श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 411–420

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 411 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः ३ ९९ आँसुओंके कारण उनसे बोला नहीं गया और वे शोकसे | ततस्तमन्तःपुरनादमुत्थितं व्याकुल होकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ३२ ॥ समीक्ष्य वृद्धास्तरुणाश्च मानवाः ।

विलपन्तीं तथा दृष्ट्वा कौसल्यां पतितां भुवि । स्त्रियश्च सर्वा रुरुदुः समन्ततः पतिं चावेक्ष्य ताः सर्वाः समन्ताद् रुरुदुः स्त्रियः ॥ ३३ ॥ पुरं तदासीत् पुनरेव संकुलम् ॥ ३४ ॥

इस प्रकार विलाप करती हुई कौसल्याको अन्तःपुरसे उठे हुए उस आर्तनादको देख - सुनकर भूमिपर पड़ी देख और अपने पतिकी मूच्छित दशापर नगरके बूढ़े और जवान पुरुष रो पड़े । सारी स्त्रियाँ भी दृष्टिपात करके सभी रानियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर रोने लगीं । वह सारा नगर उस समय सब ओरसे पुनः

रोने लगीं ॥३३ ॥ । शोकसे व्याकुल हो उठा ॥३४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५७ ॥

अष्टपञ्चाशः सर्गः महाराज दशरथकी आज्ञासे सुमन्त्रका

प्रत्याश्वस्तो यदा राजा मोहात् प्रत्यागतस्मृतिः ।

तदाजुहाव तं सूतं रामवृत्तान्तकारणात् ॥ १ ॥

मूर्च्छा दूर होनेपर जब राजाको चेत हुआ तब सुस्थिर चित्त होकर उन्होंने श्रीरामका वृत्तान्त सुननेके लिये सारथि सुमन्त्रको सामने बुलाया ॥१ ॥

तदा सूतो महाराजं कृताञ्जलिरुपस्थितः ।

राममेवानुशोचन्तं दुःखशोकसमन्वितम् ॥ २ ॥

उस समय सुमन्त्र श्रीरामके ही शोक और चिन्तामें निरन्तर डूबे रहनेवाले दुःख - शोकसे व्याकुल महाराज दशरथके पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ २ ॥

वृद्धं परमसंतप्तं नवग्रहमिव द्विपम् ।

विनिःश्वसन्तं ध्यायन्तमस्वस्थमिव कुञ्जरम् ॥ ३ ॥

राजा तु रजसा सूतं ध्वस्ताङ्गं समुपस्थितम् ।

अश्रुपूर्णमुखं दीनमुवाच परमार्तवत् ॥ ४ ॥

जैसे जंगलसे तुरंत पकड़कर लाया हुआ हाथी अपने यूथपति गजराजका चिन्तन करके लंबी साँस खींचता और अत्यन्त संतप्त तथा अस्वस्थ हो जाता है, उसी प्रकार बूढ़े राजा दशरथ श्रीरामके लिये अत्यन्त संतप्त हो लंबी साँस खींचकर उन्हींका ध्यान करते हुए अस्वस्थ - से हो गये थे । राजाने देखा, सारथिका सारा शरीर धूलसे भर गया है । यह सामने खड़ा है । इसके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही है और यह अत्यन्त दीन दिखायी देता है । उस अवस्थामें राजाने अत्यन्त आर्त होकर उससे पूछा- ॥

क्व नु वत्स्यति धर्मात्मा वृक्षमूलमुपाश्रितः ।

सोऽत्यन्तसुखितः सूत किमशिष्यति राघवः ॥ ५ ॥

' सूत! धर्मात्मा श्रीराम वृक्षकी जड़का सहारा ले श्रीराम और लक्ष्मणके संदेश सुनाना कहाँ निवास करेंगे? जो अत्यन्त सुखमें पले थे, वे मेरे लाड़ले राम वहाँ क्या खायेंगे? ॥ ५ ॥

दुःखस्यानुचितो दुःखं सुमन्त्र शयनोचितः ।

भूमिपालात्मजो भूमौ शेते कथमनाथवत् ॥ ६ ॥

' सुमन्त्र! जो दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन्हीं श्रीरामको भारी दुःख प्राप्त हुआ है । जो राजोचित शय्यापर शयन करनेयोग्य हैं, वे राजकुमार श्रीराम अनाथकी भाँति भूमिपर कैसे सोते होंगे? ॥ ६ ॥

यं यान्तमनुयान्ति स्म पदातिरथकुञ्जराः ।

स वत्स्यति कथं रामो विजनं वनमाश्रितः ॥ ७ ॥

' जिनके यात्रा करते समय पीछे - पीछे पैदलों, रथियों और हाथीसवारोंकी सेना चलती थी, वे ही श्रीराम निर्जन वनमें पहुँचकर वहाँ कैसे निवास करेंगे? ॥

व्यालैर्मृगैराचरितं कृष्णसर्पनिषेवितम् ।

कथं कुमारौ वैदेह्या सार्धं वनमुपाश्रितौ ॥ ८ ॥

' जहाँ अजगर और व्याघ्र - सिंह आदि हिंसक पशु विचरते हैं तथा काले सर्प जिसका सेवन करते हैं, उसी वनका आश्रय लेनेवाले मेरे दोनों कुमार सीताके साथ वहाँ कैसे रहेंगे? ॥ ८ ॥

सुकुमार्या तपस्विन्या सुमन्त्र सह सीतया ।

राजपुत्रौ कथं पादैरवरुह्य रथाद् गतौ ॥९ ॥

' सुमन्त्र! परम सुकुमारी तपस्विनी सीताके साथ वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण रथसे उतरकर पैदल कैसे गये होंगे? ॥ ९ ॥

सिद्धार्थः खलु सूत त्वं येन दृष्टौ ममात्मजौ ।

। वनान्तं प्रविशन्तौ तावश्विनाविव मन्दरम् ॥१० ॥

पृष्ठ 412

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 412 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' सारथे! तुम कृतकृत्य हो गये; क्योंकि जैसे दोनों अश्विनीकुमार मन्दराचलके वनमें जाते हैं, उसी प्रकार वनके भीतर प्रवेश करते हुए मेरे दोनों पुत्रोंको तुमने अपनी आँखोंसे देखा है ॥ १० ॥

किमुवाच वचो रामः किमुवाच च लक्ष्मणः ।

सुमन्त्र वनमासाद्य किमुवाच च मैथिली ॥ ११ ॥

' सुमन्त्र! वनमें पहुँचकर श्रीरामने तुमसे क्या कहा? लक्ष्मणने भी क्या कहा? तथा मिथिलेशकुमारी सीताने क्या संदेश दिया? ॥ ११ ॥

आसितं शयितं भुक्तं सूत रामस्य कीर्तय ।

जीविष्याम्ययमेतेन ययातिरिव साधुषु ॥ १२ ॥

' सूत! तुम श्रीरामके बैठने, सोने और खाने-पीनेसे सम्बन्ध रखनेवाली बातें बताओ । जैसे स्वर्गसे गिरे हुए राजा ययाति सत्पुरुषोंके बीचमें उपस्थित होनेपर सत्संगके प्रभावसे पुनः सुखी हो गये थे, उसी प्रकार तुम - जैसे साधुपुरुषके मुखसे पुत्रका वृत्तान्त सुननेसे मैं सुखपूर्वक जीवन धारण कर सकूँगा ' ॥ १२ ॥

इति सूतो नरेन्द्रेण चोदितः सज्जमानया ।

उवाच वाचा राजानं स बाष्पपरिबद्धया ॥ १३ ॥

महाराजके इस प्रकार पूछनेपर सारथि सुमन्त्रने आँसुओंसे रुँधी हुई गद्गद वाणीद्वारा उनसे कहा- ॥

अब्रवीन्मे महाराज धर्ममेवानुपालयन् ।

अञ्जलिं राघवः कृत्वा शिरसाभिप्रणम्य च ॥ १४॥ ।

सूत मद्वचनात् तस्य तातस्य विदितात्मनः ।

शिरसा वन्दनीयस्य वन्द्यौ पादौ महात्मनः ॥ १५ ॥

सर्वमन्तःपुरं वाच्यं सूत मद्वचनात् त्वया ।

आरोग्यमविशेषेण यथार्हमभिवादनम् ॥ १६ ॥

' महाराज! श्रीरामचन्द्रजीने धर्मका ही निरन्तर पालन करते हुए दोनों हाथ जोड़कर और मस्तक झुकाकर कहा है — ' सूत! तुम मेरी ओरसे आत्मज्ञानी तथा वन्दनीय मेरे महात्मा पिताके दोनों चरणोंमें प्रणाम कहना तथा अन्तःपुरमें सभी माताओंको मेरे आरोग्यका समाचार देते हुए उनसे विशेषरूपसे मेरा यथोचित प्रणाम निवेदन करना ॥ १४–१६ ॥

माता च मम कौसल्या कुशलं चाभिवादनम् ।

अप्रमादं च वक्तव्या ब्रूयाश्चैनामिदं वचः ॥ १७॥

धर्मनित्या यथाकालमग्न्यगारपरा भव ।

देवि देवस्य पादौ च देववत् परिपालय ॥ १८ ॥ ।

‘ इसके बाद मेरी माता कौसल्यासे मेरा प्रणाम करके बताना कि ' मैं कुशलसे हूँ और धर्मपालनमें सावधान रहता हूँ । ' फिर उनको मेरा यह संदेश सुनाना कि ' माँ । तुम सदा धर्ममें तत्पर रहकर यथासमय अग्निशाला के सेवन ( अग्निहोत्र - कार्य ) में संलग्न रहना । देवि! महाराजको देवताके समान मानकर उनके चरणोंकी सेवा करना ॥

अभिमानं च मानं च त्यक्त्वा वर्तस्व मातृषु ।

अनुराजानमार्यां च कैकेयीमम्ब कारय ॥ १ ९ ॥

' अभिमान ' और मानको? त्यागकर सभी माताओंके प्रति समान बर्ताव करना — उनके साथ हिल - मिलकर रहना । अम्बे! जिसमें राजाका अनुराग है, उस कैकेयीको भी श्रेष्ठ मानकर उसका सत्कार करना ॥ १ ९ ॥

कुमारे भरते वृत्तिर्वर्तितव्या च राजवत् ।

अप्यज्येष्ठा हि राजानो राजधर्ममनुस्मर ॥ २० ॥

' कुमार भरतके प्रति राजोचित बर्ताव करना । राजा छोटी उम्रके हों तो भी वे आदरणीय ही होते हैं — इस राजधर्मको याद रखना'॥२० ॥

भरतः कुशलं वाच्यो वाच्यो मद्वचनेन च ।

सर्वास्वेव यथान्यायं वृत्तिं वर्तस्व मातृषु ॥ २१ ॥

' कुमार भरतसे भी मेरा कुशल- समाचार बताकर उनसे मेरी ओरसे कहना - ' भैया! तुम सभी माताओंके प्रति न्यायोचित बर्ताव करते रहना ॥ २१ ॥

वक्तव्यश्च महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलनन्दनः ।

पितरं यौवराज्यस्थो राज्यस्थमनुपालय ॥ २२ ॥

' इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु भरतसे यह भी कहना चाहिये कि युवराजपदपर अभिषिक्त होनेके बाद भी तुम राज्यसिंहासनपर विराजमान पिताजीकी रक्षा एवं सेवामें संलग्न रहना ॥ २२ ॥

अतिक्रान्तवया राजा मा स्मैनं व्यपरोरुधः ।

कुमारराज्ये जीवस्व तस्यैवाज्ञाप्रवर्तनात् ॥ २३ ॥

' राजा बहुत बूढ़े हो गये हैं- ऐसा मानकर तुम उनका विरोध न करना- उन्हें राजसिंहासनसे न उतारना । युवराज - पदपर ही प्रतिष्ठित रहकर उनकी आज्ञाका पालन करते हुए ही जीवन - निर्वाह करना ॥ २३ ॥

अब्रवीच्चापि मां भूयो भृशमश्रूणि वर्तयन् ।

मातेव मम माता ते द्रष्टव्या पुत्रगर्धिनी ॥ २४ ॥

इत्येवं मां महाबाहुर्बुवन्नेव महायशाः ।

रामो राजीवपत्राक्षो भृशमश्रूण्यवर्तयत् ॥ २५ ॥

१. मुख्य पटरानी होनेका अहङ्कार । २. अपने बड़प्पनके घमंडमें आकर दूसरोंके तिरस्कार करनेकी भावना ।

पृष्ठ 413

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 413 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे ‘ फिर उन्होंने नेत्रोंसे बहुत आँसू बहाते हुए मुझसे भरतसे कहनेके लिये ही यह संदेश दिया- ' भरत! मेरी पुत्रवत्सला माताको अपनी ही माताके समान समझना । ' मुझसे इतना ही कहकर महाबाहु महायशस्वी कमलनयन श्रीराम बड़े वेगसे आँसुओंकी वर्षा करने लगे ॥

लक्ष्मणस्तु सुसंक्रुद्धो निःश्वसन् वाक्यमब्रवीत् ।

केनायमपराधेन राजपुत्रो विवासितः ॥ २६ ॥

' परंतु लक्ष्मण उस समय अत्यन्त कुपित हो लंबी साँस खींचते हुए बोले- ' सुमन्त्रजी! किस अपराधके कारण महाराजने इन राजकुमार श्रीरामको देशनिकाला दे दिया है? ॥ २६ ॥

राज्ञा तु खलु कैकेय्या लघु चाश्रुत्य शासनम् ।

कृतं कार्यमकार्यं वा वयं येनाभिपीडिताः ॥ २७ ॥

' राजाने कैकेयीका आदेश सुनकर झटसे उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली । उनका यह कार्य उचित हो या अनुचित, परंतु हमलोगोंको उसके कारण कष्ट भोगना ही पड़ता है ॥ २७ ॥

यदि प्रब्राजितो रामो लोभकारणकारितम् ।

वरदाननिमित्तं वा सर्वथा दुष्कृतं कृतम् ॥ २८ ॥

4 ' श्रीरामको वनवास देना कैकेयीके लोभके कारण हुआ हो अथवा राजाके दिये हुए वरदानके कारण, मेरी दृष्टिमें यह सर्वथा पाप ही किया गया है ॥ २८ ॥

इदं तावद् यथाकाममीश्वरस्य कृते कृतम् ।

रामस्य तु परित्यागे न हेतुमुपलक्षये ॥ २ ९ ॥

' यह श्रीरामको वनवास देनेका कार्य राजाकी स्वेच्छाचारिताके कारण किया गया हो अथवा ईश्वरकी प्रेरणासे, परंतु मुझे श्रीरामके परित्यागका कोई समुचित कारण नहीं दिखायी देता है ॥ २ ९ ॥

असमीक्ष्य समारब्धं विरुद्धं बुद्धिलाघवात् ।

जनयिष्यति संक्रोशं राघवस्य विवासनम् ॥ ३० ॥

' बुद्धिकी कमी अथवा तुच्छताके कारण उचित-अनुचितका विचार किये बिना ही जो यह राम-वनवासरूपी शास्त्रविरुद्ध कार्य आरम्भ किया गया है, यह अवश्य ही निन्दा और दुःखका जनक होगा ॥ ३० ॥

अहं तावन्महाराजे पितृत्वं नोपलक्षये ।

भ्राता भर्ता च बन्धुश्च पिता च मम राघवः ॥ ३१ ॥

अष्टपञ्चाशः सर्गः ४०१ । दिखायी देता । अब तो रघुकुलनन्दन श्रीराम ही मेरे भाई, स्वामी, बन्धु - बान्धव तथा पिता हैं ॥ ३१ ॥

सर्वलोकप्रियं त्यक्त्वा सर्वलोकहिते रतम् ।

सर्वलोकोऽनुरज्येत कथं चानेन कर्मणा ॥ ३२ ॥

' जो सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर होनेके कारण सब लोगोंके प्रिय हैं, उन श्रीरामका परित्याग करके राजाने जो यह क्रूरतापूर्ण पापकृत्य किया है, इसके कारण अब सारा संसार उनमें कैसे अनुरक्त रह सकता है? ( अब उनमें राजोचित गुण कहाँ रह गया है? ) ॥ ३२ ॥

सर्वप्रजाभिरामं हि रामं प्रव्रज्य धार्मिकम् ।

सर्वलोकविरोधेन कथं राजा भविष्यति ॥ ३३ ॥

' जिनमें समस्त प्रजाका मन रमता है, उन धर्मात्मा श्रीरामको देशनिकाला देकर समस्त लोकोंका विरोध करनेके कारण अब वे कैसे राजा हो सकेंगे? ॥ ३३ ॥

जानकी तु महाराज निःश्वसन्ती तपस्विनी ।

भूतोपहतचित्तेव विष्ठिता विस्मृता स्थिता ॥ ३४ ॥

' महाराज! तपस्विनी जनकनन्दिनी सीता तो लंबी साँस खींचती हुई इस प्रकार निश्चेष्ट खड़ी थीं, मानो उनमें किसी भूतका आवेश हो गया हो । वे भूली - सी जान पड़ती थीं ॥ ३४ ॥

अदृष्टपूर्वव्यसना राजपुत्री यशस्विनी ।

। तेन दुःखेन रुदती नैव मां किंचिदब्रवीत् ॥ ३५ ॥

' उन यशस्विनी राजकुमारीने पहले कभी ऐसा संकट नहीं देखा था । वे पतिके ही दुःखसे दुःखी होकर रो रही थीं । उन्होंने मुझसे कुछ भी नहीं कहा ॥ ३५ ॥।

उद्वीक्षमाणा भर्तारं मुखेन परिशुष्यता ।

मुमोच सहसा बाष्पं प्रयान्तमुपवीक्ष्य सा ॥ ३६ ॥

' मुझे इधर आनेके लिये उद्यत देख वे सूखे मुँहसे पतिकी ओर देखती हुई सहसा आँसू बहाने लगी थीं ॥ तथैव रामोऽश्रुमुखः कृताञ्जलिः स्थितोऽब्रवील्लक्ष्मणबाहुपालितः । तथैव सीता रुदती तपस्विनी निरीक्षते राजरथं तथैव माम् ॥३७ ॥

' इसी प्रकार लक्ष्मणकी भुजाओंसे सुरक्षित श्रीराम उस समय हाथ जोड़े खड़े थे । उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । मनस्विनी सीता भी रोती हुई कभी आपके ' मुझे इस समय महाराजमें पिताका भाव नहीं | इस रथकी ओर देखती थीं और कभी मेरी ओर ' ॥ ३७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः ॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५८ ॥

पृष्ठ 414

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 414 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे एकोनषष्टितमः सर्गः सुमन्त्रद्वारा श्रीरामके शोकसे जड़ - चेतन एवं अयोध्यापुरीकी दुरवस्थाका वर्णन तथा

मम त्वश्वा निवृत्तस्य न प्रावर्तन्त वर्त्मनि ।

उष्णमश्रु विमुञ्चन्तो रामे सम्प्रस्थिते वनम् ॥ १ ॥

उभाभ्यां राजपुत्राभ्यामथ कृत्वाहमञ्जलिम् ।

प्रस्थितो रथमास्थाय तद्दुःखमपि धारयन् ॥ २ ॥

सुमन्त्रने कहा — ' जब श्रीरामचन्द्रजी वनकी ओर प्रस्थित हुए, तब मैंने उन दोनों राजकुमारोंको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके वियोगके दुःखको हृदयमें धारण करके रथपर आरूढ़ हो उधरसे लौटा । लौटते समय मेरे घोड़े नेत्रोंसे गरम - गरम आँसू बहाने लगे । रास्ता चलनेमें उनका मन नहीं लगता था ॥ १-२ ॥

गुहेन सार्धं तत्रैव स्थितोऽस्मि दिवसान् बहून् ।

आशया यदि मां रामः पुनः शब्दापयेदिति ॥ ३ ॥

' मैं गुहके साथ कई दिनोंतक वहाँ इस आशासे ठहरा रहा कि सम्भव है, श्रीराम फिर मुझे बुला लें ॥ ३ ॥

विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिताः ।

अपि वृक्षाः परिम्लानाः सपुष्पाङ्कुरकोरकाः ॥ ४ ॥

' महाराज! आपके राज्यमें वृक्ष भी इस महान् संकटसे कृशकाय हो गये हैं, फूल, अंकुर और कलियोंसहित मुरझा गये हैं ॥४ ॥

उपतप्तोदका नद्यः पल्वलानि सरांसि च ।

परिशुष्कपलाशानि वनान्युपवनानि च ॥ ५ ॥

' नदियों, छोटे जलाशयों तथा बड़े सरोवरोंके जल गरम हो गये हैं । वनों और उपवनोंके पत्ते सूख गये हैं ।

न च सर्पन्ति सत्त्वानि व्याला न प्रचरन्ति च ।

रामशोकाभिभूतं तन्निष्कूजमभवद् वनम् ॥ ६ ॥

‘ वनके जीव - जन्तु आहारके लिये भी कहीं नहीं जाते हैं । अजगर आदि सर्प भी जहाँ - के - तहाँ पड़े हैं, आगे नहीं बढ़ते हैं । श्रीरामके शोकसे पीड़ित हुआ वह सारा वन नीरव - सा हो गया है ॥ ६ ॥

लीनपुष्करपत्राश्च नद्यश्च कलुषोदकाः ।

संतप्तपद्माः पद्मिन्यो लीनमीनविहंगमाः ॥ ७ ॥

' नदियोंके जल मलिन हो गये हैं । उनमें फैले हुए कमलोंके पत्ते गल गये हैं । सरोवरोंके कमल भी सूख गये हैं । उनमें रहनेवाले मत्स्य और पक्षी भी नष्टप्राय हो गये हैं ॥ ७ ॥

राजा दशरथका विलाप

जलजानि च पुष्पाणि माल्यानि स्थलजानि च ।

नातिभान्त्यल्पगन्धीनि फलानि च यथापुरम् ॥८ ॥

' जलमें उत्पन्न होनेवाले पुष्प तथा स्थलसे पैदा होनेवाले फूल भी बहुत थोड़ी सुगन्धसे युक्त होनेके कारण अधिक शोभा नहीं पाते हैं तथा फल भी पूर्ववत् नहीं दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ८ ॥

अत्रोद्यानानि शून्यानि प्रलीनविहगानि च ।

न चाभिरामानारामान् पश्यामि मनुजर्षभ ॥ ९ ॥

' नरश्रेष्ठ! अयोध्याके उद्यान भी सूने हो गये हैं, उनमें रहनेवाले पक्षी भी कहीं छिप गये हैं । यहाँके बगीचे भी मुझे पहलेकी भाँति मनोहर नहीं दिखायी देते हैं ॥ ९ ॥

प्रविशन्तमयोध्यायां न कश्चिदभिनन्दति ।

नरा राममपश्यन्तो निःश्वसन्ति मुहुर्मुहुः ॥ १० ॥

' अयोध्यामें प्रवेश करते समय मुझसे किसीने प्रसन्न होकर बात नहीं की । श्रीरामको न देखकर लोग बारंबार लंबी साँसें खींचने लगे ॥१० ॥

देव राजरथं दृष्ट्वा विना राममिहागतम् ।

दूरादश्रुमुखः सर्वो राजमार्गे गतो जनः ॥ ११ ॥

' देव! सड़कपर आये हुए सब लोग राजाका रथ श्रीरामके बिना ही यहाँ लौट आया है, यह देखकर दूरसे ही आँसू बहाने लगे थे ॥११ ॥

हम्यैर्विमानैः प्रासादैरवेक्ष्य रथमागतम् ।

हाहाकारकृता नार्यो रामादर्शनकर्शिताः ॥ १२ ॥

' अट्टालिकाओं, विमानों और प्रासादोंपर बैठी हुई स्त्रियाँ वहाँसे रथको सूना ही लौटा देखकर श्रीरामको न देखनेके कारण व्यथित हो उठीं और हाहाकार करने लगीं ॥ १२ ॥

आयतैर्विमलैर्नेत्रैरश्रुवेगपरिप्लुतैः अन्योन्यमभिवीक्षन्तेऽव्यक्तमार्ततराः स्त्रियः ॥ १३ ॥

' उनके कज्जल आदिसे रहित बड़े - बड़े नेत्र आँसुओंके वेगमें डूबे हुए थे । वे स्त्रियाँ अत्यन्त आ होकर अव्यक्त भावसे एक - दूसरीकी ओर देख रही थीं ॥

नामित्राणां न मित्राणामुदासीनजनस्य च ।

अहमार्ततया कंचिद् विशेषं नोपलक्षये ॥ १४ ॥

‘ शत्रुओं, मित्रों तथा उदासीन ( मध्यस्थ ) मनुष्योंको

पृष्ठ 415

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 415 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ४०३

भी मैंने समानरूपसे दुःखी देखा है । किसीके शोकमें ।

मुझे कुछ अन्तर नहीं दिखायी दिया है ॥ १४ ॥

अप्रहृष्टमनुष्या च दीननागतुरंगमा ।

आर्तस्वरपरिम्लाना विनिःश्वसितनिःस्वना ॥ १५ ॥

निरानन्दा महाराज रामप्रव्राजनातुरा ।

कौसल्या पुत्रहीनेव अयोध्या प्रतिभाति मे ॥ १६ ॥

' महाराज! अयोध्याके मनुष्योंका हर्ष छिन गया है । वहाँके घोड़े और हाथी भी बहुत दुःखी हैं । सारी पुरी आर्तनादसे मलिन दिखायी देती है । लोगोंकी लंबी - लंबी साँसें ही इस नगरीका उच्छ्वास बन गयी हैं । यह अयोध्यापुरी श्रीरामके वनवाससे व्याकुल हुई पुत्रवियोगिनी कौसल्याकी भाँति मुझे आनन्दशून्य प्रतीत हो रही है ' ॥ १५-१६ ॥

सूतस्य वचनं श्रुत्वा वाचा परमदीनया ।

बाष्पोपहतया सूतमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥

सुमन्त्रके वचन सुनकर राजाने उनसे अश्रु - गद्गद परम दीन वाणीमें कहा- ॥ १७ ॥

कैकेय्या विनियुक्तेन पापाभिजनभावया ।

मया न मन्त्रकुशलैर्वृद्धैः सह समर्थितम् ॥ १८ ॥

' सूत! जो पापी कुल और पापपूर्ण देशमें उत्पन्न हुई है तथा जिसके विचार भी पापसे भरे हैं, उस कैकेयीके कहनेमें आकर मैंने सलाह देनेमें कुशल वृद्ध पुरुषोंके साथ बैठकर इस विषयमें कोई परामर्श भी नहीं किया ॥१८ ॥

न सुहृद्भिर्न चामात्यैर्मन्त्रयित्वा सनैगमैः ।

मयायमर्थः सम्मोहात् स्त्रीहेतोः सहसा कृतः ॥ १ ९ ॥

' सुहृदों, मन्त्रियों और वेदवेत्ताओंसे सलाह लिये बिना ही मैंने मोहवश केवल एक स्त्रीकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये सहसा यह अनर्थमय कार्य कर डाला है ॥

भवितव्यतया नूनमिदं वा व्यसनं महत् ।

कुलस्यास्य विनाशाय प्राप्तं सूत यदृच्छया ॥ २० ॥

' सुमन्त्र! होनहारवश यह भारी विपत्ति निश्चय ही इस कुलका विनाश करनेके लिये अकस्मात् आ पहुँची है ॥ २० ॥

सूत यद्यस्ति ते किंचिन्मयापि सुकृतं कृतम् ।

त्वं प्रापयाशु मां रामं प्राणाः संत्वरयन्ति माम् ॥ २१ ॥

' सारथे! यदि मैंने तुम्हारा कभी कुछ थोड़ा - सा भी उपकार किया हो तो तुम मुझे शीघ्र ही श्रीरामके पास पहुँचा दो । मेरे प्राण मुझे श्रीरामके दर्शनके लिये शीघ्रता करनेकी प्रेरणा दे रहे हैं ॥ २१ ॥

यद्यद्यापि ममैवाज्ञा निवर्तयतु राघवम् ।

न शक्ष्यामि विना रामं मुहूर्तमपि जीवितुम् ॥ २२ ॥

' यदि आज भी इस राज्यमें मेरी ही आज्ञा चलती हो तो तुम मेरे ही आदेशसे जाकर श्रीरामको वनसे लौटा ले आओ; क्योंकि अब मैं उनके बिना दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ २२ ॥

अथवापि महाबाहुर्गतो दूरं भविष्यति ।

मामेव रथमारोप्य शीघ्रं रामाय दर्शय ॥ २३ ॥

' अथवा महाबाहु श्रीराम तो अब दूर चले गये होंगे, इसलिये मुझे ही रथपर बिठाकर ले चलो और शीघ्र ही रामका दर्शन कराओ ॥ २३ ॥

वृत्तदंष्ट्रो महेष्वासः क्वासौ लक्ष्मणपूर्वजः ।

यदि जीवामि साध्वेनं पश्येयं सीतया सह ॥ २४ ॥

' कुन्दकलीके समान श्वेत दाँतोंवाले, लक्ष्मणके बड़े भाई महाधनुर्धर श्रीराम कहाँ हैं? यदि सीताके साथ भली - भाँति उनका दर्शन कर लूँ, तभी मैं जीवित रह सकता हूँ ॥२४ ॥

लोहिताक्षं महाबाहुमामुक्तमणिकुण्डलम् ।

रामं यदि न पश्येयं गमिष्यामि यमक्षयम् ॥ २५ ॥

' जिनके लाल नेत्र और बड़ी - बड़ी भुजाएँ हैं तथा जो मणियोंके कुण्डल धारण करते हैं, उन श्रीरामको यदि मैं नहीं देखूँगा तो अवश्य यमलोकको चला जाऊँगा ॥ २५ ॥

अतो नु किं दुःखतरं योऽहमिक्ष्वाकुनन्दनम् ।

इमामवस्थामापन्नो नेह पश्यामि राघवम् ॥ २६ ॥

' इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या होगी कि मैं इस मरणासन्न अवस्थामें पहुँचकर भी इक्ष्वाकुकुलनन्दन राघवेन्द्र श्रीरामको यहाँ नहीं देख रहा हूँ ॥ २६ ॥

हा राम रामानुज हा हा वैदेहि तपस्विनि ।

न मां जानीत दुःखेन म्रियमाणमनाथवत् ॥ २७ ॥

' हा राम! हा लक्ष्मण! हा विदेहराजकुमारी तपस्विनी सीते! तुम्हें पता नहीं होगा कि मैं किस प्रकार दुःखसे अनाथकी भाँति मर रहा हूँ ' ॥२७ ॥

स तेन राजा दुःखेन भृशमर्पितचेतनः ।

अवगाढः सुदुष्पारं शोकसागरमब्रवीत् ॥ २८ ॥

राजा उस दुःखसे अत्यन्त अचेत हो रहे थे, अतः वे उस परम दुर्लङ्घय शोकसमुद्रमें निमग्न होकर बोले— ॥

रामशोकमहावेगः सीताविरहपारगः ।

श्वसितोर्मिमहावर्तो बाष्पवेगजलाविलः ॥ २ ९ ॥

बाहुविक्षेपमीनोऽसौ विक्रन्दितमहास्वनः ।

प्रकीर्णकेशशैवालः कैकेयीवडवामुखः ॥ ३० ॥

पृष्ठ 416

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 416 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

ममाश्रुवेगप्रभवः कुब्जावाक्यमहाग्रहः ।

वरवेलो नृशंस रामप्रव्राजनायतः ॥ ३१ ॥

यस्मिन् बत निमग्नोऽहं कौसल्ये राघवं विना ।

दुस्तरो जीवता देवि मयायं शोकसागरः ॥ ३२ ॥

' देवि कौसल्ये! मैं श्रीरामके बिना जिस शोक-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ, उसे जीते - जी पार करना मेरे लिये अत्यन्त कठिन है । श्रीरामका शोक ही उस समुद्रका महान् वेग है । सीताका बिछोह ही उसका दूसरा छोर है । लंबी - लंबी साँसें उसकी लहरें और बड़ी - बड़ी भँवरें हैं । आँसुओंका वेगपूर्वक उमड़ा हुआ प्रवाह ही उसका मलिन जल है । मेरा हाथ पटकना ही उसमें उछलती हुई मछलियोंका विलास है । करुण - क्रन्दन ही उसकी महान् गर्जना है । ये बिखरे हुए केश ही उसमें उपलब्ध होनेवाले सेवार हैं । कैकेयी बड़वानल है । वह शोक-समुद्र मेरी वेगपूर्वक होनेवाली अश्रुवर्षाकी उत्पत्तिका मूल कारण है । मन्थराके कुटिलतापूर्ण वचन ही उस समुद्रके बड़े - बड़े ग्राह हैं । क्रूर कैकेयीके माँगे हुए दो वर ही उसके दो तट हैं तथा श्रीरामका वनवास ही उस शोक - सागरका महान् विस्तार है ॥ २ ९ -३२ ॥ अशोभनं योऽहमिहाद्य राघवं दिदृक्षमाणो न लभे सलक्ष्मणम् । इतीव राजा विलपन् महायशाः पपात तूर्णं शयने स मूर्च्छितः ॥ ३३ ॥

' मैं लक्ष्मणसहित श्रीरामको देखना चाहता हूँ, परंतु इस समय उन्हें यहाँ देख नहीं पाता हूँ- यह मेरे बहुत बड़े पापका फल है । ' इस तरह विलाप करते हुए महायशस्वी राजा दशरथ तुरंत ही मूच्छित शय्यापर गिर पड़े ॥ ३३ ॥

इति विलपति पार्थिवे प्रणष्टे करुणतरं द्विगुणं च रामहेतोः । वचनमनुनिशम्य तस्य देवी भयमगमत् पुनरेव राममाता ॥ ३४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके लिये इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथके मूच्छित हो जानेपर उनके उस अत्यन्त करुणाजनक वचनको सुनकर राममाता देवी । कौसल्याको पुनः दुगुना भय हो गया ॥ ३४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ९ ॥ षष्टितमः सर्गः कौसल्याका विलाप और सारथि सुमन्त्रका उन्हें समझाना

ततो भूतोपसृष्टेव वेपमाना पुनः पुनः ।

धरण्यां गतसत्त्वेव कौसल्या सूतमब्रवीत् ॥ ॥

तदनन्तर जैसे उनमें भूतका आवेश हो गया हो, इस प्रकार कौसल्या देवी बारंबार काँपने लगीं और अचेत - सी होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं । उसी अवस्थामें उन्होंने सारथिसे कहा— ॥ १ ॥

नय मां यत्र काकुत्स्थः सीता यत्र च लक्ष्मणः ।

तान् विना क्षणमप्यद्य जीवितुं नोत्सहे ह्यहम् ॥ २ ॥

' सुमन्त्र! जहाँ श्रीराम हैं, जहाँ सीता और लक्ष्मण हैं, वहीँ मुझे भी पहुँचा दो । मैं उनके बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती ॥ २ ॥

निवर्तय रथं शीघ्रं दण्डकान् नय मामपि ।

अथ तान् नानुगच्छामि गमिष्यामि यमक्षयम् ॥ ३ ॥

' जल्दी रथ लौटाओ और मुझे भी दण्डकारण्यमें ले चलो । यदि मैं उनके पास न जा सकी तो यमलोककी यात्रा करूंगी ' ॥३ ॥

बाष्पवेगोपहतया स वाचा सज्जमानया ।

इदमाश्वासयन् देवीं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ ४ ॥

देवी कौसल्याकी बात सुनकर सारथि सुमन्त्रने हाथ जोड़कर उन्हें समझाते हुए आँसुओंके वेगसे अवरुद्ध हुई गद्गदवाणीमें कहा – ॥ ४ ॥

त्यज शोकं च मोहं च सम्भ्रमं दुःखजं तथा ।

व्यवधूय च संतापं वने वत्स्यति राघवः ॥ ५ ॥

' महारानी! यह शोक, मोह और दुःखजनित व्याकुलता छोड़िये । श्रीरामचन्द्रजी इस समय सारा संताप भूलकर वनमें निवास करते हैं ॥५ ॥

लक्ष्मणश्चापि रामस्य पादौ परिचरन् वने ।

आराधयति धर्मज्ञः परलोकं जितेन्द्रियः ॥ ६ ॥

' धर्मज्ञ एवं जितेन्द्रिय लक्ष्मण भी उस वनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी सेवा करते हुए अपना

पृष्ठ 417

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 417 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे परलोक बना रहे हैं ॥ ६ ॥

विजनेऽपि वने सीता वासं प्राप्य गृहेष्विव ।

विस्त्रम्भं लभतेऽभीता रामे विन्यस्तमानसा ॥ ७ ॥

' सीताका मन भगवान् श्रीराममें ही लगा हुआ है । इसलिये निर्जन वनमें रहकर भी घरकी ही भाँति प्रेम एवं प्रसन्नता पाती तथा निर्भय रहती हैं ॥ ७ ॥

नास्या दैन्यं कृतं किंचित् सुसूक्ष्ममपि लक्ष्यते ।

उचितेव प्रवासानां वैदेही प्रतिभाति मे ॥८ ॥

' वनमें रहनेके कारण उनके मनमें कुछ थोड़ा - सा भी दुःख नहीं दिखायी देता । मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो विदेहराजकुमारी सीताको परदेशमें रहनेका पहलेसे ही अभ्यास हो ॥ ८ ॥

नगरोपवनं गत्वा यथा स्म रमते पुरा ।

तथैव रमते सीता निर्जनेषु वनेष्वपि ॥ ९ ॥

‘ जैसे यहाँ नगरके उपवनमें जाकर वे पहले घूमा करती थीं, उसी प्रकार निर्जन वनमें भी सीता सानन्द विचरती हैं॥९॥

रमते सीताबालचन्द्रनिभानना ।

रामा रामे ह्यदीनात्मा विजनेऽपि वने सती ॥ १० ॥

' पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली रमणी -शिरोमणि उदारहृदया सती - साध्वी सीता उस निर्जन वनमें भी श्रीरामके समीप बालिकाके समान खेलती और प्रसन्न रहती हैं ॥ १० ॥

तद्गतं हृदयं यस्यास्तदधीनं च जीवितम् ।

अयोध्या हि भवेदस्या रामहीना तथा वनम् ॥ ११ ॥

' उनका हृदय श्रीराममें ही लगा हुआ है । उनका जीवन भी श्रीरामके ही अधीन है, अतः रामके बिना अयोध्या भी उनके लिये वनके समान ही होगी ( और श्रीरामके साथ रहनेपर वे वनमें भी अयोध्याके समान ही सुखका अनुभव करेंगी ) ॥ ११ ॥

परिपृच्छति वैदेही ग्रामांश्च नगराणि च ।

गतिं दृष्ट्वा नदीनां च पादपान् विविधानपि ॥ १२ ॥

' विदेहनन्दिनी सीता मार्गमें मिलनेवाले गाँवों, नगरों, नदियोंके प्रवाहों और नाना प्रकारके वृक्षोंको देखकर उनका परिचय पूछा करती हैं ॥ १२ ॥

रामं वा लक्ष्मणं वापि दृष्ट्वा जानाति जानकी ।

अयोध्या क्रोशमात्रे तु विहारमिव साश्रिता ॥ १३ ॥

' श्रीराम और लक्ष्मणको अपने पास देखकर जानकीको यही जान पड़ता है कि मैं अयोध्यासे एक कोसकी दूरीपर मानो घूमने - फिरनेके लिये ही आयी हूँ ॥ षष्टितमः सर्गः ४०५

इदमेव स्मराम्यस्याः सहसैवोपजल्पितम् ।

कैकेयीसंश्रितं जल्पं नेदानीं प्रतिभाति माम् ॥ १४ ॥

' सीताके सम्बन्धमें मुझे इतना ही स्मरण है । उन्होंने कैकेयीको लक्ष्य करके जो सहसा कोई बात कह दी थी, वह इस समय मुझे याद नहीं आ रही है ' ॥

ध्वंसयित्वा तु तद् वाक्यं प्रमादात् पर्युपस्थितम् ।

ह्रादनं वचनं सूतो देव्या मधुरमब्रवीत् ॥ १५ ॥

इस प्रकार भूलसे निकली हुई कैकेयीविषयक उस बातको पलटकर सारथि सुमन्त्रने देवी कौसल्याके हृदयको आह्लाद प्रदान करनेवाला मधुर वचन कहा— ॥ १५ ॥

अध्वना वातवेगेन सम्भ्रमेणातपेन च ।

न विगच्छति वैदेह्याश्चन्द्रांशुसदृशी प्रभा ॥ १६ ॥

' मार्गमें चलनेकी थकावट, वायुके वेग, भयदायक वस्तुओंको देखनेके कारण होनेवाली घबराहट तथा धूपसे भी विदेहराजकुमारीकी चन्द्रकिरणोंके समान कमनीय कान्ति उनसे दूर नहीं होती है ॥ १६ ॥

सदृशं शतपत्रस्य पूर्णचन्द्रोपमप्रभम् ।

वदनं तद् वदान्याया वैदेह्या न विकम्पते ॥ १७ ॥

' उदारहृदया सीताका विकसित कमलके समान सुन्दर तथा पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्ददायक कान्तिसे युक्त मुख कभी मलिन नहीं होता है ॥ १७ ॥

अलक्तरसरक्ताभावलक्तरसवर्जितौ अद्यापि चरणौ तस्याः पद्मकोशसमप्रभौ ॥ १८ ॥

' जिनमें महावरके रंग नहीं लग रहे हैं, सीताके वे दोनों चरण आज भी महावरके समान ही लाल तथा कमलकोशके समान कान्तिमान् हैं ॥ १८ ॥

नूपुरोत्कृष्टलीलेव खेलं गच्छति भामिनी ।

इदानीमपि वैदेही तद्रागान्यस्तभूषणा ॥ १ ९ ॥

' श्रीरामचन्द्रजीके प्रति अनुरागके कारण उन्हींकी प्रसन्नताके लिये जिन्होंने आभूषणोंका परित्याग नहीं किया है, वे विदेहराजकुमारी भामिनी सीता इस समय भी अपने नूपुरोंकी झनकारसे हंसोंके कलनादका तिरस्कार-सा करती हुई लीलाविलासयुक्त गति से चलती हैं ॥ १ ९ ॥

गजं वा वीक्ष्य सिंहं वा व्याघ्रं वा वनमाश्रिता ।

नाहारयति संत्रासं बाहू रामस्य संश्रिता ॥२० ॥

' वे श्रीरामचन्द्रजीके बाहुबलका भरोसा करके वनमें रहती हैं और हाथी, बाघ अथवा सिंहको भी देखकर कभी भय नहीं मानती हैं ॥२० ॥

न शोच्यास्ते न चात्मा ते शोच्यो नापि जनाधिपः ।

इदं हि चरितं लोके प्रतिष्ठास्यति शाश्वतम् ॥२१ ॥

पृष्ठ 418

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 418 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' अतः आप श्रीराम, लक्ष्मण अथवा सीताके लिये । शोक न करें, अपने और महाराजके लिये भी चिन्ता छोड़ें । श्रीरामचन्द्रजीका यह पावन चरित्र संसारमें सदा ही स्थिर रहेगा ॥ २१ ॥

विधूय शोकं परिहृष्टमानसा महर्षियाते पथि सुव्यवस्थिताः । वने रता वन्यफलाशनाः पितुः शुभां प्रतिज्ञां प्रतिपालयन्ति ते ॥ २२ ॥

' वे तीनों ही शोक छोड़कर प्रसन्नचित्त हो महर्षियोंके मार्गपर दृढ़तापूर्वक स्थित हैं और वनमें

रहकर फल - मूलका भोजन करते हुए पिताकी उत्तम ।

प्रतिज्ञाका पालन कर रहे हैं ' ॥ २२ ॥

तथापि सुयुक्तवादिना निवार्यमाणा सुतशोककर्शिता । न चैव देवी विरराम कूजितात् प्रियेति पुत्रेति च राघवेति च ॥ २३ ॥

इस प्रकार युक्तियुक्त वचन कहकर सारथि सुमन्त्रने पुत्रशोकसे पीड़ित हुई कौसल्याको चिन्ता करने और रोनेसे रोका तो भी देवी कौसल्या विलापसे विरत न हुईं । वे ' हा प्यारे! ' ' हा पुत्र! ' और ' हा रघुनन्दन! ' की रट लगाती हुई करुण क्रन्दन करती ही रहीं ॥ २३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६० ॥

एकषष्टितमः सर्गः कौसल्याका विलापपूर्वक राजा दशरथको उपालम्भ देना

वनं गते धर्मरते रामे रमयतां वरे ।

कौसल्या रुदती चार्ता भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

प्रजाजनोंको आनन्द प्रदान करनेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ धर्मपरायण श्रीरामके वनमें चले जानेपर आर्त होकर रोती हुई कौसल्याने अपने पतिसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥

यद्यपि त्रिषु लोकेषु प्रथितं ते महद् यशः ।

सानुक्रोशो वदान्यश्च प्रियवादी च राघवः ॥ २ ॥

' महाराज! यद्यपि तीनों लोकोंमें आपका महान् यश फैला हुआ है, – सब लोग यही जानते हैं कि-रघुकुलनरेश दशरथ बड़े दयालु, उदार और प्रिय वचन बोलनेवाले हैं ॥ २ ॥

कथं नरवरश्रेष्ठ पुत्रौ तौ सह सीतया ।

दुःखितौ सुखसंवृद्धौ वने दुःखं सहिष्यतः ॥ ३ ॥

‘ नरेशोंमें श्रेष्ठ आर्यपुत्र! तथापि आपने इस बातका विचार नहीं किया कि सुखमें पले हुए आपके वे दोनों पुत्र सीताके साथ वनवासका कष्ट कैसे सहन करेंगे ॥ ३ ॥

सा नूनं तरुणी श्यामा सुकुमारी सुखोचिता ।

कथमुष्णं च शीतं च मैथिली विसहिष्यते ॥ ४ ॥

' वह सोलह - अठारह वर्षोंकी सुकुमारी तरुणी मिथिलेशकुमारी सीता, जो सुख भोगनेके ही योग्य है, वनमें सर्दी गरमीका दुःख कैसे सहेगी? ॥ ४ ॥

भुक्त्वाशनं विशालाक्षी सूपदंशान्वितं शुभम् ।

वन्यं नैवारमाहारं कथं सीतोपभोक्ष्यते ॥ ५ ॥ ।

' विशाललोचना सीता सुन्दर व्यञ्जनोंसे युक्त सुन्दर स्वादिष्ट अन्न भोजन किया करती थी, अब वह जंगलकी तिन्नीके चावलका सूखा भात कैसे खायगी? ॥

गीतवादित्रनिर्घोषं श्रुत्वा शुभसमन्विता ।

कथं क्रव्यादसिंहानां शब्दं श्रोष्यत्यशोभनम् ॥ ६ ॥

' जो माङ्गलिक वस्तुओंसे सम्पन्न रहकर सदा गीत और वाद्यकी मधुर ध्वनि सुना करती थी, वही जंगलमें मांसभक्षी सिंहोंका अशोभन ( अमङ्गलकारी ) शब्द कैसे सुन सकेगी? ॥ ६ ॥

महेन्द्रध्वजसंकाशः क्व नु शेते महाभुजः ।

भुजं परिघसंकाशमुपाधाय महाबलः ॥ ७ ॥

' जो इन्द्रध्वजके समान समस्त लोकोंके लिये उत्सव प्रदान करनेवाले थे, वे महाबली, महाबाहु श्रीराम अपनी परिघ - जैसी मोटी बाँहका तकिया लगाकर कहाँ सोते होंगे? ॥ ७ ॥

पद्मवर्णं सुकेशान्तं पद्मनिःश्वासमुत्तमम् ।

कदा द्रक्ष्यामि रामस्य वदनं पुष्करेक्षणम् ॥ ८ ॥

‘ जिसकी कान्ति कमलके समान है, जिसके ऊपर सुन्दर केश शोभा पाते हैं, जिसकी प्रत्येक साँससे कमलकी - सी सुगन्ध निकलती है तथा नेत्र जिसमें विकसित कमलके सदृश सुन्दर सुशोभित होते हैं, श्रीरामके उस मनोहर मुखको मैं कब देखूँगी? ॥ ८ ॥

पृष्ठ 419

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 419 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे

वज्रसारमयं नूनं हृदयं मे न संशयः ।

अपश्यन्त्या न तं यद् वै फलतीदं सहस्रधा ॥ ९ ॥

' मेरा हृदय निश्चय ही लोहेका बना हुआ है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि श्रीरामको न देखनेपर भी मेरे इस हृदयके सहस्त्रों टुकड़े नहीं हो जाते हैं ॥ ९ ॥

यत् त्वया करुणं कर्म व्यपोह्य मम बान्धवाः ।

निरस्ताः परिधावन्ति सुखार्हाः कृपणा वने ॥१० ॥

' आपने यह बड़ा ही निर्दयतापूर्ण कर्म किया है कि बिना कुछ सोच - विचार किये मेरे बान्धवोंको ( कैकेयीके कहनेसे ) निकाल दिया है, जिसके कारण वे सुख भोगनेके योग्य होनेपर भी दीन होकर वनमें दौड़ रहे हैं ॥ १० ॥

यदि पञ्चदशे वर्षे राघवः पुनरेष्यति ।

जह्याद् राज्यं च कोशं च भरतो नोपलक्ष्यते ॥ ११ ॥

' यदि पंद्रहवें वर्षमें श्रीरामचन्द्र पुनः वनसे लौटें तो भरत उनके लिये राज्य और खजाना छोड़ देंगे, ऐसी सम्भावना नहीं दिखायी देती ॥ ११ ॥

भोजयन्ति किल श्राद्धे केचित् स्वानेव बान्धवान् ।

ततः पश्चात् समीक्षन्ते कृतकार्या द्विजोत्तमान् ॥ १२ ॥

तत्र ये गुणवन्तश्च विद्वांसश्च द्विजातयः ।

न पश्चात् तेऽभिमन्यन्ते सुधामपि सुरोपमाः ॥ १३ ॥

' कहते हैं, कुछ लोग श्राद्धमें पहले अपने बान्धवों ( दौहित्र आदि ) - को ही भोजन करा देते हैं, उसके बाद कृतकृत्य होकर निमन्त्रित श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी ओर ध्यान देते हैं । परंतु वहाँ जो गुणवान् एवं विद्वान् देवतुल्य उत्तम ब्राह्मण होते हैं, वे पीछे अमृत भी परोसा गया हो तो उसको स्वीकार नहीं करते हैं ॥ १२-१३ ॥

ब्राह्मणेष्वपि वृत्तेषु भुक्तशेषं द्विजोत्तमाः ।

नाभ्युपेतुमलं प्राज्ञाः शृङ्गच्छेदमिवर्षभाः ॥ १४ ॥

' यद्यपि पहली पंक्तिमें भी ब्राह्मण ही भोजन करके उठे होते हैं, तथापि जो श्रेष्ठ और विद्वान् ब्राह्मण हैं, वे अपमानके भयसे उस भुक्तशेष अन्नको उसी तरह ग्रहण नहीं कर पाते जैसे अच्छे बैल अपने सींग कटानेको नहीं तैयार होते हैं ॥ १४ ॥

एवं कनीयसा भ्रात्रा भुक्तं राज्यं विशाम्पते ।

भ्राता ज्येष्ठो वरिष्ठश्च किमर्थं नावमन्यते ॥ १५ ॥

' महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ और श्रेष्ठ भ्राता अपने छोटे भाईके भोगे हुए राज्यको कैसे ग्रहण करेंगे? वे उसका तिरस्कार ( त्याग ) क्यों नहीं कर देंगे? ॥ १५ ॥

न परेणाहृतं भक्ष्यं व्याघ्रः खादितुमिच्छति ।

एवमेव नरव्याघ्रः परलीढं न मंस्यते ॥ १६ ॥

एकषष्टितमः सर्गः ४०७ ' जैसे बाघ गीदड़ आदि दूसरे जन्तुओंके लाये या खाये हुए भक्ष्य पदार्थ ( शिकार ) - को खाना नहीं चाहता, इसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीराम दूसरोंके चाटे ( भोगे ) हुए राज्य - भोगको नहीं स्वीकार करेंगे ॥ १६ ॥

हविराज्यं पुरोडाशः कुशा यूपाश्च खादिराः ।

नैतानि यातयामानि कुर्वन्ति पुनरध्वरे ॥ १७ ॥

' हविष्य, घृत, पुरोडाश, कुश और खदिर ( खैर ) -के यूप - ये एक यज्ञके उपयोगमें आ जानेपर ‘ यातयाम ’ ( उपभुक्त ) हो जाते हैं; इसलिये विद्वान् इनका फिर दूसरे यज्ञमें उपयोग नहीं करते हैं ॥ १७ ॥

तथा ह्यात्तमिदं राज्यं हृतसारां सुरामिव ।

नाभिमन्तुमलं रामो नष्टसोममिवाध्वरम् ॥ १८ ॥

' इसी प्रकार निःसार सुरा और भुक्तावशिष्ट यज्ञसम्बन्धी सोमरसकी भाँति इस भोगे हुए राज्यको श्रीराम नहीं ग्रहण कर सकते ॥ १८ ॥

नैवंविधमसत्कारं राघवो मर्षयिष्यति ।

बलवानिव शार्दूलो वालधेरभिमर्शनम् ॥ १ ९ ॥

' जैसे बलवान् शेर किसीके द्वारा अपनी पूँछका पकड़ा जाना नहीं सह सकता, उसी प्रकार श्रीराम ऐसे अपमानको नहीं सह सकेंगे ॥ १ ९ ॥

नैतस्य सहिता लोका भयं कुर्युर्महामृधे ।

अधर्मं त्विह धर्मात्मा लोकं धर्मेण योजयेत् ॥ २० ॥

' समस्त लोक एक साथ होकर यदि महासमरमें आ जायँ तो भी वे श्रीरामचन्द्रजीके मनमें भय उत्पन्न नहीं कर सकते, तथापि इस तरह राज्य लेनेमें अधर्म मानकर उन्होंने इसपर अधिकार नहीं किया । जो धर्मात्मा समस्त जगत्को धर्ममें लगाते हैं, वे स्वयं अधर्म कैसे कर सकते हैं? ॥ २० ॥

नन्वसौ काञ्चनैर्बाणैर्महावीर्यो महाभुजः ।

युगान्त इव भूतानि सागरानपि निर्दहेत् ॥ २१ ॥

' वे महापराक्रमी महाबाहु श्रीराम अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा सारे समुद्रोंको भी उसी प्रकार दग्ध कर सकते हैं, जैसे संवर्तक अग्निदेव प्रलयकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म कर डालते हैं ॥ २१ ॥

स तादृशः सिंहबलो वृषभाक्षो नरर्षभः ।

स्वयमेव हतः पित्रा जलजेनात्मजो यथा ॥ २२ ॥

' सिंहके समान बल और बैलके समान बड़े - बड़े नेत्रवाला वैसा नरश्रेष्ठ वीर पुत्र स्वयं अपने पिताके ही हाथोंद्वारा मारा गया ( राज्यसे वञ्चित कर दिया गया ) । ठीक उसी तरह, जैसे मत्स्यका बच्चा अपने पिता । मत्स्यके द्वारा ही खा लिया जाता है ॥२२ ॥

पृष्ठ 420

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 420 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

द्विजातिचरितो धर्मः शास्त्रे दृष्टः सनातनैः ।

यदि ते धर्मनिरते त्वया पुत्रे विवासिते ॥ २३ ॥

' आपके द्वारा धर्मपरायण पुत्रको देशनिकाला दे दिया गया, अतः यह प्रश्न उठता है कि सनातन ऋषियोंने वेदमें जिसका साक्षात्कार किया है तथा श्रेष्ठ द्विज जिसे अपने आचरणमें लाये हैं, वह धर्म आपकी दृष्टिमें सत्य है या नहीं ॥ २३ ॥

गतिरेका पतिर्नार्या द्वितीया गतिरात्मजः ।

तृतीया ज्ञातयो राजंश्चतुर्थी नैव विद्यते ॥ २४ ॥

' राजन्! नारीके लिये एक सहारा उसका पति है, दूसरा उसका पुत्र है तथा तीसरा सहारा उसके पिता -भाई आदि बन्धु - बान्धव हैं, चौथा कोई सहारा उसके लिये नहीं है ॥ २४ ॥

तत्र त्वं मम नैवासि रामश्च वनमाहितः ।

न वनं गन्तुमिच्छामि सर्वथा हा हता त्वया ॥ २५ ॥

' इन सहारोंमेंसे आप तो मेरे हैं ही नहीं ( क्योंकि आप सौतके अधीन हैं ) । दूसरा सहारा श्रीराम हैं, जो वनमें भेज दिये गये ( और बन्धु - बान्धव भी दूर हैं । अतः तीसरा सहारा भी नहीं रहा ) । आपकी सेवा छोड़कर मैं श्रीरामके पास वनमें जाना नहीं चाहती हूँ, इसलिये सर्वथा आपके द्वारा मारी ही गयी ॥ २५ ॥

हतं त्वया राष्ट्रमिदं राज्यं हताः स्म सर्वाः सह मन्त्रिभिश्च । हता सपुत्रास्मि हताश्च पौराः सुतश्च भार्या च तव प्रहृष्टौ ॥२६ ॥

' आपने श्रीरामको वनमें भेजकर इस राष्ट्रका तथा आस- पासके अन्य राज्योंका भी नाश कर डाला, मन्त्रियोंसहित सारी प्रजाका वध कर डाला । आपके द्वारा पुत्रसहित मैं भी मारी गयी और इस नगर के निवासी भी नष्टप्राय हो गये । केवल आपके पुत्र भरत और पत्नी कैकेयी दो ही प्रसन्न हुए हैं ' ॥ २६ ॥

इमां गिरं दारुणशब्दसंहितां निशम्य रामेति मुमोह दुःखितः । ततः स शोकं प्रविवेश पार्थिवः स्वदुष्कृतं चापि पुनस्तथास्मरत् ॥ २७ ॥

कौसल्याकी यह कठोर शब्दोंसे युक्त वाणी सुनकर राजा दशरथको बड़ा दुःख हुआ । वे ' हा राम! ' कहकर मूच्छित हो गये । राजा शोकमें डूब गये । फिर उसी समय उन्हें अपने एक पुराने दुष्कर्मका स्मरण हो आया, । जिसके कारण उन्हें यह दुःख प्राप्त हुआ था ॥ २७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६१ ॥

द्विषष्टितमः सर्गः दुःखी हुए राजा दशरथका कौसल्याको हाथ जोड़कर मनाना और कौसल्याका उनके चरणोंमें पड़कर क्षमा माँगना

एवं तु क्रुद्धया राजा राममात्रा सशोकया ।

श्रावितः परुषं वाक्यं चिन्तयामास दुःखितः ॥ १ ॥

शोकमग्न हो कुपित हुई श्रीराममाता कौसल्याने जब राजा दशरथको इस प्रकार कठोर वचन सुनाया, तब वे दुःखित होकर बड़ी चिन्तामें पड़ गये ॥ १ ॥

चिन्तयित्वा स च नृपो मोहव्याकुलितेन्द्रियः ।

अथ दीर्घेण कालेन संज्ञामाप परंतपः ॥ २ ॥

चिन्तित होनेके कारण राजाकी सारी इन्द्रियाँ मोहसे आच्छन्न हो गयीं । तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा दशरथको चेत हुआ ॥२ ॥

स संज्ञामुपलभ्यैव दीर्घमुष्णं च निःश्वसन् ।

कौसल्यां पार्श्वतो दृष्ट्वा ततश्चिन्तामुपागमत् ॥ ३ ॥ ।

होशमें आनेपर उन्होंने गरम - गरम लंबी साँस ली और कौसल्याको बगलमें बैठी हुई देख वे फिर चिन्तामें पड़ गये ॥ ३ ॥

तस्य चिन्तयमानस्य प्रत्यभात् कर्म दुष्कृतम् ।

यदनेन कृतं पूर्वमज्ञानाच्छब्दवेधिना ॥ ४ ॥

चिन्तामें पड़े - पड़े ही उन्हें अपने एक दुष्कर्मका स्मरण हो आया, जो इन शब्दवेधी बाण चलानेवाले नरेशके द्वारा पहले अनजानमें बन गया था ॥ ४ ॥

अमनास्तेन शोकेन रामशोकेन च प्रभुः ।

द्वाभ्यामपि महाराजः शोकाभ्यामभितप्यते ॥ ५ ॥

उस शोकसे तथा श्रीरामके शोकसे भी राजाके । मनमें बड़ी वेदना हुई । उन दोनों ही शोकोंसे महाराज संतप्त होने लगे ॥ ५ ॥