वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 431–440
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440
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अयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ४१ ९ सदृशं शारदस्येन्दोः फुल्लस्य कमलस्य च ॥ ७० ॥ ।
सुगन्धि मम रामस्य धन्या द्रक्ष्यन्ति ये मुखम् ।
निवृत्तवनवासं तमयोध्यां पुनरागतम् ॥ ७१ ॥
द्रक्ष्यन्ति सुखिनो रामं शुक्रं मार्गगतं यथा । ' जो मेरे श्रीरामके शरच्चन्द्रसदृश मनोहर और प्रफुल्ल कमलके समान सुवासित मुखका दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं । जैसे मूढ़ता आदि अवस्थाओंको त्यागकर अपने उच्च मार्गमें स्थित शुक्रका दर्शन करके लोग सुखी होते हैं, उसी प्रकार वनवासकी अवधि पूरी करके पुनः अयोध्यामें लौटकर आये हुए श्रीरामको जो लोग देखेंगे वे ही सुखी होंगे ॥ ७०-७१३ ॥ कौसल्ये चित्तमोहेन हृदयं सीदतेतराम् ॥ ७२ ॥
वेदये न च संयुक्तान् शब्दस्पर्शरसानहम् । ‘ कौसल्ये! मेरे चित्तपर मोह छा रहा है, हृदय विदीर्ण-सा हो रहा है, इन्द्रियोंसे संयोग होनेपर भी मुझे शब्द, स्पर्श और रस आदि विषयोंका अनुभव नहीं हो रहा है ॥
चित्तनाशाद् विपद्यन्ते सर्वाण्येवेन्द्रियाणि हि ।
क्षीणस्नेहस्य दीपस्य संरक्ता रश्मयो यथा ॥ ७३ ॥
' जैसे तेल समाप्त हो जानेपर दीपककी अरुण प्रभा विलीन हो जाती है, उसी प्रकार चेतनाके नष्ट होनेसे मेरी सारी इन्द्रियाँ ही नष्ट हो चली हैं ॥ ७३ ॥
अयमात्मभवः शोको मामनाथमचेतनम् ।
संसाधयति वेगेन यथा कूलं नदीरयः ॥ ७४ ॥
' जिस प्रकार नदीका वेग अपने ही किनारेको काट गिराता है, उसी प्रकार मेरा अपना ही उत्पन्न किया हुआ शोक मुझे वेगपूर्वक अनाथ और अचेत किये दे रहा है ॥ ७४ ॥
हा राघव महाबाहो हा ममायासनाशन ।
हा पितृप्रिय मे नाथ हा ममासि गतः सुत ॥ ७५ ॥
' हा महाबाहु रघुनन्दन! हा मेरे कष्टोंको दूर करनेवाले श्रीराम! हा पिताके प्रिय पुत्र! हा मेरे नाथ! हा मेरे बेटे! तुम कहाँ चले गये? ॥ ७५ ॥
हा कौसल्ये न पश्यामि हा सुमित्रे तपस्विनि ।
हा नृशंसे ममामित्रे कैकेयि कुलपांसनि ॥ ७६ ॥
' हा कौसल्ये! अब मुझे कुछ नहीं दिखायी देता । हा तपस्विनि सुमित्रे! अब मैं इस लोकसे जा रहा हूँ । हा मेरी शत्रु, क्रूर, कुलाङ्गार कैकेयि! ( तेरी कुटिल इच्छा पूरी हुई ) ' ॥ ७६ ॥
इति मातुश्च रामस्य सुमित्रायाश्च संनिधौ ।
राजा दशरथः शोचञ्जीवितान्तमुपागमत् ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीराम - माता कौसल्या और सुमित्राके निकट शोकपूर्ण विलाप करते हुए राजा दशरथके । जीवनका अन्त हो गया ॥ ७७ ॥
तथा तु दीनः कथयन् नराधिपः
प्रियस्य पुत्रस्य विवासनातुरः ।
गतेऽर्धरात्रे भृशदुःखपीडित-स्तदा जहाँ प्राणमुदारदर्शनः ॥ ७८ ॥
अपने प्रिय पुत्रके वनवाससे शोकाकुल हुए राजा दशरथ इस प्रकार दीनतापूर्ण वचन कहते हुए आधी रात बीतते - बीतते अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो गये और उसी समय उन उदारदर्शी नरेशने अपने प्राणोंको | त्याग दिया ॥ ७८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
पञ्चषष्टितमः सर्गः वन्दीजनोंका स्तुतिपाठ, राजा दशरथको दिवंगत हुआ जान उनकी रानियोंका करुण - विलाप
अथ रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरेवापरेऽहनि ।
वन्दिनः पर्युपातिष्ठंस्तत्पार्थिवनिवेशनम् ॥ १ ॥
तदनन्तर रात बीतनेपर दूसरे दिन सबेरे ही वन्दीजन ( महाराजकी स्तुति करनेके लिये ) राजमहलमें उपस्थित हुए ॥१ ॥
सूताः परमसंस्कारा मागधाश्चोत्तमश्रुताः ।
गायकाः श्रुतिशीलाश्च निगदन्तः पृथक्पृथक् ॥ २ ॥
75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) Section_15_2_Front व्याकरण - ज्ञानसे सम्पन्न ( अथवा उत्तम अलङ्कारोंसे विभूषित ) सूत, उत्तमरूपसे वंशपरम्पराका श्रवण करानेवाले मागध और सङ्गीतशास्त्रका अनुशीलन करनेवाले गायक अपने - अपने मार्गके अनुसार पृथक् - पृथक् यशोगान करते हुए वहाँ आये ॥ २ ॥
राजानं स्तुवतां तेषामुदात्ताभिहिताशिषाम् ।
प्रासादाभोगविस्तीर्णः स्तुतिशब्दो ह्यवर्तत ॥ ३ ॥
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४२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उच्चस्वरसे आशीर्वाद देते हुए राजाकी स्तुति करनेवाले उन सूत - मागध आदिका शब्द राजमहलोंके भीतरी भागमें फैलकर गूँजने लगा ॥ ३ ॥
ततस्तु स्तुवतां तेषां सूतानां पाणिवादकाः ।
अपदानान्युदाहृत्य पाणिवादान्यवादयन् ॥ ४ ॥
वे सूतगण स्तुति कर रहे थे; इतनेहीमें पाणिवादक ( हाथोंसे ताल देकर गानेवाले ) वहाँ आये और राजाओंके बीते हुए अद्भुत कर्मोंका बखान करते हुए तालगतिके अनुसार तालियाँ बजाने लगे ॥४ ॥
तेन शब्देन विहगाः प्रतिबुद्धाश्च सस्वनुः ।
शाखास्थाः पञ्जरस्थाश्च ये राजकुलगोचराः ॥ ५ ॥
उस शब्दसे वृक्षोंकी शाखाओंपर बैठे हुए तथा राजकुलमें ही विचरनेवाले पिंजड़े में बंद शुक आदि पक्षी जागकर चहचहाने लगे ॥ ५ ॥
व्याहृताः पुण्यशब्दाश्च वीणानां चापि निःस्वनाः ।
आशीर्गेयं च गाथानां पूरयामास वेश्म तत् ॥ ६ ॥
शुक आदि पक्षियों तथा ब्राह्मणोंके मुखसे निकले हुए पवित्र शब्द, वीणाओंके मधुर नाद तथा गाथाओंके आशीर्वादयुक्त गानसे वह सारा भवन गूँज उठा ॥ ६ ॥
ततः शुचिसमाचाराः पर्युपस्थानकोविदाः ।
स्त्रीवर्षवरभूयिष्ठा उपतस्थुर्यथापुरा ॥ ७ ॥
तदनन्तर सदाचारी तथा परिचर्याकुशल सेवक, जिनमें स्त्रियों और खोजोंकी संख्या अधिक थी, पहलेकी भाँति उस दिन भी राजभवनमें उपस्थित हुए ॥ ७ ॥
हरिचन्दनसम्पृक्तमुदकं काञ्चनैर्घटैः ।
आनिन्युः स्नानशिक्षाज्ञा यथाकालं यथाविधि ॥ ८ ॥
स्नानविधिके ज्ञाता भृत्यजन विधिपूर्वक सोनेके घड़ोंमें चन्दनमिश्रित जल लेकर ठीक समयपर आये ॥ ८ ॥
मङ्गलालम्भनीयानि प्राशनीयान्युपस्करान् ।
उपानिन्युस्तथा पुण्याः कुमारीबहुलाः स्त्रियः ॥ ९ ॥
पवित्र आचार - विचारवाली स्त्रियाँ, जिनमें कुमारी कन्याओंकी संख्या अधिक थी, मङ्गलके लिये स्पर्श करने योग्य गौ आदि, पीनेयोग्य गङ्गाजल आदि तथा अन्य उपकरण – दर्पण, आभूषण और वस्त्र आदि ले आयीं ॥ ९ ॥
सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वं विधिवदर्चितम् ।
सर्वं सुगुणलक्ष्मीवत् तदभूदाभिहारिकम् ॥ १० ॥
प्रातःकाल राजाओंके मङ्गलके लिये जो - जो वस्तुएँ लायी जाती हैं, उनका नाम आभिहारिक है । वहाँ | लायी गयी सारी आभिहारिक सामग्री समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, विधिके अनुरूप, आदर और प्रशंसाके योग्य उत्तम गुणसे युक्त तथा शोभायमान थी ॥ १० ॥
ततः सूर्योदयं यावत् सर्वं परिसमुत्सुकम् ।
तस्थावनुपसम्प्राप्तं किंस्विदित्युपशङ्कितम् ॥ ११ ॥
सूर्योदय होनेतक राजाकी सेवाके लिये उत्सुक हुआ सारा परिजनवर्ग वहाँ आकर खड़ा हो गया । ब उस समयतक राजा बाहर नहीं निकले, तब सबके मनमें यह शङ्का हो गयी कि महाराजके न आनेका क्या कारण हो सकता है? ॥११ ॥
अथ याः कोसलेन्द्रस्य शयनं प्रत्यनन्तराः ।
ताः स्त्रियस्तु समागम्य भर्तारं प्रत्यबोधयन् ॥ १२ ॥
तदनन्तर जो कोसलनरेश दशरथके समीप रहनेवाली स्त्रियाँ थीं, वे उनकी शय्याके पास जाकर अपने स्वामीको जगाने लगीं ॥ १२ ॥
अथाप्युचितवृत्तास्ता विनयेन नयेन च ।
नह्यस्य शयनं स्पृष्ट्वा किंचिदप्युपलेभिरे ॥ १३ ॥
वे स्त्रियाँ उनका स्पर्श आदि करनेके योग्य थीं; अतः विनीतभावसे युक्तिपूर्वक उन्होंने उनकी शय्याका स्पर्श किया । स्पर्श करके भी वे उनमें जीवनका कोई चिह्न नहीं पा सकीं ॥ १३ ॥
ताः स्त्रियः स्वजशीलज्ञाश्चेष्टां संचलनादिषु ।
ता वेपथुपरीताश्च राज्ञः प्राणेषु शङ्किताः ॥ १४ ॥
सोये हुए पुरुषकी जैसी स्थिति होती है, उसको भी वे स्त्रियाँ अच्छी तरह समझती थीं; अतः उन्होंने हृदय एवं हाथके मूलभागमें चलनेवाली नाड़ियोंकी भी परीक्षा की, किंतु वहाँ भी कोई चेष्टा नहीं प्रतीत हुई । फिर तो वे काँप उठीं । उनके मनमें राजाके प्राणोंके निकल जानेकी आशङ्का हो गयी ॥ १४ ॥
प्रतिस्रोतस्तृणाग्राणां सदृशं संचकाशिरे ।
अथ संदेहमानानां स्त्रीणां दृष्ट्वा च पार्थिवम् ।
यत् तदाशङ्कितं पापं तदा जज्ञे विनिश्चयः ॥ १५ ॥
वे जलके प्रवाहके सम्मुख पड़े हुए तिनकोंके अग्रभागकी भाँति काँपती हुई प्रतीत होने लगीं । संशयमें पड़ी हुई उन स्त्रियोंको राजाकी ओर देखकर उनकी मृत्युके विषयमें जो शङ्का हुई थी, उसका उस समय उन्हें पूरा निश्चय हो गया ॥
कौसल्या च सुमित्रा च पुत्रशोकपराजिते ।
प्रसुप्ते न प्रबुध्येते यथा कालसमन्विते ॥ १६ ॥
पुत्रशोकसे आक्रान्त हुई कौसल्या और सुमित्रा 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) Section_15_2_Back
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अयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ४२१
उस समय मरी हुईके समान सो गयी थीं और उस ।
समयतक उनकी नींद नहीं खुल पायी थी ॥ १६ ॥
निष्प्रभासा विवर्णा च सन्ना शोकेन संनता ।
न व्यराजत कौसल्या तारेव तिमिरावृता ॥ १७ ॥
सोयी हुई कौसल्या श्रीहीन हो गयी थीं । उनके शरीरका रंग बदल गया था । वे शोकसे पराजित एवं पीड़ित हो अन्धकारसे आच्छादित हुई तारिकाके समान शोभा नहीं पा रही थीं ॥ १७ ॥
कौसल्यानन्तरं राज्ञः सुमित्रा तदनन्तरम् ।
न स्म विभ्राजते देवी शोकाश्रुलुलितानना ॥ १८ ॥
राजाके पास कौसल्या थीं और कौसल्याके समीप देवी सुमित्रा थीं । दोनों ही निद्रामग्न हो जानेके कारण शोभाहीन प्रतीत होती थीं । उन दोनोंके मुखपर शोकके आँसू फैले हुए थे ॥१८ ॥
ते च दृष्ट्वा तदा सुते उभे देव्यौ च तं नृपम् ।
सुप्तमेवोद्गतप्राणमन्तःपुरममन्यत ॥ १ ९ ॥
उस समय उन दोनों देवियोंको निद्रामग्न देख अन्तःपुरकी अन्य स्त्रियोंने यही समझा कि सोते अवस्थामें ही महाराजके प्राण निकल गये हैं ॥ १ ९ ॥
ततः प्रचुकुशुर्दीनाः सस्वरं ता वराङ्गनाः ।
करेणेव इवारण्ये स्थानप्रच्युतयूथपाः ॥ २० ॥
फिर तो जैसे जंगलमें यूथपति गजराजके अपने वासस्थानसे अन्यत्र चले जानेपर हथिनियाँ करुण चीत्कार करने लगती हैं, उसी प्रकार वे अन्तःपुरकी सुन्दरी रानियाँ अत्यन्त दुःखी हो उच्चस्वरसे आर्तनाद करने लगीं ॥ २० ॥
तासामाक्रन्दशब्देन सहसोद्गतचेतने ।
कौसल्या च सुमित्रा च त्यक्तनिद्रे बभूवतुः ॥ २१ ॥
उनके रोनेकी आवाजसे कौसल्या और सुमित्राकी भी नींद टूट गयी और वे दोनों सहसा जाग उठीं ॥ २१ ॥
कौसल्या च सुमित्रा च दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च पार्थिवम् ।
हा नाथेति परिक्रुश्य पेततुर्धरणीतले ॥ २२ ॥
कौसल्या और सुमित्राने राजाको देखा, उनके शरीरका स्पर्श किया और ' हा नाथ! ' की पुकार मचाती हुई वे दोनों रानियाँ पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ २२ ॥
सा कोसलेन्द्रदुहिता चेष्टमाना महीतले ।
न भ्राजते रजोध्वस्ता तारेव गगनच्युता ॥ २३ ॥
कोसलराजकुमारी कौसल्या धरतीपर लोटने और छटपटाने लगीं । उनका धूलि - धूसरित शरीर शोभाहीन दिखायी देने लगा, मानो आकाशसे टूटकर गिरी हुई कोई तारा धूलमें लोट रही हो ॥ २३ ॥
नृपे शान्तगुणे जाते कौसल्यां पतितां भुवि ।
अपश्यंस्ताः स्त्रियः सर्वा हतां नागवधूमिव ॥ २४ ॥
राजा दशरथके शरीरकी उष्णता शान्त हो गयी थी । इस प्रकार उनका जीवन शान्त हो जानेपर भूमिपर अचेत पड़ी हुई कौसल्याको अन्तःपुरकी उन सारी स्त्रियोंने मरी हुई नागिनके समान देखा ॥ २४ ॥।
ततः सर्वा नरेन्द्रस्य कैकेयीप्रमुखाः स्त्रियः ।
रुदन्त्यः शोकसंतप्ता निपेतुर्गतचेतनाः ॥ २५ ॥।
तदनन्तर पीछे आयी हुई महाराजकी कैकेयी आदि सारी रानियाँ शोकसे संतप्त होकर रोने लगीं और अचेत होकर गिर पड़ीं ॥ २५ ॥
ताभिः स बलवान् नादः क्रोशन्तीभिरनुद्भुतः ।
येन स्फीतीकृतो भूयस्तद् गृहं समनादयत् ॥ २६ ॥
उन क्रन्दन करती हुई रानियोंने वहाँ पहलेसे होनेवाले प्रबल आर्तनादको और भी बढ़ा दिया । उस बढ़े हुए आर्तनादसे वह सारा राजमहल पुनः बड़े जोरसे गूँज उठा ॥
तत् परित्रस्तसम्भ्रान्तपर्युत्सुकजनाकुलम् ।
सर्वतस्तुमुलाक्रन्दं परितापार्तबान्धवम् ॥ २७ ॥
सद्योनिपतितानन्दं दीनं विक्लवदर्शनम् ।. बभूव नरदेवस्य सद्म दिष्टान्तमीयुषः ॥ २८ ॥
कालधर्मको प्राप्त हुए राजा दशरथका वह भवन डरे, घबराये और अत्यन्त उत्सुक हुए मनुष्योंसे भर गया । सब ओर रोने - चिल्लानेका भयंकर शब्द होने लगा । वहाँ राजाके सभी बन्धु - बान्धव शोक - संतापसे पीड़ित होकर जुट गये । वह सारा भवन तत्काल आनन्दशून्य हो दीन-दुःखी एवं व्याकुल दिखायी देने लगा ॥ २७-२८ ॥ अतीतमाज्ञाय तु पार्थिवर्षभं यशस्विनं तं परिवार्य पत्नयः । भृशं रुदन्त्यः करुणं सुदुःखिताः प्रगृह्य बाहू व्यलपन्ननाथवत् ॥ २ ९ ॥ उन यशस्वी भूपालशिरोमणिको दिवङ्गत हुआ जान उनकी सारी पत्नियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर अत्यन्त दुःखी हो जोर - जोरसे रोने लगीं और उनकी दोनों बाँहें । पकड़कर अनाथकी भाँति करुण - विलाप करने लगीं ॥ २ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
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४२२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे षट्षष्टितमः सर्गः राजाके लिये कौसल्याका विलाप और कैकेयीकी भर्त्सना, मन्त्रियोंका राजाके शवको तेलसे भरे हुए कड़ाहमें सुलाना, रानियोंका विलाप, पुरीकी श्रीहीनता और
तमग्निमिव संशान्तमम्बुहीनमिवार्णवम् ।
गतप्रभमिवादित्यं स्वर्गस्थं प्रेक्ष्य भूमिपम् ॥ १ ॥
कौसल्या बाष्पपूर्णाक्षी विविधं शोककर्शिता ।
उपगृह्य शिरो राज्ञः कैकेयीं प्रत्यभाषत ॥ २ ॥
बुझी हुई आग, जलहीन समुद्र तथा प्रभाहीन सूर्यकी भाँति शोभाहीन हुए दिवङ्गत राजाका शव देखकर कौसल्याके नेत्रोंमें आँसू भर आये । वे अनेक प्रकारसे शोकाकुल होकर राजाके मस्तकको गोदमें ले कैकेयीसे इस प्रकार बोलीं- ॥ १-२ ॥
सकामा भव कैकेयी भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम् ।
त्यक्त्वा राजानमेकाग्रा नृशंसे दुष्टचारिणि ॥ ३ ॥
' दुराचारिणी क्रूर कैकेयी! ले, तेरी कामना सफल हुई । अब राजाको भी त्यागकर एकाग्रचित्त हो अपना अकण्टक राज्य भोग ॥ ३ ॥;
विहाय मां गतो रामो भर्ता च स्वर्गतो मम ।
विपथे सार्थहीनेव नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ४ ॥
' राम मुझे छोड़कर वनमें चले गये और मेरे स्वामी स्वर्ग सिधारे । अब मैं दुर्गम मार्गमें साथियोंसे बिछुड़कर असहाय हुई अबलाकी भाँति जीवित नहीं रह सकती ॥
भर्तारं तु परित्यज्य का स्त्री दैवतमात्मनः ।
इच्छेज्जीवितुमन्यत्र कैकेय्यास्त्यक्तधर्मणः ॥ ५ ॥
' नारीधर्मको त्याग देनेवाली कैकेयीके सिवा संसारमें दूसरी कौन ऐसी स्त्री होगी जो अपने लिये आराध्य देवस्वरूप पतिका परित्याग करके जीना चाहेगी? ॥ ५ ॥
न लुब्धो बुध्यते दोषान् किंपाकमिव भक्षयन् ।
कुब्जानिमित्तं कैकेय्या राघवाणां कुलं हतम् ॥ ६ ॥
' जैसे कोई धनका लोभी दूसरोंको विष खिला देता है और उससे होनेवाले हत्याके दोषोंपर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार इस कैकेयीने कुब्जाके कारण रघुवंशियोंके इस कुलका नाश कर डाला ॥ ६ ॥
अनियोगे नियुक्तेन राज्ञा रामं विवासितम् ।
सभार्यं जनकः श्रुत्वा परितप्स्यत्यहं यथा ॥ ७ ॥
' कैकेयीने महाराजको अयोग्य कार्यमें लगाकर उनके द्वारा पत्नीसहित श्रीरामको वनवास दिलवा दिया । यह समाचार जब राजा जनक सुनेंगे, तब मेरे ही समान । पुरवासियोंका शोक उनको भी बड़ा कष्ट होगा ॥ ७ ॥
स मामनाथां विधवां नाद्य जानाति धार्मिकः ।
रामः कमलपत्राक्षो जीवन्नाशमितो गतः ॥ ८ ॥
' मैं अनाथ और विधवा हो गयी - यह बात मेरे धर्मात्मा पुत्र कमलनयन श्रीरामको नहीं मालूम है । वे तो यहाँसे जीते - जी अदृश्य हो गये हैं ॥ ८ ॥
विदेहराजस्य सुता तथा चारुतपस्विनी ।
दुःखस्यानुचिता दुःखं वने पर्युद्विजिष्यति ॥ ९ ॥
‘ पति - सेवारूप मनोहर तप करनेवाली विदेहराजकुमारी सीता दुःख भोगनेके योग्य नहीं है । वह वनमें दुःखका अनुभव करके उद्विग्न हो उठेगी॥९ ॥
नदतां भीमघोषाणां निशासु मृगपक्षिणाम् ।
निशम्यमाना संत्रस्ता राघवं संश्रयिष्यति ॥ १० ॥
' रातके समय भयानक शब्द करनेवाले पशु-पक्षियोंकी बोली सुनकर भयभीत हो सीता श्रीरामकी ही शरण लेगी - उन्हींकी गोदमें जाकर छिपेगी ॥१० ॥
वृद्धश्चैवाल्पपुत्रश्च वैदेहीमनुचिन्तयन् ।
सोऽपि शोकसमाविष्टो नूनं त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ ११ ॥
' जो बूढ़े हो गये हैं, कन्याएँमात्र ही जिनकी संतति हैं, वे राजा जनक भी सीताकी ही बारम्बार चिन्ता करते हुए शोकमें डूबकर अवश्य ही अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ ११ ॥
साहमद्यैव दिष्टान्तं गमिष्यामि पतिव्रता ।
इदं शरीरमालिङ्ग्य प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ॥ १२ ॥
' मैं भी आज ही मृत्युका वरण करूँगी । एक पतिव्रताकी भाँति पतिके शरीरका आलिङ्गन करके चिताकी आगमें प्रवेश कर जाऊँगी ' ॥ १२ ॥
तां ततः सम्परिष्वज्य विलपन्तीं तपस्विनीम् ।
व्यपनिन्युः सुदुःखार्ता कौसल्यां व्यावहारिकाः ॥ १३ ॥
पतिके शरीरको हृदयसे लगाकर अत्यन्त दुःखसे आर्त हो करुण विलाप करती हुई तपस्विनी कौसल्याको राजकाज देखनेवाले मन्त्रियोंने दूसरी स्त्रियोंद्वारा वहाँसे हटवा दिया ॥ १३ ॥
तैलद्रोण्यां तदामात्याः संवेश्य जगतीपतिम् ।
राज्ञः सर्वाण्यथादिष्टाश्चक्रुः कर्माण्यनन्तरम् ॥ १४ ॥
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अयोध्याकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ४२३ फिर उन्होंने महाराजके शरीरको तेलसे भरी हुई । नावमें रखकर वसिष्ठ आदिकी आज्ञाके अनुसार शवकी रक्षा आदि अन्य सब राजकीय कार्योंकी सँभाल आरम्भ कर दी ॥ १४ ॥
न तु संकालनं राज्ञो विना पुत्रेण मन्त्रिणः ।
सर्वज्ञाः कर्तुमीषुस्ते ततो रक्षन्ति भूमिपम् ॥ १५ ॥
वे सर्वज्ञ मन्त्री पुत्रके बिना राजाका दाह - संस्कार न कर सके, इसलिये उनके शवकी रक्षा करने लगे ॥
तैलद्रोण्यां शायितं तं सचिवैस्तु नराधिपम् ।
हा मृतोऽयमिति ज्ञात्वा स्त्रियस्ताः पर्यदेवयन् ॥ १६ ॥
जब मन्त्रियोंने राजाके शवको तैलकी नावमें सुलाया, तब यह जानकर सारी रानियाँ ' हाय! ये महाराज परलोकवासी हो गये ' ऐसा कहती हुई पुनः विलाप करने लगीं ॥ १६ ॥
बाहूनुच्छ्रित्य कृपणा नेत्रप्रस्त्रवणैर्मुखैः ।
रुदत्यः शोकसंतप्ताः कृपणं पर्यदेवयन् ॥ १७ ॥
उनके मुखपर नेत्रोंसे आँसुओंके झरने झर रहे थे । वे अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर दीनभावसे रोने और शोकसंतप्त हो दयनीय विलाप करने लगीं ॥ १७ ॥
हा महाराज रामेण सततं प्रियवादिना ।
विहीनाः सत्यसंधेन किमर्थं विजहासि नः ॥ १८ ॥
वे बोलीं- ' हा महाराज! हम सत्यप्रतिज्ञ एवं सदा प्रिय बोलनेवाले अपने पुत्र श्रीरामसे तो बिछुड़ी ही थीं, अब आप भी क्यों हमारा परित्याग कर रहे हैं? ॥ १८ ॥
कैकेय्या दुष्टभावाया राघवेण विवर्जिताः ।
कथं सपल्या वत्स्यामः समीपे विधवा वयम् ॥ १ ९ ॥
' श्रीरामसे बिछुड़कर हम सब विधवाएँ इस दुष्ट विचारवाली सौत कैकेयीके समीप कैसे रहेंगी? ॥ १ ९ ॥
स हि नाथः स चास्माकं तव च प्रभुरात्मवान् ।
वनं रामो गतः श्रीमान् विहाय नृपतिश्रियम् ॥ २० ॥
' जो हमारे और आपके भी रक्षक और प्रभु थे, वे मनस्वी श्रीरामचन्द्र राजलक्ष्मीको छोड़कर वन चले गये ॥
त्वया तेन च वीरेण विना व्यसनमोहिताः ।
कथं वयं निवत्स्यामः कैकेय्या च विदूषिताः ॥ २१ ॥
' वीरवर श्रीराम और आपके भी न रहनेसे हमारे ऊपर बड़ा भारी संकट आ गया, जिससे हम मोहित हो रही हैं । अब सौत कैकेयीके द्वारा तिरस्कृत हो हम यहाँ कैसे रह सकेंगी? ॥ २१ ॥
यया च राजा रामश्च लक्ष्मणश्च महाबलः ।
सीतया सह संत्यक्ताः सा कमन्यं न हास्यति ॥ २२ ॥
' जिसने राजाका तथा सीतासहित श्रीराम और महाबली लक्ष्मणका भी परित्याग कर दिया, वह दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी? ॥ २२ ॥
ता बाष्पेण च संवीताः शोकेन विपुलेन च ।
व्यचेष्टन्त निरानन्दा राघवस्य वरस्त्रियः ॥ २३ ॥
रघुकुलनरेश दशरथकी वे सुन्दरी रानियाँ महान् शोकसे ग्रस्त हो आँसू बहाती हुई नाना प्रकारकी चेष्टाएँ
और विलाप कर रही थीं । उनका आनन्द लुट गया था ॥
निशा नक्षत्रहीनेव स्त्रीव भर्तृविवर्जिता ।
पुरी नाराजतायोध्या हीना राज्ञा महात्मना ॥ २४ ॥
महामना राजा दशरथसे हीन हुई वह अयोध्यापुरी नक्षत्रहीन रात्रि और पतिविहीना नारीकी भाँति श्रीहीन हो गयी थी ॥२४ ॥
बाष्पपर्याकुलजना हाहाभूतकुलाङ्गना ।
शून्यचत्वरवेश्मान्ता न बभ्राज यथापुरम् ॥ २५ ॥
नगरके सभी मनुष्य आँसू बहा रहे थे । कुलवती स्त्रियाँ हाहाकार कर रही थीं । चौराहे तथा घरोंके द्वार सूने दिखायी देते थे । ( वहाँ झाड़ - बुहार, लीपने - पोतने तथा बलि अर्पण करने आदिकी क्रियाएँ नहीं होती थीं । ) इस प्रकार वह पुरी पहलेकी भाँति शोभा नहीं पाती थी ॥ गते तु शोकात् त्रिदिवं नराधिपे महीतलस्थासु नृपाङ्गनासु च । निवृत्तचारः सहसा गतो रविः प्रवृत्तचारा रजनी ह्युपस्थिता ॥ २६ ॥
राजा दशरथ शोकवश स्वर्ग सिधारे और उनकी रानियाँ शोकसे ही भूतलपर लोटती रहीं । इस शोकमें ही सहसा सूर्यकी किरणोंका प्रचार बंद हो गया और सूर्यदेव अस्त हो गये । तत्पश्चात् अन्धकारका प्रचार करती हुई रात्रि उपस्थित हुई ॥ २६ ॥
ऋते तु पुत्राद् दहनं महीपते-नरोचयंस्ते सुहृदः समागताः । इतीव तस्मिन् शयने न्यवेशयन् विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम् ॥ २७ ॥
वहाँ पधारे हुए सुहृदोंने किसी भी पुत्रके बिना राजाका दाह - संस्कार होना नहीं पसंद किया । अब राजाका दर्शन अचिन्त्य हो गया, यह सोचते हुए उन सबने उस तैलपूर्ण कड़ाहमें उनके शवको सुरक्षित रख दिया ॥ २७ ॥
गतप्रभा द्यौरिव भास्करं विना व्यपेतनक्षत्रगणेव शर्वरी । पुरी बभासे रहिता महात्मना कण्ठास्त्रकण्ठाकुलमार्गचत्वरा ॥ २८ ॥
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४२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सूर्यके बिना प्रभाहीन आकाश तथा नक्षत्रोंके बिना । शोभाहीन रात्रिकी भाँति अयोध्यापुरी महात्मा राजा दशरथसे रहित हो श्रीहीन प्रतीत होती थी । उसकी सड़कों और चौराहोंपर आँसुओंसे अवरुद्ध कण्ठवाले मनुष्योंकी भीड़ एकत्र हो गयी थी ॥ २८ ॥
नराश्च नार्यश्च समेत्य संघशो विगर्हमाणा भरतस्य मातरम् । तदा नगर्यां नरदेवसंक्षये बभूवुरार्ता न च शर्म लेभिरे ॥ २ ९ ॥ झुंड - के - झुंड स्त्री और पुरुष एक साथ खड़े होकर भरत माता कैकेयीकी निन्दा करने लगे । उस समय महाराजकी मृत्युसे अयोध्यापुरीमें रहनेवाले सभी लोग शोकाकुल हो रहे थे । कोई भी शान्ति नहीं पाता था ॥ २ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
सप्तषष्टितमः सर्गः मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियोंका राजाके बिना होनेवाली देशकी दुरवस्थाका वर्णन करके वसिष्ठजीसे किसीको राजा बनानेके लिये अनुरोध
आक्रन्दिता निरानन्दा सास्त्रकण्ठजनाविला ।
अयोध्यायामवतता सा व्यतीयाय शर्वरी ॥ १ ॥
अयोध्यामें लोगोंकी वह रात रोते- कलपते ही बीती । उसमें आनन्दका नाम भी नहीं था । आँसुओंसे सब लोगोंके कण्ठ भरे हुए थे । दुःखके कारण वह रात सबको बड़ी लम्बी प्रतीत हुई थी ॥ १ ॥
व्यतीतायां तु शर्वर्यामादित्यस्योदये ततः ।
समेत्य राजकर्तारः सभामीयुर्द्विजातयः ॥ २ ॥
जब रात बीत गयी और सूर्योदय हुआ, तब राज्यका प्रबन्ध करनेवाले ब्राह्मणलोग एकत्र हो दरबारमें आये ॥ २ ॥
मार्कण्डेयोऽथ मौद्गल्यो वामदेवश्च कश्यपः ।
कात्यायनो गौतमश्च जाबालिश्च महायशाः ॥ ३ ॥
एते द्विजाः सहामात्यैः पृथग्वाचमुदीरयन् ।
वसिष्ठमेवाभिमुखाः श्रेष्ठं राजपुरोहितम् ॥ ४ ॥
मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन, गौतम और महायशस्वी जाबालि - ये सभी ब्राह्मणश्रेष्ठ राजपुरोहित वसिष्ठजीके सामने बैठकर मन्त्रियोंके साथ अपनी अलग- अलग राय देने लगे ॥ ३-४ ॥
अतीता शर्वरी दुःखं या नो वर्षशतोपमा ।
अस्मिन् पञ्चत्वमापन्ने पुत्रशोकेन पार्थिवे ॥ ५ ॥
वे बोले – ‘ पुत्रशोकसे इन महाराजके स्वर्गवासी होनेके कारण यह रात बड़े दुःखसे बीती है, जो हमारे लिये सौ वर्षोंके समान प्रतीत हुई थी ॥ ५ ॥
स्वर्गस्थश्च महाराजो रामश्चारण्यमाश्रितः ।
लक्ष्मणश्चापि तेजस्वी रामेणैव गतः सह ॥ ६ ॥
' महाराज दशरथ स्वर्ग सिधारे । श्रीरामचन्द्रजी वनमें रहने लगे और तेजस्वी लक्ष्मण भी श्रीरामके साथ ही चले गये ॥ ६ ॥
उभौ भरतशत्रुघ्न केकयेषु परंतपौ ।
पुरे राजगृहे रम्ये मातामहनिवेशने ॥ ७ ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न केकयदेशके रमणीय राजगृहमें नानाके घरमें निवास करते हैं ॥ ७ ॥
इक्ष्वाकूणामिहाद्यैव कश्चिद् राजा विधीयताम् ।
अराजकं हि नो राष्ट्रं विनाशं समवाप्नुयात् ॥ ८ ॥
' इक्ष्वाकुवंशी राजकुमारोंमेंसे किसीको आज ही यहाँका राजा बनाया जाय; क्योंकि राजाके बिना हमारे इस राज्यका नाश हो जायगा ॥ ८ ॥
नाराजके जनपदे विद्युन्माली महास्वनः ।
अभिवर्षति पर्जन्यो महीं दिव्येन वारिणा ॥ ९ ॥
' जहाँ कोई राजा नहीं होता, ऐसे जनपदमें विद्युन्मालाओंसे अलंकृत महान् गर्जन करनेवाला मेघ पृथ्वीपर दिव्य जलकी वर्षा नहीं करता है॥९॥
नाराजके जनपदे बीजमुष्टिः प्रकीर्यते ।
नाराजके पितुः पुत्रो भार्या वा वर्तते वशे ॥ १० ॥
' जिस जनपदमें कोई राजा नहीं, वहाँके खेतोंमें मुट्ठी - के - मुट्ठी बीज नहीं बिखेरे जाते । राजासे रहित देशमें पुत्र पिता और स्त्री पतिके वशमें नहीं रहती ॥ १० ॥
अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके ।
इदमत्याहितं चान्यत् कुतः सत्यमराजके ॥ ११ ॥
' राजहीन देशमें धन अपना नहीं होता है । बिना
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अयोध्याकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ४२५ राजाके राज्यमें पत्नी भी अपनी नहीं रह पाती है । । राजारहित देशमें यह महान् भय बना रहता है । ( जब वहाँ पति - पत्नी आदिका सत्य सम्बन्ध नहीं रह सकता, ) तब फिर दूसरा कोई सत्य कैसे रह सकता है? ॥ ११ ॥
नाराजके जनपदे कारयन्ति सभां नराः ।
उद्यानानि च रम्याणि हृष्टाः पुण्यगृहाणि च ॥ १२ ॥
' बिना राजाके राज्यमें मनुष्य कोई पञ्चायत - भवन नहीं बनवाते, रमणीय उद्यानका भी निर्माण नहीं करवाते तथा हर्ष और उत्साहके साथ पुण्यगृह ( धर्मशाला, मन्दिर आदि ) भी नहीं बनवाते हैं ॥ १२ ॥
नाराजके जनपदे यज्ञशीला द्विजातयः ।
सत्राण्यन्वासते दान्ता ब्राह्मणः संशितव्रताः ॥ १३ ॥
' जहाँ कोई राजा नहीं, उस जनपदमें स्वभावतः यज्ञ करनेवाले द्विज और कठोर व्रतका पालन करनेवाले जितेन्द्रिय ब्राह्मण उन बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं करते, जिनमें सभी ऋत्विज् और सभी यजमान होते हैं ॥
नाराजके जनपदे महायज्ञेषु यज्वनः ।
ब्राह्मणा वसुसम्पूर्णा विसृजन्त्याप्तदक्षिणाः ॥ १४ ॥
' राजारहित जनपदमें कदाचित् महायज्ञोंका आरम्भ हो भी तो उनमें धनसम्पन्न ब्राह्मण भी ऋत्विजोंको पर्याप्त दक्षिणा नहीं देते ( उन्हें भय रहता है कि लोग हमें धनी समझकर लूट न लें ) ॥ १४ ॥
नाराज जनपदे प्रहृष्टनटनर्तकाः ।
उत्सवाश्च समाजाश्च वर्धन्ते राष्ट्रवर्धनाः ॥ १५ ॥
' अराजक देशमें राष्ट्रको उन्नतिशील बनानेवाले उत्सव, जिनमें नट और नर्तक हर्षमें भरकर अपनी कलाका प्रदर्शन करते हैं, बढ़ने नहीं पाते हैं तथा दूसरे -दूसरे राष्ट्रहितकारी संघ भी नहीं पनपने पाते हैं ॥ १५ ॥
नाराजके जनपदे सिद्धार्था व्यवहारिणः ।
कथाभिरभिरज्यन्ते कथाशीलाः कथाप्रियैः ॥ १६ ॥
‘ बिना राजाके राज्यमें वादी और प्रतिवादीके विवादका संतोषजनक निपटारा नहीं हो पाता अथवा व्यापारियोंको लाभ नहीं होता । कथा सुननेकी इच्छावाले लोग कथावाचक पौराणिकोंकी कथाओंसे प्रसन्न नहीं होते ॥
नाराजके जनपदे तूद्यानानि समागताः ।
सायाह्ने क्रीडितुं यान्ति कुमार्यो हेमभूषिताः ॥ १७ ॥
' राजारहित जनपदमें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुई कुमारियाँ एक साथ मिलकर संध्याके समय उद्यानों में क्रीड़ा करनेके लिये नहीं जाती हैं ॥ १७ ॥
नाराजके जनपदे धनवन्तः सुरक्षिताः ।
शेरते विवृतद्वाराः कृषिगोरक्षजीविनः ॥ १८ ॥
' बिना राजाके राज्यमें धनीलोग सुरक्षित नहीं रह पाते तथा कृषि और गोरक्षासे जीवन - निर्वाह करनेवाले वैश्य भी दरवाजा खोलकर नहीं सो पाते हैं ॥ १८ ॥
नाराजके जनपदे वाहनैः शीघ्रवाहिभिः ।
नरा निर्यान्त्यरण्यानि नारीभिः सह कामिनः ॥ १ ९ ॥
' राजासे रहित जनपदमें कामी मनुष्य नारियोंके साथ शीघ्रगामी वाहनोंद्वारा वनविहारके लिये नहीं निकलते हैं ॥ १ ९ ॥
नाराजके जनपदे बद्धघण्टा विषाणिनः ।
अटन्ति राजमार्गेषु कुञ्जराः षष्टिहायनाः ॥ २० ॥
' जहाँ कोई राजा नहीं होता, उस जनपदमें साठ वर्षके दन्तार हाथी घंटे बाँधकर सड़कोंपर नहीं घूमते हैं ॥ २० ॥
नाराजके जनपदे शरान् संततमस्यताम् ।
श्रूयते तलनिर्घोष इष्वस्त्राणामुपासने ॥ २१ ॥
' बिना राजाके राज्यमें धनुर्विद्याके अभ्यासकालमें निरन्तर लक्ष्यकी ओर बाण चलानेवाले वीरोंकी प्रत्यञ्चा तथा करतलका शब्द नहीं सुनायी देता है ॥ २१ ॥
नाराजके जनपदे वणिजो दूरगामिनः ।
गच्छन्ति क्षेममध्वानं बहुपण्यसमाचिताः ॥ २२ ॥
' राजासे रहित जनपदमें दूर जाकर व्यापार करनेवाले वणिक् बेचनेकी बहुत - सी वस्तुएँ साथ लेकर कुशलपूर्वक मार्ग तै नहीं कर सकते ॥२२ ॥
नाराजके जनपदे चरत्येकचरो वशी ।
भावयन्नात्मनाऽऽत्मानं यत्र सायं गृहो मुनिः ॥ २३ ॥
' जहाँ कोई राजा नहीं होता, उस जनपदमें जहाँ संध्या हो वहीं डेरा डाल देनेवाला, अपने अन्तःकरणके द्वारा परमात्माका ध्यान करनेवाला और अकेला ही विचरनेवाला जितेन्द्रिय मुनि नहीं घूमता - फिरता है ( क्योंकि उसे कोई भोजन देनेवाला नहीं होता ) ॥ २३ ॥
नाराजके जनपदे योगक्षेमः प्रवर्तते ।
न चाप्यराजके सेना शत्रून् विषहते युधि ॥ २४ ॥
' अराजक देशमें लोगोंको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति । और प्राप्त वस्तुकी रक्षा नहीं हो पाती । राजाके न रहनेपर सेना भी युद्धमें शत्रुओंका सामना नहीं करती ॥ २४ ॥
नाराजके जनपदे हृष्टैः परमवाजिभिः ।
नराः संयान्ति सहसा रथैश्च प्रतिमण्डिताः ॥ २५ ॥
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४२६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' बिना राजाके राज्यमें लोग वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो हृष्ट - पुष्ट उत्तम घोड़ों तथा रथद्वारा सहसा यात्रा नहीं करते हैं ( क्योंकि उन्हें लुटेरोंका भय बना रहता है ) ॥
नाराजके जनपदे नराः शास्त्रविशारदाः ।
संवदन्तोपतिष्ठन्ते वनेषूपवनेषु वा ॥ २६ ॥
' राजासे रहित राज्यमें शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान् मनुष्य वनों और उपवनोंमें शास्त्रोंकी व्याख्या करते हुए नहीं ठहर पाते हैं ॥ २६ ॥
नाराजके जनपदे माल्यमोदकदक्षिणाः ।
देवताभ्यर्चनार्थाय कल्प्यन्ते नियतैर्जनैः ॥ २७ ॥
' जहाँ अराजकता फैल जाती है, उस जनपदमें मनको वशमें रखनेवाले लोग देवताओंकी पूजाके लिये फूल, मिठाई और दक्षिणाकी व्यवस्था नहीं करते हैं ॥ २७ ॥
नाराजके जनपदे चन्दनागुरुरूषिताः ।
राजपुत्रा विराजन्ते वसन्ते इव शाखिनः ॥ २८ ॥
' जिस जनपदमें कोई राजा नहीं होता है, वहाँ चन्दन और अगुरुका लेप लगाये हुए राजकुमार वसन्त ऋतुके खिले हुए वृक्षोंकी भाँति शोभा नहीं पाते हैं ॥ २८ ॥
यथा ह्यनुदका नद्यो यथा वाप्यतृणं वनम् ।
अगोपाला यथा गावस्तथा राष्ट्रमराजकम् ॥ २ ९ ॥
' जैसे जलके बिना नदियाँ, घासके बिना वन और ग्वालोंके बिना गौओंकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार राजाके बिना राज्य शोभा नहीं पाता है ॥ २ ९ ॥
ध्वजो रथस्य प्रज्ञानं धूमो ज्ञानं विभावसोः ।
तेषां यो नो ध्वजो राजा स देवत्वमितो गतः ॥ ३० ॥
' जैसे ध्वज रथका ज्ञान कराता है और धूम अग्रिका बोधक होता है, उसी प्रकार राजकाज देखनेवाले हमलोगोंके अधिकारको प्रकाशित करनेवाले जो महाराज थे, वे यहाँसे देवलोकको चले गये ॥३० ॥
नाराजके जनपदे स्वकं भवति कस्यचित् ।
मत्स्या इव जना नित्यं भक्षयन्ति परस्परम् ॥ ३१ ॥
' राजाके न रहनेपर राज्यमें किसी भी मनुष्यकी कोई भी वस्तु अपनी नहीं रह जाती । जैसे मत्स्य एक - दूसरेको खा जाते हैं, उसी प्रकार अराजक देशके लोग सदा एक - दूसरेको खाते - लूटते - खसोटते रहते हैं ॥ ३१ ॥
ये हि सम्भिन्नमर्यादा नास्तिकारिछन्नसंशयाः ।
तेऽपि भावाय कल्पन्ते राजदण्डनिपीडिताः ॥ ३२ ॥
‘ जो वेद - शास्त्रोंकी तथा अपनी - अपनी जातिके लिये नियत वर्णाश्रमकी मर्यादाको भङ्ग करनेवाले नास्तिक मनुष्य पहले राजदण्डसे पीड़ित होकर दबे रहते थे, वे भी अब राजाके न रहनेसे निःशङ्क होकर अपना प्रभुत्व प्रकट करेंगे ॥ ३२ ॥
यथा दृष्टिः शरीरस्य नित्यमेव प्रवर्तते ।
तथा नरेन्द्रो राष्ट्रस्य प्रभवः सत्यधर्मयोः ॥ ३३ ॥
' जैसे दृष्टि सदा ही शरीरके हितमें प्रवृत्त रहती है, उसी प्रकार राजा राज्यके भीतर सत्य और धर्मका प्रवर्त्तक होता है ॥ ३३ ॥
राजा सत्यं च धर्मश्च राजा कुलवतां कुलम् ।
राजा माता पिता चैव राजा हितकरो नृणाम् ॥ ३४ ॥
' राजा ही सत्य और धर्म है । राजा ही कुलवानोंका कुल है । राजा ही माता और पिता है तथा राजा ही मनुष्योंका हित करनेवाला है ॥ ३४ ॥
यमो वैश्रवणः शक्रो वरुणश्च महाबलः ।
विशिष्यन्ते नरेन्द्रेण वृत्तेन महता ततः ॥ ३५ ॥
' राजा अपने महान् चरित्रके द्वारा यम, कुबेर, इन्द्र और महाबली वरुणसे भी बढ़ जाते हैं ( यमराज केवल दण्ड देते हैं, कुबेर केवल धन देते हैं, इन्द्र केवल पालन करते हैं और वरुण केवल सदाचारमें नियन्त्रित करते हैं; परंतु एक श्रेष्ठ राजामें ये चारों गुण मौजूद होते हैं । अतः वह इनसे बढ़ जाता है ) ॥ ३५ ॥
अहो तम इवेदं स्यान्न प्रज्ञायेत किंचन ।
राजा चेन्न भवेल्लोके विभजन् साध्वसाधुनी ॥ ३६ ॥
' यदि संसारमें भले - बुरेका विभाग करनेवाला राजा न हो तो यह सारा जगत् अन्धकारसे आच्छन्न-सा हो जाय, कुछ भी सूझ न पड़े ॥ ३६ ॥
जीवत्यपि महाराजे तवैव वचनं वयम् ।
नातिक्रमामहे सर्वे बेलां प्राप्येव सागरः ॥ ३७ ॥
‘ वसिष्ठजी! जैसे उमड़ता हुआ समुद्र अपनी तटभूमितक पहुँचकर उससे आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार हम सब लोग महाराजके जीवनकालमें भी केवल आपकी ही बातका उल्लङ्घन नहीं करते थे ॥३७ ॥
स नः समीक्ष्य द्विजवर्य वृत्तं नृपं विना राष्ट्रमरण्यभूतम् । कुमारमिक्ष्वाकुसुतं तथान्यं त्वमेव राजानमिहाभिषेचय ॥ ३८ ॥
' अतः विप्रवर! इस समय हमारे व्यवहारको
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अयोध्याकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः ४२७ देखकर तथा राजाके अभावमें जंगल बने हुए इस | राजकुमारको अथवा दूसरे किसी योग्य पुरुषको राजाके
देशपर दृष्टिपात करके आप ही किसी इक्ष्वाकुवंशी । पदपर अभिषिक्त कीजिये ॥ ३८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
अष्टषष्टितमः सर्गः वसिष्ठजीकी आज्ञासे पाँच दूतोंका अयोध्यासे केकयदेशके राजगृह नगरमें जाना
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठः प्रत्युवाच ह ।
मित्रामात्यजनान् सर्वान् ब्राह्मणांस्तानिदं वचः ॥ १ ॥
मार्कण्डेय आदिके ऐसे वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने मित्रों, मन्त्रियों और उन समस्त ब्राह्मणोंको इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १ ॥
यदसौ मातुलकुले दत्तराज्यः परं सुखी ।
भरतो वसति भ्रात्रा शत्रुघ्नेन मुदान्वितः ॥ २ ॥
' राजा दशरथने जिनको राज्य दिया है, वे भरत इस समय अपने भाई शत्रुघ्नके साथ मामाके यहाँ बड़े सुख और प्रसन्नताके साथ निवास करते हैं ॥ २ ॥
तच्छीघ्रं जवना दूता गच्छन्तु त्वरितं हयैः ।
आनेतुं भ्रातरौ वीरौ किं समीक्षामहे वयम् ॥ ३ ॥
' उन दोनों वीर बन्धुओंको बुलानेके लिये शीघ्र ही तेज चलनेवाले दूत घोड़ोंपर सवार होकर यहाँसे जायँ, इसके सिवा हमलोग और क्या विचार कर सकते हैं? ' ॥ ३ ॥
गच्छन्त्विति ततः सर्वे वसिष्ठं वाक्यमब्रुवन् ।
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥४ ॥
इसपर सबने वसिष्ठजीसे कहा - - ' ' हाँ, दूत अवश्य भेजे जायँ । ' उनका वह कथन सुनकर वसिष्ठजीने दूतोंको सम्बोधित करके कहा —॥४ ॥
एहि सिद्धार्थ विजय जयन्ताशोकनन्दन ।
श्रूयतामितिकर्तव्यं सर्वानेव ब्रवीमि वः ॥ ५ ॥
‘ सिद्धार्थ! विजय! जयन्त! अशोक! और नन्दन! तुम सब यहाँ आओ और तुम्हें जो काम करना है, उसे सुनो । मैं तुम सब लोगोंसे ही कहता हूँ ॥५ ॥
पुरं राजगृहं गत्वा शीघ्रं शीघ्रजवैर्हयैः ।
त्यक्तशोकैरिदं वाच्यः शासनाद् भरतो मम ॥ ६ ॥
' तुमलोग शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर तुरंत ही राजगृह नगरको जाओ और शोकका भाव न प्रकट करते हुए मेरी आज्ञाके अनुसार भरतसे इस प्रकार कहो ॥ ६ ॥
पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे च मन्त्रिणः ।
त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया ॥ ७ ॥
' कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियोंने आपसे कुशल- मङ्गल कहा है । अब आप यहाँसे शीघ्र ही चलिये । अयोध्यामें आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है ॥
मा चास्मै प्रोषितं रामं मा चास्मै पितरं मृतम् ।
भवन्तः शंसिषुर्गत्वा राघवाणामितः क्षयम् ॥ ८ ॥
' भरतको श्रीरामचन्द्रके वनवास और पिताकी मृत्युका हाल मत बतलाना और इन परिस्थितियोंके कारण रघुवंशियोंके यहाँ जो कुहराम मचा हुआ है, इसकी चर्चा भी न करना ॥८ ॥
कौशेयानि च वस्त्राणि भूषणानि वराणि च ।
क्षिप्रमादाय राज्ञश्च भरतस्य च गच्छत ॥ ९ ॥
' केकयराज तथा भरतको भेंट देनेके लिये रेशमी वस्त्र और उत्तम आभूषण लेकर तुमलोग यहाँसे शीघ्र चल दो ' ॥
दत्तपथ्यशना दूता जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम् ।
केकयांस्ते गमिष्यन्तो हयानारुह्य सम्मतान् ॥ १० ॥
केकय देशको जानेवाले वे दूत रास्तेका खर्च ले अच्छे घोड़ोंपर सवार हो अपने - अपने घरको गये ॥ १० ॥
ततः प्रास्थानिकं कृत्वा कार्यशेषमनन्तरम् ।
वसिष्ठेनाभ्यनुज्ञाता दूताः संत्वरितं ययुः ॥ ११ ॥
तदनन्तर यात्रासम्बन्धी शेष तैयारी पूरी करके वसिष्ठजीकी आज्ञा ले सभी दूत तुरंत वहाँसे प्रस्थित हो गये ॥ ११ ॥
न्यन्तेनापरतालस्य प्रलम्बस्योत्तरं प्रति ।
निषेवमाणास्ते जग्मुर्नदीं मध्येन मालिनीम् ॥१२ ॥
अपरताल नामक पर्वतके अन्तिम छोर अर्थात् दक्षिण भाग और प्रलम्बगिरिके उत्तरभागमें दोनों पर्वतोंके बीचसे बहनेवाली मालिनी नदीके तटपर होते हुए वे दूत | आगे बढ़े ॥१२ ॥
ते हास्तिनपुरे गङ्गां तीर्त्वा प्रत्यङ्मुखा ययुः ।
पाञ्चालदेशमासाद्य मध्येन कुरुजाङ्गलम् ॥ १३ ॥
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४२८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे हस्तिनापुरमें गङ्गाको पार करके वे पश्चिमकी ओर । गये और पाञ्चालदेशमें पहुँचकर कुरुजाङ्गल प्रदेशके बीचसे होते हुए आगे बढ़ गये ॥ १३ ॥
सरांसि च सुफुल्लानि नदीश्च विमलोदकाः ।
निरीक्षमाणा जग्मुस्ते दूताः कार्यवशादद्भुतम् ॥ १४ ॥
मार्गमें सुन्दर फूलोंसे सुशोभित सरोवरों तथा निर्मल जलवाली नदियोंका दर्शन करते हुए वे दूत कार्यवश तीव्र- गतिसे आगे बढ़ते गये ॥ १४ ॥
ते प्रसन्नोदकां दिव्यां नानाविहगसेविताम् ।
उपातिजग्मुर्वेगेन शरदण्डां जलाकुलाम् ॥ १५ ॥
तदनन्तर वे स्वच्छ जलसे सुशोभित, पानीसे भरी हुई और भाँति - भाँतिके पक्षियोंसे सेवित दिव्य नदी शरदण्डाके तटपर पहुँचकर उसे वेगपूर्वक लाँघ गये ॥ १५ ॥
निकूलवृक्षमासाद्य दिव्यं सत्योपयाचनम् ।
अभिगम्याभिवाद्यं तं कुलिङ्गां प्राविशन् पुरीम् ॥ १६ ॥
शरदण्डाके पश्चिमतटपर एक दिव्य वृक्ष था, जिसपर किसी देवताका आवास था; इसीलिये वहाँ जो याचना की जाती थी, वह सत्य ( सफल ) होती थी, अतः उसका नाम सत्योपयाचन हो गया था । उस वन्दनीय वृक्षके निकट पहुँचकर दूतोंने उसकी परिक्रमा की और वहाँसे आगे जाकर उन्होंने कुलिङ्गा नामक पुरीमें प्रवेश किया ॥
अभिकालं ततः प्राप्य तेजोऽभिभवनाच्च्युताः ।
पितृपैतामहीं पुण्यां तेरुरिक्षुमतीं नदीम् ॥ १७ ॥
वहाँसे तेजोऽभिभवन नामक गाँवको पार करते हुए वे अभिकाल नामक गाँवमें पहुँचे और वहाँसे आगे बढ़ने पर उन्होंने राजा दशरथके पिता - पितामहोंद्वारा सेवित पुण्यसलिला इक्षुमती नदीको पार किया ॥ १७ ॥
अवेक्ष्याञ्जलिपानांश्च ब्राह्मणान् वेदपारगान् ।
ययुर्मध्येन बाह्लीकान् सुदामानं च पर्वतम् ॥ १८ ॥
वहाँ केवल अञ्जलि भर जल पीकर तपस्या करनेवाले वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंका दर्शन करके वे दूत बाह्लीक देशके मध्यभागमें स्थित सुदामा नामक पर्वतके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥
विष्णोः पदं प्रेक्ष्यमाणा विपाशां चापि शाल्मलीम् ।
नदीर्वापीतटाकानि पल्वलानि सरांसि च ॥१ ९ ॥
पश्यन्तो विविधांश्चापि सिंहान् व्याघ्रान् मृगान् द्विपान् ।
ययुः पथातिमहता शासनं भर्तुरीप्सवः ॥ २० ॥
उस पर्वतके शिखरपर स्थित भगवान् विष्णुके चरणचिह्नका दर्शन करके वे विपाशा ( व्यास ) नदी और उसके तटवर्ती शाल्मली वृक्षके निकट गये । वहाँसे आगे बढ़ने पर बहुत - सी नदियों, बावड़ियों, पोखरों, छोटे तालाबों, सरोवरों तथा भाँति - भाँतिके वनजन्तुओं – सिंह, व्याघ्र, मृग और हाथियोंका दर्शन करते हुए वे दूत अत्यन्त विशाल मार्गके द्वारा आगे बढ़ने लगे । वे अपने स्वामीकी आज्ञाका शीघ्र पालन करनेकी इच्छा रखते थे ॥ १ ९ -२० ॥
ते श्रान्तवाहना दूता विकृष्टेन सता पथा ।
गिरिव्रजं पुरवरं शीघ्रमासेदुरञ्जसा ॥ २१ ॥
उन दूतोंके वाहन ( घोड़े ) चलते - चलते थक गये थे । वह मार्ग बड़ी दूरका होनेपर उपद्रवसे रहित था । उसे तै करके सारे दूत शीघ्र ही बिना किसी कष्टके श्रेष्ठ नगर गिरिव्रजमें जा पहुँचे ॥ २१ ॥
भर्तुः प्रियार्थं कुलरक्षणार्थं भर्तुश्च वंशस्य परिग्रहार्थम् । अहेडमानास्त्वरया स्म दूता रात्र्यां तु ते तत्पुरमेव याताः ॥२२ ॥
अपने स्वामी ( आज्ञा देनेवाले वसिष्ठजी ) का प्रिय और प्रजावर्गकी रक्षा करने तथा महाराज दशरथके वंशपरम्परागत राज्यको भरतजीसे स्वीकार करानेके लिये सादर तत्पर हुए वे दूत बड़ी उतावलीके साथ । चलकर रातमें ही उस नगरमें जा पहुँचे ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
एकोनसप्ततितमः सर्गः भरतकी चिन्ता, मित्रोंद्वारा उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयास तथा उनके पूछनेपर भरतका मित्रोंके समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्नका वर्णन करना यामेव रात्रिं ते दूताः प्रविशन्ति स्म तां पुरीम् । उससे पहली रातमें भरतने भी एक अप्रिय स्वप्न देखा था || भरतेनापि तां रात्रिं स्वप्नो दृष्टोऽयमप्रियः ॥ १ ॥ व्युष्टामेव तु तां रात्रिं दृष्ट्वा तं स्वप्नमप्रियम् ।
जिस रातमें दूतोंने उस नगरमें प्रवेश किया था, पुत्रौ राजाधिराजस्य सुभृशं पर्यतप्यत ॥ २ ॥