वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 451–460

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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अयोध्याकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ४३ ९ जाता है, उसी प्रकार कालधर्मके वशीभूत हुए तुम्हारे पिताने अन्तिम वचन इस प्रकार कहा था- ॥ ३७ ॥

सिद्धार्थास्तु नरा राममागतं सह सीतया ।

लक्ष्मणं च महाबाहुं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम् ॥ ३८ ॥

‘ जो लोग सीताके साथ पुनः लौटकर आये हुए महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मणको देखेंगे, वे ही कृतार्थ होंगे ' ॥

तच्छ्रुत्वा विषसादैव द्वितीयाप्रियशंसनात् ।

विषण्णवदनो भूत्वा भूयः पप्रच्छ मातरम् ॥ ३ ९ ॥

माताके द्वारा यह दूसरी अप्रिय बात कही जानेपर भरत और भी दुःखी ही हुए । उनके मुखपर विषाद छा गया और उन्होंने पुनः मातासे पूछा —॥३ ९ ॥

क्व चेदानीं स धर्मात्मा कौसल्यानन्दवर्धनः ।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया च समागतः ॥ ४० ॥

' मा! माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी इस अवसरपर भाई लक्ष्मण और सीताके साथ कहाँ चले गये हैं? ' ॥ ४० ॥

तथा पृष्टा यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे ।

मातास्य युगपद्वाक्यं विप्रियं प्रियशंसया ॥ ४१ ॥

इस प्रकार पूछनेपर उनकी माता कैकेयीने एक साथ ही प्रिय बुद्धिसे वह अप्रिय संवाद यथोचित रीतिसे सुनाना आरम्भ किया— ॥ ४१ ॥

स हि राजसुतः पुत्र चीरवासा महावनम् ।

दण्डकान् सह वैदेह्या लक्ष्मणानुचरो गतः ॥ ४२ ॥

' बेटा! राजकुमार श्रीराम वल्कल - वस्त्र धारण करके सीताके साथ दण्डकवनमें चले गये हैं । लक्ष्मणने भी उन्हींका अनुसरण किया है ' ॥ ४२ ॥

तच्छ्रुत्वा भरतस्त्रस्तो भ्रातुश्चारित्रशङ्कया ।

स्वस्य वंशस्य माहात्म्यात् प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ ४३ ॥

यह सुनकर भरत डर गये, उन्हें अपने भाईके चरित्रपर शङ्का हो आयी । ( वे सोचने लगे - श्रीराम कहीं धर्मसे गिर तो नहीं गये? ) अपने वंशकी महत्ता ( धर्मपरायणता ) का स्मरण करके वे कैकेयीसे इस प्रकार पूछने लगे - ॥ ४३ ॥

कच्चिन्न ब्राह्मणधनं हृतं रामेण कस्यचित् ।

कच्चिन्नाढ्यो दरिद्रो वा तेनापापो विहिंसितः ॥ ४४ ॥

' मा! श्रीरामने किसी कारणवश ब्राह्मणका धन तो नहीं हर लिया था? किसी निष्पाप धनी या दरिद्रकी हत्या तो नहीं कर डाली थी? ॥ ४४ ॥

कच्चिन्न परदारान् वा राजपुत्रोऽभिमन्यते ।

कस्मात् स दण्डकारण्ये भ्राता रामो विवासितः ॥ ४५ ॥

' राजकुमार श्रीरामका मन किसी परायी स्त्रीकी ओर तो नहीं चला गया? किस अपराधके कारण भैया श्रीरामको दण्डकारण्यमें जानेके लिये निर्वासित कर दिया गया है? ' ॥ ४५ ॥

अथास्य चपला माता तत् स्वकर्म यथातथम् ।

तेनैव स्त्रीस्वभावेन व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ ४६ ॥।

तब चपल स्वभाववाली भरतकी माता कैकेयीने उस विवेकशून्य चञ्चल नारीस्वभावके कारण ही अपनी करतूतको ठीक - ठीक बताना आरम्भ किया ॥ ४६ ॥

एवमुक्ता तु कैकेयी भरतेन महात्मना ।

उवाच वचनं हृष्टा वृथापण्डितमानिनी ॥ ४७ ॥

महात्मा भरतके पूर्वोक्त रूपसे पूछनेपर व्यर्थ ही अपनेको बड़ी विदुषी माननेवाली कैकेयीने बड़े हर्षमें भरकर कहा- ॥ ४७ ॥

न ब्राह्मणधनं किंचिद्धृतं रामेण कस्यचित् ।

कश्चिन्नाढ्यो दरिद्रो वा तेनापापो विहिंसितः ।

न रामः परदारान् स चक्षुर्भ्यामपि पश्यति ॥ ४८ ॥

' बेटा! श्रीरामने किसी कारणवश किञ्चिन्मात्र भी ब्राह्मणके धनका अपहरण नहीं किया है । किसी निरपराध धनी या दरिद्रकी हत्या भी उन्होंने नहीं की है । श्रीराम कभी किसी परायी स्त्रीपर दृष्टि नहीं डालते हैं ॥ ४८ ॥

मया तु पुत्र श्रुत्वैव रामस्येहाभिषेचनम् ।

याचितस्ते पिता राज्यं रामस्य च विवासनम् ॥ ४ ९ ॥

' बेटा! ( उनके वनमें जानेका कारण इस प्रकार है ) – मैंने सुना था कि अयोध्यामें श्रीरामका राज्याभिषेक होने जा रहा है, तब मैंने तुम्हारे पितासे तुम्हारे लिये राज्य और श्रीरामके लिये वनवासकी प्रार्थना की ॥ ४ ९ ॥

स स्ववृत्तिं समास्थाय पिता ते तत् तथाकरोत् ।

रामस्तु सहसौमित्रिः प्रेषितः सह सीतया ॥ ५० ॥

तमपश्यन् प्रियं पुत्रं महीपालो महायशाः ।

पुत्रशोकपरिद्यूनः पञ्चत्वमुपपेदिवान् ॥ ५१ ॥

' उन्होंने अपने सत्यप्रतिज्ञ स्वभावके अनुसार मेरी माँग पूरी की । श्रीराम लक्ष्मण और सीताके साथ वनको भेज दिये गये, फिर अपने प्रिय पुत्र श्रीरामको न देखकर वे महायशस्वी महाराज पुत्रशोकसे पीड़ित हो परलोकवासी हो गये ॥ ५०-५१ ॥

त्वया त्विदानीं धर्मज्ञ राजत्वमवलम्ब्यताम् ।

त्वत्कृते हि मया सर्वमिदमेवंविधं कृतम् ॥ ५२ ॥

' धर्मज्ञ! अब तुम राजपद स्वीकार करो । तुम्हारे । लिये ही मैंने इस प्रकारसे यह सब कुछ किया है ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 452

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४४० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मा शोकं मा च संतापं धैर्यमाश्रय पुत्रक । संकल् राजानमदीनसत्त्व-त्वदधीना हि नगरी राज्यं चैतदनामयम् ॥५३ ॥ मात्मानमुर्व्यामभिषेचयस्व ॥ ५४ ॥

' बेटा! शोक और संताप न करो, धैर्यका आश्रय लो । ' अतः वत्स! अब विधि - विधानके ज्ञाता वसिष्ठ अब यह नगर और निष्कण्टक राज्य तुम्हारे ही अधीन है ॥ आदि प्रमुख ब्राह्मणोंके साथ तुम उदार हृदयवाले पुत्र शीघ्रं विधिना विधिज्ञै- महाराजका अन्त्येष्टि - संस्कार करके इस पृथ्वीके राज्यपर

तत् र्वसिष्ठमुख्यैः सहितो द्विजेन्द्रैः । अपना अभिषेक कराओ ' ॥५४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥ ७२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७२ ॥

त्रिसप्ततितमः सर्गः भरतका कैकेयीको धिक्कारना और

श्रुत्वा च स पितुर्वृत्तं भ्रातरौ च विवासितौ ।

भरतो दुःखसंतप्त इदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

पिताके परलोकवास और दोनों भाइयोंके वनवासका समाचार सुनकर भरत दुःखसे संतप्त हो उठे और इस प्रकार बोले - ॥१ ॥

किं नु कार्यं हतस्येह मम राज्येन शोचतः ।

विहीनस्याथ पित्रा च भ्रात्रा पितृसमेन च ॥ २ ॥

' हाय! तूने मुझे मार डाला । मैं पितासे सदाके लिये बिछुड़ गया और पितृतुल्य बड़े भाईसे भी बिलग हो गया । अब तो मैं शोकमें डूब रहा हूँ, मुझे यहाँ राज्य लेकर क्या करना है? ॥ २ ॥

दुःखे मे दुःखमकरोर्व्रणे क्षारमिवाददाः ।

राजानं प्रेतभावस्थं कृत्वा रामं च तापसम् ॥ ३ ॥

' तूने राजाको परलोकवासी तथा श्रीरामको तपस्वी बनाकर मुझे दुःख - पर- दुःख दिया है, घावपर नमक-सा छिड़क दिया है ॥ ३ ॥

कुलस्य त्वमभावाय कालरात्रिरिवागता ।

अङ्गारमुपगूह्य स्म पिता मे नावबुद्धवान् ॥ ४ ॥

' तू इस कुलका विनाश करनेके लिये कालरात्रि बनकर आयी थी । मेरे पिताने तुझे अपनी पत्नी क्या बनाया, दहकते हुए अङ्गारको हृदयसे लगा लिया था; किंतु उस समय यह बात उनकी समझमें नहीं आयी थी ॥ ४ ॥

मृत्युमापादितो राजा त्वया मे पापदर्शिनि ।

सुखं परिहृतं मोहात् कुलेऽस्मिन् कुलपांसनि ॥ ५ ॥

' पापपर ही दृष्टि रखनेवाली! कुलकलङ्किनी! तूने मेरे महाराजको कालके गालमें डाल दिया और मोहवश इस कुलका सुख सदाके लिये छीन लिया ॥ ५ ॥

उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना

त्वां प्राप्य हि पिता मेऽद्य सत्यसंधो महायशाः ।

तीव्रदुःखाभिसंतप्तो वृत्तो दशरथो नृपः ॥६ ॥

' तुझे पाकर मेरे सत्यप्रतिज्ञ महायशस्वी पिता महाराज दशरथ इन दिनों दुःसह दुःखसे संतप्त होकर प्राण त्यागनेको विवश हुए हैं ॥ ६ ॥

विनाशितो महाराजः पिता मे धर्मवत्सलः ।

कस्मात् प्रब्राजितो रामः कस्मादेव वनं गतः ॥७ ॥

' बता, तूने मेरे धर्मवत्सल पिता महाराज दशरथका विनाश क्यों किया? मेरे बड़े भाई श्रीरामको क्यों घरसे निकाला और वे भी क्यों ( तेरे ही कहनेसे ) वनको चले गये? ॥ ७ ॥

कौसल्या च सुमित्रा च पुत्रशोकाभिपीडिते ।

दुष्करं यदि जीवेतां प्राप्य त्वां जननीं मम ॥८ ॥

' कौसल्या और सुमित्रा भी मेरी माता कहलानेवाली तुझ कैकेयीको पाकर पुत्रशोकसे पीड़ित हो गयीं । अब उनका जीवित रहना अत्यन्त कठिन है ॥ ८ ॥

नन्वार्योऽपि च धर्मात्मा त्वयि वृत्तिमनुत्तमाम् ।

वर्तते गुरुवृत्तिज्ञो यथा मातरि वर्तते ॥ ९ ॥

' बड़े भैया श्रीराम धर्मात्मा हैं; गुरुजनोंके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये- इसे वे अच्छी तरह जानते हैं, इसलिये उनका अपनी माताके प्रति जैसा बर्ताव था, वैसा ही उत्तम व्यवहार वे तेरे साथ भी करते थे ॥ ९ ॥

तथा ज्येष्ठा हि मे माता कौसल्या दीर्घदर्शिनी ।

त्वयि धर्मं समास्थाय भगिन्यामिव वर्तते ॥ १० ॥

' मेरी बड़ी माता कौसल्या भी बड़ी दूरदर्शिनी हैं । वे धर्मका ही आश्रय लेकर तेरे साथ बहिनका - सा बर्ताव करती हैं ॥ १० ॥

पृष्ठ 453

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अयोध्याकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ४४१

तस्याः पुत्रं महात्मानं चीरवल्कलवाससम् ।

प्रस्थाप्य वनवासाय कथं पापे न शोचसे ॥ ११ ॥

' पापिनि! उनके महात्मा पुत्रको चीर और वल्कल पहनाकर तूने वनमें रहनेके लिये भेज दिया । फिर भी तुझे शोक क्यों नहीं हो रहा है ॥११ ॥

अपापदर्शिनं शूरं कृतात्मानं यशस्विनम् ।

प्रव्राज्य चीरवसनं किं नु पश्यसि कारणम् ॥ १२ ॥

' श्रीराम किसीकी बुराई नहीं देखते । वे शूरवीर,

पवित्रात्मा और यशस्वी हैं । उन्हें चीर पहनाकर वनवास ।

दे देनेमें तू कौन - सा लाभ देख रही है? ॥ १२ ॥

लुब्धाया विदितो मन्ये न तेऽहं राघवं यथा ।

तथा नर्थो राज्यार्थं त्वयाऽऽनीतो महानयम् ॥ १३ ॥

' तू लोभिन है । मैं समझता हूँ, इसीलिये तुझे यह पता नहीं है कि मेरा श्रीरामचन्द्रजीके प्रति कैसा भाव है, तभी तूने राज्यके लिये यह महान् अनर्थ कर डाला है ॥ १३ ॥

अहं हि पुरुषव्याघ्रावपश्यन् रामलक्ष्मणौ ।

केन शक्तिप्रभावेण राज्यं रक्षितुमुत्सहे ॥ १४ ॥

' मैं पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणको न देखकर किस शक्तिके प्रभावसे इस राज्यकी रक्षा कर सकता हूँ? ( मेरे बल तो मेरे भाई ही हैं ) ॥ १४ ॥

तं हि नित्यं महाराजो बलवन्तं महौजसम् ।

उपाश्रितोऽभूद् धर्मात्मा मेरुर्मेरुवनं यथा ॥ १५ ॥

' मेरे धर्मात्मा पिता महाराज दशरथ भी सदा उन महातेजस्वी बलवान् श्रीरामका ही आश्रय लेते थे ( उन्हींसे अपने लोक - परलोककी सिद्धिकी आशा रखते थे ), ठीक उसी तरह जैसे मेरुपर्वत अपनी रक्षाके लिये अपने ऊपर उत्पन्न हुए गहन वनका ही आश्रय लेता है ( यदि वह दुर्गम वनसे घिरा हुआ न हो तो दूसरे लोग निश्चय ही उसपर आक्रमण कर सकते हैं ) ॥ १५ ॥

सोऽहं कथमिमं भारं महाधुर्यसमुद्यतम् ।

दम्यो धुरमिवासाद्य सहेयं केन चौजसा ॥ १६ ॥

‘ यह राज्यका भार, जिसे किसी महाधुरंधरने धारण किया था, मैं कैसे, किस बलसे धारण कर सकता हूँ? जैसे कोई छोटा - सा बछड़ा बड़े - बड़े बैलोंद्वारा ढोये जानेयोग्य महान् भारको नहीं खींच सकता, उसी प्रकार यह राज्यका महान् भार मेरे लिये असह्य है ॥ १६ ॥

अथवा मे भवेच्छक्तियोंगैर्बुद्धिबलेन वा ।

सकामां न करिष्यामि त्वामहं पुत्रगर्द्धिनीम् ॥ १७ ॥

' अथवा नाना प्रकारके उपायों तथा बुद्धिबलसे मुझमें राज्यके भरण - पोषणकी शक्ति हो तो भी केवल अपने बेटेके लिये राज्य चाहनेवाली तुझ कैकेयीकी मन: कामना पूरी नहीं होने दूँगा ॥ १७ ॥

न मे विकांक्षा जायेत त्यक्तुं त्वां पापनिश्चयाम् ।

यदि रामस्य नावेक्षा त्वयि स्यान्मातृवत् सदा ॥ १८ ॥

' यदि श्रीराम तुझे सदा अपनी माताके समान नहीं देखते होते तो तेरी - जैसी पापपूर्ण विचारवा माताका त्याग करनेमें मुझे तनिक भी हिचक नहीं होती ॥ १८ ॥

उत्पन्ना तु कथं बुद्धिस्तवेयं पापदर्शिनी ।

साधुचारित्रविभ्रष्टे पूर्वेषां नो विगर्हिता ॥ १ ९ ॥

' उत्तम चरित्रसे गिरी हुई पापिनि! मेरे पूर्वजोंने जिसकी सदा निन्दा की है, वह पापपर ही दृष्टि रखनेवाली बुद्धि तुझमें कैसे उत्पन्न हो गयी? ॥ १ ९ ॥

अस्मिन् कुले हि सर्वेषां ज्येष्ठो राज्येऽभिषिच्यते ।

अपरे भ्रातरस्तस्मिन् प्रवर्तन्ते समाहिताः ॥ २० ॥

' इस कुलमें जो सबसे बड़ा होता है, उसीका राज्याभिषेक होता है; दूसरे भाई सावधानीके साथ बड़ेकी आज्ञाके अधीन रहकर कार्य करते हैं ॥ २० ॥

न हि मन्ये नृशंसे त्वं राजधर्ममवेक्षसे ।

गतिं वा न विजानासि राजवृत्तस्य शाश्वतीम् ॥ २१ ॥

' क्रूर स्वभाववाली कैकेय! मेरी समझमें तू राजधर्मपर दृष्टि नहीं रखती है अथवा उसे बिलकुल नहीं जानती । राजाओंके बर्तावका जो सनातन स्वरूप है, उसका भी तुझे ज्ञान नहीं है ॥ २१ ॥

सततं राजपुत्रेषु ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते ।

राज्ञामेतत् समं तत् स्यादिक्ष्वाकूणां विशेषतः ॥ २२ ॥

' राजकुमारोंमें जो ज्येष्ठ होता है, सदा उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाता है । सभी राजाओंके यहाँ समान रूपसे इस नियमका पालन होता है । इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंके कुलमें इसका विशेष आदर है ॥ २२ ॥

तेषां धर्मैकरक्षाणां कुलचारित्रशोभिनाम् ।

अद्य चारित्रशौटीर्यं त्वां प्राप्य विनिवर्तितम् ॥ २३ ॥

' जिनकी एकमात्र धर्मसे ही रक्षा होती आयी है तथा जो कुलोचित सदाचारके पालनसे ही सुशोभित हुए हैं, उनका यह चरित्रविषयक अभियान आज तुझे पाकर - तेरे सम्बन्धके कारण दूर हो गया ॥ २३ ॥

तवापि सुमहाभागे जनेन्द्रकुलपूर्वके ।

बुद्धिमोहः कथमयं सम्भूतस्त्वयि गर्हितः ॥ २४ ॥

' महाभागे! तेरा जन्म भी तो महाराज केकयके

पृष्ठ 454

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४४२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

कुलमें हुआ है, फिर तेरे हृदयमें यह निन्दित बुद्धिमोह ।

कैसे उत्पन्न हो गया? ॥ २४ ॥

न तु कामं करिष्यामि तवाहं पापनिश्चये ।

यया व्यसनमारब्धं जीवितान्तकरं मम ॥ २५ ॥

' अरी! तेरा विचार बड़ा ही पापपूर्ण है । मैं तेरी इच्छा कदापि नहीं पूर्ण करूँगा । तूने मेरे लिये उस विपत्तिकी नींव डाल दी है, जो मेरे प्राणतक ले सकती है ॥ २५ ॥

एष त्विदानीमेवाहमप्रियार्थं तवानघम् ।

निवर्तयिष्यामि वनाद् भ्रातरं स्वजनप्रियम् ॥ २६ ॥

' यह ले, मैं अभी तेरा अप्रिय करनेके लिये तुल गया हूँ । मैं वनसे निष्पाप भ्राता श्रीरामको, जो स्वजनोंके प्रिय हैं, लौटा लाऊँगा ॥ २६ ॥

निवर्तयित्वा रामं च तस्याहं दीप्ततेजसः ।

दासभूतो भविष्यामि सुस्थितेनान्तरात्मना ॥ २७ ॥

श्रीरामको लौटा लाकर उद्दीप्त तेजवाले उन्हीं महापुरुषका दास बनकर स्वस्थचित्तसे जीवन व्यतीत करूँगा ' ॥ २७ ॥

इत्येवमुक्त्वा भरतो महात्मा प्रियेतरैर्वाक्यगणैस्तुदंस्ताम् । शोकार्दितश्चापि ननाद भूयः सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः ॥ २८ ॥

ऐसा कहकर महात्मा भरत शोकसे पीड़ित हो पुनः जली - कटी बातोंसे कैकेयीको व्यथित करते हुए उसे जोर - जोरसे फटकारने लगे, मानो मन्दराचलकी गुहामें बैठा हुआ सिंह गरज रहा हो ॥ २८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥ ७३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७३ ॥

चतुःसप्ततितमः सर्गः भरतका कैकेयीको

तां तथा गर्हयित्वा तु मातरं भरतस्तदा ।

रोषेण महताविष्टः पुनरेवाब्रवीद् वचः ॥ १ ॥

इस प्रकार माताकी निन्दा करके भरत उस समय महान् रोषावेशसे भर गये और फिर कठोर वाणीमें कहने लगे- ॥१ ॥

राज्याद् भ्रंशस्व कैकेयि नृशंसे दुष्टचारिणि ।

परित्यक्तासि धर्मेण मा मृतं रुदती भव ॥ २ ॥

' दृष्टतापूर्ण बर्ताव करनेवाली क्रूरहृदया कैकेयि! तू राज्यसे भ्रष्ट हो जा । धर्मने तेरा परित्याग कर दिया है, अतः अब तू मरे हुए महाराजके लिये रोना मत, ( क्योंकि तू पत्नीधर्मसे गिर चुकी है ) अथवा मुझे मरा हुआ समझकर तू जन्मभर पुत्रके लिये रोया कर ॥ २ ॥

किं नु तेऽदूषयद् रामो राजा वा भृशधार्मिकः ।

ययोर्मृत्युर्विवासश्च त्वत्कृते तुल्यमागतौ ॥ ३ ॥

' श्रीरामने अथवा अत्यन्त धर्मात्मा महाराज ( पिताजी ) ने तेरा क्या बिगाड़ा था, जिससे एक साथ ही उन्हें तुम्हारे कारण वनवास और मृत्युका कष्ट भोगना पड़ा? ॥ ३ ॥

भ्रूणहत्यामसि प्राप्ता कुलस्यास्य विनाशनात् ।

कैकेयि नरकं गच्छ मा च तातसलोकताम् ॥ ४ ॥

कैकेयि! तूने इस कुलका विनाश करनेके कारण कड़ी फटकार देना भ्रूणहत्याका पाप अपने सिरपर लिया है, इसलिये तू नरकमें जा और पिताजीका लोक तुझे न मिले ॥ ४ ॥

यत्त्वया हीदृशं पापं कृतं घोरेण कर्मणा ।

सर्वलोकप्रियं हित्वा ममाप्यापादितं भयम् ॥ ५ ॥

' तूने इस घोर कर्मके द्वारा समस्त लोकोंके प्रिय श्रीरामको देशनिकाला देकर जो ऐसा बड़ा पाप किया है, उसने मेरे लिये भी भय उपस्थित कर दिया है ॥ ५ ॥

त्वत्कृते मे पिता वृत्तो रामश्चारण्यमाश्रितः ।

अयशो जीवलोके च त्वयाहं प्रतिपादितः ॥ ६ ॥

' तेरे कारण मेरे पिताकी मृत्यु हुई, श्रीरामको वनका आश्रय लेना पड़ा और मुझे भी तूने इस जीवजगत्में अपयशका भागी बना दिया ॥ ६ ॥

मातृरूपे ममामित्रे नृशंसे राज्यकामुके ।

न तेऽहमभिभाष्योऽस्मि दुर्वृत्ते पतिघातिनि ॥ ७ ॥

' राज्यके लोभमें पड़कर क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाली

दुराचारिणी पतिघातिनि! तू माताके रूपमें मेरी शत्रु है ।

तुझे मुझसे बात नहीं करनी चाहिये ॥७ ॥

कौसल्या च सुमित्रा च याश्चान्या मम मातरः ।

दुःखेन महताविष्टास्त्वां प्राप्य कुलदूषिणीम् ॥ ८ ॥

' कौसल्या, सुमित्रा तथा जो अन्य मेरी माताएँ

पृष्ठ 455

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अयोध्याकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः ४४३

हैं, वे सब तुझ कुलकलङ्किनीके कारण महान् दुःखमें ।

पड़ गयी हैं ॥ ८ ॥

न त्वमश्वपतेः कन्या धर्मराजस्य धीमतः ।

राक्षसी तत्र जातासि कुलप्रध्वंसिनी पितुः ॥ ९ ॥

' तू बुद्धिमान् धर्मराज अश्वपतिकी कन्या नहीं है । तू उनके कुलमें कोई राक्षसी पैदा हो गयी है, जो पिताके वंशका विध्वंस करनेवाली है ॥ ९ ॥

यत् त्वया धार्मिको रामो नित्यं सत्यपरायणः ।

वनं प्रस्थापितो वीरः पितापि त्रिदिवं गतः ॥ १० ॥

यत् प्रधानासि तत् पापं मयि पित्रा विना कृते ।

भ्रातृभ्यां च परित्यक्ते सर्वलोकस्य चाप्रिये ॥ ११ ॥

' तूने सदा सत्यमें तत्पर रहनेवाले धर्मात्मा वीर श्रीरामको जो वनमें भेज दिया और तेरे कारण जो मेरे पिता स्वर्गवासी हो गये, इन सब कुकृत्योंद्वारा तूने प्रधान रूपसे जिस पापका अर्जन किया है, वह पाप मुझमें आकर अपना फल दिखा रहा है; इसलिये मैं पितृहीन हो गया, अपने दो भाइयोंसे बिछुड़ गया और समस्त जगत् के लोगोंके लिये अप्रिय बन गया ॥ १०-११ ॥

कौसल्यां धर्मसंयुक्तां वियुक्तां पापनिश्चये ।

कृत्वा कं प्राप्स्यसे ह्यद्य लोकं निरयगामिनि ॥ १२ ॥

' पापपूर्ण विचार रखनेवाली नरकगामिनी कैकेयि!

धर्मपरायणा माता कौसल्याको पति और पुत्रसे वञ्चित ।

करके अब तू किस लोकमें जायगी? ॥ १२ ॥

किं नावबुध्यसे क्रूरे नियतं बन्धुसंश्रयम् ।

ज्येष्ठं पितृसमं रामं कौसल्यायात्मसम्भवम् ॥ १३ ॥

' क्रूरहृदये! कौसल्यापुत्र श्रीराम मेरे बड़े भाई और पिताके तुल्य हैं । वे जितेन्द्रिय और बन्धुओंके आश्रयदाता हैं । क्या तू उन्हें इस रूपमें नहीं जानती है? ॥ १३ ॥

अङ्गप्रत्यङ्गजः पुत्रो हृदयाच्चाभिजायते ।

तस्मात् प्रियतरो मातुः प्रिया एव तु बान्धवाः ॥ १४ ॥

' पुत्र माताके अङ्ग - प्रत्यङ्ग और हृदयसे उत्पन्न होता है, इसलिये वह माताको अधिक प्रिय होता है । अन्य भाई - बन्धु केवल प्रिय ही होते हैं ( किंतु पुत्र प्रियतर होता है ) ॥ १४ ॥

अन्यदा किल धर्मज्ञा सुरभिः सुरसम्मता ।

वहमानौ ददर्शोर्व्यां पुत्रौ विगतचेतसौ ॥ १५ ॥

' एक समयकी बात है कि धर्मको जाननेवाली देव - सम्मानित सुरभि ( कामधेनु ) ने पृथ्वीपर अपने दो पुत्रोंको देखा, जो हल जोतते - जोतते अचेत हो गये थे ॥ १५ ॥

तावर्धदिवसं श्रान्तौ दृष्ट्वा पुत्रौ महीतले ।

रुरोद पुत्रशोकेन बाष्पपर्याकुलेक्षणम् ॥ १६ ॥

' मध्याह्नका समय होनेतक लगातार हल जोतनेसे वे बहुत थक गये थे । पृथ्वीपर अपने उन दोनों पुत्रोंको

ऐसी दुर्दशामें पड़ा देख सुरभि पुत्रशोकसे रोने लगी ।

उसके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये ॥ १६ ॥

अधस्ताद् व्रजतस्तस्याः सुरराज्ञो महात्मनः ।

बिन्दवः पतिता गात्रे सूक्ष्माः सुरभिगन्धिनः ॥ १७ ॥

' उसी समय महात्मा देवराज इन्द्र सुरभिके नीचेसे होकर कहीं जा रहे थे । उनके शरीरपर कामधेनुके दो बूँद सुगन्धित आँसू गिर पड़े ॥ १७ ॥

निरीक्षमाणस्तां शक्रो ददर्श सुरभिं स्थिताम् ।

आकाशे विष्ठितां दीनां रुदतीं भृशदुःखिताम् ॥ १८ ॥

' जब इन्द्रने ऊपर दृष्टि डाली, तब देखा-आकाशमें सुरभि खड़ी हैं और अत्यन्त दुःखी हो दीनभावसे रो रही हैं ॥ १८ ॥

तां दृष्ट्वा शोकसंतप्तां वज्रपाणिर्यशस्विनीम् ।

इन्द्रः प्राञ्जलिरुद्विग्नः सुरराजोऽब्रवीद् वचः ॥ १ ९ ॥

' यशस्विनी सुरभिको शोकसे संतप्त हुई देख वज्रधारी देवराज इन्द्र उद्विग्न हो उठे और हाथ जोड़कर बोले - ॥ १ ९ ॥

भयं कच्चिन्न चास्मासु कुतश्चिद् विद्यते महत् ।

कुतोनिमित्तः शोकस्ते ब्रूहि सर्वहितैषिणि ॥ २० ॥

' सबका हित चाहनेवाली देवि! हमलोगोंपर कहींसे कोई महान् भय तो नहीं उपस्थित हुआ है? बताओ, किस कारणसे तुम्हें यह शोक प्राप्त हुआ है? ॥ २० ॥

एवमुक्ता तु सुरभिः सुरराजेन धीमता ।

प्रत्युवाच ततो धीरा वाक्यं वाक्यविशारदा ॥ २१ ॥

' बुद्धिमान् देवराज इन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर बोलनेमें चतुर और धीरस्वभाववाली सुरभिने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया – ॥ २१ ॥

शान्तं पापं न वः किंचित् कुतश्चिदमराधिप ।

अहं तु मग्नौ शोचामि स्व पुत्रौ विषमे स्थितौ ॥ २२ ॥

' देवेश्वर! पाप शान्त हो । तुमलोगोंपर कहींसे कोई भय नहीं है । मैं तो अपने इन दोनों पुत्रोंको विषम अवस्था ( घोर सङ्कट ) में मग्न हुआ देख शोक | कर रही हूँ ॥ २२ ॥

पृष्ठ 456

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४४४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

एतौ दृष्ट्वा कृशौ दीनौ सूर्यरश्मिप्रतापितौ ।

वध्यमानौ बलीवर्दों कर्षकेण दुरात्मना ॥ २३ ॥

' ये दोनों बैल अत्यन्त दुर्बल और दुःखी हैं, सूर्यकी किरणोंसे बहुत तप गये हैं और ऊपरसे वह दुष्ट किसान इन्हें पीट रहा है ॥ २३ ॥

मम कायात् प्रसूतौ हि दुःखितौ भारपीडितौ ।

यौ दृष्ट्वा परितप्येऽहं नास्ति पुत्रसमः प्रियः ॥ २४ ॥

' मेरे शरीरसे इनकी उत्पत्ति हुई है । ये दोनों भारसे पीड़ित और दु: खी हैं, इसीलिये इन्हें देखकर मैं शोकसे संतप्त हो रही हूँ; क्योंकि पुत्रके समान प्रिय दूसरा कोई नहीं है ' ॥ २४ ॥

यस्याः पुत्रसहस्त्रैस्तु कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत् ।

तां दृष्ट्वा रुदतीं शक्रो न सुतान् मन्यते परम् ॥ २५ ॥

' जिनके सहस्रों पुत्रोंसे यह सारा जगत् भरा हुआ है, उन्हीं कामधेनुको इस तरह रोती देख इन्द्रने यह माना कि पुत्रसे बढ़कर और कोई नहीं है ॥ २५ ॥

इन्द्रो ह्यश्रुनिपातं तं स्वगात्रे पुण्यगन्धिनम् ।

सुरभिं मन्यते दृष्ट्वा भूयसीं तामिहेश्वरः ॥ २६ ॥

‘ देवेश्वर इन्द्रने अपने शरीरपर उस पवित्र गन्धवाले अश्रुपातको देखकर देवी सुरभिको इस जगत् में सबसे श्रेष्ठ माना ॥ २६ ॥

समाप्रतिमवृत्ताया लोकधारणकाम्यया ।

श्रीमत्या गुणमुख्यायाः स्वभावपरिचेष्टया ॥ २७ ॥ ।

यस्याः पुत्रसहस्राणि सापि शोचति कामधुक् ।

किं पुनर्या विना रामं कौसल्या वर्तयिष्यति ॥ २८ ॥

" जिनका चरित्र समस्त प्राणियोंके लिये समान रूपसे हितकर और अनुपम है, जो अभीष्ट दानरूप ऐश्वर्यशक्तिसे सम्पन्न, सत्यरूप प्रधान गुणसे युक्त तथा लोकरक्षाकी कामनासे कार्यमें प्रवृत्त होनेवाली हैं और जिनके सहस्रों पुत्र हैं, वे कामधेनु भी जब अपने दो पुत्रोंके लिये उनके स्वाभाविक चेष्टामें रत होनेपर भी कष्ट पानेके कारण शोक करती हैं तब जिनके एक ही पुत्र है, वे माता कौसल्या श्रीरामके बिना कैसे जीवित रहेंगी? ॥ २७-२८ ॥

एकपुत्रा च साध्वी च विवत्सेयं त्वया कृता ।

तस्मात् त्वं सततं दुःखं प्रेत्य चेह च लप्स्यसे ॥ २ ९ ॥

' इकलौते बेटेवाली इन सती - साध्वी कौसल्याका तूने उनके पुत्रसे बिछोह करा दिया है, इसलिये तू सदा ही इस लोक और परलोकमें भी दुःख ही पायेगी ॥ २ ९ ॥

अहं त्वपचितिं भ्रातुः पितुश्च सकलामिमाम् ।

वर्धनं यशसश्चापि करिष्यामि न संशयः ॥३० ॥

' मैं तो यह राज्य लौटाकर भाईकी पूजा करूँगा और यह सारा अन्त्येष्टिसंस्कार आदि करके पिताका भी पूर्णरूपसे पूजन करूँगा तथा निःसंदेह मैं वही कर्म करूँगा, जो ( तेरे दिये हुए कलङ्कको मिटानेवाला और ) मेरे यशको बढ़ानेवाला हो ॥३० ॥

आनाय्य च महाबाहुं कोसलेन्द्रं महाबलम् ।

स्वयमेव प्रवेक्ष्यामि वनं मुनिनिषेवितम् ॥३१ ॥

' महाबली महाबाहु कोसलनरेश श्रीरामको यहाँ लौटा लाकर मैं स्वयं ही मुनिजनसेवित वनमें प्रवेश करूँगा ॥

नह्यहं पापसंकल्पे पापे पापं त्वया कृतम् ।

शक्तो धारयितुं पौरैरश्रुकण्ठैर्निरीक्षितः ॥ ३२ ॥

' पापपूर्ण संकल्प करनेवाली पापिनि! पुरवासी मनुष्य आँसू बहाते हुए अवरुद्धकण्ठ हो मुझे देखें और मैं तेरे किये हुए इस पापका बोझ ढोता रहूँ- यह मुझसे नहीं हो सकता ॥ ३२ ॥

सा त्वमग्निं प्रविश वा स्वयं वा विश दण्डकान् ।

रज्जुं बद्ध्वाथवा कण्ठे नहि तेऽन्यत् परायणम् ॥ ३३ ॥

' अब तू जलती आगमें प्रवेश कर जा, या स्वयं दण्डकारण्यमें चली जा अथवा गलेमें रस्सी बाँधकर प्राण दे दे, इसके सिवा तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ॥ ३३ ॥

अहमप्यवनीं प्राप्ते रामे सत्यपराक्रमे ।

कृतकृत्यो भविष्यामि विप्रवासितकल्मषः ॥ ३४ ॥

' सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जब अयोध्याकी भूमिपर पदार्पण करेंगे, तभी मेरा कलङ्क दूर होगा और तभी मैं कृतकृत्य होऊँगा ' ॥ ३४ ॥

इति नाग इवारण्ये तोमराङ्कुशतोदितः ।

पपात भुवि संक्रुद्धो निःश्वसन्निव पन्नगः ॥ ३५ ॥

यह कहकर भरत वनमें तोमर और अंकुशद्वारा पीड़ित किये गये हाथीकी भाँति मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए साँपकी भाँति लम्बी साँस खींचने लगे ॥ ३५ ॥

संरक्तनेत्रः शिथिलाम्बरस्तथा विधूतसर्वाभरणः परंतपः । बभूव भूमौ पतितो नृपात्मजः शचीपतेः केतुरिवोत्सवक्षये ॥ ३६ ॥

शत्रुओंको तपानेवाले राजकुमार भरत उत्सव

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अयोध्याकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः ४४५ समाप्त होनेपर नीचे गिराये गये शचीपति इन्द्रके ध्वजकी | लाल हो गये थे, वस्त्र ढीले पड़ गये थे और सारे भाँति उस समय पृथ्वीपर पड़े थे, उनके नेत्र क्रोधसे । आभूषण टूटकर बिखर गये थे ॥ ३६ ॥

. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः ॥७४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

पञ्चसप्ततितमः सर्गः कौसल्याके सामने भरतका शपथ खाना

दीर्घकालात् समुत्थाय संज्ञां लब्ध्वा स वीर्यवान् ।

नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां दीनामुद्वीक्ष्य मातरम् ॥ १ ॥

सोऽमात्यमध्ये भरतो जननीमभ्यकुत्सयत् । बहुत देरके बाद होशमें आनेपर जब पराक्रमी भरत उठे, तब आँसूभरे नेत्रोंसे दीन बनी बैठी हुई माताकी ओर देखकर मन्त्रियोंके बीचमें उसकी निन्दा करते हुए बोले -॥१३ ॥

राज्यं न कामये जातु मन्त्रये नापि मातरम् ॥ २ ॥

अभिषेकं न जानामि योऽभूद् राज्ञा समीक्षितः ।

विप्रकृष्टे ह्यहं देशे शत्रुघ्नसहितोऽभवम् ॥ ३ ॥

' मन्त्रिवरो! मैं राज्य नहीं चाहता और न मैंने कभी मातासे इसके लिये बातचीत ही की है । महाराजने जिस अभिषेकका निश्चय किया था, उसका भी मुझे पता नहीं था; क्योंकि उस समय मैं शत्रुघ्नके साथ दूर देशमें था॥२-३ ॥

वनवासं न जानामि रामस्याहं महात्मनः ।

विवासनं च सौमित्रेः सीतायाश्च यथाभवत् ॥ ४ ॥

' महात्मा श्रीरामके वनवास और सीता तथा लक्ष्मणके निर्वासनका भी मुझे ज्ञान नहीं है कि वह कब और कैसे हुआ? ' ॥ ४ ॥

तथैव क्रोशतस्तस्य भरतस्य महात्मनः ।

कौसल्या शब्दमाज्ञाय सुमित्रां चेदमब्रवीत् ॥ ५ ॥

महात्मा भरत जब इस प्रकार अपनी माताको कोस रहे थे, उस समय उनकी आवाजको पहचानकर कौसल्याने सुमित्रासे इस प्रकार कहा —॥५ ॥

आगतः क्रूरकार्यायाः कैकेय्या भरतः सुतः ।

तमहं द्रष्टुमिच्छामि भरतं दीर्घदर्शिनम् ॥ ६ ॥

' क्रूर कर्म करनेवाली कैकेयीके पुत्र भरत आ गये हैं । वे बड़े दूरदर्शी हैं, अतः मैं उन्हें देखना चाहती हूँ'॥६ ॥

एवमुक्त्वा सुमित्रां तां विवर्णवदना कृशा ।

प्रतस्थे भरतो यत्र वेपमाना विचेतना ॥ ७ ॥

सुमित्रासे ऐसा कहकर उदास मुखवाली, दुर्बल और अचेत - सी हुई कौसल्या जहाँ भरत थे, उस स्थानपर जानेके लिये काँपती हुई चलीं ॥ ७ ॥

स तु राजात्मजश्चापि शत्रुघ्नसहितस्तदा ।

प्रतस्थे भरतो येन कौसल्याया निवेशनम् ॥ ८ ॥

उसी समय उधरसे राजकुमार भरत भी शत्रुघ्नको साथ लिये उसी मार्गसे चले आ रहे थे, जिससे कौसल्याके भवनमें आना - जाना होता था ॥ ८ ॥

ततः शत्रुघ्न भरतौ कौसल्यां प्रेक्ष्य दुःखितौ ।

पर्यष्वजेतां दुःखार्तां पतितां नष्टचेतनाम् ॥ ९ ॥

रुदन्तौ रुदती दुःखात् समेत्यार्या मनस्विनी ।

भरतं प्रत्युवाचेदं कौसल्या भृशदुःखिता ॥ १० ॥

तदनन्तर शत्रुघ्र और भरतने दूरसे ही देखा कि माता कौसल्या दुःखसे व्याकुल और अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी हैं । यह देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे दौड़कर उनकी गोदीसे लग गये तथा फूट-फूटकर रोने लगे । आर्या मनस्विनी कौसल्या भी दुःखसे रो पड़ीं और उन्हें छातीसे लगाकर अत्यन्त दुःखित हो भरतसे इस प्रकार बोलीं – ॥ ९ -१० ॥

इदं ते राज्यकामस्य राज्यं प्राप्तमकण्टकम् ।

सम्प्राप्तं बत कैकेय्या शीघ्रं क्रूरेण कर्मणा ॥ ११ ॥

' बेटा! तुम राज्य चाहते थे न? सो यह निष्कण्टक राज्य तुम्हें प्राप्त हो गया; किंतु खेद यही है कि कैकेयीने जल्दीके कारण बड़े क्रूर कर्मके द्वारा इसे पाया है ॥

प्रस्थाप्य चीरवसनं पुत्रं मे वनवासिनम् ।

कैकेयी कं गुणं तत्र पश्यति क्रूरदर्शिनी ॥ १२ ॥

' क्रूरतापूर्ण दृष्टि रखनेवाली कैकेयी न जाने इसमें कौन - सा लाभ देखती थी कि उसने मेरे बेटेको चीर - वस्त्र पहनाकर वनमें भेज दिया और उसे वनवासी बना दिया ॥ १२ ॥

क्षिप्रं मामपि कैकेयी प्रस्थापयितुमर्हति ।

। हिरण्यनाभो यत्रास्ते सुतो मे सुमहायशाः ॥ १३ ॥

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४४६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' अब कैकेयीको चाहिये कि मुझे भी शीघ्र ही । उसी स्थानपर भेज दे, जहाँ इस समय सुवर्णमयी नाभिसे सुशोभित मेरे महायशस्वी पुत्र श्रीराम हैं ॥ १३ ॥

अथवा स्वयमेवाहं सुमित्रानुचरा सुखम् ।

अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य प्रस्थास्ये यत्र राघवः ॥ १४ ॥

' अथवा सुमित्राको साथ लेकर और अग्निहोत्रको आगे करके मैं स्वयं ही सुखपूर्वक उस स्थानको प्रस्थान करूँगी, जहाँ श्रीराम निवास करते हैं ॥ १४ ॥

कामं वा स्वयमेवाद्य तत्र मां नेतुमर्हसि ।

यत्रासौ पुरुषव्याघ्रस्तप्यते मे सुतस्तपः ॥ १५ ॥

4 ' अथवा तुम स्वयं ही अपनी इच्छाके अनुसार अब मुझे वहीं पहुँचा दो, जहाँ मेरे पुत्र पुरुषसिंह श्रीराम तप करते हैं ॥ १५ ॥

इदं हि तव विस्तीर्णं धनधान्यसमाचितम् ।

हस्त्यश्वरथसम्पूर्णं राज्यं निर्यातितं तया ॥ १६ ॥

' यह धन - धान्यसे सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े एवं रथोंसे भरा - पूरा विस्तृत राज्य कैकेयीने ( श्रीरामसे छीनकर ) तुम्हें दिलाया है ' ॥ १६ ॥

इत्यादिबहुभिर्वाक्यैः क्रूरैः सम्भत्सितोऽनघः ।

विव्यथे भरतोऽतीव व्रणे तुद्येव सूचिना ॥ १७ ॥

इस तरहकी बहुत - सी कठोर बातें कहकर जब कौसल्याने निरपराध भरतकी भर्त्सना की, तब उनको बड़ी पीड़ा हुई; मानो किसीने घावमें सूई चुभो दी हो ॥ १७ ॥

पपात चरणौ तस्यास्तदा सम्भ्रान्तचेतनः ।

विलप्य बहुधासंज्ञो लब्धसंज्ञस्तदाभवत् ॥ १८ ॥

वे कौसल्याके चरणोंमें गिर पड़े, उस समय उनके चित्तमें बड़ी घबराहट थी । वे बारम्बार विलाप करके अचेत हो गये । थोड़ी देर बाद उन्हें फिर चेत हुआ ॥ १८ ॥

एवं विलपमानां तां प्राञ्जलिर्भरतस्तदा ।

कौसल्यां प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहुभिरावृताम् ॥ १ ९ ॥

तब भरत अनेक प्रकारके शोकोंसे घिरी हुई और पूर्वोक्त रूपसे विलाप करती हुई माता कौसल्यासे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले - ॥ १ ९ ॥

आर्ये कस्मादजानन्तं गर्हसे मामकल्मषम् ।

विपुलां च मम प्रीतिं स्थितां जानासि राघवे ॥ २० ॥

' आर्ये! यहाँ जो कुछ हुआ है, इसकी मुझे बिलकुल जानकारी नहीं थी । मैं सर्वथा निरपराध हूँ, तो भी आप क्यों मुझे दोष दे रही हैं? आप तो जानती हैं कि श्रीरघुनाथजीमें मेरा कितना प्रगाढ़ प्रेम है ॥ २० ॥

कृतशास्त्रानुगा बुद्धिर्मा भूत् तस्य कदाचन ।

सत्यसंधः सतां श्रेष्ठो यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ २१ ॥

‘ जिसकी अनुमतिसे सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, आर्य श्रीरामजी वनमें गये हों, उस पापीकी बुद्धि कभी गुरुसे सीखे हुए शास्त्रोंमें बताये गये मार्गका अनुसरण करनेवाली न हो ॥ २१ ॥

प्रैष्यं पापीयसां यातु सूर्यं च प्रति मेहतु ।

हन्तु पादेन गाः सुप्ता यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ २२ ॥

' जिसकी सलाहसे बड़े भाई श्रीरामको वनमें जाना पड़ा हो, वह अत्यन्त पापियों - हीन जातियोंका सेवक हो । सूर्यकी ओर मुँह करके मल - मूत्रका त्याग करे और सोयी हुई गौओंको लातसे मारे ( अर्थात् वह इन. पापकर्मोंके दुष्परिणामका भागी हो ) ॥ २२ ॥

कारयित्वा महत् कर्म भर्ता भृत्यमनर्थकम् ।

अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ २३ ॥

' जिसकी सम्मतिसे भैया श्रीरामने वनको प्रस्थान किया हो, उसको वही पाप लगे, जो सेवकसे भारी काम कराकर उसे समुचित वेतन न देनेवाले स्वामीको लगता है ॥ २३ ॥

परिपालयमानस्य राज्ञो भूतानि पुत्रवत् ।

ततस्तु द्रुह्यतां पापं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥२४ ॥

' जिसके कहनेसे आर्य श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, उसको वही पाप लगे, जो समस्त प्राणियोंका पुत्रकी भाँति पालन करनेवाले राजासे द्रोह करनेवाले लोगोंको लगता है ॥ २४ ॥

बलिषड्भागमुद्धृत्य नृपस्यारक्षितुः प्रजाः ।

अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ २५ ॥

' जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह उसी अधर्मका भागी हो, जो प्रजासे उसकी आयका छठा भाग लेकर भी प्रजावर्गकी रक्षा न करनेवाले राजाको प्राप्त होता है ॥ २५ ॥

संश्रुत्य च तपस्विभ्यः सत्रे वै यज्ञदक्षिणाम् ।

तां चापलपतां पापं यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ २६ ॥

' जिसकी सलाहसे भैया श्रीरामको वनमें जाना पड़ा हो, उसे वही पाप लगे, जो यज्ञमें कष्ट सहनेवाले ऋत्विजोंको दक्षिणा देनेकी प्रतिज्ञा करके पीछे इनकार कर देनेवाले लोगोंको लगता है ॥ २६ ॥

हस्त्यश्वरथसम्बाधे युद्धे शस्त्रसमाकुले ।

। मा स्म कार्षीत् सतां धर्मं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ २७ ॥

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अयोध्याकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः ४४७ ' हाथी, घोड़े और रथोंसे भरे एवं अस्त्र - शस्त्रोंकी । वर्षासे व्याप्त संग्राममें सत्पुरुषोंके धर्मका पालन न करनेवाले योद्धाओंको जो पाप लगता है, वही उस मनुष्यको भी प्राप्त हो, जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीरामजीको वनमें भेजा गया हो ॥ २७ ॥

उपदिष्टं सुसूक्ष्मार्थं शास्त्रं यलेन धीमता ।

स नाशयतु दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ २८ ॥

' जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामको वनमें प्रस्थान करना पड़ा है, वह दुष्टात्मा बुद्धिमान् गुरुके द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त हुआ शास्त्रके सूक्ष्म विषयका उपदेश भुला दे ॥ २८ ॥

मा च तं व्यूढबाह्वंसं चन्द्रभास्करतेजसम् ।

द्राक्षीद् राज्यस्थमासीनं यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ २ ९ ॥

‘ जिसकी सलाहसे बड़े भैया श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, वह चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी तथा विशाल भुजाओं और कंधोंसे सुशोभित श्रीरामचन्द्रजीको राज्यसिंहासनपर विराजमान न देख सके - वह राजा श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित रह जाय ॥ २ ९ ॥

पायसं कृसरं छागं वृथा सोऽश्नातु निर्घृणः ।

गुरूंश्चाप्यवजानातु यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३० ॥

' जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामचन्द्रजी वनमें गये । हों, वह निर्दय मनुष्य खीर, खिचड़ी और बकरीके दूधको देवताओं, पितरों एवं भगवान्‌को निवेदन किये बिना व्यर्थ करके खाय ॥ ३० ॥

गाश्च स्पृशतु पादेन गुरून् परिवदेत च ।

मित्रे द्रुह्येत सोऽत्यर्थं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३१ ॥

' जिसकी सम्मतिसे श्रीरामचन्द्रजीको वनमें जाना पड़ा हो, वह पापी मनुष्य गौओंके शरीरका पैरसे स्पर्श, गुरुजनोंकी निन्दा तथा मित्रके प्रति अत्यन्त द्रोह करे ॥ ३१ ॥

विश्वासात् कथितं किंचित् परिवादं मिथः क्वचित् ।

विवृणोतु स दुष्टात्मा यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ३२ ॥

' जिसके कहनेसे बड़े भैया श्रीराम वनमें गये हों, वह दुष्टात्मा गुप्त रखनेके विश्वासपर एकान्तमें कहे हुए किसीके दोषको दूसरोंपर प्रकट कर दे ( अर्थात् उसे विश्वासघात करनेका पाप लगे ) ॥ ३२ ॥

अकर्ता चाकृतज्ञश्च त्यक्तात्मा निरपत्रपः ।

लोके भवतु विद्विष्टो यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ३३ ॥

' जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह मनुष्य उपकार न करनेवाला, कृतघ्न, सत्पुरुषोंद्वारा परित्यक्त, निर्लज्ज और जगत्‌में सबके द्वेषका पात्र हो ॥

पुत्रैर्दासैश्च भृत्यैश्च स्वगृहे परिवारितः ।

स एको मृष्टमश्नातु यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ३४ ॥

' जिसकी सलाहसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह अपने घरमें पुत्रों, दासों और भृत्योंसे घिरा रहकर भी अकेले ही मिष्टान्न भोजन करनेके पापका भागी हो ॥

अप्राप्य सदृशान् दाराननपत्यः प्रमीयताम् ।

अनवाप्य क्रियां धर्म्यं यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ३५ ॥

' जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह अपने अनुरूप पत्नीको न पाकर अग्निहोत्र आदि धार्मिक कर्मोंका अनुष्ठान किये बिना संतानहीन अवस्थामें ही मर जाय ॥ ३५ ॥

माऽऽत्मनः संततिं द्राक्षीत् स्वेषु दारेषु दुःखितः ।

आयुः समग्रमप्राप्य यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३६ ॥

' जिसकी सम्मतिसे मेरे बड़े भाई श्रीराम वनमें गये हों, वह सदा दुःखी रहकर अपनी धर्मपत्नीसे होनेवाली संतानका मुँह न देखे तथा सम्पूर्ण आयुका उपभोग किये बिना ही मर जाय ॥ ३६ ॥

राजस्त्रीबालवृद्धानां वधे यत् पापमुच्यते ।

भृत्यत्यागे च यत् पापं तत् पापं प्रतिपद्यताम् ॥ ३७ ॥

' राजा, स्त्री, बालक और वृद्धोंका वध करने तथा भृत्योंको त्याग देनेमें जो पाप होता है, वही पाप उसे भी लगे ॥ ३७ ॥

लाक्षया मधुमांसेन लोहेन च विषेण च ।

सदैव बिभृयाद् भृत्यान् यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ३८ ॥

' जिसकी सम्मतिसे श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह सदैव लाह, मधु, मांस, लोहा और विष आदि निषिद्ध वस्तुओंको बेचकर कमाये हुए धनसे अपने भरण - पोषणके योग्य कुटुम्बीजनोंका पालन करे ॥ ३८ ॥

संग्रामे समुपोढे च शत्रुपक्षभयंकरे ।

पलायमानो वध्येत यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ३ ९ ॥

‘ जिसकी रायसे श्रीराम वनमें जानेको विवश हुए हों, वह शत्रुपक्षको भय देनेवाले युद्धके प्राप्त होनेपर उसमें पीठ दिखाकर भागता हुआ मारा जाय ॥३ ९ ॥

कपालपाणिः पृथिवीमटतां चीरसंवृतः ।

भिक्षमाणो यथोन्मत्तो यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ४० ॥

' जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह फटे - पुराने, मैले - कुचैले वस्त्रसे अपने शरीरको ढककर हाथमें खप्पर ले भीख माँगता हुआ उन्मत्तकी भाँति पृथ्वीपर घूमता फिरे ॥ ४० ॥

पृष्ठ 460

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 460 का मूल पृष्ठ
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४४८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

मद्यप्रसक्तो भवतु स्त्रीष्वक्षेषु च नित्यशः ।

कामक्रोधाभिभूतश्च यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ४१ ॥

' जिसकी सलाहसे श्रीरामचन्द्रजीको वनमें जाना पड़ा हो, वह काम - क्रोधके वशीभूत होकर सदा ही मद्यपान, स्त्रीसमागम और द्यूतक्रीड़ामें आसक्त रहे ॥ ४१ ॥

मास्य धर्मे मनो भूयादधर्मं स निषेवताम् ।

अपात्रवर्षी भवतु यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ४२ ॥

' जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, उसका मन कभी धर्ममें न लगे, वह अधर्मका ही सेवन करे और अपात्रको धन दान करे ॥ ४२ ॥

संचितान्यस्य वित्तानि विविधानि सहस्त्रशः ।

दस्युभिर्विप्रलुप्यन्तां यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४३ ॥

' जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामका वन - गमन हुआ हो, उसके द्वारा सहस्रोंकी संख्यामें संचित किये गये नाना प्रकारके धन - वैभवोंको लुटेरे लूट ले जायँ ॥ ४३ ॥

उभे संध्ये शयानस्य यत् पापं परिकल्प्यते ।

तच्च पापं भवेत् तस्य यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ४४ ॥

यदग्निदायके पापं यत् पापं गुरुतल्पगे ।

मित्रद्रोहे च यत् पापं तत् पापं प्रतिपद्यताम् ॥ ४५ ॥

' जिसके कहनेसे भैया श्रीरामको वनमें भेजा गया । हो, उसे वही पाप लगे, जो दोनों संध्याओंके समय सोये हुए पुरुषको प्राप्त होता है । आग लगानेवाले मनुष्यको जो पाप लगता है, गुरुपत्नीगामीको जिस पापकी प्राप्ति होती है तथा मित्रद्रोह करनेसे जो पाप प्राप्त होता है, वही पाप उसे भी लगे ॥ ४४-४५ ॥

देवतानां पितॄणां च मातापित्रोस्तथैव च ।

मास्म कार्षीत् स शुश्रूषां यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ४६ ॥

' जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है, वह देवताओं, पितरों और माता - पिताकी सेवा कभी न करे ( अर्थात् उनकी सेवाके पुण्यसे वञ्चित रह जाय ॥ ४६ ॥

सतां लोकात् सतां कीर्त्याः सज्जुष्टात् कर्मणस्तथा ।

भ्रश्यतु क्षिप्रमद्यैव यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४७ ॥

' जिसकी अनुमतिसे विवश होकर भैया श्रीरामने वनमें पदार्पण किया है, वह पापी आज ही सत्पुरुषोंके लोकसे, सत्पुरुषोंकी कीर्तिसे तथा सत्पुरुषोंद्वारा सेवित कर्मसे शीघ्र भ्रष्ट हो जाय ॥ ४७ ॥

अपास्य मातृशुश्रूषामनर्थे सोऽवतिष्ठताम् ।

दीर्घबाहुर्महावक्षा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४८ ॥

‘ जिसकी सम्मतिसे बड़ी - बड़ी बाँह और विशाल वक्षवाले आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है, वह माताकी सेवा छोड़कर अनर्थके पथमें स्थित रहे ॥ ४८ ॥

बहुभृत्यो दरिद्रश्च ज्वररोगसमन्वितः ।

समायात् सततं क्लेशं यस्यायनुमते गतः ॥ ४ ९ ॥

" जिसकी सलाहसे श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह दरिद्र हो, उसके यहाँ भरण - पोषण पानेके योग्य पुत्र आदिकी संख्या बहुत अधिक हो तथा वह ज्वर - रोगसे पीड़ित होकर सदा क्लेश भोगता रहे ॥ ४ ९ ॥

आशामाशंसमानानां दीनानामूर्ध्वचक्षुषाम् ।

अर्थिनां वितथां कुर्याद् यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ५० ॥

' जिसकी अनुमति पाकर आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह आशा लगाये ऊपरकी ओर आँख उठाकर दाताके मुँहकी ओर देखनेवाले दीन याचकोंकी आशाको निष्फल कर दे ॥ ५० ॥

मायया रमतां नित्यं पुरुषः पिशुनोऽशुचिः ।

राज्ञो भीतस्त्वधर्मात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५१ ॥

' जिसके कहनेसे भैया श्रीरामने वनको प्रस्थान किया हो, वह पापात्मा पुरुष चुगला, अपवित्र तथा राजासे भयभीत रहकर सदा छल - कपटमें ही रचा - पचा रहे ॥ ५१ ॥

ऋतुस्नातां सतीं भार्यामृतुकालानुरोधिनीम् ।

अतिवर्तेत दुष्टात्मा यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥५२ ॥

‘ जिसके परामर्शसे आर्यका वनमगन हुआ हो, वह दुष्टात्मा ऋतु स्नानकाल प्राप्त होनेके कारण अपने पास आयी हुई सती - साध्वी ऋतुस्नाता पत्नीको ठुकरा दे ( उसकी इच्छा न पूर्ण करनेके पापका भागी हो ) ॥ ५२ ॥

विप्रलुप्तप्रजातस्य दुष्कृतं ब्राह्मणस्य यत् ।

तदेतत् प्रतिपद्येत यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५३ ॥

' जिसकी सलाहसे मेरे बड़े भाईको वनमें जाना पड़ा हो, उसको वही पाप लगे, जो ( अन्न आदिका दान न करने अथवा स्त्रीसे द्वेष रखनेके कारण ) नष्ट हुई संतानवाले ब्राह्मणको प्राप्त होता है ॥ ५३ ॥

ब्राह्मणायोद्यतां पूजां विहन्तु कलुषेन्द्रियः ।

बालवत्सां च गां दोग्धु यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥ ५४ ॥

‘ जिसकी रायसे आर्यने वनमें पदार्पण किया हो, वह मलिन इन्द्रियवाला पुरुष ब्राह्मणके लिये की जाती हुई पूजामें विघ्न डाल दे और छोटे बछड़ेवाली ( दस दिनके भीतरकी ब्यायी हुई ) गायका दूध दुहे ॥ ५४ ॥

धर्मदारान् परित्यज्य परदारान् निषेवताम् ।

। त्यक्तधर्मरतिर्मूढो यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५५ ॥