वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 551–560

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 551 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे चतुर्दशाधिकशततमः सर्गः ५३ ९ जानेके कारण पीड़ित एवं असहाय हो रही थी ॥ ३ ॥ ।

अल्पोष्ण क्षुब्धसलिलां लीनमीनझषग्राहां कृशां वह पुरी उस पर्वतीय दिखायी देती थी, जिसका तपकर कुछ गरम और गँदला धूपसे संतप्त होकर भाग गये मत्स्य और ग्राह गहरे जलमें

घर्मतप्तविहंगमाम् ।

गिरिनदीमिव ॥ ४ ॥

नदीकी भाँति कृशकाय जल सूर्यकी किरणोंसे हो रहा हो, जिसके पक्षी हों तथा जिसके मीन, छिप गये हों ॥४ ॥

विधूमामिव हेमाभां शिखामग्नेः समुत्थिताम् ।

हविरभ्युक्षितां पश्चाच्छिखां विप्रलयं गताम् ॥ ५ ॥

जो अयोध्या पहले धूमरहित सुनहरी कान्तिवाली प्रज्वलित अग्निशिखाके समान प्रकाशित होती थी, वही श्रीरामवनवासके बाद हवनीय दुग्धसे सींची गयी अग्निकी ज्वालाके समान बुझकर विलीन - सी हो गयी है ॥ ५ ॥

विध्वस्तकवचां रुग्णगजवाजिरथध्वजाम् ।

हतप्रवीरामापन्नां चमूवि महाहवे ॥ ६ ॥

उस समय अयोध्या महासमरमें संकटग्रस्त हुई उस सेनाके समान प्रतीत होती थी, जिसके कवच कटकर गिर गये हों, हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजा छिन्न - भिन्न हो गये हों और मुख्य - मुख्य वीर मार डाले गये हों ॥ ६ ॥

सफेनां सस्वनां भूत्वा सागरस्य समुत्थिताम् ।

प्रशान्तमारुतोद्धूतां जलोर्मिमिव निःस्वनाम् ॥ ७ ॥

प्रबल वायुके वेगसे फेन और गर्जनाके साथ उठी हुई समुद्रकी उत्ताल तरंग सहसा वायुके शान्त हो जानेपर जैसे शिथिल और नीरव हो जाती है, उसी प्रकार कोलाहलपूर्ण अयोध्या अब शब्दशून्य - सी जान पड़ती थी ॥७ ॥

त्यक्तां यज्ञायुधैः सर्वैरभिरूपैश्च याजकैः ।

सुत्याकाले सुनिर्वृत्ते वेदिं गतरवामिव ॥८ ॥

यज्ञकाल समाप्त होनेपर ‘ स्फ्य ' आदि यज्ञसम्बन्धी आयुधों तथा श्रेष्ठ याजकोंसे सूनी हुई वेदी जैसे मन्त्रोच्चारणकी ध्वनिसे रहित हो जाती है, उसी प्रकार अयोध्या सुनसान दिखायी देती थी ॥८ ॥

गोष्ठमध्ये स्थितामार्तामचरन्तीं नवं तृणम् ।

गोवृषेण परित्यक्तां गवां पत्नीमिवोत्सुकाम् ॥ ९ ॥

जैसे कोई गाय साँड़के साथ समागमके लिये उत्सुक हो, उसी अवस्थामें उसे साँड़से अलग कर दिया गया हो और वह नूतन घास चरना छोड़कर आर्त भावसे गोष्ठमें बँधी हुई खड़ी हो, उसी तरह अयोध्यापुरी भी आन्तरिक वेदनासे पीड़ित थी॥९॥

प्रभाकराद्यैः सुस्निग्धैः प्रज्वलद्भिरिवोत्तमैः ।

वियुक्तां मणिभिर्जात्यैर्नवां मुक्तावलीमिव ॥ १० ॥

श्रीराम आदिसे रहित हुई अयोध्या मोतियोंकी उस नूतन मालाके समान श्रीहीन हो गयी थी, जिसकी अत्यन्त चिकनी चमकीली, उत्तम तथा अच्छी जातिकी पद्मराग आदि मणियाँ उससे निकालकर अलग कर दी गयी हों ॥१० ॥

सहसाचरितां स्थानान्महीं पुण्यक्षयाद् गताम् ।

संहृतद्युतिविस्तारां तारामिव दिवश्च्युताम् ॥ ११ ॥

जो पुण्य - क्षय होनेके कारण सहसा अपने स्थानसे भ्रष्ट हो पृथ्वीपर आ पहुँची हो, अतएव जिसकी विस्तृत प्रभा क्षीण हो गयी हो, आकाशसे गिरी हुई उस तारिकाकी भाँति अयोध्या शोभाहीन हो गयी थी ॥ ११ ॥

पुष्पनद्धां वसन्तान्ते मत्तभ्रमरशालिनीम् ।

द्रुतदावाग्निविप्लुष्टां क्लान्तां वनलतामिव ॥ १२ ॥

जो ग्रीष्म ऋतुमें पहले फूलोंसे लदी हुई होनेके कारण मतवाले भ्रमरोंसे सुशोभित होती रही हो और फिर सहसा दावानलके लपेटमें आकर मुरझा गयी हो, वनकी उस लताके समान पहलेकी उल्लासपूर्ण अयोध्या अब उदास हो गयी थी ॥१२ ॥

सम्मूढनिगमां सर्वां संक्षिप्तविपणापणाम् ।

प्रच्छन्नशशिनक्षत्रां द्यामिवाम्बुधरैर्युताम् ॥ १३ ॥

वहाँके व्यापारी वणिक् शोकसे व्याकुल होनेके कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे, बाजार - हाट और दूकानें बहुत कम खुली थीं । उस समय सारी पुरी उस आकाशकी भाँति शोभाहीन हो गयी थी, जहाँ बादलोंकी घटाएँ घिर आयी हों और तारे तथा चन्द्रमा ढक गये हों ॥ १३ ॥

क्षीणपानोत्तमैर्भग्रैः शरावैरभिसंवृताम् ।

हतशौण्डामिव ध्वस्तां पानभूमिमसंस्कृताम् ॥१४ ॥

( उन दिनों अयोध्यापुरीकी सड़कें झाड़ी - बुहारी नहीं गयी थीं, इसलिये यत्र - तत्र कूड़े - करकटके ढेर पड़े थे । उस अवस्थामें ) वह नगरी उस उजड़ी हुई पानभूमि ( मधुशाला ) के समान श्रीहीन दिखायी देती थी, जिसकी सफाई न की गयी हो, जहाँ मधुसे खाली टूटी - फूटी प्यालियाँ पड़ी हों और जहाँके पीनेवाले भी नष्ट हो गये हों ॥ १४ ॥

वृक्णभूमितलां निम्नां वृक्णपात्रैः समावृताम् ।

उपयुक्तोदकां भग्नां प्रपां निपतितामिव ॥ १५ ॥

उस पुरीकी दशा उस पौंसलेकी - सी हो रही थी,

पृष्ठ 552

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 552 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे जो खम्भोंके टूट जानेसे ढह गया हो, जिसका चबूतरा । छिन्न - भिन्न हो गया हो, भूमि नीची हो गयी हो, पानी चुक गया हो और जलपात्र टूट - फूटकर इधर - उधर सब ओर बिखरे पड़े हों ॥ १५ ॥

विपुलां विततां चैव युक्तपाशां तरस्विनाम् ।

भूमौ बाणैर्विनिष्कृत्तां पतितां ज्यामिवायुधात् ॥ १६ ॥

जो विशाल और सम्पूर्ण धनुषमें फैली हुई हो, उसकी दोनों कोटियों ( किनारों ) में बाँधनेके लिये जिसमें रस्सी जुड़ी हुई हो, किंतु वेगशाली वीरोंके बाणोंसे कटकर धनुषसे पृथ्वीपर गिर पड़ी हो, उस प्रत्यञ्चाके समान ही अयोध्यापुरी भी स्थानभ्रष्ट हुई - सी दिखायी देती थी ॥ १६ ॥

सहसा युद्धशौण्डेन हयारोहेण वाहिताम् ।

निहतां प्रतिसैन्येन वडवामिव पातिताम् ॥ १७ ॥

जिसपर युद्धकुशल घुड़सवारने सवारी की हो और जिसे शत्रुपक्षकी सेनाने सहसा मार गिराया हो, युद्धभूमिमें पड़ी हुई उस घोड़ीकी जो दशा होती है, वही उस समय अयोध्यापुरीकी भी थी ( कैकेयीके कुचक्रसे उसके संचालक नरेशका स्वर्गवास और युवराजका वनवास हो गया था ) ॥ १७ ॥

भरतस्तु रथस्थः सन् श्रीमान् दशरथात्मजः ।

वाहयन्तं रथश्रेष्ठं सारथिं वाक्यमब्रवीत् ॥ १८ ॥

रथपर बैठे हुए श्रीमान् दशरथनन्दन भरतने उस समय श्रेष्ठ रथका संचालन करनेवाले सारथि सुमन्त्रसे इस प्रकार कहा- ॥ १८ ॥

किं नु खल्वद्य गम्भीरो मूर्च्छितो न निशाम्यते ।

यथापुरमयोध्यायां गीतवादित्रनिःस्वनः ॥ १ ९ ॥

6 ' अब अयोध्यामें पहलेकी भाँति सब ओर फैला हुआ गाने - बजानेका गम्भीर नाद नहीं सुनायी पड़ता; यह कितने कष्टकी बात है! ॥१ ९ ॥

वारुणीमदगन्धश्च माल्यगन्धश्च मूच्छितः ।

चन्दनागुरुगन्धश्च न प्रवाति समन्ततः ॥ २० ॥

' अब चारों ओर वारुणी ( मधु ) की मादक गन्ध, व्याप्त हुई फूलोंकी सुगन्ध तथा चन्दन और अगुरुकी पवित्र गन्ध नहीं फैल रही है ॥ २० ॥

यानप्रवरघोषश्च सुस्निग्धहयनिःस्वनः ।

प्रमत्तगजनादश्च महांश्च रथनिःस्वनः ॥ २१ ॥

' अच्छी - अच्छी सवारियोंकी आवाज, घोड़ोंके ह्रींसनेका सुस्निग्ध शब्द, मतवाले हाथियोंका चिग्घाड़ना तथा रथोंकी घर्घराहटका महान् शब्द - ये सब नहीं सुनायी दे रहे हैं ॥ २१ ॥

नेदानीं श्रूयते पुर्यामस्यां रामे विवासिते ।

चन्दनागुरुगन्धांश्च महार्हाश्च वनत्रजः ॥ २२ ॥

गते रामे हि तरुणाः संतप्ता नोपभुञ्जते ।

बहिर्यात्रां न गच्छन्ति चित्रमाल्यधरा नराः ॥ २३ ॥

' श्रीरामचन्द्रजीके निर्वासित होनेके कारण ही इस पुरीमें इस समय इन सब प्रकारके शब्दोंका श्रवण नहीं हो रहा है । श्रीरामके चले जानेसे यहाँके तरुण बहुत संतप्त हैं । वे चन्दन और अगुरुकी सुगन्धका सेवन नहीं करते तथा बहुमूल्य वनमालाएँ भी नहीं धारण करते । अब इस पुरीके लोग विचित्र फूलोंके हार पहनकर बाहर घूमनेके लिये नहीं निकलते हैं ॥ २२-२३ ॥

नोत्सवाः सम्प्रवर्तन्ते रामशोकार्दिते पुरे ।

सा हि नूनं मम भ्रात्रा पुरस्यास्य द्युतिर्गता ॥२४ ॥

' श्रीरामके शोकसे पीड़ित हुए इस नगरमें अब नाना प्रकारके उत्सव नहीं हो रहे हैं । निश्चय ही इस पुरीकी वह सारी शोभा मेरे भाईके साथ ही चली गयी ॥

नहि राजत्ययोध्येयं सासारेवार्जुनी क्षपा ।

कदा नु खलु मे भ्राता महोत्सव इवागतः ॥ २५ ॥

जनयिष्यत्ययोध्यायां हर्षं ग्रीष्म इवाम्बुदः । ' जैसे वेगयुक्त वर्षाके कारण शुक्लपक्षकी चाँदनी रात भी शोभा नहीं पाती है, उसी प्रकार नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई यह अयोध्या भी शोभित नहीं हो रही है । अब कब मेरे भाई महोत्सवकी भाँति अयोध्यामें पधारेंगे और ग्रीष्म ऋतुमें प्रकट हुए मेघकी भाँति सबके हृदयमें हर्षका संचार करेंगे ॥ २५३ ॥

तरुणैश्चारुवेषैश्च नरैरुन्नतगामिभिः ॥ २६ ॥

सम्पतद्भिरयोध्यायां नाभिभान्ति महापथाः । ' अब अयोध्याकी बड़ी - बड़ी सड़कें हर्षसे उछलकर चलते हुए मनोहर वेषधारी तरुणोंके शुभागमनसे शोभा नहीं पा रही हैं ' ॥ २६३ ॥

इति ब्रुवन् सारथिना दुःखितो भरतस्तदा ॥ २७ ॥

अयोध्यां सम्प्रविश्यैव विवेश वसतिं पितुः ।

तेन हीनां नरेन्द्रेण सिंहहीनां गुहामिव ॥ २८ ॥

इस प्रकार सारथिके साथ बातचीत करते हुए दुःखी भरत उस समय सिंहसे रहित गुफाकी भाँति राजा दशरथसे हीन पिताके निवासस्थान राजमहलमें गये ॥ दा तदन्तःपुरमुज्झितप्रभं सुरैरिवोत्कृष्टमभास्करं दिनम् । निरीक्ष्य सर्वत्र विभक्तमात्मवान् मुमोच बाष्पं भरतः सुदुःखितः ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 553

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 553 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे पञ्चदशाधिकशततमः सर्गः ५४१ जैसे सूर्यके छिप जानेसे दिनकी शोभा नष्ट हो | वहाँके लोग शोकमग्न थे । उसे सब ओरसे स्वच्छता और जाती है और देवता शोक करने लगते हैं, उसी प्रकार सजावटसे हीन देख भरत धैर्यवान् होनेपर भी अत्यन्त

उस समय वह अन्त: पुर शोभाहीन हो गया था और । दुःखी हो आँसू बहाने लगे ॥ २ ९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्दशाधिकशततमः सर्गः ॥११४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११४ ॥

पञ्चदशाधिकशततमः सर्गः भरतका नन्दिग्राममें जाकर श्रीरामकी करके उन्हें निवेदनपूर्वक

ततो निक्षिप्य मातृस्ता अयोध्यायां दृढव्रतः ।

भरतः शोकसंतप्तो गुरूनिदमथाब्रवीत् ॥ १ ॥

तदनन्तर सब माताओंको अयोध्यामें रखकर दृढप्रतिज्ञ भरतने शोकसे संतप्त हो गुरुजनोंसे इस प्रकार कहा—

नन्दिग्रामं गमिष्यामि सर्वानामन्त्रयेऽत्र वः ।

तत्र दुःखमिदं सर्वं सहिष्ये राघवं विना ॥ २ ॥

' अब मैं नन्दिग्रामको जाऊँगा, इसके लिये आप सब लोगोंकी आज्ञा चाहता हूँ । वहाँ श्रीरामके बिना प्राप्त होनेवाले इस सारे दुःखको सहन करूँगा ॥२ ॥

गतश्चाहो दिवं राजा वनस्थः स गुरुर्मम ।

रामं प्रतीक्षे राज्याय स हि राजा महायशाः ॥ ३ ॥

' अहो! महाराज ( पूज्य पिताजी ) तो स्वर्गको सिधारे और वे मेरे गुरु ( पूजनीय भ्राता ) श्रीरामचन्द्रजी वनमें विराज रहे हैं । मैं इस राज्यके लिये वहाँ श्रीरामकी प्रतीक्षा करता रहूँगा; क्योंकि वे महायशस्वी श्रीराम ही हमारे राजा हैं ' ॥ ३ ॥

एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मनः ।

अब्रुवन् मन्त्रिणः सर्वे वसिष्ठश्च पुरोहितः ॥ ४ ॥

महात्मा भरतका यह शुभ वचन सुनकर सब मन्त्री और पुरोहित वसिष्ठजी बोले – ॥४ ॥

सुभृशं श्लाघनीयं च यदुक्तं भरत त्वया ।

वचनं भ्रातृवात्सल्यादनुरूपं तवैव तत् ॥ ५ ॥

' भरत! भ्रातृभक्तिसे प्रेरित होकर तुमने जो बात कही है, वह बहुत ही प्रशंसनीय है । वास्तवमें वह तुम्हारे ही योग्य है ॥५ ॥

नित्यं ते बन्धुलुब्धस्य तिष्ठतो भ्रातृसौहृदे ।

मार्गमार्यं प्रपन्नस्य नानुमन्येत कः पुमान् ॥ ६ ॥

' तुम अपने भाईके दर्शनके लिये सदा लालायित रहते हो और भाईके ही सौहार्द ( हितसाधन ) में संलग्न हो । साथ ही श्रेष्ठ मार्गपर स्थित हो, अतः कौन पुरुष चरणपादुकाओंको राज्यपर अभिषिक्त राज्यका सब कार्य करना तुम्हारे विचारका अनुमोदन नहीं करेगा ' ॥ ६ ॥

मन्त्रिणां वचनं श्रुत्वा यथाभिलषितं प्रियम् ।

अब्रवीत् सारथिं वाक्यं रथो मे युज्यतामिति ॥ ७ ॥

मन्त्रियोंका अपनी रुचिके अनुरूप प्रिय वचन सुनकर भरतने सारथिसे कहा- ' मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाय ' ॥ ७ ॥।

प्रहृष्टवदनः सर्वा मातृः समभिभाष्य च ।

आरुरोह रथं श्रीमान् शत्रुघ्नेन समन्वितः ॥ ८ ॥

फिर उन्होंने प्रसन्नवदन होकर सब माताओंसे बातचीत करके जानेकी आज्ञा ली । इसके बाद शत्रुघ्नके सहित श्रीमान् भरत रथपर सवार हुए ॥ ८ ॥

आरुह्य तु रथं क्षिप्रं शत्रुघ्नभरतावुभौ ।

। ययतुः परमप्रीतौ वृतौ मन्त्रिपुरोहितैः ॥ ९ ॥

रथपर आरूढ़ होकर परम प्रसन्न हुए भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई मन्त्रियों तथा पुरोहितोंसे घिरकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे प्रस्थित हुए॥९॥

अग्रतो गुरवः सर्वे वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः ।

प्रययुः प्राङ्मुखाः सर्वे नन्दिग्रामो यतो भवेत् ॥ १० ॥

आगे - आगे वसिष्ठ आदि सभी गुरुजन एवं ब्राह्मण चल रहे थे । उन सब लोगोंने अयोध्यासे पूर्वाभिमुख होकर यात्रा की और उस मार्गको पकड़ा, जो नन्दिग्रामी ओर जाता था ॥१० ॥

बलं च तदनाहूतं गजाश्वरथसंकुलम् ।

प्रययौ भरते याते सर्वे च पुरवासिनः ॥११ ॥

भरतके प्रस्थित होनेपर हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई सारी सेना भी बिना बुलाये ही उनके पीछे-पीछे चल दी और समस्त पुरवासी भी उनके साथ हो लिये ॥ ११ ॥

रथस्थः स तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सलः ।

। नन्दिग्रामं ययौ तूर्णं शिरस्यादाय पादुके ॥ १२ ॥

पृष्ठ 554

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 554 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे धर्मात्मा भ्रातृवत्सल भरत अपने मस्तकपर । भगवान् श्रीरामकी चरणपादुका लिये रथपर बैठकर बड़ी शीघ्रतासे नन्दिग्रामकी ओर चले ॥ १२ ॥

भरतस्तु ततः क्षिप्रं नन्दिग्रामं प्रविश्य सः ।

अवतीर्य रथात् तूर्णं गुरूनिदमभाषत ॥ १३ ॥

नन्दिग्राममें शीघ्र पहुँचकर भरत तुरंत ही रथसे उतर पड़े और गुरुजनोंसे इस प्रकार बोले- ॥ १३ ॥

एतद् राज्यं मम भ्रात्रा दत्तं संन्यासमुत्तमम् ।

योगक्षेमवहे चेमे पादुके हेमभूषिते ॥ १४ ॥

' मेरे भाईने यह उत्तम राज्य मुझे धरोहरके रूपमें दिया है, उनकी ये सुवर्णविभूषित चरणपादुकाएँ ही सबके योगक्षेमका निर्वाह करनेवाली हैं ' ॥ १४ ॥

भरतः शिरसा कृत्वा संन्यासं पादुके ततः ।

अब्रवीद् दुःखसंतप्तः सर्वं प्रकृतिमण्डलम् ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् भरतने मस्तक झुकाकर उन चरण-पादुकाओंके प्रति उस धरोहररूप राज्यको समर्पित करके दुःखसे संतप्त हो समस्त प्रकृतिमण्डल ( मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि ) से कहा- ॥ १५ ॥

छत्रं धारयत क्षिप्रमार्यपादाविमौ मतौ ।

आभ्यां राज्ये स्थितो धर्मः पादुकाभ्यां गुरोर्मम ॥ १६ ॥

' आप सब लोग इन चरणपादुकाओंके ऊपर छत्र धारण करें । मैं इन्हें आर्य रामचन्द्रजीके साक्षात् चरण मानता हूँ । मेरे गुरुकी इन चरणपादुकाओंसे ही इस राज्यमें धर्मकी स्थापना होगी ॥ १६ ॥

भ्रात्रा तु मयि संन्यासो निक्षिप्तः सौहृदादयम् ।

तमिमं पालयिष्यामि राघवागमनं प्रति ॥ १७ ॥

‘ मेरे भाईने प्रेमके कारण ही यह धरोहर मुझे सौंपी है, अतः मैं उनके लौटनेतक इसकी भलीभाँति रक्षा करूँगा ॥ १७ ॥

क्षिप्रं संयोजयित्वा तु राघवस्य पुनः स्वयम् ।

चरणौ तौ तु रामस्य द्रक्ष्यामि सहपादुकौ ॥ १८ ॥

' इसके बाद मैं स्वयं इन पादुकाओंको पुनः शीघ्र ही श्रीरघुनाथजीके चरणोंसे संयुक्त करके इन पादुकाओंसे सुशोभित श्रीरामके उन युगल चरणोंका दर्शन करूँगा ॥

ततो निक्षिप्तभारोऽहं राघवेण समागतः ।

निवेद्य गुरवे राज्यं भजिष्ये गुरुवर्तिताम् ॥ १ ९ ॥

' श्रीरघुनाथजीके आनेपर उनसे मिलते ही मैं अपने उन गुरुदेवको यह राज्य समर्पित करके उनकी आज्ञाके अधीन हो उन्हींकी सेवामें लग जाऊँगा । राज्यका यह भार उनपर डालकर मैं हलका हो जाऊँगा ॥ १ ९ ॥

राघवाय च संन्यासं दत्त्वेमे वरपादुके ।

राज्यं चेदमयोध्यां च धूतपापो भवाम्यहम् ॥ २० ॥

‘ मेरे पास धरोहररूपमें रखे हुए इस राज्यको, अयोध्याको तथा इन श्रेष्ठ पादुकाओंको श्रीरघुनाथजी सेवामें समर्पित करके मैं सब प्रकारके पापतापसे मुक्त हो जाऊँगा ॥२० ॥

अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे प्रहृष्टमुदिते जने ।

प्रीतिर्मम यशश्चैव भवेद् राज्याच्चतुर्गुणम् ॥ २१ ॥

' ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामका अयोध्याके राज्यप अभिषेक हो जानेपर जब सब लोग हर्ष और आनन्दमें निमग्न हो जायँगे, तब मुझे राज्य पानेकी अपेक्षा चौगुनी प्रसन्नता और चौगुने यशकी प्राप्ति होगी ' ॥ २१ ॥

एवं तु विलपन् दीनो भरतः स महायशाः ।

नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं दुःखितो मन्त्रिभिः सह ॥ २२ ॥

इस प्रकार दीनभावसे विलाप करते हुए दुःखमग्न महायशस्वी भरत मन्त्रियोंके साथ नन्दिग्राममें रहकर राज्यका शासन करने लगे ॥२२ ॥

स वल्कलजटाधारी मुनिवेषधरः प्रभुः ।

नन्दिग्रामेऽवसद् धीरः ससैन्यो भरतस्तदा ॥ २३ ॥

सेनासहित प्रभावशाली धीर - वीर भरतने उस समय वल्कल और जटा धारण करके मुनिवेषधारी हो नन्दिग्राममें निवास किया ॥ २३ ॥

रामागमनमाकांक्षन् भरतो भ्रातृवत्सलः ।

भ्रातुर्वचनकारी च प्रतिज्ञापारगस्तदा ।

पादुके त्वभिषिच्याथ नन्दिग्रामेऽवसत् तदा ॥ २४ ॥

भाईकी आज्ञाका पालन और प्रतिज्ञाके पार जानेकी इच्छा करनेवाले भ्रातृवत्सल भरत श्रीरामचन्द्रजीके आगमनकी आकांक्षा रखते हुए उनकी चरणपादुकाओंको राज्यपर अभिषिक्त करके उन दिनों नन्दिग्राममें रहने लगे ॥

सवालव्यजनं छत्रं धारयामास स स्वयम् ।

भरतः शासनं सर्वं पादुकाभ्यां निवेदयन् ॥ २५ ॥

भरतजी राज्य - शासनका समस्त कार्य भगवान् श्रीरामकी चरणपादुकाओंको निवेदन करके करते थे तथा स्वयं ही उनके ऊपर छत्र लगाते और चँवर डुलाते थे ॥२५ ॥

ततस्तु भरतः श्रीमानभिषिच्यार्यपादुके ।

तदधीनस्तदा राज्यं कारयामास सर्वदा ॥ २६ ॥

श्रीमान् भरत बड़े भाईकी उन पादुकाओंको राज्यपर अभिषिक्त करके सदा उनके अधीन रहकर उन दिनों राज्यका सब कार्य मन्त्री आदिसे कराते थे ॥ २६ ॥

पृष्ठ 555

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 555 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे षोडशाधिकशततमः सर्गः ५४३ तदा हि यत् कार्यमुपैति किंचि- उस समय जो कोई भी कार्य उपस्थित होता, जो दुपायनं चोपहृतं महार्हम् । भी बहुमूल्य भेंट आती, वह सब पहले उन पादुकाओंको स पादुकाभ्यां प्रथमं निवेद्य निवेदन करके पीछे भरतजी उसका यथावत् प्रबन्ध

चकार पश्चाद् भरतो यथावत् ॥ २७ ॥ । करते थे ॥ २७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चदशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११५ ॥

षोडशाधिकशततमः सर्गः ॥ वृद्ध कुलपतिसहित बहुत - से ऋषियोंका

प्रतियाते तु भरते वसन् रामस्तदा वने ।

लक्षयामास सोद्वेगमथौत्सुक्यं तपस्विनाम् ॥ १ ॥

भरतके लौट जानेपर श्रीरामचन्द्रजी उन दिनों जब वनमें निवास करने लगे, तब उन्होंने देखा कि वहाँके तपस्वी उद्विग्न हो वहाँसे अन्यत्र चले जानेके लिये उत्सुक हैं ॥१ ॥

ये तत्र चित्रकूटस्य पुरस्तात् तापसाश्रमे ।

राममाश्रित्य निरतास्तानलक्षयदुत्सुकान् ॥ २ ॥

पहले चित्रकूटके उस आश्रममें जो तपस्वी श्रीरामका आश्रय लेकर सदा आनन्दमग्न रहते थे, उन्हींको श्रीरामने उत्कण्ठित देखा ( मानो वे कहीं जानेके विषयमें कुछ कहना चाहते हों ) ॥ २ ॥

नयनैर्भुकुटीभिश्च रामं निर्दिश्य शङ्किताः ।

अन्योन्यमुपजल्पन्तः शनैश्चकुर्मिथः कथाः ॥ ३ ॥

नेत्रोंसे, भौंहें टेढ़ी करके, श्रीरामकी ओर संकेत करके मन - ही - मन शङ्कित हो आपसमें कुछ सलाह करते हुए वे तपस्वी मुनि धीरे - धीरे परस्पर वार्तालाप कर रहे थे ॥ ३ ॥

तेषामौत्सुक्यमालक्ष्य रामस्त्वात्मनि शङ्कितः ।

कृताञ्जलिरुवाचेदमृषिं कुलपतिं ततः ॥ ४ ॥

उनकी उत्कण्ठा देख श्रीरामचन्द्रजीके मनमें यह शङ्का हुई कि मुझसे कोई अपराध तो नहीं बन गया । तब वे हाथ जोड़कर वहाँके कुलपति महर्षिसे इस प्रकार बोले - ॥ ४ ॥

न कश्चिद् भगवन् किंचित् पूर्ववृत्तमिदं मयि ।

दृश्यते विकृतं येन विक्रियन्ते तपस्विनः ॥ ५ ॥

' भगवन्! क्या मुझमें पूर्ववर्ती राजाओंका - सा कोई बर्ताव नहीं दिखायी देता अथवा मुझमें कोई विकृत भाव दृष्टिगोचर होता है, जिससे यहाँके तपस्वी मुनि विकारको प्राप्त हो रहे हैं ॥५ ॥

चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रममें जाना

प्रमादाच्चरितं किंचित् कच्चिन्नावरजस्य मे ।

लक्ष्मणस्यर्षिभिर्दृष्टं नानुरूपं महात्मनः ॥ ६ ॥

' क्या मेरे छोटे भाई महात्मा लक्ष्मणका प्रमादवश किया हुआ कोई ऐसा आचरण ऋषियोंने देखा है, जो उसके योग्य नहीं है ॥६ ॥

कच्चिच्छुश्रूषमाणा वः शुश्रूषणपरा मयि ।

प्रमदाभ्युचितां वृत्तिं सीता युक्तां न वर्तते ॥ ७ ॥

' अथवा क्या जो अर्घ्य पाद्य आदिके द्वारा सदा आपलोगोंकी सेवा करती रही है, वह सीता इस समय मेरी सेवामें लग जानेके कारण एक गृहस्थकी सती नारीके अनुरूप ऋषियोंकी समुचित सेवा नहीं कर पाती है? ' ॥ ७ ॥

अथर्षिर्जरया वृद्धस्तपसा च जरां गतः ।

वेपमान इवोवाच रामं भूतदयापरम् ॥ ८ ॥

श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर एक महर्षि जो जरावस्थाके कारण तो वृद्ध थे ही, तपस्याद्वारा भी वृद्ध हो गये थे, समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाले श्रीरामसे काँपते हुए - से बोले - ॥ ८ ॥

कुतः कल्याणसत्त्वायाः कल्याणाभिरतेः सदा ।

चलनं तात वैदेह्यास्तपस्विषु विशेषतः ॥ ९ ॥

' तात! जो स्वभावसे ही कल्याणमयी है और सदा सबके कल्याणमें ही रत रहती है, वह विदेहनन्दिनी सीता विशेषतः तपस्वीजनोंके प्रति बर्ताव करते समय अपने कल्याणमय स्वभावसे विचलित हो जाय, यह कैसे सम्भव है? ॥ ९ ॥

त्वन्निमित्तमिदं तावत् तापसान् प्रति वर्तते ।

रक्षोभ्यस्तेन संविग्नाः कथयन्ति मिथः कथाः ॥ १० ॥

' आपके ही कारण तापसोंपर यह राक्षसोंकी ओर से भय उपस्थित होनेवाला है, उससे उद्विग्न हुए ऋषि आपसमें कुछ बातें ( कानाफूसी ) कर रहे हैं ॥ १० ॥

पृष्ठ 556

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 556 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

रावणावरजः कश्चित् खरो नामेह राक्षसः ।

उत्पाट्य तापसान् सर्वाञ्जनस्थाननिवासिनः ॥ ११ ॥

धृष्टश्च जितकाशी च नृशंसः पुरुषादकः ।

अवलिप्तश्च पापश्च त्वां च तात न मृष्यते ॥ १२ ॥

' तात! यहाँ वनप्रान्तमें रावणका छोटा भाई खर नामक राक्षस है, जिसने जनस्थानमें रहनेवाले समस्त तापसोंको उखाड़ फेंका है । वह बड़ा ही ढीठ, विजयोन्मत्त, क्रूर, नरभक्षी और घमंडी है । वह आपको भी सहन नहीं कर पाता है ॥ ११-१२ ॥

त्वं यदाप्रभृति ह्यस्मिन्नाश्रमे तात वर्तसे ।

तदाप्रभृति रक्षांसि विप्रकुर्वन्ति तापसान् ॥ १३ ॥

' तात! जबसे आप इस आश्रममें रह रहे हैं, तबसे सब राक्षस तापसोंको विशेषरूपसे सताने लगे हैं ।

दर्शयन्ति हि बीभत्सैः क्रूरैर्भीषणकैरपि ।

नानारूपैर्विरूपैश्च रूपैरसुखदर्शनैः ॥१४ ॥

अप्रशस्तैरशुचिभिः सम्प्रयुज्य च तापसान् ।

प्रतिघ्नन्त्यपरान् क्षिप्रमनार्याः पुरतः स्थितान् ॥ १५ ॥

' वे अनार्य राक्षस बीभत्स ( घृणित ), क्रूर और भीषण, नाना प्रकारके विकृत एवं देखनेमें दुःखदायक रूप धारण करके सामने आते हैं और पापजनक अपवित्र पदार्थोंसे तपस्वियोंका स्पर्श कराकर अपने सामने खड़े हुए अन्य ऋषियोंको भी पीड़ा देते हैं ॥ १४-१५ ॥

तेषु तेष्वाश्रमस्थानेष्वबुद्धमवलीय च ।

रमन्ते तापसांस्तत्र नाशयन्तोऽल्पचेतसः ॥ १६ ॥

' वे उन - उन आश्रमोंमें अज्ञातरूपसे आकर छिप जाते हैं और अल्पज्ञ अथवा असावधान तापसोंका विनाश करते हुए वहाँ सानन्द विचरते रहते हैं ॥ १६ ॥

अवक्षिपन्ति स्रुग्भाण्डानग्नीन् सिञ्चन्ति वारिणा ।

कलशांश्च प्रमर्दन्ति हवने समुपस्थिते ॥ १७ ॥

' होमकर्म आरम्भ होनेपर वे स्रुक् - खुवा आदि यज्ञ-सामग्रियोंको इधर - उधर फेंक देते हैं । प्रज्वलित अग्निमें पानी डाल देते हैं और कलशोंको फोड़ डालते हैं ॥

तैर्दुरात्मभिराविष्टानाश्रमान् प्रजिहासवः ।

गमनायान्यदेशस्य चोदयन्त्यृषयोऽद्य माम् ॥ १८ ॥

' उन दुरात्मा राक्षसोंसे आविष्ट हुए आश्रमोंको त्याग देनेकी इच्छा रखकर ये ऋषिलोग आज मुझे यहाँसे अन्य स्थानमें चलनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं ॥ १८ ॥

तत् पुरा राम शारीरीमुपहिंसां तपस्विषु ।

दर्शयन्ति हि दुष्टास्ते त्यक्ष्याम इममाश्रमम् ॥ १ ९ ॥

' श्रीराम! वे दुष्ट राक्षस तपस्वियोंकी शारीरिक हिंसाका प्रदर्शन करें, इसके पहले ही हम इस आश्रमको त्याग देंगे ॥ १ ९ ॥

बहुमूलफलं चित्रमविदूरादितो वनम् ।

अश्वस्याश्रममेवाहं श्रयिष्ये सगणः पुनः ॥ २० ॥

' यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक विचित्र वन है, जहाँ फल- मूलकी अधिकता है । वहीं अश्वमुनिका आश्रम है, अतः ऋषियोंके समूहको साथ लेकर मैं पुन: उसी आश्रमका आश्रय लूँगा ॥२० ॥

खरस्त्वय्यपि चायुक्तं पुरा राम प्रवर्तते ।

सहास्माभिरितो गच्छ यदि बुद्धिः प्रवर्तते ॥ २१ ॥

' श्रीराम! खर आपके प्रति भी कोई अनुचित बर्ताव करे, उसके पहले ही यदि आपका विचार हो तो हमारे साथ ही यहाँसे चल दीजिये ॥ २१ ॥

सकलत्रस्य संदेहो नित्यं युक्तस्य राघव ।

समर्थस्यापि हि सतो वासो दुःखमिहाद्य ते ॥२२ ॥

' रघुनन्दन! यद्यपि आप सदा सावधान रहनेवाले तथा राक्षसोंके दमनमें समर्थ हैं, तथापि पत्नीके साथ आजकल उस आश्रममें आपका रहना संदेहजनक एवं दुःखदायक है ' ॥ २२ ॥

इत्युक्तवन्तं रामस्तं राजपुत्रस्तपस्विनम् ।

न शशाकोत्तरैर्वाक्यैरवबद्धुं समुत्सुकम् ॥ २३ ॥

ऐसी बात कहकर अन्यत्र जानेके लिये उत्कण्ठित हुए उन तपस्वी मुनिको राजकुमार श्रीराम सान्त्वनाजनक उत्तरवाक्योंद्वारा वहाँ रोक नहीं सके ॥ २३ ॥

अभिनन्द्य समापृच्छ्य समाधाय च राघवम् ।

स जगामाश्रमं त्यक्त्वा कुलैः कुलपतिः सह ॥ २४ ॥

तत्पश्चात् वे कुलपति महर्षि श्रीरामचन्द्रजीका अभिनन्दन करके उनसे पूछकर और उन्हें सान्त्वना देकर इस आश्रमको छोड़ वहाँसे अपने दलके ऋषियोंके साथ चले गये ॥ २४ ॥

रामः संसाध्य ऋषिगणमनुगमनाद् देशात् तस्मात् कुलपतिमभिवाद्य ऋषिम् । सम्यक्प्रीतैस्तैरनुमत उपदिष्टार्थः पुण्यं वासाय स्वनिलयमुपसम्पेदे ॥ २५ ॥

श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे जानेवाले ऋषियोंके पीछे - पीछे जाकर उन्हें विदा दे कुलपति ऋषिको प्रणाम करके परम प्रसन्न हुए उन ऋषियोंकी अनुमति ले उनके दिये हुए कर्तव्यविषयक उपदेशको सुनकर लौटे और निवास करनेके लिये अपने पवित्र आश्रम में आये ॥ २५ ॥

पृष्ठ 557

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 557 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे सप्तदशाधिकशततमः सर्गः ५४५ आश्रममृषिविरहितं प्रभुः एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ा । जिनका ऋषियोंके समान क्षणमपि न जहौ स राघवः । ही चरित्र था, उन श्रीरामचन्द्रजीमें निश्चय ही ऋषियोंकी राघवं सततमनुगता- रक्षाकी शक्तिरूप गुण विद्यमान है । ऐसा विश्वास रखनेवाले स्तापसाश्चार्षचरिते धृतगुणाः ॥ २६ ॥ कुछ तपस्वीजनोंने सदा श्रीरामका ही अनुसरण किया ।

उन ऋषियोंसे रहित हुए आश्रमको भगवान् श्रीरामने | वे दूसरे किसी आश्रममें नहीं गये ॥ २६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षोडशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११६ ॥

सप्तदशाधिकशततमः सर्गः श्रीराम आदिका अत्रिमुनिके आश्रमपर जाकर उनके द्वारा सत्कृत होना तथा अनसूयाद्वारा सीताका सत्कार

राघवस्त्वपयातेषु सर्वेष्वनुविचिन्तयन् ।

न तत्रारोचयद् वासं कारणैर्बहुभिस्तदा ॥ १ ॥

उन सब ऋषियोंके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने जब बारंबार विचार किया, तब उन्हें बहुत - से ऐसे

कारण ज्ञात हुए, जिनसे उन्होंने स्वयं भी वहाँ रहना ।

उचित न समझा ॥ १ ॥

इह मे भरतो दृष्टो मातरश्च सनागराः ।

सा च मे स्मृतिरन्वेति तान् नित्यमनुशोचतः ॥ २ ॥

उन्होंने मन - ही - मन सोचा, ' इस आश्रममें मैं भरतसे, माताओंसे तथा पुरवासी मनुष्योंसे मिल चुका हूँ । वह स्मृति मुझे बराबर बनी रहती है और मैं प्रतिदिन उन सब लोगोंका चिन्तन करके शोकमग्न हो जाता हूँ ॥

स्कन्धावारनिवेशेन तेन तस्य महात्मनः ।

हयहस्तिकरीषैश्च उपमर्दः कृतो भृशम् ॥ ३ ॥

' महात्मा भरतकी सेनाका पड़ाव पड़नेके कारण हाथी और घोड़ोंकी लीदोंसे यहाँकी भूमि अधिक अपवित्र कर दी गयी है ॥ ३ ॥

तस्मादन्यत्र गच्छाम इति संचिन्त्य राघवः ।

प्रातिष्ठत स वैदेह्या लक्ष्मणेन च संगतः ॥ ४ ॥

' अतः हमलोग भी अन्यत्र चले जायँ ' ऐसा सोचकर ।

श्रीरघुनाथजी सीता और लक्ष्मणके साथ वहाँसे चल दिये ॥

सोऽनेराश्रममासाद्य तं ववन्दे महायशाः ।

तं चापि भगवानत्रिः पुत्रवत् प्रत्यपद्यत ॥ ५ ॥

वहाँसे अत्रिके आश्रमपर पहुँचकर महायशस्वी श्रीरामने उन्हें प्रणाम किया तथा भगवान् अत्रिने भी उन्हें अपने पुत्रकी भाँति स्नेहपूर्वक अपनाया ॥ ५ ॥

स्वयमातिथ्यमादिश्य सर्वमस्य सुसत्कृतम् ।

सौमित्रिं च महाभागं सीतां च समसान्त्वयत् ॥ ६ ॥

75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) Section_19_1_Front उन्होंने स्वयं ही श्रीरामका सम्पूर्ण आतिथ्य-सत्कार करके महाभाग लक्ष्मण और सीताको भी सत्कारपूर्वक संतुष्ट किया ॥ ६ ॥

पत्नीं च तामनुप्राप्तां वृद्धामामन्त्र्य सत्कृताम् ।

सान्त्वयामास धर्मज्ञः सर्वभूतहिते रतः ॥७ ॥

अनसूयां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम् ।

प्रतिगृह्णीष्व वैदेहीमब्रवीदृषिसत्तमः ॥ ८ ॥

सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले धर्मज्ञ मुनिश्रेष्ठ अत्रिने अपने समीप आयी हुई सबके द्वारा सम्मानित तापसी एवं धर्मपरायणा बूढ़ी पत्नी महाभागा अनसूयाको सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा संतुष्ट किया और कहा - ' देवि! विदेहराजनन्दिनी सीताको । सत्कारपूर्वक हृदयसे लगाओ'॥७-८ ॥

रामाय चाचचक्षे तां तापसीं धर्मचारिणीम् ।

दश वर्षाण्यनावृष्ट्या दग्धे लोके निरन्तरम् ॥ ९ ॥

यया मूलफले सृष्टे जाह्नवी च प्रवर्तिता ।

उग्रेण तपसा युक्ता नियमैश्चाप्यलंकृता ॥ १० ॥

दश वर्षसहस्त्राणि यया तप्तं महत् तपः ।

अनसूयाव्रतैस्तात प्रत्यूहाश्च निबर्हिताः ॥ ११ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूयाका परिचय देते हुए कहा - ' एक समय दस वर्षोंतक वृष्टि नहीं हुई, उस समय जब सारा जगत् निरन्तर दग्ध होने लगा, तब जिन्होंने उग्र तपस्यासे युक्त तथा कठोर नियमोंसे अलंकृत होकर अपने तपके प्रभावसे यहाँ फल-मूल उत्पन्न किये और मन्दाकिनीकी पवित्र धारा बहायी तथा तात! जिन्होंने दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या करके अपने उत्तम व्रतोंके प्रभावसे ऋषियोंके समस्त । विघ्नोंका निवारण किया था, वे ही यह अनसूया देवी हैं ॥

पृष्ठ 558

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 558 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

देवकार्यनिमित्तं च यया संत्वरमाणया ।

दशरात्रं कृता रात्रिः सेयं मातेव तेऽनघ ॥ १२ ॥ ।

' निष्पाप श्रीराम! इन्होंने देवताओंके कार्यके लिये अत्यन्त उतावली होकर दस रातके बराबर एक ही रात बनायी थी; वे ही ये अनसूया देवी तुम्हारे लिये माताकी भाँति पूजनीया हैं ॥१२ ॥

तामिमां सर्वभूतानां नमस्कार्यं तपस्विनीम् ।

अभिगच्छतु वैदेही वृद्धामक्रोधनां सदा ॥ १३ ॥

' ये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये वन्दनीया तपस्विनी हैं । क्रोध तो इन्हें कभी छू भी नहीं सका है । विदेहनन्दिनी सीता इन वृद्धा अनसूया देवीके पास जायँ ' ॥ १३ ॥

एवं ब्रुवाणं तमृषिं तथेत्युक्त्वा स राघवः ।

सीतामालोक्य धर्मज्ञामिदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥

ऐसी बात कहते हुए अत्रि मुनिसे ' बहुत अच्छा ' कहकर श्रीरामचन्द्रजीने धर्मज्ञा सीताकी ओर देखकर यह बात कही - ॥ १४ ॥

राजपुत्रि श्रुतं त्वेतन्मुनेरस्य समीरितम् ।

श्रेयोऽर्थमात्मनः शीघ्रमभिगच्छ तपस्विनीम् ॥ १५ ॥

' राजकुमारी! महर्षि अत्रिके वचन तो तुमने सुन ही लिये; अब अपने कल्याणके लिये तुम शीघ्र ही इन तपस्विनी देवीके पास जाओ ॥ १५ ॥

अनसूयेति या लोके कर्मभिः ख्यातिमागता ।

तां शीघ्रमभिगच्छ त्वमभिगम्यां तपस्विनीम् ॥ १६ ॥

' जो अपने सत्कर्मोंसे संसारमें अनसूयाके नामसे विख्यात हुई हैं, वे तपस्विनी देवी तुम्हारे आश्रय लेने योग्य हैं; तुम शीघ्र उनके पास जाओ ' ॥ १६ ॥

सीता त्वेतद् वचः श्रुत्वा राघवस्य यशस्विनी ।

तामत्रिपत्नीं धर्मज्ञामभिचक्राम मैथिली ॥ १७ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर यशस्विनी मिथिलेश - कुमारी सीता धर्मको जाननेवाली अत्रिपत्नी अनसूयाके पास गयीं ॥ १७ ॥

शिथिलां वलितां वृद्धां जरापाण्डुरमूर्धजाम् ।

सततं वेपमानाङ्गीं प्रवाते कदलीमिव ॥१८ ॥

अनसूया वृद्धावस्थाके कारण शिथिल हो गयी थीं; उनके शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं थीं तथा सिरके बाल सफेद हो गये थे । अधिक हवा चलनेपर हिलते हुए कदली-वृक्षके समान उनके सारे अङ्ग निरन्तर काँप रहे थे ॥ १८ ॥

तां तु सीता महाभागामनसूयां पतिव्रताम् ।

अभ्यवादयदव्यग्रा स्वं नाम समुदाहरत् ॥ १ ९ ॥

सीताने निकट जाकर शान्तभावसे अपना नाम बताया और उन महाभागा पतिव्रता अनसूयाको प्रणा किया ॥ १ ९ ॥

अभिवाद्य च वैदेही तापसीं तां दमान्विताम् ।

बद्धाञ्जलिपुटा हृष्टा पर्यपृच्छदनामयम् ॥ २० ॥

उन संयमशीला तपस्विनीको प्रणाम करके हर्षसे भरी हुई सीताने दोनों हाथ जोड़कर उनका कुशल-समाचार पूछा ॥ २० ॥

ततः सीतां महाभागां दृष्ट्वा तां धर्मचारिणीम् ।

सान्त्वयन्त्यब्रवीद् वृद्धा दिष्ट्या धर्ममवेक्षसे ॥ २१ ॥

धर्मका आचरण करनेवाली महाभागा सीताको देखकर बूढ़ी अनसूया देवी उन्हें सान्त्वना देती हुई बोलीं – ' सीते! सौभाग्यकी बात है कि तुम धर्मपर ही दृष्टि रखती हो ॥ २१ ॥

त्यक्त्वा ज्ञातिजनं सीते मानवृद्धिं च मानिनि ।

अवरुद्धं वने रामं दिष्ट्या त्वमनुगच्छसि ॥ २२ ॥

' मानिनी सीते! बन्धु - बान्धवोंको छोड़कर और उनसे प्राप्त होनेवाली मान - प्रतिष्ठाका परित्याग करके तुम वनमें भेजे हुए श्रीरामका अनुसरण कर रही हो— यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ २२ ॥

नगरस्थो वनस्थो वा शुभो वा यदि वाशुभः ।

यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका महोदयाः ॥ २३ ॥

' अपने स्वामी नगरमें रहें या वनमें, भले हों या बुरे, जिन स्त्रियोंको वे प्रिय होते हैं, उन्हें महान् अभ्युदयशाली लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥

दुःशीलः कामवृत्तो वा धनैर्वा परिवर्जितः ।

स्त्रीणामार्यस्वभावानां परमं दैवतं पतिः ॥ २४ ॥

' पति बुरे स्वभावका, मनमाना बर्ताव करनेवाला अथवा धनहीन ही क्यों न हो, वह उत्तम स्वभाववाली नारियोंके लिये श्रेष्ठ देवताके समान है ॥ २४ ॥

नातो विशिष्टं पश्यामि बान्धवं विमृशन्त्यहम् ।

सर्वत्र योग्यं वैदेहि तपःकृतमिवाव्ययम् ॥ २५ ॥

' विदेहराजनन्दिनि! मैं बहुत विचार करनेपर भी पतिसे बढ़कर कोई हितकारी बन्धु नहीं देखती । अपनी की हुई तपस्याके अविनाशी फलकी भाँति वह इस लोकमें और परलोकमें सर्वत्र सुख पहुँचाने में समर्थ होता है ॥ २५ ॥

न त्वेवमनुगच्छन्ति गुणदोषमसत्स्त्रियः ।

कामवक्तव्यहृदया भर्तृनाथाश्चरन्ति याः ॥ २६ ॥

' जो अपने पतिपर भी शासन करती हैं, वे कामके अधीन चित्तवाली असाध्वी स्त्रियाँ इस प्रकार पतिका अनुसरण नहीं करतीं । उन्हें गुण - दोषोंका ज्ञान नहीं होता; 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_19_1_Back

पृष्ठ 559

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 559 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अयोध्याकाण्डे अष्टादशाधिकशततमः सर्गः ५४७ अतः वे इच्छानुसार इधर - उधर विचरती रहती हैं ॥ २६ ॥ ।

प्राप्नुवन्त्ययशश्चैव धर्मभ्रंशं च मैथिलि ।

अकार्यवशमापन्नाः स्त्रियो याः खलु तद्विधाः ॥ २७ ॥

‘ मिथिलेशकुमारी! ऐसी नारियाँ अवश्य ही अनुचित कर्ममें फँसकर धर्मसे भ्रष्ट हो जाती हैं और संसारमें उन्हें अपयशकी प्राप्ति होती है ॥ २७ ॥

त्वद्विधास्तु गुणैर्युक्ता दृष्टलोकपरावराः ।

स्त्रियः स्वर्गे चरिष्यन्ति यथा पुण्यकृतस्तथा ॥ २८ ॥

' किंतु जो तुम्हारे समान लोक - परलोकको जाननेवाली साध्वी स्त्रियाँ हैं, वे उत्तम गुणोंसे युक्त होकर पुण्यकर्मोंमें

संलग्न रहती हैं; अतः वे दूसरे पुण्यात्माओंकी भाँति ।

स्वर्गलोकमें विचरण करेंगी ॥ २८ ॥।

तदेवमेतं त्वमनुव्रता सती पतिप्रधाना समयानुवर्तिनी । भव स्वभर्तुः सहधर्मचारिणी यशश्च धर्मं च ततः समाप्स्यसि ॥ २ ९ ॥ ' अतः तुम इसी प्रकार अपने इन पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लगी रहो- सतीधर्मका पालन करो, पतिको प्रधान देवता समझो और प्रत्येक समय उनका अनुसरण करती हुई अपने स्वामीकी सहधर्मिणी बनो, इससे तुम्हें सुयश और धर्म दोनोंकी प्राप्ति होगी ' ॥ २ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तदशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११७ ॥

अष्टादशाधिकशततमः सर्गः सीता - - अ अनसूया - संवाद, अनसूयाका सीताको प्रेमोपहार देना तथा अनसूयाके पूछनेपर सीताका उन्हें अपने स्वयंवरकी कथा सुनाना

सा त्वेवमुक्ता वैदेही त्वनसूयानसूयया ।

प्रतिपूज्य वचो मन्दं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ १ ॥

तपस्विनी अनसूयाके इस प्रकार उपदेश देनेपर किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखनेवाली विदेहराजकुमारी सीताने उनके वचनोंकी भूरि - भूरि प्रशंसा करके धीरे-धीरे इस प्रकार कहना आरम्भ किया- ॥ १ ॥

नैतदाश्चर्यमार्यायां यन्मां त्वमनुभाषसे ।

विदितं तु ममाप्येतद् यथा नार्याः पतिर्गुरुः ॥ २ ॥

‘ देवि! आप संसारकी स्त्रियोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं । आपके मुँहसे ऐसी बातोंका सुनना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । नारीका गुरु पति ही है, इस विषयमें जैसा आपने उपदेश किया है, यह बात मुझे भी पहलेसे ही विदित है ॥२ ॥

यद्यप्येष भवेद् भर्ता अनार्यों वृत्तिवर्जितः ।

अद्वैधमत्र वर्तव्यं यथाप्येष मया भवेत् ॥ ३ ॥

' मेरे पतिदेव यदि अनार्य ( चरित्रहीन ) तथा जीविकाके साधनोंसे रहित ( निर्धन ) होते तो भी मैं बिना किसी दुविधाके इनकी सेवामें लगी रहती ॥ ३ ॥

किं पुनर्यो गुणश्लाघ्यः सानुक्रोशो जितेन्द्रियः ।

स्थिरानुरागो धर्मात्मा मातृवत्पितृवत्प्रियः ॥ ४ ॥

‘ फिर जब कि ये अपने गुणोंके कारण ही सबकी प्रशंसाके पात्र हैं, तब तो इनकी सेवाके लिये कहना ही क्या है । ये श्रीरघुनाथजी परम दयालु, जितेन्द्रिय, दृढ़ अनुराग रखनेवाले, धर्मात्मा तथा माता - पिताके समान प्रिय हैं ॥ ४ ॥

यां वृत्तिं वर्तते रामः कौसल्यायां महाबलः ।

तामेव नृपनारीणामन्यासामपि वर्तते ॥ ५ ॥

' महाबली श्रीराम अपनी माता कौसल्याके प्रति जैसा बर्ताव करते हैं वैसा ही महाराज दशरथकी दूसरी रानियोंके साथ भी करते हैं ॥५ ॥

सकृद् दृष्टास्वपि स्त्रीषु नृपेण नृपवत्सलः ।

मातृवद् वर्तते वीरो मानमुत्सृज्य धर्मवित् ॥ ६ ॥

' महाराज दशरथने एक बार भी जिन स्त्रियोंको प्रेमदृष्टिसे देख लिया है, उनके प्रति भी ये पितृवत्सल धर्मज्ञ वीर श्रीराम मान छोड़कर माताके समान ही बर्ताव करते हैं ॥६ ॥

आगच्छन्त्याश्च विजनं वनमेवं भयावहम् ।

समाहितं हि मे श्वश्र्वा हृदये यत् स्थिरं मम ॥ ७ ॥

' जब मैं पतिके साथ निर्जन वनमें आने लगी, उस समय मेरी सास कौसल्याने मुझे जो कर्तव्यका उपदेश दिया था, वह मेरे हृदयमें ज्यों - का - त्यों स्थिरभावसे अङ्कित है ॥७ ॥

पाणिप्रदानकाले च यत् पुरा त्वग्निसंनिधौ ।

। अनुशिष्टं जनन्या मे वाक्यं तदपि मे धृतम् ॥ ८ ॥

75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_19_2_Front

पृष्ठ 560

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 560 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

' पहले मेरे विवाह - कालमें अग्निके समीप माताने मुझे ।

जो शिक्षा दी थी, वह भी मुझे अच्छी तरह याद है ॥ ८ ॥

न विस्मृतं तु मे सर्वं वाक्यैः स्वैर्धर्मचारिणि ।

पतिशुश्रूषणान्नार्यास्तपो नान्यद् विधीयते ॥ ९ ॥

' धर्मचारिणि! इसके सिवा मेरे अन्य स्वजनोंने अपने वचनोंद्वारा जो - जो उपदेश किया है, वह भी मुझे भूला नहीं है । स्त्रीके लिये पतिकी सेवाके अतिरिक्त दूसरे किसी तपका विधान नहीं है ॥ ९ ॥

सावित्री पतिशुश्रूषां कृत्वा स्वर्गे महीयते ।

तथावृत्तिश्च याता त्वं पतिशुश्रूषया दिवम् ॥ १० ॥

' सत्यवान्‌की पत्नी सावित्री पतिकी सेवा करके ही स्वर्गलोकमें पूजित हो रही हैं । उन्हींके समान बर्ताव करनेवाली आप ( अनसूया देवी ) ने भी पतिकी सेवाके ही प्रभावसे स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया है ॥ १० ॥

वरिष्ठा सर्वनारीणामेषा च दिवि देवता ।

रोहिणी न विना चन्द्रं मुहूर्तमपि दृश्यते ॥ ११ ॥

' सम्पूर्ण स्त्रियोंमें श्रेष्ठ यह स्वर्गकी देवी रोहिणी पतिसेवाके प्रभावसे ही एक मुहूर्तके लिये भी चन्द्रमासे बिलग होती नहीं देखी जाती ॥ ११ ॥

एवंविधाश्च प्रवराः स्त्रियो भर्तृदृढव्रताः ।

देवलोके महीयन्ते पुण्येन स्वेन कर्मणा ॥ १२ ॥

' इस प्रकार दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य धर्मका पालन करनेवाली बहुत - सी साध्वी स्त्रियाँ अपने पुण्यकर्मके बलसे देवलोकमें आदर पा रही हैं ' ॥ १२ ॥

ततोऽनसूया संहृष्टा श्रुत्वोक्तं सीतया वचः ।

शिरसाऽऽघ्राय चोवाच मैथिलीं हर्षयन्त्युत ॥ १३ ॥

तदनन्तर सीताके कहे हुए वचन सुनकर अनसूयाको बड़ा हर्ष हुआ । उन्होंने उनका मस्तक सूँघा और फिर उन मिथिलेशकुमारीका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा -नियमैर्विविधैराप्तं तपो हि महदस्ति मे । तत् संश्रित्य बलं सीते छन्दये त्वां शुचिव्रते ॥ १४ ॥

' उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सीते! मैंने अनेक प्रकारके नियमोंका पालन करके बहुत बड़ी तपस्या संचित की है । उस तपोबलका ही आश्रय लेकर मैं तुमसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहती हूँ ॥ १४ ॥

उपपन्नं च युक्तं च वचनं तव मैथिलि ।

प्रीता चास्म्युचितां सीते करवाणि प्रियं च किम् ॥ १५ ॥

' मिथिलेशकुमारी सीते! तुमने बहुत ही युक्तियुक्त और उत्तम वचन कहा है । उसे सुनकर मुझे बड़ा संतोष हुआ है, अतः बताओ मैं तुम्हारा कौन - सा प्रिय कार्य करूँ? ' ॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा विस्मिता मन्दविस्मया ।

कृतमित्यब्रवीत् सीता तपोबलसमन्विताम् ॥ १६ ॥

उनका यह कथन सुनकर सीताको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे तपोबलसम्पन्न अनसूयासे मन्द - मन्द मुसकराती हुई बोलीं- ' आपने अपने वचनोंद्वारा ही मेरा सारा प्रिय कार्य कर दिया, अब और कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं है ' ।

सा त्वेवमुक्ता धर्मज्ञा तया प्रीततराभवत् ।

सफलं च प्रहर्ष ते हन्त सीते करोम्यहम् ॥ १७ ॥

सीताके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ अनसूयाको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे बोलीं- ' सीते! तुम्हारी निर्लोभतासे जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है ( अथवा तुममें जो लोभहीनताके कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है ), उसे मैं अवश्य सफल करूँगी ॥१७ ॥

इदं दिव्यं वरं माल्यं वस्त्रमाभरणानि च ।

अङ्गरागं च वैदेहि महार्हमनुलेपनम् ॥ १८ ॥

मया दत्तमिदं सीते तव गात्राणि शोभयेत् ।

अनुरूपमसंक्लिष्टं नित्यमेव भविष्यति ॥ १ ९ ॥

' यह सुन्दर दिव्य हार, यह वस्त्र, ये आभूषण, यह अङ्गराग और बहुमूल्य अनुलेपन मैं तुम्हें देती हूँ । विदेह-नन्दिनि सीते! मेरी दी हुई ये वस्तुएँ तुम्हारे अङ्गोंकी शोभा बढ़ायेंगी । ये सब तुम्हारे ही योग्य हैं और सदा उपयोगमें लायी जानेपर निर्दोष एवं निर्विकार रहेंगी ॥

अङ्गरागेण दिव्येन लिप्ताङ्गी जनकात्मजे ।

शोभयिष्यसि भर्तारं यथा श्रीर्विष्णुमव्ययम् ॥ २० ॥

‘ जनककिशोरी! इस दिव्य अङ्गरागको अङ्गोंमें लगाकर तुम अपने पतिको उसी प्रकार सुशोभित करोगी, जैसे लक्ष्मी अविनाशी भगवान् विष्णुकी शोभा बढ़ाती है ' ॥

सा वस्त्रमङ्गरागं च भूषणानि स्त्रजस्तथा ।

मैथिली प्रतिजग्राह प्रीतिदानमनुत्तमम् ॥ २१ ॥

प्रतिगृह्य च तत् सीता प्रीतिदानं यशस्विनी ।

श्लिष्टाञ्जलिपुटा धीरा समुपास्त तपोधनाम् ॥ २२ ॥

अनसूयाकी आज्ञासे धीर स्वभाववाली यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीताने उस वस्त्र, अङ्गराग, आभूषण और हारको उनकी प्रसन्नताका परम उत्तम उपहार समझकर ले लिया । उस प्रेमोपहारको ग्रहण करके वे दोनों हाथ जोड़कर उन तपोधना अनसूयाकी सेवामें बैठी रहीं ॥

तथा सीतामुपासीनामनसूया दृढव्रता ।

वचनं प्रष्टुमारेभे कथां कांचिदनुप्रियाम् ॥ २३ ॥

तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीतासे दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली अनसूयाने 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_19_2_Back