वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 371–380
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380
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अयोध्याकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ३५ ९ है और जैसी कल्याणकारिणी शक्ति है, उससे जान । पड़ता है कि वे वनवाससे लौटकर शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे ॥१४ ॥
सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः ।
श्रियाः श्रीश्च भवेदग्र्या कीर्त्याः कीर्तिः क्षमाक्षमा ॥ १५ ॥
दैवतं देवतानां च भूतानां भूतसत्तमः ।
तस्य के ह्यगुणा देवि वने वाप्यथवा पुरे ॥ १६ ॥
' देवि! श्रीराम सूर्यके भी सूर्य ( प्रकाशक ) और अग्रिके भी अग्रि ( दाहक ) हैं । वे प्रभुके भी प्रभु, लक्ष्मीकी भी उत्तम लक्ष्मी और क्षमाकी भी क्षमा हैं । इतना ही नहीं - वे देवताओंके भी देवता तथा भूतोंके भी उत्तम भूत हैं । वे वनमें रहें या नगरमें, उनके लिये कौन - से चराचर प्राणी दोषावह हो सकते हैं ॥ १५-१६ ॥
पृथिव्या सह वैदेह्या श्रिया च पुरुषर्षभः ।
क्षिप्रं तिसृभिरेताभिः सह रामोऽभिषेक्ष्यते ॥ १७ ॥
' पुरुषशिरोमणि श्रीराम शीघ्र ही पृथ्वी, सीता और लक्ष्मी - इन तीनोंके साथ राज्यपर अभिषिक्त होंगे ॥ १७ ॥
दुःखजं विसृजत्यश्रु निष्क्रामन्तमुदीक्ष्य यम् ।
अयोध्यायां जनः सर्वः शोकवेगसमाहतः ॥ १८ ॥
कुशचीरधरं वीरं गच्छन्तमपराजितम् ।
सीतेवानुगता लक्ष्मीस्तस्य किं नाम दुर्लभम् ॥ १ ९ ॥
जिनको नगरसे निकलते देख अयोध्याका सारा जनसमुदाय शोकके वेगसे आहत हो नेत्रोंसे दुःखके आँसू बहा रहा है, कुश और चीर धारण करके वनको जाते हुए जिन अपराजित नित्यविजयी वीरके पीछे - पीछे सीताके रूपमें साक्षात् लक्ष्मी ही गयी है, उनके लिये क्या दुर्लभ है? ॥ १८-१९ ॥
धनुर्ग्रहवरो यस्य बाणखड्गास्त्रभृत् स्वयम् ।
लक्ष्मणो व्रजति ह्यग्रे तस्य किं नाम दुर्लभम् ॥ २० ॥
' जिनके आगे धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ लक्ष्मण स्वयं बाण और खड्ग आदि अस्त्र लिये जा रहे हैं, उनके लिये जगत्में कौन - सी वस्तु दुर्लभ है? ॥ २० ॥
निवृत्तवनवासं तं द्रष्टासि पुनरागतम् ।
जहि शोकं च मोहं च देवि सत्यं ब्रवीमि ते ॥ २१ ॥
' देवि! मैं तुमसे सत्य कहती हूँ । तुम वनवासकी अवधि पूर्ण होनेपर यहाँ लौटे हुए श्रीरामको फिर देखोगी, इसलिये तुम शोक और मोह छोड़ दो ॥ २१ ॥
शिरसा चरणावेतौ वन्दमानमनिन्दिते ।
पुनर्द्रक्ष्यसि कल्याणि पुत्रं चन्द्रमिवोदितम् ॥ २२ ॥
' कल्याणि! अनिन्दिते! तुम नवोदित चन्द्रमाके समान अपने पुत्रको पुनः अपने चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करते देखोगी ॥ २२ ॥
पुनः प्रविष्टं दृष्ट्वा तमभिषिक्तं महाश्रियम् ।
समुत्स्त्रक्ष्यसि नेत्राभ्यां शीघ्रमानन्दजं जलम् ॥ २३ ॥
' राजभवनमें प्रविष्ट होकर पुनः राजपदपर अभिषिक्त हुए अपने पुत्रको बड़ी भारी राजलक्ष्मीसे सम्पन्न देखकर तुम शीघ्र ही अपने नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाओगी ॥ २३ ॥
मा शोको देवि दुःखं वा न रामे दृष्यतेऽशिवम् ।
क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पुत्रं त्वं ससीतं सहलक्ष्मणम् ॥ २४ ॥
' देवि! श्रीरामके लिये तुम्हारे मनमें शोक और दुःख नहीं होना चाहिये; क्योंकि उनमें कोई अशुभ बात नहीं दिखायी देती । तुम सीता और लक्ष्मणके साथ अपने पुत्र श्रीरामको शीघ्र ही यहाँ उपस्थित देखोगी ॥ २४ ॥
त्वयाऽशेषो जनश्चायं समाश्वास्यो यतोऽनघे ।
किमिदानीमिदं देवि करोषि हृदि विक्लवम् ॥ २५ ॥
' पापरहित देवि! तुम्हें तो इन सब लोगोंको धैर्य बँधाना चाहिये, फिर स्वयं ही इस समय अपने हृदयमें इतना दुःख क्यों करती हो? ॥ २५ ॥
नार्हा त्वं शोचितुं देवि यस्यास्ते राघवः सुतः ।
नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः ॥ २६ ॥
' देवि! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि तुम्हें रघुकुलनन्दन राम - जैसा बेटा मिला है । श्रीरामसे बढ़कर सन्मार्गमें स्थिर रहनेवाला मनुष्य संसारमें दूसरा कोई नहीं है ॥ २६ ॥
अभिवादयमानं तं दृष्ट्वा ससुहृदं सुतम् ।
मुदाश्रु मोक्ष्यसे क्षिप्रं मेघरेखेव वार्षिकी ॥ २७ ॥
' जैसे वर्षाकालके मेघोंकी घटा जलकी वृष्टि करती है, उसी प्रकार तुम सुहृदोंसहित अपने पुत्र श्रीरामको अपने चरणोंमें प्रणाम करते देख शीघ्र ही आनन्दपूर्वक आँसुओंकी वर्षा करोगी ॥२७ ॥
पुत्रस्ते वरदः क्षिप्रमयोध्यां पुनरागतः । कराभ्यां मृदुपीनाभ्यां ' तुम्हारे वरदायक आकर अपने मोटे - मोटे पैरोंको दबायँगे ॥ २८ ॥
अभिवाद्य नमस्यन्तं मुदास्त्रैः प्रोक्षसे पुत्रं ' जैसे मेघमाला प्रकार तुम अभिवादन चरणौ पीडयिष्यति ॥ २८ ॥
पुत्र पुनः शीघ्र ही अयोध्यामें कोमल हाथोंद्वारा तुम्हारे दोनों
शूरं ससुहृदं सुतम् ।
मेघराजिरिवाचलम् ॥ २ ९ ॥
पर्वतको नहलाती है, उसी करके नमस्कार करते हुए | सुहृदोंसहित अपने शूरवीर पुत्रका आनन्दके आँसुओंसे
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३६० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अभिषेक करोगी ' ॥ २ ९ ॥ आश्वासयन्ती विविधैश्च वाक्यै-र्वाक्योपचारे कुशलानवद्या रामस्य तां मातरमेवमुक्त्वा देवी सुमित्रा विरराम रामा ॥ बातचीत करनेमें कुशल, दोषरहित तथा रूपवाली देवी सुमित्रा इस प्रकार तरह - तरहकी श्रीराममाता कौसल्याको आश्वासन देती हुई बातें कहकर चुप हो गयीं ॥ ३० ॥
निशम्य तल्लक्ष्मणमातृवाक्यं रामस्य मातुर्नरदेवपत्न्याः 1 । सद्यः शरीरे विननाश शोकः शरद्गतो मेघ इवाल्पतोयः ॥ ३१ ॥
३० ॥ लक्ष्मणकी माताका वह वचन सुनकर महाराज रमणीय दशरथकी पत्नी तथा श्रीरामकी माता कौसल्याका सा बातोंसे शोक उनके शरीर ( मन ) में ही तत्काल विलीन हो उपर्युक्त गया । ठीक उसी तरह, जैसे शरद् ऋतुका थोड़े जलवाला बादल शीघ्र ही छिन्न - भिन्न हो जाता है ॥ ३१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
पञ्चचत्वारिंशः सर्गः श्रीरामका पुरवासियोंसे भरत और महाराज दशरथके प्रति प्रेम - भाव रखनेका अनुरोध करते हुए लौट जानेके लिये कहना; नगरके वृद्ध ब्राह्मणोंका श्रीरामसे लौट चलनेके लिये आग्रह करना तथा उन सबके साथ श्रीरामका तमसातटपर पहुँचना
अनुरक्ता महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।
अनुजग्मुः प्रयान्तं तं वनवासाय मानवाः ॥ १ ॥
उधर सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम जब वनकी ओर जाने लगे, उस समय उनके प्रति अनुराग रखनेवाले बहुत - से अयोध्यावासी मनुष्य वनमें निवास करनेके लिये उनके पीछे - पीछे चल दिये ॥ १ ॥
निवर्तितेऽतीव बलात् सुहृद्धर्मेण राजनि ।
नैव ते संन्यवर्तन्त रामस्यानुगता रथम् ॥ २ ॥
' जिसके जल्दी लौटनेकी कामना की जाय, उस स्वजनको दूरतक नहीं पहुँचाना चाहिये ' – इत्यादि रूपसे बताये गये सुहृद्धर्मके अनुसार जब राजा दशरथ बलपूर्वक लौटा दिये गये, तब भी जो श्रीरामजीके रथके पीछे - पीछे लगे हुए थे, वे अयोध्यावासी अपने घरकी ओर नहीं लौटे ॥ २ ॥
अयोध्यानिलयानां हि पुरुषाणां महायशाः ।
बभूव गुणसम्पन्नः पूर्णचन्द्र इव प्रियः ॥ ३ ॥
क्योंकि अयोध्यावासी पुरुषोंके लिये सद्गुणसम्पन्न महायशस्वी श्रीराम पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रिय हो गये थे ॥
स याच्यमानः काकुत्स्थस्ताभिः प्रकृतिभिस्तदा ।
कुर्वाणः पितरं सत्यं वनमेवान्वपद्यत ॥ ४ ॥
उन प्रजाजनोंने श्रीरामसे घर लौट चलनेके लिये बहुत प्रार्थना की; किंतु वे पिताके सत्यकी रक्षा करनेके लिये वनकी ओर ही बढ़ते गये ॥४ ॥
अवेक्षमाणः सस्नेहं चक्षुषा प्रपिबन्निव ।
उवाच रामः सस्नेहं ताः प्रजाः स्वाः प्रजा इव ॥५ ॥
वे प्रजाजनोंको इस प्रकार स्नेहभरी दृष्टिसे देख रहे थे मानो नेत्रोंसे उन्हें पी रहे हों । उस समय श्रीरामने अपनी संतानके समान प्रिय उन प्रजाजनोंसे स्नेहपूर्वक | कहा— ॥ ५ ॥
या प्रीतिर्बहुमानश्च मय्ययोध्यानिवासिनाम् ।
मत्प्रियार्थं विशेषेण भरते सा विधीयताम् ॥६ ॥
' अयोध्यानिवासियोंका मेरे प्रति जो प्रेम और आदर है, वह मेरी ही प्रसन्नताके लिये भरतके प्रति और अधिक रूपमें होना चाहिये ॥ ६ ॥
स हि कल्याणचारित्रः कैकेय्यानन्दवर्धनः ।
करिष्यति यथावद् वः प्रियाणि च हितानि च ॥ ७ ॥
' उनका चरित्र बड़ा ही सुन्दर और सबका कल्याण करनेवाला है । कैकेयीका आनन्द बढ़ानेवाले भरत आप लोगोंका यथावत् प्रिय और हित करेंगे ॥७ ॥
ज्ञानवृद्धो वयोबालो मृदुर्वीर्यगुणान्वितः ।
अनुरूपः स वो भर्ता भविष्यति भयापहः ॥ ८ ॥
' वे अवस्थामें छोटे होनेपर भी ज्ञानमें बड़े हैं ।
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अयोध्याकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ३६१ पराक्रमोचित गुणोंसे सम्पन्न होनेपर भी स्वभावके बड़े । कोमल हैं । वे आपलोगोंके लिये योग्य राजा होंगे और प्रजाके भयका निवारण करेंगे ॥ ८ ॥
स हि राजगुणैर्युक्तो युवराजः समीक्षितः ।
अपि चापि मया शिष्टैः कार्यं वो भर्तृशासनम् ॥ ९ ॥
' वे मुझसे भी अधिक राजोचित गुणोंसे युक्त हैं, इसीलिये महाराजने उन्हें युवराज बनानेका निश्चय किया है; अतः आपलोगोंको अपने स्वामी भरतकी आज्ञाका सदा पालन करना चाहिये ॥ ९ ॥
न संतप्येद् यथा चासौ वनवासं गते मयि ।
महाराजस्तथा कार्यो मम प्रियचिकीर्षया ॥ १० ॥
' मेरे वनमें चले जानेपर महाराज दशरथ जिस प्रकार भी शोकसे संतप्त न होने पायें, इस बातके लिये आपलोग सदा चेष्टा रखें । मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे आपको मेरी इस प्रार्थनापर अवश्य ध्यान देना चाहिये ' ॥
यथा यथा दाशरथिर्धर्ममेवाश्रितो भवेत् ।
तथा तथा प्रकृतयो रामं पतिमकामयन् ॥ ११ ॥
दशरथनन्दन श्रीरामने ज्यों - ज्यों धर्मका आश्रय लेनेके लिये ही दृढ़ता दिखायी, त्यों - ही - त्यों प्रजाजनोंके मनमें उन्हींको अपना स्वामी बनानेकी इच्छा प्रबल होती गयी ॥
बाष्पेण पिहितं दीनं रामः सौमित्रिणा सह ।
चकर्षेव गुणैर्बद्धं जनं पुरनिवासिनम् ॥ १२ ॥
समस्त पुरवासी अत्यन्त दीन होकर आँसू बहा रहे थे और लक्ष्मणसहित श्रीराम मानो अपने गुणोंमें बाँधकर उन्हें खींचे लिये जा रहे थे ॥ १२ ॥
ते द्विजास्त्रिविधं वृद्धा ज्ञानेन वयसौजसा ।
वयःप्रकम्पशिरसो दूरादूचुरिदं वचः ॥ १३ ॥
उनमें बहुत - से ब्राह्मण थे, जो ज्ञान, अवस्था और तपोबल – तीनों ही दृष्टियोंसे बड़े थे । वृद्धावस्थाके कारण कितनोंके तो सिर काँप रहे थे । वे दूरसे ही इस प्रकार बोले - ॥ १३ ॥
वहन्तो जवना रामं भो भो जात्यास्तुरंगमाः ।
निवर्तध्वं न गन्तव्यं हिता भवत भर्तरि ॥१४ ॥
' अरे! ओ तेज चलनेवाले अच्छी जातिके घोड़ो! तुम बड़े वेगशाली हो और श्रीरामको वनकी ओर लिये जा रहे हो, लौटो! अपने स्वामीके हितैषी बनो! तुम्हें वनमें नहीं जाना चाहिये ॥१४ ॥
कर्णवन्ति हि भूतानि विशेषेण तुरङ्गमाः ।
यूयं तस्मान्निवर्तध्वं याचनां प्रतिवेदिताः ॥ १५ ॥
‘ यों तो सभी प्राणियोंके कान होते हैं, परंतु घोड़ोंके कान बड़े होते हैं; अतः तुम्हें हमारी याचनाका ज्ञान तो हो ही गया होगा; इसलिये घरकी ओर लौट चलो ॥ १५ ॥
धर्मतः स विशुद्धात्मा वीरः शुभदृढव्रतः ।
। उपवाह्यस्तु वो भर्ता नापवाह्यः पुराद् वनम् ॥ १६ ॥
' तुम्हारे स्वामी श्रीराम विशुद्धात्मा, वीर और उत्तम व्रतका दृढ़तासे पालन करनेवाले हैं, अतः तुम्हें इनका उपवहन करना चाहिये - इन्हें बाहरसे नगरके समीप ले चलना चाहिये । नगरसे वनकी ओर इनका अपवहन करना— इन्हें ले जाना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है ' ॥ १६ ॥
एवमार्तप्रलापांस्तान् वृद्धान् प्रलपतो द्विजान् ।
अवेक्ष्य सहसा रामो रथादवततार ह ॥ १७ ॥
वृद्ध ब्राह्मणोंको इस प्रकार आर्तभावसे प्रलाप करते देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा रथसे नीचे उतर गये ॥
पद्भ्यामेव जगामाथ ससीतः सहलक्ष्मणः ।
संनिकृष्टपदन्यासो रामो वनपरायणः ॥ १८ ॥
वे सीता और लक्ष्मणके साथ पैदल ही चलने लगे । ब्राह्मणोंका साथ न छूटे, इसके लिये वे अपना पैर बहुत निकट रखते थे - लंबे डगसे नहीं चलते थे । वनमें पहुँचना ही उनकी यात्राका परम लक्ष्य था ॥१८ ॥
द्विजातीन् हि पदातींस्तान् रामश्चारित्रवत्सलः ।
न शशाक घृणाचक्षुः परिमोक्तुं रथेन सः ॥ १ ९ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रमें वात्सल्य - गुणकी प्रधानता थी । उनकी दृष्टिमें दया भरी हुई थी; इसलिये वे रथके द्वारा चलकर उन पैदल चलनेवाले ब्राह्मणोंको पीछे छोड़नेका साहस न कर सके ॥ १ ९ ॥
गच्छन्तमेव तं दृष्ट्वा रामं सम्भ्रान्तमानसाः ।
ऊचुः परमसंतप्ता रामं वाक्यमिदं द्विजाः ॥ २० ॥
श्रीरामको अब भी वनकी ओर ही जाते देख वे ब्राह्मण मन - ही - मन घबरा उठे और अत्यन्त संतप्त होकर उनसे इस प्रकार बोले - ॥ २० ॥
। ब्राह्मण्यं कृत्स्नमेतत् त्वां ब्रह्मण्यमनुगच्छति ।
द्विजस्कन्धाधिरूढास्त्वामग्नयोऽप्यनुयान्त्वमी ॥ २१ ॥
' रघुनन्दन! तुम ब्राह्मणोंके हितैषी हो, इसीसे यह सारा ब्राह्मण समाज तुम्हारे पीछे - पीछे चल रहा है । इन ब्राह्मणोंके कंधोंपर चढ़कर अग्निदेव भी तुम्हारा अनुसरण कर रहे हैं ॥ २१ ॥
वाजपेयसमुत्थानि च्छ्त्राण्येतानि पश्य नः ।
पृष्ठतोऽनुप्रयातानि मेघानिव जलात्यये ॥ २२ ॥
' वर्षा बीतनेपर शरद् ऋतुमें दिखायी देनेवाले | सफेद बादलोंके समान हमारे इन श्वेत छत्रोंकी ओर
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३६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे देखो, जो तुम्हारे पीछे - पीछे चल पड़े हैं । ये हमें वाजपेय यज्ञमें प्राप्त हुए थे ॥ २२ ॥
अनवाप्तातपत्रस्य रश्मिसंतापितस्य ते ।
एभिश्छायां करिष्यामः स्वैश्छत्रैर्वाजपेयकैः ॥ २३ ॥
' तुम्हें राजकीय श्वेतच्छत्र नहीं प्राप्त हुआ, अतएव तुम सूर्यदेवकी किरणोंसे संतप्त हो रहे हो । इस अवस्थामें हम वाजपेय यज्ञमें प्राप्त हुए इन अपने छत्रोंद्वारा तुम्हारे लिये छाया करेंगे ॥ २३ ॥
या हि नः सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी ।
त्वत्कृते सा कृता वत्स वनवासानुसारिणी ॥ २४ ॥
‘ वत्स! हमारी जो बुद्धि सदा वेदमन्त्रोंके पीछे चलती थी — उन्हींके चिन्तनमें लगी रहती थी, वही तुम्हारे लिये वनवासका अनुसरण करनेवाली हो गयी है ॥२४ ॥
हृदयेष्ववतिष्ठन्ते वेदा ये नः परं धनम् ।
वत्स्यन्त्यपि गृहेष्वेव दाराश्चारित्ररक्षिताः ॥ २५ ॥
' जो हमारे परम धन वेद हैं, वे हमारे हृदयों में स्थित हैं । हमारी स्त्रियाँ अपने चरित्रबलसे सुरक्षित रहकर घरोंमें ही रहेंगी ॥ २५ ॥
पुनर्न निश्चयः कार्यस्त्वद्गतौ सुकृता मतिः ।
त्वयि धर्मव्यपेक्षे तु किं स्याद् धर्मपथे स्थितम् ॥ २६ ॥
‘ अब हमें अपने कर्तव्यके विषयमें पुनः कुछ निश्चय नहीं करना है । हमने तुम्हारे साथ जानेका विचार स्थिर कर लिया है । तो भी हमें इतना अवश्य कहना है कि ' जब तुम ही ब्राह्मणकी आज्ञाके पालनरूपी धर्मकी ओरसे निरपेक्ष हो जाओगे, तब दूसरा कौन प्राणी धर्ममार्गपर स्थित रह सकेगा ॥ २६ ॥
याचितो नो निवर्तस्व हंसशुक्लशिरोरुहैः ।
शिरोभिर्निभृताचार महीपतनपांसुलैः ॥ २७ ॥
' सदाचारका पोषण करनेवाले श्रीराम! हमारे सिरके बाल पककर हंसके समान सफेद हो गये हैं और पृथ्वीपर पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम करनेसे इनमें धूल भर गयी है । हम अपने ऐसे मस्तकोंको झुकाकर तुमसे याचना करते हैं कि तुम घरको लौट चलो ( वे तत्त्वज्ञ ब्राह्मण यह जानते थे कि श्रीराम साक्षात् भगवान् विष्णु हैं । इसीलिये उनका श्रीरामके प्रति प्रणाम करना दोषकी बात नहीं है ) ॥
बहूनां वितता यज्ञा द्विजानां य इहागताः ।
तेषां समाप्तिरायत्ता तव वत्स निवर्तने ॥ २८ ॥ ।
' ( इतनेपर भी जब श्रीराम नहीं रुके, तब वे ब्राह्मण बोले— ) वत्स! जो लोग यहाँ आये हैं, इनमें बहुत-से ऐसे ब्राह्मण हैं, जिन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दिया है; अब इनके यज्ञोंकी समाप्ति तुम्हारे लौटनेपर ही निर्भर है ।
भक्तिमन्तीह भूतानि जङ्गमाजङ्गमानि च ।
याचमानेषु तेषु त्वं भक्तिं भक्तेषु दर्शय ॥ २ ९ ॥
' संसारके स्थावर और जङ्गम सभी प्राणी तुम्हारे प्रति भक्ति रखते हैं । वे सब तुमसे लौट चलनेकी प्रार्थना कर रहे हैं । अपने उन भक्तोंपर तुम अपना स्नेह दिखाओ ॥
अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः ।
उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः ॥ ३० ॥
' ये वृक्ष अपनी जड़ोंके कारण अत्यन्त वेगहीन हैं, इसीसे तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते; परंतु वायुके वेगसे इनमें जो सनसनाहट पैदा होती है, उनके द्वारा ये ऊँचे वृक्ष मानो तुम्हें पुकार रहे हैं - तुमसे लौट चलनेकी प्रार्थना कर रहे हैं ॥३० ॥
निश्चेष्टाहारसंचारा वृक्षैकस्थाननिश्चिताः ।
पक्षिणोऽपि प्रयाचन्ते सर्वभूतानुकम्पिनम् ॥३१ ॥
' जो सब प्रकारकी चेष्टा छोड़ चुके हैं, चारा चुगनेके लिये भी कहीं उड़कर नहीं जाते हैं और निश्चितरूपसे वृक्षके एक स्थानपर ही पड़े रहते हैं, वे पक्षी भी तुमसे लौट चलनेके लिये प्रार्थना कर रहे हैं; क्योंकि तुम समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेवाले हो ' ॥ ३१ ॥
एवं विक्रोशतां तेषां द्विजातीनां निवर्तने ।
ददृशे तमसा तत्र वारयन्तीव राघवम् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीरामसे लौटनेके लिये पुकार मचाते हुए उन ब्राह्मणोंपर मानो कृपा करनेके लिये मार्गमें तमसा नदी दिखायी दी, जो अपने तिर्यक् - प्रवाह ( तिरछी धारा ) से श्रीरघुनाथजीको रोकती हुई - सी प्रतीत होती थी ॥ ३२ ॥
ततः सुमन्त्रोऽपि रथाद् विमुच्य
श्रान्तान् हयान् सम्परिवर्त्य शीघ्रम् ।
पीतोदकांस्तोयपरिप्लुताङ्गा-नचारयद् वै तमसाविदूरे ॥ ३३ ॥
वहाँ पहुँचनेपर सुमन्त्रने भी थके हुए घोड़ोंको शीघ्र ही रथसे खोलकर उन सबको टहलाया, फिर पानी पिलाया और नहलाया, तत्पश्चात् तमसाके निकट ही चरनेके लिये छोड़ दिया ॥ ३३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
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अयोध्याकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ३६३ षट्चत्वारिंशः सर्गः सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका रात्रिमें तमसा - तटपर निवास, माता - पिता और अयोध्याके लिये चिन्ता तथा पुरवासियोंको सोते छोड़कर वनकी ओर जाना
ततस्तु तमसातीरं रम्यमाश्रित्य राघवः ।
सीतामुद्वीक्ष्य सौमित्रिमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
तदनन्तर तमसाके रमणीय तटका आश्रय लेकर श्रीरामने सीताकी ओर देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥
इयमद्य निशा पूर्वा सौमित्रे प्रहिता वनम् ।
वनवासस्य भद्रं ते न चोत्कण्ठितुमर्हसि ॥ २ ॥
' सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो । हमलोग जो वनकी ओर प्रस्थित हुए हैं, हमारे उस वनवासकी आज यह पहली रात प्राप्त हुई है; अतः अब तुम्हें नगरके लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये ॥ २ ॥ ।
पश्य शून्यान्यरण्यानि रुदन्तीव समन्ततः ।
यथानिलयमायद्भिर्निलीनानि मृगद्विजैः ॥ ३ ॥
' इन सूने वनोंकी ओर तो देखो, इनमें वन्य पशु-पक्षी अपने - अपने स्थानपर आकर अपनी बोली बोल रहे हैं । उनके शब्दसे सारी वनस्थली व्याप्त हो गयी है, मानो ये सारे वन हमें इस अवस्थामें देखकर खिन्न हो सब ओरसे रो रहे हैं ॥ ३ ॥
अद्यायोध्या तु नगरी राजधानी पितुर्मम ।
सस्त्रीपुंसा गतानस्मान् शोचिष्यति न संशयः ॥ ४ ॥
‘ आज मेरे पिताकी राजधानी अयोध्या नगरी वनमें आये हुए हमलोगोंके लिये समस्त नर - नारियोंसहित शोक करेगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
अनुरक्ता हि मनुजा राजानं बहुभिर्गुणैः ।
त्वां च मां च नरव्याघ्र शत्रुघ्नभरतौ तथा ॥ ५ ॥
' पुरुषसिंह! अयोध्याके मनुष्य बहुत - से सद्गुणोंके कारण महाराजमें, तुममें, मुझमें तथा भरत और शत्रुघ्नमें भी अनुरक्त हैं ॥ ५ ॥
पितरं चानुशोचामि मातरं च यशस्विनीम् ।
अपि नान्धौ भवेतां नौ रुदन्तौ तावभीक्ष्णशः ॥ ६ ॥
' इस समय मुझे पिता और यशस्विनी माताके लिये बड़ा शोक हो रहा है; कहीं ऐसा न हो कि वे निरन्तर रोते रहनेके कारण अंधे हो जायँ ॥ ६ ॥
भरतः खलु धर्मात्मा पितरं मातरं च मे ।
धर्मार्थकामसहितैर्वाक्यैराश्वासयिष्यति ॥ ७ ॥
‘ परंतु भरत बड़े धर्मात्मा हैं । अवश्य ही वे धर्म, अर्थ और काम- तीनोंके अनुकूल वचनोंद्वारा पिताजीको और मेरी माताको भी सान्त्वना देंगे ॥७ ॥
भरतस्यानृशंसत्वं संचिन्त्याहं पुनः पुनः ।
नानुशोचामि पितरं मातरं च महाभुज ॥ ८ ॥
' महाबाहो! जब मैं भरतके कोमल स्वभावका बार - बार स्मरण करता हूँ, तब मुझे माता - पिताके लिये अधिक चिन्ता नहीं होती ॥८ ॥
त्वया कार्यं नरव्याघ्र मामनुव्रजता कृतम् ।
अन्वेष्टव्या हि वैदेह्या रक्षणार्थं सहायता ॥ ९ ॥
' नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुमने मेरे साथ आकर बड़ा ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया है; क्योंकि तुम न आते तो मुझे विदेहकुमारी सीताकी रक्षाके लिये कोई सहायक ढूँढ़ना पड़ता ॥ ९ ॥
अद्भिरेव हि सौमित्रे वत्स्याम्यद्य निशामिमाम् ।
एतद्धि रोचते मह्यं वन्येऽपि विविधे सति ॥ १० ॥
' सुमित्रानन्दन! यद्यपि यहाँ नाना प्रकारके जंगली फल - मूल मिल सकते हैं तथापि आजकी यह रात मैं केवल जल पीकर ही बिताऊँगा । यही मुझे अच्छा जान पड़ता है'॥१० ॥
एवमुक्त्वा तु सौमित्रिं सुमन्त्रमपि राघवः ।
अप्रमत्तस्त्वमश्वेषु भव सौम्येत्युवाच ह ॥ ११ ॥
लक्ष्मणसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्र भी कहा - ' सौम्य! अब आप घोड़ोंकी रक्षापर ध्यान दें, उनकी ओरसे असावधान न हों ' ॥ ११ ॥
सोऽश्वान् सुमन्त्रः संयम्य सूर्येऽस्तं समुपागते ।
प्रभूतयवसान् कृत्वा बभूव प्रत्यनन्तरः ॥ १२ ॥
सुमन्त्रने सूर्यास्त हो जानेपर घोड़ोंको लाकर बाँध दिया और उनके आगे बहुत - सा चारा डालकर वे श्रीरामके पास आ गये ॥ १२ ॥
उपास्य तु शिवां संध्यां दृष्ट्वा रात्रिमुपागताम् ।
रामस्य शयनं चक्रे सूतः सौमित्रिणा सह ॥ १३ ॥
फिर ( वर्णानुकूल ) कल्याणमयी संध्योपासना करके रात आयी देख लक्ष्मणसहित सुमन्त्रने श्रीरामचन्द्रजीके शयन करनेयोग्य स्थान और आसन ठीक किया ॥ १३ ॥
तां शय्यां तमसातीरे वीक्ष्य वृक्षदलैर्वृताम् ।
। रामः सौमित्रिणा सार्धं सभार्यः संविवेश ह ॥ १४ ॥
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३६४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तमसाके तटपर वृक्षके पत्तोंसे बनी हुई वह । शय्या देखकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताके साथ उसपर बैठे ॥१४ ॥
सभार्यं सम्प्रसुप्तं तु श्रान्तं सम्प्रेक्ष्य लक्ष्मणः ।
कथयामास सूताय रामस्य विविधान् गुणान् ॥ १५ ॥
थोड़ी देरमें सीतासहित श्रीरामको थककर सोया हुआ देख लक्ष्मण सुमन्त्रसे उनके नाना प्रकारके गुणोंका वर्णन करने लगे ॥ १५ ॥
जाग्रतोरेव तां रात्रिं सौमित्रेरुदितो रविः ।
सूतस्य तमसातीरे रामस्य ब्रुवतो गुणान् ॥ १६ ॥
सुमन्त्र और लक्ष्मण तमसाके किनारे श्रीरामके गुणोंकी चर्चा करते हुए रातभर जागते रहे । इतनेहीमें सूर्योदयका समय निकट आ पहुँचा ॥१६ ॥
गोकुलाकुलतीरायास्तमसाया विदूरतः ।
अवसत् तत्र तां रात्रिं रामः प्रकृतिभिः सह ॥ १७ ॥
तमसाका वह तट गौओंके समुदायसे भरा हुआ । था । श्रीरामचन्द्रजीने प्रजाजनोंके साथ वहीं रात्रिमें निवास किया । वे प्रजाजनोंसे कुछ दूरपर सोये थे ॥ १७ ॥
उत्थाय च महातेजाः प्रकृतीस्ता निशाम्य च ।
अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं पुण्यलक्षणम् ॥ १८ ॥
महातेजस्वी श्रीराम तड़के ही उठे और प्रजाजनोंको सोते देख पवित्र लक्षणोंवाले भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले- - ॥१८ ॥
अस्मद्व्यपेक्षान् सौमित्रे निर्व्यपेक्षान् गृहेष्वपि ।
वृक्षमूलेषु संसक्तान् पश्य लक्ष्मण साम्प्रतम् ॥ १ ९ ॥
' सुमित्राकुमार लक्ष्मण! इन पुरवासियोंकी ओर देखो, ये इस समय वृक्षोंकी जड़से सटकर सो रहे हैं । इन्हें केवल हमारी चाह है । ये अपने घरोंकी ओरसे भी पूर्ण निरपेक्ष हो गये हैं ॥ १ ९ ॥
यथैते नियमं पौराः कुर्वन्त्यस्मन्निवर्तने ।
अपि प्राणान् न्यसिष्यन्ति न तु त्यक्ष्यन्ति निश्चयम् ॥ २० ॥
' हमें लौटा ले चलनेके लिये ये जैसा उद्योग कर रहे हैं, इससे जान पड़ता है, ये अपना प्राण त्याग देंगे; किंतु अपना निश्चय नहीं छोड़ेंगे ॥ २० ॥
यावदेव तु संसुप्तास्तावदेव वयं लघु ।
रथमारुह्य गच्छामः पन्थानमकुतोभयम् ॥ २१ ॥
' अतः जबतक ये सो रहे हैं तभीतक हमलोग रथपर सवार होकर शीघ्रतापूर्वक यहाँसे चल दें । फिर हमें इस मार्गपर और किसीके आनेका भय नहीं रहेगा ॥ २१ ॥
अतो भूयोऽपि नेदानीमिक्ष्वाकुपुरवासिनः ।
स्वपेयुरनुरक्ता मा वृक्षमूलेषु संश्रिताः ॥ २२ ॥
' अयोध्यावासी हमलोगोंके अनुरागी हैं । जब हम यहाँसे निकल चलेंगे, तब उन्हें फिर अब इस प्रकार वृक्षोंकी जड़ोंसे सटकर नहीं सोना पड़ेगा ॥ २२ ॥
पौरा ह्यात्मकृताद् दुःखाद् विप्रमोच्या नृपात्मजैः ।
न तु खल्वात्मना योज्या दुःखेन पुरवासिनः ॥२३ ॥
' राजकुमारोंका यह कर्तव्य है कि वे पुरवासियोंको अपने द्वारा होनेवाले दुःखसे मुक्त करें, न कि अपना दुःख देकर उन्हें और दुःखी बना दें ' ॥ २३ ॥
अब्रवील्लक्ष्मणो रामं साक्षाद् धर्ममिव स्थितम् ।
रोचते मे तथा प्राज्ञ क्षिप्रमारुह्यतामिति ॥२४ ॥
यह सुनकर लक्ष्मणने साक्षात् धर्मके समान विराजमान भगवान् श्रीरामसे कहा — ' परम बुद्धिमान् आर्य! मुझे
आपकी राय पसंद है । शीघ्र ही रथपर सवार होइये ' ॥ २४ ॥
अथ रामोऽब्रवीत् सूतं शीघ्रं संयुज्यतां रथः ।
गमिष्यामि ततोऽरण्यं गच्छ शीघ्रमितः प्रभो ॥ २५ ॥
तब श्रीरामने सुमन्त्रसे कहा - ' प्रभो! आप जाइये और शीघ्र ही रथ जोतकर तैयार कीजिये । फिर मैं जल्दी ही यहाँसे वनकी ओर चलूँगा ' ॥ २५ ॥
सूतस्ततः संत्वरितः स्यन्दनं तैर्हयोत्तमैः ।
योजयित्वा तु रामस्य प्राञ्जलिः प्रत्यवेदयत् ॥ २६ ॥
आज्ञा पाकर सुमन्त्रने उन उत्तम घोड़ोंको तुरंत ही रथमें जोत दिया और श्रीरामके पास हाथ जोड़कर निवेदन किया- ॥ २६ ॥
अयं युक्तो महाबाहो रथस्ते रथिनां वर ।
त्वरयाऽऽरोह भद्रं ते ससीतः सहलक्ष्मणः ॥ २७ ॥
' महाबाहो! रथियोंमें श्रेष्ठ वीर! आपका कल्याण हो । आपका यह रथ जुता हुआ तैयार है । अब सीता और लक्ष्मणके साथ शीघ्र इसपर सवार होइये ' ॥ २७ ॥
तं स्यन्दनमधिष्ठाय राघवः सपरिच्छदः ।
शीघ्रगामाकुलावर्ता तमसामतरन्नदीम् ॥ २८ ॥
श्रीरामचन्द्रजी सबके साथ रथपर बैठकर तीव्र-गतिसे बहनेवाली भँवरोंसे भरी हुई तमसा नदीके उस पार गये ॥२८ ॥
स संतीर्य महाबाहुः श्रीमान् शिवमकण्टकम् ।
प्रापद्यत महामार्गमभयं भयदर्शिनाम् ॥ २ ९ ॥
नदीको पार करके महाबाहु श्रीमान् राम ऐसे महान् मार्गपर जा पहुँचे जो कल्याणप्रद, कण्टकरहित तथा सर्वत्र भय देखनेवालोंके लिये भी भयसे रहित था ॥ २ ९ ॥
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अयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ३६५
मोहनार्थं तु पौराणां सूतं रामोऽब्रवीद् वचः ।
उदङ्मुखः प्रयाहि त्वं रथमारुह्य सारथे ॥ ३० ॥
मुहूर्तं त्वरितं गत्वा निवर्तय रथं पुनः ।
यथा न विद्युः पौरा मां तथा कुरु समाहितः ॥ ३१ ॥
उस समय श्रीरामने पुरवासियोंको भुलावा देनेके लिये सुमन्त्रसे यह बात कही- ' सारथे! ( हमलोग तो यहीं उतर जाते हैं; ) परंतु आप रथपर आरूढ़ होकर पहले उत्तर दिशाकी ओर जाइये । दो घड़ीतक तीव्र गतिसे उत्तर जाकर फिर दूसरे मार्गसे रथको यहीं लौटा लाइये । जिस तरह भी पुरवासियोंको मेरा पता न चले, वैसा एकाग्रतापूर्वक प्रयत्न कीजिये ' ॥ ३०-३१ ॥
- रामस्य तु वचः श्रुत्वा तथा चक्रे च सारथिः ।
प्रत्यागम्य च रामस्य स्यन्दनं प्रत्यवेदयत् ॥ ३२ ॥
श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारथिने वैसा ही किया और लौटकर पुनः श्रीरामकी सेवामें रथ उपस्थित कर दिया ॥ ३२ ॥
तौ सम्प्रयुक्तं तु रथं समास्थितौ तदा ससीतौ रघुवंशवर्धनौ । प्रचोदयामास ततस्तुरंगमान् स सारथिर्येन पथा तपोवनम् ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण, जो रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे, लौटाकर लाये गये उस रथपर चढ़े । तदनन्तर सारथिने घोड़ोंको उस मार्गपर बढ़ा दिया, जिससे तपोवनमें पहुँचा जा सकता था ॥ ३३ ॥
ततः समास्थाय रथं महारथः ससारथिर्दाशरथिर्वनं ययौ । उदङ्मुखं तं तु रथं चकार प्रयाणमाङ्गल्यनिमित्तदर्शनात् ॥ ३४ ॥
तदनन्तर सारथिसहित महारथी श्रीरामने यात्राकालिक मङ्गलसूचक शकुन देखनेके लिये पहले तो उस रथको उत्तराभिमुख खड़ा किया; फिर वे उस रथपर आरूढ़ होकर वनकी ओर चल दिये ॥ ३४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
सप्तचत्वारिंशः सर्गः प्रातःकाल उठनेपर पुरवासियोंका विलाप
प्रभातायां तु शर्वय पौरास्ते राघवं विना ।
शोकोपहतनिश्चेष्टा बभूवुर्हतचेतसः ॥ १ ॥
इधर रात बीतने पर जब सबेरा हुआ, तब अयोध्यावासी मनुष्य श्रीरघुनाथजीको न देखकर अचेत हो गये । शोकसे व्याकुल होनेके कारण उनसे कोई भी चेष्टा करते न बनी ॥ १ ॥
शोकजानुपरिद्यूना वीक्षमाणास्ततस्ततः ।
आलोकमपि रामस्य न पश्यन्ति स्म दुःखिताः ॥ २ ॥
वे शोकजनित आँसू बहाते हुए अत्यन्त खिन्न हो गये तथा इधर - उधर उनकी खोज करने लगे । परंतु उन दुःखी पुरवासियोंको श्रीराम किधर गये, इस बातका पता देनेवाला कोई चिह्नतक नहीं दिखायी दिया ॥ २ ॥
ते विषादार्तवदना रहितास्तेन धीमता ।
कृपणाः करुणा वाचो वदन्ति स्म मनीषिणः ॥ ३ ॥
बुद्धिमान् श्रीरामसे विलग होकर वे अत्यन्त दीन हो गये । उनके मुखपर विषादजनित वेदना स्पष्ट दिखायी देती थी । वे मनीषी पुरवासी करुणाभरे वचन बोलते हुए विलाप करने लगे -॥३ ॥
करना और निराश होकर नगरको लौटना
धिगस्तु खलु निद्रां तां ययापहतचेतसः ।
नाद्य पश्यामहे रामं पृथूरस्कं महाभुजम् ॥४ ॥
' हाय! हमारी उस निद्राको धिक्कार है, जिससे अचेत हो जानेके कारण हम उस समय विशाल वक्षवाले महाबाहु श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित हो गये हैं ॥४ ॥
कथं रामो महाबाहुः स तथावितथक्रियः ।
भक्तं जनमभित्यज्य प्रवासं तापसो गतः ॥ ५ ॥
' जिनकी कोई भी क्रिया कभी निष्फल नहीं होती, वे तापसवेषधारी महाबाहु श्रीराम हम भक्तजनोंको छोड़कर परदेश ( वन ) में कैसे चले गये? ॥५ ॥
यो नः सदा पालयति पिता पुत्रानिवौरसान् ।
कथं रघूणां स श्रेष्ठस्त्यक्त्वा नो विपिनं गतः ॥ ६ ॥
' जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार जो सदा हमारी रक्षा करते थे, वे ही रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम आज हमें छोड़कर वनको क्यों चले गये? ॥ ६ ॥
। इहैव निधनं याम महाप्रस्थानमेव वा ।
रामेण रहितानां नो किमर्थं जीवितं हितम् ॥ ७ ॥
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३६६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' अब हमलोग यहीँ प्राण दे दें या मरनेका । निश्चय करके उत्तर दिशाकी ओर चल दें । श्रीरामसे रहित होकर हमारा जीवन - धारण किसलिये हितकर हो सकता है? ॥७ ॥
सन्ति शुष्काणि काष्ठानि प्रभूतानि महान्ति च ।
तैः प्रज्वाल्य चितां सर्वे प्रविशामोऽथवा वयम् ॥ ८ ॥
' अथवा यहाँ बहुत - से बड़े - बड़े सूखे काठ पड़े हैं, उनसे चिता जलाकर हम सब लोग उसीमें प्रवेश कर जायँ ॥८ ॥
किं वक्ष्यामो महाबाहुरनसूयः प्रियंवदः ।
नीतः स राघवोऽस्माभिरिति वक्तुं कथं क्षमम् ॥ ९ ॥
' ( यदि हमसे कोई श्रीरामका वृत्तान्त पूछेगा तो हम उसे क्या उत्तर देंगे? ) क्या हम यह कहेंगे कि जो किसीके दोष नहीं देखते और सबसे प्रिय वचन बोलते हैं, उन महाबाहु श्रीरघुनाथजीको हमने वनमें पहुँचा दिया है? हाय! यह अयोग्य बात हमारे मुँहसे कैसे निकल सकती है? ॥९ ॥
सा नूनं नगरी दीना दृष्ट्वास्मान् राघवं विना ।
भविष्यति निरानन्दा सस्त्रीबालवयोऽधिका ॥ १० ॥
' श्रीरामके बिना हमलोगोंको लौटा हुआ देखकर स्त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारी अयोध्यानगरी निश्चय ही दीन और आनन्दहीन हो जायगी ॥ १० ॥
निर्यातास्तेन वीरेण सह नित्यं महात्मना ।
विहीनास्तेन च पुनः कथं द्रक्ष्याम तां पुरीम् ॥ ११ ॥
' हमलोग वीरवर महात्मा श्रीरामके साथ सर्वदा निवास करनेके लिये निकले थे । अब उनसे बिछुड़कर हम अयोध्यापुरीको कैसे देख सकेंगे ' ॥ ११ ॥
इतीव बहुधा वाचो बाहुमुद्यम्य ते जनाः ।
विलपन्ति स्म दुःखार्ता हृतवत्सा इवाग्र्यगाः ॥ १२ ॥
इस प्रकार अनेक तरहकी बातें कहते हुए वे समस्त पुरवासी अपनी भुजा उठाकर विलाप करने लगे । वे बछड़ोंसे बिछुड़ी हुई अग्रगामिनी गौओंकी भाँति दुःखसे व्याकुल हो रहे थे ॥१२ ॥
ततो मार्गानुसारेण गत्वा किंचित् ततः क्षणम् ।
मार्गनाशाद् विषादेन महता समभिप्लुताः ॥ १३ ॥
फिर रास्तेपर रथकी लीक देखते हुए सब - के-सब कुछ दूरतक गये; किंतु क्षणभरमें मार्गका चिह्न न मिलनेके कारण वे महान् शोकमें डूब गये ॥ १३ ॥
रथमार्गानुसारेण न्यवर्तन्त मनस्विनः ।
किमिदं किं करिष्यामो दैवेनोपहता इति ॥१४ ॥
उस समय यह कहते हुए कि ' यह क्या हुआ? अब हम क्या करें? दैवने हमें मार डाला ' वे मनस्वी पुरुष रथकी लीकका अनुसरण करते हुए अयोध्याकी ओर लौट पड़े ॥ १४ ॥
तदा यथागतेनैव मार्गेण क्लान्तचेतसः । · अयोध्यामगमन् सर्वे पुरीं व्यथितसज्जनाम् ॥ १५ ॥
उनका चित्त क्लान्त हो रहा था । वे सब जिस मार्गसे गये थे, उसीसे लौटकर अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे, जहाँके सभी सत्पुरुष श्रीरामके लिये व्यथित थे ॥ १५ ॥
आलोक्य नगरीं तां च क्षयव्याकुलमानसाः ।
आवर्तयन्त तेऽश्रूणि नयनैः शोकपीडितैः ॥ १६ ॥
उस नगरीको देखकर उनका हृदय दुःखसे व्याकुल हो उठा । वे अपने शोकपीड़ित नेत्रद्वारा आँसुओंकी वर्षा करने लगे ॥ १६ ॥
एषा रामेण नगरी रहिता नातिशोभते ।
आपगा गरुडेनेव ह्रदादुद्धृतपन्नगा ॥ १७ ॥
( वे बोले - ) ' जिसके गहरे कुण्डसे वहाँका नाग गरुड़के द्वारा निकाल लिया गया हो, वह नदी जैसे शोभाहीन हो जाती है, उसी प्रकार श्रीरामसे रहित हुई यह अयोध्यानगरी अब अधिक शोभा नहीं पाती है ' ॥
चन्द्रहीनमिवाकाशं तोयहीनमिवार्णवम् ।
अपश्यन् निहतानन्दं नगरं ते विचेतसः ॥ १८ ॥
उन्होंने देखा, सारा नगर चन्द्रहीन आकाश और जलहीन समुद्रके समान आनन्दशून्य हो गया है । पुरीकी यह दुरवस्था देख वे अचेत - से हो गये ॥ १८ ॥
ते तानि वेश्मानि महाधनानि दुःखेन दुःखोपहता विशन्तः । नैव प्रजग्मुः स्वजनं परं वा निरीक्ष्यमाणाः प्रविनष्टहर्षाः ॥ १ ९ ॥ उनके हृदयका सारा उल्लास नष्ट हो चुका था । वे दुःखसे पीड़ित हो उन महान् वैभवसम्पन्न गृहोंमें बड़े क्लेशके साथ प्रविष्ट हो सबको देखते हुए भी अपने और परायेकी पहचान न कर सके ॥ १ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४७ ॥
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अयोध्याकाण्डे अष्टचत्वारिंशः सर्गः ३६७ अष्टचत्वारिंशः सर्गः नगरनिवासिनी स्त्रियोंका विलाप करना
तेषामेवं विषण्णानां पीडितानामतीव च ।
बाष्पविप्लुतनेत्राणां सशोकानां मुमूर्षया ॥ १ ॥
अभिगम्य निवृत्तानां रामं नगरवासिनाम् ।
उद्गतानीव सत्त्वानि बभूवुरमनस्विनाम् ॥ २ ॥
इस प्रकार जो विषादग्रस्त, अत्यन्त पीड़ित, शोकमग्न तथा प्राण त्याग देनेकी इच्छासे युक्त हो नेत्रोंसे आँसू बहा रहे थे, श्रीरामचन्द्रजीके साथ जाकर भी जो उन्हें लिये बिना लौट आये थे और इसीलिये जिनका चित्त ठिकाने नहीं था, उन नगरवासियोंकी ऐसी दशा हो रही थी मानो उनके प्राण निकल गये हों ॥ १-२ ॥
स्वं स्वं निलयमागम्य पुत्रदारैः समावृताः ।
अश्रूणि मुमुचुः सर्वे बाष्पेण पिहिताननाः ॥ ३ ॥
वे सब अपने - अपने घरमें आकर पत्नी और पुत्रोंसे घिरे हुए आँसू बहाने लगे । उनके मुख अश्रुधारासे आच्छादित थे ॥ ३ ॥
न चाहृष्यन् न चामोदन् वणिजो न प्रसारयन् ।
न चाशोभन्त पण्यानि नापचन् गृहमेधिनः ॥ ४ ॥
उनके शरीरमें हर्षका कोई चिह्न नहीं दिखायी देता था तथा मनमें भी आनन्दका अभाव ही था । वैश्योंने अपनी दुकानें नहीं खोलीं । क्रय - विक्रयकी वस्तुएँ बाजारोंमें फैलायी जानेपर भी उनकी शोभा नहीं हुई ( उन्हें लेनेके लिये ग्राहक नहीं आये ) । उस दिन गृहस्थोंके घरमें चूल्हे नहीं जले - रसोई नहीं बनी ॥ ४ ॥
नष्टं दृष्ट्वा नाभ्यनन्दन् विपुलं वा धनागमम् ।
पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाप्यनन्दत ॥ ५ ॥
खोयी हुई वस्तु मिल जानेपर भी किसीको प्रसन्नता नहीं हुई, विपुल धन - राशि प्राप्त हो जानेपर भी किसीने उसका अभिनन्दन नहीं किया । जिसने प्रथम बार पुत्रको जन्म दिया था, वह माता भी आनन्दित नहीं हुई ॥ ५ ॥
गृहे गृहे रुदत्यश्च भर्तारं गृहमागतम् ।
व्यगर्हयन्त दुःखार्ता वाग्भिस्तोत्रैरिव द्विपान् ॥६ ॥
प्रत्येक घरकी स्त्रियाँ अपने पतियोंको श्रीरामके बिना ही लौटकर आये देख रो पड़ीं और दुःखसे आतुर हो कठोर वचनोंद्वारा उन्हें कोसने लगीं, मानो महावत अंकुशोंसे हाथियोंको मार रहे हों ॥६ ॥
किं नु तेषां गृहैः कार्यं किं दारैः किं धनेन वा ।
पुत्रैर्वापि सुखैर्वापि ये न पश्यन्ति राघवम् ॥ ७ ॥
वे बोलीं- ' जो लोग श्रीरामको नहीं देखते, उन्हें घर - द्वार, स्त्री - पुत्र, धन - दौलत और सुख - भोगोंसे क्या प्रयोजन है? ॥ ७ ॥
एकः सत्पुरुषो लोके लक्ष्मणः सह सीतया ।
योऽनुगच्छति काकुत्स्थं रामं परिचरन् वने ॥८ ॥
' संसारमें एकमात्र लक्ष्मण ही सत्पुरुष हैं, जो सीताके साथ श्रीरामकी सेवा करनेके लिये उनके पीछे-पीछे वनमें जा रहे हैं ॥ ८ ॥
आपगाः कृतपुण्यास्ताः पद्मिन्यश्च सरांसि च ।
येषु यास्यति काकुत्स्थो विगाह्य सलिलं शुचि ॥९ ॥
' उन नदियों, कमलमण्डित बावड़ियों तथा सरोवरोंने अवश्य ही बहुत पुण्य किया होगा, जिनके पवित्र जलमें स्नान करके श्रीरामचन्द्रजी आगे जायँगे ॥ ९ ॥
शोभयिष्यन्ति काकुत्स्थमटव्यो रम्यकाननाः ।
आपगाश्च महानूपाः सानुमन्तश्च पर्वताः ॥ १० ॥
' जिनमें रमणीय वृक्षावलियाँ शोभा पाती हैं, वे सुन्दर वनश्रेणियाँ, बड़े कछारवाली नदियाँ और शिखरोंसे सम्पन्न पर्वत श्रीरामकी शोभा बढ़ायेंगे ॥ १० ॥
काननं वापि शैलं वा यं रामोऽनुगमिष्यति ।
प्रियातिथिमिव प्राप्तं नैनं शक्ष्यन्त्यनर्चितुम् ॥ ११ ॥
' श्रीराम जिस वन अथवा पर्वतपर जायँगे, वहाँ उन्हें अपने प्रिय अतिथिकी भाँति आया हुआ देख वे वन और पर्वत उनकी पूजा किये बिना नहीं रह सकेंगे ॥ विचित्रकुसुमापीडा राघवं दर्शयिष्यन्ति ' विचित्र फूलोंके मञ्जरियाँ धारण किये श्रीरामचन्द्रजीको अपनी अकाले चापि मुख्यानि दर्शयिष्यन्त्यनुक्रोशाद्
बहुमञ्जरिधारिणः ।
नगा भ्रमरशालिनः ॥ १२ ॥
मुकुट पहने और बहुत - सी भ्रमरोंसे सुशोभित वृक्ष वनमें शोभा दिखायेंगे ॥ १२ ॥
पुष्पाणि च फलानि च ।
गिरयो राममागतम् ॥ १३ ॥
' वहाँके पर्वत अपने यहाँ पधारे हुए श्रीरामको अत्यन्त आदरके कारण असमयमें भी उत्तम उत्तम फूल और फल दिखायेंगे ( भेंट करेंगे ) ॥ १३ ॥
प्रस्त्रविष्यन्ति तोयानि विमलानि महीधराः ।
विदर्शयन्तो विविधान् भूयश्चित्रांश्च निर्झरान् ॥ १४ ॥
' वे पर्वत बारंबार नाना प्रकारके विचित्र झरने । दिखाते हुए श्रीरामके लिये निर्मल जलके स्रोत बहायेंगे ॥
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३६८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
पादपाः पर्वताग्रेषु रमयिष्यन्ति राघवम् ।
यत्र रामो भयं नात्र नास्ति तत्र पराभवः ॥ १५ ॥
स हि शूरो महाबाहुः पुत्रो दशरथस्य च ।
पुरा भवति नोऽदूरादनुगच्छाम राघवम् ॥ १६ ॥
' पर्वत - शिखरोंपर लहलहाते हुए वृक्ष श्रीरघुनाथजीका मनोरंजन करेंगे । जहाँ श्रीराम हैं वहाँ न तो कोई भय है और न किसीके द्वारा पराभव ही हो सकता है; क्योंकि दशरथनन्दन महाबाहु श्रीराम बड़े शूरवीर हैं । अतः जबतक वे हमलोगोंसे बहुत दूर नहीं निकल जाते, इसके पहले ही हमें उनके पास पहुँचकर पीछे लग जाना चाहिये ॥
पादच्छाया सुखं भर्तुस्तादृशस्य महात्मनः ।
स हि नाथो जनस्यास्य स गतिः स परायणम् ॥ १७ ॥
' उनके - जैसे महात्मा एवं स्वामीके चरणोंकी छाया ही हमारे लिये परम सुखद है । वे ही हमारे रक्षक, गति और परम आश्रय हैं ॥ १७ ॥
वयं परिचरिष्यामः सीतां यूयं च राघवम् ।
इति पौरस्त्रियोभर्तृन् दुःखार्तास्तत्तदब्रुवन् ॥ १८ ॥
' हम स्त्रियाँ सीताजीकी सेवा करेंगी और तुम सब लोग श्रीरघुनाथजीकी सेवामें लगे रहना । ' इस प्रकार पुरवासियोंकी स्त्रियाँ दुःखसे आतुर हो अपने पतियोंसे उपर्युक्त बातें कहने लगीं ॥ १८ ॥
युष्माकं राघवोऽरण्ये योगक्षेमं विधास्यति ।
सीता नारीजनस्यास्य योगक्षेमं करिष्यति ॥ १ ९ ॥
( वे पुनः बोलीं— ) ' वनमें श्रीरामचन्द्रजी आपलोगोंका योगक्षेम सिद्ध करेंगे और सीताजी हम नारियोंके योगक्षेमका निर्वाह करेंगी ॥ १ ९ ॥
को न्वनेनाप्रतीतेन सोत्कण्ठितजनेन च ।
सम्प्रीयेतामनोज्ञेन वासेन हृतचेतसा ॥२० ॥
' यहाँका निवास प्रीति और प्रतीतिसे रहित है । यहाँके सब लोग श्रीरामके लिये उत्कण्ठित रहते हैं । किसीको यहाँका रहना अच्छा नहीं लगता तथा यहाँ रहनेसे मन अपनी सुध - बुध खो बैठता है । भला, ऐसे निवाससे किसको प्रसन्नता होगी? ॥ २० ॥
कैकेय्या यदि चेद् राज्यं स्यादधर्म्यमनाथवत् ।
न हि नो जीवितेनार्थः कुतः पुत्रैः कुतो धनैः ॥ २१ ॥
‘ यदि इस राज्यपर कैकेयीका अधिकार हो गया तो यह अनाथ - सा हो जायगा । इसमें धर्मकी मर्यादा नहीं रहने पायेगी । ऐसे राज्यमें तो हमें जीवित रहनेकी ही आवश्यकता नहीं जान पड़ती, फिर यहाँ धन और पुत्रोंसे क्या लेना है? ॥ २१ ॥
यया पुत्रश्च भर्ता च त्यक्तावैश्वर्यकारणात् ।
कं सा परिहरेदन्यं कैकेयी कुलपांसनी ॥ २२ ॥
‘ जिसने राज्य - वैभवके लिये अपने पुत्र और पतिको त्याग दिया, वह कुलकलङ्किनी कैकेयी दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी? ॥ २२ ॥
कैकेय्या न वयं राज्ये भृतका हि वसेमहि ।
जीवन्त्या जातु जीवन्त्यः पुत्रैरपि शपामहे ॥ २३ ॥
' हम अपने पुत्रोंकी शपथ खाकर कहती हैं कि जबतक कैकेयी जीवित रहेगी, तबतक हम जीते - जी कभी उसके राज्यमें नहीं रह सकेंगी, भले ही यहाँ हमारा पालन - पोषण होता रहे ( फिर भी हम यहाँ रहना नहीं चाहेंगी ) ॥ २३ ॥
या पुत्रं पार्थिवेन्द्रस्य प्रवासयति निर्घृणा ।
कस्तां प्राप्य सुखं जीवेदधर्म्यं दुष्टचारिणीम् ॥ २४ ॥
' जिस निर्दय स्वभाववाली नारीने महाराजके पुत्रको राज्यसे बाहर निकलवा दिया है, उस अधर्मपरायणा दुराचारिणी कैकेयीके अधिकारमें रहकर कौन सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है? ॥२४ ॥
उपद्रुतमिदं सर्वमनालम्भमनायकम् ।
कैकेय्यास्तु कृते सर्वं विनाशमुपयास्यति ॥ २५ ॥
' कैकेयीके कारण यह सारा राज्य अनाथ एवं यज्ञरहित होकर उपद्रवका केन्द्र बन गया है, अतः एक दिन सबका विनाश हो जायगा ॥ २५ ॥
नहि प्रव्रजिते रामे जीविष्यति महीपतिः ।
मृते दशरथे व्यक्तं विलोपस्तदनन्तरम् ॥ २६ ॥
' श्रीरामचन्द्रजीके वनवासी हो जानेपर महाराज दशरथ जीवित नहीं रहेंगे । साथ ही यह भी स्पष्ट है कि राजा दशरथकी मृत्युके पश्चात् इस राज्यका लोप हो जायगा ॥ २६ ॥
ते विषं पिबतालोड्य क्षीणपुण्याः सुदुःखिताः ।
राघवं वानुगच्छध्वमश्रुतिं वापि गच्छत ॥ २७ ॥
' इसलिये अब तुमलोग यह समझ लो कि अब हमारे पुण्य समाप्त हो गये । यहाँ रहकर हमें अत्यन्त दुःख ही भोगना पड़ेगा । ऐसी दशामें या तो जहर घोलकर पी जाओ या श्रीरामका अनुसरण करो अथवा किसी ऐसे देशमें चले चलो, जहाँ कैकेयीका नाम भी न सुनायी पड़े ॥ २७ ॥
मिथ्याप्रव्राजितो रामः सभार्यः सहलक्ष्मणः ।
भरते संनिबद्धाः स्मः सौनिके पशवो यथा ॥ २८ ॥
' झूठे वरकी कल्पना करके पत्नी और लक्ष्मणके