वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 421–430
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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अयोध्याकाण्डे
दह्यमानस्तु शोकाभ्यां कौसल्यामाह दुःखितः ।
वेपमानोऽञ्जलिं कृत्वा प्रसादार्थमवाङ्मुखः ॥ ६ ॥
उन दोनों शोकोंसे दग्ध होते हुए दुःखी राजा दशरथ नीचे मुँह किये थर - थर काँपने लगे और कौसल्याको मनानेके लिये हाथ जोड़कर बोले - ॥ ६ ॥
प्रसादये त्वां कौसल्ये रचितोऽयं मयाञ्जलिः ।
वत्सला चानृशंसा च त्वं हि नित्यं परेष्वपि ॥ ७ ॥
‘ कौसल्ये! मैं तुमसे निहोरा करता हूँ, तुम प्रसन्न हो जाओ । देखो, मैंने ये दोनों हाथ जोड़ लिये हैं । तुम तो दूसरोंपर भी सदा वात्सल्य और दया दिखानेवाली हो ( फिर मेरे प्रति क्यों कठोर हो गयी? ) ॥ ७ ॥
भर्ता तु खलु नारीणां गुणवान् निर्गुणोऽपि वा ।
धर्मं विमृशमानानां प्रत्यक्षं देवि दैवतम् ॥ ८ ॥
' देवि! पति गुणवान् हो या गुणहीन, धर्मका विचार करनेवाली सती नारियोंके लिये वह प्रत्यक्ष देवता है ।
सा त्वं धर्मपरा नित्यं दृष्टलोकपरावरा ।
नार्हसे विप्रियं वक्तुं दुःखितापि सुदुःखितम् ॥ ९ ॥
' तुम तो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली और लोकमें भले - बुरेको समझनेवाली हो । यद्यपि तुम भी दुःखित हो तथापि मैं भी महान् दुःखमें पड़ा हुआ हूँ, अतः तुम्हें मुझसे कठोर वचन नहीं कहना चाहिये'॥९ ॥
तद् वाक्यं करुणं राज्ञः श्रुत्वा दीनस्य भाषितम् ।
कौसल्या व्यसृजद् बाष्पं प्रणालीव नवोदकम् ॥ १० ॥
दुःखी हुए राजा दशरथके मुखसे कहे गये उस करुणाजनक वचनको सुनकर कौसल्या अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं, मानो छतकी नालीसे नूतन ( वर्षाका ) जल गिर रहा हो ॥ १० ॥
सा मूर्ध्नि बद्ध्वा रुदती राज्ञः पद्ममिवाञ्जलिम् ।
सम्भ्रमादब्रवीत् त्रस्ता त्वरमाणाक्षरं वचः ॥ ११ ॥
वे अधर्मके भयसे रो पड़ीं और राजाके जुड़े हुए कमलसदृश हाथोंको अपने सिरसे सटाकर घबराहटके कारण शीघ्रतापूर्वक एक - एक अक्षरका उच्चारण करती हुई बोलीं- ॥११ ॥
प्रसीद शिरसा याचे भूमौ निपतितास्मि ते ।
याचितास्मि हता देव क्षन्तव्याहं नहि त्वया ॥ १२ ॥
‘ देव! मैं आपके सामने पृथ्वीपर पड़ी हूँ । आपके द्विषष्टितमः सर्गः ४० ९
नैषा हि सा स्त्री भवति श्लाघनीयेन धीमता ।
उभयोर्लोकयोर्लोके पत्या या सम्प्रसाद्यते ॥ १३ ॥
' पति अपनी स्त्रीके लिये इहलोक और परलोकमें भी स्पृहणीय है । इस जगत्में जो स्त्री अपने बुद्धिमान् पतिके द्वारा मनायी जाती है, वह कुल - स्त्री कहलाने के योग्य नहीं है ॥ १३ ॥
जानामि धर्मं धर्मज्ञ त्वां जाने सत्यवादिनम् ।
पुत्रशोकार्तया तत्तु मया किमपि भाषितम् ॥ १४ ॥
' धर्मज्ञ महाराज! मैं स्त्री- धर्मको जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि आप सत्यवादी हैं । इस समय मैंने जो कुछ भी न कहने योग्य बात कह दी है, वह पुत्रशोकसे पीड़ित होनेके कारण मेरे मुखसे निकल गयी है ॥ १४ ॥
शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम् ।
शोको नाशयते सर्वं नास्ति शोकसमो रिपुः ॥ १५ ॥
' शोक धैर्यका नाश कर देता है । शोक शास्त्रज्ञानको भी लुप्त कर देता है तथा शोक सब कुछ नष्ट कर देता है; अतः शोकके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है ॥ १५ ॥
शक्यमापतितः सोढुं प्रहारो रिपुहस्ततः ।
सोढुमापतितः शोकः सुसूक्ष्मोऽपि न शक्यते ॥ १६ ॥
' शत्रुके हाथसे अपने ऊपर पड़ा हुआ शस्त्रोंका प्रहार सह लिया जा सकता है; परंतु दैववश प्राप्त हुआ थोड़ा - सा भी शोक नहीं सहा जा सकता ॥ १६ ॥
वनवासाय रामस्य पञ्चरात्रोऽत्र गण्यते ।
यः शोकहतहर्षायाः पञ्चवर्षोपमो मम ॥ १७ ॥
' श्रीरामको वनमें गये आज पाँच रातें बीत गयीं । मैं यही गिनती रहती हूँ । शोकने मेरे हर्षको नष्ट कर दिया है, अतः ये पाँच रात मेरे लिये पाँच वर्षोंके समान प्रतीत हुई हैं ॥ १७ ॥
तं हि चिन्तयमानायाः शोकोऽयं हृदि वर्धते ।
नदीनामिव वेगेन समुद्रसलिलं महत् ॥ १८ ॥
' श्रीरामका ही चिन्तन करनेके कारण मेरे हृदयका यह शोक बढ़ता जा रहा है, जैसे नदियोंके वेगसे समुद्रका जल बहुत बढ़ जाता है ' ॥ १८ ॥
एवं हि कथयन्त्यास्तु कौसल्यायाः शुभं वचः ।
मन्दरश्मिरभूत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत ॥ १ ९ ॥
चरणोंमें मस्तक रखकर याचना करती हूँ, आप प्रसन्न अथ प्रह्लादितो वाक्यैर्देव्या कौसल्यया नृपः । हों । यदि आपने उलटे मुझसे ही याचना की, तब तो शोकेन च समाक्रान्तो निद्राया वशमेयिवान् ॥२० ॥
मैं मारी गयी । मुझसे अपराध हुआ हो तो भी मैं आपसे कौसल्या इस प्रकार शुभ वचन कह ही रही थीं क्षमा पानेके योग्य हूँ, प्रहार पानेके नहीं ॥ १२ ॥ कि सूर्यकी किरणें मन्द पड़ गयीं और रात्रिकाल आ
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४१० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पहुँचा । देवी कौसल्याकी इन बातोंसे राजाको बड़ी | थे । इस हर्ष और शोककी अवस्थामें उन्हें नींद आ प्रसन्नता हुई । साथ ही वे श्रीरामके शोकसे भी पीड़ित । गयी ॥ १ ९ -२० ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
त्रिषष्टितमः सर्गः राजा दशरथका शोक और उनका कौसल्यासे अपने द्वारा मुनिकुमारके मारे जानेका प्रसङ्ग सुनाना
प्रतिबुद्धो मुहूर्तेन शोकोपहतचेतनः ।
अथ राजा दशरथः स चिन्तामभ्यपद्यत ॥ १ ॥
राजा दशरथ दो ही घड़ीके बाद फिर जाग उठे ।
उस समय उनका हृदय शोकसे व्याकुल हो रहा था ।
वे मन - ही - मन चिन्ता करने लगे ॥ १ ॥
रामलक्ष्मणयोश्चैव विवासाद् वासवोपमम् ।
आपेदे उपसर्गस्तं तमः सूर्यमिवासुरम् ॥ २ ॥
श्रीराम और लक्ष्मणके वनमें चले जानेसे इन इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज दशरथको शोकने उसी प्रकार धर दबाया था, जैसे राहुका अन्धकार सूर्यको ढक देता है ॥२ ॥
सभार्ये हि गते रामे कौसल्यां कोसलेश्वरः ।
विवक्षुरसितापाङ्गीं स्मृत्वा दुष्कृतमात्मनः ॥ ३ ॥
पत्नीसहित श्रीरामके वनमें चले जानेपर कोसलनरेश दशरथने अपने पुरातन पापका स्मरण करके कजरारे नेत्रोंवाली कौसल्यासे कहनेका विचार किया ॥ ३ ॥
स राजा रजनीं षष्ठीं रामे प्रव्राजिते वनम् ।
अर्धरात्रे दशरथः सोऽस्मरद् दुष्कृतं कृतम् ॥४ ॥
उस समय श्रीरामचन्द्रजीको वनमें गये छठी रात बीत रही थी । जब आधी रात हुई, तब राजा दशरथको उस पहलेके किये हुए दुष्कर्मका स्मरण हुआ ॥४ ॥
स राजा पुत्रशोकार्तः स्मृत्वा दुष्कृतमात्मनः ।
कौसल्यां पुत्रशोकार्तामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
पुत्रशोकसे पीड़ित हुए महाराजने अपने उस दुष्कर्मको याद करके पुत्रशोकसे व्याकुल हुई कौसल्यासे इस प्रकार कहना आरम्भ किया- ॥५ ॥
यदाचरति कल्याणि शुभं वा यदि वाशुभम् ।
तदेव लभते भद्रे कर्ता कर्मजमात्मनः ॥ ६ ॥
' कल्याणि! मनुष्य शुभ या अशुभ जो भी कर्म करता है, भद्रे! अपने उसी कर्मके फलस्वरूप सुख या दुःख कर्ताको प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥
गुरुलाघवमर्थानामारम्भे कर्मणां फलम् ।
दोषं वा यो न जानाति स बाल इति होच्यते ॥ ७ ॥
' जो कर्मोंका आरम्भ करते समय उनके फलोंकी गुरुता या लघुताको नहीं जानता, उनसे होनेवाले लाभरूपी गुण अथवा हानिरूपी दोषको नहीं समझता, वह मनुष्य बालक ( मूर्ख ) कहा जाता है ॥ ७ ॥
कश्चिदाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च निषिञ्चति ।
पुष्पं दृष्ट्वा फले गृध्नुः स शोचति फलागमे ॥ ८ ॥
' कोई मनुष्य पलाशका सुन्दर फूल देखकर मन - ही - मन यह अनुमान करके कि इसका फल और भी मनोहर तथा सुस्वादु होगा, फलकी अभिलाषासे आमके बगीचेको काटकर वहाँ पलाशके पौदे लगाता और सींचता है, वह फल लगनेके समय पश्चात्ताप करता है ( क्योंकि उससे अपनी आशाके अनुरूप फल वह नहीं पाता है ) ॥ ८ ॥
अविज्ञाय फलं यो हि कर्म त्वेवानुधावति ।
स शोचेत् फलवेलायां यथा किंशुकसेचकः ॥ ९ ॥
' जो क्रियमाण कर्मके फलका ज्ञान या विचार न करके केवल कर्मकी ओर ही दौड़ता है, उसे उसका फल मिलनेके समय उसी तरह शोक होता है, जैसा कि आम काटकर पलाश सींचनेवालेको हुआ करता है ॥ ९ ॥
सोऽहमाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च न्यषेचयम् ।
रामं फलागमे त्यक्त्वा पश्चाच्छोचामि दुर्मतिः ॥ १० ॥
' मैंने भी आमका वन काटकर पलाशोंको ही सींचा है, इस कर्मके फलकी प्राप्तिके समय अब श्रीरामको खोकर
मैं पश्चात्ताप कर रहा हूँ । मेरी बुद्धि कैसी खोटी है? ॥
लब्धशब्देन कौसल्ये कुमारेण धनुष्मता ।
कुमारः शब्दवेधीति मया पापमिदं कृतम् ॥ ११ ॥
' कौसल्ये! पिताके जीवनकालमें जब मैं केवल राजकुमार था, एक अच्छे धनुर्धरके रूपमें मेरी ख्याति फैल गयी थी । सब लोग यही कहते थे कि ' राजकुमार
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अयोध्याकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ४११ दशरथ शब्द - वेधी बाण चलाना जानते हैं । ' इसी । ख्यातिमें पड़कर मैंने यह एक पाप कर डाला था ( जिसे अभी बताऊँगा ॥ ११ ॥
तदिदं मेऽनुसम्प्राप्तं देवि दुःखं स्वयंकृतम् ।
सम्मोहादिह बालेन यथा स्याद् भक्षितं विषम् ॥ १२ ॥
‘ देवि! उस अपने ही किये हुए कुकर्मका फल मुझे इस महान् दुःखके रूपमें प्राप्त हुआ है । जैसे कोई बालक अज्ञानवश विष खा ले तो उसे भी वह विष मार ही डालता है, उसी प्रकार मोह या अज्ञानवश किये हुए दुष्कर्मका फल भी यहाँ मुझे भोगना पड़ रहा है ॥
यथान्यः पुरुषः कश्चित् पलाशैर्मोहितो भवेत् ।
एवं मयाप्यविज्ञातं शब्दवेध्यमिदं फलम् ॥ १३ ॥
' जैसे दूसरा कोई गँवार मनुष्य पलाशके फूलोंपर ही मोहित हो उसके कड़वे फलको नहीं जानता, उसी प्रकार मैं भी ' शब्दवेधी बाण - विद्या ' की प्रशंसा सुनकर उसपर लट्टू हो गया । उसके द्वारा ऐसा क्रूरतापूर्ण पापकर्म बन सकता है और ऐसा भयंकर फल प्राप्त हो सकता है, इसका ज्ञान मुझे नहीं हुआ ॥ १३ ॥
देव्यनूढा त्वमभवो युवराजो भवाम्यहम् ।
ततः प्रावृडनुप्राप्ता मम कामविवर्धिनी ॥ १४ ॥
' देवि! तुम्हारा विवाह नहीं हुआ था और मैं अभी युवराज ही था, उन्हीं दिनोंकी बात है । मेरी कामभावनाको बढ़ानेवाली वर्षा ऋतु आयी ॥ १४ ॥
अपास्य हि रसान् भौमांस्तप्त्वा च जगदंशुभिः ।
परेताचरितां भीमां रविराचरते दिशम् ॥ १५ ॥
' सूर्यदेव पृथ्वीके रसोंको सुखाकर और जगत्को अपनी किरणोंसे भलीभाँति संतप्त करके जिसमें यमलोकवर्ती प्रेत विचरा करते हैं, उस भयंकर दक्षिण दिशामें संचरण करते थे ॥१५ ॥
उष्णमन्तर्दधे सद्यः स्निग्धा ददृशिरे घनाः ।
ततो जहृषिरे सर्वे भेकसारङ्गबर्हिणः ॥ १६ ॥
' सब ओर सजल मेघ दृष्टिगोचर होने लगे और गरमी तत्काल शान्त हो गयी; इससे समस्त मेढकों, चातकों और मयूरोंमें हर्ष छा गया ॥ १६ ॥
क्लिन्नपक्षोत्तराः स्नाताः कृच्छ्रादिव पतत्त्रिणः ।
वृष्टिवातावधूताग्रान् पादपानभिपेदिरे ॥ १७ ॥
' पक्षियोंकी पाँखें ऊपरसे भींग गयी थीं । वे नहा उठे थे और बड़ी कठिनाईसे उन वृक्षोंतक पहुँच पाते थे, जिनकी डालियोंके अग्रभाग वर्षा और वायुके झोकोंसे झूम रहे थे ॥ १७ ॥
पतितेनाम्भसाऽऽच्छन्नः पतमानेन चासकृत् ।
आबभौ मत्तसारङ्गस्तोयराशिरिवाचलः ॥ १८ ॥
' गिरे हुए और बारंबार गिरते हुए जलसे आच्छादित हुआ मतवाला हाथी तरङ्गरहित प्रशान्त समुद्र तथा भीगे पर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ १८ ॥
पाण्डुरारुणवर्णानि स्त्रोतांसि विमलान्यपि ।
सुस्रुवुर्गिरिधातुभ्यः सभस्मानि भुजंगवत् ॥ १ ९ ॥
' पर्वतोंसे गिरनेवाले स्रोत या झरने निर्मल होनेपर भी पर्वतीय धातुओंके सम्पर्कसे श्वेत, लाल और भस्मयुक्त होकर सर्पोंकी भाँति कुटिल गतिसे बह रहे थे ॥ १ ९ ॥
तस्मिन्नतिसुखे काले धनुष्मानिषुमान् रथी ।
व्यायामकृतसंकल्पः सरयूमन्वगां नदीम् ॥ २० ॥
‘ वर्षा ऋतुके उस अत्यन्त सुखद सुहावने समयमें मैं धनुष - बाण लेकर रथपर सवार हो शिकार खेलने के लिये सरयू नदीके तटपर गया ॥२० ॥
निपाने महिषं रात्रौ गजं वाभ्यागतं मृगम् ।
अन्यद् वा श्वापदं किंचिज्जिघांसुरजितेन्द्रियः ॥ २१ ॥
' मेरी इन्द्रियाँ मेरे वशमें नहीं थीं । मैंने सोचा था कि पानी पीनेके घाटपर रातके समय जब कोई उपद्रवकारी भैंसा, मतवाला हाथी अथवा सिंह- व्याघ्र आदि दूसरा कोई हिंसक जन्तु आवेगा तो उसे मारूँगा ॥ २१ ॥
अथान्धकारे त्वश्रौषं जले कुम्भस्य पूर्यतः ।
अचक्षुर्विषये घोषं वारणस्येव नर्दतः ॥ २२ ॥
' उस समय वहाँ सब ओर अन्धकार छा रहा था । मुझे अकस्मात् पानीमें घड़ा भरनेकी आवाज सुनायी पड़ी । मेरी दृष्टि तो वहाँतक पहुँचती नहीं थी, किंतु वह आवाज मुझे हाथीके पानी पीते समय होनेवाले शब्द समान जान पड़ी ॥ २२ ॥
ततोऽहं शरमुद्धृत्य दीप्तमाशीविषोपमम् ।
शब्द प्रति गजप्रेप्सुरभिलक्ष्यमपातयम् ॥ २३ ॥
' तब मैंने यह समझकर कि हाथी ही अपनी सूँड़में पानी खींच रहा होगा; अतः वही मेरे बाणका निशाना बनेगा । तरकससे एक तीर निकाला और उस शब्दको लक्ष्य करके चला दिया । वह दीप्तिमान् बाण विषधर सर्पके समान भयंकर था ॥ २३ ॥
अमुचं निशितं बाणमहमाशीविषोपमम् ।
तत्र वागुषसि व्यक्ता प्रादुरासीद् वनौकसः ॥ २४ ॥
हा हेति पततस्तोये बाणाद् व्यथितमर्मणः ।
तस्मिन्निपतिते भूमौ वागभूत् तत्र मानुषी ॥ २५ ॥
' वह उष: कालकी वेला थी । विषैले सर्पके सदृश
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४१२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उस तीखे बाणको मैंने ज्यों ही छोड़ा, त्यों ही । वहाँ पानीमें गिरते हुए किसी वनवासीका हाहाकार मुझे स्पष्टरूपसे सुनायी दिया । मेरे बाणसे उसके मर्ममें बड़ी पीड़ा हो रही थी । उस पुरुषके धराशायी हो जानेपर वहाँ यह मानव - वाणी प्रकट हुई - सुनायी देने लगी- ॥ २४-२५ ॥
कथमस्मद्विधे शस्त्रं निपतेच्च तपस्विनि ।
प्रविविक्तां नदीं रात्रावुदाहारोऽहमागतः ॥ २६ ॥
" आह! मेरे - जैसे तपस्वीपर शस्त्रका प्रहार कैसे सम्भव हुआ? मैं तो नदीके इस एकान्त तटपर रातमें पानी लेनेके लिये आया था ॥ २६ ॥
इषुणाभिहतः केन कस्य वापकृतं मया ।
ऋषेर्हि न्यस्तदण्डस्य वने वन्येन जीवतः ॥ २७ ॥
कथं नु शस्त्रेण वधो मद्विधस्य विधीयते ।
जटाभारधरस्यैव वल्कलाजिनवाससः ॥ २८ ॥
को वधेन ममार्थी स्यात् किं वास्यापकृतं मया ।
एवं निष्फलमारब्धं केवलानर्थसंहितम् ॥ २ ९ ॥
“ किसने मुझे बाण मारा है? मैंने किसका क्या बिगाड़ा था? मैं तो सभी जीवोंको पीड़ा देनेकी वृत्तिका त्याग करके ऋषि - जीवन बिताता था, वनमें रहकर जंगली फल - मूलोंसे ही जीविका चलाता था । मुझ - जैसे निरपराध मनुष्यका शस्त्रसे वध क्यों किया जा रहा है? मैं वल्कल और मृगचर्म पहननेवाला जटाधारी तपस्वी हूँ । मेरा वध करनेमें किसने अपना क्या लाभ सोचा होगा? मैंने मारनेवालेका क्या अपराध किया था? मेरी हत्याका प्रयत्न व्यर्थ ही किया गया! इससे किसीको कुछ लाभ नहीं होगा, केवल अनर्थ ही हाथ लगेगा ॥ २७–२९ ॥
न क्वचित् साधु मन्येत यथैव गुरुतल्पगम् ।
नेमं तथानुशोचामि जीवितक्षयमात्मनः ॥ ३० ॥
मातरं पितरं चोभावनुशोचामि मद्वधे ।
तदेतन्मिथुनं वृद्धं चिरकालभृतं मया ॥ ३१ ॥
मयि पञ्चत्वमापन्ने कां वृत्तिं वर्तयिष्यति ।
वृद्धौ च मातापितरावहं चैकेषुणा हतः ॥ ३२ ॥
केन स्म निहताः सर्वे सुबालेनाकृतात्मना । “ इस हत्यारेको संसारमें कहीं भी कोई उसी तरह अच्छा नहीं समझेगा, जैसे गुरुपत्नीगामीको । मुझे अपने इस जीवनके नष्ट होनेकी उतनी चिन्ता नहीं है; मेरे मारे जानेसे मेरे माता - पिताको जो कष्ट होगा, उसीके लिये मुझे बारंबार शोक हो रहा है । मैंने इन दोनों वृद्धोंका बहुत समयसे पालन - पोषण किया है; अब मेरे शरीरके न रहनेपर ये किस प्रकार जीवन - निर्वाह करेंगे? घातकने एक ही बाणसे मुझे और मेरे बूढ़े माता - पिताको भी मौतके मुखमें डाल दिया । किस विवेकहीन और अजितेन्द्रिय पुरुषने हम सब लोगोंका एक साथ ही वध कर डाला? ' ॥ ३०–३२३ ॥ तां गिरं करुणं श्रुत्वा मम धर्मानुकांक्षिणः ॥ ३३ ॥
कराभ्यां सशरं चापं व्यथितस्यापतद् भुवि । ' ये करुणाभरे वचन सुनकर मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई । कहाँ तो मैं धर्मकी अभिलाषा रखनेवाला था और कहाँ यह अधर्मका कार्य बन गया । उस समय मेरे हाथोंसे धनुष और बाण छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ तस्याहं करुणं श्रुत्वा ऋषेर्विलपतो निशि ॥ ३४ ॥
सम्भ्रान्तः शोकवेगेन भृशमासं विचेतनः । ' रातमें विलाप करते हुए ऋषिका वह करुण वचन सुनकर मैं शोकके वेगसे घबरा उठा । मेरी चेतना अत्यन्त विलुप्त सी होने लगी ॥ ३४३ ॥
तं देशमहमागम्य दीनसत्त्वः सुदुर्मनाः ॥ ३५ ॥
अपश्यमिषुणा तीरे सरय्वास्तापसं हतम् ।
अवकीर्णजटाभारं प्रविद्धकलशोदकम् ॥ ३६ ॥
पांसुशोणितदिग्धाङ्गं शयानं शल्यवेधितम् ।
स मामुवीक्ष्य नेत्राभ्यां त्रस्तमस्वस्थचेतनम् ॥ ३७ ॥
इत्युवाच वचः क्रूरं दिधक्षन्निव तेजसा । ' मेरे हृदयमें दीनता छा गयी, मन बहुत दुःखी हो गया । सरयूके किनारे उस स्थानपर जाकर मैंने देखा -एक तपस्वी बाणसे घायल होकर पड़े हैं । उनकी जटाएँ बिखरी हुई हैं, घड़ेका जल गिर गया है तथा सारा शरीर धूल और खूनमें सना हुआ है । वे बाणसे बिंधे हुए पड़े थे । उनकी अवस्था देखकर मैं डर गया, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था । उन्होंने दोनों नेत्रोंसे मेरी ओर इस प्रकार देखा, मानो अपने तेजसे मुझे भस्म कर देना चाहते हों । वे कठोर वाणीमें यों बोले— ॥ ३५-३७३ ॥ किं तवापकृतं राजन् वने निवसता मया ॥ ३८ ॥
जिहीर्षुरम्भो गुर्वर्थं यदहं ताडितस्त्वया । “ राजन्! वनमें रहते हुए मैंने तुम्हारा कौन - सा अपराध किया था, जिससे तुमने मुझे बाण मारा? मैं तो माता - पिताके लिये पानी लेनेकी इच्छासे यहाँ आया था ॥ ३८३ ॥
एकेन खलु बाणेन मर्मण्यभिहते मयि ॥३ ९ ॥ द्वावन्धौ निहतौ वृद्धौ माता जनयिता च मे ।
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अयोध्याकाण्डे " तुमने एक ही बाणसे मेरा मर्म विदीर्ण करके मेरे दोनों अन्धे और बूढ़े माता - पिताको भी मार डाला ॥ ३ ९ ३ ॥ तौ नूनं दुर्बलावन्धौ मत्प्रतीक्षौ पिपासितौ ॥ ४० ॥
चिरमाशां कृतां कष्टां तृष्णां संधारयिष्यतः । " वे दोनों बहुत दुबले और अन्धे हैं । निश्चय ही प्याससे पीड़ित होकर वे मेरी प्रतीक्षामें बैठे होंगे । वे देरतक मेरे आगमनकी आशा लगाये दुःखदायिनी प्यास लिये बाट जोहते रहेंगे ॥ ४० ॥
न नूनं तपसो वास्ति फलयोगः श्रुतस्य वा ॥ ४१ ॥
पिता यन्मां न जानीते शयानं पतितं भुवि । 44 ' अवश्य ही मेरी तपस्या अथवा शास्त्रज्ञानका कोई फल यहाँ प्रकट नहीं हो रहा है; क्योंकि पिताजीको यह नहीं मालूम है कि मैं पृथ्वीपर गिरकर मृत्युशय्यापर पड़ा हुआ हूँ ॥ ४१३ ॥
जानन्नपि च किं कुर्यादशक्तश्चापरिक्रमः ॥ ४२ ॥
भिद्यमानमिवाशक्तस्त्रातुमन्यो नगो नगम् । " यदि जान भी लें तो क्या कर सकते हैं; क्योंकि असमर्थ हैं और चल - फिर भी नहीं सकते हैं । जैसे वायु आदिके द्वारा तोड़े जाते हुए वृक्षको कोई दूसरा वृक्ष नहीं बचा सकता, उसी प्रकार मेरे पिता भी मेरी रक्षा नहीं कर सकते ॥ ४२३ ॥
पितुस्त्वमेव मे गत्वा शीघ्रमाचक्ष्व राघव ॥ ४३ ॥
न त्वामनुदहेत् क्रुद्धो वनमग्निरिवैधितः । 44 ' अतः रघुकुलनरेश! अब तुम्हीं जाकर शीघ्र ही मेरे पिताको यह समाचार सुना दो । ( यदि स्वयं कह दोगे तो ) जैसे प्रज्वलित अग्रि समूचे वनको जला डालती है, उस प्रकार वे क्रोधमें भरकर तुमको भस्म नहीं करेंगे ॥ ४३३ ॥
इयमेकपदी राजन् यतो मे पितुराश्रमः ॥ ४४ ॥
तं प्रसादय गत्वा त्वं न त्वा संकुपितः शपेत् । “ राजन्! यह पगडंडी उधर ही गयी है, जहाँ मेरे पिताका आश्रम है । तुम जाकर उन्हें प्रसन्न करो, जिससे वे कुपित होकर तुम्हें शाप न दें ॥ ४४३ ॥
विशल्यं कुरु मां राजन् मर्म मे निशितः शरः ॥ ४५ ॥
रुणद्धि मृदु सोत्सेधं तीरमम्बुरयो यथा । “ राजन्! मेरे शरीरसे इस बाणको निकाल दो । यह तीखा बाण मेरे मर्मस्थानको उसी प्रकार पीड़ा दे रहा त्रिषष्टितमः सर्गः ४१३ । सशल्यः क्लिश्यते प्राणैर्विशल्यो विनशिष्यति ॥ ४६ ॥
इति मामविशच्चिन्ता तस्य शल्यापकर्षणे ।
दुःखितस्य च दीनस्य मम शोकातुरस्य च ॥ ४७ ॥
लक्षयामास स ऋषिश्चिन्तां मुनिसुतस्तदा । ' मुनिकुमारकी यह बात सुनकर मेरे मनमें यह चिन्ता समायी कि यदि बाण नहीं निकालता हूँ तो इन्हें क्लेश होता है और निकाल देता हूँ तो ये अभी प्राणोंसे भी हाथ धो बैठते हैं । इस प्रकार बाणको निकालनेके विषयमें मुझ दीन - दुःखी और शोकाकुल दशरथकी इस चिन्ताको उस समय मुनिकुमारने लक्ष्य किया ॥ ४६-४७३ ॥ ताम्यमानं स मां कृच्छ्रादुवाच परमार्थवित् ॥ ४८ ॥
सीदमानो विवृत्ताङ्गोऽचेष्टमानो गतः क्षयम् ।
संस्तभ्य शोकं धैर्येण स्थिरचित्तो भवाम्यहम् ॥ ४ ९ ॥
' यथार्थ बातको समझ लेनेवाले उन महर्षिने मुझे अत्यन्त ग्लानिमें पड़ा हुआ देख बड़े कष्टसे कहा— ' राजन्! मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है । मेरी आँखें चढ़ गयी हैं, अङ्ग अङ्गमें तड़पन हो रही है । मुझसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती । अब मैं मृत्युके समीप पहुँच गया हूँ, फिर भी धैर्यके द्वारा शोकको रोककर अपने चित्तको स्थिर करता हूँ ( अब मेरी बात सुनो ) ॥ ४८-४९ ॥
ब्रह्महत्याकृतं तापं हृदयादपनीयताम् ।
न द्विजातिरहं राजन् मा भूत् ते मनसो व्यथा ॥ ५० ॥
" मुझसे ब्रह्महत्या हो गयी - इस चिन्ताको अपने हृदयसे निकाल दो । राजन्! मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, इसलिये तुम्हारे मनमें ब्राह्मणवधको लेकर कोई व्यथा नहीं होनी चाहिये ॥ ५० ॥
शूद्रायामस्मि वैश्येन जातो नरवराधिप ।
इतीव वदतः कृच्छ्राद् बाणाभिहतमर्मणः ॥ ५१ ॥
विघूर्णतो विचेष्टस्य वेपमानस्य भूतले ।
तस्य त्वाताम्यमानस्य तं बाणमहमुद्धरम् ।
स मामुद्वीक्ष्य संत्रस्तो जहौ प्राणांस्तपोधनः ॥ ५२ ॥
" नरश्रेष्ठ! मैं वैश्य पिताद्वारा शूद्रजातीय माता गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ । ' बाणसे मर्ममें आघात पहुँचनेके कारण वे बड़े कष्टसे इतना ही कह सके । उनकी आँखें घूम रही थीं । उनसे कोई चेष्टा नहीं बनती थी । वे पृथ्वीपर पड़े - पड़े छटपटा रहे थे और अत्यन्त कष्टका अनुभव करते थे । उस अवस्थामें मैंने उनके शरीरसे उस है, जैसे नदीके जलका वेग उसके कोमल बालुकामय बाणको निकाल दिया । फिर तो अत्यन्त भयभीत हो ऊँचे तटको छिन्न - भिन्न कर देता है ' ॥ ४५३ ॥ उन तपोधनने मेरी ओर देखकर अपने प्राण त्याग दिये ॥
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४१४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे जलार्द्रगात्रं तु विलप्य कृच्छ्रं गया था । मर्ममें आघात लगनेके कारण बड़े मर्मव्रणं संततमुच्छ्वसन्तम् । विलाप करके और बारंबार उच्छ्वास लेकर उन्होंने ततः सरय्वां तमहं शयानं प्राणोंका त्याग किया था । कल्याणी कौसल्ये! उस समीक्ष्य भद्रे सुभृशं विषण्णः ॥ ५३ ॥ अवस्थामें सरयूके तटपर मरे पड़े मुनिपुत्रको देखकर.
' पानीमें गिरनेके कारण उनका सारा शरीर भीग । मुझे बड़ा दुःख हुआ ' ॥ ५३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥६३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६३ ॥
चतुःषष्टितमः सर्गः राजा दशरथका अपने द्वारा मुनिकुमारके वधसे दुःखी हुए उनके माता - पिताके विलाप और उनके दिये हुए शापका प्रसंग सुनाकर कौसल्याके समीप रोते - बिलखते हुए आधी रातके समय अपने प्राणोंको त्याग देना
वधमप्रतिरूपं तु महर्षेस्तस्य राघवः ।
विलपन्नेव धर्मात्मा कौसल्यामिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
उन मर्हिषके अनुचित वधका स्मरण करके धर्मात्मा रघुकुलनरेशने अपने पुत्रके लिये विलाप करते हुए ही रानी कौसल्यासे इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥
तदज्ञानान्महत्पापं कृत्वा संकुलितेन्द्रियः ।
एकस्त्वचिन्तयं बुद्ध्या कथं नु सुकृतं भवेत् ॥ २ ॥
' देवि! अनजानमें यह महान् पाप कर डालनेके कारण मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो रही थीं । मैं अकेला ही बुद्धि लगाकर सोचने लगा, अब किस उपायसे मेरा कल्याण हो? ॥ २ ॥
ततस्तं घटमादाय पूर्णं परमवारिणा ।
आश्रमं तमहं प्राप्य यथाख्यातपथं गतः ॥ ३ ॥
' तदनन्तर उस घड़ेको उठाकर मैंने सरयूके उत्तम जलसे भरा और उसे लेकर मुनिकुमारके बताये हुए मार्गसे उनके आश्रमपर गया ॥ ३ ॥
तत्राहं दुर्बलावन्धौ वृद्धावपरिणायकौ ।
अपश्यं तस्य पितरौ लूनपक्षाविव द्विजौ ॥ ४ ॥
' वहाँ पहुँचकर मैंने उनके दुबले, अन्धे और बूढ़े माता - पिताको देखा, जिनका दूसरा कोई सहायक नहीं था । उनकी अवस्था पंख कटे हुए दो पक्षियोंके समान थी ॥ ४ ॥
तन्निमित्ताभिरासीनौ कथाभिरपरिश्रमौ ।
तामाशां मत्कृते हीनावुपासीनावनाथवत् ॥ ५ ॥
' वे अपने पुत्रकी ही चर्चा करते हुए उसके आनेकी आशा लगाये बैठे थे । उस चर्चाके कारण उन्हें कुछ परिश्रम या थकावटका अनुभव नहीं होता था । यद्यपि मेरे कारण उनकी वह आशा धूलमें मिल चुकी थी तो भी वे उसीके आसरे बैठे थे । अब वे दोनों सर्वथा अनाथ - से हो गये थे ॥ ५ ॥
शोकोपहतचित्तश्च भयसंत्रस्तचेतनः ।
तच्चाश्रमपदं गत्वा भूयः शोकमहं गतः ॥ ६ ॥
' मेरा हृदय पहलेसे ही शोकके कारण घबराया हुआ था । भयसे मेरा होश ठिकाने नहीं था । मुनिके आश्रमपर पहुँचकर मेरा वह शोक और भी अधिक हो गया ॥ ६ ॥
पदशब्दं तु मे श्रुत्वा मुनिर्वाक्यमभाषत ।
किं चिरायसि मे पुत्र पानीयं क्षिप्रमानय ॥ ७ ॥
' मेरे पैरोंकी आहट सुनकर वे मुनि इस प्रकार बोले- ' बेटा! देर क्यों लगा रहे हो? शीघ्र पानी ले आओ ॥ ७ ॥
यन्निमित्तमिदं तात सलिले क्रीडितं त्वया ।
उत्कण्ठिता ते मातेयं प्रविश क्षिप्रमाश्रमम् ॥ ८ ॥
“ तात! जिस कारणसे तुमने बड़ी देरतक जलमें क्रीड़ा की है, उसी कारणको लेकर तुम्हारी यह माता तुम्हारे लिये उत्कण्ठित हो गयी है; अतः शीघ्र ही आश्रमके भीतर प्रवेश करो ॥ ८ ॥
यद् व्यलीकं कृतं पुत्र मात्रा ते यदि वा मया ।
न तन्मनसि कर्तव्यं त्वया तात तपस्विना ॥। ९ ॥
" बेटा! तात! यदि तुम्हारी माताने अथवा मैंने तुम्हारा कोई अप्रिय किया हो तो उसे तुम्हें अपने मनमें नहीं लाना चाहिये; क्योंकि तुम तपस्वी हो ॥९ ॥
त्वं गतिस्त्वगतीनां च चक्षुस्त्वं हीनचक्षुषाम् ।
समासक्तास्त्वयि प्राणाः कथं त्वं नाभिभाषसे ॥ १० ॥
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अयोध्याकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ४१५ ' हम असहाय हैं, तुम्हीं हमारे सहायक हो । हम । अन्धे हैं, तुम्हीं हमारे नेत्र हो । हमलोगोंके प्राण तुम्हींमें अटके हुए हैं । बताओ, तुम बोलते क्यों नहीं हो? ' ॥ १० ॥
मुनिमव्यक्तया वाचा तमहं सज्जमानया ।
हीनव्यञ्जनया प्रेक्ष्य भीतचित्त इवाब्रुवम् ॥ ११ ॥
' मुनिको देखते ही मेरे मनमें भय - सा समा गया । मेरी जबान लड़खड़ाने लगी । कितने अक्षरोंका उच्चारण नहीं हो पाता था । इस प्रकार अस्पष्ट वाणीमें मैंने बोलनेका प्रयास किया ॥ ११ ॥
मनसः कर्म चेष्टाभिरभिसंस्तभ्य वाग्बलम् ।
आचचक्षे त्वहं तस्मै पुत्रव्यसनजं भयम् ॥ १२ ॥
' मानसिक भयको बाहरी चेष्टाओंसे दबाकर मैंने कुछ कहनेकी क्षमता प्राप्त की और मुनिपर पुत्रकी मृत्युसे जो संकट आ पड़ा था, वह उनपर प्रकट करते हुए कहा- ॥ १२ ॥
क्षत्रियोऽहं दशरथो नाहं पुत्रो महात्मनः ।
सज्जनावमतं दुःखमिदं प्राप्तं स्वकर्मजम् ॥ १३ ॥
" महात्मन्! मैं आपका पुत्र नहीं, दशरथ नामका एक क्षत्रिय हूँ । मैंने अपने कर्मवश यह ऐसा दुःख पाया है, जिसकी सत्पुरुषोंने सदा निन्दा की है ॥ १३ ॥
भगवंश्चापहस्तोऽहं सरयूतीरमागतः ।
जिघांसुः श्वापदं किंचिन्निपाने वागतं गजम् ॥ १४ ॥
44 ' भगवन्! मैं धनुष - बाण लेकर सरयूके तटपर आया था । मेरे आनेका उद्देश्य यह था कि कोई जंगली हिंसक पशु अथवा हाथी घाटपर पानी पीनेके लिये आवे तो मैं उसे मारूँ ॥१४ ॥
ततः श्रुतो मया शब्दो जले कुम्भस्य पूर्वतः ।
द्विपोऽयमिति मत्वाहं बाणेनाभिहतो मया ॥ १५ ॥
44 ' थोड़ी देर बाद मुझे जलमें घड़ा भरनेका शब्द सुनायी पड़ा । मैंने समझा कोई हाथी आकर पानी पी रहा है, इसलिये उसपर बाण चला दिया ॥ १५ ॥
गत्वा तस्यास्ततस्तीरमपश्यमिषुणा हृदि ।
विनिर्भिन्नं गतप्राणं शयानं भुवि तापसम् ॥ १६ ॥
“ फिर सरयूके तटपर जाकर देखा कि मेरा बाण एक तपस्वीकी छातीमें लगा है और वे मृतप्राय होकर धरतीपर पड़े हैं ॥ १६ ॥
ततस्तस्यैव वचनादुपेत्य परितप्यतः ।
स मया सहसा बाण उद्धृतो मर्मतस्तदा ॥ १७ ॥
" उस बाणसे उन्हें बड़ी पीड़ा हो रही थी, अतः उस समय उन्हींके कहनेसे मैंने सहसा वह बाण उनके मर्म- स्थानसे निकाल दिया ॥ १७ ॥
स चोद्धृतेन बाणेन सहसा स्वर्गमास्थितः ।
भगवन्तावुभौ शोचन्नन्धाविति विलप्य च ॥ १८ ॥
" बाण निकलनेके साथ ही वे तत्काल स्वर्ग सिधार गये । मरते समय उन्होंने आप दोनों पूजनीय अंधे पिता-माताके लिये बड़ा शोक और विलाप किया था ॥१८ ॥
अज्ञानाद् भवतः पुत्रः सहसाभिहतो मया ।
शेषमेवं गते यत् स्यात् तत् प्रसीदतु मे मुनिः ॥ १ ९ ॥
" इस प्रकार अनजानमें मेरे हाथसे आपके पुत्रका वध हो गया है । ऐसी अवस्थामे मेरे प्रति जो शाप या अनुग्रह शेष हो, उसे देनेके लिये आप महर्षि मुझपर प्रसन्न हों ' ॥ १ ९ ॥
स तच्छुत्वा वचः क्रूरं मया तदघशंसिना ।
नाशकत् तीव्रमायासं स कर्तुं भगवानृषिः ॥ २० ॥
' मैंने अपने मुँहसे अपना पाप प्रकट कर दिया था, इसलिये मेरी क्रूरतासे भरी हुई वह बात सुनकर भी वे पूज्यपाद महर्षि मुझे कठोर दण्ड - भस्म हो जानेका शाप नहीं दे सके ॥ २० ॥
स बाष्पपूर्णवदनो निःश्वसन् शोकमूर्च्छितः ।
मामुवाच महातेजाः कृताञ्जलिमुपस्थितम् ॥ २१ ॥
' उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वे शोकसे मूच्छित होकर दीर्घ निःश्वास लेने लगे । मैं हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा था । उस समय उन महातेजस्वी मुनिने मुझसे कहा- ॥ २१ ॥
यद्येतदशुभं कर्म न स्म मे कथयेः स्वयम् ।
फलेन्मूर्धा स्म ते राजन् सद्यः शतसहस्रधा ॥ २२ ॥
" राजन्! यदि यह अपना पापकर्म तुम स्वयं यहाँ आकर न बताते तो शीघ्र ही तुम्हारे मस्तकके सैकड़ों-हजारों टुकड़े हो जाते ॥ २२ ॥
क्षत्रियेण वधो राजन् वानप्रस्थे विशेषतः ।
ज्ञानपूर्वं कृतः स्थानाच्च्यावयेदपि वज्रिणम् ॥ २३ ॥
" नरेश्वर! यदि क्षत्रिय जान - बूझकर विशेषत: किसी वानप्रस्थीका वध कर डाले तो वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, वह उसे अपने स्थानसे भ्रष्ट कर देता है ॥
सप्तधा तु भवेन्मूर्धा मुनौ तपसि तिष्ठति ।
ज्ञानाद् विसृजतः शस्त्रं तादृशे ब्रह्मवादिनि ॥ २४ ॥
" तपस्यामें लगे हुए वैसे ब्रह्मवादी मुनिपर जान-बूझकर शस्त्रका प्रहार करनेवाले पुरुषके मस्तकके सात । टुकड़े हो जाते हैं ॥ २४ ॥
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४१६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
अज्ञानाद्धि कृतं यस्मादिदं ते तेन जीवसे ।
अपि ह्यकुशलं न स्याद् राघवाणां कुतो भवान् ॥ २५ ॥
" तुमने अनजानमें यह पाप किया है, इसीलिये अभीतक जीवित हो । यदि जान - बूझकर किया होता तो समस्त रघुवंशियोंका कुल ही नष्ट हो जाता, अकेले तुम्हारी तो बात ही क्या है? ' ॥ २५ ॥
नय नौ नृप तं देशमिति मां चाभ्यभाषत ।
अद्य तं द्रष्टुमिच्छावः पुत्रं पश्चिमदर्शनम् ॥ २६ ॥
' उन्होंने मुझसे यह भी कहा – ' नरेश्वर! तुम हम दोनोंको उस स्थानपर ले चलो, जहाँ हमारा पुत्र मरा पड़ा है । इस समय हम उसे देखना चाहते हैं । यह हमारे लिये उसका अन्तिम दर्शन होगा ' ॥ २६ ॥
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं प्रकीर्णाजिनवाससम् ।
शयानं भुवि निःसंज्ञं धर्मराजवशं गतम् ॥ २७ ॥
अथाहमेकस्तं देशं नीत्वा तौ भृशदुःखितौ ।
अस्पर्शयमहं पुत्रं तं मुनिं सह भार्यया ॥ २८ ॥
' तब मैं अकेला ही अत्यन्त दुःखमें पड़े हुए उन दम्पतिको उस स्थानपर ले गया, जहाँ उनका पुत्र कालके अधीन होकर पृथ्वीपर अचेत पड़ा था । उसके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो रहे थे, मृगचर्म और वस्त्र बिखरे पड़े थे । मैंने पत्नीसहित मुनिको उनके पुत्रके शरीरका स्पर्श कराया ॥ २७-२८ ॥
तौ पुत्रमात्मनः स्पृष्ट्वा तमासाद्य तपस्विनौ ।
निपेततुः शरीरेऽस्य पिता चैनमुवाच ह ॥ २ ९ ॥
' वे दोनों तपस्वी अपने उस पुत्रका स्पर्श करके उसके अत्यन्त निकट जाकर उसके शरीरपर गिर पड़े । फिर पिताने पुत्रको सम्बोधित करके उससे कहा- ॥ २ ९ ॥
नाभिवादयसे माद्य न च मामभिभाषसे ।
किं च शेषे तु भूमौ त्वं वत्स किं कुपितो ह्यसि ॥ ३० ॥
" बेटा! आज तुम मुझे न तो प्रणाम करते हो और न मुझसे बोलते ही हो । तुम धरतीपर क्यों सो रहे हो? क्या तुम हमसे रूठ गये हो? ॥३० ॥
नन्वहं तेऽप्रियः पुत्र मातरं पश्य धार्मिकीम् ।
किं च नालिङ्गसे पुत्र सुकुमार वचो वद ॥ ३१ ॥
“ बेटा! यदि मैं तुम्हारा प्रिय नहीं हूँ तो तुम अपनी इस धर्मात्मा माताकी ओर तो देखो । तुम इसके हृदयसे क्यों नहीं लग जाते हो? वत्स! कुछ तो बोलो ॥ ३१ ॥
कस्य वा पररात्रेऽहं श्रोष्यामि हृदयङ्गमम् ।
अधीयानस्य मधुरं शास्त्रं वान्यद् विशेषतः ॥ ३२ ॥
46 ' अब पिछली रातमें मधुर स्वरसे शास्त्र या पुराण आदि अन्य किसी ग्रन्थका विशेषरूपसे स्वाध्याय कर हुए किसके मुँहसे मैं मनोरम शास्त्रचर्चा सुनूँगा? ॥ ३२ ॥
को मां संध्यामुपास्यैव स्नात्वा हुतहुताशनः ।
श्लाघयिष्यत्युपासीनः पुत्रशोकभर्यादितम् ॥ ३३ ॥
“ अब कौन स्नान, संध्योपासना तथा अग्निहोत्र करके मेरे पास बैठकर पुत्रशोकके भयसे पीड़ित हु मुझ बूढ़ेको सान्त्वना देता हुआ मेरी सेवा करेगा? ॥ ३३ ॥
कन्दमूलफलं हृत्वा यो मां प्रियमिवातिथिम् ।
भोजयिष्यत्यकर्मण्यमप्रग्रहमनायकम् ॥३४ ॥
" अब कौन ऐसा है, जो कन्द, मूल और फल लाकर मुझ अकर्मण्य, अन्नसंग्रहसे रहित और अनाथको प्रिय अतिथिकी भाँति भोजन करायेगा ॥ ३४ ॥
इमामन्धां च वृद्धां च मातरं ते तपस्विनीम् ।
कथं पुत्र भरिष्यामि कृपणां पुत्रगर्धिनीम् ॥ ३५ ॥
" बेटा! तुम्हारी यह तपस्विनी माता अन्धी, बूढ़ी, दीन तथा पुत्रके लिये उत्कण्ठित रहनेवाली है । मैं ( स्वयं अन्धा होकर ) इसका भरण - पोषण कैसे करूँगा? ॥
तिष्ठ मा मा गमः पुत्र यमस्य सदनं प्रति ।
श्वो मया सह गन्तासि जनन्या च समेधितः ॥ ३६ ॥
" पुत्र! ठहरो, आज यमराजके घर न जाओ । कल मेरे और अपनी माताके साथ चलना ॥ ३६ ॥
उभावपि च शोकार्तावनाथौ कृपणौ वने ।
क्षिप्रमेव गमिष्यावस्त्वया हीनौ यमक्षयम् ॥ ३७ ॥
" हम दोनों शोकसे आर्त, अनाथ और दीन हैं ।
तुम्हारे न रहनेपर हम शीघ्र ही यमलोककी राह लेंगे ॥
ततो वैवस्वतं दृष्ट्वा तं प्रवक्ष्यामि भारतीम् ।
क्षमतां धर्मराजो मे बिभृयात् पितरावयम् ॥ ३८ ॥
" तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराजका दर्शन करके मैं उनसे यह बात कहूँगा - धर्मराज मेरे अपराधको क्षमा करें और मेरे पुत्रको छोड़ दें, जिससे यह अपने माता-पिताका भरण - पोषण कर सके ॥ ३८ ॥
दातुमर्हति धर्मात्मा लोकपालो महायशाः ।
ईदृशस्य ममाक्षय्यामेकामभयदक्षिणाम् ॥ ३ ९ ॥
" ये धर्मात्मा हैं, महायशस्वी लोकपाल हैं । मुझ-जैसे अनाथको वह एक बार अभय दान दे सकते हैं ॥
अपापोऽसि यथा पुत्र निहतः पापकर्मणा ।
तेन सत्येन गच्छाशु ये लोकास्त्वस्त्रयोधिनाम् ॥४० ॥
यां हि शूरा गतिं यान्ति संग्रामेष्वनिर्वितनः ।
हतास्त्वभिमुखाः पुत्र गतिं तां परमां ब्रज ॥४१ ॥
" बेटा! तुम निष्पाप हो, किंतु एक पापकर्मा
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अयोध्याकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ४१७ क्षत्रियने तुम्हारा वध किया है, इस कारण मेरे सत्यके । प्रभावसे तुम शीघ्र ही उन लोकोंमें जाओ, जो अस्त्रयोधी शूरवीरोंको प्राप्त होते हैं । बेटा! युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीर सम्मुख युद्धमें मारे जानेपर जिस गतिको प्राप्त होते हैं, उसी उत्तम ग भी जाओ ॥ ४०-४१ ॥
यां गतिं सगरः शैब्यो दिलीपो जनमेजयः ।
नहुषो धुन्धुमारश्च प्राप्तास्तां गच्छ पुत्रक ॥ ४२ ॥
' वत्स! राजा सगर, शैब्य, दिलीप, जनमेजय, नहुष और धुन्धुमार जिस गतिको प्राप्त हुए हैं, वही तुम्हें भी मिले ॥ ४२ ॥
या गतिः सर्वभूतानां स्वाध्यायात् तपसश्च या ।
भूमिदस्याहिताग्नेश्च एकपत्नीव्रतस्य च ॥ ४३ ॥
गोसहस्त्रप्रदातॄणां गुरुसेवाभृतामपि ।
देहन्यासकृतां या च तां गतिं गच्छ पुत्रक ॥ ४४ ॥
" स्वाध्याय और तपस्यासे समस्त प्राणियोंके आश्रयभूत जिस परब्रह्मकी प्राप्ति होती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो । वत्स! भूमिदाता, अग्निहोत्री, एकपत्नीव्रती, एक हजार गौओंका दान करनेवाले, गुरुकी सेवा करनेवाले तथा महाप्रस्थान आदिके द्वारा देहत्याग करनेवाले पुरुषों को जो गति मिलती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो ।
नहि त्वस्मिन् कुले जातो गच्छत्यकुशलां गतिम् ।
स तु यास्यति येन त्वं निहतो मम बान्धवः ॥ ४५ ॥
" हम - जैसे तपस्वियोंके इस कुलमें पैदा हुआ कोई पुरुष बुरी गतिको नहीं प्राप्त हो सकता । बुरी गति तो उसकी होगी, जिसने मेरे बान्धवरूप तुम्हें अकारण मारा है? ' ॥ ४५ ॥
एवं स कृपणं तत्र पर्यदेवयतासकृत् ।
ततोऽस्मै कर्तुमुदकं प्रवृत्तः सह भार्यया ॥ ४६ ॥
' इस प्रकार वे दीनभावसे बारम्बार विलाप करने लगे । तत्पश्चात् अपनी पत्नीके साथ वे पुत्रको जलाञ्जलि देनेके कार्य में प्रवृत्त हुए ॥ ४६ ॥
स तु दिव्येन रूपेण मुनिपुत्रः स्वकर्मभिः ।
स्वर्गमध्यारुहत् क्षिप्रं शक्रेण सह धर्मवित् ॥ ४७ ॥
' इसी समय वह धर्मज्ञ मुनिकुमार अपने पुण्य-कर्मोंके प्रभावसे दिव्य रूप धारण करके शीघ्र ही इन्द्रके साथ स्वर्गको जाने लगा ॥ ४७ ॥
आबभाषे च तौ वृद्धौ शक्रेण सह तापसः ।
आश्वस्य च मुहूर्तं तु पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥ ४८ ॥
‘ इन्द्रसहित उस तपस्वीने अपने दोनों बूढ़े पिता-माताको एक मुहूर्ततक आश्वासन देते हुए उनसे बातचीत की; फिर वह अपने पितासे बोला- ॥४८ ॥
स्थानमस्मि महत् प्राप्तो भवतोः परिचारणात् ।
भवन्तावपि च क्षिप्रं मम मूलमुपैष्यथः ॥ ४ ९ ॥
" मैं आप दोनोंकी सेवासे महान् स्थानको प्राप्त हुआ हूँ, अब आपलोग भी शीघ्र ही मेरे पास आ ' जाइयेगा ' ॥ ४ ९ ॥
एवमुक्त्वा तु दिव्येन विमानेन वपुष्मता ।
आरुरोह दिवं क्षिप्रं मुनिपुत्रो जितेन्द्रियः ॥ ५० ॥
" यह कहकर वह जितेन्द्रिय मुनिकुमार उस सुन्दर आकारवाले दिव्य विमानसे शीघ्र ही देवलोकको चला गया ॥ ५० ॥
स कृत्वाथोदकं तूर्णं तापसः सह भार्यया ।
मामुवाच महातेजाः कृताञ्जलिमुपस्थितम् ॥ ५१ ॥
' तदनन्तर पत्नीसहित उन महातेजस्वी तपस्वी मुनिने तुरंत ही पुत्रको जलाञ्जलि देकर हाथ जोड़े खड़े हुए मुझसे कहा— ॥ ५१ ॥
अद्यैव जहि मां राजन् मरणे नास्ति मे व्यथा ।
यः शरेणैकपुत्रं मां त्वमकार्षीरपुत्रकम् ॥ ५२ ॥
" राजन्! तुम आज ही मुझे भी मार डालो; अब मरनेमें मुझे कष्ट नहीं होगा । मेरे एक ही बेटा था, जिसे तुमने अपने बाणका निशाना बनाकर मुझे पुत्रहीन कर दिया ॥ ५२ ॥
त्वयापि च यदज्ञानान्निहतो मे स बालकः ।
तेन त्वामपि शस्येऽहं सुदुःखमतिदारुणम् ॥ ५३ ॥
" तुमने अज्ञानवश जो मेरे बालककी हत्या की है, उसके कारण मैं तुम्हें भी अत्यन्त भयंकर एवं भलीभाँति दुःख देनेवाला शाप दूँगा ॥ ५३ ॥
पुत्रव्यसनजं दुःखं यदेतन्मम साम्प्रतम् ।
एवं त्वं पुत्रशोकेन राजन् कालं करिष्यसि ॥५४ ॥
' राजन्! इस समय पुत्रके वियोगसे मुझे जैसा कष्ट हो रहा है, ऐसा ही तुम्हें भी होगा । तुम भी पुत्रशोकसे ही कालके गालमें जाओगे ॥ ५४ ॥
अज्ञानात्तु हतो यस्मात् क्षत्रियेण त्वया मुनिः ।
तस्मात् त्वां नाविशत्याशु ब्रह्महत्या नराधिप ॥ ५५ ॥
त्वामप्येतादृशो भावः क्षिप्रमेव गमिष्यति ।
जीवितान्तकरो घोरो दातारमिव दक्षिणाम् ॥ ५६ ॥
" नरेश्वर! क्षत्रिय होकर अनजानमें तुमने वैश्यजातीय मुनिका वध किया है, इसलिये शीघ्र ही तुम्हें ब्रह्महत्याका | पाप तो नहीं लगेगा तथापि जल्दी ही तुम्हें भी ऐसी ही 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) Section_15_1_Front
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४१८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भयानक और प्राण लेनेवाली अवस्था प्राप्त होगी । ठीक । उसी तरह, जैसे दक्षिणा देनेवाले दाताको उसके अनुरूप फल प्राप्त होता है, ॥ ५५-५६ ॥
एवं शापं मयि न्यस्य विलप्य करुणं बहु ।
चितामारोप्य देहं तन्मिथुनं स्वर्गमभ्ययात् ॥ ५७ ॥
' इस प्रकार मुझे शाप देकर वे बहुत देरतक करुणाजनक विलाप करते रहे; फिर वे दोनों पति - पत्नी अपने शरीरोंको जलती हुई चितामें डालकर स्वर्गको चले गये ॥५७ ॥
तदेतच्चिन्तयानेन स्मृतं पापं मया स्वयम् ।
तदा बाल्यात् कृतं देवि शब्दवेध्यनुकर्षिणा ॥ ५८ ॥
‘ देवि! इस प्रकार बालस्वभावके कारण मैंने पहले शब्दवेधी बाण मारकर और फिर उस मुनिके शरीरसे बाणको खींचकर जो उनका वधरूपी पाप किया था, वह आज इस पुत्रवियोगकी चिन्तामें पड़े हुए मुझे स्वयं ही स्मरण हो आया है ॥५८ ॥
तस्यायं कर्मणो देवि विपाकः समुपस्थितः ।
अपथ्यैः सह सम्भुक्ते व्याधिरन्नरसे यथा ॥ ५ ९ ॥
तस्मान्मामागतं भद्रे तस्योदारस्य तद् वचः । ‘ देवि! अपथ्य वस्तुओंके साथ अन्नरस ग्रहण कर लेनेपर जैसे शरीरमें रोग पैदा हो जाता है, उसी प्रकार यह उस पापकर्मका फल उपस्थित हुआ है । अतः कल्याणि! उन उदार महात्माका शापरूपी वचन इस समय मेरे पास फल देनेके लिये आ गया है ' ॥ ५ ९ ३ ॥ इत्युक्त्वा स रुदंस्त्रस्तो भार्यामाह तु भूमिपः ॥ ६० ॥
यदहं पुत्रशोकेन संत्यजिष्यामि जीवितम् ।
चक्षुर्थ्यां त्वां न पश्यामि कौसल्ये त्वं हि मां स्पृश ॥ ६१ ॥
ऐसा कहकर वे भूपाल मृत्युके भयसे त्रस्त हो अपनी पत्नीसे रोते हुए बोले - ' कौसल्ये! अब मैं पुत्रशोकसे अपने प्राणोंका त्याग करूँगा । इस समय मैं तुम्हें अपनी आँखोंसे देख नहीं पाता हूँ; तुम मेरा स्पर्श करो ॥ ६०-६१ ॥
यमक्षयमनुप्राप्ता द्रक्ष्यन्ति नहि मानवाः ।
यदि मां संस्पृशेद् रामः सकृदन्वारभेत वा ॥ ६२ ॥
धनं वा यौवराज्यं वा जीवेयमिति मे मतिः । ' जो मनुष्य यमलोकमें जानेवाले ( मरणासन्न ) होते हैं, वे अपने बान्धवजनोंको नहीं देख पाते हैं । यदि श्रीराम आकर एक बार मेरा स्पर्श करें अथवा यह धन-वैभव और युवराजपद स्वीकार कर लें तो मेरा विश्वास है कि मैं जी सकता हूँ ॥ ६२३ ॥
न तन्मे सदृशं देवि यन्मया राघवे कृतम् ॥ ६३ ॥
सदृशं तत्तु तस्यैव यदनेन कृतं मयि । ‘ देवि! मैंने श्रीरामके साथ जो बर्ताव किया है, वह मेरे योग्य नहीं था; परंतु श्रीरामने मेरे साथ जो व्यवहार किया है, वह सर्वथा उन्हींके योग्य है ॥ ६३३ ॥
दुर्वृत्तमपि कः पुत्रं त्यजेद् भुवि विचक्षणः ॥ ६४ ॥
कश्च प्रव्राज्यमानो वा नासूयेत् पितरं सुतः । ' कौन बुद्धिमान् पुरुष इस भूतलपर अपने दुराचारी पुत्रका भी परित्याग कर सकता है? ( एक मैं हूँ, जिसने अपने धर्मात्मा पुत्रको त्याग दिया ) तथा कौन ऐसा पुत्र है, जिसे घरसे निकाल दिया जाय और वह पिताकों
कोसेतक नहीं? ( परंतु श्रीराम चुपचाप चले गये ।
उन्होंने मेरे विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा ) ॥ ६४३ ॥
चक्षुषा त्वां न पश्यामि स्मृतिर्मम विलुप्यते ॥ ६५ ॥
दूता वैवस्वतस्यैते कौसल्ये त्वरयन्ति माम् । ' कौसल्ये! अब मेरी आँखें तुम्हें नहीं देख पाती हैं, स्मरण शक्ति भी लुप्त होती जा रही है । उधर देखो, ये यमराजके दूत मुझे यहाँसे ले जानेके लिये उतावले हो उठे हैं ॥६५३ ॥
अतस्तु किं दुःखतरं यदहं जीवितक्षये ॥ ६६ ॥
नहि पश्यामि धर्मज्ञं रामं सत्यपराक्रमम् । ' इससे बढ़कर दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है कि मैं प्राणान्तके समय सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ रामका दर्शन नहीं पा रहा हूँ ॥ ६६३ ॥
तस्यादर्शनजः शोकः सुतस्याप्रतिकर्मणः ॥ ६७ ॥
उच्छोषयति वै प्राणान् वारि स्तोकमिवातपः । ‘ जिनकी समता करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है, उन प्रिय पुत्र श्रीरामके न देखनेका शोक मेरे प्राणोंको उसी तरह सुखाये डालता है, जैसे धूप थोड़े-से जलको शीघ्र सुखा देती है ॥ ६७३ ॥
न ते मनुष्या देवास्ते ये चारुशुभकुण्डलम् ॥ ६८ ॥
मुखं द्रक्ष्यन्ति रामस्य वर्षे पञ्चदशे पुनः । ' वे मनुष्य नहीं देवता हैं, जो आपके पंद्रहवें वर्ष वनसे लौटनेपर श्रीरामका सुन्दर मनोहर कुण्डलोंसे अलंकृत मुख देखेंगे ॥ ६८३ ॥
पद्मपत्रेक्षणं सुभ्रु सुदंष्ट्रं चारुनासिकम् ॥ ६ ९ ॥ धन्या द्रक्ष्यन्ति रामस्य ताराधिपसमं मुखम् । ' जो कमलके समान नेत्र, सुन्दर भौंहें, स्वच्छ दाँत और मनोहर नासिकासे सुशोभित श्रीरामके चन्द्रोपम मुखका दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं ॥ ६ ९ ॥ 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_15_1_Back