वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 191–200

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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बालकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः १७ ९. इसी समय इक्ष्वाकुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले एक । सत्यवादी और जितेन्द्रिय राजा राज्य करते थे । उनका नाम था त्रिशंकु ॥ १०३ ॥

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना यजेयमिति राघव ॥ ११ ॥

गच्छेयं स्वशरीरेण देवतानां परां गतिम् । रघुनन्दन! उनके मनमें यह विचार हुआ कि ' मैं ऐसा कोई यज्ञ करूँ, जिससे अपने इस शरीरके साथ ही देवताओंकी परम गति – स्वर्गलोकको जा पहुँचूँ ' ॥ वसिष्ठं स समाहूय कथयामास चिन्तितम् ॥ १२ ॥

अशक्यमिति चाप्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना । तब उन्होंने वसिष्ठजीको बुलाकर अपना यह विचार उन्हें कह सुनाया । महात्मा वसिष्ठने उन्हें बताया कि ' ऐसा होना असम्भव है ' ॥ १२३ ॥

प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन स ययौ दक्षिणां दिशम् ॥ १३ ॥

ततस्तत्कर्मसिद्ध्यर्थं पुत्रांस्तस्य गतो नृपः । जब वसिष्ठने उन्हें कोरा उत्तर दे दिया, तब वे राजा उस कर्मकी सिद्धिके लिये दक्षिण दिशामें उन्हींके पुत्रोंके पास चले गये ॥ १३३ ॥

वासिष्ठा दीर्घतपसस्तपो यत्र हि तेपिरे ॥ १४ ॥

त्रिशङ्कुस्तु महातेजाः शतं परमभास्वरम् ।

वसिष्ठपुत्रान् ददृशे तप्यमानान् मनस्विनः ॥ १५ ॥

वसिष्ठजीके वे पुत्र जहाँ दीर्घकालसे तपस्यामें प्रवृत्त होकर तप करते थे, उस स्थानपर पहुँचकर महातेजस्वी त्रिशंकुने देखा कि मनको वशमें रखनेवाले वे सौ परमतेजस्वी वसिष्ठकुमार तपस्यामें संलग्न हैं ।

सोऽभिगम्य महात्मानः सर्वानेव गुरोः सुतान् ।

अभिवाद्यानुपूर्वेण ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः ॥ १६ ॥

अब्रवीत् स महात्मानः सर्वानेव कृताञ्जलिः । उन सभी महात्मा गुरुपुत्रोंके पास जाकर उन्होंने क्रमशः उन्हें प्रणाम किया और लज्जासे अपने मुखको कुछ नीचा किये हाथ जोड़कर उन सब महात्माओंसे कहा— ॥ १६३ ॥

शरणं वः प्रपन्नोऽहं शरण्यान् शरणं गतः ॥ १७ ॥

प्रत्याख्यातो हि भद्रं वो वसिष्ठेन महात्मना ।

यष्टुकाम महायज्ञं तदनुज्ञातुमर्हथ ॥ १८ ॥

' गुरुपुत्रो! आप शरणागतवत्सल हैं । मैं आपलोगोंकी शरणमें आया हूँ, आपका कल्याण हो । महात्मा वसिष्ठने मेरा यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है । मैं एक महान् यज्ञ करना चाहता हूँ । आपलोग उसके लिये आज्ञा दें ॥ १७-१८ ॥

गुरुपुत्रानहं सर्वान् नमस्कृत्य प्रसादये ।

शिरसा प्रणतो याचे ब्राह्मणांस्तपसि स्थितान् ॥ १ ९ ॥

ते मां भवन्तः सिद्ध्यर्थं याजयन्तु समाहिताः ।

सशरीरो यथाहं वै देवलोकमवाप्नुयाम् ॥ २० ॥

' मैं समस्त गुरुपुत्रोंको नमस्कार करके प्रसन्न करना चाहता हूँ । आपलोग तपस्यामें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण हैं । मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आपलोग एकाग्रचित्त हो मुझसे मेरी अभीष्टसिद्धिके लिये ऐसा कोई यज्ञ करावें, जिससे मैं इस शरीर के साथ ही देवलोकमें जा सकूँ ॥ १ ९ -२० ॥

प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन गतिमन्यां तपोधनाः ।

गुरुपुत्रानृते सर्वान् नाहं पश्यामि कांचन ॥ २१ ॥

' तपोधनो! महात्मा वसिष्ठके अस्वीकार कर देनेपर अब मैं अपने लिये समस्त गुरुपुत्रोंकी शरणमें जानेके सिवा दूसरी कोई गति नहीं देखता ॥ २१ ॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः ।

तस्मादनन्तरं सर्वे भवन्तो दैवतं मम ॥ २२ ॥

' समस्त इक्ष्वाकुवंशियोंके लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं । उनके बाद आप सब लोग ही मेरे परम | देवता हैं ' ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५७ ॥

-अष्टपञ्चाशः सर्गः वसिष्ठ ऋषिके पुत्रोंका त्रिशंकुको डाँट बताकर घर लौटनेके लिये आज्ञा देना तथा उन्हें दूसरा पुरोहित बनानेके लिये उद्यत देख शाप - प्रदान और उनके शापसे चाण्डाल हुए त्रिशंकुका विश्वामित्रजीकी शरणमें जाना श्रुत्वा क्रोधसमन्वितम् । प्रत्याख्यातोऽसि दुर्मेधो गुरुणा सत्यवादिना । ऋषिपुत्रशतं ततस्त्रिशङ्कोर्वचनं राजानमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥ | तं कथं समतिक्रम्य शाखान्तरमुपेयिवान् ॥२ ॥

राम

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१८० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे रघुनन्दन! राजा त्रिशंकुका यह वचन सुनकर वसिष्ठ मुनिके वे सौ पुत्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले— ' दुर्बुद्धे! तुम्हारे सत्यवादी गुरुने जब तुम्हें मना कर दिया है, तब तुमने उनका उल्लङ्घन करके दूसरी शाखाका आश्रय कैसे लिया? ॥ १-२ ॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः ।

न चातिक्रमितुं शक्यं वचनं सत्यवादिनः ॥ ३ ॥

' समस्त इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियोंके लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं । उन सत्यवादी महात्माकी बातको कोई अन्यथा नहीं कर सकता ॥ ३ ॥

अशक्यमिति सोवाच वसिष्ठो भगवानृषिः ।

तं वयं वै समाहर्तुं क्रतुं शक्ताः कथंचन ॥ ४ ॥

' जिस यज्ञकर्मको उन भगवान् वसिष्ठमुनिने असम्भव बताया है, उसे हमलोग कैसे कर सकते हैं ॥ ४ ॥

बालिशस्त्वं नरश्रेष्ठ गम्यतां स्वपुरं पुनः ।

याजने भगवान् शक्तस्त्रैलोक्यस्यापि पार्थिव ॥ ५ ॥

अवमानं कथं कर्तुं तस्य शक्ष्यामहे वयम् । ' नरश्रेष्ठ! तुम अभी नादान हो, अपने नगरको लौट जाओ । पृथ्वीनाथ! भगवान् वसिष्ठ तीनों लोकोंका यज्ञ करानेमें समर्थ हैं, हमलोग उनका अपमान कैसे कर सकेंगे ' ॥ ५३ ॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा क्रोधपर्याकुलाक्षरम् ॥ ६ ॥

स राजा पुनरेवैतानिदं वचनमब्रवीत् ।

प्रत्याख्यातो भगवता गुरुपुत्रैस्तथैव हि ॥ ७ ॥

अन्यां गतिं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु तपोधनाः । गुरुपुत्रका वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर राजा त्रिशंकुने पुनः उनसे इस प्रकार कहा – ' तपोधनो! भगवान् वसिष्ठने तो मुझे ठुकरा ही दिया था, आप गुरुपुत्रगण भी मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार कर रहे हैं; अतः आपका कल्याण हो, अब मैं दूसरे किसीकी शरणमें जाऊँगा ' ॥ ऋषिपुत्रास्तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं घोराभिसंहितम् ॥ ८ ॥

शेपुः परमसंक्रुद्धाश्चण्डालत्वं गमिष्यसि ।

इत्युक्त्वा ते महात्मानो विविशुः स्वं स्वमाश्रमम् ॥ ९ ॥

त्रिशंकुका यह घोर अभिसंधिपूर्ण वचन सुनकर महर्षिके पुत्रोंने अत्यन्त कुपित हो उन्हें शाप दे दिया-' अरे! जा तू चाण्डाल हो जायगा । ' ऐसा कहकर वे महात्मा अपने - अपने आश्रममें प्रविष्ट हो गये ॥ ८ - ९ ॥

अथ रात्र्यां व्यतीतायां राजा चण्डालतां गतः ।

नीलवस्त्रधरो नीलः पुरुषो ध्वस्तमूर्धजः ॥ १० ॥

चित्यमाल्यांगरागश्च आयसाभरणोऽभवत् । तदनन्तर रात व्यतीत होते ही राजा त्रिशंकु चाण्डाल हो गये । उनके शरीरका रंग नीला हो गया । कपड़े भी नीले हो गये । प्रत्येक अंगमें रुक्षता आ गयी । सिरके बाल छोटे - छोटे हो गये । सारे शरीरमें चिता राख - सी लिपट गयी । विभिन्न अंगोंमें यथास्थान लोहेके गहने पड़ गये ॥ १०३ ॥

तं दृष्ट्वा मन्त्रिणः सर्वे त्यज्य चण्डालरूपिणम् ॥ ११ ॥

प्राद्रवन् सहिता राम पौरा येऽस्यानुगामिनः ।

एको हि राजा काकुत्स्थ जगाम परमात्मवान् ॥ १२ ॥

दह्यमानो दिवारात्रं विश्वामित्रं तपोधनम् । श्रीराम! अपने राजाको चाण्डालके रूपमें देखकर सब मन्त्री और पुरवासी जो उनके साथ आये थे, उन्हें छोड़कर भाग गये । ककुत्स्थनन्दन! वे धीरस्वभाव नरेश दिन - रात चिन्ताकी आगमें जलने लगे और अकेले ही तपोधन विश्वामित्रकी शरणमें गये॥११- १२३ ॥ विश्वामित्रस्तु तं दृष्ट्वा राजानं विफलीकृतम् ॥ १३ ॥

चण्डालरूपिणं राम मुनिः कारुण्यमागतः ।

कारुण्यात् स महातेजा वाक्यं परमधार्मिकः ॥ १४ ॥

इदं जगाद भद्रं ते राजानं घोरदर्शनम् ।

किमागमनकार्यं ते राजपुत्र महाबल ॥ १५ ॥

अयोध्याधिपते वीर शापाच्चण्डालतां गतः । श्रीराम! विश्वामित्रने देखा राजाका जीवन निष्फल हो गया है । उन्हें चाण्डालके रूपमें देखकर उन महातेजस्वी परम धर्मात्मा मुनिके हृदयमें करुणा भर आयी । वे दयासे द्रवित होकर भयंकर दिखायी देनेवाले राजा त्रिशंकुसे इस प्रकार बोले- ' महाबली राजकुमार! तुम्हारा भला हो, यहाँ किस कामसे तुम्हारा आना हुआ है । वीर अयोध्यानरेश! जान पड़ता है तुम शापसे चाण्डालभावको प्राप्त हुए हो ' ॥ १३-१५३ ॥ अथ तद्वाक्यमाकर्ण्य राजा चण्डालतां गतः ॥ १६ ॥

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् । विश्वामित्रकी बात सुनकर चाण्डालभावको प्राप्त हुए और वाणीके तात्पर्यको समझनेवाले राजा त्रिशंकुने हाथ जोड़कर वाक्यार्थकोविद विश्वामित्र मुनिसे इस प्रकार कहा— ॥ १६३ ॥

प्रत्याख्यातोऽस्मि गुरुणा गुरुपुत्रैस्तथैव च ॥ १७ ॥

अनवाप्यैव तं कामं मया प्राप्तो विपर्ययः । ' महर्षे! मुझे गुरु तथा गुरुपुत्रोंने ठुकरा दिया । मैं जिस मनोऽभीष्ट वस्तुको पाना चाहता था, उसे न पाकर इच्छाके विपरीत अनर्थका भागी हो गया ॥ १७३ ॥

पृष्ठ 193

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बालकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः १८१ सशरीरो दिवं यायामिति मे सौम्यदर्शन ॥ १८ ॥ ।

मया चेष्टं क्रतुशतं तच्च नावाप्यते फलम् । ' सौम्यदर्शन मुनीश्वर! मैं चाहता था कि इसी शरीरसे स्वर्गको जाऊँ, परंतु यह इच्छा पूर्ण न हो सकी । मैंने सैकड़ों यज्ञ किये हैं; किंतु उनका भी कोई फल नहीं मिल रहा है ॥१८३ ॥

अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन ॥ १ ९ ॥ कृच्छ्रेष्वपि गतः सौम्य क्षत्रधर्मेण ते शपे । ' सौम्य! मैं क्षत्रियधर्मकी शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि बड़े - से - बड़े सङ्कटमें पड़नेपर भी न तो पहले कभी मैंने मिथ्या भाषण किया है और न भविष्यमें ही कभी करूँगा ॥ १ ९ ३ ॥ यज्ञैर्बहुविधैरिष्टं प्रजा धर्मेण पालिताः ॥ २० ॥

गुरवश्च महात्मानः शीलवृत्तेन तोषिताः ।

धर्मे प्रयतमानस्य यज्ञं चाहर्तुमिच्छतः ॥ २१ ॥

परितोषं न गच्छन्ति गुरवो मुनिपुंगव ।

दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् ॥ २२ ॥

' मैंने नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया, प्रजाजनोंकी धर्मपूर्वक रक्षा की और शील एवं सदाचारके । द्वारा महात्माओं तथा गुरुजनोंको संतुष्ट रखनेका प्रयास किया । इस समय भी मैं यज्ञ करना चाहता था; अतः मेरा यह प्रयत्न धर्मके लिये ही था । मुनिप्रवर! तो भी मेरे गुरुजन मुझपर संतुष्ट न हो सके । यह देखकर मैं दैवको ही बड़ा मानता हूँ । पुरुषार्थ तो निरर्थक जान पड़ता है ॥ २०–२२ ॥ दैवेनाक्रम्यते सर्वं दैवं हि परमा गतिः ।

तस्य मे परमार्तस्य प्रसादमभिकांक्षतः ।

कर्तुमर्हसि भद्रं ते दैवोपहतकर्मणः ॥ २३ ॥

‘ दैव सबपर आक्रमण करता है । दैव ही सबकी परमगति है । मुने! मैं अत्यन्त आर्त होकर आपकी कृपा चाहता हूँ । दैवने मेरे पुरुषार्थको दबा दिया है । आपका भला हो । आप मुझपर अवश्य कृपा करें ॥ २३ ॥

नान्यां गतिं गमिष्यामि नान्यच्छरणमस्ति मे ।

दैवं पुरुषकारेण निवर्तयितुमर्हसि ॥ २४ ॥

4 ' अब मैं आपके सिवा दूसरे किसीकी शरणमें नहीं जाऊँगा । दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला है भी नहीं । आप ही अपने पुरुषार्थसे मेरे दुर्दैवको पलट सकते हैं ' ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः ॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५८ ॥

एकोनषष्टितमः सर्गः विश्वामित्रका त्रिशंकुको आश्वासन देकर उनका यज्ञ करानेके लिये ऋषि - मुनियोंको आमन्त्रित करना और उनकी बात न माननेवाले महोदय तथा ऋषिपुत्रोंको शाप

उक्तवाक्यं तु राजानं कृपया कुशिकात्मजः ।

अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साक्षाच्चण्डालतां गतम् ॥ १ ॥

[ शतानन्दजी कहते हैं— श्रीराम! ] साक्षात् चाण्डालके स्वरूपको प्राप्त हुए राजा त्रिशंकुके पूर्वोक्त वचनको सुनकर कुशिकनन्दन विश्वामित्रजीने दयासे द्रवित होकर उनसे मधुर वाणीमें कहा – ॥ १ ॥

इक्ष्वाको स्वागतं वत्स जानामि त्वां सुधार्मिकम् ।

शरणं ते प्रदास्यामि मा भैषीर्नृपपुंगव ॥ २ ॥

' वत्स! इक्ष्वाकुकुलनन्दन! तुम्हारा स्वागत है । मैं जानता हूँ, तुम बड़े धर्मात्मा हो । नृपप्रवर! डरो मत, मैं तुम्हें शरण दूँगा ॥२ ॥

देकर नष्ट करना

अहमामन्त्रये सर्वान् महर्षीन् पुण्यकर्मणः ।

यज्ञसाह्यकरान् राजंस्ततो यक्ष्यसि निर्वृतः ॥ ३ ॥

' राजन्! तुम्हारे यज्ञमें सहायता करनेवाले समस्त पुण्यकर्मा महर्षियोंको मैं आमन्त्रित करता हूँ । फिर तुम आनन्दपूर्वक यज्ञ करना ॥ ३ ॥

गुरुशापकृतं रूपं यदिदं त्वयि वर्तते ।

अनेन सह रूपेण सशरीरो गमिष्यसि ॥ ४ ॥

हस्तप्राप्तमहं मन्ये स्वर्गं तव नराधिप ।

यस्त्वं कौशिकमागम्य शरण्यं शरणागतः ॥ ५ ॥

' गुरुके शापसे तुम्हें जो यह नवीन रूप प्राप्त हुआ है इसके साथ ही तुम सदेह स्वर्गलोकको जाओगे ।

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१८२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे नरेश्वर! तुम जो शरणागतवत्सल विश्वामित्रकी शरण में आ गये, इससे मैं यह समझता हूँ कि स्वर्गलोक तुम्हारे हाथमें आ गया है ' ॥ ४-५ ॥

एवमुक्त्वा महातेजाः पुत्रान् परमधार्मिकान् ।

व्यादिदेश महाप्राज्ञान् यज्ञसम्भारकारणात् ॥ ६ ॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी विश्वामित्रने अपने परम धर्मपरायण महाज्ञानी पुत्रोंको यज्ञकी सामग्री जुटानेकी आज्ञा दी ॥ ६ ॥

सर्वान् शिष्यान् समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह ।

सर्वानृषीन् सवासिष्ठानानयध्वं ममाज्ञया ॥ ७ ॥

सशिष्यान् सुहृदश्चैव सर्त्विजः सुबहुश्रुतान् । तत्पश्चात् समस्त शिष्योंको बुलाकर उनसे यह बात कही — ' तुमलोग मेरी आज्ञासे अनेक विषयोंके ज्ञाता समस्त ऋषि - मुनियोंको, जिनमें वसिष्ठके पुत्र भी सम्मिलित हैं, उनके शिष्यों, सुहृदों तथा ऋत्विजों सहित बुला लाओ ॥ ७३ ॥

यदन्यो वचनं ब्रूयान्मद्वाक्यबलचोदितः ॥ ८ ॥

तत् सर्वमखिलेनोक्तं ममाख्येयमनादृतम् । ' जिसे मेरा संदेश देकर बुलाया गया हो वह अथवा दूसरा कोई यदि इस यज्ञके विषयमें कोई अवहेलनापूर्ण बात कहे तो तुमलोग वह सब पूरा - पूरा मुझसे आकर कहना ' ॥ ८३ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दिशो जग्मुस्तदाज्ञया ॥ ९ ॥

आजग्मुरथ देशेभ्यः सर्वेभ्यो ब्रह्मवादिनः ।

ते च शिष्याः समागम्य मुनिं ज्वलिततेजसम् ॥ १० ॥

ऊचुश्च वचनं सर्वं सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम् । उनकी आज्ञा मानकर सभी शिष्य चारों दिशाओंमें चले गये । फिर तो सब देशोंसे ब्रह्मवादी मुनि आने लगे । विश्वामित्रके वे शिष्य उन प्रज्वलित तेजवाले महर्षिके पास सबसे पहले लौट आये और समस्त ब्रह्मवादियोंने जो बातें कही थीं, उन्हें सबने विश्वामित्रजीसे कह सुनाया ॥ श्रुत्वा ते वचनं सर्वे समायान्ति द्विजातयः ॥ ११ ॥

सर्वदेशेषु चागच्छन् वर्जयित्वा महोदयम् । वे बोले - ' गुरुदेव! आपका आदेश या संदेश सुनकर प्रायः सम्पूर्ण देशोंमें रहनेवाले सभी ब्राह्मण आ रहे हैं । केवल महोदय नामक ऋषि तथा वसिष्ठ-पुत्रोंको छोड़कर सभी महर्षि यहाँ आनेके लिये प्रस्थान कर चुके हैं ॥ ११३ ॥

वासिष्ठं यच्छतं सर्वं क्रोधपर्याकुलाक्षरम् ॥ १२ ॥

यथाह वचनं सर्वं शृणु त्वं मुनिपुंगव । ' मुनिश्रेष्ठ! वसिष्ठके जो सौ पुत्र हैं, उन सबने क्रोधभरी वाणीमें जो कुछ कहा है, वह सब आप सुनिये ॥ १२३ ॥

क्षत्रियो याजको यस्य चण्डालस्य विशेषतः ॥ १३ ॥

कथं सदसि भोक्तारो हविस्तस्य सुरर्षयः ।

ब्राह्मणा वा महात्मानो भुक्त्वा चाण्डालभोजनम् ॥ १४ ॥

कथं स्वर्गं गमिष्यन्ति विश्वामित्रेण पालिताः । ' वे कहते हैं— जो विशेषतः चण्डाल है और जिसका यज्ञ करानेवाला आचार्य क्षत्रिय है, उसके यज्ञमें देवर्षि अथवा महात्मा ब्राह्मण हविष्यका भोजन कैसे कर सकते हैं? अथवा चण्डालका अन्न खाकर विश्वामित्रसे पालित हुए ब्राह्मण स्वर्गमें कैसे जा सकेंगे? ' ॥ १३-१४३ ॥ एतद् वचननैष्ठुर्यमूचुः संरक्तलोचनाः ॥ १५ ॥

वासिष्ठा मुनिशार्दूल सर्वे सहमहोदयाः । ' मुनिप्रवर! महोदयके साथ वसिष्ठके सभी पुत्रोंने क्रोधसे लाल आँखें करके ये उपर्युक्त निष्ठुरतापूर्ण बातें कही थीं ' ॥ १५३ ॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सर्वेषां मुनिपुंगवः ॥ १६ ॥

क्रोधसंरक्तनयनः सरोषमिदमब्रवीत् । उन सबकी वह बात सुनकर मुनिवर विश्वामित्रके दोनों नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे रोषपूर्वक इस प्रकार बोले - ॥ १६३ ॥

यद् दूषयन्त्यदुष्टं मां तप उग्रं समास्थितम् ॥ १७ ॥

भस्मीभूता दुरात्मानो भविष्यन्ति न संशयः । ' मैं उग्र तपस्यामें लगा हूँ और दोष या दुर्भावनासे रहित हूँ तो भी जो मुझपर दोषारोपण करते हैं, वे दुरात्मा भस्मीभूत हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १७३ ॥

अद्य ते कालपाशेन नीता वैवस्वतक्षयम् ॥ १८ ॥

सप्तजातिशतान्येव मृतपाः सम्भवन्तु ते ।

श्वमांसनियताहारा मुष्टिका नाम निर्घृणाः ॥ १ ९ ॥

' आज कालपाशसे बँधकर वे यमलोकमें पहुँचा दिये गये । अब ये सात सौ जन्मोंतक मुर्दोंकी रखवाली करनेवाली, निश्चितरूपसे कुत्तेका मांस खानेवाली मुष्टिक नामक प्रसिद्ध निर्दय चण्डाल - जातिमें जन्म ग्रहण करें ॥ १८-१९ ॥

विकृताश्च विरूपाश्च लोकाननुचरन्त्विमान् ।

महोदयश्च दुर्बुद्धिर्मामदूष्यं ह्यदूषयत् ॥ २० ॥

दूषितः सर्वलोकेषु निषादत्वं गमिष्यति ।

प्राणातिपातनिरतो निरनुक्रोशतां गतः ॥ २१ ॥

दीर्घकालं मम क्रोधाद् दुर्गतिं वर्तयिष्यति ।

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बालकाण्डे षष्टितमः सर्गः १८३

' वे लोग विकृत एवं विरूप होकर इन लोकोंमें । करके दुर्गति भोगेगा ' ॥ २०-२१३ ॥

विचरें । साथ ही दुर्बुद्धि महोदय भी, जिसने मुझ एतावदुक्त्वा वचनं विश्वामित्रो महातपाः । दोषहीनको भी दूषित किया है, मेरे क्रोधसे दीर्घ- विरराम महातेजा ऋषिमध्ये महामुनिः ॥ २२ ॥

कालतक सब लोगोंमें निन्दित, दूसरे प्राणियोंकी | ऋषियोंके बीचमें ऐसा कहकर महातपस्वी, हिंसामें तत्पर और दयाशून्य निषादयोनिको प्राप्त | महातेजस्वी एवं महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ९ ॥ षष्टितमः सर्गः विश्वामित्रका ऋषियोंसे त्रिशंकुका यज्ञ करानेके लिये अनुरोध, ऋषियोंद्वारा यज्ञका आरम्भ, त्रिशंकुका सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्रद्वारा स्वर्गसे उनके गिराये जानेपर क्षुब्ध हुए विश्वामित्रका नूतन देवसर्गके लिये उद्योग, फिर देवताओंके अनुरोधसे उनका इस

तपोबलहतान् ज्ञात्वा वासिष्ठान् समहोदयान् ।

ऋषिमध्ये महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत ॥ १ ॥

[ शतानन्दजी कहते हैं— श्रीराम! ] महोदयसहित वसिष्ठके पुत्रोंको अपने तपोबलसे नष्ट हुआ जान महातेजस्वी विश्वामित्रने ऋषियोंके बीचमें इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

अयमिक्ष्वाकुदायादस्त्रिशङ्कुरिति विश्रुतः ।

धर्मिष्ठश्च वदान्यश्च मां चैव शरणं गतः ॥ २ ॥

' मुनिवरो! ये इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न राजा त्रिशंकु हैं । ये विख्यात नरेश बड़े ही धर्मात्मा और दानी रहे हैं तथा इस समय मेरी शरणमें आये हैं ॥ २ ॥

स्वेनानेन शरीरेण देवलोकजिगीषया ।

यथायं स्वशरीरेण देवलोकं गमिष्यति ॥ ३ ॥

तथा प्रवर्त्यतां यज्ञो भवद्भिश्च मया सह । ' इनकी इच्छा है कि मैं अपने इसी शरीरसे देवलोकपर अधिकार प्राप्त करूँ । अतः आपलोग मेरे साथ रहकर ऐसे यज्ञका अनुष्ठान करें, जिससे इन्हें इस शरीरसे ही देवलोककी प्राप्ति हो सके ' ॥ ३३ ॥

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः ॥ ४ ॥

ऊचुः समेताः सहसा धर्मज्ञा धर्मसंहितम् ।

अयं कुशिकदायादो मुनिः परमकोपनः ॥ ५ ॥

यदाह वचनं सम्यगेतत् कार्यं न संशयः । विश्वामित्रजीकी यह बात सुनकर धर्मको जाननेवाले सभी महर्षियोंने सहसा एकत्र होकर आपसमें धर्मयुक्त परामर्श किया - ' ब्राह्मणो! कुशिकके कार्यसे विरत होना पुत्र विश्वामित्र मुनि बड़े क्रोधी हैं । ये जो बात कह रहे हैं, उसका ठीक तरहसे पालन करना चाहिये । इसमें संशय नहीं है ॥ ४-५३ ॥ अग्निकल्पो हि भगवान् शापं दास्यति रोषतः ॥ ६ ॥

तस्मात् प्रवर्त्यतां यज्ञः सशरीरो यथा दिवि ।

गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा ॥ ७ ॥

' ये भगवान् विश्वामित्र अग्निके समान तेजस्वी हैं । यदि इनकी बात नहीं मानी गयी तो ये रोषपूर्वक शाप दे देंगे । इसलिये ऐसे यज्ञका आरम्भ करना चाहिये, जिससे विश्वामित्रके तेजसे ये इक्ष्वाकुनन्दन त्रिशंकु सशरीर स्वर्गलोकमें जा सकें ' ॥ ६-७ ॥

ततः प्रवर्त्यतां यज्ञः सर्वे समधितिष्ठत ।

एवमुक्त्वा महर्षयः संजह्रुस्ताः क्रियास्तदा ॥ ८ ॥

इस तरह विचार करके उन्होंने सर्वसम्मति से यह निश्चय किया कि ' यज्ञ आरम्भ किया जाय । ' ऐसा निश्चय करके महर्षियोंने उस समय अपना - अपना कार्य आरम्भ किया ॥ ८ ॥

याजकश्च महातेजा विश्वामित्रोऽभवत् क्रतौ ।

ऋत्विजश्चानुपूर्व्येण मन्त्रवन्मन्त्रकोविदाः ॥ ९ ॥

चक्रुः सर्वाणि कर्माणि यथाकल्पं यथाविधि । महातेजस्वी विश्वामित्र स्वयं ही उस यज्ञमें याजक ( अध्वर्यु ) हुए । फिर क्रमशः अनेक मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ऋत्विज् हुए; जिन्होंने कल्पशास्त्रके अनुसार विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे कार्य । सम्पन्न किये॥९ ३ ॥

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१८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ततः कालेन महता विश्वामित्रो महातपाः ॥ १० ॥

चकारावाहनं तत्र भागार्थं सर्वदेवताः ।

नाभ्यागमंस्तदा तत्र भागार्थं सर्वदेवताः ॥ ११ ॥

तदनन्तर बहुत समयतक यत्नपूर्वक मन्त्रपाठ करके महातपस्वी विश्वामित्रने अपना - अपना भाग ग्रहण करनेके लिये सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया; परंतु उस समय वहाँ भाग लेनेके लिये वे सब देवता नहीं आये॥१०-११ ॥

ततः कोपसमाविष्टो विश्वामित्रो महामुनिः ।

स्स्रुवमुद्यम्य सक्रोधस्त्रिशङ्कुमिदमब्रवीत् ॥ १२ ॥

इससे महामुनि विश्वामित्रको बड़ा क्रोध आया और उन्होंने स्स्रुवा उठाकर रोषके साथ राजा त्रिशंकुसे इस प्रकार कहा- ॥१२ ॥

पश्य मे तपसो वीर्यं स्वार्जितस्य नरेश्वर ।

एष त्वां स्वशरीरेण नयामि स्वर्गमोजसा ॥ १३ ॥

' नरेश्वर! अब तुम मेरे द्वारा उपार्जित तपस्याका बल देखो । मैं अभी तुम्हें अपनी शक्तिसे सशरीर स्वर्गलोकमें पहुँचाता हूँ ॥ १३ ॥

दुष्प्रापं स्वशरीरेण स्वर्गं गच्छ नरेश्वर ।

स्वार्जितं किंचिदप्यस्ति मया हि तपसः फलम् ॥ १४ ॥

राजंस्त्वं तेजसा तस्य सशरीरो दिवं व्रज । ' राजन्! आज तुम अपने इस शरीरके साथ ही दुर्लभ स्वर्गलोकको जाओ । नरेश्वर! यदि मैंने तपस्याका कुछ भी फल प्राप्त किया है तो उसके प्रभावसे तुम सशरीर स्वर्गलोकको जाओ ' ॥१४३ ॥

उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् सशरीरो नरेश्वरः ॥ १५ ॥

दिवं जगाम काकुत्स्थ मुनीनां पश्यतां तदा । श्रीराम! विश्वामित्र मुनिके इतना कहते ही राजा त्रिशंकु सब मुनियोंके देखते - देखते उस समय अपने शरीरके साथ ही स्वर्गलोकको चले गये ॥ १५३ ॥

स्वर्गलोकं गतं दृष्ट्वा त्रिशङ्कं पाकशासनः ॥ १६ ॥

सह सर्वैः सुरगणैरिदं वचनमब्रवीत् । त्रिशंकुको स्वर्गलोकमें पहुँचा हुआ देख समस्त देवताओंके साथ पाकशासन इन्द्रने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १६३ ॥

त्रिशङ्को गच्छ भूयस्त्वं नासि स्वर्गकृतालयः ॥ १७ ॥

गुरुशापहतो मूढ पत भूमिमवाक्शिराः । ' मूर्ख त्रिशंकु! तू फिर यहाँसे लौट जा, तेरे लिये स्वर्गमें स्थान नहीं है । तू गुरुके शापसे नष्ट हो चुका है, अतः नीचे मुँह किये पुनः पृथ्वीपर गिर जा ' ॥ १७३ ॥ ।

। एवमुक्तो महेन्द्रेण त्रिशङ्कुरपतत् पुनः ॥१८ ॥

विक्रोशमानस्त्राहीति विश्वामित्रं तपोधनम् । इन्द्रके इतना कहते ही राजा त्रिशंकु तपोधन विश्वामित्रको पुकारकर ' त्राहि - त्राहि ' की रट लगाते हुए पुनः स्वर्गसे नीचे गिरे ॥ १८३ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य क्रोशमानस्य कौशिकः ॥ १ ९ ॥ रोषमाहारयत् तीव्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । चीखते - चिल्लाते हुए त्रिशंकुकी वह करुण पुकार सुनकर कौशिक मुनिको बड़ा क्रोध हुआ । वे त्रिशंकुसे बोले- ' राजन्! वहीं ठहर जा, वहीं ठहर जा ' ( उनके ऐसा कहनेपर त्रिशंकु बीचमें ही लटके रह गये ) ॥ १ ९ ३ ॥ ऋषिमध्ये स तेजस्वी प्रजापतिरिवापरः ॥२० ॥

सृजन् दक्षिणमार्गस्थान् सप्तर्षीनपरान् पुनः ।

नक्षत्रवंशमपरमसृजत् क्रोधमूर्च्छितः ॥ २१ ॥

तत्पश्चात् तेजस्वी विश्वामित्रने ऋषिमण्डलीके बीच दूसरे प्रजापतिके समान दक्षिणमार्गके लिये नये सप्तर्षियोंकी सृष्टि की तथा क्रोधसे भरकर उन्होंने नवीन नक्षत्रोंका भी निर्माण कर डाला ॥ २०-२१ ॥

दक्षिणां दिशमास्थाय ऋषिमध्ये महायशाः ।

सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृतः ॥ २२ ॥

अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रकः ।

दैवतान्यपि स क्रोधात् स्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ २३ ॥

वे महायशस्वी मुनि क्रोधसे कलुषित हो दक्षिण दिशामें ऋषिमण्डलीके बीच नूतन नक्षत्रमालाओंकी सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि ' मैं दूसरे इन्द्रकी सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्रके ही रहेगा । ' ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओंकी सृष्टि प्रारम्भ की ॥ २२-२३ ॥

ततः परमसम्भ्रान्ताः सर्षिसङ्घाः सुरासुराः ।

विश्वामित्रं महात्मानमूचुः सानुनयं वचः ॥ २४ ॥

इससे समस्त देवता, असुर और ऋषि - समुदाय बहुत घबराये और सभी वहाँ आकर महात्मा विश्वामित्रसे विनयपूर्वक बोले -॥२४ ॥

अयं राजा महाभाग गुरुशापपरिक्षतः ।

सशरीरो दिवं यातुं नार्हत्येव तपोधन ॥ २५ ॥

' महाभाग! ये राजा त्रिशंकु गुरुके शापसे अपना पुण्य नष्ट करके चाण्डाल हो गये हैं; अतः तपोधन! ये सशरीर स्वर्गमें जानेके कदापि अधिकारी नहीं हैं ' ॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां मुनिपुंगवः ।

अब्रवीत् सुमहद् वाक्यं कौशिकः सर्वदेवताः ॥ २६ ॥

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बालकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः १८५

उन देवताओंकी यह बात सुनकर मुनिवर कौशिकने ।

सम्पूर्ण देवताओंसे परमोत्कृष्ट वचन कहा- ॥ २६ ॥

सशरीरस्य भद्रं वस्त्रिशङ्कोरस्य भूपतेः ।

आरोहणं प्रतिज्ञातं नानृतं कर्तुमुत्सहे ॥ २७ ॥

‘ देवगण! आपका कल्याण हो । मैंने राजा त्रिशंकुको सदेह स्वर्ग भेजनेकी प्रतिज्ञा कर ली है; अतः उसे मैं झूठी नहीं कर सकता ॥ २७ ॥

स्वर्गोऽस्तु सशरीरस्य त्रिशङ्कोरस्य शाश्वतः ।

नक्षत्राणि च सर्वाणि मामकानि ध्रुवाण्यथ ॥ २८ ॥

यावल्लोका धरिष्यन्ति तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः ।

यत् कृतानि सुराः सर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ ॥ २ ९ ॥

' इन महाराज त्रिशंकुको सदा स्वर्गलोकका सुख प्राप्त होता रहे । मैंने जिन नक्षत्रोंका निर्माण किया है, वे सब सदा मौजूद रहें । जबतक संसार रहे, तबतक ये सभी

वस्तुएँ, जिनकी मेरे द्वारा सृष्टि हुई है, सदा बनी रहें ।

देवताओ! आप सब लोग इन बातोंका अनुमोदन करें ' ॥

एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्मुनिपुंगवम् ।

एवं भवतु भद्रं ते तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः ॥ ३० ॥

गगने तान्यनेकानि वैश्वानरपथाद् बहिः ।

नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ तेषु ज्योतिः षु जाज्वलन् ॥ ३१ ॥

अवाक्शिरास्त्रिशङ्कुश्च तिष्ठत्वमरसंनिभः ।

अनुयास्यन्ति चैतानि ज्योतींषि नृपसत्तमम् ॥ ३२ ॥

कृतार्थं कीर्तिमन्तं च स्वर्गलोकगतं यथा । उनके ऐसा कहनेपर सब देवता मुनिवर विश्वामित्रसे बोले - ' महर्षे! ऐसा ही हो । ये सभी वस्तुएँ बनी रहें और आपका कल्याण हो । मुनिश्रेष्ठ! आपके रचे हुए अनेक नक्षत्र आकाशमें वैश्वानरपथसे बाहर प्रकाशित होंगे और उन्हीं ज्योतिर्मय नक्षत्रोंके बीचमें सिर नीचा किये त्रिशंकु भी प्रकाशमान रहेंगे । वहाँ इनकी स्थिति देवताओंके समान होगी और ये सभी नक्षत्र इन कृतार्थ एवं यशस्वी नृपश्रेष्ठका स्वर्गीय पुरुषकी भाँति अनुसरण करते रहेंगे ' ॥ विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा सर्वदेवैरभिष्टुतः ॥ ३३ ॥

ॠषिमध्ये महातेजा बाढमित्येव देवताः । इसके बाद सम्पूर्ण देवताओंने ऋषियोंके बीचमें ही महातेजस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र मुनिकी स्तुति की । इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ' बहुत अच्छा ' कहकर देवताओंका अनुरोध स्वीकार कर लिया ॥ ३३३ ॥

ततो देवा महात्मानो ऋषयश्च तपोधनाः ।

जग्मुर्यथागतं सर्वे यज्ञस्यान्ते नरोत्तम ॥ ३४ ॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम! तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर सब देवता और तपोधन महर्षि जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने - अपने स्थानको लौट गये ॥ ३४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६० ॥

एकषष्टितमः सर्गः विश्वामित्रकी पुष्कर तीर्थमें तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीषका ऋचीकके मध्यम पुत्र शुनःशेपको यज्ञ - पशु बनानेके लिये खरीदकर लाना

विश्वामित्रो महातेजाः प्रस्थितान् वीक्ष्य तानृषीन् ।

अब्रवीन्नरशार्दूल सर्वांस्तान् वनवासिनः ॥ १ ॥

[ शतानन्दजी कहते हैं— ] पुरुषसिंह श्रीराम! यज्ञमें आये हुए उन सब वनवासी ऋषियोंको वहाँसे जाते देख महातेजस्वी विश्वामित्रने उनसे कहा- ॥ १ ॥

महाविघ्नः: प्रवृत्तोऽयं दक्षिणामास्थितो दिशम् ।

दिशमन्यां प्रपत्स्यामस्तत्र तप्स्यामहे तपः ॥ २ ॥

' महर्षियो! इस दक्षिण दिशामें रहनेसे हमारी तपस्यामें महान् विघ्न आ पड़ा है; अतः अब हम दूसरी दिशामें चले जायँगे और वहीं रहकर तपस्या करेंगे ॥ २ ॥

पश्चिमायां विशालायां पुष्करेषु महात्मनः ।

सुखं तपश्चरिष्यामः सुखं तद्धि तपोवनम् ॥ ३ ॥

' विशाल पश्चिम दिशामें जो महात्मा ब्रह्माजीके तीन पुष्कर हैं, उन्हींके पास रहकर हम सुखपूर्वक तपस्या करेंगे; क्योंकि वह तपोवन बहुत ही सुखद है ' ॥ ३ ॥

एवमुक्त्वा महातेजाः पुष्करेषु महामुनिः ।

तप उग्रं दुराधर्षं तेपे मूलफलाशनः ॥ ४ ॥

ऐसा कहकर वे महातेजस्वी महामुनि पुष्करमें चले गये और वहाँ फल- मूलका भोजन करके उग्र एवं दुर्जय तपस्या करने लगे ॥४ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु अयोध्याधिपतिर्महान् ।

अम्बरीष इति ख्यातो यष्टुं समुपचक्रमे ॥ ५ ॥

इन्हीं दिनों अयोध्याके महाराज अम्बरीष एक । यज्ञकी तैयारी करने लगे ॥ ५ ॥

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१८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

तस्य वै यजमानस्य पशुमिन्द्रो जहार ह ।

प्रणष्टे तु पशौ विप्रो राजानमिदमब्रवीत् ॥ ६ ॥

जब वे यज्ञमें लगे हुए थे, उस समय इन्द्रने उनके यज्ञपशुको चुरा लिया । पशुके खो जानेपर पुरोहितजीने राजासे कहा- ॥ ६ ॥

पशुरभ्याहृतो राजन् प्रणष्टस्तव दुर्नयात् ।

अरक्षितारं राजानं घ्नन्ति दोषा नरेश्वर ॥ ७ ॥

' राजन्! जो पशु यहाँ लाया गया था, वह आपकी दुर्नीतिके कारण खो गया । नरेश्वर! जो राजा यज्ञ-पशुकी रक्षा नहीं करता, उसे अनेक प्रकारके दोष नष्ट कर डालते हैं ॥ ७ ॥

प्रायश्चित्तं महद्धयेतन्नरं वा पुरुषर्षभ ।

आनयस्व पशुं शीघ्रं यावत् कर्म प्रवर्तते ॥ ८ ॥ ।

' पुरुषप्रवर! जबतक कर्मका आरम्भ होता है, उसके पहले ही खोये हुए पशुकी खोज कराकर उसे शीघ्र यहाँ । ले आओ । अथवा उसके प्रतिनिधिरूपसे किसी पुरुष पशुको खरीद लाओ । यही इस पापका महान् प्रायश्चित्त है ' ॥

उपाध्यायवचः श्रुत्वा स राजा पुरुषर्षभः ।

अन्वियेष महाबुद्धिः पशुं गोभिः सहस्रशः ॥ ९ ॥

पुरोहितकी यह बात सुनकर महाबुद्धिमान् पुरुषश्रेष्ठ राजा अम्बरीषने हजारों गौओंके मूल्यपर खरीदने के लिये एक पुरुषका अन्वेषण किया ॥ ९ ॥

देशाञ्जनपदांस्तांस्तान् नगराणि वनानि च ।

आश्रमाणि च पुण्यानि मार्गमाणो महीपतिः ॥ १० ॥

स पुत्रसहितं तात सभार्यं रघुनन्दन ।

भृगुतुंगे समासीनमृचीकं संददर्श ह ॥ ११ ॥

तात रघुनन्दन! विभिन्न देशों, जनपदों, नगरों, वनों तथा पवित्र आश्रमोंमें खोज करते हुए राजा अम्बरीष भृगुतुंग पर्वतपर पहुँचे और वहाँ उन्होंने पत्नी तथा पुत्रोंके साथ बैठे हुए ऋचीक मुनिका दर्शन किया ॥ १०-११ ॥

तमुवाच महातेजाः प्रणम्याभिप्रसाद्य च ।

महर्षि तपसा दीप्तं राजर्षिरमितप्रभः ॥ १२ ॥

अमित कान्तिमान् एवं महातेजस्वी राजर्षि अम्बरीषने तपस्यासे उद्दीप्त होनेवाले महर्षि ऋचीकको प्रणाम किया और उन्हें प्रसन्न करके कहा ॥ १२ ॥

पृष्ट्वा सर्वत्र कुशलमृचीकं तमिदं वचः ।

गवां शतसहस्त्रेण विक्रीणीषे सुतं यदि ॥ १३ ॥

पशोरर्थे महाभाग कृतकृत्योऽस्मि भार्गव । पहले तो उन्होंने ऋचीक मुनिसे उनकी सभी वस्तुओंके विषयमें कुशल- समाचार पूछा, उसके बाद इस प्रकार कहा — ' महाभाग भृगुनन्दन! यदि आप एक लाख गौएँ लेकर अपने एक पुत्रको पशु बनानेके लिये बेचें तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा ॥ १३३ ॥

सर्वे परिगता देशा यज्ञियं न लभे पशुम् ॥ १४ ॥

दातुमर्हसि मूल्येन सुतमेकमितो मम । ' मैं सारे देशोंमें घूम आया; परंतु कहीं भी यज्ञोपयोगी पशु नहीं पा सका । अतः आप उचित मूल्य लेकर यहाँ मुझे अपने एक पुत्रको दे दीजिये ' ॥ १४३ ॥

एवमुक्तो महातेजा ऋचीकस्त्वब्रवीद् वचः ॥ १५ ॥

नाहं ज्येष्ठं नरश्रेष्ठ विक्रीणीयां कथंचन । उनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी ऋचीक बोले-' नरश्रेष्ठ! मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रको तो किसी स तरह नहीं बेचूँगा ' ॥ १५३ ॥

ऋचीकस्य वचः श्रुत्वा तेषां माता महात्मनाम् ॥ १६ ॥

उवाच नरशार्दूलमम्बरीषमिदं वचः । ऋचीक मुनिकी बात सुनकर उन महात्मा पुत्रोंकी माताने पुरुषसिंह अम्बरीषसे इस प्रकार कहा- ॥ १६३ ॥

अविक्रेयं सुतं ज्येष्ठं भगवानाह भार्गवः ॥ १७ ॥

ममापि दयितं विद्धि कनिष्ठं शुनकं प्रभो ।

तस्मात् कनीयसं पुत्रं न दास्ये तव पार्थिव ॥ १८ ॥

' प्रभो! भगवान् भार्गव कहते हैं कि ज्येष्ठ पुत्र कदापि बेचनेयोग्य नहीं है; परंतु आपको मालूम होना चाहिये जो सबसे छोटा पुत्र शुनक है, वह मुझे भी बहुत ही प्रिय है । अतः पृथ्वीनाथ! मैं अपना छोटा पुत्र आपको कदापि नहीं दूँगी ॥ १७-१८ ॥

प्रायेण हि नरश्रेष्ठ ज्येष्ठाः पितृषु वल्लभाः ।

मातृणां च कनीयांसस्तस्माद् रक्ष्ये कनीयसम् ॥ १ ९ ॥

‘ नरश्रेष्ठ! प्रायः जेठे पुत्र पिताओंको प्रिय होते हैं और छोटे पुत्र माताओंको । अतः मैं अपने कनिष्ठ पुत्रकी अवश्य रक्षा करूँगी ' ॥ १ ९ ॥

उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् मुनिपल्यां तथैव च ।

शुनःशेपः स्वयं राम मध्यमो वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥

श्रीराम! मुनि और उनकी पत्नीके ऐसा कहनेपर मझले पुत्र शुनःशेपने स्वयं कहा - ॥२० ॥

पिता ज्येष्ठमविक्रेयं माता चाह कनीयसम् ।

विक्रेयं मध्यमं मन्ये राजपुत्र नयस्व माम् ॥ २१ ॥

' राजपुत्र! पिताने ज्येष्ठको और माताने कनिष्ठ पुत्रको बेचनेके लिये अयोग्य बतलाया है । अतः मैं समझता हूँ इन दोनोंकी दृष्टिमें मझला पुत्र ही बेचनेके योग्य है । इसलिये तुम मुझे ही ले चलो ' ॥ २१ ॥

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बालकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः १८७ अथ राजा महाबाहो वाक्यान्ते ब्रह्मवादिनः । स्वर्णमुद्रा, रत्नोंके ढेर तथा एक लाख गौओंके बदले हिरण्यस्य सुवर्णस्य कोटिभी रत्नराशिभिः ॥ २२ ॥ शुनःशेपको लेकर वे घरकी ओर चले ॥ २२-२३ ॥

गवां शतसहस्त्रेण शुनःशेपं नरेश्वरः । अम्बरीषस्तु राजर्षी रथमारोप्य सत्वरः ।

गृहीत्वा परमप्रीतो जगाम रघुनन्दन ॥ २३ ॥ शुनःशेपं महातेजा जगामाशु महायशाः ॥ २४ ॥

महाबाहु रघुनन्दन! ब्रह्मवादी मझले पुत्रके ऐसा महातेजस्वी महायशस्वी राजर्षि अम्बरीष शुनःशेपको कहनेपर राजा अम्बरीष बड़े प्रसन्न हुए और एक करोड़ | रथपर बिठाकर बड़ी उतावलीके साथ तीव्र गतिसे चले ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें एकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६१ ॥

द्विषष्टितमः सर्गः विश्वामित्रद्वारा शुनःशेपकी रक्षाका सफल प्रयत्न और तपस्या

शुनःशेपं नरश्रेष्ठ गृहीत्वा तु महायशाः ।

व्यश्रमत् पुष्करे राजा मध्याह्ने रघुनन्दन ॥ १ ॥

[ शतानन्दजी बोले - ] नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! महायशस्वी राजा अम्बरीष शुनःशेपको साथ लेकर दोपहरके समय पुष्कर तीर्थमें आये और वहाँ विश्राम करने लगे ॥१ ॥

तस्य विश्रममाणस्य शुनःशेपो महायशाः ।

पुष्करं ज्येष्ठमागम्य विश्वामित्रं ददर्श ह ॥ २ ॥

तप्यन्तमृषिभिः सार्धं मातुलं परमातुरः ।

विषण्णवदनो दीनस्तृष्णया च श्रमेण च ॥ ३ ॥

पपाताङ्के मुने राम वाक्यं चेदमुवाच ह । श्रीराम! जब वे विश्राम करने लगे, उस समय महायशस्वी शुनःशेप ज्येष्ठ पुष्करमें आकर ऋषियोंके साथ तपस्या करते हुए अपने मामा विश्वामित्रसे मिला । वह अत्यन्त आतुर एवं दीन हो रहा था । उसके मुखपर विषाद छा गया था । वह भूख - प्यास और परिश्रमसे दीन हो मुनिकी गोदमें गिर पड़ा और इस प्रकार बोला- ॥ २-३३ ॥ न मेऽस्ति माता न पिता ज्ञातयो बान्धवाः कुतः ॥ ४ ॥

त्रातुमर्हसि मां सौम्य धर्मेण मुनिपुंगव । ' सौम्य! मुनिपुंगव! न मेरे माता हैं, न पिता, फिर भाई - बन्धु कहाँसे हो सकते हैं । ( मैं असहाय हूँ अतः ) आप ही धर्मके द्वारा मेरी रक्षा कीजिये ॥ ४३ ॥

त्राता त्वं हि नरश्रेष्ठ सर्वेषां त्वं हि भावनः ॥ ५ ॥

राजा च कृतकार्यः स्यादहं दीर्घायुरव्ययः ।

स्वर्गलोकमुपाश्नीयां तपस्तप्त्वा ह्यनुत्तमम् ॥ ६ ॥

' नरश्रेष्ठ! आप सबके रक्षक तथा अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति करानेवाले हैं । ये राजा अम्बरीष कृतार्थ हो जायँ और मैं भी विकाररहित दीर्घायु होकर सर्वोत्तम तपस्या करके स्वर्गलोक प्राप्त कर लूँ - ऐसी कृपा कीजिये ॥ ५-६ ॥

स मे नाथो ह्यनाथस्य भव भव्येन चेतसा ।

पितेव पुत्रं धर्मात्मंस्त्रातुमर्हसि किल्बिषात् ॥ ७ ॥

‘ धर्मात्मन्! आप अपने निर्मलचित्तसे मुझ अनाथके नाथ ( असहाय संरक्षक ) हो जायँ । जैसे पिता अपने पुत्रकी रक्षा करता है, उसी प्रकार आप मुझे इस पापमूलक विपत्तिसे बचाइये'॥७ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महातपाः ।

सान्त्वयित्वा बहुविधं पुत्रानिदमुवाच ह ॥८ ॥

शुनःशेपकी वह बात सुनकर महातपस्वी विश्वामित्र उसे नाना प्रकारसे सान्त्वना दे अपने पुत्रोंसे इस प्रकार बोले —॥८ ॥

यत्कृते पितरः पुत्राञ्जनयन्ति शुभार्थिनः ।

परलोकहितार्थाय य कालोऽयमागतः ॥ ९ ॥

' बच्चो! शुभकी अभिलाषा रखनेवाले पिता जिस पारलौकिक हितके उद्देश्यसे पुत्रोंको जन्म देते हैं, उसकी पूर्तिका यह समय आ गया है ॥ ९ ॥

अयं मुनिसुतो बालो मत्तः शरणमिच्छति ।

अस्य जीवितमात्रेण प्रियं कुरुत पुत्रकाः ॥१० ॥

' पुत्रो! यह बालक मुनिकुमार मुझसे अपनी रक्षा चाहता है, तुमलोग अपना जीवनमात्र देकर इसका प्रिय करो ॥

सर्वे सुकृतकर्माणः सर्वे धर्मपरायणाः ।

पशुभूता नरेन्द्रस्य तृप्तिमग्नेः प्रयच्छत ॥ ११ ॥

' तुम सब - के - सब पुण्यात्मा और धर्मपरायण हो । अतः राजाके यज्ञमें पशु बनकर अग्निदेवको तृप्ति | प्रदान करो ॥ ११ ॥

पृष्ठ 200

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१८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

नाथवांश्च शुनःशेपो यज्ञश्चाविघ्नतो भवेत् ।

देवतास्तर्पिताश्च स्युर्मम चापि कृतं वचः ॥ १२ ॥

' इससे शुनःशेप सनाथ होगा, राजाका यज्ञ भी बिना किसी विघ्न - बाधाके पूर्ण हो जायगा, देवता भी तृप्त होंगे और तुम्हारे द्वारा मेरी आज्ञाका पालन भी हो ' जायगा ' ॥ १२ ॥

मुनेस्तद् वचनं श्रुत्वा मधुच्छन्दादयः सुताः ।

साभिमानं नरश्रेष्ठ सलीलमिदमब्रुवन् ॥ १३ ॥

' नरश्रेष्ठ! विश्वामित्र मुनिका वह वचन सुनकर उनके मधुच्छन्द आदि पुत्र अभिमान और अवहेलनापूर्वक इस प्रकार बोले- ॥१३ ॥

कथमात्मसुतान् हित्वा त्रायसेऽन्यसुतं विभो ।

अकार्यमिव पश्यामः श्वमांसमिव भोजने ॥ १४ ॥

' प्रभो! आप अपने बहुत से पुत्रोंको त्यागकर दूसरेके एक पुत्रकी रक्षा कैसे करते हैं? जैसे पवित्र भोजनमें कुत्तेका मांस पड़ जाय तो वह अग्राह्य हो जाता है, उसी प्रकार जहाँ अपने पुत्रोंकी रक्षा आवश्यक हो, वहाँ दूसरेके पुत्रकी रक्षाके कार्यको हम अकर्त्तव्यकी कोटिमें ही देखते हैं ' ॥ १४ ॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा पुत्राणां मुनिपुंगवः ।

क्रोधसंरक्तनयनो व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १५ ॥

उन पुत्रोंका वह कथन सुनकर मुनिवर विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । वे इस प्रकार कहने लगे- ॥ १५ ॥

निःसाध्वसमिदं प्रोक्तं धर्मादपि विगर्हितम् ।

अतिक्रम्य तु मद्वाक्यं दारुणं रोमहर्षणम् ॥ १६ ॥

श्वमांसभोजिनः सर्वे वासिष्ठा इव जातिषु ।

पूर्णं वर्षसहस्त्रं तु पृथिव्यामनुवत्स्यथ ॥ १७ ॥

' अरे! तुमलोगोंने निर्भय होकर ऐसी बात कही है, जो धर्मसे रहित एवं निन्दित है । मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जो यह दारुण एवं रोमाञ्चकारी बात तुमने मुँहसे निकाली है, इस अपराधके कारण तुम सब लोग भी वसिष्ठके पुत्रोंकी भाँति कुत्तेका मांस खानेवाली मुष्टिक आदि जातियोंमें जन्म लेकर पूरे एक हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीपर रहोगे ' ॥ १६-१७ ॥

कृत्वा शापसमायुक्तान् पुत्रान् मुनिवरस्तदा ।

शुनःशेपमुवाचार्तं कृत्वा रक्षां निरामयाम् ॥ १८ ॥ ।

इस प्रकार अपने पुत्रोंको शाप देकर मुनिवर विश्वामित्रने उस समय शोकार्त शुनःशेपकी निर्विघ्न रक्षा करके उससे इस प्रकार कहा- ॥ १८ ॥

पवित्रपाशैराबद्धो रक्तमाल्यानुलेपनः ।

वैष्णवं यूपमासाद्य वाग्भिरग्निमुदाहर ॥ १ ९ ॥

इमे च गाथे द्वे दिव्ये गायेथा मुनिपुत्रक । म अम्बरीषस्य यज्ञेऽस्मिंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ॥२० ॥

' मुनिकुमार! अम्बरीषके इस यज्ञमें जब तुम्हें कुश आदिके पवित्र पाशोंसे बाँधकर लाल फूलोंकी माला और लाल चन्दन धारण करा दिया जाय, उस समय | तुम विष्णुदेवता - सम्बन्धी यूपके पास जाकर वाणीद्वारा अग्रिकी ( इन्द्र और विष्णुकी ) स्तुति करना और इन दो दिव्य गाथाओंका गान करना । इससे तुम मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लोगे ' ॥ १ ९ -२० ॥

शुनःशेपो गृहीत्वा ते द्वे गाथे सुसमाहितः ।

त्वरया राजसिंहं तमम्बरीषमुवाच ह ॥२१ ॥

शुनःशेपने एकाग्रचित्त होकर उन दोनों गाथाओंको ग्रहण किया और राजसिंह अम्बरीषके पास जाकर उनसे शीघ्रतापूर्वक कहा— ॥ २१ ॥

राजसिंह महाबुद्धे शीघ्रं गच्छावहे वयम् ।

निवर्तयस्व राजेन्द्र दीक्षां च समुदाहर ॥ २२ ॥

' राजेन्द्र! परम बुद्धिमान् राजसिंह! अब हम दोनों शीघ्र चलें । आप यज्ञकी दीक्षा लें और यज्ञकार्य सम्पन्न करें ' ॥ २२ ॥

तद् वाक्यमृषिपुत्रस्य श्रुत्वा हर्षसमन्वितः ।

जगाम नृपतिः शीघ्रं यज्ञवाटमतन्द्रितः ॥ २३ ॥

ऋषिकुमारका वह वचन सुनकर राजा अम्बरीष आलस्य छोड़ हर्षसे उत्फुल्ल हो शीघ्रतापूर्वक यज्ञशालामें गये ॥ २३ ॥

सदस्यानुमते राजा पवित्रकृतलक्षणम् ।

पशुं रक्ताम्बरं कृत्वा यूपे तं समबन्धयत् ॥ २४ ॥

वहाँ सदस्यकी अनुमति ले राजा अम्बरीषने शुनःशेपको कुशके पवित्र पाशसे बाँधकर उसे पशुके लक्षणसे सम्पन्न कर दिया और यज्ञ - पशुको लाल वस्त्र पहिनाकर यूपमें बाँध दिया ॥ २४ ॥

स बद्धो वाग्भिरग्र्याभिरभितुष्टाव वै सुरौ ।

इन्द्रमिन्द्रानुजं चैव यथावन्मुनिपुत्रकः ॥ २५ ॥

बँधे हुए मुनिपुत्र शुनःशेपने उत्तम वाणीद्वारा इन्द्र और उपेन्द्र इन दोनों देवताओंकी यथावत् स्तुति की ॥ २५ ॥

ततः प्रीतः सहस्राक्षो रहस्यस्तुतितोषितः ।

दीर्घमायुस्तदा प्रादाच्छुनःशेपाय वासवः ॥ २६ ॥

उस रहस्यभूत स्तुतिसे संतुष्ट होकर सहस्र