वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 271–280
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280
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अयोध्याकाण्डे
न स्मराम्यप्रियं वाक्यं लोकस्य प्रियवादिनः ।
स कथं त्वत्कृते रामं वक्ष्यामि प्रियमप्रियम् ॥ ३२ ॥
' श्रीराम सब लोगोंसे प्रिय बोलते हैं । उन्होंने कभी किसीको अप्रिय वचन कहा हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता । ऐसे सर्वप्रिय रामसे मैं तेरे लिये अप्रिय बात कैसे कहूँगा? ॥३२ ॥
क्षमा यस्मिंस्तपस्त्यागः सत्यं धर्मः कृतज्ञता ।
अप्यहिंसा च भूतानां तमृते का गतिर्मम ॥ ३३ ॥
' जिनमें क्षमा, तप, त्याग, सत्य, धर्म, कृतज्ञता और समस्त जीवोंके प्रति दया भरी हुई है, उन श्रीरामके बिना मेरी क्या गति होगी? ॥ ३३ ॥
मम वृद्धस्य कैकेयि दीनं लालप्यमानस्य ‘ कैकेयि! मैं बूढ़ा अवस्था शोचनीय हो सामने गिड़गिड़ा रहा हूँ । पृथिव्यां सागरान्तायां तत् सर्वं तव दास्यामि
गतान्तस्य तपस्विनः ।
कारुण्यं कर्तुमर्हसि ॥ ३४ ॥
हूँ । मौतके किनारे बैठा हूँ । मेरी रही है और मैं दीनभावसे तेरे तुझे मुझपर दया करनी चाहिये ॥
यत् किंचिदधिगम्यते ।
मा च त्वं मन्युमाविश ॥ ३५ ॥॥
' समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जो कुछ मिल सकता है, वह सब मैं तुझे दे दूँगा, परंतु तू ऐसे दुराग्रहमें न पड़, जो मुझे मौतके मुँहमें ढकेलनेवाला हो ॥ ३५ ॥
अञ्जलिं कुर्मि कैकेयि पादौ चापि स्पृशामि ते ।
शरणं भव रामस्य माधर्मो मामिह स्पृशेत् ॥ ३६ ॥
' केकयनन्दिनि! मैं हाथ जोड़ता हूँ और तेरे पैरों पड़ता हूँ । तू श्रीरामको शरण दे, जिससे यहाँ मुझे पाप न लगे ' ॥ ३६ ॥
इति दुःखाभिसंतप्तं विलपन्तमचेतनम् ।
घूर्णमानं महाराजं शोकेन समभिप्लुतम् ॥ ३७ ॥
पारं शोकार्णवस्याशु प्रार्थयन्तं पुनः पुनः ।
प्रत्युवाचाथ कैकेयी रौद्रा रौद्रतरं वचः ॥ ३८ ॥
महाराज दशरथ इस प्रकार दुःखसे संतप्त होकर विलाप कर रहे थे । उनकी चेतना बार - बार लुप्त हो जाती थी । उनके मस्तिष्कमें चक्कर आ रहा था और वे शोकमग्न हो उस शोकसागरसे शीघ्र पार होनेके लिये बारंबार अनुनय - विनय कर रहे थे, तो भी कैकेयीका हृदय नहीं पिघला । वह और भी भीषण रूप धारण करके अत्यन्त कठोर वाणीमें उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगी- ॥ ३७-३८ ॥
यदि दत्त्वा वरौ राजन् पुनः प्रत्यनुतप्यसे ।
धार्मिकत्वं कथं वीर पृथिव्यां कथयिष्यसि ॥ ३ ९ ॥
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_10_2_Front द्वादशः सर्गः २५ ९ ' राजन्! यदि दो वरदान देकर आप फिर उनके लिये पश्चात्ताप करते हैं तो वीर नरेश्वर! इस भूमण्डलमें आप अपनी धार्मिकताका ढिंढोरा कैसे पीट सकेंगे? ॥।
यदा समेता बहवस्त्वया राजर्षयः सह ।
कथयिष्यन्ति धर्मज्ञ तत्र किं प्रतिवक्ष्यसि ॥। ४० ॥
' धर्मके ज्ञाता महाराज! जब बहुत - से राजर्षि एकत्र होकर आपके साथ मुझे दिये हुए वरदानके विषयमें बातचीत करेंगे, उस समय वहाँ आप उन्हें क्या उत्तर देंगे? ॥ ४० ॥
यस्याः प्रसादे जीवामि या च मामभ्यपालयत् ।
तस्याः कृता मया मिथ्या कैकेय्या इति वक्ष्यसि ॥ ४१ ॥
' यही कहेंगे न, कि जिसके प्रसादसे मैं जीवित हूँ, जिसने ( बहुत बड़े संकटसे ) मेरी रक्षा की, उसी कैकेयीको वर देनेके लिये की हुई प्रतिज्ञा मैंने झूठी कर दी ॥ ४१ ॥
किल्बिषं त्वं नरेन्द्राणां करिष्यसि नराधिप ।
यो दत्त्वा वरमद्यैव पुनरन्यानि भाषसे ॥ ४२ ॥
' महाराज! आज ही वरदान देकर यदि आप फिर उससे विपरीत बात कहेंगे तो अपने कुलके राजाओंके माथे कलंकका टीका लगायेंगे ॥ ४२ ॥
शैब्यः श्येनकपोतीये स्वमांसं पक्षिणे ददौ ।
अलर्कश्चक्षुषी दत्त्वा जगाम गतिमुत्तमाम् ॥ ४३ ॥
' राजा शैब्यने बाज और कबूतरके झगड़ेमें ( कबूतर प्राण बचानेकी प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये ) बाज नामक पक्षीको अपने शरीरका मांस काटकर दे दिया था । इसी तरह राजा अलर्कने ( एक अंधे ब्राह्मणको ) अपने दोनों नेत्रोंका दान करके परम उत्तम गति प्राप्त की थी ॥ ४३ ॥
सागरः समयं कृत्वा न वेलामतिवर्तते ।
समयं मानृतं कार्षीः पूर्ववृत्तमनुस्मरन् ॥ ४४ ॥
' समुद्रने ( देवताओंके समक्ष ) अपनी नियत सीमाको न लाँघनेकी प्रतिज्ञा की थी, सो अबतक वह उसका उल्लङ्घन नहीं करता है । आप भी पूर्ववर्ती महापुरुषोंके बर्तावको सदा ध्यानमें रखकर अपनी प्रतिज्ञा झूठी न करें ॥४४ ॥
स त्वं धर्मं परित्यज्य रामं राज्येऽभिषिच्य च ।
सह कौसल्यया नित्यं रन्तुमिच्छसि दुर्मते ॥ ४५ ॥
' ( परंतु आप मेरी बात क्यों सुनेंगे? ) दुर्बुद्धि नरेश! आप तो धर्मको तिलाञ्जलि देकर श्रीरामको राज्यपर अभिषिक्त करके रानी कौसल्याके साथ सदा । मौज उड़ाना चाहते हैं ॥ ४५ ॥
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२६० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
भवत्वधर्मो धर्मो वा सत्यं वा यदि वानृतम् ।
यत्त्वया संश्रुतं मह्यं तस्य नास्ति व्यतिक्रमः ॥ ४६ ॥
' अब धर्म हो या अधर्म, झूठ हो या सच, जिस बातके लिये आपने मुझसे प्रतिज्ञा कर ली है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता ॥ ४६ ॥
अहं हि विषमद्यैव पीत्वा बहु तवाग्रतः ।
पश्यतस्ते मरिष्यामि रामो यद्यभिषिच्यते ॥ ४७ ॥
' यदि श्रीरामका राज्याभिषेक होगा तो मैं आपके सामने आपके देखते - देखते आज ही बहुत - सा विष पीकर मर जाऊँगी ॥ ४७ ॥
एकाहमपि पश्येयं यद्यहं राममातरम् ।
अञ्जलिं प्रतिगृह्णन्तीं श्रेयो ननु मृतिर्मम ॥ ४८ ॥
' यदि मैं एक दिन भी राममाता कौसल्याको राजमाता होनेके नाते दूसरे लोगोंसे अपनेको हाथ जोड़वाती देख लूँगी तो उस समय मैं अपने लिये मर जाना ही अच्छा समझँगी ॥ ४८ ॥
भरतेनात्मना चाहं शपे ते मनुजाधिप ।
यथा नान्येन तुष्येयमृते रामविवासनात् ॥ ४ ९ ॥
' नरेश्वर! मैं आपके सामने अपनी और भरतकी शपथ खाकर कहती हूँ कि श्रीरामको इस देशसे निकाल देनेके सिवा दूसरे किसी वरसे मुझे संतोष नहीं होगा ' ॥
एतावदुक्त्वा वचनं कैकेयी विरराम ह ।
विलपन्तं च राजानं न प्रतिव्याजहार सा ॥ ५० ॥
इतना कहकर कैकेयी चुप हो गयी । राजा बहुत रोये - गिड़गिड़ाये; किंतु उसने उनकी किसी बातका जवाब नहीं दिया ॥ ५० ॥
श्रुत्वा तु राजा कैकेय्या वाक्यं परमशोभनम् ।
रामस्य च वने वासमैश्वर्यं भरतस्य च ॥ ५१ ॥
नाभ्यभाषत कैकेयीं मुहूर्तं व्याकुलेन्द्रियः ।
प्रेक्षतानिमिषो देवीं प्रियामप्रियवादिनीम् ॥ ५२ ॥
' श्रीरामका वनवास हो और भरतका राज्याभिषेक ' कैकेयीके मुखसे यह परम अमङ्गलकारी वचन सुनकर राजाकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं । वे एक मुहूर्ततक कैकेयीसे कुछ न बोले । उस अप्रिय वचन बोलनेवाली प्यारी रानीकी ओर केवल एकटक दृष्टिसे देखते रहे ॥
तां हि वज्रसमां वाचमाकर्ण्य हृदयाप्रियाम् ।
दुःखशोकमयीं श्रुत्वा राजा न सुखितोऽभवत् ॥ ५३ ॥
मनको अप्रिय लगनेवाली कैकेयीकी वह वज्रके समान कठोर तथा दुःख - शोकमयी वाणी सुनकर राजाको बड़ा दुःख हुआ । उनकी सुख - शान्ति छिन गयी ।
स देव्या व्यवसायं च घोरं च शपथं कृतम् ।
ध्यात्वा रामेति निःश्वस्य च्छिन्नस्तरुरिवापतत् ॥५४ ॥
देवी कैकेयीके उस घोर निश्चय और किये हुए शपथकी ओर ध्यान जाते ही वे ' हा राम! ' कहकर लंबी साँस खींचते हुए कटे वृक्षकी भाँति गिर पड़े ॥ ५४ ॥
नष्टचित्तो यथोन्मत्तो विपरीतो यथातुरः ।
हृततेजा यथा सर्पो बभूव जगतीपतिः ॥ ५५ ॥
उनकी चेतना लुप्त - सी हो गयी । वे उन्मादग्रस्त-से प्रतीत होने लगे । उनकी प्रकृति विपरीत - सी हो गयी । वे रोगी - से जान पड़ते थे । इस प्रकार भूपाल दशरथ मन्त्रसे जिसका तेज हर लिया गया हो उस सर्पके समान निश्चेष्ट हो गये ॥ ५५ ॥
दीनयाऽऽतुरया वाचा इति होवाच कैकयीम् ।
अनर्थमिममर्थाभं केन त्वमुपदेशिता ॥ ५६ ॥
तदनन्तर उन्होंने दीन और आतुर वाणीमें कैकेयीसे इस प्रकार कहा — ' अरी! तुझे अनर्थ ही अर्थ -सा प्रतीत हो रहा है, किसने तुझे इसका उपदेश दिया है? ॥ ५६ ॥
भूतोपहतचित्तेव ब्रुवन्ती मां न लज्जसे ।
शीलव्यसनमेतत् ते नाभिजानाम्यहं पुरा ॥५७ ॥
' जान पड़ता है, तेरा चित्त किसी भूतके आवेशसे दूषित हो गया है । पिशाचग्रस्त नारीकी भाँति मेरे सामने ऐसी बातें कहती हुई तू लज्जित क्यों नहीं होती? मुझे पहले इस बातका पता नहीं था कि तेरा यह कुलाङ्गनोचित शील इस तरह नष्ट हो गया है ॥ ५७ ॥
बालायास्तत् त्विदानीं ते लक्षये विपरीतवत् ।
कुतो वा ते भयं जातं या त्वमेवंविधं वरम् ॥ ५८ ॥
राष्ट्रे भरतमासीनं वृणीषे राघवं वने ।
विरमैतेन भावेन त्वमेतेनानृतेन च ॥५ ९ ॥
' बालावस्थामें जो तेरा शील था, उसे इस समय मैं विपरीत - सा देख रहा हूँ । तुझे किस बातका भय हो गया है जो इस तरहका वर माँगती है? भरत राज्य-सिंहासनपर बैठें और श्रीराम वनमें रहें — यही तू माँग रही है । यह बड़ा असत्य तथा ओछा विचार है । तू अब भी इससे विरत हो जा ॥ ५८-५९ ॥
यदि भर्तुः प्रियं कार्यं लोकस्य भरतस्य च ।
नृशंसे पापसंकल्पे क्षुद्रे दुष्कृतकारिणि ॥ ६० ॥
' क्रूर स्वभाव और पापपूर्ण विचारवाली नीच दुराचारिणि! यदि अपने पतिका, सारे जगत्का और भरतका भी प्रिय करना चाहती है तो इस दूषित संकल्पको त्याग दे ॥ ६० ॥
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अयोध्याकाण्डे
किं नु दुःखमलीकं वा मयि रामे च पश्यसि ।
न कथंचिदृते रामाद् भरतो राज्यमावसेत् ॥ ६१ ॥
' तू मुझमें या श्रीराममें कौन - सा दुःखदायक या अप्रिय बर्ताव देख रही है ( कि ऐसा नीच कर्म करनेपर उतारू हो गयी है ); श्रीरामके बिना भरत किसी तरह राज्य लेना स्वीकार नहीं करेंगे ॥ ६१ ॥
रामादपि हि तं मन्ये धर्मतो बलवत्तरम् ।
कथं द्रक्ष्यामि रामस्य वनं गच्छेति भाषिते ॥ ६२ ॥
मुखवर्णं विवर्णं तु यथैवेन्दुमुपप्लुतम् । ' क्योंकि मेरी समझमें धर्मपालनकी दृष्टिसे भरत श्रीरामसे भी बढ़े - चढ़े हैं । श्रीरामसे यह कह देनेपर कि तुम वनको जाओ; जब उनके मुखकी कान्ति राहुग्रस्त चन्द्रमाकी भाँति फीकी पड़ जायगी, उस समय मैं कैसे उनके उस उदास मुखकी ओर देख सकूँगा? ॥ ६२३ ॥
तां तु मे सुकृतां बुद्धिं सुहृद्भिः सह निश्चिताम् ॥ ६३ ॥
कथं द्रक्ष्याम्यपावृत्तां परैरिव हतां चमूम् । ' मैंने श्रीरामके अभिषेकका निश्चय सुहृदोंके साथ विचार करके किया है, मेरी यह बुद्धि शुभ कर्ममें प्रवृत्त हुई है; अब मैं इसे शत्रुओंद्वारा पराजित हुई सेनाकी भाँति पलटी हुई कैसे देखूँगा? ॥ ६३३ ॥
किं मां वक्ष्यन्ति राजानो नानादिग्भ्यः समागताः ॥ ६४ ॥
बालो बतायमैक्ष्वाकश्चिरं राज्यमकारयत् । ' नाना दिशाओंसे आये हुए राजालोग मुझे लक्ष्य करके खेदपूर्वक कहेंगे कि इस मूढ इक्ष्वाकुवंशी राजाने कैसे दीर्घकालतक इस राज्यका पालन किया है? ॥ ६४३ ॥
यदा हि बहवो वृद्धा गुणवन्तो बहुश्रुताः ॥ ६५ ॥
परिप्रक्ष्यन्ति काकुत्स्थं वक्ष्यामीह कथं तदा ।
कैकेय्या क्लिश्यमानेन पुत्रः प्रव्राजितो मया ॥ ६६ ॥
' जब बहुत - से बहुश्रुत गुणवान् एवं वृद्ध पुरुष आकर मुझसे पूछेंगे कि श्रीराम कहाँ हैं? तब मैं उनसे कैसे यह कहूँगा कि कैकेयीके दबाव देनेपर मैंने अपने बेटेको घरसे निकाल दिया ॥ ६५-६६ ॥
यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति ।
किं मां वक्ष्यति कौसल्या राघवे वनमास्थिते ॥ ६७ ॥
किं चैनां प्रतिवक्ष्यामि कृत्वा विप्रियमीदृशम् । ‘ यदि कहूँ कि श्रीरामको वनवास देकर मैंने सत्यका पालन किया है तो इसके पहले जो उन्हें राज्य देनेकी बात कह चुका हूँ, वह असत्य हो जायगी । यदि राम वनको चले गये तो कौसल्या मुझे क्या कहेगी? द्वादशः सर्गः २६१ उसका ऐसा महान् अपकार करके मैं उसे क्या उत्तर दूँगा ॥ ६७३ ॥
यदा यदा च कौसल्या दासीव च सखीव च ॥ ६८ ॥
भार्यावद् भगिनीवच्च मातृवच्चोपतिष्ठति ।
सततं प्रियकामा मे प्रियपुत्रा प्रियंवदा ॥ ६ ९ ॥
न मया सत्कृता देवी सत्कारार्हा कृते तव । ' हाय! जिसका पुत्र मुझे सबसे अधिक प्रिय है, वह प्रिय वचन बोलनेवाली कौसल्या जब - जब दासी, सखी, पत्नी, बहिन और माताकी भाँति मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे मेरी सेवामें उपस्थित होती थी, तब-तब उस सत्कार पानेयोग्य देवीका भी मैंने तेरे ही कारण कभी सत्कार नहीं किया ॥ ६८-६९ ३ ॥ इदानीं तत्तपति मां यन्मया सुकृतं त्वयि ॥ ७० ॥
अपथ्यव्यञ्जनोपेतं भुक्तमन्नमिवातुरम् । ' तेरे साथ जो मैंने इतना अच्छा बर्ताव किया, वह याद आकर इस समय मुझे उसी प्रकार संताप दे रहा है, जैसे अपथ्य ( हानिकारक ) व्यञ्जनोंसे युक्त खाया हुआ अन्न किसी रोगीको कष्ट देता है ॥ ७०३ ॥
विप्रकारं च रामस्य सम्प्रयाणं वनस्य च ॥ ७१ ॥
सुमित्रा प्रेक्ष्य वै भीता कथं मे विश्वसिष्यति । ' श्रीरामके अभिषेकका निवारण और उनका वनकी ओर प्रस्थान देखकर निश्चय ही सुमित्रा भयभीत हो जायगी, फिर वह कैसे मेरा विश्वास करेगी? ॥ ७१३ ॥
कृपणं बत वैदेही श्रोष्यति द्वयमप्रियम् ॥ ७२ ॥
मां च पञ्चत्वमापन्नं रामं च वनमाश्रितम् । ' हाय! बेचारी सीताको एक ही साथ दो दुःखद एवं अप्रिय समाचार सुनने पड़ेंगे - श्रीरामका वनवास और मेरी मृत्यु ॥७२३ ॥
वैदेही बत मे प्राणान् शोचन्ती क्षपयिष्यति ॥ ७३ ॥
हीना हिमवतः पार्श्वे किंनरेणेव किंनरी । ' जब वह श्रीरामके लिये शोक करने लगेगी, उस समय मेरे प्राणोंका नाश कर डालेगी – उसका शोक देखकर मेरे प्राण इस शरीरमें नहीं रह सकेंगे । उसकी दशा हिमालयके पार्श्वभागमें अपने स्वामी किन्नरसे बिछुड़ी हुई किन्नरीके समान हो जायगी ॥ ७३३ ॥
नहि राममहं दृष्ट्वा प्रवसन्तं महावने ॥ ७४ ॥
चिरं जीवितुमाशंसे रुदन्तीं चापि मैथिलीम् ।
सा नूनं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि ॥ ७५ ॥
' मैं श्रीरामको विशाल वनमें निवास करते और मिथिलेशकुमारी सीताको रोती देख अधिक कालतक
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२६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
जीवित रहना नहीं चाहता । ऐसी दशामें तू निश्चय ही ।
विधवा होकर बेटेके साथ अयोध्याका राज्य करना ॥
सतीं त्वामहमत्यन्तं व्यवस्याम्यसतीं सतीम् ।
रूपिणीं विषसंयुक्तां पीत्वेव मदिरां नरः ॥ ७६ ॥
' ओह! मैं तुझे अत्यन्त सती - साध्वी समझता था, परंतु तू बड़ी दुष्टा निकली; ठीक उसी तरह जैसे कोई मनुष्य देखनेमें सुन्दर मदिराको पीकर पीछे उसके द्वारा किये गये विकारसे यह समझ पाता है कि इसमें विष मिला हुआ था ॥ ७६ ॥
अनृतैर्बत मां सान्त्वैः सान्त्वयन्ती स्म भाषसे ।
गीतशब्देन संरुध्य लुब्धो मृगमिवावधीः ॥ ७७ ॥
' अबतक जो तू सान्त्वनापूर्ण मीठे वचन बोलकर मुझे आश्वासन देती हुई बातें किया करती थी, वे तेरी कही हुई सारी बातें झूठी थीं । जैसे व्याध हरिणको मधुर संगीतसे आकृष्ट करके उसे मार डालता है, उसी प्रकार तू भी पहले मुझे लुभाकर अब मेरे प्राण ले रही है ॥
अनार्य इति मामार्याः पुत्रविक्रायकं ध्रुवम् ।
विकरिष्यन्ति रथ्यासु सुरापं ब्राह्मणं यथा ॥ ७८ ॥
' श्रेष्ठ पुरुष निश्चय ही मुझे नीच और एक नारीके मोहमें पड़कर बेटेको बेच देनेवाला कहकर शराबी ब्राह्मणकी भाँति मेरी राह - बाट और गली - कूचोंमें निन्दा करेंगे ॥ ७८ ॥
अहो दुःखमहो कृच्छ्रं यत्र वाचः क्षमे तव ।
दुःखमेवंविधं प्राप्तं पुरा कृतमिवाशुभम् ॥ ७ ९ ॥
' अहो! कितना दुःख है! कितना कष्ट है!! जहाँ । मुझे तेरी ये बातें सहन करनी पड़ती हैं । मानो यह मेरे पूर्वजन्मके किये हुए पापका ही अशुभ फल है, जो मुझपर ऐसा महान् दुःख आ पड़ा ॥७ ९ ॥
चिरं खलु मया पापे त्वं पापेनाभिरक्षिता ।
अज्ञानादुपसम्पन्ना रज्जुरुद्बन्धनी यथा ॥ ८० ॥
' पापिनि! मुझ पापीने बहुत दिनोंसे तेरी रक्षा की और अज्ञानवश तुझे गले लगाया; किंतु तू आज मेरे गलेमें पड़ी हुई फाँसीकी रस्सी बन गयी ॥ ८० ॥
रममाणस्त्वया सार्धं मृत्युं त्वां नाभिलक्षये ।
बालो रहसि हस्तेन कृष्णसर्पमिवास्पृशम् ॥ ८१ ॥
' जैसे बालक एकान्तमें खेलता - खेलता काले नागको हाथमें पकड़ ले, उसी प्रकार मैंने एकान्तमें तेरे साथ क्रीड़ा करते हुए तेरा आलिङ्गन किया है; परंतु उस समय मुझे यह न सूझा कि तू ही एक दिन मेरी मृत्युका कारण बनेगी ॥ ८१ ॥
तं तु मां जीवलोकोऽयं नूनमाक्रोष्टुमर्हति ।
मया ह्यपितृकः पुत्रः स महात्मा दुरात्मना ॥ ८२ ॥
' हाय! मुझ दुरात्माने जीते - जी ही अपने महात्मा पुत्रको पितृहीन बना दिया । मुझे यह सारा संसार निश्चय ही धिक्कारेगा - गालियाँ देगा, जो उचित ही होगा ॥ ८२ ॥
बालिशो बत कामात्मा राजा दशरथो भृशम् ।
स्त्रीकृते यः प्रियं पुत्रं वनं प्रस्थापयिष्यति ॥ ८३ ॥
' लोग मेरी निन्दा करते हुए कहेंगे कि राजा दशरथ बड़ा ही मूर्ख और कामी है, जो एक स्त्रीको संतुष्ट करनेके लिये अपने प्यारे पुत्रको वनमें भेज रहा है ॥ ८३ ॥
वेदैश्च ब्रह्मचर्यैश्च गुरुभिश्चोपकर्शितः ।
भोगकाले महत्कृच्छ्रं पुनरेव प्रपत्स्यते ॥ ८४ ॥
' हाय! अबतक तो श्रीराम वेदोंका अध्ययन करने, ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करने तथा अनेकानेक गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहनेके कारण दुबले होते चले आये हैं । अब जब इनके लिये सुखभोगका समय आया है, तब ये वनमें जाकर महान् कष्टमें पड़ेंगे ॥ ८४ ॥
नालं द्वितीयं वचनं पुत्रो मां प्रतिभाषितुम् ।
स वनं प्रव्रजेत्युक्तो बाढमित्येव वक्ष्यति ॥ ८५ ॥
' अपने पुत्र श्रीरामसे यदि मैं कह दूँ कि तुम वनको चले जाओ तो वे तुरंत ' बहुत अच्छा ' कहकर मेरी आज्ञाको स्वीकार कर लेंगे । मेरे पुत्र राम दूसरी कोई बात कहकर मुझे प्रतिकूल उत्तर नहीं दे सकते ॥
यदि मे राघवः कुर्याद् वनं गच्छेति चोदितः ।
प्रतिकूलं प्रियं मे स्यान्न तु वत्सः करिष्यति ॥ ८६ ॥
' यदि मेरे वन जानेकी आज्ञा दे देनेपर भी श्रीरामचन्द्र उसके विपरीत करते - वनमें नहीं जाते तो वही मेरे लिये प्रिय कार्य होगा; किंतु मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता ॥ ८६ ॥
राघवे हि वनं प्राप्ते सर्वलोकस्य धिक्कृतम् ।
मृत्युरक्षमणीयं मां नयिष्यति यमक्षयम् ॥ ८७ ॥
' यदि रघुनन्दन राम वनको चले गये तो सब लोगोंके धिक्कारपात्र बने हुए मुझ अक्षम्य अपराधीको मृत्यु अवश्य यमलोकमें पहुँचा देगी ॥ ८७ ॥
मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे ।
इष्टे मम जने शेषे किं पापं प्रतिपत्स्यसे ॥ ८८ ॥
' यदि नरश्रेष्ठ श्रीरामके वनमें चले जानेपर मेरी मृत्यु हो गयी तो शेष जो मेरे प्रियजन ( कौसल्या आदि ) यहाँ रहेंगे, उनपर तू कौन - सा अत्याचार करेगी? ॥ ८८ ॥
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अयोध्याकाण्डे
कौसल्या मां च रामं च पुत्रौ च यदि हास्यति ।
दुःखान्यसहती देवी मामेवानुगमिष्यति ॥ ८ ९ ॥
' देवी कौसल्याको यदि मुझसे, श्रीरामसे तथा शेष दोनों पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्नसे विछोह हो जायगा तो वह इतने बड़े दुःखको सहन नहीं कर सकेगी; अतः मेरे ही पीछे वह भी परलोक सिधार जायगी । ( सुमित्राका भी यही हाल होगा ) ॥। ८ ९ ॥
कौसल्यां च सुमित्रां च मां च पुत्रैस्त्रिभिः सह ।
प्रक्षिप्य नरके सा त्वं कैकेयि सुखिता भव ॥ ९ ० ॥
‘ कैकेयि! इस प्रकार कौसल्याको, सुमित्राको और तीनों पुत्रोंके साथ मुझे भी नरक - तुल्य महान् शोकमें डालकर तू स्वयं सुखी होना ॥ ९ ० ॥
मया रामेण च त्यक्तं शाश्वतं सत्कृतं गुणैः ।
इक्ष्वाकुकुलमक्षोभ्यमाकुलं पालयिष्यसि ॥ ९ १ ॥
' अनेकानेक गुणोंसे सत्कृत, शाश्वत तथा क्षोभरहित यह इक्ष्वाकुकुल जब मुझसे और श्रीरामसे परित्यक्त होकर शोकसे व्याकुल हो जायगा, तब उस अवस्थामें तू इसका पालन करेगी ॥ ९ १ ॥
प्रियं चेद् भरतस्यैतद् रामप्रव्राजनं भवेत् ।
मा स्म मे भरतः कार्षीत् प्रेतकृत्यं गतायुषः ॥ ९ २ ॥
' यदि भरतको भी श्रीरामका यह वनमें भेजा जाना प्रिय लगता हो तो मेरी मृत्युके बाद वे मेरे शरीरका दाहसंस्कार न करें ॥ ९ २ ॥
मृते मयि गते रामे वनं पुरुषपुङ्गवे ।
सेदानीं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि ॥ ९ ३ ॥
' पुरुषशिरोमणि श्रीरामके वन - गमनके पश्चात् मेरी मृत्यु हो जानेपर अब विधवा होकर तू बेटेके साथ अयोध्याका राज्य करेगी ॥ ९ ३ ॥ त्वं राजपुत्रि दैवेन न्यवसो मम वेश्मनि ।
अकीर्तिश्चातुला लोके ध्रुवः परिभवश्च मे ।
सर्वभूतेषु चावज्ञा यथा पापकृतस्तथा ॥ ९ ४ ॥
‘ राजकुमारी! तू मेरे दुर्भाग्यसे मेरे घरमें आकर बस गयी । तेरे कारण संसारमें पापाचारीकी भाँति मुझे निश्चय ही अनुपम अपयश, तिरस्कार और समस्त प्राणियोंसे अवहेलना प्राप्त होगी ॥ ९ ४ ॥
कथं रथैर्विभुर्यात्वा गजाश्वैश्च मुहुर्मुहुः ।
पद्भ्यां रामो महारण्ये वत्सो मे विचरिष्यति ॥ ९ ५ ॥
' मेरे पुत्र सामर्थ्यशाली राम बारंबार रथों, हाथियों और घोड़ोंसे यात्रा किया करते थे । वे ही अब उस विशाल वनमें पैदल कैसे चलेंगे? ॥९ ५ ॥ द्वादशः सर्गः २६३
यस्य चाहारसमये सूदाः कुण्डलधारिणः ।
अहंपूर्वाः पचन्ति स्म प्रसन्नाः पानभोजनम् ॥ ९ ६ ॥
स कथं नु कषायाणि तिक्तानि कटुकानि च ।
भक्षयन् वन्यमाहारं सुतो मे वर्तयिष्यति ॥ ९ ७ ॥
' भोजनके समय जिनके लिये कुण्डलधारी रसोइये प्रसन्न होकर ' पहले मैं बनाऊँगा ' ऐसा कहते हुए खाने-पीनेकी वस्तुएँ तैयार करते थे, वे ही मेरे पुत्र रामचन्द्र वनमें कसैले, तिक्त और कड़वे फलोंका आहार करते हुए किस तरह निर्वाह करेंगे ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥
महार्हवस्त्रसम्बद्धो भूत्वा चिरसुखोचितः ।
काषायपरिधानस्तु कथं रामो भविष्यति ॥ ९ ८ ॥
' जो सदा बहुमूल्य वस्त्र पहना करते थे और जिनका चिरकालसे सुखमें ही समय बीता है, वे ही श्रीराम वनमें गेरुए वस्त्र पहनकर कैसे रह सकेंगे? ॥ ९ ८ ॥
कस्येदं दारुणं वाक्यमेवंविधमपीरितम् ।
रामस्यारण्यगमनं भरतस्याभिषेचनम् ॥ ९९ ॥
' श्रीरामका वनगमन और भरतका अभिषेक-ऐसा कठोर वाक्य तूने किसकी प्रेरणासे अपने मुँहसे निकाला है ॥ ९९ ॥
धिगस्तु योषितो नाम शठाः स्वार्थपरायणाः ।
न ब्रवीमि स्त्रियः सर्वा भरतस्यैव मातरम् ॥ १०० ॥
' स्त्रियोंको धिक्कार है; क्योंकि वे शठ और स्वार्थपरायण होती हैं; परंतु मैं सारी स्त्रियोंके लिये ऐसा नहीं कह सकता, केवल भरतकी माताकी ही निन्दा करता हूँ ॥ १०० ॥
अनर्थभावेऽर्थपरे नृशंसे ममानुतापाय निवेशितासि । किमप्रियं मन्निमित्तं हितानुकारिण्यथवापि रामे ॥ १०१ ॥
' अनर्थमें ही अर्थबुद्धि रखनेवाली क्रूर कैकेयि! तू मुझे संताप देनेके लिये ही इस घरमें बसायी गयी है । अरी! मेरे कारण तू अपना कौन - सा अप्रिय होता देख रही है? अथवा सबका निरन्तर हित करनेवाले श्रीराममें ही तुझे कौन - सी बुराई दिखायी देती है ॥ १०१ ॥
परित्यजेयुः पितरोऽपि पुत्रान् भार्याः पतींश्चापि कृतानुरागाः । कृत्स्नं हि सर्वं कुपितं जगत् स्याद् दृष्ट्वैव रामं व्यसने निमग्नम् ॥ १०२ ॥
' श्रीरामको संकटके समुद्रमें डूबा हुआ देखकर तो पिता अपने पुत्रोंको त्याग देंगे । अनुरागिणी स्त्रियाँ
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२६४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भी अपने पतियोंको त्याग देंगी । इस प्रकार यह सारा जगत् ही कुपित - विपरीत व्यवहार करनेवाला हो जायगा ॥ १०२ ॥
अहं पुनर्देवकुमाररूप-मलंकृतं तं सुतमाव्रजन्तम् । नन्दामि पश्यन्निव दर्शनेन भवामि दृष्ट्वैव पुनर्युवेव ॥ १०३ ॥
' देवकुमारके समान कमनीय रूपवाले अपने पुत्र श्रीरामको जब वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित होकर सामने आते देखता हूँ तो नेत्रोंसे उनकी शोभा निहारकर निहाल हो जाता हूँ । उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो मैं फिर जवान हो गया ॥ १०३ ॥
विना हि सूर्येण भवेत् प्रवृत्ति-रवर्षता वज्रधरेण वापि । रामं तु गच्छन्तमितः समीक्ष्य जीवेन्न कश्चित्त्विति चेतना मे ॥ १०४ ॥
' कदाचित् सूर्यके बिना भी संसारका काम चल जाय, वज्रधारी इन्द्रके वर्षा न करनेपर भी प्राणियोंका जीवन सुरक्षित रह जाय, परंतु रामको यहाँसे वनकी ओर जाते देखकर कोई भी जीवित नहीं रह सकता— मेरी ऐसी धारणा है ॥ १०४ ॥
विनाशकामामहिताममित्रा-मावासयं मृत्युमिवात्मनस्त्वाम् । चिरं बताङ्केन धृतासि सर्प महाविषा तेन हतोऽस्मि मोहात् ॥ १०५ ॥
' अरी! तू मेरा विनाश चाहनेवाली, अहित करनेवाली और शत्रुरूप है । जैसे कोई अपनी ही मृत्युको घरमें स्थान दे दे, उसी प्रकार मैंने तुझे घरमें बसा लिया है । खेदकी बात है कि मैंने मोहवश तुझ महाविषैली नागिनको चिरकालसे अपने अङ्कमें धारण कर रखा है; इसीलिये आज मैं मारा गया ॥ १०५ ॥
मया च रामेण सलक्ष्मणेन प्रशास्तु हीनो भरतस्त्वया सह । पुरं च राष्ट्रं च निहत्य बान्धवान् ममाहितानां च भवाभिहर्षिणी ॥ १०६ ॥
' मुझसे, श्रीराम और लक्ष्मणसे हीन होकर भरत समस्त बान्धवोंका विनाश करके तेरे साथ इस नगर तथा राष्ट्रका शासन करें तथा तू मेरे शत्रुओंका हर्ष बढ़ानेवाली हो ॥ नृशंसवृत्ते व्यसनप्रहारिणि प्रसह्य वाक्यं यदिहाद्य भाषसे । | न नाम ते तेन मुखात् पतन्त्यधो विशीर्यमाणा दशनाः सहस्रधा ॥ १०७ ॥
' क्रूरतापूर्ण बर्ताव करनेवाली कैकेयी! तू संकटमें पड़े हुएपर प्रहार कर रही है । अरी! जब तू दुराग्रहपूर्वक आज ऐसी कठोर बातें मुँहसे निकालती है, उस समय तेरे दाँतोंके हजारों टुकड़े होकर मुँहसे नीचे क्यों नहीं गिर जाते? ॥ १०७ ॥
न किंचिदाहाहितमप्रियं च न वेत्ति रामः परुषाणि भाषितुम् । कथं तु रामे ह्यभिरामवादिनि ब्रवीषि दोषान् गुणनित्यसम्मते ॥ १०८ ॥
' श्रीराम कभी किसीसे कोई अहितकारक या अप्रिय वचन नहीं करते हैं । वे कटुवचन बोलना जानते ही नहीं हैं । उनका अपने गुणोंके कारण सदा - सर्वदा सम्मान होता है । उन्हीं मनोहर वचन बोलनेवाले श्रीराममें तू तू दोष कैसे बता रही है? क्योंकि वनवास उसीको दिया जाता है, जिसके बहुत - से दोष सिद्ध हो चुके हों ॥ १०८ ॥
प्रताम्य वा प्रज्वल वा प्रणश्य वा सहस्रशो वा स्फुटितां महीं व्रज । न ते करिष्यामि वचः सुदारुणं ममाहितं केकयराजपांसने ॥ १० ९ ॥ ' ओ केकयराजके कुलकी जीती - जागती कलङ्क! तू चाहे ग्लानिमें डूब जा अथवा आगमें जलकर खाक हो जा या विष खाकर प्राण दे दे अथवा पृथ्वीमें हजारों दरारें बनाकर उसीमें समा जा; परंतु मेरा अहित करनेवाली तेरी यह अत्यन्त कठोर बात मैं कदापि नहीं मानूँगा ॥ १० ९ ॥ क्षुरोपमां नित्यमसत्प्रियंवदां प्रदुष्टभावां स्वकुलोपघातिनीम् । न जीवितुं त्वां विषहेऽमनोरमां दिधक्षमाणां हृदयं सबन्धनम् ॥ ११० ॥
' तू छुरेके समान घात करनेवाली है । बातें तो मीठी - मीठी करती है, परंतु वे सदा झूठी और सद्भावनासे रहित होती हैं । तेरे हृदयका भाव अत्यन्त दूषित है तथा तू अपने कुलका भी नाश करनेवाली है । इतना ही नहीं, तू प्राणसहित मेरे हृदयको भी जलाकर भस्म कर
डालना चाहती है; इसीलिये मेरे मनको नहीं भाती है ।
तुझ पापिनीका जीवित रहना मैं नहीं सह सकता ॥ ११० ॥
न जीवितं मेऽस्ति कुतः पुनः सुखं विनात्मजेनात्मवतां कुतो रतिः ।
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अयोध्याकाण्डे माहितं देवि न कर्तुमर्हसि स्पृशामि पादावपि ते प्रसीद मे ॥ १११ ॥
‘ देवि! अपने बेटे श्रीरामके बिना मेरा जीवन नहीं रह सकता, फिर कहाँसे सुख हो सकता है? आत्मज्ञ पुरुषोंको भी अपने पुत्रसे बिछोह हो जानेपर कैसे चैन मिल सकता है? अतः तू मेरा अहित न कर । मैं तेरे पैर छूता हूँ, तू मुझपर प्रसन्न हो जा ' ॥ १११ ॥
स भूमिपालो विलपन्ननाथवत् स्त्रिया गृहीतो हृदयेऽतिमात्रया । त्रयोदशः सर्गः २६५ पपात देव्याश्चरणौ प्रसारिता-वुभावसम्प्राप्य यथाऽऽतुरस्तथा ॥ ११२ ॥
इस प्रकार महाराज दशरथ मर्यादाका उल्लङ्घन करनेवाली उस हठीली स्त्रीके वशमें पड़कर अनाथकी भाँति विलाप कर रहे थे । वे देवी कैकेयीके फैलाये हुए दोनों चरणोंको छूना चाहते थे; परंतु उन्हें न पाकर बीचमें ही मूर्च्छित होकर गिर पड़े । ठीक उसी तरह, जैसे कोई रोगी किसी वस्तुको छूना चाहता है; किंतु दुर्बलताके कारण
वहाँतक न पहुँचकर बीचमें ही अचेत होकर गिर जाता है ।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशः सर्गः राजाका विलाप और कैकेयी अनुनय- य - विनय
अद महाराजं शयानमतथोचितम् ।
ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकात् परिच्युतम् ॥ १ ॥
अनर्थरूपासिद्धार्था ह्यभीता भयदर्शिनी ।
पुनराकारयामास तमेव वरमङ्गना ॥ २ ॥
महाराज दशरथ उस अयोग्य और अनुचित अवस्थामें पृथ्वीपर पड़े थे । उस समय वे पुण्य समाप्त होनेपर देवलोकसे भ्रष्ट हुए राजा ययातिके समान जान पड़ते थे । उनकी वैसी दशा देख अनर्थकी साक्षात् मूर्ति कैकेयी, जिसका प्रयोजन अभीतक सिद्ध नहीं हुआ था, जो लोकापवादका भय छोड़ चुकी थी और श्रीरामसे भरतके लिये भय देखती थी, पुनः उसी वरके लिये राजाको सम्बोधित करके कहने लगी- ॥ १-२ ॥
त्वं कत्थसे महाराज सत्यवादी दृढव्रतः ।
मम चेदं वरं कस्माद् विधारयितुमिच्छसि ॥ ३ ॥
' महाराज! आप तो डींग मारा करते थे कि मैं बड़ा सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ हूँ, फिर आप मेरे इस वरदानको क्यों हजम कर जाना चाहते हैं? ' ॥ ३ ॥
एवमुक्तस्तु कैकेय्या राजा दशरथस्तदा ।
प्रत्युवाच ततः क्रुद्धो मुहूर्तं विह्वलन्निव ॥४ ॥
कैकेयीके ऐसा कहनेपर राजा दशरथ दो घड़ीतक व्याकुलकी - सी अवस्थामें रहे । तत्पश्चात् कुपित होकर उसे इस प्रकार उत्तर देने लगे -॥४ ॥
मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे ।
हन्तानार्ये ममामित्रे सकामा सुखिनी भव ॥ ५ ॥
' ओ नीच! तू मेरी शत्रु है । नरश्रेष्ठ श्रीरामके | वनमें चले जानेपर जब मेरी मृत्यु हो जायगी, उस समय तू सफलमनोरथ होकर सुखसे रहना ॥५ ॥
स्वर्गेऽपि खलु रामस्य कुशलं दैवतैरहम् ।
प्रत्यादेशादभिहितं धारयिष्ये कथं बत ॥ ६ ॥
' हाय! स्वर्गमें भी जब देवता मुझसे श्रीरामका कुशल समाचार पूछेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? यदि कहूँ, उन्हें वनमें भेज दिया तो उसके बाद वे लोग जो मेरे प्रति धिक्कारपूर्ण बात कहेंगे, उसे कैसे सह सकूँगा? इसके लिये मुझे बड़ा खेद है ॥ ६ ॥
कैकेय्याः प्रियकामेन रामः प्रव्राजितो वनम् ।
यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति ॥७ ॥
' कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे उसके माँगे हुए वरदानके अनुसार मैंने श्रीरामको वनमें भेज दिया, यदि ऐसा कहूँ और इसे सत्य बताऊँ तो मेरी वह पहली बात असत्य हो जायगी, जिसके द्वारा मैंने रामको राज्य देनेका आश्वासन दिया अपुत्रेण मया पुत्रः रामो लब्धो महातेजाः ' मैं पहले पुत्रहीन मैंने जिन महातेजस्वी प्राप्त किया है, उनका सकता है? ॥८ ॥
शूरश्च कृतविद्यश्च कथं कमलपत्राक्षो है ॥७ ॥
श्रमेण महता महान् ।
स कथं त्यज्यते मया ॥ ८ ॥
था, फिर महान् परिश्रम करके महापुरुष श्रीरामको पुत्ररूपमें मेरे द्वारा त्याग कैसे किया जा
जितक्रोधः क्षमापरः ।
मया रामो विवास्यते ॥ ९ ॥
' जो शूरवीर, विद्वान्, क्रोधको जीतनेवाले और
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२६६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
क्षमापरायण हैं, उन कमलनयन श्रीरामको मैं देशनिकाला ।
कैसे दे सकता हूँ? ॥ ९ ॥
कथमिन्दीवरश्यामं दीर्घबाहुं महाबलम् ।
अभिराममहं रामं स्थापयिष्यामि दण्डकान् ॥ १० ॥
' जिनकी अङ्गकान्ति नीलकमलके समान श्याम है, भुजाएँ विशाल और बल महान् हैं, उन नयनाभिराम श्रीरामको मैं दण्डकवनमें कैसे भेज सकूँगा? ॥ १० ॥
सुखानामुचितस्यैव दुःखैरनुचितस्य च ।
दुःखं नामानुपश्येयं कथं रामस्य धीमतः ॥ ११ ॥
‘ जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य हैं, कदापि दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन बुद्धिमान् श्रीरामको दुःख उठाते मैं कैसे देख सकता हूँ? ॥११ ॥
यदि दुःखमकृत्वा तु मम संक्रमणं भवेत् ।
अदुःखार्हस्य रामस्य ततः सुखमवाप्नुयाम् ॥ १२ ॥
' जो दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन श्रीरामको यह वनवासका दुःख दिये बिना ही यदि मैं इस संसारसे विदा हो जाता तो मुझे बड़ा सुख मिलता ॥ १२ ॥
नृशंसे पापसंकल्पे रामं सत्यपराक्रमम् ।
किं विप्रियेण कैकेयि प्रियं योजयसे मम ॥ १३ ॥
अकीर्तिरतुला लोके ध्रुवं परिभविष्यति । ' ओ पापपूर्ण विचार रखनेवाली पाषाणहृदया कैकेयि! सत्यपराक्रमी श्रीराम मुझे बहुत प्रिय हैं, तू मुझसे उनका विछोह क्यों करा रही है? अरी! ऐसा करनेसे निश्चय ही संसारमें तेरी वह अपकीर्ति फैलेगी, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ' ॥ १३३ ॥
तथा विलपतस्तस्य परिभ्रमितचेतसः ॥ १४ ॥
अस्तमभ्यागमत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत । इस प्रकार विलाप करते - करते राजा दशरथका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा । इतनेमें ही सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और प्रदोषकाल आ पहुँचा ॥ १४३ ॥
सा त्रियामा तदार्तस्य चन्द्रमण्डलमण्डिता ॥ १५ ॥
राज्ञो विलपमानस्य न व्यभासत शर्वरी । वह तीन पहरोंवाली रात यद्यपि चन्द्रमण्डलकी चारुचन्द्रिकासे आलोकित हो रही थी, तो भी उस समय आर्त होकर विलाप करते हुए राजा दशरथके लिये प्रकाश या उल्लास न दे सकी ॥ १५३ ॥
सदैवोष्णं विनिःश्वस्य वृद्धो दशरथो नृपः ॥ १६ ॥
विललापार्तवद् दुःखं गगनासक्तलोचनः । बूढ़े राजा दशरथ निरन्तर गरम उच्छ्वास लेते हुए आकाशकी ओर दृष्टि लगाये आर्तकी भाँति दुःखपूर्ण विलाप करने लगे — ॥ १६३ ॥
न प्रभातं त्वयेच्छामि निशे नक्षत्रभूषिते ॥ १६ ॥
क्रियतां मे दया भद्रे मयायं रचितोऽञ्जलिः । ' नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत कल्याणमयी रात्रिदेवि!
मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे द्वारा प्रभात - काल लाया जाय ।
मुझपर दया करो । मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूँ ॥
अथवा गम्यतां शीघ्रं नाहमिच्छामि निर्घृणाम् ॥ १८ ॥
नृशंसां केकयीं द्रष्टुं यत्कृते व्यसनं मम । ' अथवा शीघ्र बीत जाओ; क्योंकि जिसके कारण मुझे भारी संकट प्राप्त हुआ है, उस निर्दय और क्रूर कैकेयीको अब मैं नहीं देखना चाहता ' ॥ १८३ ॥
एवमुक्त्वा ततो राजा कैकेयीं संयताञ्जलिः ॥ १ ९ ॥ प्रसादयामास पुनः कैकेयीं राजधर्मवित् । कैकेयीसे ऐसा कहकर राजधर्मके ज्ञाता राजा दशरथने पुनः हाथ जोड़कर उसे मनाने या प्रसन्न करनेकी चेष्टा आरम्भ की — ॥ १ ९ ३ ॥ साधुवृत्तस्य दीनस्य त्वद्गतस्य गतायुषः ॥ २० ॥
प्रसादः क्रियतां भद्रे देवि राज्ञो विशेषतः । ' कल्याणमयी देवि! जो सदाचारी, दीन, तेरे आश्रित, गतायु ( मरणासन्न ) और विशेषतः राजा है— ऐसे मुझ दशरथपर कृपा कर ॥ २०३ ॥
शून्ये न खलु सुश्रोणि मयेदं समुदाहृतम् ॥ २१ ॥
कुरु साधुप्रसादं मे बाले सहृदया ह्यसि । ' सुन्दर कटिप्रदेशवाली केकयनन्दिनि! मैंने जो यह श्रीरामको राज्य देनेकी बात कही है, वह किसी सूने घरमें नहीं, भरी सभामें घोषित की है, अतः बाले! तू बड़ी सहृदय है; इसलिये मुझपर भलीभाँति कृपा कर ( जिससे सभासदोंद्वारा मेरा उपहास न हो ) ॥ २१३ ॥
प्रसीद देवि रामो मे त्वद्दत्तं राज्यमव्ययम् ॥ २२ ॥
लभतामसितापाङ्गे यशः परमवाप्स्यसि । ' देवि! प्रसन्न हो जा । कजरारे नेत्रप्रान्तवाली प्रिये! मेरे श्रीराम तेरे ही दिये हुए इस अक्षय राज्यको प्राप्त करें, इससे तुझे उत्तम यशकी प्राप्ति होगी ॥ २२३ ॥
मम रामस्य लोकस्य गुरूणां भरतस्य च ।
प्रियमेतद् गुरुश्रोणि कुरु चारुमुखेक्षणे ॥ २३ ॥
' पृथुल नितम्बवाली देवि! सुमुखि! सुलोचने! यह प्रस्ताव मुझको, श्रीरामको, समस्त प्रजावर्गको, गुरुजनोंको तथा भरतको भी प्रिय होगा, अतः इसे पूर्ण कर ' ॥ २३ ॥
विशुद्धभावस्य हि दुष्टभावा दीनस्य ताम्राश्रुकलस्य राज्ञः ।
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अयोध्याकाण्डे श्रुत्वा विचित्रं करुणं विलापं भर्तुर्नृशंसा न चकार वाक्यम् ॥ २४ ॥
राजाके हृदयका भाव अत्यन्त शुद्ध था, उनके आँसूभरे नेत्र लाल हो गये थे और वे दीनभावसे विचित्र करुणाजनक विलाप कर रहे थे, किंतु मनमें दूषित विचार रखनेवाली निष्ठुर कैकेयीने पतिके उस विलापको सुनकर भी उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया ॥ २४ ॥
ततः स राजा पुनरेव मूर्च्छितः प्रियामतुष्टां प्रतिकूलभाषिणीम् । समीक्ष्य पुत्रस्य विवासनं प्रति क्षितौ विसंज्ञो निपपात दुःखितः ॥ २५ ॥
( इतनी अनुनय - विनयके बाद भी ) जब प्रिया कैकेयी किसी तरह संतुष्ट न हो सकी और बराबर प्रतिकूल । चतुर्दशः सर्गः २६७ बात ही मुँहसे निकालती गयी, तब पुत्रके वनवासकी बात सोचकर राजा पुनः दुःखके मारे मूर्च्छित हो गये और सुध - बुध खोकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २५ ॥
इतीव राज्ञो व्यथितस्य सा निशा जगाम घोरं श्वसतो मनस्विनः । विबोध्यमानः प्रतिबोधनं तदा निवारयामास स राजसत्तमः ॥ २६ ॥
इस प्रकार व्यथित होकर भयंकर उच्छ्वास लेते हुए मनस्वी राजा दशरथकी वह रात धीरे - धीरे बीत गयी । प्रात: काल राजाको जगानेके लिये मनोहर वाद्योंके साथ मङ्गलगान होने लगा, परंतु उन राज-शिरोमणिने तत्काल मनाही भेजकर वह सब बंद करा दिया ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १३ ॥
चतुर्दशः सर्गः कैकेयीका राजाको सत्यपर दृढ़ रहनेके लिये प्रेरणा देकर अपने वरोंकी पूर्तिके लिये दुराग्रह दिखाना, महर्षि वसिष्ठका अन्तःपुरके द्वारपर आगमन और सुमन्त्रको महाराजके पास भेजना, राजाकी आज्ञासे सुमन्त्रका श्रीरामको बुलानेके लिये जाना
पुत्रशोकार्दितं पापा विसंज्ञं पतितं भुवि ।
विचेष्टमानमुत्प्रेक्ष्य ऐक्ष्वाकमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
इक्ष्वाकुनन्दन राजा दशरथ पुत्रशोकसे पीड़ित हो पृथ्वीपर अचेत पड़े थे और वेदनासे छटपटा रहे थे, उन्हें इस अवस्थामें देखकर पापिनी कैकेयी इस प्रकार बोली- ॥ १ ॥
पापं कृत्वेव किमिदं मम संश्रुत्य संश्रवम् ।
शेषे क्षितितले सन्नः स्थित्यां स्थातुं त्वमर्हसि ॥२ ॥
' महाराज! आपने मुझे दो वर देनेकी प्रतिज्ञा की थी और जब मैंने उन्हें माँगा, तब आप इस प्रकार सन्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो कोई पाप करके पछता रहे हों, यह क्या बात है? आपको सत्पुरुषोंकी मर्यादामें स्थिर रहना चाहिये ॥ २ ॥
आहुः सत्यं हि परमं धर्मं धर्मविदो जनाः ।
सत्यमाश्रित्य च मया त्वं धर्मं प्रतिचोदितः ॥ ३ ॥
‘ धर्मज्ञ पुरुष सत्यको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म बतलाते हैं, उस सत्यका सहारा लेकर मैंने आपको धर्मका पालन करनेके लिये ही प्रेरित किया है ॥ ३ ॥
संश्रुत्य शैब्यः श्येनाय स्वां तनुं जगतीपतिः ।
प्रदाय पक्षिणे राजा जगाम गतिमुत्तमाम् ॥४ ॥
' पृथ्वीपति राजा शैब्यने बाज पक्षीको अपना शरीर देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे दे ही दिया और देकर उत्तम गति प्राप्त कर ली ॥४ ॥
तथा ह्यलर्कस्तेजस्वी ब्राह्मणे वेदपारगे ।
याचमाने स्वके नेत्रे उद्धृत्याविमना ददौ ॥ ५ ॥
' इसी प्रकार तेजस्वी राजा अलर्कने वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणको उसके याचना करनेपर मनमें खेद न लाते हुए अपनी दोनों आँखें निकालकर दे दी थीं ॥५ ॥
सरितां तु पतिः स्वल्पां मर्यादां सत्यमन्वितः ।
सत्यानुरोधात् समये वेलां स्वां नातिवर्तते ॥ ६ ॥
' सत्यको प्राप्त हुआ समुद्र सत्यका ही अनुसरण करनेके कारण पर्व आदिके समय भी अपनी छोटी-सी सीमातट - भूमिका भी उल्लङ्घन नहीं करता ॥६ ॥
सत्यमेकपदं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः ।
सत्यमेवाक्षया वेदाः सत्येनावाप्यते परम् ॥७ ॥
' सत्य ही प्रणवरूप शब्दब्रह्म है, सत्यमें ही धर्म
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२६८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
प्रतिष्ठित है, सत्य ही अविनाशी वेद है और सत्यसे ।
ही परब्रह्मकी प्राप्ति होती है ॥ ७ ॥
सत्यं समनुवर्तस्व यदि धर्मे धृता मतिः ।
स वरः सफलो मेऽस्तु वरदो ह्यसि सत्तम ॥ ८ ॥
' इसलिये यदि आपकी बुद्धि धर्ममें स्थित है तो सत्यका अनुसरण कीजिये । साधुशिरोमणे! मेरा माँगा हुआ वह वर सफल होना चाहिये; क्योंकि आप स्वयं ही उस वरके दाता हैं ॥ ८ ॥
धर्मस्यैवाभिकामार्थं मम चैवाभिचोदनात् ।
प्रव्राजय सुतं रामं त्रिः खलु त्वां ब्रवीम्यहम् ॥ ९ ॥
' धर्मके ही अभीष्ट फलकी सिद्धिके लिये तथा मेरी प्रेरणासे भी आप अपने पुत्र श्रीरामको घरसे निकाल दीजिये । मैं अपने इस कथनको तीन बार दुहराती हूँ ।
समयं च ममार्येमं यदि त्वं न करिष्यसि ।
अग्रतस्ते परित्यक्ता परित्यक्ष्यामि जीवितम् ॥ १० ॥
' आर्य! यदि मुझसे की हुई इस प्रतिज्ञाका आप पालन नहीं करेंगे तो मैं आपसे परित्यक्त ( उपेक्षित ) होकर आपके सामने ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी ' ॥ १० ॥
एवं प्रचोदितो राजा कैकेय्या निर्विशङ्कया ।
नाशकत् पाशमुन्मोक्तुं बलिरिन्द्रकृतं यथा ॥ ११ ॥
इस प्रकार कैकेयीने जब निःशङ्क होकर राजाको प्रेरित किया, तब वे उस सत्यरूपी बन्धनको वैसे ही नहीं खोल सके — उस बन्धनसे अपनेको उसी तरह नहीं मुक्त कर सके, जैसे राजा बलि इन्द्रप्रेरित वामनके पाशसे अपनेको मुक्त करनेमें असमर्थ हो गये थे ॥ ११ ॥
उद्भ्रान्तहृदयश्चापि विवर्णवदनोऽभवत् ।
स धुर्यो वै परिस्पन्दन् युगचक्रान्तरं यथा ॥ १२ ॥
दो पहियोंके बीचमें फँसकर वहाँसे निकलनेकी चेष्टा करनेवाले गाड़ीके बैलकी भाँति उनका हृदय उद्भ्रान्त हो उठा था और उनके मुखकी कान्ति भी फीकी पड़ गयी थी ॥ १२ ॥
विकलाभ्यां च नेत्राभ्यामपश्यन्निव भूमिपः ।
कृच्छ्राद् धैर्येण संस्तभ्य कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ १३ ॥
अपने विकल नेत्रोंसे कुछ भी देखनेमें असमर्थ-से होकर भूपाल दशरथने बड़ी कठिनाईसे धैर्य धारण करके अपने हृदयको सँभाला और कैकेयीसे इस प्रकार कहा- ॥ १३ ॥
यस्ते मन्त्रकृतः पाणिरग्नौ पापे मया धृतः ।
संत्यजामि स्वजं चैव तव पुत्रं सह त्वया ॥ १४ ॥
' पापिनि! मैंने अग्निके समीप ' साङ्गुष्ठं ते गृभ्णामि सौभगत्वाय हस्तम् ॰ ' इत्यादि वैदिक मन्त्रका पाठ करके तेरे जिस हाथको पकड़ा था, उसे आज छोड़ रहा हूँ । साथ ही तेरे और अपने द्वारा उत्पन्न हुए तेरे पुत्रका भी त्याग करता हूँ ॥ १४ ॥
प्रयाता रजनी देवि सूर्यस्योदयनं प्रति ।
अभिषेकाय हि जनस्त्वरयिष्यति मां ध्रुवम् ॥ १५ ॥
' देवि! रात बीत गयी । सूर्योदय होते ही सब लोग निश्चय ही श्रीरामका राज्याभिषेक करनेके लिये मुझे शीघ्रता करनेको कहेंगे ॥ १५ ॥
रामाभिषेकसम्भारैस्तदर्थमुपकल्पितैः रामः कारयितव्यो मे मृतस्य सलिलक्रियाम् ॥ १६ ॥
सपुत्रया त्वया नैव कर्तव्या सलिलक्रिया । ' उस समय जो सामान श्रीरामके अभिषेकके लिये जुटाया गया है, उसके द्वारा मेरे मरनेके बाद श्रीरामके हाथसे मुझे जलाञ्जलि दिलवा देना; परंतु अपने पुत्रसहित तू मेरे लिये जलाञ्जलि न देना ॥ १६३ ॥
व्याहन्तास्यशुभाचारे यदि रामाभिषेचनम् ॥ १७ ॥
न शक्तोऽद्यास्म्यहं द्रष्टुं दृष्ट्वा पूर्वं तथामुखम् ।
हतहर्षं तथानन्दं पुनर्जनमवाङ्मुखम् ॥ १८ ॥
' पापाचारिणि! यदि तू श्रीरामके अभिषेकमें विघ्न डालेगी ( तो तुझे मेरे लिये जलाञ्जलि देनेका कोई अधिकार न होगा ) । मैं पहले श्रीरामके राज्याभिषेकके समाचारसे जो जन - समुदायका हर्षोल्लाससे परिपूर्ण उन्नत मुख देख चुका हूँ, वैसा देखनेके पश्चात् आज पुनः उसी जनताके हर्ष और आनन्दसे शून्य, नीचे लटके हुए मुखको मैं नहीं देख सकूँगा ' ॥ १७-१८ ॥
तां तथा ब्रुवतस्तस्य भूमिपस्य महात्मनः ।
प्रभाता शर्वरी पुण्या चन्द्रनक्षत्रमालिनी ॥ १ ९ ॥
महात्मा राजा दशरथके कैकेयीसे इस तरहकी बातें करते - करते ही चन्द्रमा और नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत वह पुण्यमयी रजनी बीत गयी और प्रभातकाल आ गया ॥ १ ९ ॥
ततः पापसमाचारा कैकेयी पार्थिवं पुनः ।
उवाच परुषं वाक्यं वाक्यज्ञा रोषमूर्च्छिता ॥ २० ॥
तदनन्तर बातचीतके मर्मको समझनेवाली पापाचारिणी कैकेयी रोषसे मूर्च्छित - सी होकर राजासे पुनः कठोर वाणीमें बोली - ॥ २० ॥
किमिदं भाषसे राजन् वाक्यं गररुजोपमम् ।
आनाययितुमक्लिष्टं पुत्रं राममिहार्हसि ॥ २१ ॥