वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 251–260

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 251 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे षष्ठः सर्गः २३ ९

वाणी सुनते हुए श्रीरामने प्रात: कालिक संध्योपासना की; ।

फिर एकाग्रचित्त होकर वे जप करने लगे ॥६ ॥

तुष्टाव प्रणतश्चैव शिरसा मधुसूदनम् ।

विमलक्षौमसंवीतो वाचयामास स द्विजान् ॥७ ॥

तदनन्तर रेशमी वस्त्र धारण किये हुए श्रीरामने मस्तक झुकाकर भगवान् मधुसूदनको प्रणाम और उनका स्तवन किया; इसके बाद ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया ॥ ७ ॥

तेषां पुण्याहघोषोऽथ गम्भीरमधुरस्तथा ।

अयोध्यां पूरयामास तूर्यघोषानुनादितः ॥ ८ ॥

उन ब्राह्मणोंका पुण्याहवाचनसम्बन्धी गम्भीर एवं मधुर घोष नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे व्याप्त होकर सारी अयोध्यापुरीमें फैल गया ॥ ८ ॥

कृतोपवासं तु तदा वैदेह्या सह राघवम् ।

अयोध्यानिलयः श्रुत्वा सर्वः प्रमुदितो जनः ॥ ९ ॥

उस समय अयोध्यावासी मनुष्योंने जब यह सुना कि श्रीरामचन्द्रजीने सीताके साथ उपवास - व्रत आरम्भ कर दिया है, तब उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ९ ॥

ततः पौरजनः सर्वः श्रुत्वा रामाभिषेचनम् ।

प्रभातां रजनीं दृष्ट्वा चक्रे शोभयितुं पुरीम् ॥ १० ॥

सबेरा होनेपर श्रीरामके राज्याभिषेकका समाचार सुनकर समस्त पुरवासी अयोध्यापुरीको सजानेमें लग गये ॥ १० ॥

सिताभ्रशिखराभेषु देवतायतनेषु च ।

चतुष्पथेषु रथ्यासु चैत्येष्वट्टालकेषु च ॥ ११ ॥

नानापण्यसमृद्धेषु वणिजामापणेषु च ।

कुटुम्बिनां समृद्धेषु श्रीमत्सु भवनेषु च ॥ १२ ॥

सभासु चैव सर्वासु वृक्षेष्वालक्षितेषु च ।

ध्वजाः समुच्छ्रिताः साधु पताकाश्चाभवंस्तथा ॥ १३ ॥

जिनके शिखरोंपर श्वेत बादल विश्राम करते हैं, उन पर्वतोंके समान गगनचुम्बी देवमन्दिरों, चौराहों, गलियों, देववृक्षों, समस्त सभाओं, अट्टालिकाओं, नाना प्रकारकी बेचनेयोग्य वस्तुओंसे भरी हुई व्यापारियोंकी बड़ी - बड़ी दूकानों तथा कुटुम्बी गृहस्थोंके सुन्दर समृद्धिशाली भवनोंमें और दूरसे दिखायी देनेवाले वृक्षोंपर भी ऊँची ध्वजाएँ लगायी गयीं और उनमें पताकाएँ फहरायी गयीं ॥ ११–१३ ॥

नटनर्तकसङ्घानां गायकानां च गायताम् ।

मनःकर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः ॥ १४ ॥

उस समय वहाँकी जनता सब ओर नटों और नर्तकोंके समूहों तथा गानेवाले गायकोंकी मन और कानोंको सुख देनेवाली वाणी सुनती थी ॥ १४ ॥

रामाभिषेकयुक्ताश्च कथाश्चकुर्मिथो जनाः ।

रामाभिषेके सम्प्राप्ते चत्वरेषु गृहेषु च ॥ १५ ॥

श्रीरामके राज्याभिषेकका शुभ अवसर प्राप्त होनेपर प्रायः सब लोग चौराहोंपर और घरोंमें भी आपसमें श्रीरामके राज्याभिषेककी ही चर्चा करते थे ॥ १५ ॥

बाला अपि क्रीडमाना गृहद्वारेषु सङ्घशः ।

रामाभिषवसंयुक्ताश्चकुरेव कथा मिथः ॥ १६ ॥

घरोंके दरवाजोंपर खेलते हुए झुंड के झुंड बालक भी आपसमें श्रीरामके राज्याभिषेककी ही बातें करते थे ॥१६ ॥

कृतपुष्पोपहारश्च धूपगन्धाधिवासितः ।

राजमार्गः कृतः श्रीमान् पौरै रामाभिषेचने ॥ १७ ॥

पुरवासियोंने श्रीरामके राज्याभिषेकके समय राजमार्गपर फूलोंकी भेंट चढ़ाकर वहाँ सब ओर धूपकी सुगन्ध फैला दी; ऐसा करके उन्होंने राजमार्गको बहुत सुन्दर बना दिया ॥ १७ ॥

प्रकाशकरणार्थं च निशागमनशङ्कया ।

दीपवृक्षांस्तथा चकुरनुरथ्यासु सर्वशः ॥ १८ ॥

राज्याभिषेक होते - होते रात हो जानेकी आशङ्कासे प्रकाशकी व्यवस्था करनेके लिये पुरवासियोंने सब ओर सड़कोंके दोनों तरफ वृक्षकी भाँति अनेक शाखाओंसे युक्त दीपस्तम्भ खड़े कर दिये ॥ १८ ॥

अलंकारं पुरस्यैवं कृत्वा तत् पुरवासिनः ।

आकांक्षमाणा रामस्य यौवराज्याभिषेचनम् ॥ १ ९ ॥

समेत्य सङ्घशः सर्वे चत्वरेषु सभासु च ।

कथयन्तो मिथस्तत्र प्रशशंसुर्जनाधिपम् ॥ २० ॥

इस प्रकार नगरको सजाकर श्रीरामके युवराजपदपर अभिषेककी अभिलाषा रखनेवाले समस्त पुरवासी चौराहों और सभाओंमें झुंड - के - झुंड एकत्र हो वहाँ परस्पर बातें करते हुए महाराज दशरथकी प्रशंसा करने लगे— ॥

अहो महात्मा राजायमिक्ष्वाकुकुलनन्दनः ।

ज्ञात्वा वृद्धं स्वमात्मानं रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २१ ॥

' अहो! इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाले ये राजा दशरथ बड़े महात्मा हैं, जो कि अपने - आपको बूढ़ा हुआ जानकर श्रीरामका राज्याभिषेक करने जा रहे हैं ॥

सर्वे ह्यनुगृहीताः स्म यन्नो रामो महीपतिः ।

चिराय भविता गोप्ता दृष्टलोकपरावरः ॥२२ ॥

' भगवान्‌का हम सब लोगोंपर बड़ा अनुग्रह है कि | श्रीरामचन्द्रजी हमारे राजा होंगे और चिरकालतक हमारी

पृष्ठ 252

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 252 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे रक्षा करते रहेंगे; क्योंकि वे समस्त लोकोंके निवासियोंमें जो भलाई या बुराई है, उसे अच्छी तरह देख चुके हैं ॥

अनुद्धतमना विद्वान् धर्मात्मा भ्रातृवत्सलः ।

यथा च भ्रातृषु स्निग्धस्तथास्मास्वपि राघवः ॥ २३ ॥

' श्रीरामका मन कभी उद्धत नहीं होता । वे विद्वान्, धर्मात्मा और अपने भाइयोंपर स्नेह रखनेवाले हैं । उनका अपने भाइयोंपर जैसा स्नेह है, वैसा ही हमलोगोंपर भी है ॥

चिरं जीवतु धर्मात्मा राजा दशरथोऽनघः ।

यत्प्रसादेनाभिषिक्तं रामं द्रक्ष्यामहे वयम् ॥ २४ ॥

' धर्मात्मा एवं निष्पाप राजा दशरथ चिरकालतक जीवित रहें, जिनके प्रसादसे हमें श्रीरामके राज्याभिषेकका दर्शन सुलभ होगा ' ॥ २४ ॥

एवंविधं कथयतां पौराणां शुश्रुवुः परे ।

दिग्भ्यो विश्रुतवृत्तान्ताः प्राप्ता जानपदा जनाः ॥ २५ ॥

अभिषेकका वृत्तान्त सुनकर नाना दिशाओंसे उस जनपदके लोग भी वहाँ पहुँचे थे, उन्होंने उपर्युक्त बातें कहनेवाले पुरवासियोंकी सभी बातें सुनीं ॥ २५ ॥

ते तु दिग्भ्यः पुरीं प्राप्ता द्रष्टुं रामाभिषेचनम् ।

रामस्य पूरयामासुः पुरीं जानपदा जनाः ॥ २६ ॥

वे सब - के - सब श्रीरामका राज्याभिषेक देखनेके लिये अनेक दिशाओंसे अयोध्यापुरीमें आये थे । उन जनपदनिवासी मनुष्योंने श्रीरामपुरीको अपनी उपस्थितिसे भर दिया था ॥ २६ ॥

जनौघैस्तैर्विसर्पद्भिः शुश्रुवे तत्र निःस्वनः ।

पर्वसूदीर्णवेगस्य सागरस्येव निःस्वनः ॥ २७ ॥

वहाँ मनुष्योंकी भीड़ - भाड़ बढ़नेसे जो जनरव सुनायी देता था, वह पर्वोंके दिन बढ़े हुए वेगवाले महासागरकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ २७ ॥

ततस्तदिन्द्रक्षयसंनिभं पुरं दिदृक्षुभिर्जानपदैरुपाहितैः । समन्ततः सस्वनमाकुलं बभौ समुद्रयादोभिरिवार्णवोदकम् ॥ २८ ॥

उस समय श्रीरामके अभिषेकका उत्सव देखनेके लिये पधारे हुए जनपदवासी मनुष्योंद्वारा सब ओरसे भरा हुआ वह इन्द्रपुरीके समान नगर अत्यन्त कोलाहलपूर्ण होनेके कारण मकर, नक्र, तिमिङ्गल आदि विशाल जल - जन्तुओंसे परिपूर्ण महासागरके समान प्रतीत | होता था ॥ २८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ॥

सप्तमः सर्गः श्रीरामके अभिषेकका समाचार पाकर खिन्न हुई मन्थराका कैकेयीको उभाड़ना, परंतु प्रसन्न हुई कैकेयीका उसे पुरस्काररूपमें आभूषण देना और वर माँगनेके

ज्ञातिदासी यतो जाता कैकेय्या तु सहोषिता ।

प्रासादं चन्द्रसंकाशमारुरोह यदृच्छया ॥ १ ॥

रानी कैकेयीके पास एक दासी थी, जो उसके मायकेसे आयी हुई थी । वह सदा कैकेयीके ही साथ रहा करती थी । उसका जन्म कहाँ हुआ था? उसके देश और माता - पिता कौन थे? इसका पता किसीको नहीं था । अभिषेकसे एक दिन पहले वह स्वेच्छासे ही कैकेयीके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् महलकी छतपर जा चढ़ी ॥ १ ॥

सिक्तराजपथां कृत्स्नां प्रकीर्णकमलोत्पलाम् ।

अयोध्यां मन्थरा तस्मात् प्रासादादन्ववैक्षत ॥ २ ॥

उस दासीका नाम था - मन्थरा । उसने उस महलकी छतसे देखा - अयोध्याकी सड़कोंपर छिड़काव । लिये प्रेरित करना | किया गया है और सारी पुरीमें यत्र - तत्र खिले हुए कमल और उत्पल बिखेरे गये हैं ॥ २ ॥

पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलंकृताम् ।

सिक्तां चन्दनतोयैश्च शिरःस्नातजनैर्युताम् ॥ ३ ॥

सब ओर बहुमूल्य पताकाएँ फहरा रही हैं । ध्वजाओंसे इस पुरीकी अपूर्व शोभा हो रही है । राजमार्गोंपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया है तथा अयोध्यापुरीके सब लोग उबटन लगाकर सिरके ऊपरसे स्नान किये हुए हैं ॥ ३ ॥

माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम् ।

शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनादिताम् ॥४ ॥

सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषनिनादिताम् ।

प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम् ॥ ५ ॥

पृष्ठ 253

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 253 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे सप्तमः सर्गः २४१ श्रीरामके दिये हुए माल्य और मोदक हाथमें लिये । श्रेष्ठ ब्राह्मण हर्षनाद कर रहे हैं, देवमन्दिरोंके दरवाजे चूने और चन्दन आदिसे लीपकर सफेद एवं सुन्दर बनाये गये हैं, सब प्रकारके बाजोंकी मनोहर ध्वनि हो रही है, अत्यन्त हर्षमें भरे हुए मनुष्योंसे सारा नगर परिपूर्ण है और चारों ओर वेदपाठकोंकी ध्वनि गूँज रही है, श्रेष्ठ हाथी और घोड़े हर्षसे उत्फुल्ल दिखायी देते हैं तथा गाय - बैल प्रसन्न होकर रँभा रहे हैं ॥ ४-५ ॥

हृष्टप्रमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम् ।

अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता ॥ ६ ॥

सारे नगरनिवासी हर्षजनित रोमाञ्चसे युक्त और आनन्दमग्न हैं तथा नगरमें सब ओर श्रेणीबद्ध ऊँचे - ऊँचे ध्वज फहरा रहे हैं । अयोध्याकी ऐसी शोभाको देखकर मन्थराको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ६ ॥

सा हर्षोत्फुल्लनयनां पाण्डुरक्षौमवासिनीम् ।

अविदूरे स्थितां दृष्ट्वा धात्रीं पप्रच्छ मन्थरा ॥ ७ ॥

उसने पासके ही कोठेपर रामकी धायको खड़ी देखा, उसके नेत्र प्रसन्नतासे खिले हुए थे और शरीरपर पीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा पा रही थी । उसे देखकर मन्थराने उससे पूछा —॥७ ॥

उत्तमेनाभिसंयुक्ता हर्षेर्थ सती ।

राममाता धनं किं नु जनेभ्यः सम्प्रयच्छति ॥ ८ ॥

अतिमात्रं प्रहर्षः किं जनस्यास्य च शंस मे ।

कारयिष्यति किं वापि सम्प्रहृष्टो महीपतिः ॥ ९ ॥

' धाय! आज श्रीरामचन्द्रजीकी माता अपने किसी अभीष्ट मनोरथके साधनमें तत्पर हो अत्यन्त हर्षमें भरकर लोगोंको धन क्यों बाँट रही हैं? आज यहाँके सभी मनुष्योंको इतनी अधिक प्रसन्नता क्यों है? इसका कारण मुझे बताओ! आज महाराज दशरथ अत्यन्त प्रसन्न होकर कौन - सा कर्म करायेंगे ' ॥ ८ - ९ ॥

विदीर्यमाणा हर्षेण धात्री तु परया मुदा ।

आचचक्षेऽथ कुब्जायै भूयसीं राघवे श्रियम् ॥ १० ॥

श्वः पुष्येण जितक्रोधं यौवराज्येन चानघम् ।

राजा दशरथो राममभिषेक्ता हि राघवम् ॥ ११ ॥

श्रीरामकी धाय तो हर्षसे फूली नहीं समाती थी, उसने कुब्जाके पूछनेपर बड़े आनन्दके साथ उसे ' बताया- -'कुब्जे '! रघुनाथजीको बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त होनेवाली है । कल महाराज दशरथ पुष्यनक्षत्रके योगमें क्रोधको जीतनेवाले, पापरहित, रघुकुलनन्दन श्रीरामको युवराजके पदपर अभिषिक्त करेंगे'॥१०-११ ॥

धात्र्यास्तु वचनं श्रुत्वा कुब्जा क्षिप्रममर्षितः ।

कैलासशिखराकारात् प्रासादादवरोहत ॥ १२ ॥

धायका यह वचन सुनकर कुब्जा मन - ही - मन कुढ़ गयी और उस कैलास - शिखरकी भाँति उज्ज्वल एवं गगनचुम्बी प्रासादसे तुरंत ही नीचे उतर गयी ॥ १२ ॥

सा दह्यमाना क्रोधेन मन्थरा पापदर्शिनी ।

शयानामेव कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १३ ॥

मन्थराको इसमें कैकेयीका अनिष्ट दिखायी देता था, वह क्रोधसे जल रही थी । उसने महलमें लेटी हुई कैकेयीके पास जाकर इस प्रकार कहा— ॥१३ ॥

उत्तिष्ठ मूढे किं शेषे भयं त्वामभिवर्तते ।

उपप्लुतमघौघेन नात्मानमवबुध्यसे ॥ १४ ॥

' मूर्खे! उठ । क्या सो रही है? तुझपर बड़ा भारी भय आ रहा है । अरी! तेरे ऊपर विपत्तिका पहाड़ टूट पड़ा है, फिर भी तुझे अपनी इस दुरवस्थाका बोध नहीं होता? ' ॥ १४ ॥

अनिष्टे सुभगाकारे सौभाग्येन विकत्थसे ।

चलं हि तव सौभाग्यं नद्याः स्त्रोत इवोष्णगे ॥ १५ ॥

‘ तेरे प्रियतम तेरे सामने ऐसा आकार बनाये आते हैं मानो सारा सौभाग्य तुझे ही अर्पित कर देते हों, परंतु पीठ पीछे वे तेरा अनिष्ट करते हैं । तू उन्हें अपनेमें अनुरक्त जानकर सौभाग्यकी डींग हाँका करती है, परंतु जैसे ग्रीष्म ऋतुमें नदीका प्रवाह सूखता चला जाता है, उसी प्रकार तेरा वह सौभाग्य अब अस्थिर हो गया है— तेरे हाथसे चला जाना चाहता है! ' ॥ १५ ॥

एवमुक्ता तु कैकेयी रुष्टया परुषं वचः ।

कुब्जया पापदर्शिन्या विषादमगमत् परम् ॥ १६ ॥

इष्टमें भी अनिष्टका दर्शन करानेवाली रोषभरी कुब्जाके इस प्रकार कठोर वचन कहनेपर कैकेयीके मनमें बड़ा दुःख हुआ ॥ १६ ॥

कैकेयी त्वब्रवीत् कुब्जां कच्चित् क्षेमं न मन्थरे ।

विषण्णवदनां हि त्वां लक्षये भृशदुःखिताम् ॥ १७ ॥

उस समय केकयराजकुमारीने कुब्जासे पूछा-| ' मन्थरे! कोई अमङ्गलकी बात तो नहीं हो गयी; क्योंकि तेरे मुखपर विषाद छा रहा है और तू मुझे बहुत दुःखी दिखायी देती है'॥१७ ॥

मन्थरा तु वचः श्रुत्वा कैकेय्या मधुराक्षरम् ।

उवाच क्रोधसंयुक्ता वाक्यं वाक्यविशारदा ॥ १८ ॥

सा विषण्णतरा भूत्वा कुब्जा तस्यां हितैषिणी ।

विषादयन्ती प्रोवाच भेदयन्ती च राघवम् ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 254

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 254 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मन्थरा बातचीत करनेमें बड़ी कुशल थी, वह । कैकेयीके मीठे वचन सुनकर और भी खिन्न हो गयी, उसके प्रति अपनी हितैषिता प्रकट करती हुई कुपित हो उठी और कैकेयीके मनमें श्रीरामके प्रति भेदभाव और विषाद उत्पन्न करती हुई इस प्रकार बोली- ॥

अक्षयं सुमहद् देवि प्रवृत्तं त्वद्विनाशनम् ।

रामं दशरथो राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २० ॥

' देवि! तुम्हारे सौभाग्यके महान् विनाशका कार्य आरम्भ हो गया है, जिसका कोई प्रतीकार नहीं है । कल महाराज दशरथ श्रीरामको युवराजके पदपर अभिषिक्त कर देंगे ॥ २० ॥

सास्म्यगाधे भये मग्ना दुःखशोकसमन्विता ।

दह्यमानानलेनेव त्वद्धितार्थमिहागता ॥ २१ ॥

' यह समाचार पाकर मैं दुःख और शोकसे व्याकुल हो अगाध भयके समुद्रमें डूब गयी हूँ, * चिन्ताकी आगसे मानो जली जा रही हूँ और तुम्हारे हितकी बात बतानेके लिये यहाँ आयी हूँ ' ॥ २१ ॥

तव दुःखेन कैकेयि मम दुःखं महद् भवेत् ।

त्वद्वृद्धौ मम वृद्धिश्च भवेदिह न संशयः ॥ २२ ॥

' केकयनन्दिनि! यदि तुमपर कोई दुःख आया तो उससे मुझे भी बड़े भारी दुःखमें पड़ना होगा । तुम्हारी उन्नतिमें ही मेरी भी उन्नति है, इसमें संशय नहीं है ॥ २२ ॥

नराधिपकुले जाता महिषी त्वं महीपतेः ।

उग्रत्वं राजधर्माणां कथं देवि न बुध्यसे ॥ २३ ॥

' देवि! तुम राजाओंके कुलमें उत्पन्न हुई हो और एक महाराजकी महारानी हो, फिर भी राजधर्मोकी उग्रताको कैसे नहीं समझ रही हो? ॥ २३ ॥

धर्मवादी शठो भर्ता श्लक्ष्णवादी च दारुणः ।

शुद्धभावेन जानीषे तेनैवमतिसंधिता ॥ २४ ॥

' तुम्हारे स्वामी धर्मकी बातें तो बहुत करते हैं, परंतु हैं बड़े शठ । मुँहसे चिकनी - चुपड़ी बातें करते हैं, परंतु हृदयके बड़े क्रूर हैं । तुम समझती हो कि वे सारी बातें शुद्ध भावसे ही कहते हैं, इसीलिये आज उनके द्वारा तुम बेतरह ठगी गयी ॥ २४ ॥

उपस्थितः प्रयुञ्जानस्त्वयि सान्त्वमनर्थकम् ।

अर्थेनैवाद्य ते भर्ता कौसल्यां योजयिष्यति ॥ २५ ॥

' तुम्हारे पति तुम्हें व्यर्थ सान्त्वना देनेके लिये यहाँ उपस्थित होते हैं, वे ही अब रानी कौसल्याको अर्थसे सम्पन्न करने जा रहे हैं ॥ २५ ॥

अपवाह्य तु दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु ।

काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके ॥ २६ ॥

' उनका हृदय इतना दूषित है कि भरतको तो उन्होंने तुम्हारे मायके भेज दिया और कल सबेरे ही अवधके निष्कण्टक राज्यपर वे श्रीरामका अभिषेक करेंगे ॥ २६ ॥

शत्रुः पतिप्रवादेन मात्रेव हितकाम्यया ।

आशीविष इवाङ्गेन बाले परिधृतस्त्वया ॥२७ ॥

' बाले! जैसे माता हितकी कामनासे पुत्रका पोषण करती है, उसी प्रकार ' पति ' कहलानेवाले जिस व्यक्तिका तुमने पोषण किया है, वह वास्तवमें शत्रु निकला । जैसे कोई अज्ञानवश सर्पको अपनी गोद में लेकर उसका लालन करे, उसी प्रकार तुमने उन सर्पवत् बर्ताव करनेवाले महाराजको अपने अङ्कमें स्थान दिया है ॥ २७ ॥

यथा हि कुर्याच्छत्रुर्वा सर्पों वा प्रत्युपेक्षितः ।

राज्ञा दशरथेनाद्य सपुत्रा त्वं तथा कृता ॥ २८ ॥

' उपेक्षित शत्रु अथवा सर्प जैसा बर्ताव कर सकता है, राजा दशरथने आज पुत्रसहित तुझ कैकेयीके प्रति वैसा ही बर्ताव किया है ॥ २८ ॥

पापेनानृतसान्त्वेन बाले नित्यं सुखोचिता ।

रामं स्थापयता राज्ये सानुबन्धा हता ह्यसि ॥ २ ९ ॥

' बाले! तुम सदा सुख भोगनेके योग्य हो, परंतु मनमें पाप ( दुर्भावना ) रखकर ऊपरसे झूठी सान्त्वना देनेवाले महाराजने अपने राज्यपर श्रीरामको स्थापित करनेका विचार करके आज सगे - सम्बन्धियोंसहित तुमको मानो मौतके मुखमें डाल दिया है ॥ २ ९ ॥

सा प्राप्तकालं कैकेयि क्षिप्रं कुरु हितं तव ।

त्रायस्व पुत्रमात्मानं मां च विस्मयदर्शने ॥ ३० ॥

' केकयराजकुमारी! तुम दुःखजनक बात सुनकर भी मेरी ओर इस तरह देख रही हो, मानो तुम्हें प्रसन्नता हुई हो और मेरी बातोंसे तुम्हें विस्मय हो रहा हो, परंतु यह विस्मय छोड़ो और जिसे करनेका समय आ गया है, अपने उस हितकर कार्यको शीघ्र करो तथा ऐसा करके अपनी, अपने पुत्रकी और मेरी भी रक्षा करो ' ॥ ३० ॥

मन्थराया वचः श्रुत्वा शयनात् सा शुभानना ।

उत्तस्थौ हर्षसम्पूर्णा चन्द्रलेखेव शारदी ॥ ३१ ॥

मन्थराकी यह बात सुनकर सुन्दर मुखवाली कैकेयी सहसा शय्यासे उठ बैठी । उसका हृदय हर्षसे

पृष्ठ 255

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 255 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे

भर गया । वह शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलकी भाँति उद्दीप्त ।

हो उठी ॥३१ ॥

अतीव सा तु संतुष्टा कैकेयी विस्मयान्विता ।

दिव्यमाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रददौ शुभम् ॥ ३२ ॥

कैकेयी मन - ही - मन अत्यन्त संतुष्ट हुई । विस्मयविमुग्ध हो मुसकराते हुए उसने कुब्जाको पुरस्कारके रूपमें एक बहुत सुन्दर दिव्य आभूषण प्रदान किया ॥ ३२ ॥

दत्त्वा त्वाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रमदोत्तमा ।

कैकेयी मन्थरां हृष्टा पुनरेवाब्रवीदिदम् ॥ ३३ ॥

इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यातं परमं प्रियम् ।

एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूयः करोमि ते ॥ ३४ ॥

कुब्जाको वह आभूषण देकर हर्षसे भरी हुई रमणीशिरोमणि कैकेयीने पुनः मन्थरासे इस प्रकार कहा— ' मन्थरे! यह तूने मुझे बड़ा ही प्रिय समाचार सुनाया । तूने मेरे लिये जो यह प्रिय संवाद सुनाया, इसके लिये । अष्टमः सर्गः २४३ मैं तेरा और कौन - सा उपकार करूँ॥३३-३४ ॥

रामे वा भरते वाहं विशेषं नोपलक्षये ।

तस्मात् तुष्टास्मि यद् राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ ३५ ॥

' मैं भी राम और भरतमें कोई भेद नहीं समझती । अतः यह जानकर कि राजा श्रीरामका अभिषेक करनेवाले हैं, मुझे बड़ी खुशी हुई है ॥ ३५ ॥

न मे परं किंचिदितो वरं पुनः प्रियं प्रियार्हे सुवचं वचोऽमृतम् । तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरं वरं परं ते प्रददामि तं वृणु ॥ ३६ ॥

' मन्थरे! तू मुझसे प्रिय वस्तु पानेके योग्य है । मेरे लिये श्रीरामके अभिषेकसम्बन्धी इस समाचारसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय एवं अमृतके समान मधुर वचन नहीं कहा जा सकता । ऐसी परम प्रिय बात तुमने कही है; अतः अब यह प्रिय संवाद सुनानेके बाद तू कोई श्रेष्ठ वर माँग ले, मैं उसे अवश्य दूंगी ' ॥ ३६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ॥

अष्टमः सर्गः मन्थराका पुनः श्रीरामके राज्याभिषेकको कैकेयीके लिये अनिष्टकारी बताना, कैकेयीका श्रीरामके गुणोंको बताकर उनके अभिषेकका समर्थन करना तत्पश्चात् कुब्जाका पुनः श्रीरामराज्यको भरतके लिये भयजनक बताकर कैकेयीको भड़काना

मन्थरा त्वभ्यसूय्यैनामुत्सृज्याभरणं हि तत् ।

उवाचेदं ततो वाक्यं कोपदुःखसमन्विता ॥ १ ॥

यह सुनकर मन्थराने कैकेयीकी निन्दा करके उसके दिये हुए आभूषणको उठाकर फेंक दिया और कोप तथा दुःखसे भरकर वह इस प्रकार बोली- ॥१ ॥

हर्ष किमर्थमस्थाने कृतवत्यसि बालिशे ।

शोकसागरमध्यस्थं नात्मानमवबुध्यसे ॥ २ ॥

' रानी! तुम बड़ी नादान हो । अहो! तुमने यह बेमौके हर्ष किसलिये प्रकट किया? तुम्हें शोकके स्थानपर प्रसन्नता कैसे हो रही है? अरी! तुम शोकके समुद्रमें डूबी हुई हो, तो भी तुम्हें अपनी इस विपन्नावस्थाका बोध नहीं हो रहा है ॥२ ॥

मनसा प्रसहामि त्वां देवि दुःखार्दिता सती ।

यच्छोचितव्ये हृष्टासि प्राप्य त्वं व्यसनं महत् ॥ ३ ॥

' देवि! महान् संकटमें पड़नेपर जहाँ तुम्हें शोक होना चाहिये, वहीं हर्ष हो रहा है । तुम्हारी यह अवस्था । देखकर मुझे मन - ही - मन बड़ा क्लेश सहन करना पड़ता है । मैं दुःखसे व्याकुल हुई जाती हूँ ॥ ३ ॥

शोचामि दुर्मतित्वं ते का हि प्राज्ञा प्रहर्षयेत् ।

अरेः सपत्नीपुत्रस्य वृद्धिं मृत्योरिवागताम् ॥ ४ ॥

* मुझे तुम्हारी दुर्बुद्धिके लिये ही अधिक शोक होता है । अरी! सौता बेटा शत्रु होता है । वह सौतेली माँके लिये साक्षात् मृत्युके समान है । भला, उसके अभ्युदयका अवसर आया देख कौन बुद्धिमती स्त्री अपने मनमें हर्ष मानेगी ॥४ ॥

भरतादेव रामस्य राज्यसाधारणाद् भयम् ।

तद् विचिन्त्य विषण्णास्मि भयं भीताद्धि जायते ॥ ५ ॥

' यह राज्य भरत और राम दोनोंके लिये साधारण भोग्यवस्तु है, इसपर दोनोंका समान अधिकार है, इसलिये श्रीरामको भरतसे ही भय है । यही सोचकर मैं विषादमें डूबी जाती हूँ; क्योंकि भयभीतसे ही भय प्राप्त होता है अर्थात् आज जिसे भय है, वही राज्य प्राप्त कर

पृष्ठ 256

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 256 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

लेनेपर जब सबल हो जायगा, तब अपने भयके हेतुको ।

उखाड़ फेंकेगा ॥ ५ ॥

लक्ष्मणो हि महाबाहू रामं सर्वात्मना गतः ।

शत्रुघ्नश्चापि भरतं काकुत्स्थं लक्ष्मणो यथा ॥ ६ ॥

' महाबाहु लक्ष्मण सम्पूर्ण हृदयसे श्रीरामचन्द्रजीके अनुगत हैं । जैसे लक्ष्मण श्रीरामके अनुगत हैं, उसी तरह शत्रुघ्न भी भरतका अनुसरण करनेवाले हैं ॥ ६ ॥

प्रत्यासन्नक्रमेणापि भरतस्यैव भामिनि ।

राज्यक्रमो विसृष्टस्तु तयोस्तावद्यवीयसोः ॥ ७ ॥

' भामिनि! उत्पत्तिके क्रमसे श्रीरामके बाद भरतका ही पहले राज्यपर अधिकार हो सकता है ( अतः भरतसे भय होना स्वाभाविक है ) । लक्ष्मण और शत्रुघ्न तो छोटे हैं; अतः उनके लिये राज्यप्राप्तिकी सम्भावना दूर है ॥

विदुषः क्षत्रचारित्रे प्राज्ञस्य प्राप्तकारिणः ।

भयात् प्रवेपे रामस्य चिन्तयन्ती तवात्मजम् ॥८ ॥

‘ श्रीराम समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता हैं, विशेषतः क्षत्रियचरित्र ( राजनीति ) के पण्डित हैं तथा समयोचित कर्तव्यका पालन करनेवाले हैं; अतः उनका तुम्हारे पुत्रके प्रति जो क्रूरतापूर्ण बर्ताव होगा, उसे सोचकर मैं भयसे काँप उठती हूँ ॥ ८ ॥

सुभगा किल कौसल्या यस्याः पुत्रोऽभिषेक्ष्यते ।

यौवराज्येन महता श्वः पुष्येण द्विजोत्तमैः ॥ ९ ॥

' वास्तवमें कौसल्या ही सौभाग्यवती हैं, जिनके पुत्रका कल पुष्यनक्षत्रके योगमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा युवराजके महान् पदपर अभिषेक होने जा रहा है ॥ ९ ॥

प्राप्तां वसुमतीं प्रीतिं प्रतीतां हतविद्विषम् ।

उपस्थास्यसि कौसल्यां दासीवत् त्वं कृताञ्जलिः ॥ १० ॥

' वे भूमण्डलका निष्कण्टक राज्य पाकर प्रसन्न होंगी; क्योंकि वे राजाकी विश्वासपात्र हैं और तुम दासीकी भाँति हाथ जोड़कर उनकी सेवामें उपस्थित होओगी ॥ १० ॥

एवं च त्वं सहास्माभिस्तस्याः प्रेष्या भविष्यसि ।

पुत्रश्च तव रामस्य प्रेष्यत्वं हि गमिष्यति ॥ ११ ॥ ।

' इस प्रकार हमलोगोंके साथ तुम भी कौसल्याकी

दासी बनोगी और तुम्हारे पुत्र भरतको भी श्रीरामचन्द्रजीकी ।

गुलामी करनी पड़ेगी ॥ ११ ॥

हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः ।

अप्रहृष्टा भविष्यन्ति स्नुषास्ते भरतक्षये ॥ १२ ॥

‘ श्रीरामचन्द्रजीके अन्तःपुरकी परम सुन्दरी स्त्रियाँ-सीतादेवी और उनकी सखियाँ निश्चय ही बहुत प्रसन्न होंगी और भरतके प्रभुत्वका नाश होनेसे तुम्हारी बहुएँ शोकमग्न हो जायँगी ' ॥१२ ॥

तां दृष्ट्वा परमप्रीतां ब्रुवन्तीं मन्थरां ततः ।

रामस्यैव गुणान् देवी कैकेयी प्रशशंस ह ॥ १३ ॥

मन्थराको अत्यन्त अप्रसन्नताके कारण इस प्रकार बहकी - बहकी बातें करती देख देवी कैकेयीने श्रीरामके गुणोंकी ही प्रशंसा करते हुए कहा- ॥ १३ ॥

धर्मज्ञो गुणवान् दान्तः कृतज्ञः सत्यवान् शुचिः ।

रामो राजसुतो ज्येष्ठो यौवराज्यमतोऽर्हति ॥ १४ ॥

' कुब्जे! श्रीराम धर्मके ज्ञाता, गुणवान्, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ, सत्यवादी और पवित्र होनेके साथ ही महाराजके ज्येष्ठ पुत्र हैं; अतः युवराज होनेके योग्य वे ही हैं ॥

भ्रातॄन् भृत्यांश्च दीर्घायुः पितृवत् पालयिष्यति ।

संतप्यसे कथं कुब्जे श्रुत्वा रामाभिषेचनम् ॥ १५ ॥

' वे दीर्घजीवी होकर अपने भाइयों और भृत्योंका पिताकी भाँति पालन करेंगे । कुब्जे! उनके अभिषेककी बात सुनकर तू इतनी जल क्यों रही है? ॥ १५ ॥

भरतश्चापि रामस्य ध्रुवं वर्षशतात् परम् ।

पितृपैतामहं राज्यमवाप्स्यति नरर्षभः ॥ १६ ॥

' श्रीरामकी राज्यप्राप्तिके सौ वर्ष बाद नरश्रेष्ठ भरतको भी निश्चय ही अपने पिता पितामहोंका राज्य मिलेगा ॥ १६ ॥

सा त्वमभ्युदये प्राप्ते दह्यमानेव मन्थरे ।

भविष्यति च कल्याणे किमिदं परितप्यसे ॥ १७ ॥

' मन्थरे! ऐसे अभ्युदयकी प्राप्तिके समय, जब कि भविष्यमें कल्याण - ही - कल्याण दिखायी दे रहा है, तू इस प्रकार जलती हुई - सी संतप्त क्यों हो रही है? ॥ १७ ॥

यथा वै भरतो मान्यस्तथा भूयोऽपि राघवः ।

कौसल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु ॥ १८ ॥

' मेरे लिये जैसे भरत आदरके पात्र हैं, वैसे ही बल्कि उनसे भी बढ़कर श्रीराम हैं; क्योंकि वे कौसल्यासे भी बढ़कर मेरी बहुत सेवा किया करते हैं ॥ १८ ॥

राज्यं यदि हि रामस्य भरतस्यापि तत् तदा ।

मन्यते हि यथाऽऽत्मानं यथा भ्रातॄंस्तु राघवः ॥ १ ९ ॥

' यदि श्रीरामको राज्य मिल रहा है तो उसे भरतको मिला हुआ समझ; क्योंकि श्रीरामचन्द्र अपने भाइयोंको भी अपने ही समान समझते हैं ' ॥ १ ९ ॥

कैकेय्या वचनं श्रुत्वा मन्थरा भृशदुःखिता ।

दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ २० ॥

पृष्ठ 257

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 257 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे कैकेयीकी यह बात सुनकर मन्थराको बड़ा दुःख । हुआ । वह लंबी और गरम साँस खींचकर कैकेयीसे बोली - ॥ २० ॥

अनर्थदर्शिनी मौख्यन्नात्मानमवबुध्यसे ।

शोकव्यसनविस्तीर्णे मज्जन्ती दुःखसागरे ॥ २१ ॥

‘ रानी! तुम मूर्खतावश अनर्थको ही अर्थ समझ रही हो । तुम्हें अपनी स्थितिका पता नहीं है । तुम दुःखके उस महासागरमें डूब रही हो, जो शोक ( इष्टसे वियोगकी चिन्ता ) और व्यसन ( अनिष्टकी प्राप्तिके दुःख ) से महान् विस्तारको प्राप्त हो रहा है ॥ २१ ॥

भविता राघवो राजा राघवस्य च यः सुतः ।

राजवंशात्तु भरतः कैकेयि परिहास्यते ॥ २२ ॥

' केकयराजकुमारी! जब श्रीरामचन्द्र राजा हो जायँगे, तब उनके बाद उनका जो पुत्र होगा, उसीको राज्य मिलेगा । भरत तो राजपरम्परासे अलग हो जायँगे ॥ २२ ॥

नहि राज्ञः सुताः सर्वे राज्ये तिष्ठन्ति भामिनि ।

स्थाप्यमानेषु सर्वेषु सुमहाननयो भवेत् ॥ २३ ॥

‘ भामिनि! राजाके सभी पुत्र राज्यसिंहासनपर नहीं बैठते हैं; यदि सबको बिठा दिया जाय तो बड़ा भारी अनर्थ हो जाय ॥ २३ ॥

तस्माज्ज्येष्ठे हि कैकेयि राज्यतन्त्राणि पार्थिवाः ।

स्थापयन्त्यनवद्याङ्गि गुणवत्स्वितरेष्वपि ॥ २४ ॥

‘ परमसुन्दरी केकयनन्दिनि! इसीलिये राजालोग राजकाजका भार ज्येष्ठ पुत्रपर ही रखते हैं । यदि ज्येष्ठ पुत्र गुणवान् न हो तो दूसरे गुणवान् पुत्रोंको भी राज्य सौंप देते हैं ॥२४ ॥

असावत्यन्तनिर्भग्नस्तव पुत्रो भविष्यति ।

अनाथवत् सुखेभ्यश्च राजवंशाच्च वत्सले ॥ २५ ॥

' पुत्रवत्सले! तुम्हारा पुत्र राज्यके अधिकारसे तो बहुत दूर हटा ही दिया जायगा, वह अनाथकी भाँति समस्त सुखोंसे भी वञ्चित हो जायगा ॥ २५ ॥

साहं त्वदर्थे सम्प्राप्ता त्वं तु मां नावबुद्ध्यसे ।

सपलिवृद्धौ या मे त्वं प्रदेयं दातुमर्हसि ॥ २६ ॥

' इसलिये मैं तुम्हारे ही हितकी बात सुझानेके लिये यहाँ आयी हूँ; परंतु तुम मेरा अभिप्राय तो समझती नहीं, उलटे सौतका अभ्युदय सुनकर मुझे पारितोषिक देने चली हो ॥ २६ ॥

ध्रुवं तु भरतं रामः प्राप्य राज्यमकण्टकम् ।

देशान्तरं नाययिता लोकान्तरमथापि वा ॥ २७ ॥

‘ याद रखो, यदि श्रीरामको निष्कण्टक राज्य मिल । अष्टमः सर्गः २४५ गया तो वे भरतको अवश्य ही इस देशसे बाहर निकाल देंगे अथवा उन्हें परलोकमें भी पहुँचा सकते हैं ॥ २७ ॥

बाल एव तु मातुल्यं भरतो नायितस्त्वया ।

संनिकर्षाच्च सौहार्दं जायते स्थावरेष्विव ॥ २८ ॥

' छोटी अवस्थामें ही तुमने भरतको मामाके घर भेज दिया । निकट रहनेसे सौहार्द उत्पन्न होता है । यह बात स्थावर योनियोंमें भी देखी जाती है ( लता और वृक्ष आदि एक - दूसरेके निकट होनेपर परस्पर आलिङ्गन-पाशमें बद्ध हो जाते हैं । यदि भरत यहाँ होते तो राजाका उनमें भी समानरूपसे स्नेह बढ़ता; अतः वे उन्हें भी आधा राज्य दे देते ) ॥ २८ ॥

भरतानुवशात् सोऽपि शत्रुघ्नस्तत्समं गतः ।

लक्ष्मणो हि यथा रामं तथायं भरतं गतः ॥ २ ९ ॥

' भरतके अनुरोधसे शत्रुघ्न भी उनके साथ ही चले गये ( यदि वे यहाँ होते तो भरतका काम बिगड़ने नहीं पाता । क्योंकि— ) जैसे लक्ष्मण रामके अनुगामी हैं, उसी प्रकार शत्रुघ्न भरतका अनुसरण करनेवाले हैं ॥ २ ९ ॥

श्रूयते हि द्रुमः कश्चिच्छेत्तव्यो वनजीवनैः ।

संनिकर्षादिषीकाभिर्मोचितः परमाद् भयात् ॥ ३० ॥

' सुना जाता है, जंगलकी लकड़ी बेचकर जीविका चलानेवाले कुछ लोगोंने किसी वृक्षको काटनेका निश्चय किया, परंतु वह वृक्ष कँटीली झाड़ियोंसे घिरा हुआ था; इसलिये वे उसे काट नहीं सके । इस प्रकार उन कँटीली झाड़ियोंने निकट रहनेके कारण उस वृक्षको महान् भयसे बचा लिया ॥३० ॥

गोप्ता हि रामं सौमित्रिर्लक्ष्मणं चापि राघवः ।

अश्विनोरिव सौभ्रात्रं तयोर्लोकेषु विश्रुतम् ॥ ३१ ॥

' सुमित्राकुमार लक्ष्मण श्रीरामकी रक्षा करते हैं और श्रीराम उनकी । उन दोनोंका उत्तम भ्रातृ - प्रेम दोनों अश्विनीकुमारोंकी भाँति तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है ॥ ३१ ॥

तस्मान्न लक्ष्मणे रामः पापं किंचित् करिष्यति ।

रामस्तु भरते पापं कुर्यादेव न संशयः ॥ ३२ ॥

' इसलिये श्रीराम लक्ष्मणका तो किञ्चित् भी अनिष्ट नहीं करेंगे, परंतु भरतका अनिष्ट किये बिना वे रह नहीं सकते; इसमें संशय नहीं है ॥३२ ॥

तस्माद् राजगृहादेव वनं गच्छतु राघवः ।

एतद्धि रोचते मह्यं भृशं चापि हितं तव ॥ ३३ ॥

' अतः श्रीरामचन्द्र महाराजके महलसे ही सीधे वनको चले जायँ - मुझे तो यही अच्छा जान पड़ता है और इसीमें तुम्हारा परम हित है ॥३३ ॥

पृष्ठ 258

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 258 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

एवं ते ज्ञातिपक्षस्य श्रेयश्चैव भविष्यति ।

यदि चेद् भरतो धर्मात् पित्र्यं राज्यमवाप्स्यति ॥ ३४ ॥

' यदि भरत धर्मानुसार अपने पिताका राज्य प्राप्त कर लेंगे तो तुम्हारा और तुम्हारे पक्षके अन्य सब लोगोंका भी कल्याण होगा ॥ ३४ ॥

स ते सुखोचितो बालो रामस्य सहजो रिपुः ।

समृद्धार्थस्य नष्टार्थो जीविष्यति कथं वशे ॥ ३५ ॥

' सौतेला भाई होनेके कारण जो श्रीरामका सहज शत्रु है, वह सुख भोगनेके योग्य तुम्हारा बालक भरत राज्य और धनसे वञ्चित हो राज्य पाकर समृद्धिशाली बने हुए श्रीरामके वशमें पड़कर कैसे जीवित रहेगा ॥ ३५ ॥

अभिद्भुतमिवारण्ये सिंहेन गजयूथपम् ।

प्रच्छाद्यमानं रामेण भरतं त्रातुमर्हसि ॥ ३६ ॥

' जैसे वनमें सिंह हाथियोंके यूथपतिपर आक्रमण करता है और वह भागा फिरता है, उसी प्रकार राजा राम भरतका तिरस्कार करेंगे; अतः उस तिरस्कारसे तुम भरतकी रक्षा करो ॥ ३६ ॥

दर्पान्निराकृता पूर्वं त्वया सौभाग्यवत्तया ।

राममाता सपत्नी ते कथं वैरं न यापयेत् ॥ ३७ ॥

' तुमने पहले पतिका अत्यन्त प्रेम प्राप्त होनेके कारण घमंडमें आकर जिनका अनादर किया था, वे ही तुम्हारी सौत श्रीराममाता कौसल्या पुत्रकी राज्यप्राप्तिसे परम सौभाग्यशालिनी हो उठी हैं; अब वे तुमसे अपने वैरका बदला क्यों नहीं लेंगी ॥ ३७ ॥

यदा च रामः पृथिवीमवाप्स्यते प्रभूतरत्नाकरशैलसंयुताम् 1 तदा गमिष्यस्यशुभं पराभवं सहैव दीना भरतेन भामिनि ॥ ३८ ॥

' भामिनि! जब श्रीराम अनेक समुद्रों और पर्वतोंसे युक्त समस्त भूमण्डलका राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब तुम अपने पुत्र भरतके साथ ही दीन - हीन होकर अशुभ पराभवका पात्र बन जाओगी ॥ ३८ ॥

यदा हि रामः पृथिवीमवाप्स्यते ध्रुवं प्रणष्टो भरतो भविष्यति । अतो हि संचिन्तय राज्यमात्मजे परस्य चैवास्य विवासकारणम् ॥ ३ ९ ॥ ' याद रखो, जब श्रीराम इस पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त कर लेंगे, तब निश्चय ही तुम्हारे पुत्र भरत नष्टप्राय हो जायँगे । अतः ऐसा कोई उपाय सोचो, जिससे तुम्हारे पुत्रको । तो राज्य मिले और शत्रुभूत श्रीरामका वनवास हो जाय ' ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ॥

नवमः सर्गः कुब्जाके कुचक्रसे कैकेयीका कोपभवनमें प्रवेश

एवमुक्ता तु कैकेयी क्रोधेन ज्वलितानना ।

दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य मन्थरामिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

मन्थराके ऐसा कहनेपर कैकेयीका मुख क्रोधसे तमतमा उठा । वह लंबी और गरम साँस खींचकर उससे इस प्रकार बोली- ॥१ ॥

अद्य राममितः क्षिप्रं वनं प्रस्थापयाम्यहम् ।

यौवराज्येन भरतं क्षिप्रमद्याभिषेचये ॥ २ ॥

' कुब्जे! मैं श्रीरामको शीघ्र ही यहाँसे वनमें भेजूँगी और तुरंत ही युवराजके पदपर भरतका अभिषेक कराऊँगी ॥ २ ॥

इदं त्विदानीं सम्पश्य केनोपायेन साधये ।

भरतः प्राप्नुयाद् राज्यं न तु रामः कथंचन ॥ ३ ॥

' परंतु इस समय यह तो सोचो कि किस उपायसे

अपना अभीष्ट साधन करूँ? भरतको राज्य प्राप्त हो ।

जाय और श्रीराम उसे किसी तरह भी न पा सकें-यह काम कैसे बने? ' ॥ ३ ॥

एवमुक्ता तु सा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी ।

रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥४ ॥

देवी कैकेयीके ऐसा कहनेपर पापका मार्ग दिखानेवाली मन्थरा श्रीरामके स्वार्थपर कुठाराघात करती हुई वहाँ कैकेयीसे इस प्रकार बोली- ॥ ४ ॥

हन्तेदानीं प्रपश्य त्वं कैकेयि श्रूयतां वचः ।

यथा ते भरतो राज्यं पुत्रः प्राप्स्यति केवलम् ॥ ५ ॥

' केकयनन्दिनि! अच्छा, अब देखो कि मैं क्या करती हूँ? तुम मेरी बात सुनो, जिससे केवल तुम्हारे पुत्र भरत ही राज्य प्राप्त करेंगे ( श्रीराम नहीं ) ॥ ५ ॥

किं न स्मरसि कैकेयि स्मरन्ती वा निगूहसे ।

यदुच्यमानमात्मार्थं मत्तस्त्वं श्रोतुमिच्छसि ॥ ६ ॥

पृष्ठ 259

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 259 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे नवमः सर्गः २४७ ' कैकेयि! क्या तुम्हें स्मरण नहीं है? या स्मरण । होनेपर भी मुझसे छिपा रही हो? जिसकी तुम मुझसे अनेक बार चर्चा करती रहती हो, अपने उसी प्रयोजनको तुम मुझसे सुनना चाहती हो? इसका क्या कारण है? ॥

मयोच्यमानं यदि ते श्रोतुं छन्दो विलासिनि ।

श्रूयतामभिधास्यामि श्रुत्वा चैतद् विधीयताम् ॥ ७ ॥

‘ विलासिनि! यदि मेरे ही मुँहसे सुननेके लिये तुम्हारा आग्रह है तो बताती हूँ, सुनो और सुनकर इसीके अनुसार कार्य करो ' ॥७ ॥

श्रुत्वैवं वचनं तस्या मन्थरायास्तु कैकयी ।

किंचिदुत्थाय शयनात् स्वास्तीर्णादिदमब्रवीत् ॥ ८ ॥

मन्थराका यह वचन सुनकर कैकेयी अच्छी तरहसे बिछे हुए उस पलंगसे कुछ उठकर उससे यों बोली - ॥ ८ ॥

कथयस्व ममोपायं केनोपायेन मन्थरे ।

भरतः प्राप्नुयाद् राज्यं न तु रामः कथंचन ॥ ९ ॥

मन्थरे! मुझसे वह उपाय बताओ । किस उपायसे भरतको तो राज्य मिल जायगा, किंतु श्रीराम उसे किसी तरह नहीं पा सकेंगे ' ॥ ९ ॥

एवमुक्ता तदा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी ।

रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ १० ॥

देवी कैकेयीके ऐसा कहनेपर पापका मार्ग दिखानेवाली मन्थरा श्रीरामके स्वार्थपर कुठाराघात करती हुई उस समय कैकेयीसे इस प्रकार बोली- ॥ १० ॥

पुरा देवासुरे युद्धे सह राजर्षिभिः पतिः ।

अगच्छत् त्वामुपादाय देवराजस्य साह्यकृत् ॥ ११ ॥

' देवि! पूर्वकालकी बात है कि देवासुर संग्रामके अवसरपर राजर्षियोंके साथ तुम्हारे पतिदेव तुम्हें साथ लेकर देवराजकी सहायता करनेके लिये गये थे ॥ ११ ॥ ।

दिशमास्थाय कैकेयि दक्षिणां दण्डकान् प्रति ।

वैजयन्तमिति ख्यातं पुरं यत्र तिमिध्वजः ॥ १२ ॥

स शम्बर इति ख्यातः शतमायो महासुरः ।

ददौ शक्रस्य संग्रामं देवसङ्घैरनिर्जितः ॥ १३ ॥

‘ केकयराजकुमारी! दक्षिण दिशामें दण्डकारण्यके भीतर वैजयन्त नामसे विख्यात एक नगर है, जहाँ शम्बर नामसे प्रसिद्ध एक महान् असुर रहता था । वह अपनी ध्वजामें तिमि ( ह्वेल मछली ) का चिह्न धारण करता था और सैकड़ों मायाओंका जानकार था । देवताओंके समूह भी उसे पराजित नहीं कर पाते थे । एक बार उसने इन्द्रके साथ युद्ध छेड़ दिया॥१२-१३ ॥

तस्मिन् महति संग्रामे पुरुषान् क्षतविक्षतान् ।

रात्रौ प्रसुप्तान् घ्नन्ति स्म तरसापास्य राक्षसाः ॥ १४ ॥

' उस महान् संग्राममें क्षत - विक्षत हुए पुरुष जब रातमें थककर सो जाते, उस समय राक्षस उन्हें उनके बिस्तरसे खींच ले जाते और मार डालते थे ॥ १४ ॥

तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा ।

असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः ॥ १५ ॥

' उन दिनों महाबाहु राजा दशरथने भी वहाँ असुरोंके साथ बड़ा भारी युद्ध किया । उस युद्धमें असुरोंने अपने अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा उनके शरीरको जर्जर कर दिया ॥ १५ ॥

अपवाह्य त्वया देवि संग्रामान्नष्टचेतनः ।

तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया ॥ १६ ॥

' देवि! जब राजाकी चेतना लुप्त सी हो गयी, उस समय सारथिका काम करती हुई तुमने अपने पतिको रणभूमिसे दूर हटाकर उनकी रक्षा की । जब वहाँ भी राक्षसोंके शस्त्रोंसे वे घायल हो गये, तब तुमने पुनः वहाँसे अन्यत्र ले जाकर उनकी रक्षा की ॥१६ ॥

तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने ।

स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदेच्छेयं तदा वरम् ॥ १७ ॥

गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना ।

अनभिज्ञा ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा ॥ १८ ॥

' शुभदर्शने! इससे संतुष्ट होकर महाराजने तुम्हें दो वरदान देनेको कहा- देवि! उस समय तुमने अपने पतिसे कहा — ' प्राणनाथ! जब मेरी इच्छा होगी, तब मैं इन वरोंको माँग लूँगी । ' उस समय उन महात्मा नरेशने ' तथास्तु ' कहकर तुम्हारी बात मान ली थी । देवि! मैं इस कथाको नहीं जानती थी । पूर्वकालमें तुम्हींने मुझसे यह वृत्तान्त कहा था ॥ १७-१८ ॥

कथैषा तव तु स्नेहान्मनसा धार्यते मया ।

रामाभिषेकसम्भारान्निगृह्य विनिवर्तय ॥ १ ९ ॥

' तबसे तुम्हारे स्नेहवश मैं इस बातको मन - ही-मन सदा याद रखती आयी हूँ । तुम इन वरोंके प्रभावसे स्वामीको वशमें करके श्रीरामके अभिषेकके आयोजनको पलट दो ॥ १ ९ ॥

तौ च याचस्व भर्तारं भरतस्याभिषेचनम् ।

प्रव्राजनं च रामस्य वर्षाणि च चतुर्दश ॥ २० ॥

' तुम उन दोनों वरोंको अपने स्वामीसे माँगो । एक वरके द्वारा भरतका राज्याभिषेक और दूसरेके द्वारा श्रीरामका चौदह वर्षतकका वनवास माँग लो ॥ २० ॥

पृष्ठ 260

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 260 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम् ।

प्रजाभावगतस्नेहः स्थिरः पुत्रो भविष्यति ॥ २१ ॥

' जब श्रीराम चौदह वर्षोंके लिये वनमें चले जायँगे । ' तब उतने समयमें तुम्हारे पुत्र भरत समस्त प्रजाके हृदयमें अपने लिये स्नेह पैदा कर लेंगे और इस राज्यपर स्थिर हो जायँगे ॥२१ ॥

क्रोधागारं प्रविश्याद्य क्रुद्धेवाश्वपतेः सुते ।

शेष्वानन्तर्हितायां त्वं भूमौ मलिनवासिनी ॥ २२ ॥

‘ अश्वपतिकुमारी! तुम इस समय मैले वस्त्र पहन लो और कोपभवनमें प्रवेश करके कुपित - सी होकर बिना बिस्तरके ही भूमिपर लेट जाओ ॥ २२ ॥

मा स्मैनं प्रत्युदीक्षेथा मा चैनमभिभाषथाः ।

रुदन्ती पार्थिवं दृष्ट्वा जगत्यां शोकलालसा ॥ २३ ॥

' राजा आवें तो उनकी ओर आँखें उठाकर न देखो और न उनसे कोई बात ही करो । महाराजको देखते ही रोती हुई शोकमग्न हो धरतीपर लोटने लगो ॥ २३ ॥

दयिता त्वं सदा भर्तुरत्र मे नास्ति संशयः ।

त्वत्कृते च महाराजो विशेदपि हुताशनम् ॥ २४ ॥

' इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि तुम अपने पतिको सदा ही बड़ी प्यारी रही हो । तुम्हारे लिये महाराज आगमें भी प्रवेश कर सकते हैं ॥ २४ ॥

न त्वां क्रोधयितुं शक्तो न क्रुद्धां प्रत्युदीक्षितुम् ।

तव प्रियार्थं राजा तु प्राणानपि परित्यजेत् ॥ २५ ॥

' वे न तो तुम्हें कुपित कर सकते हैं और न कुपित अवस्थामें तुम्हें देख ही सकते हैं । राजा दशरथ तुम्हारा प्रिय करनेके लिये अपने प्राणोंका भी त्याग कर सकते हैं ॥ २५ ॥

न ह्यतिक्रमितुं शक्तस्तव वाक्यं महीपतिः ।

मन्दस्वभावे बुध्यस्व सौभाग्यबलमात्मनः ॥ २६ ॥

' महाराज तुम्हारी बात किसी तरह टाल नहीं सकते । मुग्धे! तुम अपने सौभाग्यके बलका स्मरण करो ॥ २६ ॥

मणिमुक्तासुवर्णानि रत्नानि विविधानि च ।

दद्याद् दशरथो राजा मा स्म तेषु मनः कृथाः ॥ २७ ॥

' राजा दशरथ तुम्हें भुलावेमें डालनेके लिये मणि, मोती, सुवर्ण तथा भाँति - भाँतिके रत्न देनेकी चेष्टा करेंगे; किंतु तुम उनकी ओर मन न चलाना ॥ २७ ॥

यौ तौ देवासुरे युद्धे वरौ दशरथो ददौ ।

तौ स्मारय महाभागे सोऽर्थो न त्वा क्रमेदति ॥ २८ ॥

' महाभागे! देवासुर - संग्रामके अवसरपर राजा दशरथने वे जो दो वर दिये थे, उनका उन्हें स्मरण दिलाना । वरदानके रूपमें माँगा गया वह तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ सिद्ध हुए बिना नहीं रह सकता ॥ २८ ॥

यदा तु ते वरं दद्यात् स्वयमुत्थाप्य राघवः ।

व्यवस्थाप्य महाराजं त्वमिमं वृणुया वरम् ॥ २ ९ ॥

' रघुकुलनन्दन राजा दशरथ जब स्वयं तुम्हें धरतीसे उठाकर वर देनेको उद्यत हो जायँ, तब उन महाराजको सत्यकी शपथ दिलाकर खूब पक्का करके उनसे वर माँगना ॥ २ ९ ॥

रामप्रव्रजनं दूरं नव वर्षाणि पञ्च च ।

भरतः क्रियतां राजा पृथिव्यां पार्थिवर्षभ ॥ ३० ॥

' वर माँगते समय कहना कि नृपश्रेष्ठ! आप श्रीरामको चौदह वर्षोंके लिये बहुत दूर वनमें भेज दीजिये और भरतको भूमण्डलका राजा बनाइये ॥ ३० ॥

चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम् ।

रूढश्च कृतमूलश्च शेषं स्थास्यति ते सुतः ॥ ३१ ॥

' श्रीरामके चौदह वर्षोंके लिये वनमें चले जानेपर तुम्हारे पुत्र भरतका राज्य सुदृढ़ हो जायगा और प्रजा आदिको वशमें कर लेनेसे यहाँ उनकी जड़ जम जायगी । फिर चौदह वर्षोंके बाद भी वे आजीवन स्थिर बने रहेंगे ॥ ३१ ॥

रामप्रव्राजनं चैव देवि याचस्व तं वरम् ।

एवं सेत्स्यन्ति पुत्रस्य सर्वार्थास्तव कामिनि ॥ ३२ ॥

' देवि! तुम राजासे श्रीरामके वनवासका वर अवश्य माँगो । पुत्रके लिये राज्यकी कामना करनेवाली कैकेयि! ऐसा करनेसे तुम्हारे पुत्रके सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे ॥३२ ॥

एवं प्रव्राजितश्चैव रामोऽरामो भविष्यति ।

भरतश्च गतामित्रस्तव राजा भविष्यति ॥ ३३ ॥

' इस प्रकार वनवास मिल जानेपर ये राम राम नहीं रह जायँगे ( इनका आज जो प्रभाव है वह भविष्यमें नहीं रह सकेगा ) और तुम्हारे भरत भी शत्रुहीन राजा होंगे ॥

येन कालेन रामश्च वनात् प्रत्यागमिष्यति ।

अन्तर्बहिश्च पुत्रस्ते कृतमूलो भविष्यति ॥ ३४ ॥

' जिस समय श्रीराम वनसे लौटेंगे, उस समयतक तुम्हारे पुत्र भरत भीतर और बाहरसे भी दृढमूल हो जायँगे ॥

संगृहीतमनुष्यश्च सुहृद्भिः साकमात्मवान् ।

प्राप्तकालं नु मन्येऽहं राजानं वीतसाध्वसा ॥ ३५ ॥

रामाभिषेकसंकल्पान्निगृह्य विनिवर्तय ।