वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 391–400

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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अयोध्याकाण्डे करनेवाला सुहृद् आपके समान दूसरा कोई नहीं है । आप ऐसा प्रयत्न करें, जिससे महाराज दशरथको मेरे लिये शोक न हो ॥ २२ ॥

शोकोपहतचेताश्च वृद्धश्च जगतीपतिः ।

कामभारावसन्नश्च तस्मादेतद् ब्रवीमि ते ॥ २३ ॥

' पृथिवीपति महाराज दशरथ एक तो बूढ़े हैं, दूसरे उनका सारा मनोरथ चूर - चूर हो गया है; इसलिये उनका हृदय शोकसे पीड़ित है । यही कारण है कि मैं आपको उनकी सँभालके लिये कहता हूँ ॥ २३ ॥

यद् यथा ज्ञापयेत् किंचित् स महात्मा महीपतिः ।

कैकेय्याः प्रियकामार्थं कार्यं तदविकांक्षया ॥ २४ ॥

' वे महामनस्वी महाराज कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे आपको जो कुछ जैसी भी आज्ञा दें, उसका आप आदरपूर्वक पालन करें - यही मेरा अनुरोध है ॥ २४ ॥

एतदर्थं हि राज्यानि प्रशासति नराधिपाः ।

यदेषां सर्वकृत्येषु मनो न प्रतिहन्यते ॥ २५ ॥

' राजालोग इसीलिये राज्यका पालन करते हैं कि किसी भी कार्यमें इनके मनकी इच्छा - पूर्तिमें विघ्न न डाला जाय ॥ २५ ॥

यद् यथा स महाराजो नालीकमधिगच्छति ।

न च ताम्यति शोकेन सुमन्त्र कुरु तत् तथा ॥ २६ ॥

' सुमन्त्रजी! जिस किसी भी कार्यमें जिस किसी तरह भी महाराजको अप्रिय बातसे खिन्न होनेका अवसर न आवे तथा वे शोकसे दुबले न हों, वह आपको उसी प्रकार करना चाहिये ॥ २६ ॥

अदृष्टदुःखं राजानं वृद्धमार्यं जितेन्द्रियम् ।

ब्रूयास्त्वमभिवाद्यैव मम हेतोरिदं वचः ॥ २७ ॥

' जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा है, उन आर्य, जितेन्द्रिय और वृद्ध महाराजको मेरी ओरसे प्रणाम करके यह बात कहियेगा ॥ २७ ॥

न चाहमनुशोचामि लक्ष्मणो न च शोचति ।

अयोध्यायाश्च्युताश्चेति वने वत्स्यामहेति वा ॥ २८ ॥

‘ हमलोग अयोध्यासे निकल गये अथवा हमें वनमें रहना पड़ेगा, इस बातको लेकर न तो मैं कभी शोक करता हूँ और न लक्ष्मणको ही इसका शोक है ॥ २८ ॥

चतुर्दशसु वर्षेषु निवृत्तेषु पुनः पुनः ।

लक्ष्मणं मां च सीतां च द्रक्ष्यसे शीघ्रमागतान् ॥ २ ९ ॥

‘ चौदह वर्ष समाप्त होनेपर हम पुनः शीघ्र ही लौट आयँगे और उस समय आप मुझे, लक्ष्मणको और सीताको भी फिर देखेंगे ॥ २ ९ ॥ द्विपञ्चाशः सर्गः ३७ ९

। एवमुक्त्वा तु राजानं मातरं च सुमन्त्र मे ।

अन्याश्च देवीः सहिताः कैकेयीं च पुनः पुनः ॥ ३० ॥

' सुमन्त्रजी! महाराजसे ऐसा कहकर आप मेरी मातासे, उनके साथ बैठी हुई अन्य देवियों ( माताओं ) से तथा कैकेयीसे भी बारंबार मेरा कुशल- समाचार कहियेगा ॥ ३० ॥

आरोग्यं ब्रूहि कौसल्यामथ पादाभिवन्दनम् ।

सीताया मम चार्यस्य वचनाल्लक्ष्मणस्य च ॥ ३१ ॥

' माता कौसल्यासे कहियेगा कि तुम्हारा पुत्र स्वस्थ एवं प्रसन्न है । इसके बाद सीताकी ओरसे, मुझ ज्येष्ठ पुत्रकी ओरसे तथा लक्ष्मणकी ओरसे भी माताकी चरणवन्दना कह दीजियेगा ॥ ३१ ॥

ब्रूयाश्चापि महाराजं भरतं क्षिप्रमानय ।

आगतश्चापि भरतः स्थाप्यो नृपमते पदे ॥ ३२ ॥

' तदनन्तर मेरी ओरसे महाराजसे भी यह निवेदन कीजियेगा कि आप भरतको शीघ्र ही बुलवा लें और जब वे आ जायँ, तब अपने अभीष्ट युवराजपदपर उनका अभिषेक कर दें ॥ ३२ ॥

भरतं च परिष्वज्य यौवराज्येऽभिषिच्य च ।

अस्मत्संतापजं दुःखं न त्वामभिभविष्यति ॥ ३३ ॥

' भरतको छातीसे लगाकर और युवराजके पदपर अभिषिक्त करके आपको हमलोगोंके वियोगसे होनेवाला दुःख दबा नहीं सकेगा ॥ ३३ ॥

भरतश्चापि वक्तव्यो यथा राजनि वर्तसे ।

तथा मातृषु वर्तेथाः सर्वास्वेवाविशेषतः ॥ ३४ ॥

' भरतसे भी हमारा यह संदेश कह दीजियेगा कि महाराजके प्रति जैसा तुम्हारा बर्ताव है, वैसा ही समानरूपसे सभी माताओंके प्रति होना चाहिये ॥ ३४ ॥

यथा च तव कैकेयी सुमित्रा चाविशेषतः ।

तथैव देवी कौसल्या मम माता विशेषतः ॥ ३५ ॥

' तुम्हारी दृष्टिमें कैकेयीका जो स्थान है, वही समानरूपसे सुमित्रा और मेरी माता कौसल्याका भी होना उचित है, इन सबमें कोई अन्तर न रखना ॥ ३५ ॥

तातस्य प्रियकामेन यौवराज्यमवेक्षता ।

लोकयोरुभयोः शक्यं नित्यदा सुखमेधितुम् ॥ ३६ ॥

' पिताजीका प्रिय करनेकी इच्छासे युवराजपदको स्वीकार करके यदि तुम राजकाजकी देखभाल करते रहोगे तो इहलोक और परलोकमें सदा ही सुख पाओगे ' ॥

निवर्त्यमानो रामेण सुमन्त्रः प्रतिबोधितः ।

तत्सर्वं वचनं श्रुत्वा स्नेहात् काकुत्स्थमब्रवीत् ॥ ३७ ॥

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३८० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको लौटाते हुए जब इस । प्रकार समझाया, तब उनकी सारी बातें सुनकर वे श्रीरामसे स्नेहपूर्वक बोले— ॥ ३७ ॥

यदहं नोपचारेण ब्रूयां स्नेहादविक्लवम् ।

भक्तिमानिति तत् तावद् वाक्यं त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ३८ ॥

कथं हि त्वद्विहीनोऽहं प्रतियास्यामि तां पुरीम् ।

तव तात वियोगेन पुत्रशोकातुरामिव ॥ ३ ९ ॥

' तात! सेवकका स्वामीके प्रति जो सत्कारपूर्ण बर्ताव होना चाहिये, उसका यदि मैं आपसे बात करते समय पालन न कर सकूँ, यदि मेरे मुखसे स्नेहवश कोई धृष्टतापूर्ण बात निकल जाय तो ' यह मेरा भक्त है ' ऐसा समझकर आप मुझे क्षमा कीजियेगा । जो आपके वियोगसे पुत्रशोकसे आतुर हुई माताकी भाँति संतप्त हो रही है, उस अयोध्यापुरीमें मैं आपको साथ लिये बिना कैसे लौटकर जा सकूँगा? ॥ ३८-३९ ॥

सराममपि तावन्मे रथं दृष्ट्वा तदा जनः ।

विना रामं रथं दृष्ट्वा विदीर्येतापि सा पुरी ॥ ४० ॥

' आते समय लोगोंने मेरे रथमें श्रीरामको विराजमान देखा था, अब इस रथको श्रीरामसे रहित देखकर उन लोगोंका और उस अयोध्यापुरीका भी हृदय विदीर्ण हो जायगा ॥ ४० ।

दैन्यं हि नगरी गच्छेद् दृष्ट्वा शून्यमिमं रथम् ।

सूतावशेषं स्वं सैन्यं हतवीरमिवाहवे ॥ ४१ ॥ ।

' जैसे युद्धमें अपने स्वामी वीर रथीके मारे जानेपर जिसमें केवल सारथि शेष रह गया हो ऐसे रथको देखकर उसकी अपनी सेना अत्यन्त दयनीय अवस्थामें पड़ जाती है, उसी प्रकार मेरे इस रथको आपसे सूना देखकर सारी अयोध्या नगरी दीन दशाको प्राप्त हो जायगी ॥ ४१ ॥

दूरेऽपि निवसन्तं त्वां मानसेनाग्रतः स्थितम् ।

चिन्तयन्तोऽद्य नूनं त्वां निराहाराः कृताः प्रजाः ॥ ४२ ॥

' आप दूर रहकर भी प्रजाके हृदयमें निवास करनेके कारण सदा उसके सामने ही खड़े रहते हैं । निश्चय ही इस समय प्रजावर्गके सब लोगोंने आपका ही चिन्तन करते हुए खाना - पीना छोड़ दिया होगा ॥ ४२ ॥

दृष्टं तद् वै त्वया राम यादृशं त्वत्प्रवासने ।

प्रजानां संकुलं वृत्तं त्वच्छोकक्लान्तचेतसाम् ॥ ४३ ॥

' श्रीराम! जिस समय आप वनको आने लगे, उस समय आपके शोकसे व्याकुलचित्त हुई प्रजाने जैसा आर्तनाद एवं क्षोभ प्रकट किया था, उसे तो आपने देखा ही था ॥ ४३ ॥

आर्तनादो हि यः पौरैरुन्मुक्तस्त्वत्प्रवासने ।

सरथं मां निशाम्यैव कुर्युः शतगुणं ततः ॥ ४४ ॥

' आपके अयोध्यासे निकलते समय पुरवासियोंने जैसा आर्तनाद किया था, आपके बिना मुझे खाली रथ लिये लौटा देख वे उससे भी सौगुना हाहाकार करेंगे ॥

अहं किं चापि वक्ष्यामि देवीं तव सुतो मया ।

नीतोऽसौ मातुलकुलं संतापं मा कृथा इति ॥ ४५ ॥

असत्यमपि नैवाहं ब्रूयां वचनमीदृशम् ।

कथमप्रियमेवाहं ब्रूयां सत्यमिदं वचः ॥ ४६ ॥

' क्या मैं महारानी कौसल्यासे जाकर कहूँगा कि मैंने आपके बेटेको मामाके घर पहुँचा दिया है? इसलिये आप संताप न करें, यह बात प्रिय होनेपर भी असत्य है, अतः ऐसा असत्य वचन भी मैं कभी नहीं कह सकता । फिर यह अप्रिय सत्य भी कैसे सुना सकूँगा कि मैं आपके पुत्रको वनमें पहुँचा आया ॥ ४५-४६ ॥

मम तावन्नियोगस्थास्त्वद्बन्धुजनवाहिनः ।

कथं रथं त्वया हीनं प्रवाह्यन्ति हयोत्तमाः ॥ ४७ ॥

' ये उत्तम घोड़े मेरी आज्ञाके अधीन रहकर आपके बन्धुजनोंका भार वहन करते हैं ( आपके बन्धुजनोंसे हीन रथका ये वहन नहीं करते हैं ), ऐसी दशामें आपसे सूने रथको ये कैसे खींच सकेंगे? ॥४७ ॥

तन्न शक्ष्याम्यहं गन्तुमयोध्यां त्वदृतेऽनघ ।

वनवासानुयानाय मामनुज्ञातुमर्हसि ॥ ४८ ॥

' अतः निष्पाप रघुनन्दन! अब मैं आपके बिना अयोध्या लौटकर नहीं जा सकूँगा । मुझे भी वनमें चलनेकी ही आज्ञा दीजिये ॥ ४८ ॥

यदि मे याचमानस्य त्यागमेव करिष्यसि ।

सरथोऽग्निं प्रवेक्ष्यामि त्यक्तमात्र इह त्वया ॥ ४ ९ ॥

' यदि इस तरह याचना करनेपर भी आप मुझे त्याग ही देंगे तो मैं आपके द्वारा परित्यक्त होकर यहाँ रथसहित अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ॥४ ९ ॥

भविष्यन्ति वने यानि तपोविघ्नकराणि ते ।

रथेन प्रतिबाधिष्ये तानि सर्वाणि राघव ॥ ५० ॥

' रघुनन्दन! वनमें आपकी तपस्यामें विघ्न डालनेवाले जो - जो जन्तु उपस्थित होंगे, मैं इस रथके द्वारा उन सबको दूर भगा दूँगा ॥ ५० ॥

त्वत्कृतेन मया प्राप्तं रथचर्याकृतं सुखम् ।

आशंसे त्वत्कृतेनाहं वनवासकृतं सुखम् ॥५१ ॥

' श्रीराम! आपकी कृपासे मुझे आपको रथपर बिठाकर यहाँतक लानेका सुख प्राप्त हुआ । अब आपके

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अयोध्याकाण्डे ही अनुग्रहसे मैं आपके साथ वनमें रहनेका सुख भी पानेकी आशा करता हूँ ॥ ५१ ॥

प्रसीदेच्छामि तेऽरण्ये भवितुं प्रत्यनन्तरः ।

प्रीत्याभिहितमिच्छामि भव मे प्रत्यनन्तरः ॥ ५२ ॥

' आप प्रसन्न होकर आज्ञा दीजिये । मैं वनमें आपके पास ही रहना चाहता हूँ । मेरी इच्छा है कि आप प्रसन्नतापूर्वक कह दें कि तुम वनमें मेरे साथ ही रहो ॥ ५२ ॥

इमेऽपि च हया वीर यदि ते वनवासिनः ।

परिचर्यां करिष्यन्ति प्राप्स्यन्ति परमां गतिम् ॥ ५३ ॥

‘ वीर! ये घोड़े भी यदि वनमें रहते समय आपकी सेवा करेंगे तो इन्हें परमगतिकी प्राप्ति होगी ॥ ५३ ॥

तव शुश्रूषणं मूर्ध्ना करिष्यामि वने वसन् ।

अयोध्यां देवलोकं वा सर्वथा प्रजहाम्यहम् ॥ ५४ ॥

' प्रभो! मैं वनमें रहकर अपने सिरसे ( सारे शरीरसे ) आपकी सेवा करूँगा और इस सुखके आगे अयोध्या तथा देवलोकका भी सर्वथा त्याग कर दूँगा ॥

नहि शक्या प्रवेष्टुं सा मयायोध्या त्वया विना ।

राजधानी महेन्द्रस्य यथा दुष्कृतकर्मणा ॥ ५५ ॥

' जैसे सदाचारहीन प्राणी इन्द्रकी राजधानी स्वर्गमें नहीं प्रवेश कर सकता, उसी प्रकार आपके बिना मैं अयोध्यापुरीमें नहीं जा सकता ॥ ५५ ॥

वनवासे क्षयं प्राप्ते ममैष हि मनोरथः ।

यदनेन रथेनैव त्वां वहेयं पुरीं पुनः ॥ ५६ ॥

' मेरी यह अभिलाषा है कि जब वनवासकी अवधि समाप्त हो जाय, तब फिर इसी रथपर बिठाकर आपको अयोध्यापुरीमें ले चलूँ ॥५६ ॥

चतुर्दश हि वर्षाणि सहितस्य त्वया वने ।

क्षणभूतानि यास्यन्ति शतसंख्यानि चान्यथा ॥ ५७ ॥

' वनमें आपके साथ रहनेसे ये चौदह वर्ष मेरे लिये चौदह क्षणोंके समान बीत जायँगे । अन्यथा चौदह सौ वर्षोंके समान भारी जान पड़ेंगे ॥ ५७ ॥

भृत्यवत्सल तिष्ठन्तं भर्तृपुत्रगते पथि ।

भक्तं भृत्यं स्थितं स्थित्या न मा त्वं हातुमर्हसि ॥ ५८ ॥

‘ अतः भक्तवत्सल! आप मेरे स्वामीके पुत्र हैं । आप जिस पथपर चल रहे हैं, उसीपर आपकी सेवाके लिये साथ चलनेको मैं भी तैयार खड़ा हूँ । मैं आपके प्रति भक्ति रखता हूँ, आपका भृत्य हूँ और भृत्यजनोचित मर्यादाके भीतर स्थित हूँ; अतः आप मेरा परित्याग न करें ' ॥ ५८ ॥

द्विपञ्चाशः सर्गः ३८१

। एवं बहुविधं दीनं याचमानं पुनः पुनः ।

रामो भृत्यानुकम्पी तु सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ॥ ५ ९ ॥

इस तरह अनेक प्रकारसे दीन वचन कहकर बारंबार याचना करनेवाले सुमन्त्रसे सेवकोंपर कृपा करनेवाले श्रीरामने इस प्रकार कहा- ॥ ५ ९ ॥

जानामि परमां भक्तिमहं ते भर्तृवत्सल ।

शृणु चापि यदर्थं त्वां प्रेषयामि पुरीमितः ॥ ६० ॥

' सुमन्त्रजी! आप स्वामीके प्रति स्नेह रखनेवाले हैं । मुझमें आपकी जो उत्कृष्ट भक्ति है, उसे मैं जानता हूँ; फिर भी जिस कार्यके लिये मैं आपको यहाँसे अयोध्यापुरीमें भेज रहा हूँ, उसे सुनिये ॥ ६० ॥

नगरीं त्वां गतं दृष्ट्वा जननी मे यवीयसी ।

कैकेयी प्रत्ययं गच्छेदिति रामो वनं गतः ॥ ६१ ॥

' जब आप नगरको लौट जायँगे, तब आपको देखकर मेरी छोटी माता कैकेयीको यह विश्वास हो जायगा कि राम वनको चले गये ॥ ६१ ॥

विपरीते तुष्टिहीना वनवासं गते मयि ।

राजानं नातिशङ्केत मिथ्यावादीति धार्मिकम् ॥ ६२ ॥

' इसके विपरीत यदि आप नहीं गये तो उसे संतोष नहीं होगा । मेरे वनवासी हो जानेपर भी वह धर्मपरायण महाराज दशरथके प्रति मिथ्यावादी होनेका संदेह करे, ऐसा मैं नहीं चाहता ॥ ६२ ॥

एष मे प्रथमः कल्पो यदम्बा मे यवीयसी ।

भरतारक्षितं स्फीतं पुत्रराज्यमवाप्स्यते ॥ ६३ ॥

' आपको भेजनेमें मेरा मुख्य उद्देश्य यही है कि मेरी छोटी माता कैकेयी भरतद्वारा सुरक्षित समृद्धिशाली राज्यको हस्तगत कर ले ॥ ६३ ॥

मम प्रियार्थं राज्ञश्च सुमन्त्र त्वं पुरीं व्रज ।

संदिष्टश्चापि यानर्थांस्तांस्तान् ब्रूयास्तथा तथा ॥ ६४ ॥

' सुमन्त्रजी! मेरा तथा महाराजका प्रिय करनेके लिये आप अयोध्यापुरीको अवश्य पधारिये और आपको जिनके लिये जो संदेश दिया गया है, वह सब वहाँ जाकर उन लोगोंसे कह दीजिये ' ॥ ६४ ॥

इत्युक्त्वा वचनं सूतं सान्त्वयित्वा पुनः पुनः ।

गुहं वचनमक्लीबो रामो हेतुमदब्रवीत् ॥ ६५ ॥

ऐसा कहकर श्रीरामने सुमन्त्रको बारंबार सान्त्वना दी । इसके बाद उन्होंने गुहसे उत्साहपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही - ॥ ६५ ॥

नेदानीं गुह योग्योऽयं वासो मे सजने वने ।

अवश्यमाश्रमे वासः कर्तव्यस्तद्गतो विधिः ॥ ६६ ॥

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३८२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ‘ निषादराज गुह! इस समय मेरे लिये ऐसे वनमें । रहना उचित नहीं है, जहाँ जनपदके लोगोंका आना-जाना अधिक होता हो, अब अवश्य मुझे निर्जन वनके आश्रममें ही वास करना होगा । इसके लिये जटा धारण आदि आवश्यक विधिका मुझे पालन करना चाहिये ॥

सोऽहं गृहीत्वा नियमं तपस्विजनभूषणम् ।

हितकामः पितुर्भूयः सीताया लक्ष्मणस्य च ॥ ६७ ॥

जटाः कृत्वा गमिष्यामि न्यग्रोधक्षीरमानय ।

तत्क्षीरं राजपुत्राय गुहः क्षिप्रमुपाहरत् ॥ ६८ ॥

' अतः फल - मूलका आहार और पृथ्वीपर शयन आदि नियमोंको ग्रहण करके मैं सीता और लक्ष्मणकी अनुमति लेकर पिताका हित करनेकी इच्छासे सिरपर तपस्वी जनोंके आभूषणरूप जटा धारण करके यहाँसे वनको जाऊँगा । मेरे केशोंको जटाका रूप देनेके लिये तुम बड़का दूध ला दो । ' गुहने तुरंत ही बड़का दूध लाकर श्रीरामको दिया ॥ ६७-६८ ॥

लक्ष्मणस्यात्मनश्चैव रामस्तेनाकरोज्जटाः ।

दीर्घबाहुर्नरव्याघ्रो जटिलत्वमधारयत् ॥ ६ ९ ॥

श्रीरामने उसके द्वारा लक्ष्मणकी तथा अपनी जटाएँ बनायीं । महाबाहु पुरुषसिंह श्रीराम तत्काल जटाधारी हो गये ॥ ६ ९ ॥

तौ तदा चीरसम्पन्नौ जटामण्डलधारिणौ ।

अशोभेतामृषिसमौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ७० ॥

उस समय वे दोनों भाई श्रीराम - लक्ष्मण वल्कल वस्त्र और जटामण्डल धारण करके ऋषियोंके समान शोभा पाने लगे ॥ ७० ॥

ततो वैखानसं मार्गमास्थितः सहलक्ष्मणः ।

व्रतमादिष्टवान् रामः सहायं गुहमब्रवीत् ॥ ७१ ॥

तदनन्तर वानप्रस्थमार्गका आश्रय लेकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने वानप्रस्थोचित व्रतको ग्रहण किया । तत्पश्चात् वे अपने सहायक गुहसे बोले – ॥७१ ॥

अप्रमत्तो बले कोशे दुर्गे जनपदे तथा ।

भवेथा गुह राज्यं हि दुरारक्षतमं मतम् ॥ ७२ ॥

' निषादराज! तुम सेना, खजाना, किला और राज्यके विषयमें सदा सावधान रहना; क्योंकि राज्यकी रक्षाका काम बड़ा कठिन माना गया है ' ॥ ७२ ॥

ततस्तं समनुज्ञाप्य गुहमिक्ष्वाकुनन्दनः ।

जगाम तूर्णमव्यग्रः सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥ ७३ ॥

गुहको इस प्रकार आज्ञा देकर उससे विदा ले इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पत्नी और लक्ष्मणके साथ तुरंत ही वहाँसे चल दिये । उस समय उनके चित्तमें तनिक भी व्यग्रता नहीं थी ॥ ७३ ॥

स तु दृष्ट्वा नदीतीरे नावमिक्ष्वाकुनन्दनः ।

तितीर्षुः शीघ्रगां गङ्गामिदं वचनमब्रवीत् ॥७४ ॥

नदीके तटपर लगी हुई नावको देखकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामने शीघ्रगामी गङ्गानदीके पार जानेकी इच्छासे लक्ष्मणको सम्बोधित करके कहा- ॥ ७४ ॥

आरोह त्वं नरव्याघ्र स्थितां नावमिमां शनैः ।

सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम् ॥ ७५ ॥

' पुरुषसिंह! यह सामने नाव खड़ी है । तुम मनस्विनी सीताको पकड़कर धीरेसे उसपर बिठा दो, फिर स्वयं भी नावपर बैठ जाओ ' ॥ ७५ ॥

स भ्रातुः शासनं श्रुत्वा सर्वमप्रतिकूलयन् ।

आरोप्य मैथिलीं पूर्वमारुरोहात्मवांस्ततः ॥ ७६ ॥

भाईका यह आदेश सुनकर मनको वशमें रखनेवाले लक्ष्मणने पूर्णतः उसके अनुकूल चलते हुए पहले मिथिलेशकुमारी श्रीसीताको नावपर बिठाया, फिर स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुए ॥७६ ॥

अथारुरोह तेजस्वी स्वयं लक्ष्मणपूर्वजः ।

ततो निषादाधिपतिर्गु ज्ञातीनचोदयत् ॥ ७७ ॥

सबके अन्तमें लक्ष्मणके बड़े भाई तेजस्वी श्रीराम स्वयं नौकापर बैठे । तदनन्तर निषादराज गुहने अपने भाई - बन्धुओंको नौका खेनेका आदेश दिया ॥ ७७ ॥

राघवोऽपि महातेजा नावमारुह्य तां ततः ।

ब्रह्मवत्क्षत्रवच्चैव जजाप हितमात्मनः ॥ ७८ ॥

महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी भी उस नावपर आरूढ़ होनेके पश्चात् अपने हितके उद्देश्यसे ब्राह्मण और क्षत्रियके जपनेयोग्य ' दैवी नाव ' इत्यादि वैदिक मन्त्रका जप करने लगे ॥ ७८ ॥

आचम्य च यथाशास्त्रं नदीं तां सह सीतया ।

प्रणमत्प्रीतिसंतुष्टो लक्ष्मणश्च महारथः ॥ ७ ९ ॥

फिर शास्त्रविधिके अनुसार आचमन करके सीताके साथ उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर गङ्गाजीको प्रणाम किया । महारथी लक्ष्मणने भी उन्हें मस्तक झुकाया ॥ ७ ९ ॥

अनुज्ञाय सुमन्त्रं च सबलं चैव तं गुहम् ।

आस्थाय नावं रामस्तु चोदयामास नाविकान् ॥ ८० ॥

इसके बाद श्रीरामने सुमन्त्रको तथा सेनासहित गुहको भी जानेकी आज्ञा दे नावपर भलीभाँति बैठकर मल्लाहोंको उसे चलानेका आदेश दिया ॥ ८० ॥

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अयोध्याकाण्डे

ततस्तैश्चालिता नौका कर्णधारसमाहिता ।

शुभस्म्यवेगाभिहता शीघ्रं सलिलमत्यगात् ॥ ८१ ॥

तदनन्तर मल्लाहोंने नाव चलायी । कर्णधार सावधान होकर उसका संचालन करता था । वेगसे सुन्दर डाँड़ चलानेके कारण वह नाव बड़ी तेजीसे पानीपर बढ़ने लगी ॥८१ ॥

मध्यं तु समनुप्राप्य भागीरथ्यास्त्वनिन्दिता ।

वैदेही प्राञ्जलिर्भूत्वा तां नदीमिदमब्रवीत् ॥ ८२ ॥

भागीरथीकी बीच धारामें पहुँचकर सती साध्वी विदेहनन्दिनी सीताने हाथ जोड़कर गङ्गाजीसे यह प्रार्थना की— ॥ ८२ ॥

पुत्रो दशरथस्यायं महाराजस्य धीमतः ।

निदेशं पालयत्वेनं गङ्गे त्वदभिरक्षितः ॥ ८३ ॥

' देवि गङ्गे! ये परम बुद्धिमान् महाराज दशरथके पुत्र हैं और पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये वनमें जा रहे हैं । ये आपसे सुरक्षित होकर पिताकी इस आज्ञाका पालन कर सकें- ऐसी कृपा कीजिये ॥ ८३ ॥

चतुर्दश हि वर्षाणि समग्राण्युष्य कानने ।

भ्रात्रा सह मया चैव पुनः प्रत्यागमिष्यति ॥ ८४ ॥

' वनमें पूरे चौदह वर्षोंतक निवास करके ये मेरे तथा अपने भाईके साथ पुनः अयोध्यापुरीको लौटेंगे ॥ ८४ ॥

ततस्त्वां देवि सुभगे क्षेमेण पुनरागता ।

यक्ष्ये प्रमुदिता गङ्गे सर्वकामसमृद्धिनी ॥ ८५ ॥

' सौभाग्यशालिनी देवि गङ्गे! उस समय वनसे पुनः कुशलपूर्वक लौटनेपर सम्पूर्ण मनोरथोंसे सम्पन्न हुई मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपकी पूजा करूँगी ॥ ८५ ॥

त्वं हि त्रिपथगे देवि ब्रह्मलोकं समक्षसे ।

भार्या चोदधिराजस्य लोकेऽस्मिन् सम्प्रदृश्यसे ॥ ८६ ॥

' स्वर्ग, भूतल और पाताल - तीनों मार्गोंपर विचरनेवाली देवि! तुम यहाँसे ब्रह्मलोकतक फैली हुई हो और इस लोकमें समुद्रराजकी पत्नीके रूपमें दिखायी देती हो ॥ ८६ ॥

सा त्वां देवि नमस्यामि प्रशंसामि च शोभने ।

प्राप्तराज्ये नरव्याघ्रे शिवेन पुनरागते ॥ ८७ ॥

' शोभाशालिनी देवि! पुरुषसिंह श्रीराम जब पुनः वनसे सकुशल लौटकर अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब द्विपञ्चाशः सर्गः ३८३ मैं सीता पुनः आपको मस्तक झुकाऊँगी और आपकी स्तुति करूँगी ॥ ८७ ॥

गवां शतसहस्रं च वस्त्राण्यन्नं च पेशलम् ।

ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यामि तव प्रियचिकीर्षया ॥ ८८ ॥

' इतना ही नहीं, मैं आपका प्रिय करनेकी इच्छासे ब्राह्मणोंको एक लाख गौएँ, बहुत - से वस्त्र तथा उत्तमोत्तम अन्न प्रदान करूँगी ॥ ८८ ॥

सुराघटसहस्रेण मांसभूतादनेन च ।

यक्ष्ये त्वां प्रीयतां देवि पुरीं पुनरुपागता ॥। ८ ९ ॥

' देवि! पुनः अयोध्यापुरीमें लौटनेपर मैं सहस्रों देवदुर्लभ पदार्थोंसे तथा राजकीय भागसे रहित पृथ्वी, वस्त्र और अन्नके द्वारा भी आपकी पूजा करूँगी । आप मुझपर प्रसन्न हों * ॥ ८ ९ ॥

यानि त्वत्तीरवासीनि दैवतानि च सन्ति हि ।

तानि सर्वाणि यक्ष्यामि तीर्थान्यायतनानि च ॥ ९ ० ॥

' आपके किनारे जो - जो देवता, तीर्थ और मन्दिर हैं, उन सबका मैं पूजन करूँगी ॥ ९ ० ॥

पुनरेव महाबाहुर्मया भ्रात्रा च संगतः ।

अयोध्यां वनवासात् तु प्रविशत्वनघोऽनघे ॥ ९ १ ॥

' निष्पाप गङ्गे! ये मेरे तथा अपने भाईके अयोध्या नगरीमें प्रवेश तथा सम्भाषमाणा सा दक्षिणा दक्षिणं तीरं पतिके अनुकूल इस प्रकार गङ्गाजीसे दक्षिणतटपर जा पहुँचीं महाबाहु पापरहित मेरे पतिदेव साथ वनवाससे लौटकर पुनः करें ' ॥ ९ १ ॥

सीता गङ्गामनिन्दिता ।

क्षिप्रमेवाभ्युपागमत् ॥ ९ २ ॥

रहनेवाली सती - साध्वी सीता प्रार्थना करती हुई शीघ्र ही ॥ ९ २ ॥

तीरं तु समनुप्राप्य नावं हित्वा नरर्षभः ।

प्रातिष्ठत सह भ्रात्रा वैदेह्या च परंतपः ॥ ९ ३ ॥

किनारे पहुँचकर शत्रुओंको संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ श्रीरामने नाव छोड़ दी और भाई लक्ष्मण तथा विदेहनन्दिनी सीताके साथ आगेको प्रस्थान किया । ९ ३ ॥

अथाब्रवीन्महाबाहुः सुमित्रानन्दवर्धनम् ।

भव संरक्षणार्थाय सजने विजनेऽपि वा ॥९ ४ ॥

अवश्यं रक्षणं कार्यं मद्विधैर्विजने वने ॥ अग्रतो गच्छ सौमित्रे सीता त्वामनुगच्छतु ॥ ९ ५ ॥ * इस श्लोक में आये हुए ' सुराघटसहस्रेण ' की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- ' सुरेषु देवेषु न घटन्ते न सन्तीत्यर्थः, तेषां सहस्त्रं तेन सहस्त्रसंख्याकसुरदुर्लभपदार्थेनेत्यर्थः । ' ' मांसभूतौदनेन ' की व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये - ' मांसभूतौदनेन मा नास्ति अंसो राजभागो यस्यां सा एव भूः पृथ्वी च उतं वस्त्रं च ओदनं च एतेषां समाहारः, तेन च त्वां यक्ष्ये । '

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३८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सीतां त्वां चानुपालयन् ।

अन्योन्यस्य हि नो रक्षा कर्तव्या पुरुषर्षभ ॥ ९ ६ ॥

तदनन्तर महाबाहु श्रीराम सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे । बोले- ' सुमित्राकुमार! अब तुम सजन या निर्जन वनमें सीताकी रक्षाके लिये सावधान हो जाओ । हम जैसे लोगोंको निर्जन वनमें नारीकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये । अतः तुम आगे - आगे चलो, सीता तुम्हारे पीछे-पीछे चलें और मैं सीताकी तथा तुम्हारी रक्षा करता हुआ सबसे पीछे चलूँगा । पुरुषप्रवर! हमलोगोंको एक-दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ९ ४ - ९ ६ ॥

न हि तावदतिक्रान्तासुकरा काचन क्रिया ।

अद्य दुःखं तु वैदेही वनवासस्य वेत्स्यति ॥ ९ ७ ॥

' अबतक कोई भी दुष्कर कार्य समाप्त नहीं हुआ है— इस समयसे ही कठिनाइयोंका सामना आरम्भ हुआ है । आज विदेहकुमारी सीताको वनवासके वास्तविक कष्टका अनुभव होगा ॥ ९ ७ ॥

प्रणष्टजनसम्बाधं क्षेत्रारामविवर्जितम् ।

विषमं च प्रपातं च वनमद्य प्रवेक्ष्यति ॥ ९ ८ ॥

' अब ये ऐसे वनमें प्रवेश करेंगी, जहाँ मनुष्योंके आने - जानेका कोई चिह्न नहीं दिखायी देगा, न धान आदिके खेत होंगे, न टहलनेके लिये बगीचे । जहाँ ऊँची - नीची भूमि होगी और गड्ढे मिलेंगे, जिसमें गिरनेका भय रहेगा ' ॥ ९ ८ ॥

श्रुत्वा रामस्य वचनं प्रतस्थे लक्ष्मणोऽग्रतः ।

अनन्तरं च सीताया राघवो रघुनन्दनः ॥ ९९ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मण आगे बढ़े । उनके पीछे सीता चलने लगीं तथा सीताके पीछे रघुकुलनन्दन श्रीराम थे ॥ ९९ ॥

तं तु गङ्गापरपारमाशु

रामं सुमन्त्रः सततं निरीक्ष्य ।

अध्वप्रकर्षाद् विनिवृत्तदृष्टि-र्मुमोच बाष्पं व्यथितस्तपस्वी ॥ १०० ॥

श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र गङ्गाजीके उस पार पहुँचकर जबतक दिखायी दिये तबतक सुमन्त्र निरन्तर उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये देखते रहे । जब वनके मार्गमें बहुत दूर निकल जानेके कारण वे दृष्टिसे ओझल हो गये, तब तपस्वी सुमन्त्रके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई । वे नेत्रों आँसू बहाने लगे ॥१०० ॥

स लोकपालप्रतिमप्रभाव-स्तीर्त्वा महात्मा वरदो महानदीम् । ततः समृद्धान् शुभसस्यमालिनः क्रमेण वत्सान् मुदितानुपागमत् ॥१०१ ॥

लोकपालोंके समान प्रभावशाली वरदायक महात्मा श्रीराम महानदी गङ्गाको पार करके क्रमशः समृद्धिशाली वत्सदेश ( प्रयाग ) -में जा पहुँचे, जो सुन्दर धन - धान्यसे सम्पन्न था । वहाँके लोग बड़े हृष्ट - पुष्ट थे ॥१०१ ॥

तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान् वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम् । आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम् ॥ १०२ ॥

वहाँ उन दोनों भाइयोंने मृगया - विनोदके लिये वराह, ऋष्य, पृषत् और महारुरु — इन चार महामृगोंपर बाणोंका प्रहार किया । तत्पश्चात् जब उन्हें भूख लगी, तब पवित्र कन्द - मूल आदि लेकर सायंकालके समय ठहरनेके लिये ( वे सीताजीके साथ ) एक वृक्षके नीचे चले गये ॥१०२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥ ५२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

त्रिपञ्चाशः सर्गः श्रीरामका राजाको उपालम्भ देते हुए कैकेयीसे कौसल्या आदिके अनिष्टकी आशङ्का बताकर लक्ष्मणको अयोध्या लौटानेके लिये प्रयत्न करना, लक्ष्मणका श्रीरामके बिना अपना जीवन असम्भव बताकर वहाँ जानेसे इनकार करना, फिर श्रीरामका उन्हें वनवासकी अनुमति देना स तं वृक्षं समासाद्य संध्यामन्वास्य पश्चिमाम् । उस वृक्षके नीचे पहुँचकर आनन्द प्रदान रामो रमयतां श्रेष्ठ इति होवाच लक्ष्मणम् ॥ १ ॥ करनेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीरामने सायंकालकी संध्योपासना

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अयोध्याकाण्डे करके लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥

अद्येयं प्रथमा रात्रिर्याता जनपदाद् बहिः ।

या सुमन्त्रेण रहिता तां नोत्कण्ठितुमर्हसि ॥ २ ॥

' सुमित्रानन्दन! आज हमें अपने जनपदसे बाहर यह पहली रात प्राप्त हुई है; जिसमें सुमन्त्र हमारे साथ नहीं हैं । इस रातको पाकर तुम्हें नगरकी सुख-सुविधाओंके लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये ॥ २ ॥

जागर्तव्यमतन्द्रिभ्यामद्यप्रभृति रात्रिषु ।

योगक्षेमौ हि सीताया वर्तेते लक्ष्मणावयोः ॥ ३ ॥

' लक्ष्मण! आजसे हम दोनों भाइयोंको आलस्य छोड़कर रातमें जागना होगा; क्योंकि सीताके योगक्षेम हम दोनोंके ही अधीन हैं ॥ ३ ॥

रात्रिं कथंचिदेवेमां सौमित्रे वर्तयामहे ।

अपवर्तामहे भूमावास्तीर्य स्वयमर्जितैः ॥ ४ ॥

' सुमित्रानन्दन! यह रात हमलोग किसी तरह बितायँगे और स्वयं संग्रह करके लाये हुए तिनकों और पत्तोंकी शय्या बनाकर उसे भूमिपर बिछाकर उसपर किसी तरह सो लेंगे'॥४ ॥

स तु संविश्य मेदिन्यां महार्हशयनोचितः ।

इमाः सौमित्रये रामो व्याजहार कथाः शुभाः ॥ ५ ॥

जो बहुमूल्य शय्यापर सोनेके योग्य थे, वे श्रीराम भूमिपर ही बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे ये शुभ बातें कहने लगे - * ॥५ ॥

ध्रुवमद्य महाराजो दुःखं स्वपिति लक्ष्मण ।

कृतकामा तु कैकेयी तुष्टा भवितुमर्हति ॥ ६ ॥

' लक्ष्मण! आज महाराज निश्चय ही बड़े दुःखसे सो रहे होंगे; परंतु कैकेयी सफलमनोरथ होनेके कारण बहुत संतुष्ट होगी ॥ ६ ॥

सा हि देवी महाराजं कैकेयी राज्यकारणात् ।

अपि न च्यावयेत् प्राणान् दृष्ट्वा भरतमागतम् ॥ ७ ॥

' कहीं ऐसा न हो कि रानी कैकेयी भरतको आया देख राज्यके लिये महाराजको प्राणोंसे भी वियुक्त कर दे ॥७ ॥

अनाथश्च हि वृद्धश्च मया चैव विना कृतः ।

किं करिष्यति कामात्मा कैकेय्या वशमागतः ॥ ८ ॥

' महाराजका कोई रक्षक न होनेके कारण वे इस समय अनाथ हैं, बूढ़े हैं और उन्हें मेरे वियोगका सामना * श्लोक ६ से लेकर २६ तक श्रीरामचन्द्रजीने अयोध्या लौटानेके लिये कही गयी हैं; वास्तवमें उनकी स्वीकार की है । त्रिपञ्चाशः सर्गः ३८५ करना पड़ा है । उनकी कामना मनमें ही रह गयी तथा वे कैकेयीके वशमें पड़ गये हैं; ऐसी दशामें वे बेचारे अपनी रक्षाके लिये क्या करेंगे? ॥ ८ ॥

इदं व्यसनमालोक्य राज्ञश्च मतिविभ्रमम् ।

काम एवार्थधर्माभ्यां गरीयानिति मे मतिः ॥ ९ ॥

' अपने ऊपर आये हुए इस संकटको और राजाकी मतिभ्रान्तिको देखकर मुझे ऐसा मालूम होता है । कि अर्थ और धर्मकी अपेक्षा कामका ही गौरव अधिक | है ॥ ९ ॥

को ह्यविद्वानपि पुमान् प्रमदायाः कृते त्यजेत् ।

छन्दानुवर्तिनं पुत्रं तातो मामिव लक्ष्मण ॥ १० ॥

' लक्ष्मण! पिताजीने जिस तरह मुझे त्याग दिया है, उस प्रकार अत्यन्त अज्ञ होनेपर भी कौन ऐसा पुरुष होगा, जो एक स्त्रीके लिये अपने आज्ञाकारी पुत्रका परित्याग कर दे? ॥ १० ॥

सुखी बत सुभार्यश्च भरतः केकयीसुतः ।

मुदितान् कोसलानेको यो भोक्ष्यत्यधिराजवत् ॥ ११ ॥

' कैकेयीकुमार भरत ही सुखी और सौभाग्यवती स्त्रीके पति हैं, जो अकेले ही हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए कोसलदेशका सम्राट्की भाँति पालन करेंगे ॥ ११ ॥

। स हि राज्यस्य सर्वस्य सुखमेकं भविष्यति ।

ताते तु वयसातीते मयि चारण्यमाश्रिते ॥ १२ ॥

' पिताजी अत्यन्त वृद्ध हो गये हैं और मैं वनमें चला आया हूँ, ऐसी दशामें केवल भरत ही समस्त राज्यके श्रेष्ठ सुखका उपभोग करेंगे ॥ १२ ॥

अर्थधम परित्यज्य यः काममनुवर्तते ।

एवमापद्यते क्षिप्रं राजा दशरथो यथा ॥ १३ ॥

' सच है, जो अर्थ और धर्मका परित्याग करके | केवल कामका अनुसरण करता है, वह उसी प्रकार शीघ्र ही आपत्तिमें पड़ जाता है, जैसे इस समय महाराज दशरथ पड़े हैं ॥ १३ ॥

मन्ये दशरथान्ताय मम प्रव्राजनाय च ।

कैकेयी सौम्य सम्प्राप्ता राज्याय भरतस्य च ॥ १४ ॥

' सौम्य! मैं समझता हूँ कि महाराज दशरथके प्राणोंका अन्त करने, मुझे देशनिकाला देने और भरतको राज्य दिलानेके लिये ही कैकेयी इस राजभवनमें | आयी थी ॥ १४ ॥

जो बातें कही हैं, वे लक्ष्मणकी परीक्षाके लिये तथा उन्हें ऐसी मान्यता नहीं थी । यही बात यहाँ सभी व्याख्याकारोंने 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_14_1_Front

पृष्ठ 398

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३८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

अपीदानीं तु कैकेयी सौभाग्यमदमोहिता ।

कौसल्यां च सुमित्रां च सा प्रबाधेत मत्कृते ॥ १५ ॥

' इस समय भी सौभाग्यके मदसे मोहित हुई कैकेयी मेरे कारण कौसल्या और सुमित्राको कष्ट पहुँचा सकती है ॥ १५ ॥

मातास्मत्कारणाद् देवी सुमित्रा दुःखमावसेत् ।

अयोध्यामित एव त्वं काले प्रविश लक्ष्मण ॥ १६ ॥

' हमलोगोंके कारण तुम्हारी माता सुमित्रादेवीको बड़े दुःखके साथ वहाँ रहना पड़ेगा; अतः लक्ष्मण! तुम यहींसे कल प्रातःकाल अयोध्याको लौट जाओ ॥ १६ ॥

अहमेको गमिष्यामि सीतया सह दण्डकान् ।

अनाथाया हि नाथस्त्वं कौसल्याया भविष्यसि ॥ १७ ॥

' मैं अकेला ही सीताके साथ दण्डकवनको जाऊँगा । तुम वहाँ मेरी असहाय माता कौसल्याके सहायक हो जाओगे ॥ १७ ॥

क्षुद्रकर्मा हि कैकेयी द्वेषादन्यायमाचरेत् ।

परिदद्याद्धि धर्मज्ञ गरं ते मम मातरम् ॥ १८ ॥

' धर्मज्ञ लक्ष्मण! कैकेयीके कर्म बड़े खोटे हैं । वह द्वेषवश अन्याय भी कर सकती है । तुम्हारी और मेरी माताको जहर भी दे सकती है ॥ १८ ॥

नूनं जात्यन्तरे तात स्त्रियः पुत्रैर्वियोजिताः ।

जनन्या मम सौमित्रे तदद्यैतदुपस्थितम् ॥ १ ९ ॥

' तात सुमित्राकुमार! निश्चय ही पूर्वजन्ममें मेरी माताने कुछ स्त्रियोंका उनके पुत्रोंसे वियोग कराया होगा, उसी पापका यह पुत्र - बिछोहरूप फल आज उन्हें प्राप्त हुआ है ॥ ॥ १ ९ ॥

मया हि चिरपुष्टेन दुःखसंवर्धितेन च ।

विप्रयुज्यत कौसल्या फलकाले धिगस्तु माम् ॥ २० ॥

' मेरी माताने चिरकालतक मेरा पालन - पोषण किया और स्वयं दुःख सहकर मुझे बड़ा किया । अब जब पुत्रसे प्राप्त होनेवाले सुखरूपी फलके भोगनेका अवसर आया, तब मैंने माता कौसल्याको अपनेसे

बिलग कर दिया । मुझे धिक्कार है! ॥ २० ॥

मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम् ।

सौमित्रे योऽहमम्बाया दद्मि शोकमनन्तकम् ॥ २१ ॥

' सुमित्रानन्दन! कोई भी सौभाग्यवती स्त्री कभी ऐसे पुत्रको जन्म न दे, जैसा मैं हूँ; क्योंकि मैं अपनी माताको अनन्त शोक दे रहा हूँ ॥ २१ ॥

मन्ये प्रीतिविशिष्टा सा मत्तो लक्ष्मण सारिका ।

यत्तस्याः श्रूयते वाक्यं शुक पादमरेर्दश ॥ २२ ॥ ।

' लक्ष्मण! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि माता कौसल्यामें मुझसे अधिक प्रेम उनकी पाली हुई ह सारिका ही करती है; क्योंकि उसके मुखसे माँको सदा यह बात सुनायी देती है कि ' ऐ तोते! तू शत्रुके पैरको काट खा ' ( अर्थात् हमें पालनेवाली माता कौसल्याके ' शत्रुके पाँवको चोंच मार दे । वह पक्षिणी होकर माताका इतना ध्यान रखती है और मैं उनका पुत्र होकर भी उनके लिये कुछ नहीं कर पाता ) ॥ २२ ॥

शोचन्त्याश्चाल्पभाग्याया न किंचिदुपकुर्वता ।

पुत्रेण किमपुत्राया मया कार्यमरिंदम ॥ २३ ॥

' शत्रुदमन! जो मेरे लिये शोकमग्न रहती है, मन्दभागिनी - सी हो रही है और पुत्रका कोई फल न पानेके कारण निपूती - सी हो गयी है, उस मेरी माताको कुछ भी उपकार न करनेवाले मुझ जैसे पुत्रसे क्या प्रयोजन है? ॥ २३ ॥

अल्पभाग्या हि मे माता कौसल्या रहिता मया । शेते परमदुःखार्ता ' मुझसे बिछुड़ वास्तवमें मन्दभागिनी पड़कर अत्यन्त दुःखसे एको ह्यहमयोध्यां च तरेयमिषुभिः क्रुद्धो ' लक्ष्मण! यदि पतिता शोकसागरे ॥ २४ ॥

जानेके कारण माता कौसल्या हो गयी है और शोकके समुद्र में आतुर हो उसीमें शयन करती है ॥

पृथिवीं चापि लक्ष्मण ।

ननु वीर्यमकारणम् ॥ २५ ॥

मैं कुपित हो जाऊँ तो अपने बाणोंद्वारा अकेला ही अयोध्यापुरी तथा समस्त भूमण्डलको निष्कण्टक बनाकर अपने अधिकारमें कर लूँ; परंतु पारलौकिक हित - साधनमें बल - पराक्रम कारण नहीं होता है ( इसीलिये मैं ऐसा नहीं कर रहा हूँ । ) ॥ २५ ॥

अधर्मभयभीतश्च परलोकस्य चानघ ।

तेन लक्ष्मण नाद्याहमात्मानमभिषेचये ॥ २६ ॥

' निष्पाप लक्ष्मण! मैं अधर्म और परलोकके डरसे डरता हूँ; इसीलिये आज अयोध्याके राज्यपर अपना अभिषेक नहीं कराता हूँ ' ॥ २६ ॥

एतदन्यच्च करुणं विलप्य विजने बहु ।

अश्रुपूर्णमुखो दीनो निशि तूष्णीमुपाविशत् ॥ २७ ॥

यह तथा और भी बहुत - सी बातें कहकर श्रीरामने उस निर्जन वनमें करुणाजनक विलाप किया । तत्पश्चात् वे उस रातमें चुपचाप बैठ गये । उस समय उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी और दीनता छा रही थी ॥

विलापोपरतं रामं गतार्चिषमिवानलम् ।

समुद्रमिव निर्वेगमाश्वासयत लक्ष्मणः ॥ २८ ॥

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पृष्ठ 399

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अयोध्याकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ३८७ विलापसे निवृत्त होनेपर श्रीराम ज्वालारहित अग्नि । और वेगशून्य समुद्रके समान शान्त प्रतीत होते थे । उस समय लक्ष्मणने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा- ॥ २८ ॥

ध्रुवमद्य पुरी राम अयोध्याऽऽयुधिनां वर ।

निष्प्रभा त्वयि निष्क्रान्ते गतचन्द्रेव शर्वरी ॥ २ ९ ॥

' अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! आपके निकल आनेसे निश्चय ही आज अयोध्यापुरी चन्द्रहीन रात्रिके समान निस्तेज हो गयी ॥ २ ९ ॥

नैतदौपयिकं राम यदिदं परितप्यसे ।

विषादयसि सीतां च मां चैव पुरुषर्षभ ॥ ३० ॥

' पुरुषोत्तम श्रीराम! आप जो इस तरह संतप्त हो रहे हैं, यह आपके लिये कदापि उचित नहीं है । आप ऐसा करके सीताको और मुझको भी खेदमें डाल रहे हैं ॥ ३० ॥

न च सीता त्वया हीना न चाहमपि राघव ।

मुहूर्तमपि जीवावो जलान्मत्स्याविवोद्धृतौ ॥ ३१ ॥

' रघुनन्दन! आपके बिना सीता और मैं दोनों दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते । ठीक उसी तरह, जैसे जलसे निकाले हुए मत्स्य नहीं जीते हैं ॥ ३१ ॥

नहि तातं न शत्रुघ्नं न सुमित्रां परंतप ।

द्रष्टुमिच्छेयमद्याहं स्वर्गं चापि त्वया विना ॥ ३२ ॥

' शत्रुओंको ताप देनेवाले रघुवीर! आपके बिना आज मैं न तो पिताजीको, न भाई शत्रुघ्नको, न माता सुमित्राको और न स्वर्गलोकको ही देखना चाहता हूँ ' ॥

ततस्तत्र समासीनौ नातिदूरे निरीक्ष्य ताम् ।

न्यग्रोधे सुकृतां शय्यां भेजाते धर्मवत्सलौ ॥ ३३ ॥

तदनन्तर वहाँ बैठे हुए धर्मवत्सल सीता और श्रीरामने थोड़ी ही दूरपर वटवृक्षके नीचे लक्ष्मणद्वारा सुन्दर ढंगसे निर्मित हुई शय्या देखकर उसीका आश्रय लिया ( अर्थात् वे दोनों वहाँ जाकर सो गये । ) ॥ ३३ ॥

स लक्ष्मणस्योत्तमपुष्कलं वचो निशम्य चैवं वनवासमादरात् । समाः समस्ता विदधे परंतपः प्रपद्य धर्मं सुचिराय राघवः ॥ ३४ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनाथजीने इस प्रकार वनवासके प्रति आदरपूर्वक कहे हुए लक्ष्मणके अत्यन्त उत्तम वचनोंको सुनकर स्वयं भी दीर्घकालके लिये वनवासरूप धर्मको स्वीकार करके सम्पूर्ण वर्षोंतक लक्ष्मणको अपने साथ वनमें रहनेकी अनुमति दे दी ॥ ततस्तु तस्मिन् विजने महाबलौ

महावने राघववंशवर्धनौ ।

न तौ भयं सम्भ्रममभ्युपेयतु-र्यथैव सिंहौ गिरिसानुगोचरौ ॥ ३५ ॥

तदनन्तर उस महान् निर्जन वनमें रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले वे दोनों महाबली वीर पर्वतशिखरपर विचरनेवाले । दो सिंहोंके समान कभी भय और उद्वेगको नहीं प्राप्त हुए । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५३ ॥

चतुःपञ्चाशः सर्गः लक्ष्मण और सीतासहित श्रीरामका प्रयागमें गङ्गा - यमुना - संगमके समीप भरद्वाज - आश्रममें जाना, मुनिके द्वारा उनका अतिथिसत्कार, उन्हें चित्रकूट पर्वतपर ठहरनेका आदेश तथा चित्रकूटकी

ते तु तस्मिन् महावृक्षे उषित्वा रजनीं शुभाम् ।

विमलेऽभ्युदिते सूर्ये तस्माद् देशात् प्रतस्थिरे ॥ १ ॥

उस महान् वृक्षके नीचे वह सुन्दर रात बिताकर वे सब लोग निर्मल सूर्योदयकालमें उस स्थानसे आगेको प्रस्थित हुए ॥ १ ॥

यत्र भागीरथीं गङ्गां यमुनाभिप्रवर्तते ।

जग्मुस्तं देशमुद्दिश्य विगाह्य सुमहद् वनम् ॥ २ ॥

जहाँ भागीरथी गङ्गासे यमुना मिलती हैं, उस स्थानपर जानेके लिये वे महान् वनके भीतरसे होकर महत्ता एवं शोभाका वर्णन यात्रा करने लगे ॥ २ ॥

तेभूमिभागान् विविधान् देशांश्चापि मनोहरान् ।

अदृष्टपूर्वान् पश्यन्तस्तत्र तत्र यशस्विनः ॥ ३ ॥

वे तीनों यशस्वी यात्री मार्गमें जहाँ - तहाँ जो पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे, ऐसे अनेक प्रकारके भू - भाग तथा मनोहर प्रदेश देखते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ३ ॥

यथा क्षेमेण सम्पश्यन् पुष्पितान् विविधान् द्रुमान् ।

निर्वृत्तमात्रे दिवसे रामः सौमित्रिमब्रवीत् ॥ ४ ॥

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पृष्ठ 400

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 400 का मूल पृष्ठ
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३८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सुखपूर्वक आरामसे उठते - बैठते यात्रा करते हुए उन तीनोंने फूलोंसे सुशोभित भाँति - भाँतिके वृक्षोंका दर्शन किया । इस प्रकार जब दिन प्रायः समाप्त हो चला, तब श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा- ॥ ४ ॥

प्रयागमभितः पश्य सौमित्रे धूममुत्तमम् ।

अग्नेर्भगवतः केतुं मन्ये संनिहितो मुनिः ॥ ५ ॥

‘ सुमित्रानन्दन! वह देखो, प्रयागके पास भगवान् अग्निदेवकी ध्वजारूप उत्तम धूम उठ रहा है । मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं ॥ ५ ॥

नूनं प्राप्ताः स्म सम्भेदं गङ्गायमुनयोर्वयम् ।

तथाहि श्रूयते शब्दो वारिणोर्वारिघर्षजः ॥ ६ ॥

' निश्चय ही हमलोग गङ्गा - यमुनाके सङ्गमके पास आ पहुँचे हैं; क्योंकि दो नदियोंके जलोंके परस्पर टकरानेसे जो शब्द प्रकट होता है, वह सुनायी दे रहा है ॥६ ॥

दारूणि परिभिन्नानि वनजैरुपजीविभिः ।

छिन्नाश्चाप्याश्रमे चैते दृश्यन्ते विविधा द्रुमाः ॥ ७ ॥

' वनमें उत्पन्न हुए फल- मूल और काष्ठ आदिसे जीविका चलानेवाले लोगोंने जो लकड़ियाँ काटी हैं, वे दिखायी देती हैं तथा जिनकी लकड़ियाँ काटी गयी हैं, वे नाना प्रकारके वृक्ष भी आश्रमके समीप दृष्टिगोचर हो रहे हैं'॥७ ॥

धन्विनौ तौ सुखं गत्वा लम्बमाने दिवाकरे ।

गङ्गायमुनयोः संधौ प्रापतुर्निलयं मुनेः ॥ ८ ॥

इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों धनुर्धर वीर श्रीराम और लक्ष्मण सूर्यास्त होते - होते गङ्गा - यमुनाके सङ्गमके समीप मुनिवर भरद्वाजके आश्रमपर जा पहुँचे ॥ ८ ॥

रामस्त्वाश्रममासाद्य त्रासयन् मृगपक्षिणः ।

गत्वा मुहूर्तमध्वानं भरद्वाजमुपागमत् ॥ ९ ॥

श्रीरामचन्द्रजी आश्रमकी सीमामें पहुँचकर अपने धनुर्धर वेशके द्वारा वहाँके पशु - पक्षियोंको डराते हुए दो ही घड़ीमें तै करनेयोग्य मार्गसे चलकर भरद्वाज मुनिके समीप जा पहुँचे ॥ ९ ॥

ततस्त्वाश्रममासाद्य मुनेर्दर्शनकांक्षिणौ ।

सीतयानुगतौ वीरौ दूरादेवावतस्थतुः ॥ १० ॥

आश्रममें पहुँचकर महर्षिके दर्शनकी इच्छावाले सीतासहित वे दोनों वीर कुछ दूरपर ही खड़े हो गये ॥

स प्रविश्य महात्मानमृषिं शिष्यगणैर्वृतम् ।

संशितव्रतमेकाग्रं तपसा लब्धचक्षुषम् ॥ ११ ॥

हुताग्निहोत्रं दृष्ट्वैव महाभागः कृताञ्जलिः ।

रामः सौमित्रिणा सार्धं सीतया चाभ्यवादयत् ॥ १२ ॥

( दूर खड़े हो महर्षिके शिष्यसे अपने आगमन सूचना दिलवाकर भीतर आनेकी अनुमति प्राप्त कर लेनेके बाद ) पर्णशाला में प्रवेश करके उन्होंने तपस्याके प्रभावसे तीनों कालोंकी सारी बातें देखनेकी दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेनेवाले एकाग्रचित्त तथा तीक्ष्ण व्रतधारी महात्मा भरद्वाज ऋषिका दर्शन किया, जो अग्निहोत्र करके शिष्योंसे घिरे हुए आसनपर विराजमान थे । महर्षिको देखते ही लक्ष्मण और सीतासहित महाभाग श्रीरामने हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ११-१२ ॥

न्यवेदयत चात्मानं तस्मै लक्ष्मणपूर्वजः ।

पुत्रौ दशरथस्यावां भगवन् रामलक्ष्मणौ ॥ १३ ॥

भार्या ममेयं कल्याणी वैदेही जनकात्मजा ।

मां चानुयाता विजनं तपोवनमनिन्दिता ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरघुनाथजीने उनसे इस प्रकार अपना परिचय दिया- ' भगवन्! हम दोनों राजा दशरथके पुत्र हैं । मेरा नाम राम और इनका लक्ष्मण है तथा ये विदेहराज जनककी पुत्री और मेरी कल्याणमयी पत्नी सती साध्वी सीता हैं, जो निर्जन तपोवनमें भी मेरा साथ देनेके लिये आयी हैं॥१३-१४ ॥

पित्रा प्रव्राज्यमानं मां सौमित्रिरनुजः प्रियः ।

अयमन्वगमद् भ्राता वनमेव धृतव्रतः ॥ १५ ॥

' पिताकी आज्ञासे मुझे वनकी ओर आते देख ये मेरे प्रिय अनुज भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी वनमें ही रहनेका व्रत लेकर मेरे पीछे - पीछे चले आये हैं ॥ १५ ॥

पित्रा नियुक्ता भगवन् प्रवेक्ष्यामस्तपोवनम् ।

धर्ममेवाचरिष्यामस्तत्र मूलफलाशनाः ॥ १६ ॥

' भगवन्! इस प्रकार पिताकी आज्ञासे हम तीनों तपोवनमें जायँगे और वहाँ फल - मूलका आहार करते हुए धर्मका ही आचरण करेंगे ' ॥ १६ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः ।

उपानयत धर्मात्मा गामर्घ्यमुदकं ततः ॥ १७ ॥

परम बुद्धिमान् राजकुमार श्रीरामका वह वचन सुनकर धर्मात्मा भरद्वाज मुनिने उनके लिये आतिथ्य-सत्कारके रूपमें एक गौ तथा अर्घ्य - जल समर्पित किये ॥ १७ ॥

नानाविधानन्नरसान् वन्यमूलफलाश्रयान् ।

तेभ्यो ददौ तप्ततपा वासं चैवाभ्यकल्पयत् ॥ १८ ॥

उन तपस्वी महात्माने उन सबको नाना प्रकार अन्न, रस और जंगली फल - मूल प्रदान किये । साथ ही उनके ठहरनेके लिये स्थानकी भी व्यवस्था की ॥ १८ ॥

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