प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 281–290
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 281–290
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य षोडशोप्रजापतिनिरूपणं प्राण उसके अपान, उदान, समान, व्यानरूप में परिणत होता है । अध्यात्म का यह पञ्चप्राणात्मक होता है । प्राण से ( जो कि स्वायम्भुव होने से परोरजा एवं ऋषिनाम से भी प्रसिद्ध है ) उत्पन्न प्राप्य प्राणोत्पादक इसी प्राण को हमने पूर्व में ' ब्राह्मप्राण ' कहा है । दूसरा है- वैष्णव आप्यप्राण । यह श्रप्य-प्राण ' श्रद्धा ' उत्पन्न करता है । श्रद्धा एक प्रकार का सौम्यप्राण है - स्नेहतत्त्व है । यह श्रद्धातत्त्व प्राण से उत्पन्न होता है, अतएव इसके लिए- ' श्रद्धा वा आपः १ - यह कहा जाता है । इस श्रद्धा - तत्त्व का चान्द्रमण्डल में विकास होता है । चान्द्र द्वारा अन्न में श्रद्धा का आगमन होता है । अन्नद्वारा वह हमारे में आती है । अन्न दिव्यासुरभेद से भिन्न - भिन्नधर्म्मवाले होते हैं । घटाकाश- पटाकाशवत् वह श्रद्धातत्त्व जैसे - जैसे अन्न से युक्त होता है, उसकी प्रकृति वैसी - वैसी ही हो जाती है एवं इस अन्न को खाने वाले के की श्रद्धा भी वैसी ही रहती है । जो दूषित अन्न खाते हैं- उनकी श्रद्धा का सम्बन्ध दूषित पदार्थों साथ ही रहता है । अन्न द्वारा ग्रागत श्रद्धारस क्रमिक विशकलन से मन में जाकर प्रतिष्ठित होता है । जैसे प्रज्ञानपुरुष काममय है, एवमेव इस श्रद्धारस के सम्बन्ध से यह श्रद्धामय है । चान्द्रभाग सोम हैं । ' स्वमिमा ओषधीः सोम विश्वाः २ - के अनुसार यही चान्द्र सोम औषधि बनता है । यह सोम श्रद्धामय है । है । श्रद्धा पारमेष्ठ्य आप्यप्राण से उत्पन्न ' स्नेहतत्त्व ' है । वह इसी चान्द्रसोम में प्रतिष्ठित इसी के सम्बन्ध से सोम में संकोचधर्म्म उत्पन्न होता है । स्थूल पानी में भी वही श्रद्धारस है, अतएव उसमें भी स्नेहगुण है । इसी गुण के कारण आटे के विशकलित परमाणु परस्पर जुड़ जाते हैं । गेंद में है । ' श्रद्धा ' का भाग और भी अधिक है, अतः फटे कागज को जोड़ने के लिए उसकी आवश्यकता होती निदर्शनमात्र है । संसार में जितने भी ' चेप ' वाले पदार्थ हैं- स्नेहधर्म्मा हैं, सबमें सोममय श्रद्धारस विद्यमान है ॥ वही श्रद्धारस मनुष्य के मन में आता है । अन्न में सोममयी श्रद्धा है । सोमभाग मन बन जाता है, अतएव तद्गतश्रद्धा इसी सौम्य मन में व्याप्त हो जाती है । चूंकि श्रद्धा का आगमन अन्न द्वारा यह जैसा होता अन्न खाता अन्न के गुणदोष अनुशयरूप से श्रद्धा से युक्त होकर मन में प्रतिष्ठित हो जाते हैं । है, इसके मन में वैसी ही श्रद्धा होती है । पूर्वजन्म के संस्कारों के साथ भी इस श्रद्धा का सम्बन्ध है । श्रद्धा के प्रभाव से मन विषयों से सम्बन्ध रखने में समर्थ होता है । बस, जैसी इसकी श्रद्धा होती है-वैसे ही विषयों पर मन दौड़ता है । आस्तिक्य, देवार्चन, गुरुभक्ति, अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि भावों पर उसी की श्रद्धा जाती है जो कि दिव्य संस्कारयुक्त है एवं दिव्य अन्न खाता है । विपरीतता में बुरे कार्य्यो के साथ श्रद्धा का सम्बन्ध होता है । इसी अभिप्राय से-" श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः " ॥३ " तं यथा यथोपासते तदेव भवति इत्यादि " | " — यह कहा जाता है । १- द्रष्टव्य तैत्ति ० उप ० ३।२।४।१ । ३- गीता १७।३ । २ - ऋग्वेद मं ० ११६१।२ । ४- शत ० ब्रा ० १०।५।२।२० [ २६७ ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य षोडशीप्रजापतिनिरूपणे श्रद्धामय मन ( श्रद्धा के द्वारा ) जिससे बद्ध हो जाता है - उसी में डूब जाता है - तन्मय हो जाता अतएव उसके गुणदोष के विवेक करने में असमर्थ रहता है । वह उसे अच्छा ही समझता है । चाहे फिर उसमें दोष ही क्यों न हों? इसीलिए दार्शनिक लोग श्रद्धा का - ' दोषदर्शनानुकूल प्रतिबन्धकवृत्ति धारणतत्वम् ' - यह लक्षण किया करते हैं । उस वस्तु को ( चाहे वह असत् ही हो - बुरी ही हो ) श्रद्धा के प्रभाव से श्रद्धामय मन सत् ( अच्छी - उपादेय ) समझ कर उस पर प्रतिष्ठित हो जाता है, अतएव ' श्रत् ( सत्यत्वं ) दधाति विषयेषु यया शक्त्या ' - इस व्युत्पत्ति से इसे ' श्रद्धा ' कहा जाता है । गुरु पर श्रद्धा है । अब चाहे उसमें दोष हो, परन्तु शिष्य की उस पर दृष्टि जाती ही नहीं । मन को काममय बतलाया जाता है । यह काम उसी श्रद्धामय मन की श्रद्धा के अनुसार ही होता है, अतः श्रद्धा को ' कामनाओं की माता ' कहा जाता है । श्रद्धा ही सोम की माता है । श्रद्धा के स्नेहतत्त्व का ही चन्द्रमण्डल में सोमरूप से विकास होता है । सौर दिव्याग्नि में श्रद्धातत्त्व आहुत होकर सोमरूप में परिणत होता है - जैसा कि पञ्चाग्निविद्या में निरूपण किया जाएगा । दीक्षा - तप - श्रद्धा तीनों एक लोक में ( पारमेष्ठ्य लोक में ) उत्पन्न होती हैं । परमेष्ठी के ऊपर तपोलोक है । यहाँ तप का प्रादुर्भाव होता है । दीक्षा का स्वयम्भू से सम्बन्ध है । स्वयम्भू में - वेद, सूत्र, नियति - ये तीन मनोता हैं । तीनों में नियति ( अन्तर्यामी ) ही दीक्षा की जननी है । इस दीक्षा से दीक्षित सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि सारे पदार्थ दीक्षित होकर श्रद्धा द्वारा अपना - अपना तप ( व्यापार ) कर रहे हैं । ' अधिकारसमर्पणम् ' ही दीक्षा है । सब इसी दीक्षा से अधिकृत होकर प्राकृतिक नित्ययज्ञ में सम्मिलित हो रहे हैं, अतएव वैध - यज्ञ में यजमान तब तक यज्ञ नहीं कर सकता जब तक कि वह दीक्षित नहीं बन जाता है । दीक्षित पदार्थ ( जड़चेतनात्मक उभयविध ) कुछ कर्म्म करता है । वह कम्मं ही तप है । यह उस तपोलोक की वस्तु है । तत्तत्कर्म में प्रवृत्त मनुष्य की तत्तत्कर्म में श्रद्धा होती । यह श्रद्धा पारमेष्ठ्य प्राण से उत्पन्न स्नेहतत्त्व है । स्वयम्भू सत्यलोक है! दीक्षा यहीं की वस्तु है, अतएव दीक्षित यजमान के लिए ' तस्माद् दीक्षितो नानृतं वदेत् ' - यह आज्ञा दी जाती है । तपोलोक से आगत तप, सत्यस्वयम्भू से आगत नियतिसत्यरूपा दीक्षा, पारमेष्ठ्य सोममयी श्रद्धा से युक्त होते हैं । एक ओर दीक्षा है, दूसरी ओर तप है । मध्य में श्रद्धामय तप है । यहीं वायव्य गन्धर्वप्राण है । यही दीक्षा तपोवेष्टित श्रद्धामय सोम की तत्रस्थ आप्य श्रसुरप्राण के आक्रमण से रक्षा करती है, अतएव गन्धर्वो को सोमरक्षक कहा जाता है । भूपृष्ठ से निकलकर प्रबल वेग से ऊपर जाने वाला सुपर्ण नाम से प्रसिद्ध गायत्राग्नि वहाँ जाकर कुशीभूत ( दीवार भूत ) दीक्षा - तप - श्रद्धा मय सोम तीनों को लाकर भूमण्डल के अग्नि में प्राहुत करता रहता है । अग्नि के द्वारा ही ये तीनों तत्त्व हमें प्राप्त होते हैं । इस रहस्य का प्रतिपादन करने वाला कल्पित आख्यान ब्राह्मणग्रन्थों में-' सौपर्णाख्यान ' नाम से प्रसिद्ध है । अस्तु, इस अप्राकृत विषय को हम अधिक नहीं बढाना चाहते । यहाँ हमें यही बतलाना है कि आप्यप्राण से श्रद्धातत्त्व उत्पन्न होता है । यह सोममय है, अतएव इसे आहुतिद्रव्य भी माना जाता है । निम्नलिखित ब्राह्मणवचन इसी श्रद्धातत्त्व का वैज्ञानिक स्वरूप हमारे सामने रखते हैं— [ २६६ ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य " श्रद्धयाऽग्निः समिध्यते । श्रद्धया विन्दते हविः । षोडशी प्रजापतिनिरूपण श्रद्धां भगस्य मूर्द्धनि ( सूर्य्यो भगः - तदुपरि ) वचसाऽऽवेदयामसि ॥
श्रद्धां देवा यजमानाः वायुगोपा उपासते ।
श्रद्धां हृदय्ययाऽऽकूत्या । श्रद्धया हूयते हविः ॥
श्रद्धां प्रातर्हवामहे । श्रद्धां मध्यन्दिनं परि ।
श्रद्धां सूर्यस्य निश्चि । श्रद्धे श्रद्धापयेह मा ॥
श्रद्धा देवानधिवस्ते । श्रद्धा विश्वमिदं जगत् । श्रद्धां कामस्य मातरम् । हविषा वर्द्धयामसि " ॥ ' • श्रद्धा पारमेष्ठ्य आप्यप्राणमयी है । श्रापः ही मैथुनी सृष्टि का आरम्भण है, अतएव तद्रूपिणी श्रद्धा के लिए ' श्रद्धा विश्वमिदं जगत् ' - यह कहा जाता है । उस विज्ञानपुरुष के आपोभाग से ही यह तत्त्व उत्पन्न हुआ है । तीसरी है - वाक् । वाक् आकाश है । दूसरे शब्दों में वाक् से ( अमृताकाश से ) मर्त्याकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी - ये पाँच तत्त्व उत्पन्न होते हैं । वाक् पञ्चभूत की जननी है । यह पूर्व के ' सत्यानृत ' - प्रकरण में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । वाक् ही उत्तरोत्तर के क्रमिक चिति-सम्बन्ध से क्रमश: पाँच भूतों में परिणत होती है । चौथी है - अन्नकला । अन्नकला से पाँच इन्द्रिएँ और मन उत्पन्न होते हैं । इसी प्राणरूप अन्न से स्थूल अन्न, तद्द्द्वारा मन और इन्द्रिएँ उत्पन्न होती हैं । इस प्रकार अन्न से अन्न, मन, इन्द्रिएँ- ये तीन कलाएँ उत्पन्न होती हैं । इस अन्न से स्थूल अन्न द्वारा वीर्य्यकला उत्पन्न होती है । अन्न से सोम अभिप्रेत है । वही सोम पर्जन्यद्वारा पानी बनता हुआ औषधि बनता है । औषधि अन्न इसी सोम से उत्पन्न हुआ है । अन्न में भूत, प्राण, प्रज्ञा - तीन भाग हैं । भूतभाग पार्थिव है । प्राणभाग ग्रान्तरिक्ष्य है एवं प्रज्ञाभाग दिव्य है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । शरीर में भी ये ही तीन भाग हैं । वैश्वानराग्निमय धातुसमष्टि भूतभाग है । तैजस वायुविशिष्ट इन्द्रियसमष्टि प्राणभाग है एवं प्राज्ञ-संपरिष्वक्त प्रज्ञानभाग प्रज्ञामात्रा है । यही पूर्वोक्त मन, प्राण, वाक् है । मन आध्यात्मिक मन है । प्राण इन्द्रिएँ हैं । वाग्भाग आध्यात्मिक अन्न है । अन्न को भोग्य कहते हैं । शरीर का इन्द्रियों द्वारा मन भोग करता है, अतएव धातुरूप शरीर को हम ' अन्न ' कहने के लिए तय्यार । उस विज्ञानपुरुष की अन्नकला से - मनः प्राणवाङ्मय अन्न उत्पन्न होता है । अन्न का स्थूलभाग शरीररूप अन्न का पोषक होने से अन्न है । ग्रन्नगत प्राणभाग- आध्यात्मिक प्रारणरूप इन्द्रियवर्ग का पोषक होने से इन्द्रिय-१- ते ० ब्रा ० २८८।६-८ । [ २६६ ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशीप्रजापतिनिरूपण स्थानीय है । सूक्ष्म चेतनामय सोमभाग मन का उपकारक होने से मनःस्थानीय है । इस प्रकार अन्नकला से उत्पन्न एक ही अन्न में अन्न, इन्द्रिय, मन - तीन कलाओं की सत्ता सिद्ध हो जाती है । वह अन्नभाग स्वयं त्रिकल है, अतः अन्नरूप में परिणत होकर वह मन इन्द्रिय अन्न- इन तीन कलानों में परिणत होता है । यही अन्न वीर्यकला का भी जनक है । अन्न सोम है । यह श्रद्धायुक्त पारमेष्ठ्य तत्त्व है । परमेष्ठिरूपसोम स्वयम्भू और सूर्य्यं दोनों का रस लेकर वीर्य्ययुक्त बन जाता है । पारमेष्ठ्य सोमान ही महान् का स्वरूपसंपादक । यही सोमान्न विज्ञानपुरुष की चौथी कला है । ऊपर ब्रह्म स्वयम्भू है | नीचे क्षत्र सूर्य्य है । परमेष्ठी में ही एक वायुविशेष और है । वह ' द्युतानमारत ' नाम से प्रसिद्ध है । ' यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः - के अनुसार दोनों का इससे सम्बन्ध होता है । ब्रह्म ब्रह्मवीर्य्य है । क्षत्रइन्द्र क्षत्रवीर्य्य है । ' बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ' १- के अनुसार सौर इन्द्र के ऊपर अमृतमण्डल के अन्त में उत्तमस्थानीय आंगिरस बृहस्पति है वही ब्रह्म है । यह स्वायम्भुव ब्रह्मप्राण का अंशभूत होने से ही ' ब्रह्म ' कहलाता है । इसके नीचे इन्द्र है । यहाँ का सोम इन दोनों से युक्त रहता है । तीसरे ' द्युतानमारत ' से भी सम्बन्ध रखता है । आपः, वायु, सोम में इस मध्यपतित भार्गव वायु की शिव - हंस- द्युतानमारुत आदि अनेक जातियाँ हैं । इनमें द्युतान-मारुत ही विड्वीय्यं कहलाता है । इन तीनों वीर्य्यो का इस अन्नसोम से सम्बन्ध रहता है । इस प्रकार इस चौथे अन्नरूप सौम्यप्राण में अन्न, इन्द्रिय, मन, वीर्य्य - इन चार की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन चारों से अन्न उत्पन्न होता है, अतएव अन्न चतुष्कल है । स्थूलभाग श्रन्नकला है । प्राणभाग इन्द्रिय-स्थानीय है । सोमभाग मनःस्थानीय है एवं ब्रह्म इन्द्र - यु तीनों भाग वीर्य्यस्थानीय है । अन्न को खाने से वीर्य का विकास होता है, अतएव यहाँ ' अन्नाद् वीर्य्यम् ' कहा है । ' मुण्डकोपनिषत् ' में महान् की कलाओं का निरूपण करते हुए- ' अन्मात् प्राणो मनो वीर्य्यम् ' कहा है । वहाँ वीर्य्य के लिए ' प्राण ' शब्द कहा है । वहाँ का ' प्राण ' और यहाँ का ' वीर्य्य ' शब्द समानार्थक हैं । अन्न से ऊबल उत्पन्न होता है । यह उक्बल पारमेष्ठ्य भाग है । इसी के लिए ' ऊ ' वै रसो उदुम्बरः - यह कहा जाता है । श्रौषधि, वनस्पतियों में, गूलर में यह अत्यधिक मात्रा में रहता है, अतएव उसे उदुम्बर कहा जाता है । यही ऊंबल यहाँ वीर्य्यं शब्द से अभिप्र ेत है । वहाँ प्राणशब्द से अभिप्र ेत है । प्रसंगागत एक बात और समझ लेनी चाहिए । ' अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्म्मसु चामृतम् ' का निरूपण करते हुए हम महान् ( पशुरूप ) की ११ कलाएँ बतलाने वाले हैं । यहाँ त्रिगुणरूप तीन कलाएँ बतलाई गई हैं । इसमें श्रुतिविरोध आता है । इस विरोध का परिहार करने का उपाय यही प्रतीत होता है कि के तीन गुणों को कितने ही वैज्ञानिक स्वरूपधम्मं मान लेते हैं । उनके मतानुसार रयिप्राण, महान् तीन गुण - ये पाँच स्वरूपधर्म्म हो जाते हैं । शेष अन्नादि ११ कलाएँ इनके मतानुसार पशु हैं । जो विज्ञान की कला हैं वे ही महान् की हैं । केवल महान् में खं वायु - ज्योति जल- पृथिवी - इन पाँच भौतिक कलायों का सम्बन्ध नहीं है, अतः उसमें ११ ही कलाएँ रह जाती हैं । मुण्डक इसी सिद्धान्त को रख-१- शत ० ब्रा ० ५।३।५।७ । [ २७० ]
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षष्ठ प्रश्न १ - तप-२- मन्त्र, ३- कर्म्म-१ - मनुस्मृति १२।१४ । प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण [ २७१ ] कर महान को एकादशकलायुक्त बतलाता है । यद्यपि तावुभौ भूतसंपृक्तौ स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः १-इस मनुवचन के अनुसार महान् के साथ भी भूत ( पञ्चभूत ) का सम्बन्ध सिद्ध होता है । परन्तु वस्तुतः ऐसा नहीं है । ' विज्ञान, महान् से संपरिष्वक्त रहता है ' - केवल इस अविनाभाव को ही लक्ष्य में रखकर ' तावुभौ भूतसंपृक्त ' कह दिया है । चूंकि महान् भूतातीत ( पञ्चभूतातीत ) है, अतः उसमें ११ कलाएँ ही रह जाती हैं । कितने ही विद्वानों के मतानुसार रविप्राणमात्र ही महान् के स्वरूपधर्म हैं । त्रैगुण्य तो ' विज्ञान ' के दर्शपूर्णमास से उत्पन्न होने के कारण श्रागन्तुक ही है । जैसा कि - ' या प्राणने संभवत्यदितिर्देवतामयी ' इस कठ वचन में विस्तार के साथ बतला दिया गया है । इस मत के अनुसार त्रैगुण्यसम्बन्ध से महान् त्रिकल ही होता है । इस प्रश्न में हमने इसी मत को प्रधानता दी है । अस्तु, यह कथान्तर । प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि विज्ञानात्मा के अन्न से अन्न, इन्द्रिय, मन, वीर्य्यं चारकलाओंयुक्त अन्न उत्पन्न होता है । इसी अन्नभोग से ( अन्न खाने से ) आध्यात्मिक चारों भाग प्रतिष्ठित रहते हैं । किसी अन्न में ब्रह्मवीय्यं प्रधान है । ब्राह्मण के लिए स्ववीर्य्य रक्षार्थ वही अन्न उपादेय है । किसी में क्षत्रवीर्य्य किसी में विड्वीर्य्यं प्रधान है । ग्रन्न में तीनों हैं । प्रधाना-प्रधानता का भेद है । तत्तद्वर्ण को स्ववीर्य्यरक्षार्थं तत्तदन्न खाने चाहिए । विरोधि ग्रन्नों का परित्याग करना चाहिए । पाँच प्राण है- अन्नाद | अन्नाद अग्नि है । इससे मन्त्र, तप, लोक, नाम, कर्म्म ये पाँच कलाएँ उत्पन्न होती हैं । ' मनसश्चेन्द्रियाणां च ऐकाग्र्यं परमं तपः- तप का यही लक्षण है । इस तप से आत्मा में एक बल आता । वह बलवान् आत्मा ही उस विज्ञान को प्राप्त करने में समर्थ होता है । यही बल ' तपोबल ' नाम से प्रसिद्ध है । इस तपोबल का अग्नि से सम्बन्ध है । अग्नि हो असली बल है । इसी के आधार पर तप हो सकता है । निर्बल मनुष्य का मन, इन्द्रिएँ निर्बल हैं । वह इनका संयम क्या करेगा? तपोबल का उदय अग्निबल पर ही निर्भर है । दुर्बल मनुष्य में तपोबल का अत्यन्ताभाव है । अथवा तप प्राणव्यापार है । शरीर में जब तक अग्नि रहता है, तब तक ही व्यापार होता है । हाथ - पैर ठंडे होते ही सारा चर्खा बन्द हो जाता है । अग्नि ही तपःकला का जनक है । मन्त्र से यहाँ वेदतत्त्व अभिप्रेत है । ऋग्यजुः साम ही वेदमन्त्र हैं । ऋग् अग्नि है । यजुः वायु है । आदित्य साम है । तीनों ही अग्नि हैं । इसी अग्नित्रयी का नाम ' यज्ञमात्रिक ' वेद है । गार्हपत्य,
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण दक्षिणा, आहवनीय का इसी ( वेद ) त्रयी से सम्बन्ध है । इस त्रयी के मन्त्र, विद्या, ब्रह्म - तीन विवर्त हैं । तीनों में साधारण अन्तर है । परमार्थतः तीनों श्रभिन्न हैं । विषय देखने से श्रात्मा में एक प्रकार का संस्कार पैदा होता है । विषय देखने से हमें एक ज्ञान होता है । विषय सामने है । उसका हमें ज्ञान हो रहा है । बम, इस विषयावच्छिन्न ज्ञान का ही नाम - ' ब्रह्म ' है । इस विषयज्ञान से आत्मा पर एक प्रकार का संस्कार हो जाता है । यह संस्कार- ज्ञानमय, कम्र्म्ममय विषयभेद से भावनावासनारूप बनकर आत्मा में ( प्रज्ञान में ) प्रतिष्ठित होता है । इसी संस्कार से प्रारम्भ में होने वाले विषयज्ञान ' है । का पुनः पुनः स्मरण हुआ करता है । स्मृति का संस्कारावच्छिन्न ज्ञान से सम्बन्ध है । यही ' विद्या शब्द सुनने से भी एक प्रकार का ज्ञान होता है । बस, शब्दावच्छिन्न ज्ञान का ही नाम मन्त्र है - यही वेद है । विज्ञान - ब्रह्म एक तत्त्व है । शब्द, संस्कार, विषयरूप उपाधि से वह एक ही तीन भावों में परिणत हो जाता है । उपाधिशून्य वह एक है, अतएव ब्रह्म, वेद, विद्या- तीनों के लिए- ' त्रयं ब्रह्म, ' त्रयी विद्या ', ' त्रयो वेदा: ' - यह अभिन्न व्यवहार होता है । तीनों के लिए मनशब्द प्रयुक्त हो सकता है । तीनों का आधार विज्ञानाक्षर का अन्नादभाग है । मन्त्र ब्रह्म ( ज्ञान ) का वाचक है । ब्रह्म वेद है । वेद का मूल वाक् है । वाक् अग्नि है । अग्नि ही त्रयी विद्या है । यही त्रयीब्रह्म है । यही तीन भेद हैं । यजुः ही प्रधान ब्रह्म है । जैसा कि कठ के ब्रह्मतत्त्वनिरूपण में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । एक एक शब्दावच्छिन्न विज्ञान एक एक मन्त्र है । सर्वविज्ञानसमष्टि ब्रह्म है- प्रत्येक मन्त्र है । मन्त्र-समष्टि ब्रह्म है - यही विद्या है । यही ज्ञान है--१- विषयावच्छिन्नं विज्ञानं ब्रह्म । २- संस्कारावच्छिन्नं ( भावनावासनारूपं ) विज्ञानं - विद्या ।
३ - शब्दावच्छिन्नं विज्ञानं - वेदः ।
एकं विज्ञानं ब्रह्म । तवेवोपाधिभेदेन त्रिधा विभक्तम् ॥
१- विषयोपहितं विज्ञानं ब्रह्म -त्रयं ब्रह्म २ - संस्कारोपहितं विज्ञान विद्या - त्रयीविद्या → ' ब्रह्म ' ' मन्त्रः ' - ज्ञानं विद्या वेदः ३ - शब्दोपहितं विज्ञानं वेदः - त्रयोवेदाः ' विज्ञानं ब्रह्मत्युपासीत ' इसी मन्त्ररूपविद्या के लिए मुण्डक में महान् की कलाओं का निरूपण करते समय ' ब्रह्म ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । इस ज्ञानरूपमन्त्र का वेदत्रयी का विकास अन्नाद से ही होता अतः मन्त्ररूप ब्रह्म को हम अन्नाद की कला मानने के लिए तय्यार हैं । [ २७२ ]
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षष्ठ प्रश्न ३- तीसरा है - कर्म्म-४- लोकाः-५- नाम-स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धाम् ( सौरवाङ्मयप्राणेन ) ( चान्द्रसौम्यप्राणेन ) ( पार्थिवाग्नेयप्राणेन ) षोडशी प्रजापतिनिरूपण प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य ( स्वायम्भुव प्राकृतप्राणेन - पञ्चात्मकं पशुप्राणमसृजत ) ( पारमेष्ठ्यप्राकृताप्य प्राणेन - स्नेहरूपां श्रद्धामसृजत ) [ २७३ ] के विद्या - कर्म्म अविनाभूत हैं । चलना, फिरना, सोना, उठना, बैठना सारे कर्म्म- श्रन्नादाग्नि अग्नि आधार पर हैं - इसी से उत्पन्न होते हैं । ' प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति के अनुसार यही कर्म्म सदा जाग्रत् रहता है । जब तक यह जाग्रत् रहता है तभी तक सारे कर्म होते हैं, अतः मन्त्रवत् को भी हम अन्नाद से ही निकला हुआ मानने के लिए तय्यार हैं । पृथिवी अन्तरिक्ष - यो तीन लोक हैं । अध्यात्म में मूलद्वार से नाभि तक पृथिवीलोक है । नाभि से हृदय तक अन्तरिक्षलोक है । हृदय से मस्तक तक द्युलोक है । तीनों क्रमशः प्राण, अपान, व्यानाग्निमय है । तीनों में क्रमशः वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ प्रतिष्ठित हैं । वैश्वानर अग्नि है, तेजस वायु है भी एवं प्राज्ञ श्रादित्य है । तीनों आत्माग्नि हैं । आत्माग्नियुक्त लोकाग्नि का प्रभव प्रतिष्ठा परायण वही है । लोक तक अर्थब्रह्म है । नाम शब्दब्रह्म है । अर्थब्रह्मवत् शब्दब्रह्म भी उसी से उत्पन्न होता है ॥ उसी के लिए यहाँ नामशब्द प्रयुक्त हुआ है । प्राण, आपः, वाक्, अन्न, अन्नाद से अर्थसृष्टि होती है अन्नाद से शब्दसृष्टि होती है । ' अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् ' के अनुसार एवं ' आत्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान् ' ० - इत्यादि शिक्षा के अनुसार सारे वर्णं भी इसी से उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार तप, मन्त्र, हैं । जैसा कि लोक, कर्म्म, नाम- पाँचों उसी से उत्पन्न होते हैं । कुल मिलाकर १६ कलाएँ हो जाती आगे की तालिका से स्पष्ट हो जाएगा-( खं, वायुः, ज्योतिः, आप:, पृथिवी - इति पञ्चभूतमसृजत ) ( इन्द्रियं मनः, अन्नं ( अन्नाद् ) वीर्य्यमसृजत ) ( तपः, मन्त्राः, कर्म्म, लोका: ( लोकिनश्च ), लोकेषु नाम च )
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षष्ठ प्रश्न १- ब्रा ० प्राणात् २- आप्यप्राणात्-291 प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य ' सोऽयं विज्ञानात्मा षोडशकलः ' १- प्राणः ( प्राणापानादयः पञ्च ) १२ श्रद्धा, षोडशी प्रजापतिनिरूपण ( विषयेन सह मनसो बन्धने कारणभूतं स्नेहतत्त्वम् ) ( शरीरगतानि छिद्राणि ) ३- वाङ्मय प्रारणात् -३- खम्, ४ - वायुः ( श्वासप्रश्वासौ ) ५- ज्योतिः ( शरीरगता - उष्मा ) ६- आपः ( लोहितं श्लेष्मा - रेतः- कफादि ) ४- अन्नात् -७- पृथिवी ( शरीरम् - अस्थिमांसादिघनद्रव्याणि ) ८- इन्द्रियम् ( ज्ञानेन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि ) ६ - मनः ( प्रज्ञान मनः ) १० - अन्नम् ( गोधूमादयः ) ११- वीर्य्यम् ( ब्रह्म - क्षत्र - विट् त्रिविधम् ) १२- तपः ( आत्मबलम् ) ५- अन्नादात्-१३- मन्त्राः ( ब्रह्म - ज्ञानम् ) १४ - लोकाः ( लोकिनश्च ) वस्तिः, उदरः, उरः, शिरः, गुहाः I १५ - कम् ( कम्मं ) - क्रिया १६ - नाम ( रूपं च ), - वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ ) यह विज्ञानात्मा प्रज्ञानात्मा नाम से प्रसिद्ध मन के ऊपर प्रतिष्ठित रहकर ही इन १६ कलाओं का भोग करने में समर्थ होता है । श्रायुप्राणरूप विज्ञान- ' मनोधिकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे ' के अनुसार प्रज्ञान मन के द्वारा ही प्रतिष्ठित होता है, अतएव ऐतरेय ने पूर्वोक्त १६ कलाओं का प्रज्ञान से भी सम्बन्ध मान लिया है । परन्तु वस्तुतः ये कलाएँ विज्ञान की हैं । प्रज्ञान की अपनी प्रातिस्विक २४ कलाएँ हैं जिनका कि केनोपनिषत् में विस्तार के साथ निरूपण किया जा चुका है । प्रज्ञान ही उन [ २७४ ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण विज्ञान की १६ कलाओं की प्रतिष्ठा है । प्रज्ञान भोगायतन है । उस पर प्रतिष्ठित १६ कला भोग हैं । प्राणअबादि पाँचों प्राण भोगसाधन हैं । विज्ञान भोक्ता है । यह भोगसंस्कार प्रज्ञान पर ही होता है, अतः विज्ञान के लिए ' असंगोह्ययं पुरुषः ' - यह कहा जाता है । प्रज्ञानयुक्त विज्ञान की ( प्रज्ञान के आधार-रूप होने से ) प्रज्ञानरूप से इन्हीं सोलह कलाओं का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है-" एष ब्रह्म । एष इन्द्रः । एष प्रजापतिः । एते सर्वे देवाः । इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश प्रापो ज्योतींषि इत्येतानि च क्षुद्रमिश्रा-णीव । बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि ' । तत् सर्वं प्रज्ञानेत्रम् " ॥ ' कलाएँ हैं वस्तुतः विज्ञान की । प्रज्ञान पर ये प्रतिष्ठितमात्र हैं । इसी का स्पष्टीकरण करती हुई आगे जा कर श्रुति कहती है-" प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं, प्रज्ञानेत्रो लोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा " ॥ " बस, हमारा चौथा मन्त्र इसी अर्थ का निरूपण करता है— ॥ इति प्रथमोऽर्थः ॥१ ॥
अथ द्वितीयोऽर्थ: -अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर - यह त्रित्ववाद ही उपनिषदों का मूल है । उपनिषदों का ही क्या सारे ' शब्द ' ब्रह्म का मूल है । इस त्रित्ववाद के आधार पर सृष्टिविद्या तीन भागों में विभक्त है । कितने ही वैज्ञानिक अव्यय से सृष्टिधारा मानते हैं । कितने ही वैज्ञानिक अक्षर से सृष्टि का विकास मानते है एवं कितने ही वैज्ञानिक क्षर से सृष्टि की उत्पत्ति मानते हैं । अव्ययमूला सृष्टिविद्या उपनिषदों में ' अश्वत्थ ' विद्या नाम से प्रसिद्ध है । यह अश्वत्थमूलासृष्टि ' उर्ध्वमूला ' ' स्वयम्भू मूला ' ' मस्तकमूला ' आदि नामों व्यवहृत की जा सकती है । अव्यय को मूल मानकर सारी सृष्टि का निरूपण करना यह प्रथम उत्तमकल्प है । अक्षरमूला सृष्टिविद्या उपनिषदों में- ' हिरण्यगर्भविद्या ' - ' उद्गीथविद्या ' आदि नामों से प्रसिद्ध है । इसे ही हम ' मध्यमूला ' - ' हृदयमूला ' ' सूर्य्यमूला ' सृष्टि कहेंगे । इस प्रकार अक्षर को मूल मानकर सारी सृष्टि का निरूपण करना मध्यमकल्प है एवं क्षरमूलासृष्टि उपनिषदों में ' प्राणविद्या ' - ' उक्थविद्या ' आदि नामों से प्रसिद्ध है । इसे ही हम - ' पादमूला ' ' पृथिवीमूला ' सृष्टि कहेंगे । इस क्षर को मूल मानकर सृष्टि का निरूपण करना प्रथमकल्प है । तीनों में कोई विरोध नहीं है । वस्तुतः तीनों धाराएँ- ' सर्व सहैव ' के अनुसार एक साथ चलती हैं । ऊर्ध्वमूला अव्ययसृष्टि का आधिदैविक १- ऐतरेयोप ० ५।३ । २ - ऐतरेयोप ० ५।३ । [ २७५ ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण प्रपञ्च से घनिष्ठ सम्बन्ध है । मध्यमूला अक्षरसृष्टि का प्राध्यात्मिक प्रपञ्च से घनिष्ठ सम्बन्ध है, एवं अघोमूला क्षरसृष्टि का आधिभौतिक प्रपञ्च के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है । स्वयम्भू से परमेष्ठी, परमेष्ठी से सूर्य्य, सूर्य्यं से पृथिवी, पृथिवी से चन्द्रमा - यह उत्तमकल्प है । पृथिवी से चन्द्रमा, चन्द्रमा से सूर्य, सूर्य्यं से परमेष्ठी, परमेष्ठी से स्वयम्भू - यह प्रथमकल्प है । मध्यस्थ अमृतमर्त्यभावापन्न सूर्य्यं के अमृतभाग से परमेष्ठी- स्वयम्भू, मत्र्त्यभाग से चन्द्रमा पृथिवी- यह मध्यमकल्प है । उपनिषत् प्रधानरूप से अध्यात्म का निरूपण करता है । अध्यात्मसृष्टि के मूलाधार का ' सूर्य्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च ' के अनुसार मध्यपतित सौर अक्षर से सम्बन्ध है, अतएव उपनिषदों में इसी मध्यमूला सृष्टि को ( प्रायः ) अधिक माहात्म्य दिया जाता है । मध्यमूल अक्षर अव्ययात्मक्षराविनाभूत है । ऐसा अक्षर सूर्य में आकर ' विज्ञान ' नाम धारण कर लेता है । यह सूर्य्य लोकचक्षु है । सारा विश्व इसी से देखने में समर्थ हो रहा है । चक्षुरिन्द्रिय का सम्बन्ध इसी से है । यह सौराक्षर विज्ञानात्मा नाम से प्रसिद्ध होता हुआ आध्यात्मिक सोममय प्रज्ञानात्मा पर प्रतिष्ठित होता है । इसी विज्ञानप्रकाश से प्रकाशित होता हुआ प्रज्ञानमन इन्द्रियों द्वारा विषय देखने में समर्थ होता है । इस प्रकार प्रज्ञानविज्ञानभेद से अध्यात्म में दो देखने वाले हो जाते हैं । इनमें प्रज्ञान विषय की प्रोर ही झुका रहता है । प्रज्ञान विना विषय के देखने में असमर्थ है । विषय को तभी देख सकता है, जबकि विज्ञान के समीप बैठा हो । विज्ञान-प्रकाश के समीप रहकर विषयमात्र देखना इसका ( प्रज्ञान का ) काम है, अतएव वैज्ञानिकों ने इसका नाम ' उपद्रष्टा ' रक्खा है । परन्तु विज्ञानसूर्य्यं चान्द्रप्रज्ञानवत् परज्योति नहीं है - अपि तु स्वज्योति है । सब ओर से प्रकाशित रहता है । विषय को भी देखता है । विना विषय के भी अपने व्यापार में समर्थ रहता है । चूँकि इसकी द्रष्टृत्वशक्ति ( स्वज्योतिर्भाव के कारण ) सब ओर काम करती है, अतएव इसे ' परिद्रष्टा ( परितः सर्वतः द्रष्टा ) - कहा जाता है । आधिदैविकमण्डल में सूर्य परिद्रष्टा है - चन्द्रमा उपद्रष्टा है । चन्द्रमा में जो प्रकाश है वह ' अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे ' " के अनुसार इसी सूर्य्यं से आया हुआ है । अध्यात्म में विज्ञान परिद्रष्टा है- प्रज्ञान उपद्रष्टा है । यह आध्यात्मिक विज्ञान उस प्राविदैविक अक्षररूप विज्ञान का अंश है । इसी को मूल मानकर सृष्टि का विकास मानने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत तीनों का प्रभव - प्रतिष्ठा-परायण यही मध्य का सौर अक्षर है । यही सौर अक्षर आग्नेयभाव के कारण ' हिरण्यगर्भ ' नाम से प्रसिद्ध है । सृष्टि में सबसे पहले इसी का विकास होता है । स्वयम्भूपरमेष्ठीरूप द्युलोक एवं चन्द्र-पृथिवीरूप पृथिवीलोक दूसरे शब्दों में स्वयम्भू परमेष्ठीरूप अमृतमण्डल, चन्द्रपृथिवीरूप मर्त्यमण्डल दोनों इसी से प्रादुर्भूत हुए हैं—
" हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम " ॥
१ - ऋग्वेद मं ० ११८४ । १५ । २ - ऋग्वेद मं ० १०।१२१।१ । [ २७६ ]