वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 351–360
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360
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अयोध्याकाण्डेषट्त्रिंशः सर्गः ३३ ९ ‘ अनार्ये! अहितकारिणि! तू रामको वनवास देनेके । दुर्वह भारमें लगाकर जब मैं उस भारको ढो रहा हूँ, उस अवस्थामें क्यों अपने वचनोंका चाबुक मारकर मुझे पीड़ा दे रही है? इस समय जो कार्य तूने आरम्भ किया है अर्थात् श्रीरामके साथ सेना और सामग्री भेजनेमें जो प्रतिबन्ध लगाया है, इसके लिये तूने पहले ही क्यों नहीं प्रार्थना की थी? ( अर्थात् पहले ही यह क्यों नहीं कह दिया था कि श्रीरामको अकेले वनमें जाना पड़ेगा, उनके साथ सेना आदि सामग्री नहीं जा सकती ) ' ॥ १४ ॥
तस्यैतत् क्रोधसंयुक्तमुक्तं श्रुत्वा वराङ्गना ।
कैकेयी द्विगुणं क्रुद्धा राजानमिदमब्रवीत् ॥ १५ ॥
राजाका यह क्रोधयुक्त वचन सुनकर सुन्दरी कैकेयी उनकी अपेक्षा दूना क्रोध करके उनसे इस प्रकार बोली- ॥ १५ ॥
तवैव वंशे सगरो ज्येष्ठपुत्रमुपारुधत् ।
असमञ्ज इति ख्यातं तथायं गन्तुमर्हति ॥ १६ ॥
' महाराज! आपके ही वंशमें पहले राजा सगर हो गये हैं, जिन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमञ्जको निकालकर उसके लिये राज्यका दरवाजा सदाके लिये बंद कर दिया था । इसी तरह इनको भी यहाँसे निकल जाना चाहिये ' ॥ १६ ॥
एवमुक्तो धिगित्येव राजा दशरथोऽब्रवीत् ।
व्रीडितश्च जनः सर्वः सा च तन्नावबुध्यत ॥ १७ ॥
उसके ऐसा कहनेपर राजा दशरथने कहा-' धिक्कार है । ' वहाँ जितने लोग बैठे थे सभी लाजसे गड़ गये; किंतु कैकेयी अपने कथनके अनौचित्यको अथवा राजाद्वारा दिये गये धिक्कारके औचित्यको नहीं समझ सकी ॥१७ ॥
तत्र वृद्धो महामात्रः सिद्धार्थो नाम नामतः ।
शुचिर्बहुमतो राज्ञः कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ १८ ॥
उस समय वहाँ राजाके प्रधान और वयोवृद्ध मन्त्री सिद्धार्थ बैठे थे । वे बड़े ही शुद्ध स्वभाववाले और राजाके विशेष आदरणीय थे । उन्होंने कैकेयीसे इस प्रकार कहा- ॥ १८ ॥
असमञ्जो गृहीत्वा तु क्रीडतः पथि दारकान् ।
सरय्वां प्रक्षिपन्नप्सु रमते तेन दुर्मतिः ॥ १ ९ ॥
' देवि! असमञ्ज बड़ी दुष्ट बुद्धिका राजकुमार था । वह मार्गपर खेलते हुए बालकोंको पकड़कर सरयूके जलमें फेंक देता था और ऐसे ही कार्योंसे अपना मनोरञ्जन करता था ॥ १ ९ ॥
तं दृष्ट्वा नागराः सर्वे क्रुद्धा राजानमब्रुवन् ।
असमञ्जं वृणीष्वैकमस्मान् वा राष्ट्रवर्धन ॥ २० ॥
' उसकी यह करतूत देखकर सभी नगरनिवासी कुपित हो राजाके पास जाकर बोले — ' राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले महाराज! या तो आप अकेले असमञ्जको लेकर रहिये या इन्हें निकालकर हमें इस नगरमें रहने दीजिये ' ॥ २० ॥
तानुवाच ततो राजा किंनिमित्तमिदं भयम् ।
ताश्चापि राज्ञा सम्पृष्टा वाक्यं प्रकृतयोऽब्रुवन् ॥ २१ ॥
' तब राजाने उनसे पूछा - ' तुम्हें असमञ्जसे किस कारण भय हुआ है? ' राजाके पूछनेपर उन प्रजाजनोंने यह बात कही - ॥ २१ ॥
क्रीडतस्त्वेष नः पुत्रान् बालानुद्भ्रान्तचेतसः ।
सरय्वां प्रक्षिपन्मौर्थ्यादतुलां प्रीतिमश्नुते ॥ २२ ॥
' महाराज! यह हमारे खेलते हुए छोटे - छोटे बच्चोंको पकड़ लेते हैं और जब वे बहुत घबरा जाते हैं, तब उन्हें सरयूमें फेंक देते हैं । मूर्खतावश ऐसा करके इन्हें अनुपम आनन्द प्राप्त होता है ' ॥ २२ ॥
स तासां वचनं श्रुत्वा प्रकृतीनां नराधिपः ।
तं तत्याजाहितं पुत्रं तासां प्रियचिकीर्षया ॥ २३ ॥
' उन प्रजाजनोंकी वह बात सुनकर राजा सगरने उनका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने उस अहितकारक दुष्ट पुत्रको त्याग दिया ॥ २३ ॥
तं यानं शीघ्रमारोप्य सभार्यं सपरिच्छदम् ।
यावज्जीवं विवास्योऽयमिति तानन्वशात् पिता ॥ २४ ॥
‘ पिताने अपने उस पुत्रको पत्नी और आवश्यक सामग्रीसहित शीघ्र रथपर बिठाकर अपने सेवकोंको आज्ञा दी - ' इसे जीवनभरके लिये राज्यसे बाहर निकाल दो ' ॥ २४ ॥
स फालपिटकं गृह्य गिरिदुर्गाण्यलोकयत् ।
दिशः सर्वास्त्वनुचरन् स यथा पापकर्मकृत् ॥ २५ ॥
इत्येनमत्यजद् राजा सगरो वै सुधार्मिकः ।
रामः किमकरोत् पापं येनैवमुपरुध्यते ॥ २६ ॥
' असमञ्जने फाल और पिटारी लेकर पर्वतोंकी दुर्गम गुफाओंको ही अपने निवासके योग्य देखा और कन्द आदिके लिये वह सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरने लगा । वह जैसा कि बताया गया है, पापाचारी था, इसलिये परम धार्मिक राजा सगरने उसको त्याग दिया था । श्रीरामने ऐसा कौन - सा अपराध किया है, जिसके कारण इन्हें इस तरह राज्य पानेसे रोका जा रहा है? ॥
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३४० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
नहि कंचन पश्यामो राघवस्यागुणं वयम् ।
दुर्लभो ह्यस्य निरयः शशाङ्कस्येव कल्मषम् ॥ २७ ॥
' हमलोग तो श्रीरामचन्द्रजीमें कोई अवगुण नहीं देखते हैं; जैसे ( शुक्लपक्षकी द्वितीयाके ) चन्द्रमामें
मलिनताका दर्शन दुर्लभ है, उसी प्रकार इनमें कोई पाप ।
या अपराध ढूँढ़नेसे भी नहीं मिल सकता ॥ २७ ॥
अथवा देवि त्वं कंचिद् दोषं पश्यसि राघवे ।
तमद्य ब्रूहि तत्त्वेन तदा रामो विवास्यते ॥ २८ ॥
' अथवा देवि! यदि तुम्हें श्रीरामचन्द्रजीमें कोई
दोष दिखायी देता हो तो आज उसे ठीक - ठीक बताओ ।
उस दशामें श्रीरामको निकाल दिया जा सकता है ॥ २८ ॥
अदुष्टस्य हि संत्यागः सत्पथे निरतस्य च ।
निर्दहेदपि शक्रस्य द्युतिं धर्मविरोधवान् ॥ २ ९ ॥
' जिसमें कोई दुष्टता नहीं है, जो सदा सन्मार्गमें ही स्थित है, ऐसे पुरुषका त्याग धर्मसे विरुद्ध माना जाता है । ऐसा धर्मविरोधी कर्म तो इन्द्रके भी तेजको दग्ध कर देगा ॥ २ ९ ॥
तदलं देवि रामस्य श्रिया विहतया त्वया ।
लोकतोऽपि हि ते रक्ष्यः परिवादः शुभानने ॥ ३० ॥
‘ अतः देवि! श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न डालनेसे तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा । शुभानने! तुम्हें लोकनिन्दासे भी बचनेकी चेष्टा करनी चाहिये ' ॥ ३० ॥
श्रुत्वा तु सिद्धार्थवचो राजा श्रान्ततरस्वरः ।
शोकोपहतया वाचा कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ ३१ ॥
सिद्धार्थकी बातें सुनकर राजा दशरथ अत्यन्त थके हुए स्वरसे शोकाकुल वाणीमें कैकेयीसे इस प्रकार बोले - ॥ ३१ ॥
एतद्वच नेच्छसि पापरूपे हितं न जानासि ममात्मनोऽथवा । आस्थाय मार्गं कृपणं कुचेष्टा चेष्टा हि ते साधुपथादपेता ॥ ३२ ॥
' पापिनि! क्या तुझे यह बात नहीं रुची? तुझे मेरे या अपने हितका भी बिलकुल ज्ञान नहीं है? तू दुःखद मार्गका आश्रय लेकर ऐसी कुचेष्टा कर रही है । तेरी यह सारी चेष्टा साधु पुरुषोंके मार्गके विपरीत है ॥ ३२ ॥
अनुवजिष्याम्यहमद्य रामं राज्यं परित्यज्य सुखं धनं च । सर्वे च राज्ञा भरतेन च त्वं यथासुखं भुङ्क्ष्व चिराय राज्यम् ॥ ३३ ॥
' अब मैं भी यह राज्य, धन और सुख छोड़कर श्रीरामके पीछे चला जाऊँगा । ये सब लोग भी उन्हींके साथ जायँगे । तू अकेली राजा भरतके साथ चिरकालतक । सुखपूर्वक राज्य भोगती रह ' ॥ ३३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
सप्तत्रिंशः सर्गः श्रीराम आदिका वल्कल - वस्त्र - धारण, सीताके वल्कल - धारणसे रनिवासकी स्त्रियोंको खेद तथा गुरु वसिष्ठका कैकेयीको फटकारते हुए सीताके वल्कल - धारणका अनौचित्य बताना
महामात्रवचः श्रुत्वा रामो दशरथं तदा ।
अभ्यभाषत वाक्यं तु विनयज्ञो विनीतवत् ॥ १ ॥
प्रधान मन्त्रीकी पूर्वोक्त बात सुनकर विनयके ज्ञाता श्रीरामने उस समय राजा दशरथसे विनीत होकर कहा- ॥ १ ॥
त्यक्तभोगस्य मे राजन् वने वन्येन जीवतः ।
किं कार्यमनुयात्रेण त्यक्तसङ्गस्य सर्वतः ॥ २ ॥
' राजन्! मैं भोगोंका परित्याग कर चुका हूँ । मुझे जंगलके फल - मूलोंसे जीवन - निर्वाह करना है । जब मैं सब ओरसे आसक्ति छोड़ चुका हूँ, तब मुझे सेनासे क्या प्रयोजन है? ॥ २ ॥
यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मनः ।
रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजतः कुञ्जरोत्तमम् ॥ ३ ॥
' जो श्रेष्ठ गजराजका दान करके उसके रस्सेमें मन लगाता है — लोभवश रस्सेको रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथीका त्याग करनेवाले पुरुषको उसके रस्सेमें आसक्ति रखनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ ३ ॥
तथा मम सतां श्रेष्ठ किं ध्वजिन्या जगत्पते ।
सर्वाण्येवानुजानामि चीराण्येवानयन्तु मे ॥४ ॥
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अयोध्याकाण्डे ' सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज! इसी तरह मुझे । सेना लेकर क्या करना है? मैं ये सारी वस्तुएँ भरतको अर्पित करनेकी अनुमति देता हूँ । मेरे लिये तो ( माता कैकेयीकी दासियाँ ) चीर ( चिथड़े या वल्कल - वस्त्र ) ला दें ॥ ४ ॥
खनित्रपिटके चोभे समानयत गच्छत ।
चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वसतो मम ॥५ ॥
‘ दासियो! जाओ, खन्ती और पेटारी अथवा कुदारी और खाँची ये दोनों वस्तुएँ लाओ । चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेके लिये ये चीजें उपयोगी हो सकती हैं ' ॥
अथ चीराणि कैकेयी स्वयमाहृत्य राघवम् ।
उवाच परिधत्स्वेति जनौघे निरपत्रपा ॥ ६ ॥
कैकेयी लाज - संकोच छोड़ चुकी थी । वह स्वयं ही जाकर बहुत - सी चीर ले आयी और जनसमुदायमें श्रीरामचन्द्रजीसे बोली, ' लो, पहन लो ' ॥ ६ ॥
स चीरे पुरुषव्याघ्रः कैकेय्याः प्रतिगृह्य ते ।
सूक्ष्मवस्त्रमवक्षिप्य मुनिवस्त्राण्यवस्त ह ॥७ ॥
पुरुषसिंह श्रीरामने कैकेयीके हाथसे दो चीर ले लिये और अपने महीन वस्त्र उतारकर मुनियोंके से वस्त्र धारण कर लिये ॥ ७ ॥
लक्ष्मणश्चापि तत्रैव विहाय वसने शुभे ।
तापसाच्छादने चैव जग्राह पितुरग्रतः ॥ ८ ॥
इसी प्रकार लक्ष्मणने भी अपने पिताके सामने ही दोनों सुन्दर वस्त्र उतारकर तपस्वियोंके से वल्कल -वस्त्र पहन लिये ॥ ८ ॥
अथात्मपरिधानार्थं सीता कौशेयवासिनी ।
सम्प्रेक्ष्य चीरं संत्रस्ता पृषती वागुरामिव ॥ ९ ॥
सा व्यपत्रपमाणेव प्रगृह्य च सुदुर्मनाः ।
कैकेय्याः कुशचीरे ते जानकी शुभलक्षणा ॥ १० ॥
अश्रुसम्पूर्णनेत्रा च धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी ।
गन्धर्वराजप्रतिमं भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ ११ ॥
कथं नु चीरं बघ्नन्ति मुनयो वनवासिनः ।
इति ह्यकुशला सीता सा मुमोह मुहुर्मुहुः ॥ १२ ॥
तदनन्तर रेशमी - वस्त्र पहनने और धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाली धर्मज्ञा शुभलक्षणा जनकनन्दिनी सीता अपने पहननेके लिये भी चीरवस्त्रको प्रस्तुत देख उसी प्रकार डर गयीं, जैसे मृगी बिछे हुए जालको देखकर भयभीत हो जाती है । वे कैकेयीके हाथसे दो वल्कल - वस्त्र लेकर लज्जित - सी हो गयीं । उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ और नेत्रोंमें आँसू भर आये । उस समय उन्होंने । सप्तत्रिंशः सर्गः ३४१ गन्धर्वराजके समान तेजस्वी पतिसे इस प्रकार पूछा-' नाथ! वनवासी मुनिलोग चीर कैसे बाँधते हैं? ' यह कहकर उसे धारण करनेमें कुशल न होनेके कारण सीता बारम्बार मोहमें पड़ जाती थीं- भूल कर बैठती थीं ॥
कृत्वा कण्ठे स्म सा चीरमेकमादाय पाणिना ।
तस्थौ ह्यकुशला तत्र व्रीडिता जनकात्मजा ॥ १३ ॥
चीर - धारणमें कुशल न होनेसे जनकनन्दिनी सीता लज्जित हो एक वल्कल गलेमें डाल दूसरा हाथमें लेकर चुपचाप खड़ी रहीं ॥ १३ ॥
तस्यास्तत् क्षिप्रमागत्य रामो धर्मभृतां वरः ।
चीरं बबन्ध सीतायाः कौशेयस्योपरि स्वयम् ॥ १४ ॥
तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीराम जल्दीसे उनके पास आकर स्वयं अपने हाथोंसे उनके रेशमी वस्त्रके ऊपर वल्कल - वस्त्र बाँधने लगे ॥१४ ॥
रामं प्रेक्ष्य तु सीताया बवन्तं चीरमुत्तमम् ।
अन्तःपुरचरा नार्यो मुमुचुर्वारि नेत्रजम् ॥ १५ ॥
सीताको उत्तम चीरवस्त्र पहनाते हुए श्रीरामकी ओर देखकर रनवासकी स्त्रियाँ अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ १५ ॥
ऊचुश्च परमायत्ता रामं ज्वलिततेजसम् ।
वत्स नैवं नियुक्तेयं वनवासे मनस्विनी ॥ १६ ॥
वे सब अत्यन्त खिन्न होकर उदीप्त तेजवाले श्रीरामसे बोलीं- ' बेटा! मनस्विनी सीताको इस प्रकार वनवासकी आज्ञा नहीं दी गयी है ॥ १६ ॥
पितुर्वाक्यानुरोधेन गतस्य विजनं वनम् ।
तावद् दर्शनमस्या नः सफलं भवतु प्रभो ॥ १७ ॥
' प्रभो! तुम पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये जबतक निर्जन वनमें जाकर रहोगे, तबतक इसीको देखकर हमारा जीवन सफल होने दो ॥१७ ॥
लक्ष्मणेन सहायेन वनं गच्छस्व पुत्रक ।
नेयमर्हति कल्याणि वस्तुं तापसवद् वने ॥ १८ ॥
' बेटा! तुम लक्ष्मणको अपना साथी बनाकर उनके साथ वनको जाओ, परंतु यह कल्याणी सीता तपस्वी मुनिकी भाँति वनमें निवास करनेके योग्य नहीं है ॥ १८ ॥
कुरु नो याचनां पुत्र सीता तिष्ठतु भामिनी ।
धर्मनित्यः स्वयं स्थातुं न हीदानीं त्वमिच्छसि ॥१ ९ ॥
' पुत्र! तुम हमारी यह याचना सफल करो । भामिनी सीता यहीं रहे । तुम तो नित्य धर्मपरायण हो अतः स्वयं इस समय यहाँ नहीं रहना चाहते हो ( परंतु सीताको तो रहने दो ) ' ॥ १ ९ ॥
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३४२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
तासामेवंविधा वाचः शृण्वन् दशरथात्मजः ।
बबन्धैव तथा चीरं सीतया तुल्यशीलया ॥ २० ॥
चीरे गृहीते तु तया सबाष्पो नृपतेर्गुरुः ।
निवार्य सीतां कैकेयीं वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥ २१ ॥
माताओंकी ऐसी बातें सुनते हुए भी दशरथ-नन्दन श्रीरामने सीताको वल्कल - वस्त्र पहना ही दिया । पतिके समान शीलस्वभाववाली सीताके वल्कल धारण कर लेनेपर राजाके गुरु वसिष्ठजीके नेत्रोंमें आँसू भर आया । उन्होंने सीताको रोककर कैकेयीसे कहा- ॥ २०-२१ ॥
अतिप्रवृत्ते दुर्मेधे कैकेयि कुलपांसनि ।
वञ्चयित्वा तु राजानं न प्रमाणेऽवतिष्ठसि ॥ २२ ॥
' मर्यादाका उल्लङ्घन करके अधर्मकी ओर पैर बढ़ानेवाली दुर्बुद्धि कैकेयी! तू केकयराजके कुलकी जीती - जागती कलङ्क है । अरी! राजाको धोखा देकर अब तू सीमाके भीतर नहीं रहना चाहती है? ॥ २२ ॥
न गन्तव्यं वनं देव्या सीतया शीलवर्जिते ।
अनुष्ठास्यति रामस्य सीता प्रकृतमासनम् ॥ २३ ॥
' शीलका परित्याग करनेवाली दुष्टे! देवी सीता वनमें नहीं जायँगी । रामके लिये प्रस्तुत हुए राजसिंहासनपर ये ही बैठेंगी ॥ २३ ॥
आत्मा हि दाराः सर्वेषां दारसंग्रहवर्तिनाम् ।
आत्मेयमिति रामस्य पालयिष्यति मेदिनीम् ॥ २४ ॥
' सम्पूर्ण गृहस्थोंकी पत्नियाँ उनका आधा अङ्ग हैं । इस तरह सीता देवी भी श्रीरामकी आत्मा हैं; अतः उनकी जगह ये ही इस राज्यका पालन करेंगी ॥ २४ ॥
अथ यास्यति वैदेही वनं रामेण संगता ।
वयमत्रानुयास्यामः पुरं चेदं गमिष्यति ॥ २५ ॥
अन्तपालाश्च यास्यन्ति सदारो यत्र राघवः ।
सहोपजीव्यं राष्ट्रं च पुरं च सपरिच्छदम् ॥ २६ ॥
' यदि विदेहनन्दिनी सीता श्रीरामके साथ वनमें जायँगी तो हमलोग भी इनके साथ चले जायँगे । यह सारा नगर भी चला जायगा और अन्तःपुरके रक्षक भी चले जायँगे । अपनी पत्नीके साथ श्रीरामचन्द्रजी जहाँ निवास करेंगे, वहीं इस राज्य और नगरके लोग भी धन- -दौलत और आवश्यक सामान लेकर चले जायँगे ॥
भरतश्च शत्रुघ्नचीरवासा वनेचरः ।
वने वसन्तं काकुत्स्थमनुवत्स्यति पूर्वजम् ॥ २७ ॥
' भरत और शत्रुघ्न भी चीरवस्त्र धारण करके वनमें रहेंगे और वहाँ निवास करनेवाले अपने बड़े भाई श्रीरामकी सेवा करेंगे ॥ २७ ॥
ततः शून्यां गतजनां वसुधां पादपैः सह ।
त्वमेका शाधि दुर्वृत्ता प्रजानामहिते स्थिता ॥ २८ ॥
' फिर तू वृक्षोंके साथ अकेली रहकर इस निर्जन एवं सूनी पृथ्वीका राज्य करना । तू बड़ी दुराचारिणी है और प्रजाका अहित करनेमें लगी हुई है ॥ २८ ॥
न हि तद् भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः ।
तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति ॥ २ ९ ॥
' याद रख, श्रीराम जहाँके राजा न होंगे, वह राज्य राज्य नहीं रह जायगा - जंगल हो जायगा तथा श्रीराम जहाँ निवास करेंगे, वह वन एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन जायगा ॥ २ ९ ॥
न ह्यदत्तां महीं पित्रा भरतः शास्तुमिच्छति ।
त्वयि वा पुत्रवद् वस्तुं यदि जातो महीपतेः ॥ ३० ॥
' यदि भरत राजा दशरथसे पैदा हुए हैं तो पिताके प्रसन्नतापूर्वक दिये बिना इस राज्यको कदापि लेना नहीं चाहेंगे तथा तेरे साथ पुत्रवत् बर्ताव करनेके लिये भी यहाँ बैठे रहनेकी इच्छा नहीं करेंगे ॥ ३० ॥
यद्यपि त्वं क्षितितलाद् गगनं चोत्पतिष्यसि ।
पितृवंशचरित्रज्ञः सोऽन्यथा न करिष्यति ॥ ३१ ॥
' तू पृथ्वी छोड़कर आसमानमें उड़ जाय तो भी अपने पितृकुलके आचार - व्यवहारको जाननेवाले भरत उसके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे ॥३१ ॥
तत् त्वया पुत्रगर्धिन्या पुत्रस्य कृतमप्रियम् ।
लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः ॥३२ ॥
' तूने पुत्रका प्रिय करनेकी इच्छासे वास्तवमें उसका अप्रिय ही किया है; क्योंकि संसारमें कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो श्रीरामका भक्त न हो ॥ ३२ ॥
द्रक्ष्यस्यद्यैव कैकेयि पशुव्यालमृगद्विजान् ।
गच्छतः सह रामेण पादपांश्च तदुन्मुखान् ॥ ३३ ॥
' कैकेयि! तू आज ही देखेगी कि वनको जाते हुए श्रीरामके साथ पशु, सर्प, मृग और पक्षी भी चले रहे हैं । औरोंकी तो बात ही क्या, वृक्ष भी उनके साथ जानेको उत्सुक हैं ॥ ३३ ॥
अथोत्तमान्याभरणानि देवि देहि स्नुषायै व्यपनीय चीरम् । न चीरमस्याः प्रविधीयतेति न्यवारयत् तद् वसनं वसिष्ठः ॥ ३४ ॥
' देवि! सीता तेरी पुत्रवधू हैं । इनके शरीरसे
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अयोध्याकाण्डे वल्कल - वस्त्र हटाकर तू इन्हें पहननेके लिये उत्तमोत्तम वस्त्र और आभूषण दे । इनके लिये वल्कल - वस्त्र देना कदापि उचित नहीं है । ' ऐसा कहकर वसिष्ठने उसे जानकीको वल्कल - वस्त्र पहनानेसे मना किया ॥ ३४ ॥
एकस्य रामस्य वने निवास-स्त्वया वृतः केकयराजपुत्रि । विभूषितेयं प्रतिकर्मनित्या वसत्वरण्ये सह राघवेण ॥ ३५ ॥
वे फिर बोले — ' केकयराजकुमारी! तूने अकेले श्रीरामके लिये ही वनवासका वर माँगा है ( सीताके लिये नहीं ); अतः ये राजकुमारी वस्त्राभूषणोंसे विभूषित होकर सदा शृङ्गार धारण करके वनमें श्रीरामचन्द्रजीके साथ निवास करें ॥ ३५ ॥
यानैश्च मुख्यैः परिचारकैश्च सुसंवृता गच्छतु राजपुत्री । अष्टात्रिंशः सर्गः ३४३ । वस्त्रैश्च सर्वैः सहितैर्विधानै-र्नेयं वृता ते वरसम्प्रदाने ॥ ३६ ॥
' राजकुमारी सीता मुख्य - मुख्य सेवकों तथा सवारियोंके उपकरणोंसे समय पहले ( अत: इन्हें तस्मिंस्तथा नैव स्म साथ सब प्रकारके वस्त्रों और आवश्यक सम्पन्न होकर वनकी यात्रा करें । तूने वर माँगते सीताके वनवासकी कोई चर्चा नहीं की थी वल्कल - वस्त्र नहीं पहनाया जा सकता ) ' ॥ जल्पति विप्रमुख्ये नृपस्याप्रतिमप्रभावे । सीता विनिवृत्तभाव प्रियस्य भर्तुः प्रतिकारकामा ॥ ३७ ॥
ब्राह्मणशिरोमणि अप्रतिम प्रभावशाली राजगुरु महर्षि वसिष्ठके ऐसा कहनेपर भी सीता अपने प्रियतम पतिके समान ही वेशभूषा धारण करनेकी इच्छा रखकर उस चीर - धारणसे विरत नहीं हुईं ॥ ३७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
अष्टात्रिंशः सर्गः राजा दशरथका सीताको वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयीको फटकारना और श्रीरामका उनसे कौसल्यापर कृपादृष्टि रखनेके लिये अनुरोध करना
तस्यां चीरं वसानायां नाथवत्यामनाथवत् ।
प्रचुक्रोश जनः सर्वो धिक् त्वां दशरथं त्विति ॥ १ ॥
सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथकी भाँति चीर-वस्त्र धारण करने लगीं, तब सब लोग चिल्ला - चिल्लाकर कहने लगे – ' राजा दशरथ! तुम्हें धिक्कार है! ' ॥१ ॥
तेन तत्र प्रणादेन दुःखितः स महीपतिः ।
चिच्छेद जीविते श्रद्धां धर्में यशसि चात्मनः ॥ २ ॥
स निःश्वस्योष्णमैक्ष्वाकस्तां भार्यामिदमब्रवीत् ।
कैकेयि कुशचीरेण न सीता गन्तुमर्हति ॥ ३ ॥
वहाँ होनेवाले उस कोलाहलसे दुःखी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथने अपने जीवन, धर्म और यशकी उत्कट इच्छा त्याग दी । फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयीसे इस प्रकार बोले-' कैकेयि! सीता कुश - चीर ( वल्कल - वस्त्र ) पहनकर वनमें जानेके योग्य नहीं है ॥ २-३ ॥
सुकुमारी च बाला च सततं च सुखोचिता ।
नेयं वनस्य योग्येति सत्यमाह गुरुर्मम ॥ ४ ॥
' यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखोंमें ही पली है । मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वनमें जाने योग्य नहीं है ॥४ ॥
इयं हि कस्यापि करोति किंचित् तपस्विनी राजवरस्य पुत्री । या जनस्य मध्ये स्थिता विसंज्ञा श्रमणीव काचित् ॥ ५ ॥
' राजाओंमें श्रेष्ठ जनककी यह तपस्विनी पुत्री क्या किसीका भी कुछ बिगाड़ती है? जो इस प्रकार जन - समुदायके बीच किसी किंकर्तव्यविमूढ़ भिक्षुकीके समान चीर धारण करके खड़ी है? ॥ ५ ॥
चीराण्यपास्याज्जनकस्य कन्या नेयं प्रतिज्ञा मम दत्तपूर्वा । यथासुखं गच्छतु राजपुत्री वनं समग्रा सह सर्वरत्नैः ॥ ६ ॥
' जनकनन्दिनी अपने चीर - वस्त्र उतार डाले । ' यह इस रूपमें वन जाय ' ऐसी कोई प्रतिज्ञा मैंने पहले नहीं की है और न किसीको इस तरहका वचन ही दिया है । | अतः राजकुमारी सीता सम्पूर्ण वस्त्रालंकारोंसे सम्पन्न हो
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३४४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सब प्रकारके रत्नोंके साथ जिस तरह भी वह सुखी रह सके, उसी तरह वनको जा सकती है ॥ ६ ॥
अजीवनार्हेण मया नृशंसा कृता प्रतिज्ञा नियमेन तावत् । त्वया हि बाल्यात् प्रतिपन्नमेतत् तन्मा दहेद् वेणुमिवात्मपुष्पम् ॥ ७॥ ।
' मैं जीवित रहनेयोग्य नहीं हूँ । मैंने तेरे वचनोंमें बँधकर एक तो बड़ी क्रूर प्रतिज्ञा कर नादानीके कारण सीताको कर दिया । जिस प्रकार डालता ' है, उसी प्रकार भस्म किये डालती है ॥ रामेण यदि ते पापे अपकारः क इह ते यों ही नियम ( शपथ ) पूर्वक डाली है, दूसरे तूने अपनी इस तरह चीर पहनाना प्रारम्भ बाँसका फूल उसीको सुखा मेरी की हुई प्रतिज्ञा मुझीको ७ ॥
किंचित्कृतमशोभनम् ।
वैदेह्या दर्शितोऽधमे ॥ ८ ॥
' नीच पापिनि! यदि श्रीरामने तेरा कोई अपराध किया है तो ( उन्हें तो तू वनवास दे ही चुकी ) विदेहनन्दिनी सीताने ऐसा दण्ड पानेयोग्य तेरा कौन - सा अपकार कर डाला है? ॥ ८ ॥
मृगीवोत्फुल्लनयना मृदुशीला मनस्विनी ।
अपकारं कमिव ते करोति जनकात्मजा ॥ ९ ॥
' जिसके नेत्र हरिणीके नेत्रोंके समान खिले हुए हैं, जिसका स्वभाव अत्यन्त कोमल एवं मधुर है, वह मनस्विनी जनकनन्दिनी तेरा कौन - सा अपराध कर रही है? ॥ ९ ॥
ननु पर्याप्तमेवं ते पापे रामविवासनम् ।
किमेभिः कृपणैर्भूयः पातकैरपि ते कृतैः ॥ १० ॥
' पापिनि! तूने श्रीरामको वनवास देकर ही पूरा पाप कमा लिया है । अब सीताको भी वनमें भेजने और वल्कल पहनाने आदिका अत्यन्त दुःखद कार्य करके फिर तू इतने पातक किसलिये बटोर रही है? ॥ १० ॥
प्रतिज्ञातं मया तावत् त्वयोक्तं देवि शृण्वता ।
रामं यदभिषेकाय त्वमिहागतमब्रवीः ॥ ११ ॥
' देवि! श्रीराम जब अभिषेकके लिये यहाँ आये थे, उस समय तूने उनसे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर मैंने उतनेके लिये ही प्रतिज्ञा की थी ॥ ११ ॥
तत्त्वेतत् समतिक्रम्य निरयं गन्तुमिच्छसि ।
मैथिलीमपि या हि त्वमीक्षसे चीरवासिनीम् ॥ १२ ॥
' उसका उल्लङ्घन करके जो तू मिथिलेशकुमारी जानकीको भी वल्कल - वस्त्र पहने देखना चाहती है, इससे जान पड़ता है, तुझे नरकमें ही जानेकी इच्छा हो रही है ' ॥ १२ ॥
एवं ब्रुवन्तं पितरं रामः सम्प्रस्थितो वनम् ।
अवाक्शिरसमासीनमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १३ ॥
राजा दशरथ सिर नीचा किये बैठे हुए जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वनकी ओर जाते हुए श्रीरामने पितासे इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥
इयं धार्मिक कौसल्या मम माता यशस्विनी ।
वृद्धा चाक्षुद्रशीला च न च त्वां देव गर्हते ॥ १४ ॥
मया विहीनां वरद प्रपन्नां शोकसागरम् ।
अदृष्टपूर्वव्यसनां भूयः सम्मन्तुमर्हसि ॥ १५ ॥
' धर्मात्मन्! ये मेरी यशस्विनी माता कौसल्या अब वृद्ध हो चली हैं । इनका स्वभाव बहुत ही उच्च और उदार है । देव! यह कभी आपकी निन्दा नहीं करती हैं । इन्होंने पहले कभी ऐसा भारी संकट नहीं देखा होगा । वरदायक नरेश! ये मेरे न रहनेसे शोकके समुद्रमें डूब जायँगी । अतः आप सदा इनका अधिक सम्मान करते रहें ॥ १४-१५ ॥
पुत्रशोकं यथा नच्छॆत् त्वया पूज्येन पूजिता ।
मां हि संचिन्तयन्ती सा त्वयि जीवेत् तपस्विनी ॥ १६ ॥
' आप पूज्यतम पतिसे सम्मानित हो जिस प्रकार यह पुत्रशोकका अनुभव न कर सकें और मेरा चिन्तन करती हुई भी आपके आश्रयमें ही ये मेरी तपस्विनी माता जीवन धारण करें, ऐसा प्रयत्न आपको करना चाहिये ॥ १६ ॥
इमां महेन्द्रोपम जातगर्धिनीं तथा विधातुं जननीं ममार्हसि । यथा वनस्थे मयि शोककर्शिता न जीवितं न्यस्य यमक्षयं व्रजेत् ॥ १७ ॥
' इन्द्रके समान तेजस्वी महाराज! ये निरन्तर अपने बिछुड़े हुए बेटेको देखनेके लिये उत्सुक रहेंगी । कहीं ऐसा न हो मेरे वनमें रहते समय ये शोकसे कातर हो अपने प्राणोंको त्याग करके यमलोकको चली जायँ । अतः आप मेरी माताको सदा ऐसी ही परिस्थितिमें रखें, । जिससे उक्त आशङ्काके लिये अवकाश न रह जाय ' ॥ १७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
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अयोध्याकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ३४५ एकोनचत्वारिंशः सर्गः राजा दशरथका विलाप, उनकी आज्ञासे सुमन्त्रका रामके लिये रथ जोतकर लाना, कोषाध्यक्षका सीताको बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण देना, कौसल्याका सीताको पतिसेवाका उपदेश, सीताके द्वारा उसकी स्वीकृति तथा श्रीरामका अपनी मातासे पिताके प्रति दोषदृष्टि न रखनेका अनुरोध करके अन्य माताओंसे भी विदा माँगना
रामस्य तु वचः श्रुत्वा मुनिवेषधरं च तम् ।
समीक्ष्य सह भार्याभी राजा विगतचेतनः ॥ १ ॥
श्रीरामकी बात सुनकर और उन्हें मुनिवेष धारण किये देख स्त्रियोंसहित राजा दशरथ शोकसे अचेत हो गये ॥ १ ॥
नैनं दुःखेन संतप्तः प्रत्यवैक्षत राघवम् ।
न चैनमभिसम्प्रेक्ष्य प्रत्यभाषत दुर्मनाः ॥ २ ॥
दुःखसे संतप्त होनेके कारण वे श्रीरामकी ओर भर आँख देख भी न सके और देखकर भी मनमें दुःख होनेके कारण उन्हें कुछ उत्तर न दे सके ॥ २ ॥
स मुहूर्तमिवासंज्ञो दुःखितश्च महीपतिः ।
विललाप महाबाहू राममेवानुचिन्तयन् ॥ ३ ॥
दो घड़ीतक अचेत - सा रहनेके बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे महाबाहु नरेश श्रीरामका ही चिन्तन करते हुए दुःखी होकर विलाप करने लगे - ॥ ३ ॥
मन्ये खलु मया पूर्वं विवत्सा बहवः कृताः ।
प्राणिनो हिंसिता वापि तन्मामिदमुपस्थितम् ॥ ४ ॥
' मालूम होता है, मैंने पूर्वजन्ममें अवश्य ही बहुत-सी गौओंका उनके बछड़ोंसे विछोह कराया है अथवा अनेक प्राणियोंकी हिंसा की है, इसीसे आज मेरे ऊपर यह संकट आ पड़ा है ॥४ ॥
न त्वेवानागते काले देहाच्व्यवति जीवितम् ।
कैकेय्या क्लिश्यमानस्य मृत्युर्मम न विद्यते ॥ ५ ॥
' समय पूरा हुए बिना किसीके शरीरसे प्राण नहीं निकलते; तभी तो कैकेयीके द्वारा इतना क्लेश पानेपर भी मेरी मृत्यु नहीं हो रही है ॥५ ॥
योऽहं पावकसंकाशं पश्यामि पुरतः स्थितम् ।
विहाय वसने सूक्ष्मे तापसाच्छादमात्मजम् ॥ ६ ॥
' ओह! अपने अग्निके समान तेजस्वी पुत्रको महीन वस्त्र त्यागकर तपस्वियोंके से वल्कल - वस्त्र धारण किये सामने खड़ा देख रहा हूँ ( फिर भी मेरे प्राण नहीं निकलते हैं ) ॥ ६ ॥
। एकस्याः खलु कैकेय्याः कृतेऽयं खिद्यते जनः ।
स्वार्थे प्रयतमानायाः संश्रित्य निकृतिं त्विमाम् ॥ ७ ॥
' इस वरदानरूप शठताका आश्रय लेकर अपने स्वार्थसाधनके प्रयत्नमें लगी हुई एकमात्र कैकेयीके कारण ये सब लोग महान् कष्टमें पड़ गये हैं'॥७ ॥
एवमुक्त्वा तु वचनं बाष्पेण विहतेन्द्रियः ।
रामेति सकृदेवोक्त्वा व्याहर्तुं न शशाक सः ॥ ८ ॥
' ऐसी बात कहते - कहते राजाके नेत्रोंमें आँसू भर आये । उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं और वे एक ही बार ' हे राम! ' कहकर मूच्छित हो गये । आगे कुछ न बोल सके ' ॥ ८ ॥
संज्ञां तु प्रतिलभ्यैव मुहूर्तात् स महीपतिः ।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
दो घड़ी बाद होशमें आते ही वे महाराज आँसू-भरे नेत्रोंसे देखते हुए सुमन्त्रसे इस प्रकार बोले - ॥ ९ ॥
औपवाह्यं रथं युक्त्वा त्वमायाहि हयोत्तमैः ।
प्रापयैनं महाभागमितो जनपदात् परम् ॥१० ॥
' तुम सवारीके योग्य एक रथको उसमें उत्तम घोड़े जोतकर यहाँ ले आओ और इन महाभाग श्रीरामको उसपर बिठाकर इस जनपदसे बाहरतक पहुँचा आओ ॥ १० ॥
एवं मन्ये गुणवतां गुणानां फलमुच्यते ।
पित्रा मात्रा च यत्साधुर्वीरो निर्वास्यते वनम् ॥ ११ ॥
' अपने श्रेष्ठ वीर पुत्रको स्वयं माता - पिता ही जब घरसे निकालकर वनमें भेज रहे हैं, तब ऐसा मालूम होता है कि शास्त्रमें गुणवान् पुरुषोंके गुणोंका यही फल बताया जाता है ' ॥ ११ ॥
राज्ञो वचनमाज्ञाय सुमन्त्रः शीघ्रविक्रमः ।
योजयित्वा ययौ तत्र रथमश्वैरलंकृतम् ॥ १२ ॥
राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करके शीघ्रगामी सुमन्त्र गये और उत्तम घोड़ोंसे सुशोभित रथ जोतकर | ले आये ॥ १२ ॥
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३४६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
तं रथं राजपुत्राय सूतः कनकभूषितम् ।
आचचक्षेऽञ्जलिं कृत्वा युक्तं परमवाजिभिः ॥ १३ ॥
फिर सूत सुमन्त्रने हाथ जोड़कर कहा - ' महाराज! राजकुमार श्रीरामके लिये उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ सुवर्णभूषित रथ तैयार है ' ॥ १३ ॥
राजा सत्वरमाहूय व्यापृतं वित्तसंचये ।
उवाच देशकालज्ञो निश्चितं सर्वतः शुचिः ॥ १४ ॥
तब देश और कालको समझनेवाले, सब ओरसे शुद्ध ( इहलोक और परलोकसे उऋण ) राजा दशरथने तुरंत ही धन - संग्रहके व्यापारमें नियुक्त कोषाध्यक्षको बुलाकर यह निश्चित बात कही - ॥ १४ ॥
वासांसि च वरार्हाणि भूषणानि महान्ति च ।
वर्षाण्येतानि संख्याय वैदेह्याः क्षिप्रमानय ॥ १५ ॥
' तुम विदेहकुमारी सीताके पहननेयोग्य बहुमूल्य वस्त्र और महान् आभूषण जो चौदह वर्षोंके लिये पर्याप्त हों, गिनकर शीघ्र ले आओ ' ॥ १५ ॥
नरेन्द्रेणैवमुक्तस्तु गत्वा कोशगृहं ततः ।
प्रायच्छत् सर्वमाहृत्य सीतायै क्षिप्रमेव तत् ॥ १६ ॥
महाराजके ऐसा कहनेपर कोषाध्यक्षने खजानेमें जा वहाँसे सब चीजें लाकर शीघ्र ही सीताको समर्पित कर दीं ॥ १६ ॥
सा सुजाता सुजातानि वैदेही प्रस्थिता वनम् ।
भूषयामास गात्राणि तैर्विचित्रैर्विभूषणैः ॥ १७ ॥
उत्तम कुलमें उत्पन्न अथवा अयोनिजा और वनवासके लिये प्रस्थित विदेहकुमारी सीताने सुन्दर लक्षणोंसे युक्त अपने सभी अङ्गोंको उन विचित्र आभूषणोंसे विभूषित किया ॥ १७ ॥
व्यराजयत वैदेही वेश्म तत् सुविभूषिता ।
उद्यतोंऽशुमतः काले खं प्रभेव विवस्वतः ॥ १८ ॥
उन आभूषणोंसे विभूषित हुई विदेहनन्दिनी सीता उस घरको उसी प्रकार सुशोभित करने लगीं, जैसे प्रातःकाल उगते हुए अंशुमाली सूर्यकी प्रभा आकाशको प्रकाशित करती है ॥ १८ ॥
तां भुजाभ्यां परिष्वज्य श्वश्रूर्वचनमब्रवीत् ।
अनाचरन्तीं कृपणं मूर्क्युपाघ्राय मैथिलीम् ॥ १ ९ ॥
उस समय सास कौसल्याने कभी दुःखद बर्ताव न करनेवाली मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया और उनके मस्तकको सूँघकर कहा— ॥ १ ९ ॥
असत्यः सर्वलोकेऽस्मिन् सततं सत्कृताः प्रियैः ।
भर्तारं नानुमन्यन्ते विनिपातगतं स्त्रियः ॥ २० ॥
‘ बेटी! जो स्त्रियाँ अपने प्रियतम पतिके द्वारा सदा सम्मानित होकर भी संकटमें पड़नेपर उसका आदर नहीं करती हैं, वे इस सम्पूर्ण जगत् में ' असती ' ( दुष्टा ) के नामसे पुकारी जाती हैं ॥ २० ॥
एष स्वभावो नारीणामनुभूय पुरा सुखम् ।
अल्पामप्यापदं प्राप्य दुष्यन्ति प्रजहत्यपि ॥ २१ ॥
' दुष्टा स्त्रियोंका यह स्वभाव होता है कि पहले तो वे पतिके द्वारा यथेष्ट सुख भोगती हैं, परंतु जब वह थोड़ी - सी भी विपत्तिमें पड़ता है, तब उसपर दोषारोपण करती और उसका साथ छोड़ देती हैं ॥ २१ ॥
असत्यशीला विकृता दुर्गा अहृदयाः सदा ।
असत्यः पापसंकल्पाः क्षणमात्रविरागिणः ॥ २२ ॥
' जो झूठ बोलनेवाली, विकृत चेष्टा करनेवाली, दुष्ट पुरुषोंसे संसर्ग रखनेवाली, पतिके प्रति सदा हृदयहीनताका परिचय देनेवाली, कुलटा, पापके ही मनसूबे बाँधनेवाली और छोटी - सी बातके लिये भी क्षणमात्रमें पतिकी ओरसे विरक्त हो जानेवाली हैं, वे सब - की - सब असती या दुष्टा कही गयी हैं ॥ २२ ॥
न कुलं न कृतं विद्या न दत्तं नापि संग्रहः ।
स्त्रीणां गृह्णाति हृदयमनित्यहृदया हि ताः ॥ २३ ॥
' उत्तम कुल, किया हुआ उपकार, विद्या, भूषण आदिका दान और संग्रह ( पतिके द्वारा स्नेहपूर्वक अपनाया जाना ), यह सब कुछ दुष्टा स्त्रियोंके हृदयको नहीं वशमें कर पाता है; क्योंकि उनका चित्त अव्यवस्थित होता है ॥
साध्वीनां तु स्थितानां तु शीले सत्ये श्रुते स्थिते ।
स्त्रीणां पवित्रं परमं पतिरेको विशिष्यते ॥ २४ ॥
' इसके विपरीत जो सत्य, सदाचार, शास्त्रोंकी आज्ञा और कुलोचित मर्यादाओंमें स्थित रहती हैं, उन साध्वी स्त्रियोंके लिये एकमात्र पति ही परम पवित्र एवं सर्वश्रेष्ठ देवता है ॥ २४ ॥
स त्वया नावमन्तव्यः पुत्रः प्रव्राजितो वनम् ।
तव देवसमस्त्वेष निर्धनः सधनोऽपि वा ॥ २५ ॥
' इसलिये तुम मेरे पुत्र श्रीरामका, जिन्हें वनवासकी आज्ञा मिली है, कभी अनादर न करना । ये निर्धन हों या धनी, तुम्हारे लिये देवताके तुल्य हैं ' ॥ २५ ॥
विज्ञाय वचनं सीता तस्या धर्मार्थसंहितम् ।
कृत्वाञ्जलिमुवाचेदं श्वश्रूमभिमुखे स्थिता ॥ २६ ॥
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अयोध्याकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ३४७ सासके धर्म और अर्थयुक्त वचनोंका तात्पर्य । भलीभाँति समझकर उनके सामने खड़ी हुई सीताने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ २६ ॥
करिष्ये सर्वमेवाहमार्या यदनुशास्ति माम् ।
अभिज्ञास्मि यथा भर्तुर्वर्तितव्यं श्रुतं च मे ॥ २७ ॥
' आर्ये! आप मेरे लिये जो कुछ उपदेश दे रही हैं, मैं उसका पूर्णरूपसे पालन करूँगी । स्वामीके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, यह मुझे भलीभाँति विदित है; क्योंकि इस विषयको मैंने पहलेसे ही सुन रखा है ।
न मामसज्जनेनार्या समानयितुमर्हति ।
धर्माद् विचलितुं नाहमलं चन्द्रादिव प्रभा ॥ २८ ॥
' पूजनीया माताजी! आपको मुझे असती स्त्रियोंके समान नहीं मानना चाहिये; क्योंकि जैसे प्रभा चन्द्रमासे दूर नहीं हो सकती, उसी प्रकार मैं पतिव्रत - धर्मसे विचलित नहीं हो सकती ॥ २८ ॥
नातन्त्री वाद्यते वीणा नाचक्रो विद्यते रथः ।
नापतिः सुखमेधेत या स्यादपि शतात्मजा ॥ २ ९ ॥
' जैसे बिना तारकी वीणा नहीं बज सकती और बिना पहियेका रथ नहीं चल सकता है, उसी प्रकार नारी सौ बेटोंकी माता होनेपर भी बिना पतिके सुखी नहीं हो सकती ॥ २ ९ ॥
मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः ।
अमितस्य तु दातारं भर्तारं का न पूजयेत् ॥ ३० ॥
' पिता, भ्राता और पुत्र - ये परिमित सुख प्रदान करते हैं, परंतु पति अपरिमित सुखका दाता है— उसकी सेवासे इहलोक और परलोक दोनोंमें कल्याण होता है; अतः ऐसी कौन स्त्री है, जो अपने पतिका सत्कार नहीं करेगी ॥ ३० ॥
साहमेवंगता श्रुतधर्मपरावरा ।
आर्ये किमवमन्येयं स्त्रिया भर्ता हि दैवतम् ॥ ३१ ॥
' आर्ये! मैंने श्रेष्ठ स्त्रियों - माता आदिके मुखसे नारीके सामान्य और विशेष धर्मोंका श्रवण किया है । इस प्रकार पातिव्रत्यका महत्त्व जानकर भी मैं पतिका क्यों अपमान करूँगी? मैं जानती हूँ कि पति ही स्त्रीका देवता है'॥३१ ॥
सीताया वचनं श्रुत्वा कौसल्या हृदयङ्गमम् ।
शुद्धसत्त्वा मुमोचाश्रु सहसा दुःखहर्षजम् ॥ ३२ ॥
सीताका यह मनोहर वचन सुनकर शुद्ध अन्तःकरणवाली देवी कौसल्याके नेत्रोंसे सहसा दुःख और हर्षके आँसू बहने लगे ॥ ३२ ॥
तां प्राञ्जलिरभिप्रेक्ष्य मातृमध्येऽतिसत्कृताम् ।
रामः परमधर्मात्मा मातरं वाक्यमब्रवीत् ॥ ३३ ॥
तब परम धर्मात्मा श्रीरामने माताओंके बीचमें अत्यन्त सम्मानित होकर खड़ी हुई माता कौसल्याकी ओर देख हाथ जोड़कर कहा- ॥ ३३ ॥
अम्ब मा दुःखिता भूत्वा पश्येस्त्वं पितरं मम ।
क्षयोऽपि वनवासस्य क्षिप्रमेव भविष्यति ॥ ३४ ॥
' माँ! ( इन्हींके कारण मेरे पुत्रका वनवास हुआ है; ऐसा समझकर ) तुम मेरे पिताजीकी ओर दुःखित होकर न देखना । वनवासकी अवधि भी शीघ्र ही समाप्त हो जायगी ॥ ३४ ॥
सुप्तायास्ते गमिष्यन्ति नव वर्षाणि पञ्च च ।
समग्रमिह सम्प्राप्तं मां द्रक्ष्यसि सुहृद्वृतम् ॥ ३५ ॥
' ये चौदह वर्ष तो तुम्हारे सोते - सोते निकल जायँगे, फिर एक दिन देखोगी कि मैं अपने सुहृदोंसे घिरा हुआ सीता और लक्ष्मणके साथ सम्पूर्णरूपसे यहाँ आ पहुँचा हूँ ' ॥ ३५ ॥
एतावदभिनीतार्थमुक्त्वा स जननीं वचः ।
त्रयः शतशतार्धा हि ददर्शावेक्ष्य मातरः ॥ ३६ ॥
ताश्चापि स तथैवार्ता मातृर्दशरथात्मजः ।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं निजगाद कृताञ्जलिः ॥ ३७ ॥
मातासे इस प्रकार अपना निश्चित अभिप्राय बताकर दशरथनन्दन श्रीरामने अपनी अन्य साढ़े तीन सौ माताओं ओर दृष्टिपात किया और उनको भी कौसल्याकी ही भाँति शोकाकुल पाया । तब उन्होंने हाथ जोड़कर उन सबसे यह धर्मयुक्त बात कही - ॥ ३६-३७ ॥
संवासात् परुषं किंचिदज्ञानादपि यत् कृतम् ।
तन्मे समुपजानीत सर्वाश्चामन्त्रयामि वः ॥ ३८ ॥
' माताओ! सदा एक साथ रहनेके कारण मैंने जो कुछ कठोर वचन कह दिये हों अथवा अनजानमें भी मुझसे जो अपराध बन गये हों, उनके लिये आप मुझे क्षमा कर दें । मैं आप सब माताओंसे विदा माँगता हूँ ' ॥ ३८ ॥
वचनं राघवस्यैतद् धर्मयुक्तं समाहितम् ।
शुश्रुवुस्ताः स्त्रियः सर्वाः शोकोपहतचेतसः ॥ ३ ९ ॥
राजा दशरथकी उन सभी स्त्रियोंने श्रीरघुनाथजीका यह समाधानकारी धर्मयुक्त वचन सुना, सुनकर उन सबका चित्त शोकसे व्याकुल हो गया ॥ ३ ९ ॥
जज्ञेऽथ तासां संनादः क्रौञ्चीनामिव निःस्वनः ।
मानवेन्द्रस्य भार्याणामेवं वदति राघवे ॥ ४० ॥
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३४८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे श्रीरामके ऐसी बात कहते समय महाराज | विलपितपरिदेवनाकुलं दशरथकी रानियाँ कुररियोंके समान विलाप करने व्यसनगतं तदभूत् सुदुःखितम् ॥ ४१ ॥
लगीं । उनका वह आर्तनाद उस राजभवनमें सब ओर राजा दशरथका जो भवन पहले मुरज, पणव और गूँज उठा ॥ ४० ॥ मेघ आदि वाद्योंके गम्भीर घोषसे गूँजता रहता था, वही
मुरजपणवमेघघोषवद् विलाप और रोदनसे व्याप्त हो संकटमें पड़कर अत्यन्त
दशरथवेश्म बभूव यत् पुरा । दुःखमय प्रतीत होने लगा ॥ ४१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ९ ॥ चत्वारिंशः सर्गः सीता, राम और लक्ष्मणका दशरथकी परिक्रमा करके कौसल्या आदिको प्रणाम करना, सुमित्राका लक्ष्मणको उपदेश, सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मणका रथमें बैठकर वनकी ओर प्रस्थान, पुरवासियों तथा रानियोंसहित महाराज दशरथकी
अथ रामश्च सीता च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः ।
उपसंगृह्य राजानं चक्रुर्दीनाः प्रदक्षिणम् ॥ १ ॥
तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीताने हाथ जोड़कर दीनभावसे राजा दशरथके चरणोंका स्पर्श करके उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की ॥ १ ॥
तं चापि समनुज्ञाप्य धर्मज्ञः सह सीतया ।
राघवः शोकसम्मूढो जननीमभ्यवादयत् ॥ २ ॥
उनसे विदा लेकर सीतासहित धर्मज्ञ रघुनाथजीने माताका कष्ट देखकर शोकसे व्याकुल हो उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ २ ॥
अन्वक्षं लक्ष्मणो भ्रातुः कौसल्यामभ्यवादयत् ।
अपि मातुः सुमित्राया जग्राह चरणौ पुनः ॥ ३ ॥
श्रीरामके बाद लक्ष्मणने भी पहले माता कौसल्याको प्रणाम किया, फिर अपनी माता सुमित्राके भी दोनों पैर पकड़े ॥ ३ ॥
तं वन्दमानं रुदती माता सौमित्रिमब्रवीत् ।
हितकामा महाबाहुं मूर्म्युपाघ्राय लक्ष्मणम् ॥ ४ ॥
अपने पुत्र महाबाहु लक्ष्मणको प्रणाम करते देख उनका हित चाहनेवाली माता सुमित्राने बेटेका मस्तक सूँघकर कहा -॥४ ॥
सृष्टस्त्वं वनवासाय स्वनुरक्तः सुहृज्जने ।
रामे प्रमादं मा कार्षीः पुत्र भ्रातरि गच्छति ॥ ५॥
‘ वत्स! तुम अपने सुहृद् श्रीरामके परम अनुरागी हो, इसलिये मैं तुम्हें वनवासके लिये विदा करती हूँ । शोकाकुल अवस्था अपने बड़े भाईके वनमें इधर - उधर जाते समय तुम उनकी सेवामें कभी प्रमाद न करना ॥ ५ ॥
व्यसनी वा समृद्धो वा गतिरेष तवानघ ।
एष लोके सतां धर्मो यज्ज्येष्ठवशगो भवेत् ॥६ ॥
' ये संकटमें हों या समृद्धिमें, ये ही तुम्हारी परम गति हैं । निष्पाप लक्ष्मण! संसारमें सत्पुरुषोंका यही धर्म है कि सर्वदा अपने बड़े भाईकी आज्ञाके अधीन रहें ॥
इदं हि वृत्तमुचितं कुलस्यास्य सनातनम् ।
दानं दीक्षा च यज्ञेषु तनुत्यागो मृधेषु हि ॥ ७ ॥
' दान देना, यज्ञमें दीक्षा ग्रहण करना और युद्धमें शरीर त्यागना - यही इस कुलका उचित एवं सनातन आचार है ' ॥ ७ ॥
लक्ष्मणं त्वेवमुक्त्वासौ संसिद्धं प्रियराघवम् ।
सुमित्रा गच्छ गच्छेति पुनः पुनरुवाच तम् ॥८ ॥
अपने पुत्र लक्ष्मणसे ऐसा कहकर सुमित्राने वनवासके लिये निश्चित विचार रखनेवाले सर्वप्रिय श्रीरामचन्द्रजीसे कहा- ' बेटा! जाओ, जाओ ( तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो ) । ' इसके बाद वे लक्ष्मणसे फिर बोलीं- ॥८ ॥
रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् ।
अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम् ॥ ९ ॥
' बेटा! तुम श्रीरामको ही अपने पिता महाराज दशरथ समझो, जनकनन्दिनी सीताको ही अपनी माता सुमित्रा मानो और वनको ही अयोध्या जानो । अब । सुखपूर्वक यहाँसे प्रस्थान करो ' ॥ ९ ॥