वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 381–390

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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अयोध्याकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ३६ ९ साथ श्रीरामको देशनिकाला दे दिया गया और हमें । भरतके साथ बाँध दिया गया । अब हमारी दशा कसाईके घर बँधे हुए पशुओंके समान हो गयी है ॥ २८ ॥

पूर्णचन्द्राननः श्यामो गूढजत्रुररिंदमः ।

आजानुबाहुः पद्माक्षो रामो लक्ष्मणपूर्वजः ॥ २ ९ ॥

पूर्वाभिभाषी मधुरः सत्यवादी महाबलः ।

सौम्यश्च सर्वलोकस्य चन्द्रवत् प्रियदर्शनः ॥ ३० ॥

' लक्ष्मणके ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर है । उनके शरीरकी कान्ति श्याम, गलेकी हँसली मांससे ढकी हुई, भुजाएँ घुटनोंतक लंबी और नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं । वे सामने आनेपर पहले ही बातचीत छेड़ते हैं तथा मीठे और सत्य वचन बोलते हैं । श्रीराम शत्रुओंका दमन करनेवाले और महान् बलवान् हैं । समस्त जगत्के लिये सौम्य ( कोमल स्वभाववाले ) हैं । उनका दर्शन चन्द्रमाके समान प्यारा है ॥ २ ९ -३० ॥

नूनं पुरुषशार्दूलो मत्तमातङ्गविक्रमः ।

शोभयिष्यत्यरण्यानि विचरन् स महारथः ॥ ३१ ॥

' निश्चय ही मतवाले गजराजके समान पराक्रमी पुरुषसिंह महारथी श्रीराम भूतलपर विचरते हुए वनस्थलियोंकी शोभा बढ़ायेंगे ' ॥ ३१ ॥

तास्तथा विलपन्त्यस्तु नगरे नागरस्त्रियः ।

चुक्रुशुर्दुःखसंतप्ता मृत्योरिव भयागमे ॥ ३२ ॥

नगरमें नागरिकोंकी स्त्रियाँ इस प्रकार विलाप करती हुई दुःखसे संतप्त हो इस तरह जोर - जोरसे रोने लगीं, मानो उनपर मृत्युका भय आ गया हो ॥ ३२ ॥

इत्येवं विलपन्तीनां स्त्रीणां वेश्मसु राघवम् ।

जगामास्तं दिनकरो रजनी चाभ्यवर्तत ॥ ३३ ॥

अपने - अपने घरोंमें श्रीरामके लिये स्त्रियाँ इस प्रकार दिनभर विलाप करती रहीं । धीरे - धीरे सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और रात हो गयी ॥ ३३ ॥

नष्टज्वलनसंतापा प्रशान्ताध्यायसत्कथा ।

तिमिरेणानुलिप्तेव तदा सा नगरी बभौ ॥ ३४ ॥

उस समय किसीके घरमें अग्रिहोत्रके लिये भी आग नहीं जली । स्वाध्याय और कथा - वार्ता भी नहीं हुई । सारी अयोध्यापुरी अन्धकारसे पुती हुई - सी प्रतीत होती थी ॥

उपशान्तवणिक्पण्या नष्टहर्षा निराश्रया ।

अयोध्या नगरी चासीन्नष्टतारमिवाम्बरम् ॥ ३५ ॥

बनियोंकी दुकानें बंद होनेके कारण वहाँ चहल - पहल नहीं थी, सारी पुरीकी हँसी - खुशी छिन गयी थी, श्रीरामरूपी आश्रयसे रहित अयोध्यानगरी जिसके तारे छिप गये हों, उस आकाशके समान श्रीहीन जान पड़ती थी ॥ ३५ ॥

तदा स्त्रियो रामनिमित्तमातुरा यथा सुते भ्रातरि वा विवासिते । विलप्य दीना रुरुदुर्विचेतसः सुतैर्हि तासामधिकोऽपि सोऽभवत् ॥ ३६ ॥

उस समय नगरवासिनी स्त्रियाँ श्रीरामके लिये इस तरह शोकातुर हो रही थीं, मानो उनके सगे बेटे या भाईको देशनिकाला दे दिया गया हो । वे अत्यन्त दीनभावसे विलाप करके रोने लगीं और रोते - रोते अचेत हो गयीं; क्योंकि श्रीराम उनके लिये पुत्रों ( तथा भाइयों ) से भी बढ़कर थे ॥ ३६ ॥

प्रशान्तगीतोत्सवनृत्यवादना विभ्रष्टहर्षा पिहितापणोदया । तदा ह्ययोध्या नगरी बभूव सा महार्णवः संक्षपितोदको यथा ॥ ३७ ॥

वहाँ गाने, बजाने और नाचनेके उत्सव बंद हो गये, सबका उत्साह जाता रहा, बाजारकी दुकानें नहीं खुलीं, इन सब कारणोंसे उस समय अयोध्यानगरी जलहीन समुद्रके समान सूनसान लग रही थी ॥ ३७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः ॥४८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

एकोनपञ्चाशः सर्गः ग्रामवासियोंकी बातें सुनते हुए श्रीरामका कोसल जनपदको लाँघते हुए आगे जाना और वेदश्रुति, गोमती एवं स्यन्दिका नदियोंको पार करके सुमन्त्रसे कुछ कहना रामोऽपि रात्रिशेषेण तेनैव महदन्तरम् । स्मरण करते हुए उस शेष रात्रिमें ही बहुत दूर निकल गये ॥ जगाम पुरुषव्याघ्रः पितुराज्ञामनुस्मरन् ॥ १ ॥ तथैव गच्छतस्तस्य व्यपायाद् रजनी शिवा ।

उधर पुरुषसिंह श्रीराम भी पिताकी आज्ञाका बारंबार | उपास्य तु शिवां संध्यां विषयानत्यगाहत ॥२ ॥

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३७० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उसी तरह चलते - चलते उनकी वह कल्याणमयी रजनी भी व्यतीत हो गयी । सबेरा होनेपर मङ्गलमयी संध्योपासना करके वे विभिन्न जनपदोंको लाँघते हुए चल दिये ॥ २ ॥

ग्रामान् विकृष्टसीमान्तान् पुष्पितानि वनानि च ।

पश्यन्नतिययौ शीघ्रं शनैरिव हयोत्तमैः ॥ ३ ॥

जिनकी सीमाके पासकी भूमि जोत दी गयी थी, उन ग्रामों तथा फूलोंसे सुशोभित वनोंको देखते हुए वे उन उत्तम घोड़ोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े जा रहे थे तथापि सुन्दर दृश्योंके देखनेमें तन्मय रहनेके कारण उन्हें उस रथकी गति धीमी - सी ही जान पड़ती थी ॥

शृण्वन् वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम् ।

राजानं धिग् दशरथं कामस्य वशमास्थितम् ॥ ४ ॥

मार्गमें जो बड़े और छोटे गाँव मिलते थे, उनमें निवास करनेवाले मनुष्योंकी निम्नाङ्कित बातें उनके कानोंमें पड़ रही थीं — ' अहो! कामके वशमें पड़े हुए राजा दशरथको धिक्कार है! ॥ ४ ॥

हा नृशंसाद्य कैकेयी पापा पापानुबन्धिनी ।

तीक्ष्णा सम्भिन्नमर्यादा तीक्ष्णकर्मणि वर्तते ॥ ५ ॥

' हाय! हाय! पापशीला, पापासक्त, क्रूर तथा धर्ममर्यादाका त्याग करनेवाली कैकेयीको तो दया छू भी नहीं गयी है, वह क्रूर अब निष्ठुर कर्ममें ही लगी रहती है ॥५ ॥

या पुत्रमीदृशं राज्ञः प्रवासयति धार्मिकम् ।

वनवासे महाप्राज्ञं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम् ॥ ६ ॥

' जिसने महाराजके ऐसे धर्मात्मा, महाज्ञानी, दयालु

और जितेन्द्रिय पुत्रको वनवासके लिये घरसे निकलवा ।

दिया है ॥६ ॥

कथं नाम महाभागा सीता जनकनन्दिनी ।

सदा सुखेष्वभिरता दुःखान्यनुभविष्यति ॥ ७ ॥

' जनकनन्दिनी महाभागा सीता, जो सदा सुखोंमें ही रत रहती थीं, अब वनवासके दुःख कैसे भोग सकेंगी?

अहो दशरथो राजा निःस्नेहः स्वसुतं प्रति ।

प्रजानामनघं रामं परित्यक्तुमिहेच्छति ॥ ८ ॥ ।

' अहो! क्या राजा दशरथ अपने पुत्रके प्रति इतने स्नेहहीन हो गये, जो प्रजाओंके प्रति कोई अपराध न करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीका यहाँ परित्याग कर देना चाहते हैं ' ॥ ८ ॥

एता वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम् ।

शृण्वन्नतिययौ वीरः कोसलान् कोसलेश्वरः ॥ ९ ॥

छोटे - बड़े गाँवोंमें रहनेवाले मनुष्योंकी ये बातें सुनते हुए वीर कोसलपति श्रीराम कोसल जनपदकी सीमा लाँघकर आगे बढ़ गये ॥ ९ ॥

ततो वेदश्रुतिं नाम शिववारिवहां नदीम् ।

उत्तीर्याभिमुखः प्रायादगस्त्याध्युषितां दिशम् ॥ १० ॥

तदनन्तर शीतल एवं सुखद जल बहानेवाली वेदश्रुति नामक नदीको पार करके श्रीरामचन्द्रजी अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ गये ॥१० ॥

गत्वा तु सुचिरं कालं ततः शीतवहां नदीम् ।

गोमतीं गोयुतानूपामतरत् सागरङ्गमाम् ॥ ११ ॥

दीर्घकालतक चलकर उन्होंने समुद्रगामिनी गोमती नदीको पार किया, जो शीतल जलका स्रोत बहाती थी । उसके कछारमें बहुत - सी गौएँ विचरती थीं ॥ ११ ॥

गोमतीं चाप्यतिक्रम्य राघवः शीघ्रगैर्हयैः ।

मयूरहंसाभिरुतां ततार स्यन्दिकां नदीम् ॥ १२ ॥

शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा गोमती नदीको लाँघ करके श्रीरघुनाथजीने मोरों और हंसोंके कलरवोंसे व्याप्त स्यन्दिका नामक नदीको भी पार किया ॥ १२ ॥

स महीं मनुना राज्ञा दत्तामिक्ष्वाकवे पुरा ।

स्फीतां राष्ट्रवृतां रामो वैदेहीमन्वदर्शयत् ॥ १३ ॥

वहाँ जाकर श्रीरामने धन - धान्यसे सम्पन्न और अनेक अवान्तर जनपदोंसे घिरी हुई भूमिका सीताको दर्शन कराया, जिसे पूर्वकालमें राजा मनुने इक्ष्वाकुको दिया था ॥ १३ ॥

सूत इत्येव चाभाष्य सारथिं तमभीक्ष्णशः ।

हंसमत्तस्वरः श्रीमानुवाच पुरुषोत्तमः ॥ १४ ॥

फिर श्रीमान् पुरुषोत्तम श्रीरामने ' सूत! ' कहकर सारथिको बारंबार सम्बोधित किया और मदमत्त हंसके समान मधुर स्वरमें इस प्रकार कहा- ॥ १४ ॥

कदाहं पुनरागम्य सरय्वाः पुष्पिते वने ।

मृगयां पर्यटिष्यामि मात्रा पित्रा च संगतः ॥ १५ ॥

' सूत! मैं कब पुनः लौटकर माता - पितासे मिलूँगा और सरयूके पार्श्ववर्ती पुष्पित वनमें मृगयाके लिये भ्रमण करूँगा? ॥ १५ ॥

नात्यर्थमभिकांक्षामि मृगयां सरयूवने ।

रतिर्ह्येषातुला लोके राजर्षिगणसम्मता ॥ १६ ॥

' मैं सरयूके वनमें शिकार खेलनेकी बहुत अधिक अभिलाषा नहीं रखता । यह लोकमें एक प्रकारकी अनुपम क्रीड़ा है, जो राजर्षियोंके

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अयोध्याकाण्डे समुदायको अभिमत है ॥ १६ ॥

राजर्षीणां हि लोकेऽस्मिन् रत्यर्थं मृगया वने ।

काले कृतां तां मनुजैर्धन्विनामभिकांक्षिताम् ॥ १७ ॥

' इस लोकमें वनमें जाकर शिकार खेलना राजर्षियोंकी क्रीड़ाके लिये प्रचलित हुआ था । अतः मनुपुत्रद्वारा उस समय की गयी यह क्रीड़ा अन्य । पञ्चाशः सर्गः ३७१ धनुर्धरोंको भी अभीष्ट हुई ' ॥ १७ ॥

स तमध्वानमैक्ष्वाकः सूतं मधुरया गिरा ।

तं तमर्थमभिप्रेत्य ययौ वाक्यमुदीरयन् ॥ १८ ॥

इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी विभिन्न विषयोंको लेकर सूतसे मधुर वाणीमें उपयुक्त बातें कहते हुए उस मार्गपर बढ़ते चले गये ॥ १८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ९ ॥ पञ्चाशः श्रीरामका मार्गमें अयोध्यापुरीसे वनवासकी पहुँचकर रात्रिमें निवास करना, वहाँ

विशालान् कोसलान् रम्यान् यात्वा लक्ष्मणपूर्वजः ।

अयोध्यामुन्मुखो धीमान् प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥

इस प्रकार विशाल और रमणीय कोसलदेशकी सीमाको पार करके लक्ष्मणके बड़े भाई बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने अयोध्याकी ओर अपना मुख किया और हाथ जोड़कर कहा —॥१ ॥

आपृच्छे त्वां पुरिश्रेष्ठे काकुत्स्थपरिपालिते ।

दैवतानि च यानि त्वां पालयन्त्यावसन्ति च ॥ २ ॥

‘ ककुत्स्थवंशी राजाओंसे परिपालित पुरीशिरोमणि अयोध्ये! मैं तुमसे तथा जो - जो देवता तुम्हारी रक्षा करते और तुम्हारे भीतर निवास करते हैं, उनसे भी वनमें जानेकी आज्ञा चाहता हूँ ॥ २ ॥

निवृत्तवनवासस्त्वामनृणो जगतीपतेः ।

पुनर्द्रक्ष्यामि मात्रा च पित्रा च सह संगतः ॥ ३ ॥

‘ वनवासकी अवधि पूरी करके महाराजके ऋणसे उऋण हो मैं पुनः लौटकर तुम्हारा दर्शन करूँगा और अपने माता - पितासे भी मिलूँगा ' ॥ ३ ॥

ततो रुचिरताम्राक्षो भुजमुद्यम्य दक्षिणम् ।

अश्रुपूर्णमुखो दीनोऽब्रवीज्जानपदं जनम् ॥ ४ ॥

इसके बाद सुन्दर एवं अरुण नेत्रवाले श्रीरामने दाहिनी भुजा उठाकर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए दुःखी होकर जनपदके लोगोंसे कहा — ॥ ४ ॥

अनुक्रोशो दया चैव यथार्हं मयि वः कृतः ।

चिरं दुःखस्य पापीयो गम्यतामर्थसिद्धये ॥ ५ ॥

' आपने मुझपर बड़ी कृपा की और यथोचित दया दिखायी । मेरे लिये आपलोगोंने बहुत देरतक कष्ट सहन किया । इस तरह आपका देरतक दुःखमें पड़े रहना । सर्गः आज्ञा माँगना और शृङ्गवेरपुरमें गङ्गातटपर निषादराज गुहद्वारा उनका सत्कार अच्छा नहीं है; इसलिये अब आपलोग अपना - अपना कार्य करनेके लिये जाइये'॥५ ॥

तेऽभिवाद्य महात्मानं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।

विलपन्तो नरा घोरं व्यतिष्ठंश्च क्वचित् क्वचित् ॥ ६ ॥

यह सुनकर उन मनुष्योंने महात्मा श्रीरामको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और घोर विलाप करते हुए वे जहाँ - तहाँ खड़े हो गये ॥६ ॥

तथा विलपतां तेषामतृप्तानां च राघवः ।

अचक्षुर्विषयं प्रायाद् यथार्कः क्षणदामुखे ॥ ७ ॥

उनकी आँखें अभी श्रीरामके दर्शनसे तृप्त नहीं हुई थीं और वे पूर्वोक्त रूपसे विलाप कर ही रहे थे, इतनेमें श्रीरघुनाथजी उनकी दृष्टिसे ओझल हो गये, जैसे सूर्य प्रदोषकालमें छिप जाते हैं ॥ ७ ॥

ततो धान्यधनोपेतान् दानशीलजनान् शिवान् ।

अकुतश्चिद्भयान् रम्यांश्चैत्ययूपसमावृतान् ॥ ८ ॥

उद्यानाम्रवणोपेतान् सम्पन्नसलिलाशयान् ।

तुष्टपुष्टजनाकीर्णान् गोकुलाकुलसेवितान् ॥ ९ ॥

रक्षणीयान् नरेन्द्राणां ब्रह्मघोषाभिनादितान् ।

रथेन पुरुषव्याघ्रः कोसलानत्यवर्तत ॥१० ॥

इसके बाद पुरुषसिंह श्रीराम रथके द्वारा ही उस कोसल जनपदको लाँघ गये, जो धन - धान्यसे सम्पन्न और सुखदायक था । वहाँके सब लोग दानशील थे । उस जनपदमें कहींसे कोई भय नहीं था । वहाँके भूभाग रमणीय एवं चैत्य - वृक्षों तथा यज्ञ - सम्बन्धी यूपोंसे व्याप्त थे । बहुत - से उद्यान और आमोंके वन उस जनपदकी शोभा बढ़ाते थे । वहाँ जलसे भरे हुए बहुत - से जलाशय सुशोभित थे । सारा जनपद हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे भरा था;

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३७२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे गौओंके समूहोंसे व्याप्त और सेवित था । वहाँके ग्रामोंकी । बहुत - से नरेश रक्षा करते थे तथा वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती थी ॥ ८ 1 - १० ॥

मध्येन मुदितं स्फीतं रम्योद्यानसमाकुलम् ।

राज्यं भोज्यं नरेन्द्राणां ययौ धृतिमतां वरः ॥ ११ ॥

कोसलदेशसे आगे बढ़नेपर धैर्यवानोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी मध्यमार्गसे ऐसे राज्यमें होकर निकले, जो सुख - सुविधासे युक्त, धन - धान्यसे सम्पन्न, रमणीय । उद्यानोंसे व्याप्त तथा सामन्त नरेशोंके उपभोगमें आनेवाला था ॥ ११ ॥

तत्र त्रिपथगां दिव्यां शीततोयामशैवलाम् ।

ददर्श राघवो गङ्गां रम्यामृषिनिषेविताम् ॥ १२ ॥

उस राज्यमें श्रीरघुनाथजीने त्रिपथगामिनी दिव्य नदी गङ्गाका दर्शन किया, जो शीतल जलसे भरी हुई,

सेवारोंसे रहित तथा रमणीय थीं । बहुत - से महर्षि उनका ।

सेवन करते थे ॥ १२ ॥

आश्रमैरविदूरस्थैः श्रीमद्भिः समलंकृताम् ।

कालेऽप्सरोभिर्हृष्टाभिः सेविताम्भोह्रदां शिवाम् ॥ १३ ॥

उनके तटपर थोड़ी - थोड़ी दूरपर बहुत - से सुन्दर आश्रम बने थे, जो उन देवनदीकी शोभा बढ़ाते थे । समय - समयपर हर्षभरी अप्सराएँ भी उतरकर उनके जलकुण्डका सेवन करती हैं । वे गङ्गा सबका कल्याण करनेवाली हैं ॥ १३ ॥

देवदानवगन्धर्वैः किंनरैरुपशोभिताम् ।

नागगन्धर्वपत्नीभिः सेवितां सततं शिवाम् ॥ १४ ॥

देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उन शिवस्वरूपा भागीरथीकी शोभा बढ़ाते हैं । नागों और गन्धर्वोंकी पत्नियाँ उनके जलका सदा सेवन करती हैं ॥ १४ ॥

देवाक्रीडशताकीर्णां देवोद्यानयुतां नदीम् ।

देवार्थमाकाशगतां विख्यातां देवपद्मिनीम् ॥ १५ ॥

गङ्गाके दोनों तटोंपर देवताओंके सैकड़ों पर्वतीय क्रीड़ास्थल हैं । उनके किनारे देवताओंके बहुत - से उद्यान भी हैं । वे देवताओंकी क्रीड़ाके लिये आकाशमें भी विद्यमान हैं और वहाँ देवपद्मिनीके रूपमें विख्यात हैं ॥

जलाघाताट्टहासोग्रां फेननिर्मलहासिनीम् ।

क्वचिद् वेणीकृतजलां क्वचिदावर्तशोभिताम् ॥ १६ ॥

प्रस्तरखण्डोंसे गङ्गाके जलके टकरानेसे जो शब्द होता है, वही मानो उनका उग्र अट्टहास है । जलसे जो फेन प्रकट होता है, वही उन दिव्य नदीका निर्मल हास

है । कहीं तो उनका जल वेणीके आकारका है और कहीं ।

वे भँवरोंसे सुशोभित होती हैं ॥१६ ॥

क्वचित् स्तिमितगम्भीरां क्वचिद् वेगसमाकुलाम् ।

क्वचिद् गम्भीरनिर्घोषां क्वचिद् भैरवनिःस्वनाम् ॥ १७ ॥

कहीं उनका जल निश्चल एवं गहरा है । कहीं वे महान् वेगसे व्याप्त हैं । कहीं उनके जलसे मृदङ्ग आदिके समान गम्भीर घोष प्रकट होता है और कहीं वज्रपात आदिके समान भयंकर नाद सुनायी पड़ता है ॥१७ ॥

देवसंघाप्लुतजलां निर्मलोत्पलसंकुलाम् ।

क्वचिदाभोगपुलिनां क्वचिन्निर्मलवालुकाम् ॥ १८ ॥

उनके जलमें देवताओंके समुदाय गोते लगाते हैं । कहीं - कहीं उनका जल नील कमलों अथवा कुमुदोंसे आच्छादित होता है । कहीं विशाल पुलिनका दर्शन होता है तो कहीं निर्मल बालुका - राशिका ॥ १८ ॥

हंससारससंघुष्टां चक्रवाकोपशोभिताम् ।

सदामत्तैश्च विहगैरभिपन्नामनिन्दिताम् ॥ १ ९ ॥

हंसों और सारसोंके कलरव वहाँ गूँजते रहते हैं । चकवे उन देवनदीकी शोभा बढ़ाते हैं । सदा मदमत्त रहनेवाले विहंगम उनके जलपर मँडराते रहते हैं । वे उत्तम शोभासे सम्पन्न हैं ॥ १ ९ ॥

क्वचित् तीररुहैर्वृक्षैर्मालाभिरिव शोभिताम् ।

क्वचित् फुल्लोत्पलच्छन्नां क्वचित् पद्मवनाकुलाम् ॥ २० ॥

कहीं तटवर्ती वृक्ष मालाकार होकर उनकी शोभा बढ़ाते हैं । कहीं तो उनका जल खिले हुए उत्पलोंसे आच्छादित है और कहीं कमलवनोंसे व्याप्त ॥ २० ॥

क्वचित् कुमुदखण्डैश्च कुड्मलैरुपशोभिताम् ।

नानापुष्परजोध्वस्तां समदामिव च क्वचित् ॥ २१ ॥

कहीं कुमुदसमूह तथा कहीं कलिकाएँ उन्हें सुशोभित करती हैं । कहीं नाना प्रकारके पुष्पोंके परागोंसे व्याप्त होकर वे मदमत्त नारीके समान प्रतीत होती हैं ॥

व्यपेतमलसंघातां मणिनिर्मलदर्शनाम् ।

दिशागजैर्वनगजैर्मत्तैश्च वरवारणैः ॥ २२ ॥

देवराजोपवाह्यैश्च संनादितवनान्तराम् । वे मलसमूह ( पापराशि ) दूर कर देती हैं । उनका जल इतना स्वच्छ है कि मणिके समान निर्मल दिखायी देता है । उनके तटवर्ती वनका भीतरी भाग मदमत्त दिग्गजों, जंगली हाथियों तथा देवराजकी सवारीमें आनेवाले श्रेष्ठ गजराजोंसे कोलाहलपूर्ण बना रहता है ॥ प्रमदामिव यत्नेन भूषितां भूषणोत्तमैः ॥ २३ ॥

फलपुष्पैः किसलयैर्वृतां गुल्मैर्द्विजैस्तथा 1 ।

विष्णुपादच्युतां दिव्यामपापां पापनाशिनीम् ॥२४ ॥

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अयोध्याकाण्डे वे फलों, फूलों, पल्लवों, गुल्मों तथा पक्षियोंसे आवृत होकर उत्तम आभूषणोंसे यत्नपूर्वक विभूषित हुई युवतीके समान शोभा पाती हैं । उनका प्राकट्य भगवान् विष्णुके चरणोंसे हुआ है । उनमें पापका लेश भी नहीं है । वे दिव्य नदी गङ्गा जीवोंके समस्त पापोंका नाश कर देनेवाली हैं॥२३-२४ ॥

शिंशुमारैश्च नक्रैश्च भुजंगैश्च समन्विताम् ।

शंकरस्य जटाजूटाद् भ्रष्टां सागरतेजसा ॥ २५ ॥

समुद्रमहिषीं गङ्गां सारसक्रौञ्चनादिताम् ।

आससाद महाबाहुः शृङ्गवेरपुरं प्रति ॥ २६ ॥

उनके जलमें सूँस, घड़ियाल और सर्प निवास करते हैं । सगरवंशी राजा भगीरथके तपोमय तेजसे जिनका शंकरजीके जटाजूटसे अवतरण हुआ था, जो समुद्रकी रानी हैं तथा जिनके निकट सारस और क्रौञ्च पक्षी कलरव करते रहते हैं, उन्हीं देवनदी गङ्गाके पास महाबाहु श्रीरामजी पहुँचे । गङ्गाकी वह धारा शृङ्गवेरपुरमें बह रही थी ॥ २५-२६ ॥

तामूर्मिकलिलावतांमन्ववेक्ष्य महारथः ।

सुमन्त्रमब्रवीत् सूतमिहैवाद्य वसामहे ॥ २७ ॥

जिनके आवर्त ( भँवरें ) लहरोंसे व्याप्त थे, उन गङ्गाजीका दर्शन करके महारथी श्रीरामने सारथि सुमन्त्रसे कहा— ' सूत! आज हमलोग यहीं रहेंगे ' ॥ २७ ॥

अविदूरादयं नद्या बहुपुष्पप्रवालवान् ।

सुमहानिङ्गुदीवृक्षो वसामो ऽत्रैव सारथे ॥ २८ ॥

' सारथे! गङ्गाजीके समीप ही जो यह बहुत - से फूलों और नये - नये पल्लवोंसे सुशोभित महान् इङ्गुदीका वृक्ष है, इसीके नीचे आज रातमें हम निवास करेंगे ॥ २८ ॥

प्रेक्षामि सरितां श्रेष्ठां सम्मान्यसलिलां शिवाम् ।

देवमानवगन्धर्वमृगपन्नगपक्षिणाम् ॥२ ९ ॥ ।

' जिनका जल देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, सर्पों, पशुओं तथा पक्षियोंके लिये भी समादरणीय है, उन कल्याणस्वरूपा, सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीका भी मुझे यहाँसे दर्शन होता रहेगा ' ॥ २ ९ ॥

लक्ष्मणश्च सुमन्त्रश्च बाढमित्येव राघवम् ।

उक्त्वा तमिङ्गुदीवृक्षं तदोपययतुर्हयैः ॥ ३० ॥

तब लक्ष्मण और सुमन्त्र भी श्रीरामचन्द्रजीसे बहुत अच्छा कहकर अश्वोंद्वारा उस इंगुदी - वृक्षके समीप गये ॥

रामोऽभियाय तं रम्यं वृक्षमिक्ष्वाकुनन्दनः ।

रथादवतरत् तस्मात् सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥ ३१॥ ।

पञ्चाशः सर्गः ३७३ उस रमणीय वृक्षके पास पहुँचकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ रथसे उतर गये ॥ ३१ ॥

सुमन्त्रोऽप्यवतीर्याथ मोचयित्वा हयोत्तमान् ।

वृक्षमूलगतं राम कृताञ्जलिः ॥ ३२ ॥

फिर सुमन्त्रने भी उतरकर उत्तम घोड़ोंको खोल दिया और वृक्षकी जड़पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ३२ ॥

तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसमः सखा ।

निषादजात्यो बलवान् स्थपतिश्चेति विश्रुतः ॥ ३३ ॥

शृङ्गवेरपुरमें गुहनामका राजा राज्य करता था । वह श्रीरामचन्द्रजीका प्राणोंके समान प्रिय मित्र था । उसका जन्म निषादकुलमें हुआ था । वह शारीरिक शक्ति और सैनिक शक्तिकी दृष्टिसे भी बलवान् था तथा वहाँके निषादोंका सुविख्यात राजा था ॥ ३३ ॥

स श्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं रामं विषयमागतम् ।

वृद्धैः परिवृतोऽमात्यैर्ज्ञातिभिश्चाप्युपागतः ॥ ३४ ॥

उसने जब सुना कि पुरुषसिंह श्रीराम मेरे राज्यमें पधारे हैं, तब वह बूढ़े मन्त्रियों और बन्धु - बान्धवोंसे घिरा हुआ वहाँ आया ॥ ३४ ॥

ततो निषादाधिपतिं दृष्ट्वा दूरादुपस्थितम् ।

सह सौमित्रिणा रामः समागच्छद् गुहेन सः ॥ ३५ ॥

निषादराजको दूरसे आया हुआ देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ आगे बढ़कर उससे मिले ॥३५ ॥

तमार्तः सम्परिष्वज्य गुहो राघवमब्रवीत् ।

यथायोध्या तथेदं ते राम किं करवाणि ते ॥ ३६ ॥

ईदृशं हि महाबाहो कः प्राप्स्यत्यतिथिं प्रियम् । श्रीरामचन्द्रजीको वल्कल आदि धारण किये देख गुहको बड़ा दुःख हुआ । उसने श्रीरघुनाथजीको हृदयसे लगाकर कहा - ' श्रीराम! आपके लिये जैसे अयोध्याका राज्य है, उसी प्रकार यह राज्य भी है । बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? महाबाहो! आप जैसा प्रिय अतिथि किसको सुलभ होगा? ' ॥ ३६३ ॥

ततो गुणवदन्नाद्यमुपादाय पृथग्विधम् ॥ ३७ ॥

अर्घ्यं चोपानयच्छीघ्रं वाक्यं चेदमुवाच ह ।

स्वागतं ते महाबाहो तवेयमखिला मही ॥३८ ॥

वयं प्रेष्या भवान् भर्ता साधु राज्यं प्रशाधि नः ।

भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च लेह्यं चैतदुपस्थितम् ।

शयनानि च मुख्यानि वाजिनां खादनं च ते ॥ ३ ९ ॥

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३७४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे फिर भाँति - भाँतिका उत्तम अन्न लेकर वह सेवामें । उपस्थित हुआ । उसने शीघ्र ही अर्घ्य निवेदन किया और इस प्रकार कहा — ' महाबाहो! आपका स्वागत है । यह सारी भूमि, जो मेरे अधिकारमें है आपकी ही है । हम आपके सेवक हैं और आप हमारे स्वामी, आजसे आप ही हमारे इस राज्यका भलीभाँति शासन करें । यह भक्ष्य ( अन्न आदि ), भोज्य ( खीर आदि ), पेय ( पानकरस आदि ) तथा लेह्य ( चटनी आदि ) आपकी सेवामें उपस्थित है, इसे स्वीकार करें । ये उत्तमोत्तम शय्याएँ हैं तथा आपके घोड़ोंके खानेके लिये चने और घास आदि भी प्रस्तुत हैं — ये सब सामग्री ग्रहण करें ' ॥ ३७-३९ ॥

गुहमेवं ब्रुवाणं तु राघवः प्रत्युवाच ह ।

अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वदा वयम् ॥ ४० ॥

पद्भ्यामभिगमाच्चैव स्नेहसंदर्शनेन च । गुहके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उसे इस प्रकार उत्तर दिया — ' सखे! तुम्हारे यहाँतक पैदल आने और स्नेह दिखानेसे ही हमारा सदाके लिये भलीभाँति पूजन — स्वागत - सत्कार हो गया । तुमसे मिलकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है ' ॥ ४०३ ॥

भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पीडयन् वाक्यमब्रवीत् ॥ ४१ ॥

दिष्ट्या त्वां गुह पश्यामि ह्यरोगं सह बान्धवैः ।

अपि ते कुशलं राष्ट्रे मित्रेषु च वनेषु च ॥ ४२ ॥

फिर श्रीरामने अपनी दोनों गोल - गोल भुजाओंसे गुहका अच्छी तरह आलिङ्गन करते हुए कहा— ' गुह! सौभाग्यकी बात है कि मैं आज तुम्हें बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वस्थ एवं सानन्द देख रहा हूँ । बताओ, तुम्हारे राज्यमें, मित्रोंके यहाँ तथा वनोंमें सर्वत्र कुशल तो है? ॥ ४१-४२ ॥

यत् त्विदं भवता किंचित् प्रीत्या समुपकल्पितम् ।

सर्वं तदनुजानामि नहि वर्ते प्रतिग्रहे ॥ ४३ ॥

' तुमने प्रेमवश यह जो कुछ सामग्री प्रस्तुत की है, इसे स्वीकार करके मैं तुम्हें वापिस ले जानेकी आज्ञा देता हूँ; क्योंकि इस समय दूसरोंकी दी हुई कोई भी वस्तु मैं ग्रहण नहीं करता — अपने उपयोगमें नहीं लाता ॥

कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं च माम् ।

विद्धि प्रणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम् ॥ ४४ ॥

' वल्कल और मृगचर्म धारण करके फल - मूलका आहार करता हूँ और धर्ममें स्थित रहकर तापसवेशमें वनके भीतर ही विचरता हूँ । इन दिनों तुम मुझे इसी नियममें स्थित जानो ॥ ४४ ॥

अश्वानां खादनेनाहमर्थी नान्येन केनचित् ।

एतावतात्र भवता भविष्यामि सुपूजितः ॥ ४५ ॥

‘ इन सामग्रियोंमें जो घोड़ोंके खाने - पीनेकी वस्तु है, उसीकी इस समय मुझे आवश्यकता है, दूसरी किसी वस्तुकी नहीं । घोड़ोंको खिला - पिला देनेमात्रसे तुम्हारे द्वारा मेरा पूर्ण सत्कार हो जायगा ॥ ४५ ॥

एते हि दयिता राज्ञः पितुर्दशरथस्य मे ।

एतैः सुविहितैरश्वैर्भविष्याम्यहमर्चितः ॥ ४६ ॥

' ये घोड़े मेरे पिता महाराज दशरथको बहुत प्रिय हैं । इनके खाने - पीनेका सुन्दर प्रबन्ध कर देनेसे मेरा भलीभाँति पूजन हो जायगा ' ॥ ४६ ॥

अश्वानां प्रतिपानं च खादनं चैव सोऽन्वशात् ।

गुहस्तत्रैव पुरुषांस्त्वरितं दीयतामिति ॥ ४७ ॥

तब गुहने अपने सेवकोंको उसी समय यह आज्ञा दी कि तुम घोड़ोंके खाने - पीनेके लिये आवश्यक वस्तुएँ शीघ्र लाकर दो ॥४७ ॥

ततश्चीरोत्तरासङ्गः संध्यामन्वास्य पश्चिमाम् ।

जलमेवाददे भोज्यं लक्ष्मणेनाहृतं स्वयम् ॥ ४८ ॥

तत्पश्चात् वल्कलका उत्तरीय - वस्त्र धारण करनेवाले श्रीरामने सायंकालकी संध्योपासना करके भोजनके नामपर स्वयं लक्ष्मणका लाया हुआ केवल जलमात्र पी लिया ॥ ४८ ॥

तस्य भूमौ शयानस्य पादौ प्रक्षाल्य लक्ष्मणः ।

सभार्यस्य ततोऽभ्येत्य तस्थौ वृक्षमुपाश्रितः ॥४ ९ ॥

फिर पत्नीसहित श्रीराम भूमिपर ही तृणकी शय्या बिछाकर सोये । उस समय लक्ष्मण उनके दोनों चरणोंको धो - पोंछकर वहाँसे कुछ दूरपर हट आये और एक वृक्षका सहारा लेकर बैठ गये ॥ ४ ९ ॥

गुहोऽपि सह सूतेन सौमित्रिमनुभाषयन् ।

अन्वजाग्रत् ततो राममप्रमत्तो धनुर्धरः ॥ ५० ॥

गुह भी सावधानीके साथ धनुष धारण करके सुमन्त्रके साथ बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे बातचीत करता हुआ श्रीरामकी रक्षाके लिये रातभर जागता रहा ॥ ५० ॥

तथा शयानस्य ततो यशस्विनो मनस्विनो दाशरथेर्महात्मनः । अदृष्टदुःखस्य सुखोचितस्य सा तदा व्यतीता सुचिरेण शर्वरी ॥ ५१ ॥

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अयोध्याकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ३७५ इस प्रकार सोये हुए यशस्वी मनस्वी दशरथनन्दन | तथा जो सुख भोगनेके ही योग्य थे, वह रात उस समय महात्मा श्रीरामकी, जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा था | ( नींद न आनेके कारण ) बहुत देरके बाद व्यतीत हुई ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५० ॥

एकपञ्चाशः सर्गः निषादराज गुहके समक्ष लक्ष्मणका विलाप

तं जाग्रतमदम्भेन भ्रातुरर्थाय लक्ष्मणम् ।

गुहः संतापसंतप्तो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥

लक्ष्मणको अपने भाईके लिये स्वाभाविक अनुरागसे जागते देख निषादराज गुहको बड़ा संताप हुआ । उसने रघुकुलनन्दन लक्ष्मणसे कहा- ॥ १ ॥

इयं तात सुखा शय्या त्वदर्थमुपकल्पिता ।

प्रत्याश्वसिहि साध्वस्यां राजपुत्र यथासुखम् ॥ २ ॥

' तात! राजकुमार! तुम्हारे लिये यह आराम देनेवाली शय्या तैयार है, इसपर सुखपूर्वक सोकर भलीभाँति विश्राम कर लो ॥ २ ॥

उचितोऽयं जनः सर्वः क्लेशानां त्वं सुखोचितः ।

गुप्त्यर्थं जागरिष्यामः काकुत्स्थस्य वयं निशाम् ॥ ३ ॥

' यह ( मैं ) सेवक तथा इसके साथके सब लोग वनवासी होनेके कारण सब प्रकारके क्लेश सहन करनेके योग्य हैं ( क्योंकि हम सबको कष्ट सहनेका अभ्यास है ), परंतु तुम सुखमें ही पले हो, अतः उसीके योग्य हो ( इसलिये सो जाओ ) । हम सब लोग श्रीरामचन्द्रजीकी रक्षाके लिये रातभर जागते रहेंगे ॥ ३ ॥

नहि रामात् प्रियतमो ममास्ते भुवि कश्चन ।

ब्रवीम्येव च ते सत्यं सत्येनैव च ते शपे ॥ ४ ॥

‘ मैं सत्यकी ही शपथ खाकर तुमसे सत्य कहता हूँ कि इस भूतलपर मुझे श्रीरामसे बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है ॥४ ॥

अस्य प्रसादादाशंसे लोकेऽस्मिन् सुमहद् यशः ।

धर्मावाप्तिं च विपुलामर्थकामौ च पुष्कलौ ॥ ५ ॥

‘ इन श्रीरघुनाथजीके प्रसादसे ही मैं इस लोकमें महान् यश, विपुल धर्म - लाभ तथा प्रचुर अर्थ एवं भोग्य वस्तु पानेकी आशा करता हूँ ॥५ ॥

सोऽहं प्रियसखं रामं शयानं सह सीतया ।

रक्षिष्यामि धनुष्पाणिः सर्वथा ज्ञातिभिः सह ॥ ६ ॥

' अतः मैं अपने बन्धु - बान्धवोंके साथ हाथमें धनुष लेकर सीतासहित सोये हुए प्रियसखा श्रीरामकी सब प्रकारसे रक्षा करूँगा ॥६ ॥

न मेऽस्त्यविदितं किंचिद् वनेऽस्मिंश्चरतः सदा ।

चतुरङ्गं ह्यतिबलं सुमहत् संतरेमहि ॥ ७ ॥

' इस वनमें सदा विचरते रहनेके कारण मुझसे यहाँकी कोई बात छिपी नहीं है । हमलोग यहाँ शत्रुकी अत्यन्त शक्तिशालिनी विशाल चतुरङ्गिणी सेनाको भी अनायास ही जीत लेंगे ' ॥७ ॥

लक्ष्मणस्तु तदोवाच रक्ष्यमाणास्त्वयानघ ।

नात्र भीता वयं सर्वे धर्ममेवानुपश्यता ॥ ८ ॥

कथं दाशरथौ भूमौ शयाने सह सीतया ।

शक्या निद्रा मया लब्धुं जीवितं वा सुखानि वा ॥ ९ ॥

यह सुनकर लक्ष्मणने कहा- ' निष्पाप निषादराज! तुम धर्मपर ही दृष्टि रखते हुए हमारी रक्षा करते हो, इसलिये इस स्थानपर हम सब लोगोंके लिये कोई भय नहीं है । फिर भी जब महाराज दशरथके ज्येष्ठ पुत्र सीताके साथ भूमिपर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्यापर सोकर नींद लेना, जीवन - धारणके लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे दूसरे सुखोंको भोगना कैसे सम्भव हो सकता है? ॥ ८ - ९ ॥

यो न देवासुरैः सर्वैः शक्यः प्रसहितुं युधि ।

तं पश्य सुखसंसुप्तं तृणेषु सह सीतया ॥ १० ॥

' देखो! सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी युद्धमें जिनके वेगको नहीं सह सकते, वे ही श्रीराम इस समय सीताके साथ तिनकोंके ऊपर सुखसे सो रहे हैं ॥ १० ॥

यो मन्त्रतपसा लब्धो विविधैश्च पराक्रमैः ।

एको दशरथस्यैष पुत्रः सदृशलक्षणः ॥११ ॥

अस्मिन् प्रव्रजिते राजा न चिरं वर्तयिष्यति ।

विधवा मेदिनी नूनं क्षिप्रमेव भविष्यति ॥ १२ ॥

' गायत्री आदि मन्त्रोंके जप, कृच्छ्रचान्द्रायण आदि तप तथा नाना प्रकारके पराक्रम ( यज्ञानुष्ठान आदि | प्रयत्न ) करनेसे जो महाराज दशरथको अपने समान

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३७६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उत्तम लक्षणोंसे युक्त ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें प्राप्त हुए हैं, उन्हीं इन श्रीरामके वनमें आ जानेसे अब राजा दशरथ अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेंगे । जान पड़ता है, निश्चय ही यह पृथ्वी अब शीघ्र विधवा हो जायगी ॥ ११-१२ ॥

विनद्य सुमहानादं श्रमेणोपरताः स्त्रियः ।

निर्घोषोपरतं तात मन्ये राजनिवेशनम् ॥ १३ ॥

' तात! रनिवासकी स्त्रियाँ बड़े जोरसे आर्तनाद करके अधिक श्रमके कारण अब चुप हो गयी होंगी । मैं समझता हूँ, राजभवनका हाहाकार और चीत्कार अब शान्त हो गया होगा ॥ १३ ॥

कौसल्या चैव राजा च तथैव जननी मम ।

नाशंसे यदि जीवन्ति सर्वे ते शर्वरीमिमाम् ॥ १४ ॥

' महारानी कौसल्या, राजा दशरथ तथा मेरी माता सुमित्रा — ये सब लोग आजकी राततक जीवित रहेंगे या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता ॥१४ ॥

जीवेदपि हि मे माता शत्रुघ्नस्यान्ववेक्षया ।

तद् दुःखं यदि कौसल्या वीरसूर्विनशिष्यति ॥ १५ ॥

' शत्रुघ्नकी बाट देखनेके कारण सम्भव है मेरी माता जीवित रह जाय, परंतु यदि वीरजननी कौसल्या श्रीरामके विरहमें नष्ट हो जायँगी तो यह हमलोगोंके लिये बड़े दुःखकी बात होगी ॥ १५ ॥

अनुरक्तजनाकीर्णा सुखालोकप्रियावहा ।

राजव्यसनसंसृष्टा सा पुरी विनशिष्यति ॥ १६ ॥

' जिसमें श्रीरामके अनुरागी मनुष्य भरे हुए हैं तथा जो सदा सुखका दर्शनरूप प्रिय वस्तुकी प्राप्ति करानेवाली रही है, वह अयोध्यापुरी राजा दशरथके निधनजनित दुःखसे युक्त होकर नष्ट हो जायगी ॥ १६ ॥

कथं पुत्रं महात्मानं ज्येष्ठपुत्रमपश्यतः ।

शरीरं धारयिष्यन्ति प्राणा राज्ञो महात्मनः ॥ १७ ॥

' अपने ज्येष्ठ पुत्र महात्मा श्रीरामको न देखनेपर महामना राजा दशरथके प्राण उनके शरीरमें कैसे टिके रह सकेंगे ॥ १७ ॥

विनष्टे नृपतौ पश्चात् कौसल्या विनशिष्यति ।

अनन्तरं च मातापि मम नाशमुपैष्यति ॥ १८ ॥

' महाराजके नष्ट होनेपर देवी कौसल्या भी नष्ट हो जायँगी । तदनन्तर मेरी माता सुमित्रा भी नष्ट हुए बिना नहीं रहेंगी ॥ १८ ॥

अतिक्रान्तमतिक्रान्तमनवाप्य मनोरथम् ।

राज्ये राममनिक्षिप्य पिता मे विनशिष्यति ॥ १ ९ ॥

' ( महाराजकी इच्छा थी कि श्रीरामको राज्यपर अभिषिक्त करूँ ) अपने उस मनोरथको न पाकर श्रीरामको राज्यपर स्थापित किये बिना ही ' हाय! मेरा सब कुछ नष्ट हो गया, नष्ट हो गया ' ऐसा कहते हुए मेरे पिताजी अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ १ ९ ॥

सिद्धार्थाः पितरं वृत्तं तस्मिन् काले ह्युपस्थिते ।

प्रेतकार्येषु सर्वेषु संस्करिष्यन्ति राघवम् ॥ २० ॥

' उनकी उस मृत्युका समय उपस्थित होनेपर जो लोग रहेंगे और मेरे मरे हुए पिता रघुकुलशिरोमणि दशरथका सभी प्रेतकार्योंमें संस्कार करेंगे, वे ही सफलमनोरथ और भाग्यशाली हैं ॥ २० ॥

रम्यचत्वरसंस्थानां संविभक्तमहापथाम् ।

हर्म्यप्रासादसम्पन्नां गणिकावरशोभिताम् ॥ २१ ॥

रथाश्वगजसम्बाधां तूर्यनादनिनादिताम् ।

सर्वकल्याणसम्पूर्णां हृष्टपुष्टजनाकुलाम् ॥ २२ ॥

आरामोद्यानसम्पन्नां समाजोत्सवशालिनीम् ।

सुखिता विचरिष्यन्ति राजधानीं पितुर्मम ॥ २३ ॥

‘ ( यदि पिताजी जीवित रहे तो ) रमणीय चबूतरों और चौराहोंके सुन्दर स्थानोंसे युक्त, पृथक् - पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गों से अलंकृत, धनिकोंकी अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ वाराङ्गनाओंसे सुशोभित, रथों, घोड़ों और हाथियोंके आवागमनसे भरी हुई, विविध वाद्योंकी ध्वनियोंसे निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओंसे भरपूर, हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे सेवित, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानोंसे विभूषित तथा सामाजिक उत्सवोंसे सुशोभित हुई मेरे पिताकी राजधानी अयोध्यापुरीमें जो लोग विचरेंगे, वास्तवमें वे ही सुखी हैं ॥ २१–२३ ॥

अपि जीवेद् दशरथो वनवासात् पुनर्वयम् ।

प्रत्यागम्य महात्मानमपि पश्याम सुव्रतम् ॥ २४ ॥

' क्या मेरे पिता महाराज दशरथ हमलोगोंके लौटनेतक जीवित रहेंगे? क्या वनवाससे लौटकर उन उत्तम व्रतधारी महात्माका हम फिर दर्शन कर सकेंगे? ॥

अपि सत्यप्रतिज्ञेन सार्धं कुशलिना वयम् ।

निवृत्ते वनवासेऽस्मिन्नयोध्यां प्रविशेमहि ॥ २५ ॥

' क्या वनवासकी इस अवधिके समाप्त होनेपर हमलोग सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामके साथ कुशलपूर्वक अयोध्यापुरीमें प्रवेश कर सकेंगे? ' ॥ २५ ॥

परिदेवयमानस्य दुःखार्तस्य महात्मनः ।

तिष्ठतो राजपुत्रस्य शर्वरी सात्यवर्तत ॥ २६ ॥

इस प्रकार दुःखसे आर्त होकर विलाप करते

पृष्ठ 389

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अयोध्याकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ३७७ हुए महामना राजकुमार लक्ष्मणको वह सारी रात प्रजाके हितमें संलग्न रहनेवाले राजकुमार जागते ही बीती ॥ २६ ॥

तथा हि सत्यं ब्रुवति प्रजाहिते नरेन्द्रसूनौ गुरुसौहृदाद् गुहः मुमोच बाष्पं व्यसनाभिपीडितो ज्वरातुरो नाग इव व्यथातुरः इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण लक्ष्मण जब बड़े भाईके प्रति सौहार्दवश उपर्युक्तरूपसे यथार्थ बात कह रहे थे, उस समय उसे सुनकर । निषादराज गुह दुःखसे पीड़ित हो उठा और व्यथासे व्याकुल हो ज्वरसे आतुर हुए हाथीकी भाँति आँसू ॥ २७ ॥ । बहाने लगा ॥ २७ ॥

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ॥ ५१ ॥

आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

द्विपञ्चाशः सर्गः श्रीरामकी आज्ञासे गुहका नाव मँगाना, श्रीरामका सुमन्त्रको समझा - बुझाकर अयोध्यापुरी. लौट जानेके लिये आज्ञा देना और माता - पिता आदिसे कहनेके लिये संदेश सुनाना, सुमन्त्रके वनमें ही चलनेके लिये आग्रह करनेपर श्रीरामका उन्हें युक्तिपूर्वक समझाकर लौटनेके लिये विवश करना, फिर तीनोंका नावपर बैठना, सीताकी गङ्गाजीसे प्रार्थना, नावसे पार उतरकर श्रीराम आदिका वत्सदेशमें पहुँचना और सायंकालमें एक वृक्षके नीचे रहनेके लिये जाना

प्रभातायां तु शर्वर्यां पृथुवक्षा महायशाः ।

उवाच रामः सौमित्रिं लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥ १ ॥

जब रात बीती और प्रभात हुआ, उस समय विशाल वक्षवाले महायशस्वी श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥

भास्करोदयकालोऽसौ गता भगवती निशा ।

असौ सुकृष्णो विहगः कोकिलस्तात कूजति ॥ २ ॥

' तात! भगवती रात्रि व्यतीत हो गयी । अब सूर्योदयका समय आ पहुँचा है । वह अत्यन्त काले रंगका पक्षी कोकिल कुहू कुहू बोल रहा है ॥२ ॥

बर्हिणानां च निर्घोषः श्रूयते नदतां वने ।

तराम जाह्नवीं सौम्य शीघ्रगां सागरङ्गमाम् ॥ ३ ॥

' वनमें अव्यक्त शब्द करनेवाले मयूरोंकी केका वाणी भी सुनायी देती है; अतः सौम्य! अब हमें तीव्र गतिसे बहनेवाली समुद्रगामिनी गङ्गाजीके पार उतरना चाहिये ' ॥

विज्ञाय रामस्य वचः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः ।

गुहमामन्त्र्य सूतं च सोऽतिष्ठद् भ्रातुरग्रतः ॥ ४ ॥

मित्रोंको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणने श्रीरामचन्द्रजीके कथनका अभिप्राय समझकर गुह और सुमन्त्रको बुलाकर पार उतरनेकी व्यवस्था करनेके लिये कहा और स्वयं वे भाईके सामने आकर खड़े हो गये ॥

स तु रामस्य वचनं निशम्य प्रतिगृह्य च ।

स्थपतिस्तूर्णमाहूय सचिवानिदमब्रवीत् ॥५ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका वचन सुनकर उनका आदेश शिरोधार्य करके निषादराजने तुरंत अपने सचिवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा - ॥५ ॥

अस्यवाहनसंयुक्तां कर्णग्राहवतीं शुभाम् ।

सुप्रतारां दृढां तीर्थे शीघ्रं नावमुपाहर ॥ ६ ॥

' तुम घाटपर शीघ्र ही एक ऐसी नाव ले आओ, जो मजबूत होनेके साथ ही सुगमतापूर्वक खेनेयोग्य हो, उसमें डाँड़ लगा हुआ हो, कर्णधार बैठा हो तथा वह नाव देखनेमें सुन्दर हो ' ॥६ ॥

तं निशम्य गुहादेशं गुहामात्यो गतो महान् ।

उपोह्य रुचिरां नावं गुहाय प्रत्यवेदयत् ॥ ७ ॥

निषादराज गुहका वह आदेश सुनकर उसका महान् मन्त्री गया और एक सुन्दर नाव घाटपर पहुँचाकर उसने गुहको इसकी सूचना दी ॥७ ॥

ततः स प्राञ्जलिर्भूत्वा गुहो राघवमब्रवीत् ।

उपस्थितेयं नौर्देव भूयः किं करवाणि ते ॥ ८ ॥

तब गुहने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ' देव! यह नौका उपस्थित है; बताइये, इस समय । आपकी और क्या सेवा करूँ? ॥८ ॥

पृष्ठ 390

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 390 का मूल पृष्ठ
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३७८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

तवामरसुतप्रख्य ततु सागरगामिनीम् ।

नौरियं पुरुषव्याघ्र शीघ्रमारोह सुव्रत ॥ ९ ॥

‘ देवकुमारके समान तेजस्वी तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुरुषसिंह श्रीराम! समुद्रगामिनी गङ्गानदीको पार करनेके लिये आपकी सेवामें यह नाव आ गयी है, अब आप शीघ्र इसपर आरूढ़ होइये ' ॥ ९ ॥

अथोवाच महातेजा रामो गुहमिदं वचः ।

कृतकामोऽस्मि भवता शीघ्रमारोप्यतामिति ॥ १० ॥

तब महातेजस्वी श्रीराम गुहसे इस प्रकार बोले-' सखे! तुमने मेरा सारा मनोरथ पूर्ण कर दिया, अब शीघ्र ही सब सामान नावपर चढ़ाओ ' ॥ १० ॥

ततः कलापान् संनह्य खड्गौ बध्वा च धन्विनौ ।

जग्मतुर्येन तां गङ्गां सीतया सह राघवौ ॥ ११ ॥

यह कहकर श्रीराम और लक्ष्मणने कवच धारण करके तरकस एवं तलवार बाँधी तथा धनुष लेकर वे दोनों भाई जिस मार्गसे सब लोग घाटपर जाया करते थे, उसीसे सीताके साथ गङ्गाजीके तटपर गये ॥ ११ ॥

राममेवं तु धर्मज्ञमुपागत्य विनीतवत् ।

किमहं करवाणीति सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ १२ ॥

उस समय धर्मके ज्ञाता भगवान् श्रीरामके पास जाकर सारथि सुमन्त्रने विनीतभावसे हाथ जोड़कर पूछा — ' प्रभो! अब मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ' ॥ १२ ॥

ततोऽब्रवीद् दाशरथिः सुमन्त्रं स्पृशन् करेणोत्तमदक्षिणेन । सुमन्त्र शीघ्रं पुनरेव याहि राज्ञः सकाशे भव चाप्रमत्तः ॥ १३ ॥

तब दशरथनन्दन श्रीरामने सुमन्त्रको उत्तम दाहिने हाथसे स्पर्श करते हुए कहा - ' सुमन्त्रजी! अब आप शीघ्र ही पुनः महाराजके पास लौट जाइये और वहाँ सावधान होकर रहिये ' ॥ १३ ॥

निवर्तस्वेत्युवाचैनमेतावद्धि कृतं मम ।

रथं विहाय पद्भ्यां तु गमिष्यामो महावनम् ॥ १४ ॥

उन्होंने फिर कहा - ' इतनी दूरतक महाराजकी आज्ञासे मैंने रथद्वारा यात्रा की है, अब हमलोग रथ छोड़कर पैदल ही महान् वनकी यात्रा करेंगे; अतः आप लौट जाइये ' ॥ १४ ॥

आत्मानं त्वभ्यनुज्ञातमवेक्ष्यार्तः स सारथिः ।

सुमन्त्रः पुरुषव्याघ्रमैक्ष्वाकमिदमब्रवीत् ॥ १५ ॥

अपनेको घर लौटनेकी आज्ञा प्राप्त हुई देख सारथि सुमन्त्र शोकसे व्याकुल हो उठे और इक्ष्वाकुनन्दन पुरुषसिंह श्रीरामसे इस प्रकार बोले - ॥ १५ ॥

नातिक्रान्तमिदं लोके पुरुषेणेह केनचित् ।

तव सभ्रातृभार्यस्य वासः प्राकृतवद् वने ॥ १६ ॥

' रघुनन्दन! जिसकी प्रेरणासे आपको भाई और पत्नीके साथ साधारण मनुष्योंकी भाँति वनमें रहने विवश होना पड़ा है, उस दैवका इस संसारमें किसी भी पुरुषने उल्लङ्घन नहीं किया ॥ १६ ॥

न मन्ये ब्रह्मचर्ये वा स्वधीते वा फलोदयः ।

मार्दवार्जवयोर्वापि त्वां चेद् व्यसनमागतम् ॥ १७ ॥

' जब आप - जैसे महान् पुरुषपर यह संकट आ गया, तब मैं समझता हूँ कि ब्रह्मचर्य पालन, वेदोंके स्वाध्याय, दयालुता अथवा सरलतामें भी किसी फलकी सिद्धि नहीं है ॥ १७ ॥

सह राघव वैदेह्या भ्रात्रा चैव वने वसन् ।

त्वं गतिं प्राप्स्यसे वीर त्रींल्लोकांस्तु जयन्निव ॥१८ ॥

' वीर रघुनन्दन! ( इस प्रकार पिताके सत्यकी रक्षाके लिये ) विदेहनन्दिनी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ वनमें निवास करते हुए आप तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेवाले महापुरुष नारायणकी भाँति उत्कर्ष ( महान् यश ) प्राप्त करेंगे ॥ १८ ॥

वयं खलु हता राम ये त्वया ह्युपवञ्चिताः ।

कैकेय्या वशमेष्यामः पापाया दुःखभागिनः ॥ १ ९ ॥

' श्रीराम! निश्चय ही हमलोग हर तरहसे मारे गये; क्योंकि आपने हम पुरवासियोंको अपने साथ न ले जाकर अपने दर्शनजनित सुखसे वञ्चित कर दिया । अब हम पापिनी कैकेयीके वशमें पड़ेंगे और दुःख । भोगते रहेंगे ' ॥ १ ९ ॥

इति ब्रुवन्नात्मसमं सुमन्त्रः सारथिस्तदा ।

दृष्ट्वा दूरगतं रामं दुःखार्तो रुरुदे चिरम् ॥ २० ॥

आत्माके समान प्रिय श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसी बात कहकर उन्हें दूर जानेको उद्यत देख सारथि सुमन्त्र दुःखसे व्याकुल होकर देरतक रोते रहे ॥२० ॥

ततस्तु विगते बाष्पे सूतं स्पृष्ट्वोदकं शुचिम् ।

रामस्तु मधुरं वाक्यं पुनः पुनरुवाच तम् ॥ २१ ॥

आँसुओंका प्रवाह रुकनेपर आचमन करके पवित्र हुए सारथिसे श्रीरामचन्द्रजीने बारंबार वाणीमें कहा- ॥ २१ ॥

इक्ष्वाकूणां त्वया तुल्यं सुहृदं नोपलक्षये ।

यथा दशरथो राजा मां न शोचेत् तथा कुरु ॥ २२ ॥

' सुमन्त्रजी! मेरी दृष्टिमें इक्ष्वाकुवंशियोंका हित