श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 401–410
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410
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अयोध्याकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ३८ ९
मृगपक्षिभिरासीनो मुनिभिश्च समन्ततः ।
राममागतमभ्यर्च्य स्वागतेनागतं मुनिः ॥ १ ९ ॥
प्रतिगृह्य तु तामर्चामुपविष्टं स राघवम् ।
भरद्वाजोऽब्रवीद् वाक्यं धर्मयुक्तमिदं तदा ॥ २० ॥
महर्षिके चारों ओर मृग, पक्षी और ऋषि - मुनि बैठे थे और उनके बीचमें वे विराजमान थे । उन्होंने अपने आश्रमपर अतिथिरूपमें पधारे हुए श्रीरामका स्वागतपूर्वक सत्कार किया । उनके उस सत्कारको ग्रहण करके श्रीरामचन्द्रजी जब आसनपर विराजमान हुए, तब भरद्वाजजीने उनसे यह धर्मयुक्त वचन कहा - ॥
चिरस्य खलु काकुत्स्थ पश्याम्यहमुपागतम् ।
श्रुतं तव मया चैव विवासनमकारणम् ॥ २१ ॥
‘ ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मैं इस आश्रमपर दीर्घकालसे तुम्हारे शुभागमनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ ( आज मेरा मनोरथ सफल हुआ है ) । मैंने यह भी सुना है कि तुम्हें अकारण ही वनवास दे दिया गया है ॥ २१ ॥
अवकाशो विविक्तोऽयं महानद्योः समागमे ।
पुण्यश्च रमणीयश्च वसत्विह भवान् सुखम् ॥ २२ ॥
' गङ्गा और यमुना – इन दोनों महानदियोंके संगमके पासका यह स्थान बड़ा ही पवित्र और एकान्त है । यहाँकी प्राकृतिक छटा भी मनोरम है, अतः तुम यहीं सुखपूर्वक निवास करो ' ॥ २२ ॥
एवमुक्तस्तु वचनं भरद्वाजेन राघवः ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यं रामः सर्वहिते रतः ॥ २३ ॥
भरद्वाज मुनिके ऐसा कहनेपर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले रघुकुलनन्दन श्रीरामने इन शुभ वचनोंके द्वारा उन्हें उत्तर दिया- ॥ २३ ॥
भगवन्नित आसन्नः पौरजानपदो जनः ।
सुदर्शमिह मां प्रेक्ष्य मन्येऽहमिममाश्रमम् ॥ २४ ॥
आगमिष्यति वैदेहीं मां चापि प्रेक्षको जनः ।
अनेन कारणेनाहमिह वासं न रोचये ॥ २५ ॥
' भगवन्! मेरे नगर और जनपदके लोग यहाँसे बहुत निकट पड़ते हैं, अतः मैं समझता हूँ कि यहाँ मुझसे मिलना सुगम समझकर लोग इस आश्रमपर मुझे और सीताको देखनेके लिये प्रायः आते - जाते रहेंगे; इस कारण यहाँ निवास करना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता ॥
एकान्ते पश्य भगवन्नाश्रमस्थानमुत्तमम् ।
रमते यत्र वैदेही सुखार्हा जनकात्मजा ॥ २६ ॥
' भगवन्! किसी एकान्त प्रदेशमें आश्रमके योग्य उत्तम स्थान देखिये ( सोचकर बताइये ), जहाँ सुख भोगनेके योग्य विदेहराजकुमारी जानकी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें ' ॥ २६ ॥
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरद्वाजो महामुनिः ।
राघवस्य तु तद् वाक्यमर्थग्राहकमब्रवीत् ॥ २७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह शुभ वचन सुनकर महामुनि भरद्वाजजीने उनके उक्त उद्देश्यकी सिद्धिका बोध करानेवाली बात कही - ॥ २७ ॥
दशक्रोश इतस्तात गिरिर्यस्मिन् निवत्स्यसि ।
महर्षिसेवितः पुण्यः पर्वतः शुभदर्शनः ॥ २८ ॥
' तात! यहाँसे दस कोस ( अन्य व्याख्याके अनुसार ३० कोस ) * की दूरीपर एक सुन्दर और महर्षियोंद्वारा सेवित परम पवित्र पर्वत है, जिसपर तुम्हें निवास करना होगा ॥ २८ ॥
गोलाङ्गूलानुचरितो वानरर्क्षनिषेवितः ।
चित्रकूट इति ख्यातो गन्धमादनसंनिभः ॥ २ ९ ॥
' उसपर बहुत - से लंगूर विचरते रहते हैं । वहाँ वानर और रीछ भी निवास करते हैं । वह पर्वत चित्रकूट नामसे विख्यात है और गन्धमादनके समान मनोहर है ॥
यावता चित्रकूटस्य नरः शृङ्गाण्यवेक्षते ।
कल्याणानि समाधत्ते न पापे कुरुते मनः ॥ ३० ॥
' जब मनुष्य चित्रकूटके शिखरोंका दर्शन कर लेता है, तब कल्याणकारी पुण्य कर्मोंका फल पा लेता है और कभी पापमें मन नहीं लगाता है ॥३० ॥
ऋषयस्तत्र बहवो विहृत्य शरदां शतम् ।
तपसा दिवमारूढाः कपालशिरसा सह ॥३१ ॥
' वहाँ बहुत - से ऋषि, जिनके सिरके बाल वृद्धावस्थाके कारण खोपड़ीकी भाँति सफेद हो गये थे, तपस्याद्वारा सैकड़ों वर्षोंतक क्रीड़ा करके स्वर्गलोकको चले गये हैं ॥ रामायणशिरोमणिकार दस कोसका अर्थ तीस कोस करते हैं और ' दश च दश च दश च ' ऐसी व्युत्पत्ति करके एकशेषके नियमानुसार एक ही दशका प्रयोग होनेपर भी उसे ३० संख्याका बोधक मानते हैं । प्रयागसे चित्रकूटकी दूरी लगभग २८ कोस मानी जाती है, जो उपर्युक्त संख्यासे मिलती - जुलती ही है । आधुनिक मापके अनुसार प्रयागसे चित्रकूट ८० मील है । इस हिसाबसे चालीस कोसकी दूरी हुई । परंतु पहलेका क्रोशमान आधुनिक मानसे कुछ बड़ा रहा होगा, तभी यह अन्तर है ।
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३ ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
प्रविविक्तमहं मन्ये तं वासं भवतः सुखम् ।
इह वा वनवासाय वस राम मया सह ॥ ३२ ॥
‘ उसी पर्वतको मैं तुम्हारे लिये एकान्तवासके योग्य और सुखद मानता हूँ अथवा श्रीराम! तुम वनवासके उद्देश्यसे मेरे साथ इस आश्रमपर ही रहो ' ॥ ३२ ॥
स रामं सर्वकामैस्तं भरद्वाजः प्रियातिथिम् ।
सभार्यं सह च भ्रात्रा प्रतिजग्राह हर्षयन् ॥ ३३ ॥
ऐसा कहकर भरद्वाजजीने पत्नी और भ्रातासहित प्रिय अतिथि श्रीरामका हर्ष बढ़ाते हुए सब प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंद्वारा उन सबका आतिथ्यसत्कार किया ॥ ३३ ॥
तस्य प्रयागे रामस्य तं महर्षिमुपेयुषः ।
प्रपन्ना रजनी पुण्या चित्राः कथयतः कथाः ॥ ३४ ॥
प्रयागमें श्रीरामचन्द्रजी महर्षिके पास बैठकर विचित्र बातें करते रहे, इतनेमें ही पुण्यमयी रात्रिका आगमन हुआ ॥ ३४ ॥
सीतातृतीयः काकुत्स्थः परिश्रान्तः सुखोचितः ।
भरद्वाजाश्रमे रम्ये तां रात्रिमवसत् सुखम् ॥ ३५ ॥
वे सुख भोगनेयोग्य होनेपर भी परिश्रमसे बहुत थक गये थे, इसलिये भरद्वाज मुनिके उस मनोहर आश्रममें श्रीरामने लक्ष्मण और सीताके साथ सुखपूर्वक वह रात्रि व्यतीत की ॥ ३५ ॥
प्रभातायां तु शर्वर्यां भरद्वाजमुपागमत् ।
उवाच नरशार्दूलो मुनिं ज्वलिततेजसम् ॥ ३६ ॥
तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब पुरुषसिंह श्रीराम प्रज्वलित तेजवाले भरद्वाज मुनिके पास गये और बोले - ॥३६ ॥
शर्वरीं भगवन्नद्य सत्यशील तवाश्रमे ।
उषिताः स्मोऽह वसतिमनुजानातु नो भवान् ॥ ३७ ॥
' भगवन्! आप स्वभावतः सत्य बोलनेवाले हैं । आज हमलोगोंने आपके आश्रममें बड़े आरामसे रात बितायी है, अब आप हमें आगेके गन्तव्य स्थानपर जानेके लिये आज्ञा प्रदान करें ' ॥ ३७ ॥
रात्र्यां तु तस्यां व्युष्टायां भरद्वाजोऽब्रवीदिदम् ।
मधुमूलफलोपेतं चित्रकूटं व्रजेति ह ॥ ३८ ॥
वासमौपयिकं मन्ये तव राम महाबल । रात बीतने और सबेरा होनेपर श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजजीने कहा - ' महाबली श्रीराम! तुम मधुर फल - मूलसे सम्पन्न चित्रकूट पर्वतपर जाओ । मैं उसीको तुम्हारे लिये उपयुक्त निवासस्थान मानता हूँ ॥ नानानगगणोपेतः किन्नरोरगसेवितः ॥ ३ ९ ॥
मयूरनादाभिरतो गजराजनिषेवितः ।
गम्यतां भवता शैलश्चित्रकूटः स विश्रुतः ॥४० ॥
' वह सुविख्यात चित्रकूट पर्वत नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरा - भरा है । वहाँ बहुत से किन्नर और सर्प निवास करते हैं । मोरोंके कलरवोंसे वह और भी रमणीय प्रतीत होता है । बहुत - से गजराज उस पर्वतका
सेवन करते हैं । तुम वहीं चले जाओ ॥ ३ ९ -४० ॥
पुण्यश्च रमणीयश्च बहुमूलफलायुतः ।
तत्र कुञ्जरयूथानि मृगयूथानि चैव हि ॥ ४१ ॥
विचरन्ति वनान्तेषु तानि द्रक्ष्यसि राघव ।
सरित्प्रस्रवणप्रस्थान् दरीकन्दरनिर्झरान् ।
चरतः सीतया सार्धं नन्दिष्यति मनस्तव ॥ ४२ ॥
' वह पर्वत परम पवित्र, रमणीय तथा बहुसंख्यक फल- मूलोंसे सम्पन्न है । वहाँ झुंड के झुंड हाथी और हिरन वनके भीतर विचरते रहते हैं । रघुनन्दन! तुम उन सबको प्रत्यक्ष देखोगे । मन्दाकिनी नदी, अनेकानेक जलस्रोत, पर्वतशिखर, गुफा, कन्दरा और झरने भी तुम्हारे देखने में आयेंगे । वह पर्वत सीताके साथ विचरते हुए तुम्हारे मनको आनन्द प्रदान करेगा ॥ ४१-४२ ॥ प्रहृष्टकोयष्टिभकोकिलस्वनै-विनोदयन्तं च सुखं परं शिवम् । मृगैश्च मत्तैर्बहुभिश्च कुञ्जरैः सुरम्यमासाद्य समावसाश्रयम् ॥ ४३ ॥
' हर्षमें भरे हुए टिट्टिभ और कोकिलोंके कलरवोंद्वारा वह पर्वत यात्रियोंका मनोरञ्जन - सा करता है । वह परम सुखद एवं कल्याणकारी है, मदमत्त मृगों और बहुसंख्यक मतवाले हाथियोंने उसकी रमणीयताको और बढ़ा दिया है । तुम उसी पर्वतपर जाकर डेरा डालो और उसमें | निवास करो ' ॥ ४३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५४ ॥
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अयोध्याकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ३ ९ १ पञ्चपञ्चाशः सर्गः भरद्वाजजीका श्रीराम आदिके लिये स्वस्तिवाचन करके उन्हें चित्रकूटका मार्ग बताना, उन सबका अपने ही बनाये हुए बेड़ेसे यमुनाजीको पार करना, सीताकी यमुना और श्यामवटसे प्रार्थना, तीनोंका यमुनाके किनारेके मार्गसे एक कोसतक जाकर वनमें घूमना - फिरना, यमुनाजीके समतल तटपर रात्रिमें निवास करना
रजनीं तत्र राजपुत्रावरिंदमौ ।
महर्षिमभिवाद्याथ जग्मतुस्तं गिरिं प्रति ॥ १ ॥
उस आश्रममें रातभर रहकर शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों राजकुमार महर्षिको प्रणाम करके चित्रकूट पर्वतपर जानेको उद्यत हुए ॥१ ॥
तेषां स्वस्त्ययनं चैव महर्षिः स चकार ह ।
प्रस्थितान् प्रेक्ष्य तांश्चैव पिता पुत्रानिवौरसान् ॥ २ ॥
उन तीनोंको प्रस्थान करते देख महर्षिने उनके लिये उसी प्रकार स्वस्तिवाचन किया जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंको यात्रा करते देख उनके लिये मङ्गलसूचक आशीर्वाद देता है ॥२ ॥
ततः प्रचक्रमे वक्तुं वचनं स महामुनिः ।
भरद्वाजो महातेजा रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ३ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी महामुनि भरद्वाजने सत्य पराक्रमी श्रीरामसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—
गङ्गायमुनयोः संधिमासाद्य मनुजर्षभौ ।
कालिन्दीमनुगच्छेतां नदीं पश्चान्मुखाश्रिताम् ॥४ ॥
' नरश्रेष्ठ! तुम दोनों भाई गङ्गा और यमुनाके संगमपर पहुँचकर जिनमें पश्चिममुखी होकर गङ्गा मिली हैं, उन महानदी यमुनाके निकट जाना ॥४ ॥
अथासाद्य तु कालिन्दीं प्रतिस्त्रोतः समागताम् ।
तस्यास्तीर्थं प्रचरितं प्रकामं प्रेक्ष्य राघव ।
तत्र यूयं प्लवं कृत्वा तरतांशुमतीं नदीम् ॥ ५ ॥
' रघुनन्दन! तदनन्तर गङ्गाजीके जलके वेगसे अपने प्रवाहके प्रतिकूल दिशामें मुड़ी हुई यमुनाके पास पहुँचकर लोगोंके आने - जानेके कारण उनके पदचिह्नोंसे चिह्नित हुए अवतरण - प्रदेश ( पार उतरनेके लिये उपयोगी ' तत्पश्चात् आगे जानेपर एक बहुत बड़ा बरगदका वृक्ष मिलेगा, जिसके पत्ते हरे रंगके हैं । वह चारों ओर बहुसंख्यक दूसरे वृक्षोंद्वारा घिरा हुआ है । उस वृक्षका नाम श्यामवट है । उसकी छायाके नीचे बहुत - से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं । वहाँ पहुँचकर सीता दोनों हाथ जोड़कर उस वृक्षसे आशीर्वादकी याचना करें । यात्रीकी इच्छा हो तो उस वृक्षके पास जाकर कुछ कालतक वहाँ निवास करे अथवा वहाँसे आगे बढ़ जाय ॥ ६-७ ॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा नीलं प्रेक्ष्य च काननम् ।
सल्लकीबदरीमिश्रं रम्यं वंशैश्च यामुनैः ॥ ८ ॥
' श्यामवटसे एक कोस दूर जानेपर तुम्हें नीलवनका दर्शन होगा; वहाँ सल्लकी ( चीड़ ) और बेरके भी पेड़ मिले हुए हैं । यमुनाके तटपर उत्पन्न हुए बाँसोंके कारण वह और भी रमणीय दिखायी देता है ॥ ८ ॥
स पन्थाश्चित्रकूटस्य गतस्य बहुशो मया ।
रम्यो मार्दवयुक्तश्च दावैश्चैव विवर्जितः ॥ ९ ॥
' यह वही स्थान है जहाँसे चित्रकूटको रास्ता जाता है । मैं उस मार्गसे कई बार गया हूँ । वहाँकी भूमि कोमल और दृश्य रमणीय है । उधर कभी दावानलका भय नहीं होता है ' ॥ ९ ॥
इति पन्थानमादिश्य महर्षिः संन्यवर्तत ।
अभिवाद्य तथेत्युक्त्वा रामेण विनिवर्तितः ॥ १० ॥
इस प्रकार मार्ग बताकर जब महर्षि भरद्वाज लौटने लगे, तब श्रीरामने ' तथास्तु ' कहकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा - ' अब आप आश्रमको लौट जाइये ' ॥१० ॥
उपावृत्ते मुनौ तस्मिन् रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । घाट ) को अच्छी तरह देख - भालकर वहाँ जाना और कृतपुण्याः स्म भद्रं ते मुनिर्यन्नोऽनुकम्पते ॥११ ॥
एक बेड़ा बनाकर उसीके द्वारा सूर्यकन्या यमुनाके उस उन महर्षिके लौट जानेपर श्रीरामने लक्ष्मणसे पार उतर जाना ॥ ५ ॥ कहा — ' सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो । ये मुनि
ततो न्यग्रोधमासाद्य महान्तं हरितच्छदम् । हमारे ऊपर जो इतनी कृपा रखते हैं, इससे जान पड़ता परीतं बहुभिर्वृक्षैः श्यामं सिद्धोपसेवितम् ॥ ६ ॥ है कि हमलोगोंने पहले कभी महान् पुण्य किया है ' ॥
तस्मिन् सीताञ्जलिं कृत्वा प्रयुञ्जीताशिषां क्रियाम् । इति तौ पुरुषव्याघ्रौ मन्त्रयित्वा मनस्विनौ । समासाद्य च तं वृक्षं वसेद् वातिक्रमेत वा ॥ ५ ॥ सीतामेवाग्रतः कृत्वा कालिन्दीं जग्मतुर्नदीम् ॥ १२ ॥
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३ ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों मनस्वी । पुरुषसिंह सीताको ही आगे करके यमुना नदीके तटपर गये ॥ १२ ॥
अथासाद्य तु कालिन्दीं शीघ्रस्त्रोतस्विनीं नदीम् ।
चिन्तामापेदिरे सद्यो नदीजलतितीर्षवः ॥ १३ ॥
वहाँ कालिन्दीका स्रोत बड़ी तीव्रगतिसे प्रवाहित हो रहा था; वहाँ पहुँचकर वे इस चिन्तामें पड़े कि कैसे नदीको पार किया जाय; क्योंकि वे तुरंत ही यमुनाजीके जलको पार करना चाहते थे ॥ १३ ॥
तौ काष्ठसंघाटमथो चक्रतुः सुमहाप्लवम् ।
शुष्कैर्वशैः समाकीर्णमुशीरैश्च समावृतम् ॥ १४ ॥
ततो वैतसशाखाश्च जम्बुशाखाश्च वीर्यवान् ।
चकार लक्ष्मणश्छित्त्वा सीतायाः सुखमासनम् ॥ १५ ॥
फिर उन दोनों भाइयोंने जंगलके सूखे काठ बटोरकर उन्हींके द्वारा एक बहुत बड़ा बेड़ा तैयार किया । वह बेड़ा सूखे बाँसोंसे व्याप्त था और उसके ऊपर खस बिछाया गया था । तदनन्तर पराक्रमी लक्ष्मणने बेंत और जामुनकी टहनियोंको काटकर सीताके बैठनेके लिये एक सुखद आसन तैयार किया ॥ १४-१५ ॥
तत्र श्रियमिवाचिन्त्यां रामो दाशरथिः प्रियाम् ।
ईषत्स लज्जमानां तामध्यारोपयत प्लवम् ॥ १६ ॥
पार्श्वे तत्र च वैदेह्या वसने भूषणानि च ।
प्लवे कठिनकाजं च रामश्चक्रे समाहितः ॥ १७ ॥
दशरथनन्दन श्रीरामने लक्ष्मीके समान अचिन्त्य ऐश्वर्यवाली अपनी प्रिया सीताको जो कुछ लज्जित - सी हो रही थीं, उस बेड़ेपर चढ़ा दिया और उनके बगल में वस्त्र एवं आभूषण रख दिये; सावधानीके साथ खन्ती ( कुदारी ) मढ़ी हुई पिटारीको भी बेड़ेपर आरोप्य सीतां प्रथमं संघाटं ततः प्रतेरतुर्यत्तौ प्रीतौ इस प्रकार पहले सीताको दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण खेने लगे । उन्होंने बड़े प्रयत्न फिर श्रीरामने बड़ी और बकरेके चमड़ेसे ही रखा ॥ १६-१७ ॥
परिगृह्य तौ ।
दशरथात्मजौ ॥ १८ ॥
चढ़ाकर वे दोनों भाई उस बेड़ेको पकड़कर और प्रसन्नताके साथ नदीको पार करना आरम्भ किया ॥ १८ ॥
कालिन्दीमध्यमायाता सीता त्वेनामवन्दत ।
स्वस्ति देवि तरामि त्वां पारयेन्मे पतिव्रतम् ॥ १ ९ ॥
यमुनाकी बीच धारामें आनेपर सीताने उन्हें प्रणाम किया और कहा- ' -'देवि! इस बेड़े द्वारा मैं आपके पार जा रही हूँ । आप ऐसी कृपा करें, जिससे हमलोग सकुशल पार हो जायँ और मेरे पतिदेव अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञाको निर्विघ्न पूर्ण करें ॥१ ९ ॥
यक्ष्ये त्वां गोसहस्त्रेण सुराघटशतेन च ।
स्वस्ति प्रत्यागते रामे पुरीमिक्ष्वाकुपालिताम् ॥ २० ॥
‘ इक्ष्वाकुवंशी वीरोंद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें श्रीरघुनाथजीके सकुशल लौट आनेपर मैं आपके किनारे एक सहस्र गौओंका दान करूँगी और सैकड़ों देवदुर्लभ पदार्थ अर्पित करके आपकी पूजा सम्पन्न करूँगी’॥२० ॥
कालिन्दीमथ सीता तु याचमाना कृताञ्जलिः ।
तीरमेवाभिसम्प्राप्ता दक्षिणं वरवर्णिनी ॥ २१ ॥
इस प्रकार सुन्दरी सीता हाथ जोड़कर यमुनाजीसे प्रार्थना कर रही थीं, इतनेहीमें वे दक्षिण तटपर जा पहुँचीं ॥
ततः प्लवेनांशुमतीं शीघ्रगामूर्मिमालिनीम् ।
तीरजैर्बहुभिर्वृक्षैः संतेरुर्यमुनां नदीम् ॥ २२ ॥
इस तरह उन तीनोंने उसी बेड़ेद्वारा बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षोंसे सुशोभित और तरङ्गमालाओंसे अलंकृत शीघ्रगामिनी सूर्य - कन्या यमुना नदीको पार किया ॥ २२ ॥
ते तीर्णाः प्लवमुत्सृज्य प्रस्थाय यमुनावनात् ।
श्यामं न्यग्रोधमासेदुः शीतलं हरितच्छदम् ॥ २३ ॥
पार उतरकर उन्होंने बेड़ेको तो वहीं तटपर छोड़ दिया और यमुना - तटवर्ती वनसे प्रस्थान करके वे हरे-हरे पत्तोंसे सुशोभित शीतल छायावाले श्यामवटके पास जा पहुँचे ॥ २३ ॥
न्यग्रोधं समुपागम्य वैदेही चाभ्यवन्दत ।
नमस्तेऽस्तु महावृक्ष पारयेन्मे पतिव्रतम् ॥ २४ ॥
वटके समीप पहुँचकर विदेहनन्दिनी सीताने उसे मस्तक झुकाया और इस प्रकार कहा- ' महावृक्ष! आपको नमस्कार है । आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे पतिदेव अपने वनवास - विषयक व्रतको पूर्ण करें ॥ २४ ॥
कौसल्यां चैव पश्येम सुमित्रां च यशस्विनीम् ।
इति सीताञ्जलिं कृत्वा पर्यगच्छन्मनस्विनी ॥ २५ ॥
' तथा हमलोग वनसे सकुशल लौटकर माता कौसल्या तथा यशस्विनी सुमित्रादेवीका दर्शन कर सकें । ' इस प्रकार कहकर मनस्विनी सीताने हाथ जोड़े हुए उस वृक्षकी परिक्रमा की ॥ २५ ॥
अवलोक्य ततः सीतामायाचन्तीमनिन्दिताम् ।
दयितां च विधेयां च रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ २६ ॥
सदा अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाली प्राणप्यारी सती - साध्वी सीताको श्यामवटसे आशीर्वादकी याचना करती देख श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा- ॥ २६ ॥
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अयोध्याकाण्डे
सीतामादाय गच्छ त्वमग्रतो भरतानुज ।
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सायुधो द्विपदां वर ॥ २७ ॥
' भरतके छोटे भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुम सीताको साथ लेकर आगे - आगे चलो और मैं धनुष धारण किये पीछेसे तुमलोगोंकी रक्षा करता हुआ चलूँगा ॥ २७ ॥
यद् यत् फलं प्रार्थयते पुष्पं वा जनकात्मजा ।
तत् तत् प्रयच्छ वैदेह्या यत्रास्या रमते मनः ॥ २८ ॥
' विदेहकुलनन्दिनी जनकदुलारी सीता जो - जो फल या फूल माँगें अथवा जिस वस्तुको पाकर इनका मन प्रसन्न रहे, वह सब इन्हें देते रहो ' ॥ २८ ॥
एकैकं पादपं गुल्मं लतां वा पुष्पशालिनीम् ।
अदृष्टरूपां पश्यन्ती रामं पप्रच्छ साऽबला ॥ २ ९ ॥
अबला सीता एक - एक वृक्ष, झाड़ी अथवा पहलेकी न देखी हुई पुष्पशोभित लताको देखकर उसके विषयमें श्रीरामचन्द्रजीसे पूछती थीं ॥ २ ९ ॥
रमणीयान् बहुविधान् पादपान् कुसुमोत्करान् ।
सीतावचनसंरब्ध आनयामास लक्ष्मणः ॥ ३० ॥
तथा लक्ष्मण सीताके कथनानुसार तुरंत ही भाँति-भाँतिके वृक्षोंकी मनोहर शाखाएँ और फूलोंके गुच्छे ला- लाकर उन्हें देते थे ॥ ३० ॥
षट्पञ्चाशः सर्गः ३ ९ ३
विचित्रवालुकजलां हंससारसनादिताम् ।
रेमे जनकराजस्य सुता प्रेक्ष्य तदा नदीम् ॥ ३१ ॥
उस समय जनकराजकिशोरी सीता विचित्र वालुका और जलराशिसे सुशोभित तथा हंस और सारसोंके कलनादसे मुखरित यमुना नदीको देखकर बहुत प्रसन्न होती थीं ॥ ३१ ॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
बहून् मेध्यान् मृगान् हत्वा चेरतुर्यमुनावने ॥ ३२ ॥
इस तरह एक कोसकी यात्रा करके दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण ( प्राणियोंके हितके लिये ) मार्गमें मिले हुए हिंसक पशुओंका वध करते हुए यमुना-तटवर्ती वनमें विचरने लगे ॥ ३२ ॥
विहृत्य बर्हिणपूगनादिते शुभे वने वारणवानरायुते । समं नदीवप्रमुपेत्य सत्वरं निवासमाजग्मुरदीनदर्शनाः ॥ ३३ ॥
उदार दृष्टिवाले वे सीता, लक्ष्मण और श्रीराम मोरोंके झुंडोंकी मीठी बोलीसे गूँजते तथा हाथियों और वानरोंसे भरे हुए उस सुन्दर वनमें घूम - फिरकर शीघ्र ही यमुनानदीके समतल तटपर आ गये और रात में उन्होंने वहीं निवास किया ॥ ३३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५५ ॥
षट्पञ्चाशः सर्गः वनकी शोभा देखते - दिखाते हुए श्रीराम आदिका चित्रकूटमें पहुँचना, वाल्मीकिजीका दर्शन करके श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणद्वारा पर्णशालाका निर्माण तथा उसकी वास्तुशान्ति करके
अथ रात्र्यां व्यातीतायामवसुप्तमनन्तरम् ।
प्रबोधयामास शनैर्लक्ष्मणं रघुपुङ्गवः ॥ १ ॥
तदनन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर रघुकुल-शिरोमणि श्रीरामने अपने जागनेके बाद वहाँ सोये हुए लक्ष्मणको धीरेसे जगाया ( और इस प्रकार कहा— ) ॥ १ ॥
सौमित्रे शृणु वन्यानां वल्गु व्याहरतां स्वनम् ।
सम्प्रतिष्ठामहे कालः प्रस्थानस्य परंतप ॥ २ ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले सुमित्राकुमार! मीठी बोली बोलनेवाले शुक - पिक आदि जंगली पक्षियोंका कलरव सुनो । अब हमलोग यहाँसे प्रस्थान करें; क्योंकि उन सबका कुटीमें प्रवेश प्रस्थानके योग्य समय आ गया है ' ॥ २ ॥
प्रसुप्तस्तु ततो भ्रात्रा समये प्रतिबोधितः ।
जहाँ निद्रां च तन्द्रां च प्रसक्तं च परिश्रमम् ॥ ३ ॥
सोये हुए लक्ष्मणने अपने बड़े भाईद्वारा ठीक समयपर जगा दिये जानेपर निद्रा, आलस्य तथा राह चलनेकी थकावटको दूर कर दिया ॥ ३ ॥
तत उत्थाय ते सर्वे स्पृष्ट्वा नद्याः शिवं जलम् ।
पन्थानमृषिभिर्जुष्टं चित्रकूटस्य तं ययुः ॥४ ॥
फिर सब लोग उठे और यमुना नदीके शीतल जलमें स्नान आदि करके ऋषि - मुनियोंद्वारा सेवित । चित्रकूटके उस मार्गपर चल दिये ॥४ ॥
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३ ९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
ततः सम्प्रस्थितः काले रामः सौमित्रिणा सह ।
सीतां कमलपत्राक्षीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
उस समय लक्ष्मणके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए श्रीरामने कमलनयनी सीतासे इस प्रकार कहा- ॥ ५ ॥
आदीप्तानिव वैदेहि सर्वतः पुष्पितान् नगान् ।
स्वैः पुष्यैः किंशुकान् पश्य मालिनः शिशिरात्यये ॥६ ॥
‘ विदेहराजनन्दिनी! इस वसन्त ऋतुमें सब ओरसे खिले हुए इन पलाश - वृक्षोंको तो देखो । ये अपने ही पुष्पोंसे पुष्पमालाधारी - से प्रतीत होते हैं और उन फूलोंकी अरुण प्रभाके कारण प्रज्वलित होते - से दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥
पश्य भल्लातकान् बिल्वान् नरैरनुपसेवितान् ।
फलपुष्यैरवनतान् नूनं शक्ष्याम जीवितुम् ॥ ७ ॥
' देखो, ये भिलावे और बेलके पेड़ अपने फूलों और फलोंके भारसे झुके हुए हैं । दूसरे मनुष्योंका यहाँतक आना सम्भव न होनेसे ये उनके द्वारा उपयोगमें नहीं लाये गये हैं; अतः निश्चय ही इन फलोंसे हम जीवननिर्वाह कर सकेंगे ' ॥७ ॥
पश्य द्रोणप्रमाणानि लम्बमानानि लक्ष्मण ।
मधूनि मधुकारीभिः सम्भृतानि नगे नगे ॥ ८ ॥
( फिर लक्ष्मणसे कहा- ) ' लक्ष्मण! देखो, यहाँके एक - एक वृक्षमें मधुमक्खियोंद्वारा लगाये और पुष्ट किये गये मधुके छत्ते कैसे लटक रहे हैं । इन सबमें एक - एक द्रोण ( लगभग सोलह सेर ) मधु भरा हुआ है ॥ ८ ॥
एष क्रोशति नत्यूहस्तं शिखी प्रतिकूजति ।
रमणीये वनोद्देशे पुष्पसंस्तरसंकटे ॥ ९ ॥
' वनका यह भाग बड़ा ही रमणीय है, यहाँ फूलोंकी वर्षा - सी हो रही है और सारी भूमि पुष्पोंसे आच्छादित दिखायी देती है । इस वनप्रान्तमें यह चातक ' पी कहाँ ' ' पी कहाँ ' की रट लगा रहा है । उधर वह मोर बोल रहा है, मानो पपीहेकी बातका उत्तर दे रहा हो ॥ ९ ॥
मातङ्गयूथानुस्तं पक्षिसंघानुनादितम् ।
चित्रकूटमिमं पश्य प्रवृद्धशिखरं गिरिम् ॥ १० ॥
' यह रहा चित्रकूट पर्वत – इसका शिखर बहुत ऊँचा है । झुंड - के - झुंड हाथी उसी ओर जा रहे हैं और वहाँ बहुत - से पक्षी चहक रहे हैं ॥१० ॥
समभूमितले रम्ये द्रुमैर्बहुभिरावृते ।
पुण्ये रंस्यामहे तात चित्रकूटस्य कानने ॥ ११ ॥
' तात! जहाँकी भूमि समतल है और जो बहुत-से वृक्षोंसे भरा हुआ है, चित्रकूटके उस पवित्र काननमें हमलोग बड़े आनन्दसे विचरेंगे'॥११ ॥
ततस्तौ पादचारेण गच्छन्तौ सह सीतया ।
रम्यमासेदतुः शैलं चित्रकूटं मनोरमम् ॥ १२ ॥
सीताके साथ दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पैदल ही यात्रा करते हुए यथासमय रमणीय एवं मनोरम पर्वत चित्रकूटपर जा पहुँचे ॥१२ ॥
तं तु पर्वतमासाद्य नानापक्षिगणायुतम् ।
बहुमूलफलं रम्यं सम्पन्नसरसोदकम् ॥१३ ॥
वह पर्वत नाना प्रकारके पक्षियोंसे परिपूर्ण था । वहाँ फल - मूलोंकी बहुतायत थी और स्वादिष्ट जल पर्याप्त मात्रामें उपलब्ध होता था । उस रमणीय शैलके समीप जाकर श्रीरामने कहा— ॥ १३ ॥
मनोज्ञोऽयं गिरिः सौम्य नानाद्रुमलतायुतः ।
बहुमूलफलो रम्यः स्वाजीवः प्रतिभाति मे ॥ १४ ॥
' सौम्य! यह पर्वत बड़ा मनोहर है । नाना प्रकारके वृक्ष और लताएँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं । यहाँ फल - मूल भी बहुत हैं; यह रमणीय तो है ही । मुझे जान पड़ता है कि यहाँ बड़े सुखसे जीवन - निर्वाह हो सकता है ॥ १४ ॥
मुनयश्च महात्मानो वसन्त्यस्मिन् शिलोच्चये ।
अयं वासो भवेत् तात वयमत्र वसेमहि ॥ १५ ॥
' इस पर्वतपर बहुत - से महात्मा मुनि निवास करते हैं । तात! यही हमारा वासस्थान होनेयोग्य है । हम यहीं निवास करेंगे ' ॥ १५ ॥
इति सीता च रामश्च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः ।
अभिगम्याश्रमं सर्वे वाल्मीकिमभिवादयन् ॥ १६ ॥
ऐसा निश्चय करके सीता, श्रीराम और लक्ष्मणने हाथ जोड़कर महर्षि वाल्मीकिके आश्रममें प्रवेश किया और सबने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया ॥ १६ ॥
तान् महर्षिः प्रमुदितः पूजयामास धर्मवित् ।
आस्यतामिति चोवाच स्वागतं तं निवेद्य च ॥ १७ ॥
धर्मको जाननेवाले महर्षि उनके आगमनसे बहुत प्रसन्न हुए और ' आपलोगोंका स्वागत है । आइये, बैठिये । ' ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका आदर - सत्कार किया ॥ १७ ॥
ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्लक्ष्मणं लक्ष्मणाग्रजः ।
संनिवेद्य यथान्यायमात्मानमृषये प्रभुः ॥ १८ ॥
तदनन्तर महाबाहु भगवान् श्रीरामने महर्षिको अपना यथोचित परिचय दिया और लक्ष्मणसे कहा— ॥ १८ ॥
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अयोध्याकाण्डे
लक्ष्मणानय दारूणि दृढानि च वराणि च ।
कुरुष्वावसथं सौम्य वासे मेऽभिरतं मनः ॥ १ ९ ॥
' सौम्य लक्ष्मण! तुम जंगलसे अच्छी - अच्छी मजबूत लकड़ियाँ ले आओ और रहनेके लिये एक कुटी तैयार करो । यहीं निवास करनेको मेरा जी चाहता है ' ॥ १ ९ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सौमित्रिर्विविधान् द्रुमान् ।
आजहार ततश्चक्रे पर्णशालामरिंदमः ॥ २० ॥
श्रीरामकी यह बात सुनकर शत्रुदमन लक्ष्मण अनेक प्रकारके वृक्षोंकी डालियाँ काट लाये और उनके द्वारा एक पर्णशाला तैयार की ॥ २० ॥
तां निष्ठितां बद्धकटां दृष्ट्वा रामः सुदर्शनाम् ।
शुश्रूषमाणमेकाग्रमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥
वह कुटी बाहर - भीतरसे लकड़ीकी ही दीवारसे सुस्थिर बनायी गयी थी और उसे ऊपरसे छा दिया गया था, जिससे वर्षा आदिका निवारण हो । वह देखने में बड़ी सुन्दर लगती थी । उसे तैयार हुई देखकर एकाग्रचित्त होकर अपनी बात सुननेवाले लक्ष्मणसे श्रीरामने इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥
ऐणेयं मांसमाहृत्य शालां यक्ष्यामहे वयम् ।
कर्तव्यं वास्तुशमनं सौमित्रे चिरजीविभिः ॥ २२ ॥
' सुमित्राकुमार! हम गजकन्दका गूदा लेकर उसीसे पर्णशालाके अधिष्ठाता देवताओंका पूजन करेंगे; क्योंकि षट्पञ्चाशः सर्गः ३ ९ ५ कन्दको उखाड़कर या खोदकर शीघ्र यहाँ ले आओ; क्योंकि शास्त्रोक्त विधिका अनुष्ठान हमारे लिये अवश्य-कर्तव्य है । तुम धर्मका ही सदा चिन्तन किया करो ' ॥ २३ ॥
भ्रातुर्वचनमाज्ञाय लक्ष्मणः परवीरहा ।
चकार च यथोक्तं हि तं रामः पुनरब्रवीत् ॥ २४ ॥
भाईकी इस बातको समझकर शत्रुवीरोंका वध
करनेवाले लक्ष्मणने उनके कथनानुसार कार्य किया ।
तब श्रीरामने पुनः उनसे कहा- ॥ २४ ॥
ऐणेयं श्रपयस्वैतच्छालां यक्ष्यामहे वयम् ।
त्वर सौम्यमुहूर्तोऽयं ध्रुवश्च दिवसो ह्ययम् ॥ २५ ॥
' लक्ष्मण! इस गजकन्दको पकाओ । हम पर्णशालाके अधिष्ठाता देवताओंका पूजन करेंगे । जल्दी करो । यह सौम्यमुहूर्त है और यह दिन भी ' ध्रुव'३ संज्ञक है ( अत: इसीमें यह शुभ कार्य होना चाहिये ) ' ॥ २५ ॥
स लक्ष्मणः कृष्णमृगं हत्वा मेध्यं प्रतापवान् ।
अथ चिक्षेप सौमित्रिः समिद्धे जातवेदसि ॥ २६ ॥
प्रतापी सुमित्राकुमार लक्ष्मणने पवित्र और क छिलकेवाले गजकन्दको उखाड़कर प्रज्वलित आगमें डाल दिया ॥ २६ ॥
तत् तु पक्वं समाज्ञाय निष्टतं छिन्नशोणितम् ।
लक्ष्मणः पुरुषव्याघ्रमथ राघवमब्रवीत् ॥ २७ ॥
रक्तविकारका नाश करनेवाले उस गजकंदको दीर्घ जीवनकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंको वास्तुशान्ति भलीभाँति पका हुआ जानकर लक्ष्मणने पुरुषसिंह अवश्य करनी चाहिये ॥ २२ ॥ श्रीरघुनाथजीसे कहा- ॥ २७ ॥
मृगं हत्वाऽऽनय क्षिप्रं लक्ष्मणेह शुभेक्षण । अयं सर्वः समस्ताङ्गः शृतः कृष्णमृगो मया । कर्तव्यः शास्त्रदृष्टो हि विधिर्धर्ममनुस्मर ॥ २३ ॥ देवता देवसंकाश यजस्व कुशलो ह्यसि ॥ २८ ॥
' कल्याणदर्शी लक्ष्मण! तुम ' गजकन्द ' नामक ' देवोपम तेजस्वी श्रीरघुनाथजी! यह काले १. यहाँ ' ऐणेयं मांसम् ' का अर्थ है- गजकन्द नामक कन्द विशेषका गूदा । इस प्रसंगमें मांसपरक अर्थ नहीं लेना चाहिये; क्योंकि ऐसा अर्थ लेनेपर ' हित्वा मुनिवदामिषम् ' ( २ । २० । २ ९ ), ' फलानि मूलानि च भक्षयन् वने ' ( २। ३४। ५ ९ ) तथा ' धर्ममेवाचरिष्यामस्तत्र मूलफलाशनाः ' ( २ । ५४ । १६ ) इत्यादि रूपसे की हुई श्रीरामकी प्रतिज्ञाओंसे विरोध पड़ेगा । इन वचनोंमें निरामिष रहने और फल - मूल खाकर धर्माचरण करनेकी ही बात कही गयी है । ‘ रामो द्विर्नाभिभाषते ' ( श्रीराम दो तरहकी बात नहीं कहते हैं, एक बार जो कह दिया, वह अटल है ) इस कथनके अनुसार श्रीरामकी प्रतिज्ञा टलनेवाली नहीं है । २. मदनपाल - निघण्टुके अनुसार ' मृग ' का अर्थ गजकन्द है । ३. ' उत्तरात्रयरोहिण्यो भास्करश्च ध्रुवं स्थिरम् । ' ( मुहूर्तचिन्तामणि ) अर्थात तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र तथा रविवार – ये ' ध्रुव ' एवं ' स्थिर ' संज्ञक हैं । इसमें गृहशान्ति या वास्तुशान्ति आदि कार्य अच्छे माने गये हैं । ४. ‘ छिन्नशोणितम् ' की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- ' छिन्नं शोणितं रक्तविकाररूपं रोगजातं येन सः तम् । ' ' गजकन्द ' रोगविकारका नाशक है ' यह वैद्यकमें प्रसिद्ध है । मदनपाल - निघण्टुके ' षड्दोषादिकुष्ठहन्ता ' आदि वचनसे भी यह चर्मदोष तथा कुष्ठ आदि रक्तविकारका नाशक सिद्ध होता है ।
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३ ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे छिलकेवाला गजकन्द, जो बिगड़े हुए सभी अङ्गोंको ठीक करनेवाला है, * मेरेद्वारा सम्पूर्णतः पका दिया गया है । अब आप वास्तुदेवताओंका यजन कीजिये; क्योंकि आप इस कर्ममें कुशल हैं ॥ २८ ॥
रामः स्नात्वा तु नियतो गुणवाञ्चपकोविदः ।
संग्रहेणाकरोत् सर्वान् मन्त्रान् सत्रावसानिकान् ॥ २ ९ ॥
सद्गुणसम्पन्न तथा जपकर्मके ज्ञाता श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके शौच- संतोषादि नियमोंके पालनपूर्वक संक्षेपसे उन सभी मन्त्रोंका पाठ एवं जप किया, जिनसे वास्तुयज्ञकी पूर्ति हो जाती है ॥ २ ९ ॥
इष्ट्वा देवगणान् सर्वान् विवेशावसथं शुचिः ।
बभूव च मनोह्लादो रामस्यामिततेजसः ॥ ३० ॥
समस्त देवताओंका पूजन करके पवित्र भावसे श्रीरामने पर्णकुटीमें प्रवेश किया । उस समय अमित -तेजस्वी श्रीरामके मनमें बड़ा आह्लाद हुआ ॥ ३० ॥
वैश्वदेवबलिं कृत्वा रौद्रं वैष्णवमेव च ।
वास्तुसंशमनीयानि मङ्गलानि प्रवर्तयन् ॥ ३१ ॥
तत्पश्चात् बलिवैश्वदेव कर्म, रुद्रयाग तथा वैष्णवयाग
करके श्रीरामने वास्तुदोषकी शान्तिके लिये मङ्गलपाठ ।
किया ॥ ३१ ॥
जपं च न्यायतः कृत्वा स्नात्वा नद्यां यथाविधि ।
पापसंशमनं रामश्रकार बलिमुत्तमम् ॥ ३२ ॥
नदीमें विधिपूर्वक स्नान करके न्यायतः गायत्री आदि मन्त्रोंका जप करनेके अनन्तर श्रीरामने पञ्चसूना आदि दोषोंकी शान्तिके लिये उत्तम बलिकर्म सम्पन्न किया ॥ ३२ ॥
। वेदिस्थलविधानानि चैत्यान्यायतनानि च ।
आश्रमस्यानुरूपाणि स्थापयामास राघवः ॥ ३३ ॥
रघुनाथजीने अपनी छोटी - सी कुटीके अनुरूप ही वेदिस्थलों ( आठ दिक्पालोंके लिये बलि - समर्पणके स्थानों ), चैत्यों ( गणेश आदिके स्थानों ) तथा आयतनों ( विष्णु आदि देवोंके स्थानों ) का निर्माण एवं स्थापना की ॥ ३३ ॥
तां वृक्षपर्णच्छदनां मनोज्ञां यथाप्रदेशं सुकृतां निवाताम् । वासाय सर्वे विविशुः समेताः सभां यथा देवगणाः सुधर्माम् ॥ ३४ ॥
वह मनोहर कुटी उपयुक्त स्थानपर बनी थी । उसे वृक्षोंके पत्तोंसे छाया गया था और उसके भीतर प्रचण्ड वायुसे बचनेका पूरा प्रबन्ध था । सीता, लक्ष्मण और श्रीराम सबने एक साथ उसमें निवासके लिये प्रवेश किया । ठीक वैसे ही, जैसे देवतालोग सुधर्मा सभामें प्रवेश करते हैं ॥ ३४ ॥
सुरम्यमासाद्य तु चित्रकूटं नदीं च तां माल्यवतीं सुतीर्थाम् । ननन्द हृष्टो मृगपक्षिजुष्टां जहौ च दुःखं पुरविप्रवासात् ॥ ३५ ॥
चित्रकूट पर्वत बड़ा ही रमणीय था । वहाँ उत्तम तीर्थों ( तीर्थस्थान, सीढ़ी और घाटों ) से सुशोभित माल्यवती ( मन्दाकिनी ) नदी बह रही थी, जिसका बहुत - से पशुपक्षी सेवन करते थे । उस पर्वत और नदीका सांनिध्य पाकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा हर्ष और आनन्द हुआ । वे नगरसे दूर वनमें आनेके कारण होनेवाले कष्टको भूल गये ॥ ३५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५६ ॥
सप्तपञ्चाशः सर्गः सुमन्त्रका अयोध्याको लौटना, उनके मुखसे श्रीरामका संदेश सुनकर पुरवासियोंका विलाप, राजा दशरथ और कौसल्याकी मूर्च्छा
कथयित्वा तु दुःखार्तः सुमन्त्रेण चिरं सह ।
रामे दक्षिणकूलस्थे जगाम स्वगृहं गुहः ॥ १ ॥
इधर, जब श्रीराम गङ्गाके दक्षिणतटपर उतर गये, तब गुह दुःखसे व्याकुल हो सुमन्त्रके साथ बड़ी देरतक बातचीत करता रहा । इसके बाद वह सुमन्त्रको साथ ले अपने घरको चला गया ॥ १ ॥
' समस्ताङ्गः ' की व्युत्पत्ति यों समझनी चाहिये - ' सम्यग् तथा अन्तःपुरकी रानियोंका आर्तनाद
भरद्वाजाभिगमनं प्रयागे च सभाजनम् ।
आ गिरेर्गमनं तेषां तत्रस्थैरभिलक्षितम् ॥ २ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका प्रयागमें भरद्वाजके आश्रम पर जाना, मुनिके द्वारा सत्कार पाना तथा चित्रकूट पर्वतपर पहुँचना - ये सब वृत्तान्त शृङ्गवेरके निवासी गुप्तचरोंने देखे और लौटकर गुहको इन बातोंसे अवगत कराया ॥ २ ॥
भवन्ति अस्तानि अङ्गानि येन सः । '
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अयोध्याकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ३ ९ ७ अनुज्ञातः सुमन्त्रोऽथ योजयित्वा हयोत्तमान् ॥ अयोध्यामेव नगरीं प्रययौ गाढदुर्मनाः ॥ ३ ॥
इन सब बातोंको जानकर सुमन्त्र गुहसे विदा ले अपने उत्तम घोड़ोंको रथमें जोतकर अयोध्याकी ओर ही लौट पड़े । उस समय उनके मनमें बड़ा दुःख हो रहा था ।
स वनानि सुगन्धीनि सरितश्च सरांसि च ।
पश्यन् यत्तो ययौ शीघ्रं ग्रामाणि नगराणि च ॥ ४ ॥
वे मार्गमें सुगन्धित वनों, नदियों, सरोवरों, गाँवों और नगरोंको देखते हुए बड़ी सावधानीके साथ शीघ्रतापूर्वक जा रहे थे ॥ ४ ॥
ततः सायाह्नसमये द्वितीयेऽहनि सारथिः ।
अयोध्यां समनुप्राप्य निरानन्दां ददर्श ह ॥ ५ ॥
शृङ्गवेरपुरसे लौटनेके दूसरे दिन सायंकालमें अयोध्या पहुँचकर उन्होंने देखा, सारी पुरी आनन्दशून्य हो गयी है ॥५ ॥
स शून्यामिव निःशब्दां दृष्ट्वा परमदुर्मनाः ।
सुमन्त्रश्चिन्तयामास शोकवेगसमाहतः ॥ ६ ॥
वहाँ कहीं एक शब्द भी सुनायी नहीं देता था । सारी पुरी ऐसी नीरव थी, मानो मनुष्योंसे सूनी हो गयी हो । अयोध्याकी ऐसी दशा देखकर सुमन्त्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ । वे शोकके वेगसे पीड़ित हो इस प्रकार चिन्ता करने लगे - ॥ ६ ॥
कच्चिन्न सगजा साश्वा सजना सजनाधिपा ।
रामसंतापदुःखेन दग्धा शोकाग्निना पुरी ॥ ७ ॥
' कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि श्रीरामके विरहजनित संतापके दुःखसे व्यथित हो हाथी, घोड़े, मनुष्य और महाराजसहित सारी अयोध्यापुरी शोकाग्निसे दग्ध हो गयी हो ' ॥ ७ ॥
इति चिन्तापरः सूतो वाजिभिः शीघ्रयायिभिः ।
नगरद्वारमासाद्य त्वरितः प्रविवेश ह ॥ ८ ॥
इसी चिन्तामें पड़े हुए सारथि सुमन्त्रने शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा नगरद्वारपर पहुँचकर तुरंत ही पुरीके भीतर प्रवेश किया ॥ ८ ॥
सुमन्त्रमभिधावन्तः शतशोऽथ सहस्रशः ।
क्व राम इति पृच्छन्तः सूतमभ्यद्रवन् नराः ॥ ९ ॥
सुमन्त्रको देखकर सैकड़ों और हजारों पुरवासी मनुष्य दौड़े आये और ' श्रीराम कहा हैं? ' यह पूछते हुए उनके रथके साथ - साथ दौड़ने लगे ॥ ९ ॥
तेषां शशंस गङ्गायामहमापृच्छ्य राघवम् ।
अनुज्ञातो निवृत्तोऽस्मि धार्मिकेण महात्मना ॥ १० ॥
ते तीर्णा इति विज्ञाय बाष्पपूर्णमुखा नराः ।
अहो धिगिति निःश्वस्य हा रामेति विचुक्रुशुः ॥ ११ ॥
उस समय सुमन्त्रने उन लोगोंसे कहा - ' सज्जनो! मैं गङ्गाजीके किनारेतक श्रीरघुनाथजीके साथ गया था । वहाँसे उन धर्मनिष्ठ महात्माने मुझे लौट जानेकी आज्ञा दी । अतः मैं उनसे बिदा लेकर यहाँ लौट आया हूँ । ' वे तीनों व्यक्ति गङ्गाके उस पार चले गये ' यह जानकर सब लोगोंके मुखपर आँसुओंकी धाराएँ बह चलीं । ' अहो! हमें धिक्कार है । ' ऐसा कहकर वे लंबी साँसें खींचते और ' हा राम! ' की पुकार मचाते हुए जोर-जोरसे करुणक्रन्दन करने लगे ॥ १०-११ ॥
शुश्राव च वचस्तेषां वृन्दं वृन्दं च तिष्ठताम् ।
हताः स्म खलु ये नेह पश्याम इति राघवम् ॥ १२ ॥
सुमन्त्रने उनकी बातें सुनीं । वे झुंड के झुंड खड़े होकर कह रहे थे— ' हाय! निश्चय ही हमलोग मारे गये; क्योंकि अब हम यहाँ श्रीरामचन्द्रजीको नहीं देख पायँगे ॥ १२ ॥
दानयज्ञविवाहेषु समाजेषु महत्सु च ।
न द्रक्ष्यामः पुनर्जातु धार्मिकं राममन्तरा ॥ १३ ॥
' दान, यज्ञ, विवाह तथा बड़े - बड़े सामाजिक उत्सवोंके समय अब हम कभी धर्मात्मा श्रीरामको अपने बीचमें खड़ा हुआ नहीं देख सकेंगे ॥ १३ ॥
किं समर्थं जनस्यास्य किं प्रियं किं सुखावहम् ।
इति रामेण नगरं पित्रेव परिपालितम् ॥ १४ ॥
' अमुक पुरुषके लिये कौन - सी वस्तु उपयोगी है? क्या करनेसे उसका प्रिय होगा? और कैसे किस-किस वस्तुसे उसे सुख मिलेगा, इत्यादि बातोंका विचार करते हुए श्रीरामचन्द्रजी पिताकी भाँति इस नगरका पालन करते थे ' ॥ १४ ॥
वातायनगतानां च स्त्रीणामन्वन्तरापणम् ।
राममेवाभितप्तानां शुश्राव परिदेवनाम् ॥ १५ ॥
बाजारके बीचसे निकलते समय सारथिके कानोंमें स्त्रियोंके रोनेकी आवाज सुनायी दी, जो महलोंकी खिड़कियोंमें बैठकर श्रीरामके लिये ही संतप्त हो विलाप कर रहीं थीं ॥१५ ॥
स राजमार्गमध्येन सुमन्त्रः पिहिताननः ।
यत्र राजा दशरथस्तदेवोपययौ गृहम् ॥१६ ॥
राजमार्गके बीचसे जाते हुए सुमन्त्रने कपड़ेसे अपना मुँह ढक लिया । वे रथ लेकर उसी भवनकी । ओर गये, जहाँ राजा दशरथ मौजूद थे ॥१६ ॥
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३ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
सोऽवतीर्य रथाच्छीघ्रं राजवेश्म प्रविश्य च ।
कक्ष्याः सप्ताभिचक्राम महाजनसमाकुलाः ॥ १७ ॥
राजमहलके पास पहुँचकर वे शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और भीतर प्रवेश करके बहुत - से मनुष्योंसे भरी हुई सात ड्योढ़योंको पार कर गये ॥ १७ ॥
हम्यैर्विमानैः प्रासादैरवेक्ष्याथ समागतम् ।
हाहाकारकृता नार्यो रामादर्शनकर्शिताः ॥ १८ ॥
धनियोंकी अट्टालिकाओं, सतमंजिले मकानों तथा राजभवनोंमें बैठी हुईं स्त्रियाँ सुमन्त्रको लौटा हुआ देख श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित होनेके दुःखसे दुर्बल हो हाहाकर कर उठीं ॥ १८ ॥
आयतैर्विमलैर्नेत्रैरश्रुवेगपरिप्लुतैः अन्योन्यमभिवीक्षन्तेऽव्यक्तमार्ततराः स्त्रियः ॥ १ ९ ॥ उनके कज्जल आदिसे रहित बड़े - बड़े नेत्र आँसुओंके वेगमें डूबे हुए थे । वे स्त्रियाँ अत्यन्त आर्त होकर अव्यक्तभावसे एक - दूसरीकी ओर देख रही थीं ॥
ततो दशरथस्त्रीणां प्रासादेभ्यस्ततस्ततः ।
रामशोकाभितप्तानां मन्दं शुश्राव जल्पितम् ॥ २० ॥
तदनन्तर राजमहलोंमें जहाँ - तहाँसे श्रीरामके शोकसे संतप्त हुई राजा दशरथकी रानियोंके मन्दस्वरमें कहे गये वचन सुनायी पड़े ॥ २० ॥
सह रामेण निर्यातो विना राममिहागतः ।
सूतः किं नाम कौसल्यां क्रोशन्तीं प्रतिवक्ष्यति ॥२१ ॥
' ये सारथि सुमन्त्र श्रीरामके साथ यहाँसे गये थे और उनके बिना ही यहाँ लौटे हैं, ऐसी दशामें करुण क्रन्दन करती हुई कौसल्याको ये क्या उत्तर देंगे? ॥ २१ ॥
यथा च मन्ये दुर्जीवमेवं न सुकरं ध्रुवम् ।
आच्छिद्य पुत्रे निर्याते कौसल्या यत्र जीवति ॥ २२ ॥
' मैं समझती हूँ, जैसे जीवन दुःखजनित है, निश्चय ही उसी प्रकार इसका नाश भी सुकर नहीं है; तभी तो न्यायतः प्राप्त हुए अभिषेकको त्यागकर पुत्रके वनमें चले जानेपर भी कौसल्या अभीतक जीवित हैं ' ॥ २२ ॥
सत्यरूपं तु तद् वाक्यं राजस्त्रीणां निशामयन् ।
प्रदीप्त इव शोकेन विवेश सहसा गृहम् ॥ २३ ॥
रानियोंकी वह सच्ची बात सुनकर शोकसे दग्ध-से होते हुए सुमन्त्रने सहसा राजभवनमें प्रवेश किया ॥ २३ ॥
स प्रविश्याष्टमीं कक्ष्यां राजानं दीनमातुरम् ।
पुत्रशोकपरिघूनमपश्यत् पाण्डुरे गृहे ॥ २४ ॥
आठवीं ड्योढ़ीमें प्रवेश करके उन्होंने देखा, राजा एक श्वेत भवनमें बैठे और पुत्रशोकसे मलिन, दीन एवं आतुर हो रहे हैं ॥ २४ ॥
अभिगम्य तमासीनं राजानमभिवाद्य च ।
सुमन्त्रो रामवचनं यथोक्तं प्रत्यवेदयत् ॥ २५ ॥
सुमन्त्रने वहाँ बैठे हुए महाराजके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई बातें ज्यों - की - त्यों सुना दीं ॥ २५ ॥
स तूष्णीमेव तच्छ्रुत्वा राजा विद्रुतमानसः ।
मूच्छितो न्यपतद् भूमौ रामशोकाभिपीडितः ॥ २६ ॥
राजाने चुपचाप ही वह सुन लिया, सुनकर उनका हृदय द्रवित ( व्याकुल ) हो गया । फिर वे श्रीरामके शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २६ ॥
ततोऽन्तः पुरमाविद्धं मूच्छिते पृथिवीपतौ ।
उच्छ्रित्य बाहू चुक्रोश नृपतौ पतिते क्षितौ ॥ २७ ॥
महाराजके मूच्छित हो जानेपर सारा अन्तःपुर दुःखसे व्यथित हो उठा । राजाके पृथ्वीपर गिरते ही सब लोग दोनों बाहें उठाकर जोर - जोरसे चीत्कार करने लगे ॥ २७ ॥
सुमित्रया तु सहिता कौसल्या पतितं पतिम् ।
उत्थापयामास तदा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २८ ॥
उस समय कौसल्याने सुमित्राकी सहायतासे अपने गिरे हुए पतिको उठाया और इस प्रकार कहा— ॥ २८ ॥
इमं तस्य महाभाग दूतं दुष्करकारिणः ।
वनवासादनुप्राप्तं कस्मान्न प्रतिभाषसे ॥ २ ९ ॥
' महाभाग! ये सुमन्त्रजी दुष्कर कर्म करनेवाले श्रीरामके दूत होकर – उनका संदेश लेकर वनवाससे लौटे हैं । आप इनसे बात क्यों नहीं करते हैं? ॥ २ ९ ॥
अद्येममनयं कृत्वा व्यपत्रपसि राघव ।
उत्तिष्ठ सुकृतं तेऽस्तु शोके न स्यात् सहायता ॥ ३० ॥
' रघुनन्दन! पुत्रको वनवास दे देना अन्याय है । यह अन्याय करके आप लज्जित क्यों हो रहे हैं? उठिये, आपको अपने सत्यके पालनका पुण्य प्राप्त हो । जब आप इस तरह शोक करेंगे, तब आपके सहायकोंका समुदाय भी आपके साथ ही नष्ट हो जायगा ॥ ३० ॥
देव यस्या भयाद् रामं नानुपृच्छसि सारथिम् ।
नेह तिष्ठति कैकेयी विश्रब्धं प्रतिभाष्यताम् ॥ ३१ ॥
' देव! आप जिसके भयसे सुमन्त्रजीसे श्रीरामका समाचार नहीं पूछ रहे हैं, वह कैकेयी यहाँ मौजूद नहीं है; अतः निर्भय होकर बात कीजिये ' ॥ ३१ ॥
सा तथोक्त्वा महाराजं कौसल्या शोकलालसा ।
धरण्यां निपपाताशु बाष्पविप्लुतभाषिणी ॥ ३२ ॥
महाराजसे ऐसा कहकर कौसल्याका गला भर आया ।