श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 361–370

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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अयोध्याकाण्डे

ततः सुमन्त्रः काकुत्स्थं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।

विनीतो विनयज्ञश्च मातलिर्वासवं यथा ॥ १० ॥

इसके बाद जैसे मातलि इन्द्रसे कोई बात कहते हैं, उसी प्रकार विनयके ज्ञाता सुमन्त्रने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामसे विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा - ॥ १० ॥

रथमारोह भद्रं ते राजपुत्र महायशः ।

क्षिप्रं त्वां प्रापयिष्यामि यत्र मां राम वक्ष्यसे ॥ ११ ॥

' महायशस्वी राजकुमार श्रीराम! आपका कल्याण हो । आप इस रथपर बैठिये । आप मुझसे जहाँ कहेंगे, वहीँ मैं शीघ्र आपको पहुँचा दूँगा ॥११ ॥

चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यानि वने त्वया ।

तान्युपक्रमितव्यानि यानि देव्या प्रचोदितः ॥ १२ ॥

' आपको जिन चौदह वर्षोंतक वनमें रहना है, उनकी गणना आजसे ही आरम्भ हो जानी चाहिये; क्योंकि देवी कैकेयीने आज ही आपको वनमें जानेके लिये प्रेरित किया है ' ॥ १२ ॥

तं रथं सूर्यसंकाशं सीता हृष्टेन चेतसा ।

आरुरोह वरारोहा कृत्वालंकारमात्मनः ॥ १३ ॥

तब सुन्दरी सीता अपने अङ्गोंमें उत्तम अलंकार धारण करके प्रसन्न चित्तसे उस सूर्यके समान तेजस्वी रथपर आरूढ़ हुईं ॥ १३ ॥

वनवासं हि संख्याय वासांस्याभरणानि च ।

भर्तारमनुगच्छन्त्यै सीतायै श्वशुरो ददौ ॥ १४ ॥

पतिके साथ जानेवाली सीताके लिये उनके श्वशुरने वनवासकी वर्षसंख्या गिनकर उसके अनुसार ही वस्त्र और आभूषण दिये थे ॥ १४ ॥

तथैवायुधजातानि भ्रातृभ्यां कवचानि च ।

रथोपस्थे प्रविन्यस्य सचर्म कठिनं च यत् ॥ १५ ॥

इसी प्रकार महाराजने दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणके लिये जो बहुत - से अस्त्र - शस्त्र और कवच प्रदान किये थे, उन्हें रथके पिछले भागमें रखकर उन्होंने चमड़ेसे मढ़ी हुई पिटारी और खन्ती या कुदारी भी उसीपर रख दी ॥ १५ ॥

अथो ज्वलनसंकाशं चामीकरविभूषितम् ।

तमारुरुहतुस्तूर्णं भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १६ ॥

इसके बाद दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस अग्निके समान दीप्तिमान् सुवर्णभूषित रथपर शीघ्र ही आरूढ़ हो गये ॥ १६ ॥

सीतातृतीयानारूढान् दृष्ट्वा रथमचोदयत् ।

सुमन्त्रः सम्मतानश्वान् वायुवेगसमाञ्जवे ॥ १७॥

चत्वारिंशः सर्गः ३४ ९ जिनमें सीताकी संख्या तीसरी थी, उन श्रीराम आदिको रथपर आरूढ़ हुआ देख सारथि सुमन्त्रने रथको आगे बढ़ाया । उसमें जुते हुए वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंको हाँका ॥ १७ ॥

प्रयाते तु महारण्यं चिररात्राय राघवे ।

बभूव नगरे मूर्च्छा बलमूर्च्छा जनस्य च ॥ १८ ॥

जब श्रीरामचन्द्रजी सुदीर्घकालके लिये महान् वनकी ओर जाने लगे, उस समय समस्त पुरवासियों, सैनिकों तथा दर्शकरूपमें आये हुए बाहरी लोगोंको भी मूर्च्छा आ गयी ॥ १८ ॥

तत् समाकुलसम्भ्रान्तं मत्तसंकुपितद्विपम् ।

हयसिञ्जितनिर्घोषं पुरमासीन्महास्वनम् ॥ १ ९ ॥

उस समय सारी अयोध्यामें महान् कोलाहल मच गया । सब लोग व्याकुल होकर घबरा उठे । मतवाले हाथी श्रीरामके वियोगसे कुपित हो उठे और इधर - उधर भागते हुए घोड़ोंके हिनहिनाने एवं उनके आभूषणोंके खनखनानेकी आवाज सब ओर गूँजने लगी ॥ १ ९ ॥

ततः सबालवृद्धा सा पुरी परमपीडिता ।

राममेवाभिदुद्राव घर्मार्तः सलिलं यथा ॥ २० ॥

अयोध्यापुरीके आबाल वृद्ध सब लोग अत्यन्त पीड़ित होकर श्रीरामके ही पीछे दौड़े, मानो धूपसे पीड़ित हुए प्राणी पानीकी ओर भागे जाते हों ॥ २० ॥

पार्श्वतः पृष्ठतश्चापि लम्बमानास्तदुन्मुखाः ।

बाष्पपूर्णमुखाः सर्वे तमूचुर्भृशनिःस्वनाः ॥ २१ ॥

उनमें से कुछ लोग रथके पीछे और अगल-बगलमें लटक गये । सभी श्रीरामके लिये उत्कण्ठित थे और सबके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । वे सब - के - सब उच्चस्वरसे कहने लगे - ॥ २१ ॥

संयच्छ वाजिनां रश्मीन् सूत याहि शनैः शनैः ।

मुखं द्रक्ष्याम रामस्य दुर्दर्शं नो भविष्यति ॥ २२ ॥

' सूत! घोड़ोंकी लगाम खींचो । रथको धीरे - धीरे ले चलो । हम श्रीरामका मुख देखेंगे; क्योंकि अब इस मुखका दर्शन हमलोगोंके लिये दुर्लभ हो जायगा ॥ २२ ॥

आयसं हृदयं नूनं राममातुरसंशयम् ।

यद् देवगर्भप्रतिमे वनं याति न भिद्यते ॥ २३ ॥

निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीकी माताका हृदय लोहेका बना हुआ है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है । तभी तो देवकुमारके समान तेजस्वी पुत्रके वनकी ओर जाते । समय फट नहीं जाता है ॥ २३ ॥

पृष्ठ 362

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३५० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

कृतकृत्या हि वैदेही छायेवानुगता पतिम् ।

न जहाति रता धर्मे मेरुमर्कप्रभा यथा ॥ २४ ॥

' विदेहनन्दिनी सीता कृतार्थ हो गयीं; क्योंकि वे पतिव्रत - धर्ममें तत्पर रहकर छायाकी भाँति पतिके पीछे - पीछे चली जा रही हैं । वे श्रीरामका साथ उसी प्रकार नहीं छोड़ती हैं, जैसे सूर्यकी प्रभा मेरुपर्वतका त्याग नहीं करती है ॥ २४ ॥

अहो लक्ष्मण सिद्धार्थः सततं प्रियवादिनम् ।

भ्रातरं देवसंकाशं यस्त्वं परिचरिष्यसि ॥ २५ ॥

' अहो लक्ष्मण! तुम भी कृतार्थ हो गये; क्योंकि तुम सदा प्रिय वचन बोलनेवाले अपने देवतुल्य भाईकी वनमें सेवा करोगे ॥ २५ ॥

महत्येषा हि ते बुद्धिरेष एष स्वर्गस्य मार्गश्च ' तुम्हारी यह बुद्धि महान् अभ्युदय है और मार्ग मिल गया है; क्योंकि रहे हो ' ॥ २६ ॥

एवं वदन्तस्ते सोढुं न

चाभ्युदयो महान् ।

यदेनमनुगच्छसि ॥ २६ ॥

विशाल है । तुम्हारा यह तुम्हारे लिये यह स्वर्गका तुम श्रीरामका अनुसरण कर

शेकुर्बाष्पमागतम् ।

नरास्तमनुगच्छन्ति प्रियमिक्ष्वाकुनन्दनम् ॥ २७ ॥

ऐसी बातें कहते हुए वे पुरवासी मनुष्य उमड़े हुए आँसुओंका वेग न सह सके । वे लोग सबके प्रेमपात्र इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीके पीछे - पीछे चले जा रहे थे ॥ २७ ॥

अथ राजा वृतः स्त्रीभिर्दीनाभिर्दीनचेतनः ।

निर्जगाम प्रियं पुत्रं द्रक्ष्यामीति ब्रुवन् गृहात् ॥ २८ ॥

उसी समय दयनीय दशाको प्राप्त हुई अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए राजा दशरथ अत्यन्त दीन होकर ' मैं अपने प्यारे पुत्र श्रीरामको देखूँगा ' ऐसा कहते हुए महलसे बाहर निकल आये ॥ २८ ॥

शुश्रुवे चाग्रतः स्त्रीणां रुदतीनां महास्वनः ।

यथा नादः करेणूनां बद्धे महति कुञ्जरे ॥ २ ९ ॥

उन्होंने अपने आगे रोती हुई स्त्रियोंका महान् आर्तनाद सुना । वह वैसा ही जान पड़ता था, जैसे बड़े हाथी यूथपतिके बाँध लिये जानेपर हथिनियोंका चीत्कार सुनायी देता है ॥ २ ९ ॥

पिता हि राजा काकुत्स्थः श्रीमान् सन्नस्तदा बभौ ।

परिपूर्णः शशी काले ग्रहेणोपप्लुतो यथा ॥ ३० ॥

उस समय श्रीरामके पिता ककुत्स्थवंशी श्रीमान् राजा दशरथ उसी तरह खिन्न जान पड़ते थे, जैसे पर्वके समय राहुसे ग्रस्त होनेपर पूर्ण चन्द्रमा श्रीहीन प्रतीत होते हैं ॥ ३० ॥

स च श्रीमानचिन्त्यात्मा रामो दशरथात्मजः ।

सूतं संचोदयामास त्वरितं वाह्यतामिति ॥ ३१ ॥

यह देख अचिन्त्यस्वरूप दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् रामने सुमन्त्रको प्रेरित करते हुए कहा- ' आप रथको तेजीसे चलाइये ' ॥ ३१ ॥

राम्रो याहीति तं सूतं तिष्ठेति च जनस्तथा ।

उभयं नाशकत् सूतः कर्तुमध्वनि चोदितः ॥ ३२ ॥

एक ओर श्रीरामचन्द्रजी सारथिसे रथ हाँकने लिये कहते थे और दूसरी ओर सारा जनसमुदाय उन्हें ठहर जानेके लिये कहता था । इस प्रकार दुविधामें पड़कर सारथि सुमन्त्र उस मार्गपर दोनोंमेंसे कुछ न कर सके- न तो रथको आगे बढ़ा सके और न सर्वथा रोक ही सके ॥ ३२ ॥

निर्गच्छति महाबाहौ रामे पौरजनाश्रुभिः ।

पतितैरभ्यवहितं प्रणनाश महीरजः ॥ ३३ ॥

महाबाहु श्रीरामके नगरसे निकलते समय पुरवासियोंके नेत्रोंसे गिरे हुए आँसुओं द्वारा भीगकर धरतीकी उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी ॥ ३३ ॥

रुदिताश्रुपरिद्यूनं हाहाकृतमचेतनम् ।

प्रयाणे राघवस्यासीत् पुरं परमपीडितम् ॥ ३४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके प्रस्थान करते समय सारा नगर अत्यन्त पीड़ित हो गया । सब रोने और आँसू बहाने लगे तथा सभी हाहाकार करते - करते अचेत - से हो गये ॥ ३४ ॥

सुस्राव नयनैः स्त्रीणामस्त्रमायाससम्भवम् ।

मीनसंक्षोभचलितैः सलिलं पङ्कजैरिव ॥ ३५ ॥

नारियोंके नेत्रोंसे उसी तरह खेदजनित अश्रु झर रहे थे, जैसे मछलियोंके उछलनेसे हिले हुए कमलोंद्वारा जलकणोंकी वर्षा होने लगती है ॥ ३५ ॥

दृष्ट्वा तु नृपतिः श्रीमानेकचित्तगतं पुरम् ।

निपपातैव दुःखेन कृत्तमूल इव द्रुमः ॥ ३६ ॥

श्रीमान् राजा दशरथ सारी अयोध्यापुरीके लोगोंको एक - सा व्याकुलचित्त देखकर अत्यन्त दुःखके कारण जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति भूमिपर गिर पड़े ॥ ३६ ॥

ततो हलहलाशब्दो जज्ञे रामस्य पृष्ठतः ।

नराणां प्रेक्ष्य राजानं सीदन्तं भृशदुःखितम् ॥ ३७ ॥

उस समय राजाको अत्यन्त दुःखमें मग्न हो कष्ट पाते देख श्रीरामके पीछे जाते हुए मनुष्योंका पुनः महान् कोलाहल प्रकट हुआ ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 363

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अयोध्याकाण्डे

हा रामेति जनाः केचिद् राममातेति चापरे ।

अन्तःपुरसमृद्धं च क्रोशन्तं पर्यदेवयन् ॥ ३८ ॥ ।

अन्तःपुरकी रानियोंके सहित राजा दशरथको उच्चस्वरसे विलाप करते देख कोई ' हा राम! ' कहकर और कोई ' हा राममाता! ' की पुकार मचाकर करुणक्रन्दन करने लगे ॥३८ ॥

अन्वीक्षमाणो रामस्तु विषण्णं भ्रान्तचेतसम् ।

राजानं मातरं चैव ददर्शानुगतौ पथि ॥ ३ ९ ॥

उस समय श्रीरामचन्द्रजीने पीछे घूमकर देखा तो उन्हें विषादग्रस्त तथा भ्रान्तचित्त पिता राजा दशरथ और दुःखमें डूबी हुई माता कौसल्या दोनों ही मार्गपर अपने पीछे आते हुए दिखायी दिये ॥ ३ ९ ॥

स बद्ध इव पाशेन किशोरो मातरं यथा ।

धर्मपाशेन संयुक्तः प्रकाशं नाभ्युदैक्षत ॥ ४० ॥

जैसे रस्सीमें बँधा हुआ घोड़ेका बच्चा अपनी माको नहीं देख पाता, उसी प्रकार धर्मके बन्धनमें बँधे हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी माताकी ओर स्पष्टरूपसे न देख सके ॥४० ॥

पदातिनौ च यानार्हावदुःखाह सुखोचितौ ।

दृष्ट्वा संचोदयामास शीघ्रं याहीति सारथिम् ॥ ४१ ॥

जो सवारीपर चलने योग्य, दुःख भोगनेके अयोग्य और सुख भोगनेके ही योग्य थे, उन माता - पिताको पैदल ही अपने पीछे - पीछे आते देख श्रीरामचन्द्रजीने सारथिको शीघ्र रथ हाँकनेके लिये प्रेरित किया ॥ ४१ ॥

नहि तत् पुरुषव्याघ्रो दुःखजं दर्शनं पितुः ।

मातुश्च सहितुं शक्तस्तोत्रैर्नुन्न इव द्विपः ॥ ४२ ॥

जैसे अंकुशसे पीड़ित किया हुआ गजराज उस कष्टको नहीं सहन कर पाता है, उसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीरामके लिये माता - पिताको इस दुःखद अवस्थामें देखना असह्य हो गया ॥ ४२ ॥

प्रत्यगारमिवायान्ती सवत्सा वत्सकारणात् ।

बद्धवत्सा यथा धेनू राममाताभ्यधावत ॥ ४३ ॥

जैसे बँधे हुए बछड़ेवाली सवत्सा गौ शामको घरकी ओर लौटते समय बछड़ेके स्नेहसे दौड़ी चली आती है, उसी प्रकार श्रीरामकी माता कौसल्या उनकी ओर दौड़ी आ रही थीं ॥ ४३ ॥

तथा रुदन्तीं कौसल्यां रथं तमनुधावतीम् ।

क्रोशन्तीं राम रामेति हा सीते लक्ष्मणेति च ॥ ४४ ॥

रामलक्ष्मणसीतार्थं स्रवन्तीं वारि नेत्रजम् ।

असकृत् प्रैक्षत स तां नृत्यन्तीमिव मातरम् ॥ ४५ ॥

चत्वारिंशः सर्गः ३५१ ' हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! ' की रट लगाती और रोती हुई कौसल्या उस रथके पीछे दौड़ रही थीं । वे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके लिये नेत्रोंसे आँसू बहा रही थीं एवं इधर - उधर नाचती - चक्कर लगाती - सी डोल रही थीं । इस अवस्थामें माता कौसल्याको श्रीरामचन्द्रजीने बारंबार देखा ॥ ४४-४५ ॥

तिष्ठेति राजा चुक्रोश याहि याहीति राघवः ।

सुमन्त्रस्य बभूवात्मा चक्रयोरिव चान्तरा ॥ ४६ ॥

राजा दशरथ चिल्लाकर कहते थे- ' सुमन्त्र! ठहरो । ' किंतु श्रीरामचन्द्रजी कहते थे- ' आगे बढ़िये, शीघ्र आगे बढ़िये । ' उन दो प्रकारके आदेशोंमें पड़े हुए बेचारे सुमन्त्रका मन उस समय दो पहियोंके बीचमें फँसे हुए मनुष्यका - सा हो रहा था ॥ ४६ ॥

नाश्रौषमिति राजानमुपालब्धोऽपि वक्ष्यसि ।

चिरं दुःखस्य पापिष्ठमिति रामस्तमब्रवीत् ॥ ४७ ॥

उस समय श्रीरामने सुमन्त्रसे कहा- ' यहाँ अधिक विलम्ब करना मेरे और पिताजीके लिये दुःख ही नहीं, महान् दुःखका कारण होगा; इसलिये रथ आगे बढ़ाइये । लौटनेपर महाराज उलाहना दें तो कह दीजियेगा, मैंने आपकी बात नहीं सुनी ' ॥४७ ॥

स रामस्य वचः कुर्वन्ननुज्ञाप्य च तं जनम् ।

व्रजतोऽपि हयान् शीघ्रं चोदयामास सारथिः ॥ ४८ ॥

अन्तमें श्रीरामके ही आदेशका पालन करते हुए सारथिने पीछेसे आनेवाले लोगोंसे जानेकी आज्ञा ली और स्वतः चलते हुए घोड़ोंको भी तीव्रगतिसे चलनेके लिये हाँका ॥ ४८ ॥

न्यवर्तत जनो राज्ञो रामं कृत्वा प्रदक्षिणम् ।

मनसाप्याशुवेगेन न न्यवर्तत मानुषम् ॥ ४ ९ ॥

राजा दशरथके साथ आनेवाले लोग मन - ही - मन श्रीरामकी परिक्रमा करके शरीरमात्रसे लौटे ( मनसे नहीं लौटे ); क्योंकि वह उनके रथकी अपेक्षा भी तीव्रगामी था । दूसरे मनुष्योंका समुदाय शीघ्रगामी मन और शरीर दोनोंसे ही नहीं लौटा ( वे सब लोग श्रीरामके पीछे - पीछे दौड़े चले गये ) ॥ ४ ९ ॥

यमिच्छेत् पुनरायातं नैनं दूरमनुव्रजेत् ।

इत्यमात्या महाराजमूचुर्दशरथं वचः ॥ ५० ॥

इधर मन्त्रियोंने महाराज दशरथसे कहा— ' राजन्! जिसके लिये यह इच्छा की जाय कि वह पुनः शीघ्र लौट आये, उसके पीछे दूरतक नहीं जाना | चाहिये ' ॥ ५० ॥

पृष्ठ 364

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३५२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तेषां वचः सर्वगुणोपपन्नः सर्वगुणसम्पन्न राजा दशरथका शरीर पसीनेसे भीग प्रस्विन्नगात्रः प्रविषण्णरूपः । रहा था । वे विषादके मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते थे । अपने निशम्य राजा कृपणः सभार्यो मन्त्रियोंकी उपर्युक्त बात सुनकर वे वहीं खड़े हो गये और व्यवस्थितस्तं सुतमीक्षमाणः ॥ ५१ ॥ | रानियोंसहित अत्यन्त दीनभावसे पुत्रकी ओर देखने लगे ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४० ॥

एकचत्वारिंशः सर्गः श्रीरामके वनगमनसे रनवासकी स्त्रियोंका विलाप तथा नगरनिवासियोंकी

तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ ।

आर्तशब्दो हि संजज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे महान् ॥ १ ॥

पुरुषसिंह श्रीरामने माताओंसहित पिताके लिये दूरसे ही हाथ जोड़ रखे थे, उसी अवस्थामें जब वे रथद्वारा नगरसे बाहर निकलने लगे, उस समय रनवासकी रानियोंमें बड़ा हाहाकार मच गया ॥ १ ॥

अनाथस्य जनस्यास्य दुर्बलस्य तपस्विनः ।

यो गतिः शरणं चासीत् स नाथः क्व नु गच्छति ॥ २ ॥

वे रोती हुई कहने लगीं — ' हाय! जो हम अनाथ, दुर्बल और शोचनीय जनोंकी गति ( सब सुखोंकी प्राप्ति करानेवाले ) और शरण ( समस्त आपत्तियोंसे रक्षा करनेवाले ) थे, वे हमारे नाथ ( मनोरथ पूर्ण करनेवाले ) श्रीराम कहाँ चले जा रहे हैं? ॥ २ ॥

न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् ।

क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क्व गच्छति ॥३ ॥

' जो किसीके द्वारा झूठा कलंक लगाये जानेपर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध दिलानेवाली बातें नहीं कहते थे और रूठे हुए सभी लोगोंको मनाकर प्रसन्न कर लेते थे, वे दूसरोंके दुःखमें समवेदना प्रकट करनेवाले राम कहाँ जा रहे हैं? ॥ ३ ॥

कौसल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते ।

तथा यो वर्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति ॥ ४ ॥

' जो महातेजस्वी महात्मा श्रीराम अपनी माता कौसल्याके साथ जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही बर्ताव हमारे साथ भी करते थे, वे कहाँ चले जा रहे हैं? ॥४ ॥

कैकेय्या क्लिश्यमानेन राज्ञा संचोदितो वनम् ।

परित्राता जनस्यास्य जगतः क्व नु गच्छति ॥ ५ ॥

' कैकेयीके द्वारा क्लेशमें डाले गये महाराजके वन जानेके लिये कहनेपर हमलोगोंकी अथवा समस्त शोकाकुल अवस्था जगत्की रक्षा करनेवाले श्रीरघुवीर कहाँ चले जा रहे हैं? ॥ ५ ॥

अहो निश्चेतनो राजा जीवलोकस्य संक्षयम् ।

धर्म्यं सत्यव्रतं रामं वनवासे प्रवत्स्यति ॥ ६ ॥

' अहो! ये राजा बड़े बुद्धिहीन हैं, जो कि जीव-जगत्के आश्रयभूत, धर्मपरायण, सत्यव्रती श्रीरामको वनवासके लिये देशनिकाला दे रहे हैं ' ॥ ६ ॥

इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः ।

रुरुदुश्चैव दुःखार्ताः सस्वरं च विचुक्रुशुः ॥ ७ ॥

इस प्रकार वे सब - की - सब रानियाँ बछड़ोंसे बिछुड़ी हुई गौओंकी तरह दुःखसे आर्त होकर रोने और उच्चस्वरसे क्रन्दन करने लगीं ॥७ ॥

स तमन्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः ।

पुत्रशोकाभिसंतप्तः श्रुत्वा चासीत् सुदुःखितः ॥ ८ ॥

अन्तःपुरमें वह घोर आर्तनाद सुनकर पुत्रशोकसे संतप्त हुए महाराज दशरथ बहुत दुःखी हो गये ॥ ८ ॥

नाग्निहोत्राण्यहूयन्त नापचन् गृहमेधिनः ।

अकुर्वन् न प्रजाः कार्यं सूर्यश्चान्तरधीयत ॥ ९ ॥

व्यसृजन् कवलान् नागा गावो वत्सान् न पाययन् ।

पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाभ्यनन्दत ॥ १० ॥

उस दिन अग्निहोत्र बंद हो गया, गृहस्थोंके घर भोजन नहीं बना, प्रजाओंने कोई काम नहीं किया, सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये, हाथियोंने मुँहमें लिया हुआ चारा छोड़ दिया, गौओंने बछड़ोंको दूध नहीं पिलाया और पहले - पहल पुत्रको जन्म देकर भी कोई

माता प्रसन्न नहीं हुई । ९ -१० ॥

त्रिशङ्कुर्लोहिताङ्गश्च बृहस्पतिबुधावपि ।

दारुणाः सोममभ्येत्य ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः ॥ ११ ॥

त्रिशंकु, मङ्गल, गुरु, बुध तथा अन्य समस्त ग्रह

पृष्ठ 365

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अयोध्याकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ३५३ शुक्र, शनि आदि रातमें वक्रगतिसे चन्द्रमाके पास पहुँचकर दारुण ( क्रूरकान्तियुक्त ) होकर स्थित हो गये ॥

नक्षत्राणि गतार्चीषि ग्रहाश्च गततेजसः ।

विशाखाश्च सधूमाश्च नभसि प्रचकाशिरे ॥ १२ ॥

नक्षत्रोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी और ग्रह निस्तेज हो गये । वे सब - के - सब आकाशमें विपरीत मार्गपर स्थित हो धूमाच्छन्न प्रतीत हो रहे थे ॥ १२ ॥

कालिकानिलवेगेन महोदधिरिवोत्थितः ।

रामे वनं प्रव्रजिते नगरं प्रचचाल तत् ॥ १३ ॥

आकाशमें छायी हुई मेघमाला वायुके वेगसे उमड़े हुए समुद्रके समान प्रतीत होती थी । श्रीरामके वनको जाते समय वह सारा नगर जोर - जोरसे हिलने लगा ( वहाँ भूकम्प आ गया ) ॥ १३ ॥

दिशः पर्याकुलाः सर्वास्तिमिरेणेव संवृताः ।

न ग्रहो नापि नक्षत्रं प्रचकाशे न किंचन ॥ १४ ॥

समस्त दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, उनमें अन्धकार-सा छा गया । न कोई ग्रह प्रकाशित होता था, न नक्षत्र ॥

अकस्मान्नागरः सर्वो जनो दैन्यमुपागमत् ।

आहारे वा विहारे वा न कश्चिदकरोन्मनः ॥ १५ ॥

सहसा सारे नागरिक दीन - दशाको प्राप्त हो गये ।

किसीने भी आहार या विहारमें मन नहीं लगाया ॥ १५ ॥

शोकपर्यायसंतप्तः सततं दीर्घमुच्छ्वसन् ।

अयोध्यायां जनः सर्वश्चक्रोश जगतीपतिम् ॥ १६ ॥

अयोध्यावासी सब लोग शोकपरम्परासे संतप्त हो निरन्तर लंबी साँस खींचते हुए राजा दशरथको कोसने लगे ॥ १६ ॥

बाष्पपर्याकुलमुखो राजमार्गगतो जनः ।

न हृष्टो लभ्यते कश्चित् सर्वः शोकपरायणः ॥ १७ ॥

सड़कपर निकला हुआ कोई भी मनुष्य प्रसन्न नहीं दिखायी देता था । सबका मुख आँसुओंसे भीगा हुआ था और सभी शोकमग्न हो रहे थे ॥ १७ ॥

न वाति पवनः शीतो न शशी सौम्यदर्शनः ।

न सूर्यस्तपते लोकं सर्वं पर्याकुलं जगत् ॥१८ ॥

शीतल वायु नहीं चलती थी । चन्द्रमा सौम्य नहीं दिखायी देता था । सूर्य भी जगत्को उचित मात्रामें ताप या प्रकाश नहीं दे रहा था । सारा संसार ही व्याकुल हो उठा था ॥ १८ ॥

अनर्थिनः सुताः स्त्रीणां भर्तारो भ्रातरस्तथा ।

सर्वे सर्वं परित्यज्य राममेवान्वचिन्तयन् ॥ १ ९ ॥

बालक माँ - बापको भूल गये । पतियोंको स्त्रियोंकी याद नहीं आती थी और भाई भाईका स्मरण नहीं करते थे- सभी सब कुछ छोड़कर केवल श्रीरामका ही चिन्तन करने लगे ॥ १ ९ ॥

ये तु रामस्य सुहृदः सर्वे ते मूढचेतसः ।

शोकभारेण चाक्रान्ताः शयनं नैव भेजिरे ॥ २० ॥

जो श्रीरामके मित्र थे, वे सब तो और भी अपनी सुध - बुध खो बैठे थे । शोकके भारसे आक्रान्त होनेके कारण वे रातमें सोयेतक नहीं ॥ २० ॥

ततस्त्वयोध्या रहिता महात्मना पुरन्दरेणेव मही सपर्वता । चचाल घोरं भयशोकदीपिता सनागयोधाश्वगणा ननाद च ॥ २१ ॥

इस प्रकार सारी अयोध्यापुरी श्रीरामसे रहित होकर भय और शोकसे प्रज्वलित - सी होकर उसी प्रकार घोर हलचलमें पड़ गयी, जैसे देवराज इन्द्रसे रहित हुई मेरु-पर्वतसहित यह पृथ्वी डगमगाने लगती है । हाथी, घोड़े । और सैनिकोंसहित उस नगरीमें भयंकर आर्तनाद होने लगा ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

द्विचत्वारिंशः सर्गः राजा दशरथका पृथ्वीपर गिरना, श्रीरामके लिये विलाप करना, कैकेयीको अपने पास आनेसे मना करना और उसे त्याग देना, कौसल्या और सेवकोंकी सहायतासे उनका कौसल्याके भवनमें आना और वहाँ भी श्रीरामके लिये दुःखका ही अनुभव करना

यावत् तु निर्यतस्तस्य रजोरूपमदृश्यत । दशरथने उधरसे अपनी आँखें नहीं हटायीं ॥१ ॥

नैवेक्ष्वाकुवरस्तावत् संजहारात्मचक्षुषी ॥ १॥ यावद् राजा प्रियं पुत्रं पश्यत्यत्यन्तधार्मिकम् ।

वनकी ओर जाते हुए श्रीरामके रथकी धूल जबतक तावद् व्यवर्धतेवास्य धरण्यां पुत्रदर्शने ॥ २ ॥

दिखायी देती रही, तबतक इक्ष्वाकुवंशके स्वामी राजा वे महाराज अपने अत्यन्त धार्मिक प्रिय पुत्रको 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_13_1_Front

पृष्ठ 366

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३५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे जबतक देखते रहे, तबतक पुत्रको देखनेके लिये उनका शरीर मानो पृथ्वीपर बढ़ रहा था- वे ऊँचे उठ उठकर उनकी ओर निहार रहे थे ॥ २ ॥

न पश्यति रजोऽप्यस्य यदा रामस्य भूमिपः ।

तदार्तश्च निषण्णश्च पपात धरणीतले ॥ ३ ॥ ।

जब राजाको श्रीरामके रथकी धूल भी नहीं दिखायी देने लगी, तब वे अत्यन्त आर्त और विषादग्रस्त हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३ ॥

तस्य दक्षिणमन्वागात् कौसल्या बाहुमङ्गना ।

परं चास्यान्वगात् पार्श्वं कैकेयी सा सुमध्यमा ॥ ४ ॥

उस समय उन्हें सहारा देनेके लिये उनकी धर्मपत्नी कौसल्या देवी दाहिनी बाँहके पास आयीं और सुन्दरी कैकेयी उनके वामभागमें जा पहुँचीं ॥४ ॥

तां नयेन च सम्पन्नो धर्मेण विनयेन च । उवाच राजा कैकेयीं कैकेयीको देखते सम्पन्न राजा दशरथकी वे बोल उठे - ॥५ ॥

कैकेयि मामकाङ्गानि नहि त्वां द्रष्टुमिच्छामि ' पापपूर्ण विचार

अङ्गोंका स्पर्श न कर ।

समीक्ष्य व्यथितेन्द्रियः ॥ ५ ॥

ही नय, विनय और धर्मसे समस्त इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं;

मा स्प्राक्षीः पापनिश्चये ।

न भार्या न च बान्धवी ॥ ६ ॥

रखनेवाली कैकेयि! तू मेरे मैं तुझे देखना नहीं चाहता । तू न तो मेरी भार्या है और न बान्धवी ॥ ६ ॥

ये च त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां न ते मम ।

केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मां त्यजाम्यहम् ॥ ७ ॥

' जो तेरा आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं । तूने केवल धनमें आसक्त होकर धर्मका त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ ॥७ ॥

अगृह्णां यच्च ते पाणिमग्निं पर्यणयं च यत् ।

अनुजानामि तत् सर्वमस्मिल्लोके परत्र च ॥ ८ ॥

' मैंने जो तेरा पाणिग्रहण किया है और तुझे साथ लेकर अग्निकी परिक्रमा की है, तेरे साथका वह सारा सम्बन्ध इस लोक और परलोकके लिये भी त्याग देता हूँ ॥ ८ ॥

भरतश्चेत् प्रतीतः स्याद् राज्यं प्राप्यैतदव्ययम् ।

यन्मे स दद्यात् पित्रर्थं मा मां तद्दत्तमागमत् ॥ ९ ॥

‘ तेरा पुत्र भरत भी यदि इस विघ्न - बाधासे रहित राज्यको पाकर प्रसन्न हो तो वह मेरे लिये श्राद्धमें जो कुछ पिण्ड या जल आदि दान करे, वह मुझे प्राप्त न हो ' ॥ ९ ॥

अथ रेणुसमुद्ध्वस्तं समुत्थाप्य नराधिपम् ।

न्यवर्तत तदा देवी कौसल्या शोककर्शिता ॥ १० ॥

तदनन्तर शोकसे कातर हुई कौसल्या देवी उस समय धरतीपर लोटनेके कारण धूलसे व्याप्त हु महाराजको उठाकर उनके साथ राजभवनकी ओर लौटीं ॥ १० ॥

हत्वेव ब्राह्मणं कामात् स्पृष्ट्वाग्निमिव पाणिना ।

अन्वतप्यत धर्मात्मा पुत्रं संचिन्त्य राघवम् ॥ ११ ॥

जैसे कोई जान - बूझकर स्वेच्छापूर्वक ब्राह्मणकी हत्या कर डाले अथवा हाथसे प्रज्वलित अग्निका स्पर्श कर ले और ऐसा करके संतप्त होता रहे, उसी प्रकार धर्मात्मा राजा दशरथ अपने ही दिये हुए वरदानके कारण वनमें गये हुए श्रीरामका चिन्तन करके अनुत हो रहे थे ॥११ ॥

निवृत्यैव निवृत्यैव सीदतो रथवर्त्मसु ।

राज्ञो नातिबभौ रूपं ग्रस्तस्यांशुमतो यथा ॥१२ ॥

राजा दशरथ बारंबार पीछे लौटकर रथके मार्गों पर देखनेका कष्ट उठाते थे । उस समय उनका रूप राहुग्रस्त सूर्यकी भाँति अधिक शोभा नहीं पाता था ॥ १२ ॥

विललाप स दुःखार्तः प्रियं पुत्रमनुस्मरन् ।

नगरान्तमनुप्राप्तं बुद्ध्वा पुत्रमथाब्रवीत् ॥१३ ॥

वे अपने प्रिय पुत्रका बारंबार स्मरण करके दुःखसे आतुर हो विलाप करने लगे । वे बेटेको नगरकी सीमापर पहुँचा हुआ समझकर इस प्रकार कहने लगे - ॥ १३ ॥

वाहनानां च मुख्यानां वहतां तं ममात्मजम् ।

पदानि पथि दृश्यन्ते स महात्मा न दृश्यते ॥ १४ ॥

' हाय! मेरे पुत्रको वनकी ओर ले जाते हुए श्रेष्ठ वाहनों ( घोड़ों ) के पदचिह्न तो मार्गमें दिखायी देते हैं; परंतु उन महात्मा श्रीरामका दर्शन नहीं हो रहा है ॥ १४ ॥

यः सुखेनोपधानेषु शेते चन्दनरूषितः ।

वीज्यमानो महार्हाभिः स्त्रीभिर्मम सुतोत्तमः ॥ १५ ॥

स नूनं क्वचिदेवाद्य वृक्षमूलमुपाश्रितः ।

काष्ठं वा यदि वाश्मानमुपधाय शयिष्यते ॥ १६ ॥

' जो मेरे श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम चन्दनसे चर्चित हो तकियोंका सहारा लेकर उत्तम शय्याओंपर सुखसे सोते थे और उत्तम अलंकारोंसे विभूषित सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें व्यजन डुलाती थीं, वे निश्चय ही आज कहीं वृक्षकड़ आश्रय ले अथवा किसी काठ या पत्थरको सिरके नीचे रखकर भूमिपर ही शयन करेंगे ॥ १५-१६ ॥ 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_13_1_Back

पृष्ठ 367

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अयोध्याकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ३५५

उत्थास्यति च मेदिन्याः कृपणः पांसुगुण्ठितः ।

विनिःश्वसन् प्रस्रवणात् करेणूनामिवर्षभः ॥ १७ ॥

' फिर अङ्गोंमें धूल लपेटे दीनकी भाँति लंबी साँस खींचते हुए वे उस शयन - भूमिसे उसी प्रकार उठेंगे, जैसे किसी झरनेके पाससे गजराज उठता है ॥ द्रक्ष्यन्ति नूनं पुरुषा राममुत्थाय गच्छन्तं ' निश्चय ही वनमें महाबाहु श्रीरामको वहाँसे हुए देखेंगे ॥१८ ॥

सा नूनं जनकस्येष्टा कण्टकाक्रमणक्लान्ता

दीर्घबाहुं वनेचराः ।

लोकनाथमनाथवत् ॥ १८ ॥

रहनेवाले मनुष्य लोकनाथ अनाथकी भाँति उठकर जाते

सुता सुखसदोचिता ।

वनमद्य गमिष्यति ॥ १ ९ ॥

' जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, वह जनककी प्यारी पुत्री सीता आज अवश्य ही काँटोंपर पैर पड़नेसे व्यथाका अनुभव करती हुई वनको जायगी ॥ १ ९ ॥

अनभिज्ञा वनानां सा नूनं भयमुपैष्यति ।

श्वपदानर्दितं श्रुत्वा गम्भीरं रोमहर्षणम् ॥ २० ॥

' वह वनके कष्टोंसे अनभिज्ञ है । वहाँ व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओंका गम्भीर तथा रोमाञ्चकारी गर्जन - तर्जन सुनकर निश्चय ही भयभीत हो जायगी ॥ २० ॥

सकामा भव कैकेयि विधवा राज्यमावस ।

नहि तं पुरुषव्याघ्रं विना जीवितुमुत्सहे ॥ २१ ॥

' अरी कैकेयी! तू अपनी कामना सफल कर ले और विधवा होकर राज्य भोग । मैं पुरुषसिंह श्रीरामके बिना जीवित नहीं रह सकता ' ॥ २१ ॥

इत्येवं विलपन् राजा जनौघेनाभिसंवृतः ।

अपस्नात इवारिष्टं प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥ २२ ॥

इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथने मरघटसे नहाकर आये हुए पुरुषकी भाँति मनुष्योंकी भारी भीड़से घिरकर अपने शोकपूर्ण उत्तम भवनमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥

शून्यचत्वरवेश्मान्तां संवृतापणवेदिकाम् ।

क्लान्तदुर्बलदुःखार्तां नात्याकीर्णमहापथाम् ॥२३ ॥

तामवेक्ष्य पुरीं सर्वां राममेवानुचिन्तयन् ।

विलपन् प्राविशद् राजा गृहं सूर्य इवाम्बुदम् ॥ २४॥ ।

उन्होंने देखा, अयोध्यापुरीके प्रत्येक घरका बाहरी चबूतरा और भीतरी भाग भी सूना हो रहा है । ( क्योंकि उन घरोंके सब लोग श्रीरामके पीछे चले गये थे । ) बाजार - हाट बंद है । जो लोग नगर में हैं, वे भी अत्यन्त क्लान्त, दुर्बल और दुःखसे आतुर हो रहे हैं तथा बड़ी-बड़ी सड़कोंपर भी अधिक आदमी जाते - आते नहीं दिखायी देते हैं । सारे नगरकी यह अवस्था देखकर श्रीरामके लिये ही चिन्ता और विलाप करते हुए राजा उसी तरह महलके भीतर गये, जैसे सूर्य मेघोंकी घटामें छिप जाते हैं ॥ २३-२४ ॥

महाहृदमिवाक्षोभ्यं सुपर्णेन हृतोरगम् ।

रामेण रहितं वेश्म वैदेह्या लक्ष्मणेन च ॥। २५ ॥

श्रीराम, लक्ष्मण और सीतासे रहित वह राजभवन उस महान् अक्षोभ्य जलाशयके समान जान पड़ता था, जिसके भीतरके नागको गरुड़ उठा ले गये हों ॥ २५ ॥

अथ गद्गदशब्दस्तु विलपन् वसुधाधिपः ।

उवाच मृदु मन्दार्थं वचनं दीनमस्वरम् ॥ २६ ॥

उस समय विलाप करते हुए राजा दशरथने गद्गद वाणीमें द्वारपालोंसे यह मधुर, अस्पष्ट, दीनतायुक्त और स्वाभाविक स्वरसे रहित बात कही - ॥ २६ ॥

कौसल्याया गृहं शीघ्रं राममातुर्नयन्तु माम् ।

नह्यन्यत्र ममाश्वासो हृदयस्य भविष्यति ॥ २७ ॥

' मुझे शीघ्र ही श्रीराम - माता कौसल्याके घरमें पहुँचा दो; क्योंकि मेरे हृदयको और कहीं शान्ति नहीं मिल सकती ' ॥ २७ ॥

इति ब्रुवन्तं राजानमनयन् द्वारदर्शिनः ।

कौसल्याया गृहं तत्र न्यवेस्यत विनीतवत् ॥ २८ ॥

ऐसी बात कहते हुए राजा दशरथको द्वारपालोंने बड़ी विनयके साथ रानी कौसल्याके भवनमें पहुँचाया और पलंगपर सुला दिया ॥ २८ ॥

ततस्तत्र प्रविष्टस्य कौसल्याया निवेशनम् ।

अधिरुह्यापि शयनं बभूव लुलितं मनः ॥ २ ९ ॥

वहाँ कौसल्याके भवनमें प्रवेश करके पलंगपर आरूढ़ हो जानेपर भी राजा दशरथका मन चञ्चल एवं मलिन ही रहा ॥ २ ९ ॥

पुत्रद्वयविहीनं च स्नुषया च विवर्जितम् ।

अपश्यद् भवनं राजा नष्टचन्द्रमिवाम्बरम् ॥ ३० ॥

दोनों पुत्र और पुत्रवधू सीतासे रहित वह भवन राजाको चन्द्रहीन आकाशकी भाँति श्रीहीन दिखायी देने लगा ॥ ३० ॥

तच्च दृष्ट्वा महाराजो भुजमुद्यम्य वीर्यवान् ।

उच्चैःस्वरेण प्राक्रोशद्धा राम विजहासि नौ ॥ ३१ ॥

सुखिता बत तं कालं जीविष्यन्ति नरोत्तमाः ।

परिष्वजन्तो ये रामं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम् ॥ ३२ ॥

उसे देखकर पराक्रमी महाराजने एक बाँह ऊपर | उठाकर उच्चस्वरसे विलाप करते हुए कहा - ' हा राम! 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_13_2_Front

पृष्ठ 368

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३५६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तुम हम दोनों माता - पिताको त्याग दे रहे हो । जो नरश्रेष्ठ चौदह वर्षोंकी अयोध्यामें पुनः लौटे देखेंगे, वे ही वास्तवमें अथ रात्र्यां प्रपन्नायां अर्धरात्रे दशरथः तदनन्तर अपनी आनेपर राजा दशरथने अवधितक जीवित रहेंगे और हुए श्रीरामको हृदयसे लगाकर सुखी होंगे ' ॥ ३१-३२ ॥

कालरात्र्यामिवात्मनः ।

कौसल्यामिदमब्रवीत् ॥ ३३ ॥

कालरात्रिके समान वह रात्रि आधी रात होनेपर कौसल्यासे इस प्रकार कहा- ॥ ३३ ॥

न त्वां पश्यामि कौसल्ये साधु मां पाणिना स्पृश ।

रामं मेऽनुगता दृष्टिरद्यापि न निवर्तते ॥ ३४॥ ।

' कौसल्ये! मेरी दृष्टि श्रीरामके ही साथ चली गयी और वह अबतक नहीं लौटी है; अतः मैं तुम्हें देख नहीं पाता हूँ । एक बार अपने हाथसे मेरे शरीरका स्पर्श तो करो ' ॥ तं राममेवानुविचिन्तयन्तं समीक्ष्य देवी शयने नरेन्द्रम् । उपोपविश्याधिकमार्तरूपा विनिश्वसन्तं विललाप कृच्छ्रम् ॥ ३५ ॥

शय्यापर पड़े हुए महाराज दशरथको श्रीरामका ही चिन्तन करते और लंबी साँस खींचते देख देवी कौसल्या अत्यन्त व्यथित हो उनके पास आ बैठीं और बड़े कष्टसे विलाप करने लगीं ॥ ३५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४२ ॥

त्रिचत्वारिंशः सर्गः महारानी कौसल्याका विलाप

ततः समीक्ष्य शयने सन्नं शोकेन पार्थिवम् ।

कौसल्या पुत्रशोकार्ता तमुवाच महीपतिम् ॥ १ ॥

शय्यापर पड़े हुए राजाको पुत्रशोकसे व्याकुल देख पुत्रके ही शोकसे पीड़ित हुई कौसल्याने उन महाराजसे कहा- ॥१ ॥

राघवे नरशार्दूले विषं मुक्त्वाहिजिह्मगा ।

विचरिष्यति कैकेयी निर्मुक्तेव हि पन्नगी ॥ २ ॥

' नरश्रेष्ठ श्रीरामपर अपना विष उँडेलकर टेढ़ी चालसे चलनेवाली कैकेयी केंचुल छोड़कर नूतन शरीरसे प्रकट हुई सर्पिणीकी भाँति अब स्वच्छन्द विचरेगी ॥ २ ॥

विवास्य रामं सुभगा लब्धकामा समाहिता ।

त्रासयिष्यति मां भूयो दुष्टाहिरिव वेश्मनि ॥ ३ ॥

' जैसे घरमें रहनेवाला दुष्ट सर्प बारंबार भय देता रहता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रको वनवास देकर सफलमनोरथ हुई सुभगा कैकेयी सदा सावधान होकर मुझे त्रास देती रहेगी ॥ ३ ॥

अथास्मिन् नगरे रामश्चरन् भैक्षं गृहे वसेत् ।

कामकारो वरं दातुमपि दासं ममात्मजम् ॥ ४ ॥

' यदि श्रीराम इस नगरमें भीख माँगते हुए भी घरमें रहते अथवा मेरे पुत्रको कैकेयीका दास भी बना दिया गया होता तो वैसा वरदान मुझे भी अभीष्ट होता ( क्योंकि उस दशामें मुझे भी श्रीरामका दर्शन होता रहता । श्रीरामके वनवासका वरदान तो कैकेयीने मुझे दुःख देनेके लिये ही माँगा है । ) ॥ ४ ॥

पातयित्वा तु कैकेय्या रामं स्थानाद् यथेष्टतः ।

प्रविद्धो रक्षसां भागः पर्वणीवाहिताग्निना ॥ ५ ॥

' कैकेयीने अपनी इच्छाके अनुसार श्रीरामको उनके स्थानसे भ्रष्ट करके वैसा ही किया है, जैसे किसी अग्निहोत्रीने पर्वके दिन देवताओंको उनके भागसे वञ्चित करके राक्षसोंको वह भाग अर्पित कर दिया हो ॥ ५ ॥

नागराजगतिर्वीरो महाबाहुर्धनुर्धरः ।

वनमाविशते नूनं सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥ ६ ॥

' गजराजके समान मन्द गतिसे चलनेवाले वीर महाबाहु धनुर्धर श्रीराम निश्चय ही अपनी पत्नी और लक्ष्मणके साथ वनमें प्रवेश कर रहे होंगे ॥ ६ ॥

वने त्वदृष्टदुःखानां कैकेय्यनुमते त्वया ।

त्यक्तानां वनवासाय कान्यावस्था भविष्यति ॥ ७ ॥

‘ महाराज! जिन्होंने जीवनमें कभी दुःख नहीं देखे थे, उन श्रीराम, लक्ष्मण और सीताको आपने कैकेयीकी बातोंमें आकर वनमें भेज दिया । अब उन बेचारोंकी वनवासके कष्ट भोगनेके सिवा और क्या अवस्था होगी? ॥

ते रत्नहीनास्तरुणाः फलकाले विवासिताः ।

कथं वत्स्यन्ति कृपणाः फलमूलैः कृताशनाः ॥ ८ ॥

' रत्नतुल्य उत्तम वस्तुओंसे वञ्चित वे तीनों तरुण सुखरूप फल भोगनेके समय घरसे निकाल दिये गये । 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_13_2_Back

पृष्ठ 369

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अयोध्याकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ३५७ अब वे बेचारे फल - मूलका भोजन करके कैसे रह सकेंगे? ॥ ८ ॥

अपीदानीं स कालः स्यान्मम शोकक्षयः शिवः ।

सहभार्यं सह भ्रात्रा पश्येयमिह राघवम् ॥ ९ ॥

' क्या अब फिर मेरे शोकको नष्ट करनेवाला वह शुभ समय आयेगा, जब मैं सीता और लक्ष्मणके साथ वनसे लौटे हुए श्रीरामको देखूँगी? ॥९ ॥

श्रुत्वैवोपस्थितौ वीरौ कदायोध्या भविष्यति ।

यशस्विनी हृष्टजना सूच्छ्रितध्वजमालिनी ॥ १० ॥

' कब वह शुभ अवसर प्राप्त होगा जब कि ' वीर श्रीराम और लक्ष्मण वनसे लौट आये ' यह सुनते ही यशस्विनी अयोध्यापुरीके सब लोग हर्षसे उल्लसित हो उठेंगे और घर - घर फहराये गये ऊँचे - ऊँचे ध्वज - समूह पुरीकी शोभा बढ़ाने लगेंगे ॥ १० ॥

कदा प्रेक्ष्य नरव्याघ्रावरण्यात् पुनरागतौ ।

भविष्यति पुरी हृष्टा समुद्र इव पर्वणि ॥ ११ ॥

' नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मणको पुनः वनसे आया हुआ देख यह अयोध्यापुरी पूर्णिमाके उमड़ते हुए समुद्रकी भाँति कब हर्षोल्लाससे परिपूर्ण होगी? ॥ ११ ॥

कदायोध्यां महाबाहुः पुरीं वीरः प्रवेक्ष्यति ।

पुरस्कृत्य रथे सीतां वृषभो गोवधूमिव ॥ १२ ॥

‘ जैसे साँड़ गायको आगे करके चलता है, उसी प्रकार वीर महाबाहु श्रीराम रथपर सीताको आगे करके कब अयोध्यापुरीमें प्रवेश करेंगे? ॥ १२ ॥

कदा प्राणिसहस्त्राणि राजमार्गे ममात्मजौ ।

लाजैरवकरिष्यन्ति प्रविशन्तावरिंदमौ ॥ १३ ॥

' कब यहाँके सहस्रों मनुष्य पुरीमें प्रवेश करते और राजमार्गपर चलते हुए मेरे दोनों शत्रुदमन पुत्रोंपर लावा ( खील ) - की वर्षा करेंगे? ॥ १३ ॥

प्रविशन्तौ कदायोध्यां द्रक्ष्यामि शुभकुण्डलौ ।

उदग्रायुधनिस्त्रिंशौ सशृङ्गाविव पर्वतौ ॥ १४ ॥

' उत्तम आयुध एवं खड्ग लिये शिखरयुक्त पर्वतोंके समान प्रतीत होनेवाले श्रीराम और लक्ष्मण सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत हो कब अयोध्यापुरीमें प्रवेश करते हुए मेरे नेत्रोंके समक्ष प्रकट होंगे? ॥ १४ ॥

कदा सुमनसः कन्या द्विजातीनां फलानि च ।

प्रदिशन्त्यः पुरीं हृष्टाः करिष्यन्ति प्रदक्षिणम् ॥ १५ ॥

' कब ब्राह्मणोंकी कन्याएँ हर्षपूर्वक फूल और फल अर्पण करती हुई अयोध्यापुरीकी परिक्रमा करेंगी? ॥ १५ ॥

कदा परिणतो बुद्ध्या वयसा चामरप्रभाः ।

अभ्युपैष्यति धर्मात्मा सुवर्ष इव लालयन् ॥ १६ ॥

' कब ज्ञानमें बढ़े- चढ़े और अवस्थामें देवताओंके समान तेजस्वी धर्मात्मा श्रीराम उत्तम वर्षाकी भाँति जनसमुदायका लालन करते हुए यहाँ पधारेंगे? ॥ १६ ॥

निःसंशयं मया मन्ये पुरा वीर कदर्यया ।

पातुकामेषु वत्सेषु मातृणां शातिताः स्तनाः ॥ १७ ॥

' वीर! इसमें संदेह नहीं कि पूर्व जन्ममें मुझ नीच आचार - विचारवाली नारीने बछड़ोंके दूध पीनेके लिये उद्यत होते ही उनकी माताओंके स्तन काट दिये होंगे ॥ १७ ॥

साहं गौरिव सिंहेन विवत्सा वत्सला कृता ।

कैकेय्या पुरुषव्याघ्र बालवत्सेव गौर्बलात् ॥ १८ ॥

' पुरुषसिंह! जैसे किसी सिंहने छोटे - से बछड़ेवाली वत्सला गौको बलपूर्वक बछड़ेसे हीन कर दिया हो, उसी प्रकार कैकेयीने मुझे बलात् अपने बेटेसे विलग कर दिया है ॥ १८ ॥

नहि तावद्गुणैर्जुष्टं सर्वशास्त्रविशारदम् ।

एकपुत्रा विना पुत्रमहं जीवितुमुत्सहे ॥ १ ९ ॥

' जो उत्तम गुणोंसे युक्त और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें प्रवीण हैं, उन अपने पुत्र श्रीरामके बिना मैं इकलौते बेटेवाली माँ जीवित नहीं रह सकती ॥ १ ९ ॥

न हि मे जीविते किंचित् सामर्थ्यमिह कल्प्यते ।

अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥ २० ॥

' अब लक्ष्मणको शक्ति नहीं अयं हि महीमिमां प्यारे पुत्र श्रीराम और महाबली देखे बिना मुझमें जीवित रहनेकी कुछ भी है ॥ २० ॥

मां दीपयतेऽद्य वह्नि-स्तनूजशोकप्रभवो महाहितः । रश्मिभिरुत्तमप्रभो यथा निदाघे भगवान् दिवाकरः ॥ २१ ॥

' जैसे ग्रीष्म ऋतुमें उत्कृष्ट प्रभावाले भगवान् सूर्य अपनी किरणोंद्वारा इस पृथ्वीको अधिक ताप देते हैं, उसी प्रकार यह पुत्रशोकजनित महान् अहितकारक । अग्नि आज मुझे जलाये दे रही है'॥२१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 370

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 370 का मूल पृष्ठ
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३५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः सुमित्राका कौसल्याको आश्वासन देना

विलपन्तीं तथा तां तु कौसल्यां प्रमदोत्तमाम् ।

इदं धर्मे स्थिता धर्म्यं सुमित्रा वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥

नारियोंमें श्रेष्ठ कौसल्याको इस प्रकार विलाप करती देख धर्मपरायणा सुमित्रा यह धर्मयुक्त बात बोली- ॥ १ ॥

तवायें सद्गुणैर्युक्तः स पुत्रः पुरुषोत्तमः ।

किं ते विलपितेनैवं कृपणं रुदितेन वा ॥ २ ॥

' आर्ये! तुम्हारे पुत्र श्रीराम उत्तम गुणोंसे युक्त और पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं । उनके लिये इस प्रकार विलाप करना और दीनतापूर्वक रोना व्यर्थ है, इस तरह रोने-धोनेसे क्या लाभ? ॥ २ ॥

यस्तवार्ये गतः पुत्रस्त्यक्त्वा राज्यं महाबलः ।

साधु कुर्वन् महात्मानं पितरं सत्यवादिनम् ॥ ३ ॥

शिष्टैराचरिते सम्यक्शश्वत् प्रेत्य फलोदये ।

रामो धर्मे स्थितः श्रेष्ठो न स शोच्यः कदाचन ॥४ ॥

' बहिन! जो राज्य छोड़कर अपने महात्मा पिताको भलीभाँति सत्यवादी बनानेके लिये वनमें चले गये हैं, वे तुम्हारे महाबली श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम उस उत्तम धर्ममें स्थित हैं, जिसका सत्पुरुषोंने सर्वदा और सम्यक् प्रकारसे पालन किया है तथा जो परलोकमें भी सुखमय फल प्रदान करनेवाला है । ऐसे धर्मात्माके लिये कदापि शोक नहीं करना चाहिये ॥ ३-४ ॥

वर्तते चोत्तमां वृत्तिं लक्ष्मणोऽस्मिन् सदानघः ।

दयावान् सर्वभूतेषु लाभस्तस्य महात्मनः ॥ ५ ॥ ।

' निष्पाप लक्ष्मण समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु हैं । वे सदा श्रीरामके प्रति उत्तम बर्ताव करते हैं, अतः उन महात्मा लक्ष्मणके लिये यह लाभकी ही बात है ॥ ५ ॥

अरण्यवासे यद् दुःखं जानन्त्येव सुखोचिता ।

अनुगच्छति वैदेही धर्मात्मानं तवात्मजम् ॥ ६ ॥

' विदेहनन्दिनी सीता भी जो सुख भोगनेके ही योग्य है, वनवासके दुःखोंको भलीभाँति सोच - समझकर ही तुम्हारे धर्मात्मा पुत्रका अनुसरण करती है ॥ ६ ॥

कीर्तिभूतां पताकां यो लोके भ्रमयति प्रभुः ।

धर्मः सत्यव्रतपरः किं न प्राप्तस्तवात्मजः ॥ ७ ॥

' जो प्रभु संसारमें अपनी कीर्तिमयी पताका फहरा रहे हैं और सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन धर्मस्वरूप तुम्हारे पुत्र श्रीरामको कौन - सा श्रेय प्राप्त नहीं हुआ है ॥ ७ ॥

व्यक्तं रामस्य विज्ञाय शौचं माहात्म्यमुत्तमम् ।

न गात्रमंशुभिः सूर्यः संतापयितुमर्हति ॥ ८ ॥

' श्रीरामकी पवित्रता और उत्तम माहात्म्यको जानकर निश्चय ही सूर्य अपनी किरणोंद्वारा उनके शरीरको संतप्त नहीं कर सकते ॥ ८ ॥

शिवः सर्वेषु कालेषु काननेभ्यो विनिःसृतः ।

राघवं युक्तशीतोष्णः सेविष्यति सुखोऽनिलः ॥ ९ ॥

' सभी समयोंमें वनोंसे निकली हुई उचित सरदी और गरमीसे युक्त सुखद एवं मङ्गलमय वायु श्रीरघुनाथजीकी सेवा करेगी ॥ ९ ॥

शयानमनघं रात्रौ पितेवाभिपरिष्वजन् ।

घर्मघ्नः संस्पृशन् शीतश्चन्द्रमा ह्लादयिष्यति ॥ १० ॥

' रात्रिकालमें धूपका कष्ट दूर करनेवाले शीतल चन्द्रमा सोते हुए निष्पाप श्रीरामका अपने किरणरूपी करोंसे आलिङ्गन और स्पर्श करके उन्हें आह्लाद प्रदान करेंगे ॥ १० ॥

ददौ चास्त्राणि दिव्यानि यस्मै ब्रह्मा महौजसे ।

दानवेन्द्रं हतं दृष्ट्वा तिमिध्वजसुतं रणे ॥ ११ ॥

' श्रीरामके द्वारा रणभूमिमें तिमिध्वज ( शम्बर ) - के पुत्र दानवराज सुबाहुको मारा गया देख विश्वामित्रजीने उन महातेजस्वी वीरको बहुत - से दिव्यास्त्र प्रदान किये थे ॥ ११ ॥

स शूरः पुरुषव्याघ्रः स्वबाहुबलमाश्रितः ।

असंत्रस्तो ह्यरण्येऽसौ वेश्मनीव निवत्स्यते ॥१२ ॥

' वे पुरुषसिंह श्रीराम बड़े शूरवीर हैं । वे अपने ही बाहुबलका आश्रय लेकर जैसे महलमें रहते थे, उसी तरह वनमें भी निडर होकर रहेंगे ॥ १२ ॥

यस्येषुपथमासाद्य विनाशं यान्ति शत्रवः ।

कथं न पृथिवी तस्य शासने स्थातुमर्हति ॥ १३ ॥

' जिनके बाणोंका लक्ष्य बनकर सभी शत्रु विनाशको प्राप्त होते हैं, उनके शासनमें यह पृथ्वी और यहाँके प्राणी कैसे नहीं रहेंगे? ॥ १३ ॥

या श्रीः शौर्यं च रामस्य या च कल्याणसत्त्वता ।

निवृत्तारण्यवासः स्वं क्षिप्रं राज्यमवाप्स्यति ॥ १४ ॥

' श्रीरामकी जैसी शारीरिक शोभा है, जैसा पराक्रम