वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 111–120
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120
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बालकाण्डे अष्टादशः सर्गः ९९ तैरियं पृथिवी शूरैः सपर्वतवनार्णवा । बभूव भूर्भीमशरीररूपैः कर्णा विविधसंस्थानैर्नानाव्यञ्जनलक्षणैः ॥ ३६ ॥ समावृता रामसहायहेतोः ॥ ३७ ॥
उन सबके शरीर और पार्थक्यसूचक लक्षण नाना वे वानरयूथपति मेघसमूह तथा पर्वतशिखरके प्रकारके थे । वे शूरवीर वानर पर्वत, वन और समुद्रोंसहित समान विशालकाय थे । उनका बल महान् था । उनके समस्त भूमण्डलमें फैल गये ॥ ३६ ॥ शरीर और रूप भयंकर थे । भगवान् श्रीरामकी सहायता
तैर्मेघवृन्दाचलकूटसंनिभै- लिये प्रकट हुए उन वानर वीरोंसे यह सारी पृथ्वी भर र्महाबलैर्वानरयूथपाधिपैः गयी थी ॥ ३७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अष्टादशः सर्गः राजाओं तथा ऋष्यशृंगको विदा करके राजा दशरथका रानियोंसहित पुरीमें आगमन, श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नके जन्म, संस्कार, शील - स्वभाव एवं सद्गुण, राजाके दरबारमें विश्वामित्रका
निर्वृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे महात्मनः ।
प्रतिगृह्यामरा भागान् प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥ १ ॥
महामना राजा दशरथका यज्ञ समाप्त होनेपर देवतालोग अपना - अपना भाग ले जैसे आये थे, वैसे लौट गये ॥१ ॥
समाप्तदीक्षानियमः पत्नीगणसमन्वितः ।
प्रविवेश पुरीं राजा सभृत्यबलवाहनः ॥ २ ॥
दीक्षाका नियम समाप्त होनेपर राजा अपनी पत्नियोंको साथ ले सेवक, सैनिक और सवारियोंसहित पुरीमें प्रविष्ट हुए ॥ २ ॥
यथार्ह पूजितास्तेन राज्ञा च पृथिवीश्वराः ।
मुदिताः प्रययुर्देशान् प्रणम्य मुनिपुंगवम् ॥ ३ ॥
भिन्न - भिन्न देशोंके राजा भी ( जो उनके यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आये थे ) महाराज दशरथद्वारा यथावत् सम्मानित हो मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंगको प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने - अपने देशको चले गये ॥ ३ ॥
श्रीमतां गच्छतां तेषां स्वगृहाणि पुरात् ततः ।
बलानि राज्ञां शुभ्राणि प्रहृष्टानि चकाशिरे ॥ ४ ॥
अयोध्यापुरीसे अपने घरको जाते हुए उन श्रीमान् नरेशोंके शुभ्र सैनिक अत्यन्त हर्षमग्न होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ४ ॥
गतेषु पृथिवीशेषु राजा दशरथः पुनः प्रविवेश पुरीं श्रीमान् पुरस्कृत्य द्विजोत्तमान् ॥५ ॥ ।
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_5_2_Front आगमन और उनका सत्कार उन राजाओंके विदा हो जानेपर श्रीमान् महाराज दशरथने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको आगे करके अपनी पुरीमें प्रवेश किया ॥ ५ ॥
शान्तया प्रययौ सार्धमृष्यश्रृंगः सुपूजितः ।
अनुगम्यमानो राज्ञा च सानुयात्रेण धीमता ॥ ६ ॥
राजाद्वारा अत्यन्त सम्मानित हो ऋष्यश्रृंग मुनि भी शान्ताके साथ अपने स्थानको चले गये । उस समय सेवकोंसहित बुद्धिमान् महाराज दशरथ कुछ दूरत उनके पीछे - पीछे उन्हें पहुँचाने गये थे ॥ ६ ॥
एवं विसृज्य तान् सर्वान् राजा सम्पूर्णमानसः ।
उवास सुखितस्तत्र पुत्रोत्पत्तिं विचिन्तयन् ॥ ७ ॥
इस प्रकार उन सब अतिथियोंको विदा करके सफलमनोरथ हुए राजा दशरथ पुत्रोत्पत्तिकी प्रतीक्षा करते हुए वहाँ बड़े सुखसे रहने लगे ॥७ ॥
ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः ।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥ ८ ॥
नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु ।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ॥ ९ ॥
प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम् ॥ १० ॥
यज्ञ - समाप्तिके पश्चात् जब छः ऋतुएँ बीत गयीं, तब बारहवें मासमें चैत्रके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्नमें कौसल्यादेवीने दिव्य लक्षणोंसे युक्त, सर्वलोकवन्दित जगदीश्वर श्रीरामको
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१०० श्रीमद्वाल्मीकीय रामाय जन्म दिया । उस समय ( सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र - ये ) पाँच ग्रह अपने - अपने उच्च स्थानमें विद्यमान थे तथा लग्नमें चन्द्रमाके साथ बृहस्पति विराजमान थे ॥
विष्णोरर्धं महाभागं पुत्रमैक्ष्वाकुनन्दनम् ।
लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तोष्ठं दुन्दुभिस्वनम् ॥ ११ ॥
वे विष्णुस्वरूप हविष्य या खीरके आधे भागसे प्रकट हुए थे । कौसल्याके महाभाग पुत्र श्रीराम इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले थे । उनके नेत्रोंमें कुछ - कुछ लालिमा थी । उनके ओठ लाल, भुजाएँ बड़ी - बड़ी और स्वर दुन्दुभिके शब्दके समान गम्भीर था ॥ ११ ॥
कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेणामिततेजसा ।
यथा वरेण देवानामदितिर्वज्रपाणिना ॥ १२ ॥
उस अमिततेजस्वी पुत्रसे महारानी कौसल्याकी बड़ी शोभा हुई, ठीक उसी तरह, जैसे सुरश्रेष्ठ वज्रपाणि इन्द्रसे देवमाता अदिति सुशोभित हुई थीं ॥ १२ ॥
भरतो नाम कैकेय्यां जज्ञे सत्यपराक्रमः ।
साक्षाद् विष्णोश्चतुर्भागः सर्वैः समुदितो गुणैः ॥ १३ ॥
तदनन्तर कैकेयीसे सत्यपराक्रमी भरतका जन्म हुआ, जो साक्षात् भगवान् विष्णुके ( स्वरूपभूत पायस खीरके ) चतुर्थांशसे भी न्यून भागसे प्रकट हुए थे । ये समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे ॥ १३ ॥
अथ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्राजनयत् सुतौ ।
वीरौ सर्वास्त्रकुशलौ विष्णोरर्धसमन्वितौ ॥ १४ ॥
इसके बाद रानी सुमित्राने लक्ष्मण और शत्रुघ्न – इन दो पुत्रोंको जन्म दिया । ये दोनों वीर साक्षात् भगवान् विष्णुके अर्धभागसे सम्पन्न और सब प्रकारके अस्त्रोंकी विद्यामें कुशल थे ॥ १४ ॥
पुष्ये जातस्तु भरतो मीनलने प्रसन्नधीः ।
सार्पे जातौ तु सौमित्री कुलीरेऽभ्युदिते रवौ ॥ १५ ॥
भरत सदा प्रसन्नचित्त रहते थे । उनका जन्म पुष्य नक्षत्र तथा मीन लग्नमें हुआ था । सुमित्राके दोनों पुत्र आश्लेषा नक्षत्र और कर्कलग्नमें उत्पन्न हुए थे । उस समय सूर्य अपने उच्च स्थानमें विराजमान थे ॥ १५ ॥
राज्ञः पुत्रा महात्मानश्चत्वारो जज्ञिरे पृथक् ।
गुणवन्तोऽनुरूपाश्च रुच्या प्रोष्ठपदोपमाः ॥ १६ ॥ ।
१. प्रोष्ठपदा कहते हैं – भाद्रपदा नक्षत्रको । उसके दो तारे हैं । यह बात ज्यौतिषशास्त्रमें प्रसिद्ध है । ( रा ० ति ० ) राजा दशरथके ये चारों महामनस्वी पुत्र पृथक्-पृथक् गुणोंसे सम्पन्न और सुन्दर थे । ये भाद्रपदा नामक चार तारोंके समान कान्तिमान् थे १ ॥ १६ ॥
जगुः कलं च गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खात् पतत् ॥ १७ ॥
इनके जन्मके समय गन्धर्वोंने मधुर गीत गाये 1 । अप्सराओंने नृत्य किया । देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं तथा आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ १७ ॥
उत्सवश्च महानासीदयोध्यायां जनाकुलः ।
रथ्याश्च जनसम्बाधा नटनर्तकसंकुलाः ॥ १८ ॥
अयोध्यामें बहुत बड़ा उत्सव हुआ । मनुष्योंकी भारी भीड़ एकत्र हुई । गलियाँ और सड़कें लोगोंसे खचाखच भरी थीं । बहुत - से नट और नर्तक वहाँ अपनी कलाएँ दिखा रहे थे ॥ १८ ॥
गायनैश्च विराविण्यो विरेजुर्विपुलास्तत्र वहाँ सब ओर गाने -शब्द गूँज रहे थे । दीन - दु: प्रकारके रत्न वहाँ बिखरे प्रदेयांश्च ददौ राजा ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं
वादनैश्च तथापरैः ।
सर्वरत्नसमन्विताः ॥ १ ९ ॥
बजानेवाले तथा दूसरे लोगोंके खियोंके लिये लुटाये गये सब पड़े थे ॥ १ ९ ॥
सूतमागधवन्दिनाम् ।
गोधनानि सहस्रशः ॥ २० ॥
राजा दशरथने सूत, मागध और वन्दीजनोंको देनेयोग्य पुरस्कार दिये तथा ब्राह्मणोंको धन एवं सहस्रों गोधन प्रदान किये ॥ २० ॥
अतीत्यैकादशाहं तु नामकर्म तथाकरोत् ।
ज्येष्ठं रामं महात्मानं भरतं कैकयीसुतम् ॥ २१ ॥
सौमित्रिं लक्ष्मणमिति शत्रुघ्नमपरं तथा ।
वसिष्ठः परमप्रीतो नामानि कुरुते तदा ॥ २२ ॥
ग्यारह दिन बीतनेपर महाराजने बालकोंका नामकरण - संस्कार किया । उस समय महर्षि वसिष्ठने प्रसन्नताके साथ सबके नाम रखे । उन्होंने ज्येष्ठ पुत्रका नाम ' राम ' रखा । श्रीराम महात्मा ( परमात्मा ) थे । कैकेयीकुमारका नाम भरत तथा सुमित्रा एक पुत्रका नाम लक्ष्मण और दूसरेका शत्रुघ्न निश्चित किया ॥ २१-२२ ॥ भेद हैं — पूर्वभाद्रपदा और उत्तरभाद्रपदा । इन दोनोंमें दो - दो २. रामायणतिलकके निर्माताने मूलके एकादशाह शब्दको सूतकके अन्तिम दिनका उपलक्षण माना है । उनका कहना है कि यदि ऐसा न माना जाय तो ‘ क्षत्रियस्य द्वादशाहं सूतकम् ' ( क्षत्रियको बारह दिनोंका सूतक लगता है ) इस स्मृतिवाक्यसे विरोध होगा; अतः रामजन्मके बारह दिन बीत जानेके बाद तेरहवें दिन राजाने नामकरण - संस्कार किया — ऐसा मानना चाहिये । 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_5_2_Back
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बालकाण्डे अष्टादशः सर्गः १०१
ब्राह्मणान् भोजयामास पौरजानपदानपि ।
अददद् ब्राह्मणानां च रत्नौघममलं बहु ॥ २३ ॥
राजाने ब्राह्मणों, पुरवासियों तथा जनपदवासियोंको भी भोजन कराया । ब्राह्मणोंको बहुत - से उज्ज्वल रत्नसमूह दान किये ॥ २३ ॥
तेषां जन्मक्रियादीनि सर्वकर्माण्यकारयत् ।
तेषां केतुरिव ज्येष्ठो रामो रतिकरः पितुः ॥ २४ ॥
महर्षि वसिष्ठने समय - समयपर राजासे उन बालकोंके जातकर्म आदि सभी संस्कार करवाये थे । उन सबमें श्रीरामचन्द्रजी ज्येष्ठ होनेके साथ ही अपने कुलकी कीर्ति - ध्वजाको फहरानेवाली पताकाके समान थे । वे अपने पिताकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले थे ॥ २४ ॥
बभूव भूयो भूतानां स्वयम्भूरिव सम्मतः ।
सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे लोकहिते रताः ॥ २५ ॥
सभी भूतोंके लिये वे स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान विशेष प्रिय थे । राजाके सभी पुत्र वेदोंके विद्वान् और शूरवीर थे । सब - के - सब लोकहितकारी कार्योंमें संलग्न रहते थे ॥ २५ ॥
सर्वे ज्ञानोपसम्पन्नाः सर्वे समुदिता गुणैः ।
तेषामपि महातेजा रामः सत्यपराक्रमः ॥ २६ ॥
इष्टः सर्वस्य लोकस्य शशाङ्क इव निर्मलः ।
गजस्कन्धेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु सम्मतः ॥ २७ ॥
धनुर्वेदे च निरतः पितुः शुश्रूषणे रतः । सभी ज्ञानवान् और समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे । उनमें भी सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी सबसे अधिक तेजस्वी और सब लोगोंके विशेष प्रिय थे । वे निष्कलङ्क चन्द्रमाके समान शोभा पाते थे । उन्होंने हाथीके कंधे और घोड़ेकी पीठपर बैठने तथा रथ हाँकनेकी कलामें भी सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त किया था । वे सदा धनुर्वेदका
अभ्यास करते और पिताजीकी सेवामें लगे रहते थे ।
बाल्यात् प्रभृति सुस्निग्धो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः ॥ २८ ॥
रामस्य लोकरामस्य भ्रातुर्ज्येष्ठस्य नित्यशः ।
सर्वप्रियकरस्तस्य रामस्यापि शरीरतः ॥ २ ९ ॥
लक्ष्मीकी वृद्धि करनेवाले लक्ष्मण बाल्यावस्थासे ही श्रीरामचन्द्रजीके प्रति अत्यन्त अनुराग रखते थे । वे अपने बड़े भाई लोकाभिराम श्रीरामका सदा ही प्रिय करते थे और शरीरसे भी उनकी सेवामें ही जुटे रहते थे ॥
लक्ष्मणो लक्ष्मिसम्पन्नो बहि: प्राण इवापरः ।
न च तेन विना निद्रां लभते पुरुषोत्तमः ॥ ३० ॥
सृष्टमन्नमुपानीतमश्नाति न हि तं विना । शोभासम्पन्न लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजीके लिये बाहर विचरनेवाले दूसरे प्राणके समान थे । पुरुषोत्तम श्रीरामको उनके बिना नींद भी नहीं आती थी । यदि उनके पास उत्तम भोजन लाया जाता तो श्रीरामचन्द्रजी उसमेंसे लक्ष्मणको दिये बिना नहीं खाते थे ॥ ३०३ ॥
यदा हि हयमारूढो मृगयां याति राघवः ॥ ३१ ॥
अथैनं पृष्ठतोऽभ्येति सधनुः परिपालयन् ।
भरतस्यापि शत्रुघ्नो लक्ष्मणावरजो हि सः ॥ ३२ ॥
प्राणैः प्रियतरो नित्यं तस्य चासीत् तथा प्रियः । जब श्रीरामचन्द्रजी घोड़ेपर चढ़कर शिकार खेलने के लिये जाते, उस समय लक्ष्मण धनुष लेकर उनके शरीरकी रक्षा करते हुए पीछे - पीछे जाते थे । इसी प्रकार लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न भरतजीको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थे और वे भी भरतजीको सदा प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानते थे ॥ ३१-३२३ ॥ स चतुर्भिर्महाभागैः पुत्रैर्दशरथः प्रियैः ॥ ३३ ॥
बभूव परमप्रीतो देवैरिव पितामहः । इन चार महान् भाग्यशाली प्रिय पुत्रोंसे राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होती थी, ठीक वैसे ही जैसे चार देवताओं ( दिक्पालों ) से ब्रह्माजीको प्रसन्नता होती है ॥ ३३३ ॥
ते यदा ज्ञानसम्पन्नाः सर्वे समुदिता गुणैः ॥ ३४ ॥
ह्रीमन्तः कीर्तिमन्तश्च सर्वज्ञा दीर्घदर्शिनः ।
तेषामेवंप्रभावाणां सर्वेषां दीप्ततेजसाम् ॥ ३५ ॥
पिता दशरथो हृष्टो ब्रह्मा लोकाधिपो यथा । वे सब बालक जब समझदार हुए, तब समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हो गये । वे सभी लज्जाशील, यशस्वी, सर्वज्ञ और दूरदर्शी थे । ऐसे प्रभावशाली और अत्यन्त तेजस्वी उन सभी पुत्रोंकी प्राप्तिसे राजा दशरथ लोकेश्वर ब्रह्माकी भाँति बहुत प्रसन्न थे ॥ ३४-३५३ ॥ ते चापि मनुजव्याघ्रा वैदिकाध्ययने रताः ॥३६ ॥
पितृशुश्रूषणरता धनुर्वेदे च निष्ठिताः । वे पुरुषसिंह राजकुमार प्रतिदिन वेदोंके स्वाध्याय, पिताकी सेवा तथा धनुर्वेदके अभ्यासमें दत्त - चित्त रहते थे ॥ ३६३ ॥
अथ राजा दशरथस्तेषां दारक्रियां प्रति ॥ ३७ ॥
चिन्तयामास धर्मात्मा सोपाध्यायः सबान्धवः ।
तस्य चिन्तयमानस्य मन्त्रिमध्ये महात्मनः ॥ ३८ ॥
अभ्यागच्छन्महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः । एक दिन धर्मात्मा राजा दशरथ पुरोहित तथा
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१०२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे · बन्धु - बान्धवोंके साथ बैठकर पुत्रोंके विवाहके विषयमें । विचार कर रहे थे । मन्त्रियोंके बीचमें विचार करते हुए उन महामना नरेशके यहाँ महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र पधारे ॥ ३७-३८३ ॥ स राज्ञो दर्शनाकांक्षी द्वाराध्यक्षानुवाच ह ॥ ३ ९ ॥ शीघ्रमाख्यात मां प्राप्तं कौशिकं गाधिनः सुतम् । वे राजासे मिलना चाहते थे । उन्होंने द्वारपालोंसे कहा — ' तुमलोग शीघ्र जाकर महाराजको यह सूचना दो कि कुशिकवंशी गाधिपुत्र विश्वामित्र आये हैं ' ॥ ३ ९ ३ ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य राज्ञो वेश्म प्रदुद्रुवुः ॥ ४० ॥
सम्भ्रान्तमनसः सर्वे तेन वाक्येन चोदिताः । उनकी यह बात सुनकर वे द्वारपाल दौड़े हुए राजाके दरबारमें गये । वे सब विश्वामित्रके उस वाक्यसे प्रेरित होकर मन - ही - मन घबराये हुए थे ॥ ४०३ ॥
ते गत्वा राजभवनं विश्वामित्रमृषिं तदा ॥ ४१ ॥
प्राप्तमावेदयामासुर्नृपायेक्ष्वाकवे तदा । राजाके दरबारमें पहुँचकर उन्होंने इक्ष्वाकुकुल-नन्दन अवधनरेशसे कहा - ' महाराज! महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं ' ॥ ४१३ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सपुरोधाः समाहितः ॥ ४२ ॥
प्रत्युज्जगाम संहृष्टो ब्रह्माणमिव वासवः । उनकी वह बात सुनकर राजा सावधान हो गये । उन्होंने पुरोहितको साथ लेकर बड़े हर्षके साथ उनकी अगवानी की, मानो देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका स्वागत कर रहे हों ॥४२३ ॥
स दृष्ट्वा ज्वलितं दीप्त्या तापसं संशितव्रतम् ॥ ४३ ॥
प्रहृष्टवदनो राजा ततोऽर्घ्यमुपहारयत् । विश्वामित्रजी कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे । वे अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे । उनका दर्शन करके राजाका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उन्होंने महर्षिको अर्घ्य निवेदन किया ॥ ४३३ ॥
स राज्ञः प्रतिगृह्यार्घ्यं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ४४ ॥
कुशलं चाव्ययं चैव पर्यपृच्छन्नराधिपम् । राजाका वह अर्घ्य शास्त्रीय विधिके अनुसार स्वीकार करके महर्षिने उनसे कुशल - मंगल पूछा ॥ ४४३ ॥
पुरे कोशे जनपदे बान्धवेषु सुहृत्सु च ॥ ४५ ॥
कुशलं कौशिको राज्ञः पर्यपृच्छत् सुधार्मिकः । धर्मात्मा विश्वामित्रने क्रमशः राजाके नगर, खजाना, राज्य, बन्धु - बान्धव तथा मित्रवर्ग आदिके विषयमें कुशलप्रश्न किया- ॥ ४५३ ॥
अपि ते संनताः सर्वे सामन्तरिपवो जिताः ॥ ४६ ॥
दैवं च मानुषं चैव कर्म ते साध्वनुष्ठितम् । ' राजन् आपके राज्यकी सीमाके निकट रहनेवाले शत्रु राजा आपके समक्ष नतमस्तक तो हैं? आपने उनपर विजय तो प्राप्त की है न? आपके यज्ञयाग आदि देवकर्म और अतिथि सत्कार आदि मनुष्यकर्म तो अच्छी तरह सम्पन्न होते हैं न? ' ॥ ४६३ ॥
वसिष्ठं च समागम्य कुशलं मुनिपुंगवः ॥ ४७ ॥
ऋषींश्च तान् यथान्यायं महाभाग उवाच ह । इसके बाद महाभाग मुनिवर विश्वामित्रने वसिष्ठजी तथा अन्यान्य ऋषियोंसे मिलकर उन सबका यथावत् कुशल- समाचार पूछा ॥ ४७३ ॥
ते सर्वे हृष्टमनसस्तस्य राज्ञो निवेशनम् ॥ ४८ ॥
विविशुः पूजितास्तेन निषेदुश्च यथार्हतः । फिर वे सब लोग प्रसन्नचित्त होकर राजाके दरबारमें गये और उनके द्वारा पूजित हो यथायोग्य आसनोंपर बैठे ॥ अथ हृष्टमना राजा विश्वामित्रं महामुनिम् ॥ ४ ९ ॥ उवाच परमोदारो हृष्टस्तमभिपूजयन् । तदनन्तर प्रसन्नचित्त परम उदार राजा दशरथने पुलकित होकर महामुनि विश्वामित्रकी प्रशंसा करते हुए कहा— ॥ ४ ९ ३ ॥ यथामृतस्य सम्प्राप्तिर्यथा वर्षमनूदके ॥ ५० ॥
यथा सदृशदारेषु पुत्रजन्माप्रजस्य वै ।
प्रणष्टस्य यथा लाभो यथा हर्षो महोदयः ॥ ५१ ॥
तथैवागमनं मन्ये स्वागतं ते महामुने ।
कं च ते परमं कामं करोमि किमु हर्षितः ॥ ५२ ॥
' महामुने! जैसे किसी मरणधर्मा मनुष्यको अमृतकी प्राप्ति हो जाय, निर्जल प्रदेशमें पानी बरस जाय, किसी संतानहीनको अपने अनुरूप पत्नीके गर्भसे पुत्र प्राप्त हो जाय, खोयी हुई निधि मिल जाय तथा किसी महान् उत्सवसे हर्षका उदय हो, उसी प्रकार आपका यहाँ शुभागमन हुआ है । ऐसा मैं मानता हूँ । आपका स्वागत है । आपके मनमें कौन - सी उत्तम कामना है, जिसको मैं हर्षके साथ पूर्ण करूँ? ५०–५२ ॥
पात्रभूतोऽसि मे ब्रह्मन् दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद ।
अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् ॥ ५३ ॥
' ब्रह्मन्! आप मुझसे सब प्रकारकी सेवा लेने योग्य उत्तम पात्र हैं । मानद! मेरा अहोभाग्य है, जो आपने यहाँतक पधारनेका कष्ट उठाया । आज मेरा जन्म सफल और जीवन धन्य हो गया ॥ ५३ ॥
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बालकाण्डे एकोनविंशः सर्गः १०३
यस्माद् विप्रेन्द्रमद्राक्षं सुप्रभाता निशा मम ।
पूर्वं राजर्षिशब्देन तपसा द्योतितप्रभः ॥ ५४ ॥
ब्रह्मर्षित्वमनुप्राप्तः पूज्योऽसि बहुधा मया ।
तदद्भुतमभूद् विप्र पवित्रं परमं मम ॥ ५५ ॥
' मेरी बीती हुई रात सुन्दर प्रभात दे गयी, जिससे मैंने आज आप ब्राह्मणशिरोमणिका दर्शन किया । पूर्वकालमें आप राजर्षि शब्दसे उपलक्षित होते थे, फिर तपस्यासे अपनी अद्भुत प्रभाको प्रकाशित करके आपने ब्रह्मर्षिका । पद पाया; अतः आप राजर्षि और ब्रह्मर्षि दोनों ही रूपोंमें मेरे पूजनीय हैं । आपका जो यहाँ मेरे समक्ष शुभागमन हुआ है, यह परम पवित्र और अद्भुत है ॥
शुभक्षेत्रगतश्चाहं तव संदर्शनात् प्रभो ।
ब्रूहि यत् प्रार्थितं तुभ्यं कार्यमागमनं प्रति ॥ ५६ ॥
" प्रभो! आपके दर्शनसे आज मेरा घर तीर्थ हो गया । मैं अपने - आपको पुण्यक्षेत्रोंकी यात्रा करके आया हुआ मानता हूँ । बताइये, आप क्या चाहते हैं? आपके शुभागमनका शुभ उद्देश्य क्या है? ॥ ५६ ॥
इच्छाम्यनुगृहीतोऽहं त्वदर्थं परिवृद्धये ।
कार्यस्य न विमर्शं च गन्तुमर्हसि सुव्रत ॥ ५७ ॥
‘ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं चाहता । हूँ कि आपकी कृपासे अनुगृहीत होकर आपके अभीष्ट मनोरथको जान लूँ और अपने अभ्युदयके लिये उसकी पूर्ति करूँ । ' कार्य सिद्ध होगा या नहीं ' ऐसे संशयको अपने मनमें स्थान न दीजिये ॥ ५७ ॥
कर्ता चाहमशेषेण दैवतं हि भवान् मम ।
मम चायमनुप्राप्तो महानभ्युदयो द्विज ।
तवागमनजः कृत्स्नो धर्मश्चानुत्तमो द्विज ॥ ५८ ॥
' आप जो भी आज्ञा देंगे, मैं उसका पूर्णरूपसे पालन करूँगा; क्योंकि सम्माननीय अतिथि होनेके नाते आप मुझ गृहस्थके लिये देवता हैं । ब्रह्मन्! आज आपके आगमनसे मुझे सम्पूर्ण धर्मोंका उत्तम फल प्राप्त हो गया । यह मेरे महान् अभ्युदयका अवसर आया है ' ॥ ५८ ॥
इति हृदयसुखं निशम्य वाक्यं श्रुतिसुखमात्मवता विनीतमुक्तम् । प्रथितगुणया गुणैर्विशिष्टः परमऋषिः परमं जगाम हर्षम् ॥ ५ ९ ॥ मनस्वी नरेशके कहे हुए ये विनययुक्त वचन, जो हृदय और कानोंको सुख देनेवाले थे, सुनकर विख्यात गुण और यशवाले, शम - दम आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न महर्षि विश्वामित्र बहुत प्रसन्न हुए ॥ ५ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १८ ॥
एकोनविंशः सर्गः 189 विश्वामित्रके मुखसे श्रीरामको साथ ले जानेकी माँग सुनकर राजा दशरथका दुःखित एवं मूर्च्छित होना
तच्छ्रुत्वा राजसिंहस्य वाक्यमद्भुतविस्तरम् ।
हृष्टरोमा महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत ॥ १ ॥
नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथका यह अद्भुत विस्तारसे युक्त वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्र पुलकित हो उठे और इस प्रकार बोले ॥ १ ॥
सदृशं राजशार्दूल तवैव भुवि नान्यतः ।
महावंशप्रसूतस्य वसिष्ठव्यपदेशिनः ॥ २ ॥
राजसिंह! ये बातें आपके ही योग्य हैं । इस पृथ्वीपर दूसरेके मुखसे ऐसे उदार वचन निकलनेकी सम्भावना नहीं है । क्यों न हो, आप महान् कुलमें उत्पन्न हैं और वसिष्ठ - जैसे ब्रह्मर्षि आपके उपदेशक हैं ॥ २ ॥
यत् तु मे हृद्गतं वाक्यं तस्य कार्यस्य निश्चयम् ।
कुरुष्व राजशार्दूल भव सत्यप्रतिश्रवः ॥ ३ ॥
' अच्छा, अब जो बात मेरे हृदयमें है, उसे सुनिये । नृपश्रेष्ठ! सुनकर उस कार्यको अवश्य पूर्ण करनेका निश्चय कीजिये । आपने मेरा कार्य सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा की है । इस प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाइये ॥ ३ ॥
अहं नियममातिष्ठे सिद्धयर्थं पुरुषर्षभ ।
तस्य विघ्नकरौ द्वौ तु राक्षसौ कामरूपिणौ ॥ ४ ॥
' पुरुषप्रवर! मैं सिद्धिके लिये एक नियमका अनुष्ठान करता हूँ । उसमें इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले दो राक्षस विघ्न डाल रहे हैं ॥४ ॥
व्रते तु बहुशश्चीर्णे समाप्त्यां राक्षसाविमौ ।
मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ ॥ ५ ॥
‘ मेरे इस नियमका अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुका । है । अब उसकी समाप्तिके समय वे दो राक्षस आ
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१०४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे धमके हैं । उनके नाम हैं मारीच और सुबाहु । वे दोनों बलवान् और सुशिक्षित हैं ॥ ५ ॥
तौ मांसरुधिरौघेण वेदिं तामभ्यवर्षताम् ।
अवधूते तथाभूते तस्मिन् नियमनिश्चये ॥ ६ ॥
कृतश्रमो निरुत्साहस्तस्माद् देशादपाक्रमे । ' उन्होंने मेरी यज्ञवेदीपर रक्त और मांसकी वर्षा कर दी है । इस प्रकार उस समाप्तप्राय नियममें विघ्न पड़ जानेके कारण मेरा परिश्रम व्यर्थ गया और मैं उत्साहहीन होकर उस स्थानसे चला आया ॥ ६३ ॥
न च मे क्रोधमुत्त्रष्टुं बुद्धिर्भवति पार्थिव ॥ ७ ॥
' पृथ्वीनाथ! उनके ऊपर अपने क्रोधका प्रयोग करूँ— उन्हें शाप दे दूँ, ऐसा विचार मेरे मनमें नहीं आता है ॥
तथाभूता हि सा चर्या न शापस्तत्र मुच्यते ।
स्वपुत्रं राजशार्दूल रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ८ ॥
काकपक्षधरं वीरं ज्येष्ठं मे दातुमर्हसि । ' क्योंकि वह नियम ही ऐसा है, जिसको आरम्भ कर देनेपर किसीको शाप नहीं दिया जाता; अतः नृपश्रेष्ठ! आप अपने काकपच्छधारी, सत्यपराक्रमी, शूरवीर ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको मुझे दे दें ॥ ८३ ॥
शक्तो ह्येष मया गुप्तो दिव्येन स्वेन तेजसा ॥ ९ ॥
राक्षसा ये विकर्तारस्तेषामपि विनाशने ।
श्रेयश्चास्मै प्रदास्यामि बहुरूपं न संशयः ॥ १० ॥
' ये मुझसे सुरक्षित रहकर अपने दिव्य तेजसे उन विघ्नकारी राक्षसोंका नाश करनेमें समर्थ हैं । मैं इन्हें अनेक प्रकारका श्रेय प्रदान करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥
त्रयाणामपि लोकानां येन ख्यातिं गमिष्यति ।
न च तौ राममासाद्य शक्तो स्थातुं कथंचन ॥ ११ ॥
' उस श्रेयको पाकर ये तीनों लोकोंमें विख्यात होंगे । श्रीरामके सामने आकर वे दोनों राक्षस किसी तरह ठहर नहीं सकते ॥ ११ ॥
न च तौ राघवादन्यो हन्तुमुत्सहते पुमान् ।
वीर्योत्सिक्तौ हि तौ पापौ कालपाशवशं गतौ ॥ १२ ॥
रामस्य राजशार्दूल न पर्याप्तौ महात्मनः । ' इन रघुनन्दनके सिवा दूसरा कोई पुरुष उन राक्षसोंको मारनेका साहस नहीं कर सकता । नृपश्रेष्ठ! अपने बलका घमण्ड रखनेवाले वे दोनों पापी निशाचर कालपाशके अधीन हो गये हैं; अतः महात्मा श्रीरामके सामने नहीं टिक सकते ॥ १२३ ॥
न च पुत्रगतं स्नेहं कर्तुमर्हसि पार्थिव ॥ १३ ॥
अहं ते प्रतिजानामि हतौ तौ विद्धि राक्षसौ । ' भूपाल! आप पुत्रविषयक स्नेहको सामने न लाइये । मैं आपसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि उन दोनों राक्षसोंको इनके हाथसे मरा हुआ ही समझिये ॥ १३३ ॥
अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ॥ १४ ॥
वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः । ' सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम क्या हैं - यह मैं जानता हूँ । महातेजस्वी वसिष्ठजी तथा ये अन्य तपस्वी भी जानते हैं ॥ १४३ ॥
यदि ते धर्मलाभं तु यशश्च परमं भुवि ॥ १५ ॥
स्थिरमिच्छसि राजेन्द्र रामं मे दातुमर्हसि । ' राजेन्द्र! यदि आप इस भूमण्डलमें धर्म - लाभ और उत्तम यशको स्थिर रखना चाहते हों तो श्रीरामको मुझे दे दीजिये ॥ १५३ ॥
यद्यभ्यनुज्ञां काकुत्स्थ ददते तव मन्त्रिणः ॥ १६ ॥
वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे ततो रामं विसर्जय । ' ककुत्स्थनन्दन! यदि वसिष्ठ आदि आपके सभी मन्त्री आपको अनुमति दें तो आप श्रीरामको मेरे साथ विदा कर दीजिये ॥ १६३ ॥
अभिप्रेतमसंसक्तमात्मजं दातुमर्हसि ॥ १७ ॥
दशरात्रं हि यज्ञस्य रामं राजीवलोचनम् । ' मुझे रामको ले जाना अभीष्ट है । ये भी बड़े होनेके कारण अब आसक्तिरहित हो गये हैं; अतः आप यज्ञके अवशिष्ट दस दिनोंके लिये अपने पुत्र कमलनयन श्रीरामको मुझे दे दीजिये ॥ १७३ ॥
नात्येति कालो यज्ञस्य यथायं मम राघव ॥ १८ ॥
तथा कुरुष्व भद्रं ते मा च शोके मनः कृथाः । ' रघुनन्दन! आप ऐसा कीजिये जिससे मेरे यज्ञका समय व्यतीत न हो जाय । आपका कल्याण हो । आप अपने मनको शोक और चिन्तामें न डालिये ' ॥ १८३ ॥
इत्येवमुक्त्वा धर्मात्मा धर्मार्थसहितं वचः ॥ १ ९ ॥ विरराम महातेजा विश्वामित्रो महामतिः । यह धर्म और अर्थसे युक्त वचन कहकर धर्मात्मा, महातेजस्वी, परमबुद्धिमान् विश्वामित्रजी चुप हो गये ॥ स तन्निशम्य राजेन्द्रो विश्वामित्रवचः शुभम् ॥ २० ॥
शोकेन महताविष्टश्चचाल च मुमोह च । विश्वामित्रका यह शुभ वचन सुनकर महाराज दशरथको पुत्र - वियोगकी आशङ्कासे महान् दुःख हुआ । वे उससे पीड़ित हो सहसा काँप उठे और बेहोश हो गये ॥ २०३ ॥
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बालकाण्डे विंशः सर्गः १०५ लब्धसंज्ञस्तदोत्थाय व्यषीदत भयान्वितः ॥ २१ ॥ थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे
इति हृदयमनोविदारणं भयभीत हो विषाद करने लगे । विश्वामित्र मुनिका वचन मुनिवचनं तदतीव शुश्रुवान् । राजाके हृदय और मनको विदीर्ण करनेवाला था । उसे नरपतिरभवन्महान् महात्मा सुनकर उनके मनमें बड़ी व्यथा हुई । वे महामनस्वी व्यथितमनाः प्रचचाल चासनात् ॥ २२ ॥ | महाराज अपने आसनसे विचलित हो मूर्च्छित हो गये ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ विंशः सर्गः राजा दशरथका विश्वामित्रको अपना पुत्र देनेसे इनकार करना और विश्वामित्रका कुपित होना
तच्छ्रुत्वा राजशार्दूलो विश्वामित्रस्य भाषितम् ।
मुहूर्तमिव निःसंज्ञः संज्ञावानिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
विश्वामित्रजीका वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ दशरथ दो घड़ीके लिये संज्ञाशून्य से हो गये । फिर सचेत होकर इस प्रकार बोले— ॥१ ॥
ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः ।
न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसैः ॥ २ ॥
' महर्षे! मेरा कमलनयन राम अभी पूरे सोलह वर्षका भी नहीं हुआ है । मैं इसमें राक्षसोंके साथ युद्ध करनेकी योग्यता नहीं देखता ॥ २ ॥
इयमक्षौहिणी सेना यस्याहं पतिरीश्वरः ।
अनया सहितो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरैः ॥ ३ ॥
' यह मेरी अक्षौहिणी सेना है, जिसका मैं पालक और स्वामी भी हूँ । इस सेनाके साथ मैं स्वयं ही चलकर उन निशाचरोंके साथ युद्ध करूँगा ॥३ ॥
इमे शूराश्च विक्रान्ता भृत्या मेऽस्त्रविशारदाः ।
योग्या रक्षोगणैर्योद्धुं न रामं नेतुमर्हसि ॥ ४ ॥
‘ ये मेरे शूरवीर सैनिक, जो अस्त्रविद्यामें कुशल और पराक्रमी हैं, राक्षसोंके साथ जूझनेकी योग्यता रखते हैं; अतः इन्हें ही ले जाइये; रामको ले जाना उचित नहीं होगा ॥ ४ ॥
अहमेव धनुष्पाणिर्गोप्ता समरमूर्धनि ।
यावत् प्राणान् धरिष्यामि तावद् योत्स्ये निशाचरैः ॥ ५ ॥
' मैं स्वयं ही हाथमें धनुष ले युद्धके मुहानेपर रहकर आपके यज्ञकी रक्षा करूँगा और जबतक इस शरीरमें प्राण रहेंगे तबतक निशाचरोंके साथ लड़ता रहूँगा ॥ ५ ॥
निर्विघ्ना व्रतचर्या सा भविष्यति सुरक्षिता ।
अहं तत्र गमिष्यामि न रामं नेतुमर्हसि ॥ ६ ॥
' मेरे द्वारा सुरक्षित होकर आपका नियमानुष्ठान बिना किसी विघ्न - बाधाके पूर्ण होगा; अतः मैं ही वहाँ
आपके साथ चलूँगा । आप रामको न ले जाइये ॥ ६ ॥
बालो ह्यकृतविद्यश्च न च वेत्ति बलाबलम् ।
न चास्त्रबलसंयुक्तो न च युद्धविशारदः ॥ ७ ॥
' मेरा राम अभी बालक है । इसने अभीतक युद्धकी विद्या ही नहीं सीखी है । यह दूसरेके बलाबलको नहीं जानता है । न तो यह अस्त्र - बलसे सम्पन्न है और न युद्धकी कलामें निपुण ही ॥ ७ ॥
न चासौ रक्षसां योग्यः कूटयुद्धा हि राक्षसाः ।
विप्रयुक्तो हि रामेण मुहूर्तमपि नोत्सहे ॥ ८ ॥
जीवितुं मुनिशार्दूलं न रामं नेतुमर्हसि ।
यदि वा राघवं ब्रह्मन् नेतुमिच्छसि सुव्रत ॥ ९ ॥
चतुरंगसमायुक्तं मया सह च तं नय । ' अतः यह राक्षसोंसे युद्ध करने योग्य नहीं है; क्योंकि राक्षस मायासे - छल - कपटसे युद्ध करते हैं । इसके सिवा रामसे वियोग हो जानेपर मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता; मुनिश्रेष्ठ! इसलिये आप मेरे । रामको न ले जाइये । अथवा ब्रह्मन्! यदि आपकी इच्छा रामको ही ले जानेकी हो तो चतुरङ्गिणी सेनाके साथ
मैं भी चलता हूँ । मेरे साथ इसे ले चलिये ॥ ८ - ९ ३ ॥
षष्टिर्वर्षसहस्राणि जातस्य मम कौशिक ॥ १० ॥
कृच्छ्रेणोत्पादितश्चायं न रामं नेतुमर्हसि । ' कुशिकनन्दन! मेरी अवस्था साठ हजार वर्षकी हो गयी । इस बुढ़ापेमें बड़ी कठिनाईसे मुझे पुत्रकी प्राप्ति हुई है, अतः आप रामको न ले जाइये ॥ १०३ ॥
चतुर्णामात्मजानां हि प्रीतिः परमिका मम ॥ ११ ॥
। ज्येष्ठे धर्मप्रधाने च न रामं नेतुमर्हसि ।
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१०६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' धर्मप्रधान राम मेरे चारों पुत्रोंमें ज्येष्ठ है; इसलिये उसपर मेरा प्रेम सबसे अधिक है; अतः आप रामको न ले जाइये ॥ ११३ ॥
किंवीर्या राक्षसास्ते च कस्य पुत्राश्च के च ते ॥ १२ ॥
कथं प्रमाणाः के चैतान् रक्षन्ति मुनिपुंगव ।
कथं च प्रतिकर्तव्यं तेषां रामेण रक्षसाम् ॥ १३ ॥
‘ वे राक्षस कैसे पराक्रमी हैं, किसके पुत्र हैं और कौन हैं? उनका डीलडौल कैसा है? मुनीश्वर! उनकी रक्षा कौन करते हैं? राम उन राक्षसोंका सामना कैसे कर सकता है? ॥ १२-१३ ॥
मामकैर्वा बलैर्ब्रह्मन् मया वा कूटयोधिनाम् ।
सर्वं मे शंस भगवन् कथं तेषां मया रणे ॥ १४ ॥
स्थातव्यं दुष्टभावानां वीर्योत्सिक्ता हि राक्षसाः । ' ब्रह्मन्! मेरे सैनिकोंको या स्वयं मुझे ही उन मायायोधी राक्षसोंका प्रतीकार कैसे करना चाहिये? भगवन्! ये सारी बातें आप मुझे बताइये । उन दुष्टोंके साथ युद्धमें मुझे कैसे खड़ा होना चाहिये? क्योंकि राक्षस बड़े बलाभिमानी होते हैं ' ॥ १४३ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत ॥ १५ ॥
पौलस्त्यवंशप्रभवो रावणो नाम राक्षसः ।
स ब्रह्मणा दत्तवरस्त्रैलोक्यं बाधते भृशम् ॥ १६ ॥
महाबलो महावीर्यो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः ।
श्रूयते च महाराज रावणो राक्षसाधिपः ॥ १७ ॥
साक्षाद्वैश्रवणभ्राता पुत्रो विश्रवसो मुनेः । राजा दशरथकी इस बातको सुनकर विश्वामित्रजी बोले — ' महाराज! रावण नामसे प्रसिद्ध एक राक्षस है, जो महर्षि पुलस्त्यके कुलमें उत्पन्न हुआ है । उसे ब्रह्माजीसे मुँहमाँगा वरदान प्राप्त हुआ है; जिससे महान् बलशाली और महापराक्रमी होकर बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ वह निशाचर तीनों लोकोंके निवासियोंको अत्यन्त कष्ट दे रहा है । सुना जाता है कि राक्षसराज रावण विश्रवा मुनिका औरस पुत्र तथा साक्षात् कुबेरका भाई है ॥ यदा न खलु यज्ञस्य विघ्नकर्ता महाबलः ॥ १८ ॥
तेन संचोदितौ तौ तु राक्षसौ च महाबलौ ।
मारीचश्च सुबाहुश्च यज्ञविघ्नं करिष्यतः ॥ १ ९ ॥
' वह महाबली निशाचर इच्छा रहते हुए भी स्वयं आकर यज्ञमें विघ्न नहीं डालता ( अपने लिये इसे तुच्छ कार्य समझता है ); इसलिये उसीकी प्रेरणासे दो महान् बलवान् राक्षस मारीच और सुबाहु यज्ञोंमें विघ्न डाला करते हैं ' ॥ १८-१९ ॥
। इत्युक्तो मुनिना तेन राजोवाच मुनिं तदा ।
नहि शक्तोऽस्मि संग्रामे स्थातुं तस्य दुरात्मनः ॥ २० ॥
विश्वामित्र मुनिके ऐसा कहनेपर राजा दशरथ उनसे इस प्रकार बोले- ' मुनिवर! मैं उस दुरात्मा रावणके सामने युद्धमें नहीं ठहर सकता ॥ २० ॥
स त्वं प्रसादं धर्मज्ञ कुरुष्व मम पुत्रके ।
मम चैवाल्पभाग्यस्य दैवतं हि भवान् गुरुः ॥ २१ ॥
' धर्मज्ञ महर्षे! आप मेरे पुत्रपर तथा मुझ मन्दभागी दशरथपर भी कृपा कीजिये; क्योंकि आप मेरे देवता तथा गुरु हैं ॥ २१ ॥
देवदानवगन्धर्वा यक्षाः पतगपन्नगाः ।
न शक्ता रावणं सोढुं किं पुनर्मानवा युधि ॥ २२ ॥
' युद्धमें रावणका वेग तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, गरुड़ और नाग भी नहीं सह सकते; फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ॥ २२ ॥
स तु वीर्यवतां वीर्यमादत्ते युधि रावणः ।
तेन चाहं न शक्तोऽस्मि संयोद्धुं तस्य वा बलैः ॥ २३ ॥
सबलो वा मुनिश्रेष्ठ सहितो वा ममात्मजैः । ' मुनिश्रेष्ठ! रावण समरांगणमें बलवानोंके बलका अपहरण कर लेता है, अतः मैं अपनी सेना और पुत्रोंके साथ रहकर भी उससे तथा उसके सैनिकोंसे युद्ध करनेमें असमर्थ हूँ ॥ २३३ ॥
कथमप्यमरप्रख्यं संग्रामाणामकोविदम् ॥ २४ ॥
बालं मे तनयं ब्रह्मन् नैव दास्यामि पुत्रकम् । ' ब्रह्मन्! यह मेरा देवोपम पुत्र युद्धकी कलासे सर्वथा अनभिज्ञ है । इसकी अवस्था भी अभी बहुत थोड़ी है; इसलिये मैं इसे किसी तरह नहीं दूँगा ॥ २४३ ॥
अथ कालोपमौ युद्धे सुतौ सुन्दोपसुन्दयोः ॥ २५ ॥
यज्ञविघ्नकरौ तौ ते नैव दास्यामि पुत्रकम् ।
मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ ॥ २६ ॥
' मारीच और सुबाहु सुप्रसिद्ध दैत्य सुन्द और उपसुन्दके पुत्र हैं । वे दोनों युद्धमें यमराजके समान हैं । यदि वे ही आपके यज्ञमें विघ्न डालनेवाले हैं तो मैं उनका सामना करनेके लिये अपने पुत्रको नहीं दूँगा; क्योंकि वे दोनों प्रबल पराक्रमी और युद्धविषयक उत्तम शिक्षासे सम्पन्न हैं ॥ २५-२६ ॥
तयोरन्यतरं योद्धुं यास्यामि ससुहृद्गणः ।
अन्यथा त्वनुनेष्यामि भवन्तं सहबान्धवः ॥ २७ ॥
‘ मैं उन दोनोंमेंसे किसी एकके साथ युद्ध करनेके लिये अपने सुहृदोंके साथ चलूँगा; अन्यथा - यदि आप
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बालकाण्डे एकविंशः सर्गः १०७ मुझे न ले जाना चाहें तो मैं भाई - बन्धुओंसहित आपसे राजा दशरथके ऐसे वचन सुनकर विप्रवर अनुनय - विनय करूँगा कि आप रामको छोड़ दें ' ॥ २७ ॥ कुशिकनन्दन विश्वामित्रके मनमें महान् क्रोधका आवेश
इति नरपतिजल्पनाद् द्विजेन्द्रं हो आया, जैसे यज्ञशालामें अग्निको भलीभाँति आहुति कुशिकसुतं सुमहान् विवेश मन्युः । देकर घीकी धारासे अभिषिक्त कर दिया जाय और वह सुहुत इव मखेऽग्निराज्यसिक्तः प्रज्वलित हो उठे, उसी तरह अग्नितुल्य तेजस्वी महर्षि
समभवदुज्ज्वलितो महर्षिवह्निः ॥ २८ ॥ । विश्वामित्र भी क्रोधसे जल उठे ॥ २८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे विंशः सर्गः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २० ॥
एकविंशः सर्गः विश्वामित्रके रोषपूर्ण वचन तथा वसिष्ठका राजा दशरथको समझाना
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य स्नेहपर्याकुलाक्षरम् । ।
समन्युः कौशिको वाक्यं प्रत्युवाच महीपतिम् ॥ १ ॥
राजा दशरथकी बातके एक - एक अक्षरमें पुत्रके प्रति स्नेह भरा हुआ था, उसे सुनकर महर्षि विश्वामित्र कुपित हो उनसे इस पूर्वमर्थं प्रतिश्रुत्य राघवाणामयुक्तोऽयं ' राजन्! पहले प्रतिज्ञा करके अब तुम यह त्याग रघुवंशियोंके इस कुलके विनाशका प्रकार बोले —॥१ ॥
प्रतिज्ञां हातुमिच्छसि ।
कुलस्यास्य विपर्ययः ॥ २ ॥
मेरी माँगी हुई वस्तुके देनेकी उसे तोड़ना चाहते हो । प्रतिज्ञाका योग्य तो नहीं है । यह बर्ताव तो सूचक है ॥२ ॥
यदीदं ते क्षमं राजन् गमिष्यामि यथागतम् ।
मिथ्याप्रतिज्ञः काकुत्स्थ सुखी भव सुहृद्वृतः ॥ ३ ॥
' नरेश्वर! यदि तुम्हें ऐसा ही उचित प्रतीत होता है तो मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा । ककुत्स्थकुलके रत्न! अब तुम अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके हितैषी सुहृदोंसे घिरे रहकर सुखी रहो ' ॥ ३ ॥
तस्य रोषपरीतस्य विश्वामित्रस्य धीमतः ।
चचाल वसुधा कृत्स्ना देवानां च भयं महत् ॥ ४ ॥
बुद्धिमान् विश्वामित्रके कुपित होते ही सारी पृथ्वी काँप उठी और देवताओंके मनमें महान् भय समा गया ॥ ४ ॥
त्रस्तरूपं तु विज्ञाय जगत् सर्वं महानृषिः ।
नृपतिं सुव्रतो धीरो वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥ ५ ॥
उनके रोषसे सारे संसारको त्रस्त हुआ जान उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धीरचित्त महर्षि वसिष्ठने राजासे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
इक्ष्वाकूणां कुले जातः साक्षाद् धर्म इवापरः ।
धृतिमान् सुव्रतः श्रीमान् न धर्मं हातुमर्हसि ॥ ६ ॥
' महाराज! आप इक्ष्वाकुवंशी राजाओंके कुलमें साक्षात् दूसरे धर्मके समान उत्पन्न हुए हैं । धैर्यवान्, उत्तम व्रतके पालक तथा श्रीसम्पन्न हैं । आपको अपने धर्मका परित्याग नहीं करना चाहिये ॥ ६ ॥
त्रिषु लोकेषु विख्यातो धर्मात्मा इति राघवः ।
स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व नाधर्मं वोढुमर्हसि ॥ ७ ॥
" रघुकुलभूषण दशरथ बड़े धर्मात्मा हैं ' यह बात तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है । अतः आप अपने धर्मका ही पालन कीजिये; अधर्मका भार सिरपर न उठाइये ॥ ७ ॥
प्रतिश्रुत्य करिष्येति उक्तं वाक्यमकुर्वतः ।
इष्टापूर्तवधो भूयात् तस्माद् रामं विसर्जय ॥ ८ ॥
' मैं अमुक कार्य करूँगा ' - ऐसी प्रतिज्ञा करके भी जो उस वचनका पालन नहीं करता, उसके यज्ञ - यागादि इष्ट तथा बावली - तालाब बनवाने आदि पूर्त कर्मोंके पुण्यका नाश हो जाता है, अतः आप श्रीरामको विश्वामित्रजीके साथ भेज दीजिये ॥ ८ ॥
कृतास्त्रमकृतास्त्रं वा नैनं शक्ष्यन्ति राक्षसाः ।
गुप्तं कुशिकपुत्रेण ज्वलनेनामृतं यथा ॥ ९ ॥
' ये अस्त्रविद्या जानते हों या न जानते हों, राक्षस इनका सामना नहीं कर सकते । जैसे प्रज्वलित अग्निद्वारा सुरक्षित अमृतपर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार कुशिकनन्दन विश्वामित्रसे सुरक्षित हुए श्रीरामका वे राक्षस कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते ॥ ९ ॥
एष विग्रहवान् धर्म एष वीर्यवतां वरः ।
एष विद्याधिको लोके तपसश्च परायणम् ॥ १० ॥
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१०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' ये श्रीराम तथा महर्षि विश्वामित्र साक्षात् धर्मकी मूर्ति हैं । ये बलवानोंमें श्रेष्ठ हैं । विद्याके द्वारा ही ये संसारमें सबसे बढ़े - चढ़े हैं । तपस्याके तो ये विशाल भण्डार ही हैं ॥ १० ॥
एषोऽस्त्रान् विविधान् वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे ।
नैनमन्यः पुमान् वेत्ति न च वेत्स्यन्ति केचन ॥ ११ ॥
' चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें जो नाना प्रकारके अस्त्र हैं, उन सबको ये जानते हैं । इन्हें मेरे सिवा दूसरा कोई पुरुष न तो अच्छी तरह जानता है और न कोई जानेंगे ही ॥ ११ ॥
न देवा नर्षयः केचिन्नामरा न च राक्षसाः ।
गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः ॥ १२ ॥
' देवता, ऋषि, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा बड़े - बड़े नाग भी इनके प्रभावको नहीं जानते हैं ॥ १२ ॥
सर्वास्त्राणि कृशाश्वस्य पुत्राः परमधार्मिकाः ।
कौशिकाय पुरा दत्ता यदा राज्यं प्रशासति ॥ १३ ॥
' प्रायः सभी अस्त्र प्रजापति कृशाश्वके परम धर्मात्मा पुत्र हैं । उन्हें प्रजापतिने पूर्वकालमें कुशिकनन्दन विश्वामित्रको जब कि वे राज्यशासन करते थे, समर्पित कर दिया था ॥ १३ ॥
तेऽपि पुत्राः कृशाश्वस्य प्रजापतिसुतासुताः ।
नैकरूपा महावीर्या दीप्तिमन्तो जयावहाः ॥ १४ ॥
' कृशाश्वके वे पुत्र प्रजापति दक्षकी दो पुत्रियोंकी संतानें हैं । उनके अनेक रूप हैं । वे सब-के - सब महान् शक्तिशाली, प्रकाशमान और विजय दिलानेवाले हैं ॥१४ ॥
जया च सुप्रभा चैव दक्षकन्ये सुमध्यमे ।
ते सूतेऽस्त्राणि शस्त्राणि शतं परमभास्वरम् ॥ १५ ॥
' प्रजापति दक्षकी दो सुन्दरी कन्याएँ हैं, उनके नाम हैं जया और सुप्रभा । उन दोनोंने एक सौ परम प्रकाशमान अस्त्र - शस्त्रोंको उत्पन्न किया है ॥ १५ ॥
पञ्चाशतं सुताँल्लेभे जया लब्धवरा वरान् ।
वधायासुरसैन्यानामप्रमेयानरूपिणः ॥ १६ ॥
' उनमेंसे जयाने वर पाकर पचास श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्त किया है, जो अपरिमित शक्तिशाली और रूपरहित हैं । वे सब - के - सब असुरोंकी सेनाओंका वध करनेके लिये प्रकट हुए हैं ॥ १६ ॥
। सुप्रभाजनयच्चापि पुत्रान् पञ्चाशतं पुनः ।
संहारान् नाम दुर्धर्षान् दुराक्रामान् बलीयसः ॥ १७ ॥
' फिर सुप्रभाने भी संहार नामक पचास पुत्रोंको जन्म दिया, जो अत्यन्त दुर्जय हैं । उनपर आक्रमण करना किसीके लिये भी सर्वथा कठिन है तथा वे सब-के - सब अत्यन्त बलिष्ठ हैं ॥१७ ॥
तानि चास्त्राणि वेत्त्येष यथावत् कुशिकात्मजः ।
अपूर्वाणां च जनने शक्तो भूयश्च धर्मवित् ॥ १८ ॥
' ये धर्मज्ञ कुशिकनन्दन उन सब अस्त्र - शस्त्रोंको अच्छी तरह जानते हैं । जो अस्त्र अबतक उपलब्ध नहीं हुए हैं, उनको भी उत्पन्न करनेकी इनमें पूर्ण शक्ति | है ॥ १८ ॥
तेनास्य मुनिमुख्यस्य धर्मज्ञस्य महात्मनः ।
न किञ्चिदस्त्यविदितं भूतं भव्यं च राघव ॥ १ ९ ॥
' रघुनन्दन! इसलिये इन मुनिश्रेष्ठ धर्मज्ञ महात्मा विश्वामित्रजीसे भूत या भविष्यकी कोई बात छिपी नहीं है ॥ १ ९ ॥
एवंवीर्यो महातेजा विश्वामित्रो महायशाः ।
न रामगमने राजन् संशयं गन्तुमर्हसि ॥ २० ॥
' राजन्! ये महातेजस्वी, महायशस्वी विश्वामित्र ऐसे प्रभावशाली हैं । अतः इनके साथ रामको भेजनेमें आप किसी प्रकारका संदेह न करें ॥ २० ॥
तेषां निग्रहणे शक्तः स्वयं च कुशिकात्मजः ।
तव पुत्रहितार्थाय त्वामुपेत्याभियाचते ॥ २१ ॥
' महर्षि कौशिक स्वयं भी उन राक्षसोंका संहार करनेमें समर्थ हैं; किंतु ये आपके पुत्रका कल्याण करना चाहते हैं, इसीलिये यहाँ आकर आपसे याचना कर रहे हैं ' ॥ २१ ॥
इति मुनिवचनात् प्रसन्नचित्तो रघुवृषभश्च मुमोद पार्थिवाग्र्यः । गमनमभिरुरोच राघवस्य प्रथितयशाः कुशिकात्मजाय बुद्ध्या ॥ २२ ॥
महर्षि वसिष्ठके इस वचनसे विख्यात यशवाले रघुकुलशिरोमणि नृपश्रेष्ठ दशरथका मन प्रसन्न हो गया । वे आनन्दमग्न हो गये और बुद्धिसे विचार करनेपर विश्वामित्रजीकी प्रसन्नताके लिये उनके साथ श्रीरामका जाना उन्हें रुचिके अनुकूल प्रतीत होने लगा ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २१ ॥