वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 441–450
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450
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अयोध्याकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ४२ ९ रात बीतकर प्रायः सबेरा हो चला था तभी उस । अप्रिय स्वप्नको देखकर राजाधिराज दशरथके पुत्र भरत मन - ही - मन बहुत संतप्त हुए ॥ २ ॥
तप्यमानं तमाज्ञाय वयस्याः प्रियवादिनः ।
आयासं विनयिष्यन्तः सभायां चक्रिरे कथाः ॥ ३ ॥
उन्हें चिन्तित जान उनके अनेक प्रियवादी मित्रोंने उनका मानसिक क्लेश दूर करनेकी इच्छासे एक गोष्ठी की और उसमें अनेक प्रकारकी बातें करने लगे ॥ ३ ॥
वादयन्ति तदा शान्तिं लासयन्त्यपि चापरे ।
नाटकान्यपरे स्माहुर्हास्यानि विविधानि च ॥ ४ ॥
कुछ लोग वीणा आदि बजाने लगे । दूसरे लोग उनके खेदकी शान्तिके लिये नृत्य कराने लगे । दूसरे मित्रोंने नाना प्रकारके नाटकोंका आयोजन किया, जिनमें हास्यरसकी प्रधानता थी ॥४ ॥
स तैर्महात्मा भरतः सखिभिः प्रियवादिभिः ।
गोष्ठीहास्यानि कुर्वद्भिर्न प्राहृष्यत राघवः ॥ ५ ॥
किंतु रघुकुलभूषण महात्मा भरत उन प्रियवादी मित्रोंकी गोष्ठीमें हास्यविनोद करनेपर भी प्रसन्न नहीं हुए ॥ ५ ॥
तमब्रवीत् प्रियसखो भरतं सखिभिर्वृतम् ।
सुहृद्भिः पर्युपासीनः किं सखे नानुमोदसे ॥ ६ ॥
तब सुहृदोंसे घिरकर बैठे हुए एक प्रिय मित्रने मित्रोंके बीचमें विराजमान भरतसे पूछा - ' सखे! तुम आज प्रसन्न क्यों नहीं होते हो? ' ॥ ६ ॥
एवं ब्रुवाणं सुहृदं भरतः प्रत्युवाच ह ।
शृणु त्वं यन्निमित्तं मे दैन्यमेतदुपागतम् ॥ ७ ॥
स्वजे पितरमद्राक्षं मलिनं मुक्तमूर्धजम् ।
पतन्तमद्रिशिखरात् कलुषे गोमये हृदे ॥ ८ ॥
इस प्रकार पूछते हुए सुहृद्को भरतने इस प्रकार उत्तर दिया — ' मित्र! जिस कारणसे मेरे मनमें यह दैन्य आया है, वह बताता हूँ, सुनो । मैंने आज स्वप्नमें अपने पिताजीको देखा है । उनका मुख मलिन था; बाल खुले हुए थे और वे पर्वतकी चोटीसे एक ऐसे गंदे गढेमें गिर पड़े थे, जिसमें गोबर भरा हुआ था ॥ ७-८ ॥
प्लवमानश्च मे दृष्टः स तस्मिन् गोमये हृदे ।
पिबन्नञ्जलिना तैलं हसन्निव मुहुर्मुहुः ॥ ९ ॥
' मैंने उस गोबरके कुण्डमें उन्हें तैरते देखा था । वे अञ्जलिमें तेल लेकर पी रहे थे और बारम्बार हँसते हुए - से प्रतीत होते थे ॥ ९ ॥
ततस्तिलोदनं भुक्त्वा पुनः पुनरधःशिराः ।
तैलेनाभ्यक्तसर्वाङ्गस्तैलमेवान्वगाहत ॥ १० ॥
' फिर उन्होंने तिल और भात खाया । इसके बाद उनके सारे शरीरमें तेल लगाया गया और फिर वे सिर नीचे किये तैलमें ही गोते लगाने लगे ॥ १० ॥
स्वप्नेऽपि सागरं शुष्कं चन्द्रं च पतितं भुवि ।
उपरुद्धां च जगतीं तमसेव समावृताम् ॥ ११ ॥
' स्वप्नमें ही मैंने यह भी देखा है कि समुद्र सूख गया, चन्द्रमा पृथ्वीपर गिर पड़े हैं, सारी पृथ्वी उपद्रवसे ग्रस्त और अन्धकारसे आच्छादित सी हो गयी है ॥ ११ ॥
औपवाह्यस्य नागस्य विषाणं शकलीकृतम् ।
सहसा चापि संशान्ता ज्वलिता जातवेदसः ॥ १२ ॥
' महाराजकी सवारीके काममें आनेवाले हाथीका दाँत टूक - टूक हो गया है और पहलेसे प्रज्वलित होती हुई आग सहसा बुझ गयी है ॥ १२ ॥
अवदीर्णां च पृथिवीं शुष्कांश्च विविधान् द्रुमान् ।
अहं पश्यामि विध्वस्तान् सधूमांश्चैव पर्वतान् ॥ १३ ॥
' मैंने यह भी देखा है कि पृथ्वी फट गयी है, नाना प्रकारके वृक्ष सूख गये हैं तथा पर्वत ढह गये हैं और उनसे धुआँ निकल रहा है ॥१३ ॥
पीठे कार्ष्णायसे चैव निषष्णणं कृष्णवाससम् ।
प्रहरन्ति स्म राजानं प्रमदाः कृष्णपिङ्गलाः ॥ १४ ॥
' काले लोहेकी चौकीपर महाराज दशरथ बैठे हैं । उन्होंने काला ही वस्त्र पहन रखा है और काले एवं पिङ्गलवर्णकी स्त्रियाँ उनके ऊपर प्रहार करती हैं ॥ १४ ॥
त्वरमाणश्च धर्मात्मा रक्तमाल्यानुलेपनः ।
रथेन खरयुक्तेन प्रयातो दक्षिणामुखः ॥ १५ ॥
' धर्मात्मा राजा दशरथ लाल रंगके फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये गधे जुते हुए रथपर बैठकर बड़ी तेजीके साथ दक्षिण दिशाकी ओर गये हैं ॥
प्रहसन्तीव राजानं प्रमदा रक्तवासिनी ।
प्रकर्षन्ती मया दृष्टा राक्षसी विकृतानना ॥ १६ ॥
' लाल वस्त्र धारण करनेवाली एक स्त्री, जो विकराल मुखवाली राक्षसी प्रतीत होती थी, महाराजको हँसती हुई - सी खींचकर लिये जा रही थी । यह दृश्य भी मेरे देखनेमें आया ॥ १६ ॥
एवमेतन्मया दृष्टमिमां रात्रिं भयावहाम् ।
अहं रामोऽथवा राजा लक्ष्मणो वा मरिष्यति ॥ १७ ॥
' इस प्रकार इस भयंकर रात्रिके समय मैंने यह स्वप्न देखा है । इसका फल यह होगा कि मैं, श्रीराम,
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४३० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे राजा दशरथ अथवा लक्ष्मण - इनमेंसे किसी एककी अवश्य मृत्यु होगी ॥ १७ ॥
नरो यानेन यः स्वजे खरयुक्तेन याति हि ।
अचिरात्तस्य धूम्राग्रं चितायां सम्प्रदृश्यते ॥ १८ ॥
एतन्निमित्तं दीनोऽहं न वचः प्रतिपूजये ।
शुष्यतीव च मे कण्ठो न स्वस्थमिव मे मनः ॥ १ ९ ॥
' जो मनुष्य स्वप्नमें गधे जुते हुए रथसे यात्रा करता दिखायी देता है, उसकी चिताका धुआँ शीघ्र ही देखनेमें आता है । यही कारण है कि मैं दुःखी हो रहा हूँ और आपलोगोंकी बातोंका आदर नहीं करता हूँ । मेरा गला सूखा - सा जा रहा है और मन अस्वस्थ - सा हो चला है ॥ न पश्यामि भयस्थानं भयं चैवोपधारये ।
भ्रष्टश्च स्वरयोगो मे छाया चापगता मम ।
जुगुप्सु इव चात्मानं न च पश्यामि कारणम् ॥ २० ॥ ।
' मैं भयका कोई कारण नहीं देखता तो भी भयको प्राप्त हो रहा हूँ । मेरा स्वर बदल गया है तथा मेरी कान्ति भी फीकी पड़ गयी है । मैं अपने - आपसे घृणा - सी करने लगा हूँ, परंतु इसका कारण क्या है, यह मेरी समझमें नहीं आता ॥ २० ॥
इमां च दुःस्वप्नगतिं निशम्य हि त्वनेकरूपामवितर्कितां पुरा । भयं महत् तुद् हृदयान्न याति मे विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम् ॥ २१ ॥
' जिनके विषयमें मैंने पहले कभी सोचातक नहीं था, ऐसे अनेक प्रकारके दुःस्वप्नोंको देखकर तथा महाराजका दर्शन इस रूपमें क्यों हुआ, जिसकी मेरे मनमें कोई कल्पना नहीं थी - यह सोचकर मेरे हृदयसे महान् भय दूर नहीं हो रहा है'॥२१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ९ ॥ सप्ततितमः सर्गः दूतोंका भरतको उनके नाना और मामाके लिये उपहारकी वस्तुएँ अर्पित करना और वसिष्ठजीका संदेश सुनाना, भरतका पिता आदिकी कुशल पूछना और नानासे आज्ञा तथा उपहारकी वस्तुएँ पाकर शत्रुघ्नके साथ अयोध्याकी
भरते ब्रुवति स्वप्नं दूतास्ते क्लान्तवाहनाः ।
प्रविश्यासापरिखं रम्यं राजगृहं पुरम् ॥ १ ॥
इस प्रकार भरत जब अपने मित्रोंको स्वप्नका वृत्तान्त बता रहे थे, उसी समय थके हुए वाहनोंवाले वे दूत उस रमणीय राजगृहपुरमें प्रविष्ट हुए, जिसकी खाईको लाँघनेका कष्ट शत्रुओंके लिये असह्य था ॥ १ ॥
समागम्य च राज्ञा ते राजपुत्रेण चार्चिताः ।
राज्ञः पादौ गृहीत्वा च तमूचुर्भरतं वचः ॥ २ ॥
नगरमें आकर वे दूत केकयदेशके राजा और राजकुमारसे मिले तथा उन दोनोंने भी उनका सत्कार किया । फिर वे भावी राजा भरतके चरणोंका स्पर्श करके उनसे इस प्रकार बोले - ॥ २ ॥
पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे च मन्त्रिणः ।
त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया ॥ ३ ॥
' कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियोंने आपसे
कुशल - मङ्गल कहा है । अब आप यहाँसे शीघ्र चलिये ।
अयोध्यामें आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है ॥ ३ ॥
ओर प्रस्थान करना
इमानि च महार्हाणि वस्त्राण्याभरणानि च ।
प्रतिगृह्य विशालाक्ष मातुलस्य च दापय ॥४ ॥
' विशाल नेत्रोंवाले राजकुमार! ये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण आप स्वयं भी ग्रहण कीजिये और अपने मामाको भी दीजिये ॥४ ॥
अत्र विंशतिकोट्यस्तु नृपतेर्मातुलस्य ते दशकोट्यस्तु सम्पूर्णास्तथैव च नृपात्मज ॥ ५ ॥
' राजकुमार! यहाँ जो बहुमूल्य सामग्री लायी गयी है, इसमें बीस करोड़की लागतका सामान आपके नाना केकेयनरेशके लिये है और पूरे दस करोड़की लागतका सामान आपके मामाके लिये है ' ॥ ५ ॥
प्रतिगृह्य तु तत् सर्वं स्वनुरक्तः सुहृज्जने ।
दूतानुवाच भरतः कामैः सम्प्रतिपूज्य तान् ॥ ६ ॥
वे सारी वस्तुएँ लेकर मामा आदि सुहृदोंमें अनुराग रखनेवाले भरतने उन्हें भेंट कर दीं । तत्पश्चात् इच्छानुसार वस्तुएँ देकर दूतोंका सत्कार करनेके अनन्तर उनसे इस प्रकार कहा- ॥६ ॥
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अयोध्याकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ४३१
कच्चित् स कुशली राजा पिता दशरथो मम ।
कच्चिदारोग्यता रामे लक्ष्मणे च महात्मनि ॥ ७ ॥
' मेरे पिता महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न? महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण नीरोग तो हैं न? ॥७ ॥
आर्या च धर्मनिरता धर्मज्ञा धर्मवादिनी ।
अरोगा चापि कौसल्या माता रामस्य धीमतः ॥ ८ ॥
' धर्मको जानने और धर्मकी ही चर्चा करनेवाली बुद्धिमान् श्रीरामकी माता धर्मपरायणा आर्या कौसल्याको तो कोई रोग या कष्ट नहीं है? ॥ ८ ॥
कच्चित् सुमित्रा धर्मज्ञा जननी लक्ष्मणस्य या ।
शत्रुघ्नस्य च वीरस्य अरोगा चापि मध्यमा ॥ ९ ॥
' क्या वीर लक्ष्मण और शत्रुघ्नकी जननी मेरी मझली माता धर्मज्ञा सुमित्रा स्वस्थ और सुखी हैं? ॥ ९ ॥
आत्मकामा सदा चण्डी क्रोधना प्राज्ञमानिनी ।
अरोगा चापि मे माता कैकेयी किमुवाच ह ॥ १० ॥
' जो सदा अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहती और अपनेको बड़ी बुद्धिमती समझती है, उस उग्र स्वभाववाली कोपशीला मेरी माता कैकेयीको तो कोई कष्ट नहीं है? उसने क्या कहा है? ' ॥ १० ॥
एवमुक्तास्तु ते दूता भरतेन महात्मना ।
ऊचुः सम्प्रश्रितं वाक्यमिदं तं भरतं तदा ॥११ ॥
महात्मा भरतके इस प्रकार पूछनेपर उस समय दूतोंने विनयपूर्वक उनसे यह बात कही - ॥ ११ ॥
कुशलास्ते नरव्याघ्र येषां कुशलमिच्छसि ।
श्रीश्च त्वां वृणुते पद्मा युज्यतां चापि ते रथः ॥ १२ ॥
‘ पुरुषसिंह! आपको जिनका कुशल - मङ्गल अभिप्रेत है, वे सकुशल हैं । हाथमें कमल लिये रहनेवाली लक्ष्मी ( शोभा ) आपका वरण कर रही है । अब यात्राके लिये शीघ्र ही आपका रथ जुतकर तैयार हो जाना चाहिये ' ॥ १२ ॥
भरतश्चापि तान् दूतानेवमुक्तोऽभ्यभाषत ।
आपृच्छेऽहं महाराजं दूताः संत्वरयन्ति माम् ॥ १३ ॥
उन दूतोंके ऐसा कहनेपर भरतने उनसे कहा— ' अच्छा मैं महाराजसे पूछता हूँ कि दूत मुझसे शीघ्र अयोध्या
चलनेके लिये कह रहे हैं । आपकी क्या आज्ञा है? ' ॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा तु तान् दूतान् भरतः पार्थिवात्मजः ।
दूतैः संचोदितो वाक्यं मातामहमुवाच ह ॥ १४ ॥
दूतोंसे ऐसा कहकर राजकुमार भरत उनसे प्रेरित हो नानाके पास जाकर बोले —॥१४ ॥
राजन् पितुर्गमिष्यामि सकाशं दूतचोदितः ।
पुनरप्यहमेष्यामि यदा मे त्वं स्मरिष्यसि ॥ १५ ॥
‘ राजन्! मैं दूतोंके कहनेसे इस समय पिताजीके पास जा रहा हूँ । पुनः जब आप मुझे याद करेंगे, यहाँ आ जाऊँगा ' ॥
भरतेनैवमुक्तस्तु मातामहस्तदा ।
तमुवाच शुभं वाक्यं शिरस्याघ्राय राघवम् ॥ १६ ॥
भरतके ऐसा कहनेपर नाना केकयनरेशने उस समय उन रघुकुलभूषण भरतका मस्तक सूँघकर यह शुभ वचन कहा— ॥१६ ॥
गच्छ तातानुजाने त्वां कैकेयी सुप्रजास्त्वया ।
मातरं कुशलं ब्रूयाः पितरं च परंतप ॥ १७ ॥
' तात! जाओ, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ । तुम्हें पाकर कैकेयी उत्तम संतानवाली हो गयी । शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! तुम अपनी माता और पितासे यहाँका कुशल- समाचार कहना ॥ १७ ॥
पुरोहितं च कुशलं ये चान्ये द्विजसत्तमाः ।
तौ च तात महेष्वासौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १८ ॥
' तात! अपने पुरोहितजीसे तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उनसे भी मेरा कुशल- मङ्गल कहना । उन महाधनुर्धर दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे भी यहाँका कुशल- समाचार सुना देना ' ॥ १८ ॥
तस्मै हस्त्युत्तमांश्चित्रान् कम्बलानजिनानि च ।
सत्कृत्य केकयो राजा भरताय ददौ धनम् ॥ १ ९ ॥
ऐसा कहकर केकयनरेशने भरतका सत्कार करके उन्हें बहुत - से उत्तम हाथी, विचित्र कालीन, मृगचर्म और बहुत - सा धन दिये ॥ १ ९ ॥
अन्तःपुरेऽतिसंवृद्धान् व्याघ्रवीर्यबलोपमान् ।
दंष्ट्रायुक्तान् महाकायान् शुनश्चोपायनं ददौ ॥ २० ॥
जो अन्तःपुरमें पाल - पोसकर बड़े किये गये थे, बल और पराक्रममें बाघोंके समान थे, जिनकी दाढ़ें बड़ी - बड़ी और काया विशाल थी, ऐसे बहुत - से कुत्ते भी केकयनरेशने भरतको भेंटमें दिये ॥ २० ॥
रुक्मनिष्कसहस्त्रे द्वे षोडशाश्वशतानि च ।
सत्कृत्य केकयीपुत्रं केकयो धनमादिशत् ॥ २१ ॥
दो हजार सोनेकी मोहरें और सोलह सौ घोड़े भी दिये । इस प्रकार केकयनरेशने केकयीकुमार भरतको सत्कारपूर्वक बहुत सा धन दिया ॥ २१ ॥
तदामात्यानभिप्रेतान् विश्वास्यांश्च गुणान्वितान् ।
ददावश्वपतिः शीघ्रं भरतायानुयायिनः ॥ २२ ॥
उस समय केकयनरेश अश्वपतिने अपने अभीष्ट, विश्वासपात्र और गुणवान् मन्त्रियोंको भरतके साथ जानेके लिये शीघ्र आज्ञा दी ॥ २२ ॥
ऐरावतानैन्द्रशिरान् नागान् वै प्रियदर्शनान् ।
। खरान् शीघ्रान् सुसंयुक्तान् मातुलोऽस्मै धनं ददौ ॥ २३ ॥
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४३२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भरतके मामाने उन्हें उपहारमें दिये जानेवाले फलके रूपमें इरावान् पर्वत और इन्द्रशिर नामक स्थानके आस - पास उत्पन्न होनेवाले बहुत - से सुन्दर - सुन्दर हाथी तथा तेज चलनेवाले सुशिक्षित खच्चर दिये ॥ २३ ॥
स दत्तं केकयेन्द्रेण धनं तन्नाभ्यनन्दत ।
भरतः केकयीपुत्रो गमनत्वरया तदा ॥ २४ ॥
उस समय जानेकी जल्दी होनेके कारण केकयीपुत्र भरतने केकयराजके दिये हुए उस धनका अभिनन्दन नहीं किया ॥ २४ ॥
बभूव ह्यस्य हृदये चिन्ता सुमहती तदा ।
त्वरया चापि दूतानां स्वप्नस्यापि च दर्शनात् ॥ २५ ॥
उस अवसरपर उनके हृदयमें बड़ी भारी चिन्ता हो रही थी । इसके दो कारण थे, एक तो दूत वहाँसे चलनेकी जल्दी मचा रहे थे, दूसरे उन्हें दुःस्वप्नका दर्शन भी हुआ था ॥
स स्ववेश्माभ्यतिक्रम्य नरनागाश्वसंकुलम् ।
प्रपेदे सुमहच्छ्रीमान् राजमार्गमनुत्तमम् ॥ २६ ॥
वे यात्राकी तैयारीके लिये पहले अपने आवास-स्थानपर गये । फिर वहाँसे निकलकर मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंसे भरे हुए परम उत्तम राजमार्गपर गये । उस समय भरतजीके पास बहुत बड़ी सम्पत्ति जुट गयी थी ॥
अभ्यतीत्य ततोऽपश्यदन्तःपुरमनुत्तमम् ।
ततस्तद् भरतः श्रीमानाविवेशानिवारितः ॥ २७॥
सड़कको पार करके श्रीमान् भरतने राजभवनके परम उत्तम अन्तःपुरका दर्शन किया और उसमें वे बेरोक - टोक घुस गये ॥२७ ॥
स मातामहमापृच्छ्य मातुलं च युधाजितम् ।
रथमारुह्य भरतः शत्रुघ्नसहितो ययौ ॥ २८ ॥
वहाँ नाना, नानी, मामा युधाजित् और मामीसे विदा ले शत्रुघ्नसहित रथपर सवार हो भरतने यात्रा आरम्भ की ॥ २८ ॥
रथान् मण्डलचक्रांश्च योजयित्वा परः शतम् ।
उष्ट्रगोऽश्वखरैर्भृत्या यान्तमन्वयुः ॥ २ ९ ॥
गोलाकार पहियेवाले सौसे भी अधिक रथोंमें ऊँट, बैल, घोड़े और खच्चर जोतकर सेवकोंने जाते हुए भरतका अनुसरण किया ॥ २ ९ ॥ बलेन गुप्तो भरतो महात्मा सहार्यकस्यात्मसमैरमात्यैः आदाय शत्रुघ्नमपेतशत्रु-गृहाद् ययौ सिऽद्ध इवेन्द्रलोकात् ॥ ३० ॥
शत्रुहीन महामना भरत अपनी और मामा सेनासे सुरक्षित हो शत्रुघ्नको अपने साथ रथपर लेकर नानाके अपने ही समान माननीय मन्त्रियोंके साथ मामाके घरसे चले; मानो कोई सिद्ध पुरुष इन्द्रलोकसे । किसी अन्य स्थानके लिये प्रस्थित हुआ हो ॥ ३० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७० ॥
एकसप्ततितमः सर्गः रथ और सेनासहित भरतकी यात्रा, विभिन्न स्थानोंको पार करके उनका उज्जिहाना नगरीके उद्यानमें पहुँचना और सेनाको धीरे - धीरे आनेकी आज्ञा दे स्वयं रथद्वारा तीव्रवेगसे आगे बढ़ते हुए सालवनको पार करके अयोध्याके निकट जाना, वहाँसे अयोध्याकी दुरवस्था देखते हुए आगे बढ़ना और सारथिसे अपना दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट करते हुए राजभवनमें प्रवेश करना स प्राङ्मुखो राजगृहादभिनिर्याय वीर्यवान् । राजगृहसे निकलकर पराक्रमी भरत पूर्वदिशाकी ततः सुदामां द्युतिमान् संतीर्यावेक्ष्य तां नदीम् ॥ १ ॥ ओर चले । * उन तेजस्वी राजकुमारने मार्गमें सुदामा
ह्रादिनीं दूरपारां च प्रत्यक्स्त्रोतस्तरङ्गिणीम् । नदीका दर्शन करके उसे पार किया । तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनन्दन शतद्रुमतरच्छ्रीमान् नदीमिक्ष्वाकुनन्दनः ॥ २ ॥ | श्रीमान् भरतने, जिसका पाट दूरतक फैला हुआ था, उस
* अयोध्यासे जो पाँच दूत चले थे, वे सीधी राहसे राजगृहमें आये थे; अतः उनके मार्गमें जो - जो स्थान पड़े थे, वे भरतके मार्गमें नहीं पड़े थे । भरतके साथ रथ और चतुरङ्गिणी सेना थी, अतः उसके निर्वाहके अनुकूल मार्गसे चलकर वे अयोध्या पहुँचे थे । इसलिये इनके मार्गमें सर्वथा नये ग्रामों और स्थानोंका उल्लेख मिलता है ।
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अयोध्याकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ४३३
ह्लादिनी नदीको लाँघकर पश्चिमाभिमुख बहनेवाली शतद्रु ।
नदी ( सतलज ) को पार किया ॥ १-२ ॥
ऐलधाने नदीं तीर्त्वा प्राप्य चापरपर्वतान् ।
शिलामाकुर्वतीं तीर्त्वा आग्नेयं शल्यकर्षणम् ॥ ३ ॥
वहाँसे ऐलधान नामक गाँवमें जाकर वहाँ बहनेवाली नदीको पार किया । तत्पश्चात् वे अपरपर्वत नामक जनपदमें गये । वहाँ शिला नामकी नदी बहती थी, जो अपने भीतर पड़ी हुई वस्तुको शिलास्वरूप बना देती थी । उसे पार करके भरत वहाँसे आग्नेय कोणमें स्थित शल्यकर्षण नामक देशमें गये, जहाँ शरीरसे काँटेको निकालनेमें सहायता करनेवाली ओषधि उपलब्ध होती थी ॥३ ॥
सत्यसंधः शुचिर्भूत्वा प्रेक्षमाणः शिलावहाम् ।
अभ्यगात् स महाशैलान् वनं चैत्ररथं प्रति ॥ ४ ॥
तदनन्तर सत्यप्रतिज्ञ भरतने पवित्र होकर शिलावहा नामक नदीका दर्शन किया ( जो अपनी प्रखर धारासे शिलाखण्डों - बड़ी - बड़ी चट्टानोंको भी बहा ले जानेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध थी ) । उस नदीका दर्शन करके वे आगे बढ़ गये और बड़े - बड़े पर्वतोंको लाँघते हुए चैत्ररथ नामक वनमें जा पहुँचे ॥४ ॥
सरस्वतीं च गङ्गां च युग्मेन प्रतिपद्य च ।
उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारुण्डं प्राविशद् वनम् ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा गङ्गाकी धारा - विशेषके सङ्गमसे होते हुए उन्होंने वीरमत्स्य देशके उत्तरवर्ती देशोंमें पदार्पण किया और वहाँसे आगे बढ़कर वे भारुण्डवनके भीतर गये ॥५ ॥
वेगिनीं च कुलिङ्गाख्यां ह्रादिनीं पर्वतावृताम् ।
यमुनां प्राप्य संतीर्णो बलमाश्वासयत् तदा ॥ ६ ॥
फिर अत्यन्त वेगसे बहनेवाली तथा पर्वतोंसे घिरी होनेके कारण अपने प्रखर प्रवाहके द्वारा कलकल नाद करनेवाली कुलिङ्गा नदीको पार करके यमुनाके तटपर पहुँचकर उन्होंने सेनाको विश्राम कराया ॥६ ॥
शीतीकृत्य तु गात्राणि क्लान्तानाश्वास्य वाजिनः ।
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च प्रायादादाय चोदकम् ॥ ७ ॥
राजपुत्रो महारण्यमनभीक्ष्णोपसेवितम् ।
भद्रो भद्रेण यानेन मारुतः खमिवात्यगात् ॥ ८ ॥
थके हुए घोड़ोंको नहलाकर उनके अङ्गको शीतलता प्रदान करके उन्हें छायामें घास आदि देकर आराम करनेका अवसर दे राजकुमार भरत स्वयं भी स्नान और जलपान करके रास्तेके लिये जल साथ ले आगे बढ़े । मङ्गलाचारसे युक्त हो माङ्गलिक रथके द्वारा उन्होंने, जिसमें मनुष्योंका बहुधा आना - जाना या रहना नहीं होता था, उस विशाल वनको उसी प्रकार वेगपूर्वक पार किया, जैसे वायु आकाशको लाँघ जाती है ॥ ७-८ ॥
भागीरथीं दुष्प्रतरां सोंऽशुधाने महानदीम् ।
उपायाद् राघवस्तूर्णं प्राग्वटे विश्रुते पुरे ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् अंशुधान नामक ग्रामके पास महानदी भागीरथी गङ्गाको दुस्तर जानकर रघुनन्दन भरत तुरंत ही प्राग्वट नामसे विख्यात नगरमें आ गये ॥ ९ ॥
स गङ्गं प्राग्वटे तीर्त्वा समायात् कुटिकोष्टिकाम् ।
सबलस्तां स तीर्त्वाथ समगाद् धर्मवर्धनम् ॥ १० ॥
प्राग्वट नगरमें गङ्गाको पार करके वे कुटिकोष्टिका नामवाली नदीके तटपर आये और सेनासहित उसको भी पार करके धर्मवर्धन नामक ग्राममें जा पहुँचे ॥ १० ॥
तोरणं दक्षिणार्धेन जम्बूप्रस्थं समागमत् ।
वरूथं च ययौ रम्यं ग्रामं दशरथात्मजः ॥ ११ ॥
वहाँसे तोरण ग्रामके दक्षिणार्ध भागमें होते हुए जम्बूप्रस्थमें गये । तदनन्तर दशरथकुमार भरत एक रमणीय ग्राममें गये, जो वरूथके नामसे विख्यात था ॥
तत्र रम्ये वने वासं कृत्वासौ प्राङ्मुखो ययौ ।
उद्यानमुज्जिहानायाः प्रियका यत्र पादपाः ॥ १२ ॥
वहाँ एक रमणीय वनमें निवास करके वे प्रातः काल पूर्व दिशाकी ओर गये । जाते - जाते उज्जिहाना नगरीके उद्यानमें पहुँच गये, जहाँ कदम्ब नामवाले वृक्षोंकी बहुतायत थी ॥ १२ ॥
स तांस्तु प्रियकान् प्राप्य शीघ्रानास्थाय वाजिनः ।
अनुज्ञाप्याथ भरतो वाहिनीं त्वरितो ययौ ॥ १३ ॥
उन कदम्बोंके उद्यानमें पहुँचकर अपने रथमें शीघ्रगामी घोड़ोंको जोतकर सेनाको धीरे - धीरे आनेकी आज्ञा दे भरत तीव्रगतिसे चल दिये ॥१३ ॥
वासं कृत्वा सर्वतीर्थे तीर्त्वा चोत्तानिकां नदीम् ।
अन्या नदीश्च विविधैः पार्वतीयैस्तुरङ्गमैः ॥ १४ ॥
हस्तिपृष्ठकमासाद्य कुटिकामप्यवर्तत ।
ततार च नरव्याघ्रो लोहित्ये च कपीवतीम् ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् सर्वतीर्थ नामक ग्राममें एक रात रहकर उत्तानिका नदी तथा अन्य नदियोंको भी नाना प्रकारके पर्वतीय घोड़ोंद्वारा जुते हुए रथसे पार करके नरश्रेष्ठ भरतजी हस्तिपृष्ठक नामक ग्राममें जा पहुँचे । वहाँसे । आगे जानेपर उन्होंने कुटिका नदी पार की । फिर
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४३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
लोहित्य नामक ग्राममें पहुँचकर कपीवती नामक ।
नदीको पार किया ॥ १४-१५ ॥
एकसाले स्थाणुमतीं विनते गोमतीं नदीम् ।
कलिङ्गनगरे चापि प्राप्य सालवनं तदा ॥ १६ ॥
फिर एकसाल नगरके पास स्थाणुमती और विनत - ग्रामके निकट गोमती नदीको पार करके वे तुरंत ही कलिङ्गनगरके पास सालवनमें जा पहुँचे ॥ १६ ॥
भरतः क्षिप्रमागच्छत् सुपरिश्रान्तवाहनः ।
वनं च समतीत्याशु शर्वर्यामरुणोदये ॥ १७ ॥
अयोध्यां मनुना राज्ञा निर्मितां स ददर्श ह ।
तां पुरीं पुरुषव्याघ्रः सप्तरात्रोषितः पथि ॥ १८ ॥
वहाँ जाते - जाते भरतके घोड़े थक गये । तब उन्हें विश्राम देकर वे रातों - रात शीघ्र ही सालवनको लाँघ गये और अरुणोदयकालमें राजा मनुकी बसायी हुई अयोध्यापुरीका उन्होंने दर्शन किया । पुरुषसिंह भरत मार्गमें सात रातें व्यतीत करके आठवें दिन अयोध्यापुरीका दर्शन कर सके थे ॥ १७-१८ ॥
अयोध्यामग्रतो दृष्ट्वा सारथिं चेदमब्रवीत् ।
एषा नातिप्रतीता मे पुण्योद्याना यशस्विनी ॥ १ ९ ॥
अयोध्या दृश्यते दूरात् सारथे पाण्डुमृत्तिका ।
यज्विभिर्गुणसम्पन्नैब्रीह्मणैर्वेदपारगैः ॥ २० ॥
भूयिष्ठमृद्धैराकीर्णा राजर्षिवरपालिता । सामने अयोध्यापुरीको देखकर वे अपने सारथिसे इस प्रकार बोले — ' सूत! पवित्र उद्यानोंसे सुशोभित यह यशस्विनी नगरी आज मुझे अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देती है । यह वही नगरी है, जहाँ निरन्तर यज्ञ - याग करनेवाले गुणवान् और वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मण निवास करते हैं, जहाँ बहुत - से धनियोंकी भी बस्ती है । तथा राजर्षियोंमें श्रेष्ठ महाराज दशरथ जिसका पालन करते हैं, वही अयोध्या इस समय दूरसे सफेद मिट्टीके दूहकी भाँति दीख रही है ॥ १ ९ -२० ३ ॥ अयोध्यायां पुरा शब्दः श्रूयते तुमुलो महान् ॥ २१ ॥
समन्तान्नरनारीणां तमद्य न शृणोम्यहम् । ' पहले अयोध्यामें चारों ओर नर - नारियोंका महान् तुमुलनाद सुनायी पड़ता था; परंतु आज मैं उसे नहीं सुन रहा हूँ ॥ २१३ ॥
उद्यानानि हि सायाह्ने क्रीडित्वोपरतैर्नरैः ॥ २२ ॥
समन्ताद् विप्रधावद्भिः प्रकाशन्ते ममान्यथा ।
तान्यद्यानुरुदन्तीव परित्यक्तानि कामिभिः ॥ २३ ॥
' सायंकालके समय लोग उद्यानोंमें प्रवेश करके वहाँ क्रीड़ा करते और उस क्रीड़ासे निवृत्त होकर सब ओरसे अपने घरोंकी ओर दौड़ते थे, अतः उस समय इन उद्यानोंकी अपूर्व शोभा होती थी, परंतु आज ये मुझे कुछ और ही प्रकारके दिखायी देते हैं । वे ही उद्यान आज कामीजनोंसे परित्यक्त होकर रोते हुए - से प्रतीत होते हैं ॥ २२-२३ ॥ अरण्यभूतेव पुरी सारथे प्रतिभाति माम् ।
नह्यत्र यानैर्दृश्यन्ते न गजैर्न च वाजिभिः ।
निर्यान्तो वाभियान्तो वा नरमुख्या यथा पुरा ॥ २४ ॥
' सारथे! यह पुरी मुझे जंगल - सी जान पड़ती है । अब यहाँ पहलेकी भाँति घोड़ों, हाथियों तथा दूसरी-दूसरी सवारियोंसे आते - जाते हुए श्रेष्ठ मनुष्य नहीं दिखायी दे रहे हैं ॥ २४ ॥
उद्यानानि पुरा भान्ति मत्तप्रमुदितानि च ।
जनानां रतिसंयोगेष्वत्यन्तगुणवन्ति च ॥ २५ ॥
तान्येतान्यद्य पश्यामि निरानन्दानि सर्वशः ।
स्त्रस्तपर्णैरनुपथं विक्रोशद्भिरिव द्रुमैः ॥ २६ ॥
' जो उद्यान पहले मदमत्त एवं आनन्दमग्न भ्रमरों, कोकिलों और नर - नारियोंसे भरे प्रतीत होते थे तथा लोगोंके प्रेम - मिलनके लिये अत्यन्त गुणकारी ( अनुकूल सुविधाओंसे सम्पन्न ) थे, उन्हींको आज मैं सर्वथा आनन्दशून्य देख रहा हूँ । वहाँ मार्गपर वृक्षोंके जो पत्ते गिर रहे हैं, उनके द्वारा मानो वे वृक्ष करुण क्रन्दन कर रहे हैं ( और उनसे उपलक्षित होनेके कारण वे उद्यान आनन्दहीन प्रतीत होते हैं ) ॥ २५-२६ ॥
नाद्यापि श्रूयते शब्दो मत्तानां मृगपक्षिणाम् ।
सरक्तां मधुरां वाणीं कलं व्याहरतां बहु ॥ २७ ॥
' रागयुक्त मधुर कलरव करनेवाले मतवाले मृगों और पक्षियोंका तुमुल शब्द अभीतक सुनायी नहीं पड़ रहा है ॥ २७ ॥
चन्दनागुरुसम्पृक्तो धूपसम्मूच्छितोऽमलः ।
प्रवाति पवनः श्रीमान् किं नु नाद्य यथा पुरा ॥ २८ ॥
' चन्दन और अगुरुकी सुगन्धसे मिश्रित तथा धूपकी मनोहर गन्धसे व्याप्त निर्मल मनोरम समीर आज पहलेकी भाँति क्यों नहीं प्रवाहित हो रहा है? ॥ २८ ॥
भेरीमृदङ्गवीणानां कोणसंघट्टितः पुनः ।
किमद्य शब्दो विरतः सदादीनगतिः पुरा ॥ २ ९ ॥
' वादनदण्डद्वारा बजायी जानेवाली भेरी, मृदङ्ग और वीणाका जो आघातजनित शब्द होता है, वह पहले | अयोध्यामें सदा होता रहता था, कभी उसकी गति
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अयोध्याकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ४३५
अवरुद्ध नहीं होती थी; परंतु आज वह शब्द न जाने ।
क्यों बंद हो गया है? ॥ २ ९ ॥
अनिष्टानि च पापानि पश्यामि विविधानि च ।
निमित्तान्यमनोज्ञानि तेन सीदति मे मनः ॥ ३० ॥
' मुझे अनेक प्रकारके अनिष्टकारी, क्रूर और अशुभसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं, जिससे मेरा मन खिन्न हो रहा है ॥ ३० ॥
सर्वथा कुशलं सूत दुर्लभं मम बन्धुषु ।
' तथा ह्यसति सम्मोहे हृदयं सीदतीव मे ॥ ३१ ॥
‘ सारथे! इससे प्रतीत होता है कि इस समय मेरे बान्धवोंको कुशल- मङ्गल सर्वथा दुर्लभ है, तभी तो मोहका कोई कारण न होनेपर भी मेरा हृदय बैठा जा रहा है ' ॥ ३१ ॥
विषण्णः श्रान्तहृदयस्त्रस्तः संलुलितेन्द्रियः ।
भरतः प्रविवेशाशु पुरीमिक्ष्वाकुपालिताम् ॥ ३२ ॥
भरत मन - ही - मन बहुत खिन्न थे । उनका हृदय शिथिल हो रहा था । वे डरे हुए थे और उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठी थीं, इसी अवस्थामें उन्होंने शीघ्रतापूर्वक इक्ष्वाकुवंशी राजाओंद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३२ ॥
द्वारेण वैजयन्तेन प्राविशच्छ्रान्तवाहनः ।
द्वाःस्थैरुत्थाय विजयमुक्तस्तैः सहितो ययौ ॥ ३३ ॥
पुरीके द्वारपर सदा वैजयन्ती पताका फहरानेके । कारण उस द्वारका नाम वैजयन्त रखा गया था । ( यह पुरीके पश्चिम भागमें था । ) उस वैजयन्तद्वारसे भरत पुरीके भीतर प्रविष्ट हुए । उस समय उनके रथके घोड़े बहुत थके हुए थे । द्वारपालोंने उठकर कहा - ' महाराजकी जय हो! ' फिर वे उनके साथ आगे बढ़े ॥ ३३ ॥
स त्वनेकाग्रहृदयो द्वाःस्थं प्रत्यर्च्य तं जनम् ।
सूतमश्चपतेः क्लान्तमब्रवीत् तत्र राघवः ॥ ३४ ॥ ।
भरतका हृदय एकाग्र नहीं था - वे घबराये हुए थे । अतः उन रघुकुलनन्दन भरतने साथ आये हुए द्वारपालोंको सत्कारपूर्वक लौटा दिया और केकयराज अश्वपतिके थके- माँदे सारथिसे वहाँ इस प्रकार कहा- ॥ ३४ ॥
किमहं त्वरयाऽऽनीतः कारणेन विनानघ ।
अशुभाशङ्कि हृदयं शीलं च पततीव मे ॥ ३५ ॥
' निष्पाप सूत! मैं बिना कारण ही इतनी उतावलीके साथ क्यों बुलाया गया? इस बातका विचार करके मेरे हृदयमें अशुभकी आशङ्का होती है । मेरा दीनतारहित स्वभाव भी अपनी स्थितिसे भ्रष्ट - सा हो रहा है ॥ ३५ ॥
श्रुता नु यादृशाः पूर्वं नृपतीनां विनाशने ।
आकारांस्तानहं सर्वानिह पश्यामि सारथे ॥ ३६ ॥
' सारथे! अबसे जैसे - जैसे लक्षण सुन मैं यहाँ देख रहा हूँ ॥ सम्मार्जनविहीनानि असंयतकवाटानि बलिकर्मविहीनानि अनाशितकुटुम्बानि पहले मैंने राजाओंके विनाशके रखे हैं, उन सभी लक्षणोंको आज ३६ ॥
परुषाण्युपलक्षये ।
श्रीविहीनानि सर्वशः ॥ ३७ ॥
धूपसम्मोदनेन च ।
प्रभाहीनजनानि च ॥ ३८ ॥
अलक्ष्मीकानि पश्यामि कुटुम्बिभवनान्यहम् । ' मैं देखता हूँ – गृहस्थोंके घरोंमें झाडू नहीं लगी है । वे रूखे और श्रीहीन दिखायी देते हैं । इनकी किवाड़ें खुली हैं । इन घरोंमें बलिवैश्वदेवकर्म नहीं हो रहे हैं । ये धूपकी सुगन्धसे वञ्चित हैं । इनमें रहनेवाले कुटुम्बीजनोंको भोजन नहीं प्राप्त हुआ है तथा ये सारे गृह प्रभाहीन ( उदास ) दिखायी देते हैं । जान पड़ता है— इनमें लक्ष्मीका निवास नहीं है ॥ ३७-३८३ ॥ अपेतमाल्यशोभानि असम्पृष्टाजिराणि च ॥ ३ ९ ॥ देवागाराणि शून्यानि न भान्तीह यथा पुरा । ' देवमन्दिर फूलोंसे सजे हुए नहीं दिखायी देते । इनके आँगन झाड़े - बुहारे नहीं गये हैं । ये मनुष्योंसे सूने हो रहे हैं, अतएव इनकी पहले जैसी शोभा नहीं हो रही है ॥ ३ ९ ३ ॥ देवतार्चाः प्रविद्धाश्च यज्ञगोष्ठास्तथैव च ॥ ४० ॥
माल्यापणेषु राजन्ते नाद्य पण्यानि वा तथा ।
दृश्यन्ते वणिजोऽप्यद्य न यथापूर्वमत्र वै ॥ ४१ ॥
ध्यानसंविग्नहृदया नष्टव्यापारयन्त्रिताः । ' देवप्रतिमाओंकी पूजा बंद हो गयी है । यज्ञशालाओंमें यज्ञ नहीं हो रहे हैं । फूलों और मालाओंके बाजारमें आज बिकनेकी कोई वस्तुएँ नहीं शोभित हो रही हैं । यहाँ पहलेके समान बनिये भी आज नहीं दिखायी देते हैं । चिन्तासे उनका हृदय उद्विग्न जान पड़ता है और अपना व्यापार नष्ट हो जानेके कारण वे संकुचित हो रहे हैं ॥ ४०-४१३ ॥ देवायतनचैत्येषु दीनाः पक्षिमृगास्तथा ॥ ४२ ॥
मलिनं चाश्रुपूर्णाक्षं दीनं ध्यानपरं कृशम् ।
सस्त्रीपुंसं च पश्यामि जनमुत्कण्ठितं पुरे ॥ ४३ ॥
' देवालयों तथा चैत्य ( देव ) वृक्षोंपर जिनका निवास है, वे पशु - पक्षी दीन दिखायी दे रहे हैं । मैं | देखता हूँ, नगरके सभी स्त्री - पुरुषोंका मुख मलिन है,
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४३६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामाय
उनकी आँखोंमें आँसू भरे हैं और वे सब - के - सब दीन, ।
चिन्तित, दुर्बल तथा उत्कण्ठित हैं ' ॥ ४२-४३ ॥
इत्येवमुक्त्वा भरतः सूतं तं दीनमानसः ।
तान्यनिष्टान्ययोध्यायां प्रेक्ष्य राजगृहं ययौ ॥ ४४ ॥
सारथिसे ऐसा कहकर अयोध्यामें होनेवाले उन अनिष्टसूचक चिह्नोंको देखते हुए भरत मन - ही - मन दुःखी हो राजमहलमें गये ॥ ४४ ॥
तां शून्यशृङ्गाटकवेश्मरथ्यां रजोरुणद्वारकवाटयन्त्राम् I दृष्ट्वा पुरीमिन्द्रपुरीप्रकाशां दुःखेन सम्पूर्णतरो बभूव ॥ ४५ ॥
जो अयोध्यापुरी कभी देवराज इन्द्रकी नगरीके समान शोभा पाती थी; उसीके चौराहे, घर और सड़कें आज सूनी दिखायी देती थीं तथा दरवाजोंकी किवाड़ें धूलि - धूसर हो रही थीं, उसकी ऐसी दुर्दशा देख भरत पूर्णतः दुःखमें निमग्न हो गये ॥४५ ॥
बभूव पश्यन् मनसोऽप्रियाणि यान्यन्यदा नास्य पुरे बभूवुः । अवाक्शिरा दीनमना न हृष्टः पितुर्महात्मा प्रविवेश वेश्म ॥ ४६ ॥
उस नगरमें जो पहले कभी नहीं हुई थीं, ऐसी अप्रिय बातोंको देखकर महात्मा भरतने अपना मस्तक नीचेको झुका लिया, उनका हर्ष छिन गया और उन्होंने । दीन - हृदयसे पिताके भवनमें प्रवेश किया ॥ ४६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इकहत्तरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७१ ॥
द्विसप्ततितमः सर्गः भरतका कैकेयीके भवनमें जाकर उसे प्रणाम करना, उसके द्वारा पिताके परलोकवासका समाचार पा दुःखी हो विलाप करना तथा श्रीरामके विषयमें पूछनेपर कैकेयीद्वारा उनका श्रीरामके वनगमनके वृत्तान्तसे अवगत होना
अपश्यंस्तु ततस्तत्र पितरं पितुरालये ।
जगाम भरतो द्रष्टुं मातरं मातुरालये ॥ १ ॥
तदनन्तर पिताके घरमें पिताको न देखकर भरत माताका दर्शन करनेके लिये अपनी माताके महलमें गये ॥ १ ॥
अनुप्राप्तं तु तं दृष्ट्वा कैकेयी प्रोषितं सुतम् ।
उत्पपात तदा हृष्टा त्यक्त्वा सौवर्णमासनम् ॥ २ ॥
अपने परदेश गये हुए पुत्रको घर आया देख उस समय कैकेयी हर्षसे भर गयी और अपने सुवर्णमय आसनको छोड़ उछलकर खड़ी हो गयी ॥२ ॥
स प्रविश्यैव धर्मात्मा स्वगृहं श्रीविवर्जितम् ।
भरतः प्रेक्ष्य जग्राह जनन्याश्चरणौ शुभौ ॥ ३ ॥
धर्मात्मा भरतने अपने उस घरमें प्रवेश करके देखा कि सारा घर श्रीहीन हो रहा है, फिर उन्होंने माताके शुभ चरणोंका स्पर्श किया ॥ ३ ॥
तं मूर्ध्नि समुपाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनम् ।
अङ्के भरतमारोप्य प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ ४ ॥
अपने यशस्वी पुत्र भरतको छातीसे लगाकर कैकेयीने उनका मस्तक सूँघा और उन्हें गोदमें बिठाकर पूछना आरम्भ किया— ॥ ४ ॥
अद्य ते कतिचिद् रात्र्यश्च्युतस्यार्यकवेश्मनः ।
अपि नाध्वश्रमः शीघ्रं रथेनापततस्तव ॥ ५ ॥
' बेटा! तुम्हें अपने नानाके घरसे चले आज कितनी रातें व्यतीत हो गयीं? तुम रथके द्वारा बड़ी शीघ्रताके साथ आये हो । रास्तेमें तुम्हें अधिक थकावट तो नहीं हुई? ॥ ५ ॥
आर्यकस्ते सुकुशली युधाजिन्मातुलस्तव ।
प्रवासाच्च सुखं पुत्र सर्वं मे वक्तुमर्हसि ॥ ६ ॥
' तुम्हारे नाना सकुशल तो हैं न? तुम्हारे मामा युधाजित् तो कुशलसे हैं? बेटा! जब तुम यहाँसे गये थे, तबसे लेकर अबतक सुखसे रहे हो न? ये सारी बातें मुझे बताओ ' ॥ ६ ॥
एवं पृष्टस्तु कैकेय्या प्रियं पार्थिवनन्दनः ।
आचष्ट भरतः सर्वं मात्रे राजीवलोचनः ॥ ७ ॥
कैकेयीके इस प्रकार प्रिय वाणीमें पूछनेपर दशरथनन्दन कमलनयन भरतने माताको सब बातें बतायीं ॥ ७ ॥
अद्य मे सप्तमी रात्रिश्च्युतस्यार्यकवेश्मनः ।
अम्बायाः कुशली तातो युधाजिन्मातुलश्च मे ॥ ८ ॥
( वे बोले - ) ' मा! नानाके घरसे चले मेरी यह
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अयोध्याकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ४३७
सातवीं रात बीती है । मेरे नानाजी और मामा युधाजित् ।
भी कुशलसे हैं ॥ ८ ॥
यन्मे धनं च रलं च ददौ राजा परंतपः ।
परिश्रान्तं पथ्यभवत् ततोऽहं पूर्वमागतः ॥ ९ ॥
राजवाक्यहरैर्दूतैस्त्वर्यमाणोऽहमागतः यदहं प्रष्टुमिच्छामि तदम्बा वक्तुमर्हति ॥ १० ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले केकयनरेशने मुझे जो धन - रत्न प्रदान किये हैं, उनके भारसे मार्गमें सब वाहन थक गये थे, इसलिये मैं राजकीय संदेश लेकर गये हुए दूतोंके जल्दी मचानेसे यहाँ पहले ही चला आया हूँ । अच्छा माँ, अब मैं जो कुछ पूछता हूँ, उसे तुम बताओ ' ॥ ९ -१० ॥
शून्योऽयं शयनीयस्ते पर्यङ्को हेमभूषितः ।
न चायमिक्ष्वाकुजनः प्रहृष्टः प्रतिभाति मे ॥ ११ ॥
' यह तुम्हारी शय्या सुवर्णभूषित पलंग इस समय सूना है, इसका क्या कारण है ( आज यहाँ महाराज उपस्थित क्यों नहीं हैं )? ये महाराजके परिजन आज प्रसन्न क्यों नहीं जान पड़ते हैं? ॥ ११ ॥
राजा भवति भूयिष्ठमिहाम्बाया निवेशने ।
तमहं नाद्य पश्यामि द्रष्टुमिच्छन्निहागतः ॥ १२ ॥
' महाराज ( पिताजी ) प्रायः माताजीके ही महलमें रहा करते थे, किंतु आज मैं उन्हें यहाँ नहीं देख रहा हूँ । मैं उन्हींका दर्शन करनेकी इच्छासे यहाँ आया हूँ ॥
पितुर्ग्रहीष्ये पादौ च तं ममाख्याहि पृच्छतः ।
आहोस्विदम्बाज्येष्ठायाः कौसल्याया निवेशने ॥ १३ ॥
' मैं पूछता हूँ, बताओ, पिताजी कहाँ हैं? मैं उनके पैर पकडूंगा । अथवा बड़ी माता कौसल्याके घरमें तो वे नहीं हैं? ' ॥ १३ ॥
तं प्रत्युवाच कैकेयी प्रियवद् घोरमप्रियम् ।
अजानन्तं प्रजानन्ती राज्यलोभेन मोहिता ॥ १४ ॥
कैकेयी राज्यके लोभसे मोहित हो रही थी । वह राजाका वृत्तान्त न जाननेवाले भरतसे उस घोर अप्रिय समाचारको प्रिय - सा समझती हुई इस प्रकार बताने लगी - ॥ १४ ॥
या गतिः सर्वभूतानां तां गतिं ते पिता गतः ।
राजा महात्मा तेजस्वी यायजूकः सतां गतिः ॥ १५ ॥
' बेटा! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ बड़े महात्मा, तेजस्वी, यज्ञशील और सत्पुरुषोंके आश्रयदाता थे । एक दिन समस्त प्राणियोंकी जो गति होती है, उसी गतिको वे भी प्राप्त हुए हैं ' ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं धर्माभिजनवाञ्छुचिः ।
पपात सहसा भूमौ पितृशोकबलार्दितः ॥ १६ ॥
हा हतोऽस्मीति कृपणां दीनां वाचमुदीरयन् ।
निपपात महाबाहुर्बाहू विक्षिप्य वीर्यवान् ॥ १७ ॥
भरत धार्मिक कुलमें उत्पन्न हुए थे और उनका हृदय शुद्ध था । माताकी बात सुनकर वे पितृशोकसे अत्यन्त पीड़ित हो सहसा पृथ्वीपर गिर पड़े और ' हाय, मैं मारा गया! ' इस प्रकार अत्यन्त दीन और दुःखमय वचन कहकर रोने लगे । पराक्रमी महाबाहु भरत अपनी भुजाओंको बारम्बार पृथ्वीपर पटककर गिरने और लोटने लगे ॥ १६-१७ ॥
ततः शोकेन संवीतः पितुर्मरणदुःखितः ।
विललाप महातेजा भ्रान्ताकुलितचेतनः ॥ १८ ॥
उन महातेजस्वी राजकुमारकी चेतना भ्रान्त और व्याकुल हो गयी । वे पिताकी मृत्युसे दुःखी और शोकसे व्याकुलचित्त होकर विलाप करने लगे - ॥ १८ ॥
एतत् सुरुचिरं भाति पितुर्मे शयनं पुरा ।
शशिनेवामलं रात्रौ गगनं तोयदात्यये ॥ १ ९ ॥
तदिदं न विभात्यद्य विहीनं तेन धीमता ।
व्योमेव शशिना हीनमप्शुष्क इव सागरः ॥ २० ॥
' हाय! मेरे पिताजीकी जो यह अत्यन्त सुन्दर शय्या पहले शरत्कालकी रातमें चन्द्रमासे सुशोभित होनेवाले निर्मल आकाशकी भाँति शोभा पाती थी, वही यह आज उन्हीं बुद्धिमान् महाराजसे रहित होकर चन्द्रमासे हीन आकाश और सूखे हुए समुद्रके समान श्रीहीन प्रतीत होती है'॥१९ -२० ॥
बाष्पमुत्सृज्य कण्ठेन स्वात्मना परिपीडितः ।
प्रच्छाद्य वदनं श्रीमद् वस्त्रेण जयतां वरः ॥ २१ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ भरत अपने सुन्दर मुख वस्त्रसे ढककर अपने कण्ठस्वरके साथ आँसू गिराकर मन - ही - मन अत्यन्त पीड़ित हो पृथ्वीपर पड़कर विलाप करने लगे ॥ २१ ॥
तमार्तं देवसंकाशं समीक्ष्य पतितं भुवि ।
निकृत्तमिव सालस्य स्कन्धं परशुना वने ॥ २२ ॥
माता मातङ्गसंकाशं चन्द्रार्कसदृशं सुतम् ।
उत्थापयित्वा शोकार्तं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २३ ॥
देवतुल्य भरत शोकसे व्याकुल हो वनमें फरसेसे काटे गये साखूके तनेकी भाँति पृथ्वीपर पड़े थे, मतवाले हाथीके समान पुष्ट तथा चन्द्रमा या सूर्यके समान तेजस्वी अपने शोकाकुल पुत्रको इस तरह
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४३८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भूमिपर पड़ा देख माता कैकेयीने उन्हें उठाया और इस प्रकार कहा- ॥ २२-२३ ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे राजन्नत्र महायशः ।
त्वद्विधा नहि शोचन्ति सन्तः सदसि सम्मताः ॥ २४ ॥
' राजन्! उठो! उठो! महायशस्वी कुमार! तुम इस तरह यहाँ धरतीपर क्यों पड़े हो? तुम्हारे - जैसे सभाओं में सम्मानित होनेवाले सत्पुरुष शोक नहीं किया करते हैं ॥ २४ ॥
दानयज्ञाधिकास हि शीलश्रुतितपोनुगा ।
बुद्धिस्ते बुद्धिसम्पन्न प्रभेवार्कस्य मन्दिरे ॥ २५ ॥
' बुद्धिसम्पन्न पुत्र! जैसे सूर्यमण्डलमें प्रभा निश्चलरूपसे रहती है, उसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि सुस्थिर है । वह दान और यज्ञमें लगनेकी अधिकारिणी है; क्योंकि सदाचार और वेदवाक्योंका अनुसरण करनेवाली है ' ॥ २५ ॥
स रुदित्वा चिरं कालं भूमौ परिविवृत्य च ।
जननीं प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहुभिरावृतः ॥ २६ ॥
भरत पृथ्वीपर लोटते - पोटते बहुत देरतक रोते रहे । तत्पश्चात् अधिकाधिक शोकसे आकुल होकर वे मातासे इस प्रकार बोले - ॥ २६ ॥
अभिषेक्ष्यति रामं तु राजा यज्ञं नु यक्ष्यते ।
इत्यहं कृतसंकल्पो हृष्टो यात्रामयासिषम् ॥ २७ ॥
' मैंने तो यह सोचा था कि महाराज श्रीरामका राज्याभिषेक करेंगे और स्वयं यज्ञका अनुष्ठान करेंगे— यही सोचकर मैंने बड़े हर्षके साथ वहाँसे यात्रा की
थी ॥। २७ ॥
तदिदं ह्यन्यथाभूतं व्यवदीर्णं मनो मम ।
पितरं यो न पश्यामि नित्यं प्रियहिते रतम् ॥ २८ ॥
' किंतु यहाँ आनेपर सारी बातें मेरी आशाके विपरीत हो गयीं । मेरा हृदय फटा जा रहा है; क्योंकि सदा अपने प्रिय और हितमें लगे रहनेवाले पिताजीको मैं नहीं देख रहा हूँ ॥ २८ ॥
अम्ब केनात्यगाद् राजा व्याधिना मय्यनागते ।
धन्या रामादयः सर्वे यैः पिता संस्कृतः स्वयम् ॥ २ ९ ॥
' मा! महाराजको ऐसा कौन - सा रोग हो गया था, जिससे वे मेरे आनेके पहले ही चल बसे? श्रीराम आदि सब भाई धन्य हैं, जिन्होंने स्वयं उपस्थित रहकर पिताजीका अन्त्येष्टि - संस्कार किया ॥ २ ९ ॥
न नूनं मां महाराजः प्राप्तं जानाति कीर्तिमान् ।
उपजिघ्रेत् तु मां मूर्ध्नि तातः संनाम्य सत्वरम् ॥ ३० ॥
' निश्चय ही मेरे पूज्य पिता यशस्वी महाराजको मेरे यहाँ आनेका कुछ पता नहीं है, अन्यथा वे शीघ्र ही मेरे मस्तकको झुकाकर उसे प्यारसे सूँघते ॥३० ॥
क्व स पाणिः सुखस्पर्शस्तातस्याक्लिष्टकर्मणः ।
यो हि मां रजसा ध्वस्तमभीक्ष्णं परिमार्जति ॥ ३१ ॥
' हा! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे पिताका वह कोमल हाथ कहाँ है, जिसका स्पर्श मेरे लिये बहुत ही सुखदायक था? वे उसी हाथसे मेरे धूलिधूसर शरीरको बारंबार पोंछा करते थे ॥३१ ॥
यो मे भ्राता पिता बन्धुर्यस्य दासोऽस्मि सम्मतः ।
तस्य मां शीघ्रमाख्याहि रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ३२ ॥
4 ' अब जो मेरे भाई, पिता और बन्धु हैं तथा जिनका मैं परम प्रिय दास हूँ, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले उन श्रीरामचन्द्रजीको तुम शीघ्र ही मेरे आनेकी सूचना दो ॥ ३२ ॥
पिता हि भवति ज्येष्ठो धर्ममार्यस्य जानतः ।
तस्य पादौ ग्रहीष्यामि स हीदानीं गतिर्मम ॥ ३३ ॥
' धर्मके ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुषके लिये बड़ा भाई पिताके समान होता है । मैं उनके चरणोंमें प्रणाम करूँगा । अब वे ही मेरे आश्रय हैं ॥ ३३ ॥
धर्मविद् धर्मशीलश्च महाभागो दृढव्रतः ।
आर्ये किमब्रवीद् राजा पिता मे सत्यविक्रमः ॥ ३४ ॥
पश्चिमं साधुसंदेशमिच्छामि श्रोतुमात्मनः । ' आर्ये! धर्मका आचरण जिनका स्वभाव बन गया था तथा जो बड़ी दृढ़ताके साथ उत्तम व्रतका पालन करते थे, वे मेरे सत्यपराक्रमी और धर्मज्ञ पिता महाराज दशरथ अन्तिम समयमें क्या कह गये थे? मेरे लिये जो उनका अन्तिम संदेश हो उसे मैं सुनना चाहता हूँ ' ॥३४३ ॥
इति पृष्टा यथातत्त्वं कैकेयी वाक्यमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
रामेति राजा विलपन् हा सीते लक्ष्मणेति च ।
स महात्मा परं लोकं गतो मतिमतां वरः ॥ ३६ ॥
भरतके इस प्रकार पूछनेपर कैकेयीने सब बात ठीक - ठीक बता दी । वह कहने लगी- ' बेटा! बुद्धिमानों में श्रेष्ठ तुम्हारे महात्मा पिता महाराजने ' हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! ' इस प्रकार विलाप करते हुए परलोककी यात्रा की थी ॥ ३५-३६ ॥
इतीमां पश्चिमां वाचं व्याजहार पिता तव ।
कालधर्मं परिक्षिप्तः पाशैरिव महागजः ॥ ३७ ॥
' जैसे पार्शोसे बँधा हुआ महान् गज विवश हो