वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 561–570
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570
पृष्ठ 561
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे अष्टादशाधिकशततमः सर्गः ५४ ९ कोई परम प्रिय कथा सुनानेके लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया- ॥ २३ ॥
स्वयंवरे किल प्राप्ता त्वमनेन यशस्विना ।
राघवेणेति मे सीते कथा श्रुतिमुपागता ॥ २४ ॥
' सीते! इन यशस्वी राघवेन्द्रने तुम्हें स्वयंवरमें प्राप्त किया था, यह बात मेरे सुननेमें आयी है ॥ २४ ॥
तां कथां श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण च मैथिलि ।
यथाभूतं च कार्त्स्न्येन तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ २५ ॥
' मिथिलेशनन्दिनि! मैं उस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहती हूँ । अतः जो कुछ जिस प्रकार हुआ, वह सब पूर्णरूपसे मुझे बताओ ' ॥ २५ ॥
एवमुक्ता तु सा सीता तापसीं धर्मचारिणीम् ।
श्रूयतामिति चोक्त्वा वै कथयामास तां कथाम् ॥ २६ ॥
उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर सीताने उन धर्मचारिणी तापसी अनसूयासे कहा— ' माताजी! सुनिये । ' ऐसा कहकर उन्होंने उस कथाको इस प्रकार कहना आरम्भ किया—
मिथिलाधिपतिर्वीरो जनको नाम धर्मवित् ।
क्षत्रकर्मण्यभिरतो न्यायतः शास्ति मेदिनीम् ॥ २७ ॥
‘ मिथिला जनपदके वीर राजा ' जनक ' नामसे प्रसिद्ध हैं । वे धर्मके ज्ञाता हैं, अतः क्षत्रियोचित कर्ममें तत्पर रहकर न्यायपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हैं ॥ २७ ॥
तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम् ।
अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपतेः सुता ॥ २८ ॥
' एक समयकी बात है, वे यज्ञके योग्य क्षेत्रको हाथमें हल लेकर जोत रहे थे; इसी समय मैं पृथ्वीको फाड़कर प्रकट हुई । इतनेमात्रसे ही मैं राजा जनककी पुत्री हुई ॥
स मां दृष्ट्वा नरपतिर्मुष्टिविक्षेपतत्परः ।
पांसुगुण्ठितसर्वाङ्गीं विस्मितो जनकोऽभवत् ॥ २ ९ ॥
' वे राजा उस क्षेत्रमें ओषधियोंको मुट्ठीमें लेकर बो रहे थे । इतनेहीमें उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी । मेरे सारे अङ्गोंमें धूल लिपटी हुई थी । उस अवस्थामें मुझे देखकर राजा जनकको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २ ९ ॥
अनपत्येन च स्नेहादङ्कमारोप्य च स्वयम् ।
ममेयं तनयेत्युक्त्वा स्नेहो मयि निपातितः ॥ ३० ॥
' उन दिनों उनके कोई दूसरी संतान नहीं थी, इसलिये स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोदमें ले लिया और ' यह मेरी बेटी है ' ऐसा कहकर मुझपर अपने हृदयका सारा स्नेह उड़ेल दिया ॥ ३० ॥
अन्तरिक्षे च वागुक्ता प्रतिमामानुषी किल ।
एवमेतन्नरपते धर्मे तनया तव ॥ ३१ ॥
' इसी समय आकाशवाणी हुई, जो स्वरूपतः मानवी भाषामें कही गयी थी ( अथवा मेरे विषयमें प्रकट हुई वह वाणी अमानुषी - दिव्य थी ) । उसने कहा - ' नरेश्वर! तुम्हारा कथन ठीक है, यह कन्या धर्मतः तुम्हारी ही पुत्री है ' ॥
ततः प्रहृष्टो धर्मात्मा पिता मे मिथिलाधिपः ।
अवाप्तो विपुलामृद्धिं मामवाप्य नराधिपः ॥ ३२ ॥
' यह आकाशवाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिलानरेश बड़े प्रसन्न हुए । मुझे पाकर उन नरेशने मानो कोई बड़ी समृद्धि पा ली थी ॥ ३२ ॥
दत्ता चास्मीष्टवद्देव्यै ज्येष्ठायै पुण्यकर्मणे ।
तया सम्भाविता चास्मि स्निग्धया मातृसौहृदात् ॥ ३३ ॥
' उन्होंने पुण्यकर्मपरायणा बड़ी रानीको, जो उन्हें अधिक प्रिय थीं, मुझे दे दिया । उन स्नेहमयी महारानीने मातृसमुचित सौहार्दसे मेरा लालन - पालन किया ॥ ३३ ॥
पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता ।
चिन्तामभ्यगमद् दीनो वित्तनाशादिवाधनः ॥ ३४ ॥
' जब पिताने देखा कि मेरी अवस्था विवाहके योग्य हो गयी, तब इसके लिये वे बड़ी चिन्तामें पड़े । जैसे कमाये हुए धनका नाश हो जानेसे बड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार वे चिन्तासे बहुत दुःखी हो गये ॥ ३४ ॥
| सदृशाच्चापकृष्टाच्च लोके कन्यापिता प्रधर्षणमवाप्नोति शक्रेणापि समो ' संसारमें कन्याके पिताको, वह ही तुल्य क्यों न हो, वरपक्षके लोगोंसे, निर्धन मनुष्यको मेरे विवाहकी
जनात् ।
भुवि ॥ ३५ ॥
भूतलपर इन्द्रके वे अपने समान या अपनेसे छोटी हैसियतके ही क्यों न हों, प्रायः अपमान उठाना पड़ता है ॥ ३५ ॥
तां धर्षणामदूरस्थां संदृश्यात्मनि पार्थिवः ।
चिन्तार्णवगतः पारं नाससादाप्लवो यथा ॥ ३६ ॥
' वह अपमान सहन करनेकी घड़ी अपने लिये बहुत समीप आ गयी है, यह देखकर राजा चिन्ताके समुद्रमें डूब गये । जैसे नौकारहित मनुष्य पार नहीं पहुँच पाता, उसी प्रकार मेरे पिता भी चिन्ताका पार नहीं पा रहे थे ॥
अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन् ।
सदृशं चाभिरूपं च महीपालः पतिं मम ॥ ३७ ॥
' मुझे अयोनिजा कन्या समझकर वे भूपाल मेरे लिये योग्य और परम सुन्दर पतिका विचार करने लगे; किंतु किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके ॥ ३७ ॥
तस्य बुद्धिरियं जाता चिन्तयानस्य संततम् ।
। स्वयंवरं तनूजायाः करिष्यामीति धर्मतः ॥ ३८ ॥
पृष्ठ 562
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५५० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' सदा मेरे विवाहकी चिन्तामें पड़े रहनेवाले उन महाराजके मनमें एक दिन यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं धर्मतः अपनी पुत्रीका स्वयंवर करूँगा ॥ ३८ ॥
महायज्ञे तदा तस्य वरुणेन महात्मना ।
दत्तं धनुर्वरं प्रीत्या तूणी चाक्षय्यसायकौ ॥ ३ ९ ॥
' उन्हीं दिनों उनके एक महान् यज्ञमें प्रसन्न होकर महात्मा वरुणने उन्हें एक श्रेष्ठ दिव्य धनुष तथा अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरकस दिये ॥३ ९ ॥
असंचाल्यं मनुष्यैश्च यत्नेनापि च गौरवात् ।
तन्न शक्ता नमयितुं स्वजेष्वपि नराधिपाः ॥ ४० ॥
' वह धनुष इतना भारी था कि मनुष्य पूरा प्रयत्न । करनेपर भी उसे हिला भी नहीं पाते थे । भूमण्डलके नरेश स्वप्नमें भी उस धनुषको झुकानेमें असमर्थ थे ॥ ४० ॥
तद्धनुः प्राप्य मे पित्रा व्याहृतं सत्यवादिना ।
समवाये नरेन्द्राणां पूर्वमामन्त्र्य पार्थिवान् ॥ ४१ ॥
' उस धनुषको पाकर मेरे सत्यवादी पिताने पहले भूमण्डलके राजाओंको आमन्त्रित करके उन नरेशोंके समूहमें यह बात कही — ॥ ४१ ॥
इदं च धनुरुद्यम्य सज्यं यः कुरुते नरः ।
तस्य मे दुहिता भार्या भविष्यति न संशयः ॥ ४२ ॥
' जो मनुष्य इस धनुषको उठाकर इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा, मेरी पुत्री सीता उसीकी पत्नी होगी; इसमें संशय नहीं है ॥ ४२ ॥
तच्च दृष्ट्वा धनुःश्रेष्ठं गौरवाद् गिरिसंनिभम् ।
अभिवाद्य नृपा जग्मुरशक्तास्तस्य तोलने ॥ ४३ ॥
‘ अपने भारीपनके कारण पहाड़ जैसे प्रतीत होनेवाले उस श्रेष्ठ धनुषको देखकर वहाँ आये हुए राजा जब उसे उठानेमें समर्थ न हो सके, तब उसे प्रणाम करके चले गये ॥
सुदीर्घस्य तु कालस्य राघवोऽयं महाद्युतिः ।
विश्वामित्रेण सहितो यज्ञं द्रष्टुं समागतः ॥ ४४ ॥
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा रामः सत्यपराक्रमः ।
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा मम पित्रा सुपूजितः ॥ ४५ ॥
' तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् ये महातेजस्वी रघुकुल-नन्दन सत्यपराक्रमी श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणको साथ ले विश्वामित्रजीके साथ मेरे पिताका यज्ञ देखनेके लिये मिथिलामें पधारे । उस समय मेरे पिताने धर्मात्मा विश्वामित्र मुनिका बड़ा आदर - सत्कार किया ॥ ४४-४५ ॥ प्रोवाच पितरं तत्र राघवौ रामलक्ष्मणौ ।
सुतौ दशरथस्येमौ धनुर्दर्शनकांक्षिणौ ।
धनुर्दर्शय रामाय राजपुत्राय दैविकम् ॥ ४६ ॥
' तब वहाँ विश्वामित्रजी मेरे पितासे बोले – ' राजन्! ये दोनों रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथके पुत्र हैं और आपके उस दिव्य धनुषका दर्शन करना चाहते हैं । आप अपना वह देवप्रदत्त धनुष राजकुमार श्रीरामको दिखाइये ' ॥ ४६ ॥
इत्युक्तस्तेन विप्रेण तद् धनुः समुपानयत् ।
तद् धनुर्दर्शयामास राजपुत्राय दैविकम् ॥ ४७ ॥
' विप्रवर विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर पिताजीने उस दिव्य धनुषको मँगवाया और राजकुमार श्रीरामको उसे दिखाया ॥ ४७ ॥
निमेषान्तरमात्रेण तदानम्य महाबलः ।
ज्यां समारोप्य झटिति पूरयामास वीर्यवान् ॥ ४८ ॥
' महाबली और परम पराक्रमी श्रीरामने पलक मारते - मारते उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसे तुरंत कानतक खींचा ॥ ४८ ॥
तेनापूरयता वेगान्मध्ये भग्नं द्विधा धनुः ।
तस्य शब्दोऽभवद् भीमः पतितस्याशनेर्यथा ॥ ४ ९ ॥
' उनके वेगपूर्वक खींचते समय वह धनुष बीचसे ही टूट गया और उसके दो टुकड़े हो गये । उसके टूटते समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ मानो वहाँ वज्र टूट पड़ा हो ॥ ४ ९ ॥
ततोऽहं तत्र रामाय पित्रा सत्याभिसंधिना ।
उद्यता दातुमुद्यम्य जलभाजनमुत्तमम् ॥५० ॥
' तब मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिताने जलका उत्तम पात्र लेकर श्रीरामके हाथमें मुझे दे देनेका उद्योग किया ॥ ५० ॥
दीयमानां न तु तदा प्रतिजग्राह राघवः ।
अविज्ञाय पितुश्छन्दमयोध्याधिपतेः प्रभोः ॥ ५१ ॥
' उस समय अपने पिता अयोध्यानरेश महाराज दशरथके अभिप्रायको जाने बिना श्रीरामने राजा जनकके देनेपर भी मुझे नहीं ग्रहण किया ॥ ५१ ॥
ततः श्वशुरमामन्त्र्य वृद्धं दशरथं नृपम् ।
मम पित्रा त्वहं दत्तां रामाय विदितात्मने ॥ ५२ ॥
' तदनन्तर मेरे बूढ़े श्वशुर राजा दशरथकी अनुमति लेकर पिताजीने आत्मज्ञानी श्रीरामको मेरा दान कर दिया ॥ ५२ ॥
मम चैवानुजा साध्वी ऊर्मिला शुभदर्शना ।
भार्यार्थे लक्ष्मणस्यापि दत्ता पित्रा मम स्वयम् ॥ ५३ ॥
' तत्पश्चात् पिताजीने स्वयं ही मेरी छोटी बहिन सती साध्वी परम सुन्दरी ऊर्मिलाको लक्ष्मणकी पत्नीरूपसे । उनके हाथमें दे दिया ॥५३ ॥
पृष्ठ 563
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अयोध्याकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः ५५१ एवं दत्तास्मि रामाय तथा तस्मिन् स्वयंवरे । | हाथमें मुझको सौंपा था । मैं धर्मके अनुसार अपने अनुरक्तास्मि धर्मेण पतिं वीर्यवतां वरम् ॥ ५४ ॥ पति बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीराममें सदा अनुरक्त
' इस प्रकार उस स्वयंवरमें पिताजीने श्रीरामके । रहती हूँ ' ॥ ५४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टादशाधिकशततमः सर्गः ॥११८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः अनसूयाकी आज्ञासे सीताका उनके दिये हुए वस्त्राभूषणोंको धारण करके श्रीरामजीके पास आना तथा श्रीराम आदिका रात्रिमें आश्रमपर रहकर प्रातःकाल अन्यत्र जानेके लिये ऋषियोंसे विदा लेना
अनसूया तु धर्मज्ञा श्रुत्वा तां महतीं कथाम् ।
पर्यष्वजत बाहुभ्यां शिरस्याघ्राय मैथिलीम् ॥ १ ॥
धर्मको जाननेवाली अनसूयाने उस लंबी कथाको सुनकर मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे अङ्कमें भर लिया और उनका मस्तक सूँघकर कहा-व्यक्ताक्षरपदं चित्रं भाषितं मधुरं त्वया । यथा स्वयंवरं वृत्तं तत् सर्वं च श्रुतं मया ॥ २ ॥
' बेटी! तुमने सुस्पष्ट अक्षरवाले शब्दोंमें यह विचित्र एवं मधुर प्रसङ्ग सुनाया । तुम्हारा स्वयंवर जिस प्रकार हुआ था, वह सब मैंने सुन लिया ॥ २ ॥
रमेयं कथया ते तु दृढं मधुरभाषिणि ।
रविरस्तं गतः श्रीमानुपोह्य रजनीं शुभाम् ॥ ३ ॥
दिवसं परिकीर्णानामाहारार्थं पतत्रिणाम् ।
संध्याकाले निलीनानां निद्रार्थं श्रूयते ध्वनिः ॥ ४ ॥
' मधुरभाषिणी सीते! तुम्हारी इस कथामें मेरा मन बहुत लग रहा है; तथापि तेजस्वी सूर्यदेव रजनीकी शुभ वेलाको निकट पहुँचाकर अस्त हो गये । जो दिनमें चारा चुगनेके लिये चारों ओर छिटके हुए थे, वे पक्षी अब संध्याकालमें नींद लेनेके लिये अपने घोंसलोंमें आकर छिप गये हैं; उनकी यह ध्वनि सुनायी दे रही है ॥
एते चाप्यभिषेकार्द्रा मुनयः कलशोद्यताः ।
सहिता उपवर्तन्ते सलिलाप्लुतवल्कलाः ॥ ५ ॥
' ये जलसे भीगे हुए वल्कल धारण करनेवाले मुनि, जिनके शरीर स्नानके कारण आर्द्र दिखायी देते हैं, जलसे भरे कलश उठाये एक साथ आश्रमकी ओर लौट रहे हैं ॥ ५ ॥
अग्निहोत्रे च ऋषिणा हुते च विधिपूर्वकम् ।
कपोताङ्गारुणो धूमो दृश्यते पवनोद्धतः ॥ ६ ॥
' महर्षि ( अत्रि ) ने विधिपूर्वक अग्निहोत्र - सम्बन्धी होमकर्म सम्पन्न कर लिया है, अतः वायुके वेगसे ऊपरको उठा हुआ यह कबूतरके कण्ठकी भाँति श्यामवर्णका धूम दिखायी दे रहा है ॥ ६ ॥
अल्पवर्णा हि तरवो घनीभूताः समन्ततः ।
विप्रकृष्टेन्द्रिये देशे न प्रकाशन्ति वै दिशः ॥ ७ ॥
' अपनी इन्द्रियोंसे दूर देशमें चारों ओर जो वृक्ष दिखायी देते हैं, वे थोड़े पत्तेवाले होनेपर भी अन्धकारसे व्यास हो घनीभूत हो गये हैं; अतएव दिशाओंका भान नहीं हो रहा है ॥ ७ ॥
। रजनीचरसत्त्वानि प्रचरन्ति समन्ततः ।
तपोवनमृगा ह्येते वेदितीर्थेषु शेरते ॥ ८ ॥
' रातको विचरनेवाले प्राणी ( उल्लू आदि ) सब ओर विचरण कर रहे हैं तथा ये तपोवनके मृग पुण्यक्षेत्रस्वरूप आश्रमके वेदी आदि विभिन्न प्रदेशोंमें सो रहे हैं ॥ ८ ॥
सम्प्रवृत्ता निशा सीते नक्षत्रसमलंकृता ।
ज्योत्स्नाप्रावरणश्चन्द्रो दृश्यतेऽभ्युदितोऽम्बरे ॥ ९ ॥
' सीते! अब रात हो गयी, वह नक्षत्रोंसे सज गयी है । आकाशमें चन्द्रदेव चाँदनीकी चादर ओढ़े उदित दिखायी देते हैं ॥ ९ ॥
गम्यतामनुजानामि रामस्यानुचरी भव ।
कथयन्त्या हि मधुरं त्वयाहमपि तोषिता ॥ १० ॥
' अतः अब जाओ, मैं तुम्हें जानेकी आज्ञा देती हूँ । जाकर श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लग जाओ । तुमने अपनी मीठी - मीठी बातोंसे मुझे भी बहुत संतुष्ट किया है ॥ १० ॥
अलंकुरु च तावत् त्वं प्रत्यक्षं मम मैथिलि ।
प्रीतिं जनय मे वत्से दिव्यालंकारशोभिनी ॥ ११ ॥
' बेटी! मिथिलेशकुमारी! पहले मेरी आँखोंके सामने अपने - आपको अलंकृत करो । इन दिव्य वस्त्र और । आभूषणोंको धारण करके इनसे सुशोभित हो मुझे प्रसन्न करो ' ॥
पृष्ठ 564
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५५२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
सा तदा समलंकृत्य सीता सुरसुतोपमा ।
प्रणम्य शिरसा पादौ रामं त्वभिमुखी ययौ ॥ १२ ॥
यह सुनकर देवकन्याके समान सुन्दरी सीताने उस समय उन वस्त्राभूषणोंसे अपना शृङ्गार किया और अनसूयाके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर वे श्रीरामके सम्मुख गयीं ॥१२ ॥
तथा तु भूषितां सीतां ददर्श वदतां वरः ।
राघवः प्रीतिदानेन तपस्विन्या जहर्ष च ॥ १३ ॥
श्रीरामने जब इस प्रकार सीताको वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित देखा, तब तपस्विनी अनसूयाके उस प्रेमोपहारके दर्शनसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १३ ॥
न्यवेदयत् ततः सर्वं सीता रामाय मैथिली ।
प्रीतिदानं तपस्विन्या वसनाभरणस्त्रजाम् ॥ १४ ॥
उस समय मिथिलेशकुमारी सीताने तपस्विनी अनसूयाके हाथसे जिस प्रकार वस्त्र, आभूषण और हार आदिका प्रेमोपहार प्राप्त हुआ था, वह सब श्रीरामचन्द्रजीसे कह सुनाया ॥ १४ ॥
प्रहृष्टस्त्वभवद् रामो लक्ष्मणश्च महारथः ।
मैथिल्याः सत्क्रियां दृष्ट्वा मानुषेषु सुदुर्लभाम् ॥ १५ ॥
भगवान् श्रीराम और महारथी लक्ष्मण सीताका वह सत्कार, जो मनुष्योंके लिये सर्वथा दुर्लभ है, देखकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १५ ॥
ततः स शर्वरीं प्रीतः पुण्यां शशिनिभाननाम् ।
अर्चितस्तापसैः सर्वैरुवास रघुनन्दनः ॥ १६ ॥
तदनन्तर समस्त तपस्विजनोंसे सम्मानित हु रघुकुलनन्दन श्रीरामने अनसूयाके दिये हुए पवित्र अलंकार आदिसे अलंकृत चन्द्रमुखी सीताको देखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ रात्रिभर निवास किया ॥ १६ ॥
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामभिषिच्य हुताग्निकान् ।
आपृच्छेतां नरव्याघ्रौ तापसान् वनगोचरान् ॥ १७ ॥
वह रात बीतनेपर जब सभी वनवासी तपस्वी मुनि स्नान करके अग्निहोत्र कर चुके, तब पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणने उनसे जानेके लिये आज्ञा माँगी ॥ १७ ॥
तावूचुस्ते वनचरास्तापसा धर्मचारिणः ।
वनस्य तस्य संचारं राक्षसैः समभिप्लुतम् ॥ १८ ॥
रक्षांसि पुरुषादानि नानारूपाणि राघव ।
वसन्त्यस्मिन् महारण्ये व्यालाश्च रुधिराशनाः ॥ १ ९ ॥
तब वे धर्मपरायण वनवासी तपस्वी उन दोनों भाइयोंसे इस प्रकार बोले- ' रघुनन्दन! इस वनका मार्ग राक्षसोंसे आक्रान्त है — यहाँ उनका उपद्रव होता रहता है । इस विशाल वनमें नानारूपधारी नरभक्षी राक्षस तथा रक्तभोजी हिंसक पशु निवास करते हैं॥१८-१९ ॥
उच्छिष्टं वा प्रमत्तं वा तापसं ब्रह्मचारिणम् ।
अदन्त्यस्मिन् महारण्ये तान् निवारय राघव ॥ २० ॥
' राघवेन्द्र! जो तपस्वी और ब्रह्मचारी यहाँ अपवित्र अथवा असावधान अवस्थामें मिल जाता है, उसे वे राक्षस और हिंसक जन्तु इस महान् वनमें खा जाते हैं; अतः आप उन्हें रोकिये - यहाँसे मार भगाइये ॥२० ॥
एष पन्था महर्षीणां फलान्याहरतां वने ।
अनेन तु वनं दुर्गं गन्तुं राघव ते क्षमम् ॥ २१ ॥
' रघुकुलभूषण! यही वह मार्ग है, जिससे महर्षिलोग वनके भीतर फल- मूल लेनेके लिये जाते हैं । आपको भी इसी मार्गसे इस दुर्गम वनमें प्रवेश करना चाहिये ' ॥ २१ ॥
इतीरितः प्राञ्जलिभिस्तपस्विभि-र्द्विजैः कृतस्वस्त्ययनः परंतपः । वनं सभार्यः प्रविवेश राघवः सलक्ष्मणः सूर्य इवाभ्रमण्डलम् ॥ २२ ॥
तपस्वी ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर जब ऐसी बातें कहीं और उनकी मङ्गलयात्राके लिये स्वस्तिवाचन किया, तब शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान् श्रीरामने अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ उस वनमें प्रवेश किया, मानो सूर्यदेव मेघोंकी घटाके भीतर घुस | गये हों ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ ११ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११ ९ ॥ ॥ अयोध्याकाण्डं सम्पूर्णम् ॥ क ( )
पृष्ठ 565
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम् अरण्यकाण्डम् प्रथमः सर्गः श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका तापसोंके आश्रममण्डलमें सत्कार
प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान् ।
राम ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम् ॥ १ ॥
दण्डकारण्य नामक महान् वनमें प्रवेश करके मनको वशमें रखनेवाले दुर्जय वीर श्रीरामने तपस्वी मुनियोंके बहुत - से आश्रम देखे ॥१ ॥
कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्मया लक्ष्म्या समावृतम् ।
यथा प्रदीप्तं दुर्दर्श गगने सूर्यमण्डलम् ॥ २ ॥
वहाँ कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे । वह आश्रममण्डल ऋषियोंकी ब्रह्मविद्याके अभ्याससे प्रकट हुए विलक्षण तेजसे व्याप्त था, इसलिये आकाशमें प्रकाशित होनेवाले दुर्दर्श सूर्य - मण्डलकी भाँति वह भूतलपर उद्दीप्त हो रहा था । राक्षस आदिके लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था ॥ २ ॥
शरण्यं सर्वभूतानां सुसम्मृष्टाजिरं सदा ।
मृगैर्बहुभिराकीर्णं पक्षिसंघैः समावृतम् ॥ ३ ॥
वह आश्रमसमुदाय सभी प्राणियोंको शरण देनेवाला था । उसका आँगन सदा झाड़ने- बुहारनेसे स्वच्छ बना रहता था । वहाँ बहुत - से वन्य पशु भरे रहते थे और पक्षियोंके समुदाय भी उसे सब ओरसे घेरे रहते थे ।
पूजितं चोपनृत्तं च नित्यमप्सरसां गणैः ।
विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैरजिनैः कुशैः ॥ ४ ॥
समिद्धिस्तोयकलशैः फलमूलैश्च शोभितम् ।
आरण्यैश्च महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्वृतम् ॥ ५ ॥
वहाँका प्रदेश इतना मनोरम था कि वहाँ अप्सराएँ प्रतिदिन आकर नृत्य करती थीं । उस स्थानके प्रति उनके मनमें बड़े आदरका भाव था । बड़ी - बड़ी अग्निशालाएँ, स्रुवा आदि यज्ञपात्र, मृगचर्म, कुश, समिधा, जलपूर्ण कलश तथा फल - मूल उसकी शोभा बढ़ाते थे । स्वादिष्ट फल देनेवाले परम पवित्र तथा बड़े - बड़े वन्य वृक्षोंसे वह आश्रममण्डल घिरा हुआ था ॥ ४-५ ॥
बलिहोमार्चितं पुण्यं ब्रह्मघोषनिनादितम् ।
पुष्पैश्चान्यैः परिक्षिप्तं पद्मिन्या च सपद्मया ॥ ६ ॥
बलिवैश्वदेव और होमसे पूजित वह पवित्र आश्रमसमूह वेदमन्त्रोंके पाठकी ध्वनिसे गूँजता रहता था । कमलपुष्पोंसे सुशोभित पुष्करिणी उस स्थानकी शोभा बढ़ाती थी तथा वहाँ और भी बहुत - से फूल सब ओर बिखरे हुए फलमूलाशनैर्दान्तैश्चीरकृष्णाजिनाम्बरैः सूर्यवैश्वानराभैश्च पुराणैर्मुनिभिर्युतम् ॥ ७ ॥
उन आश्रमोंमें चीर और काला मृगचर्म धारण करनेवाले तथा फल - मूलका आहार करके रहनेवाले, जितेन्द्रिय एवं सूर्य और अग्निके तुल्य महातेजस्वी, पुरातन मुनि निवास करते थे ॥७ ॥
पुण्यैश्च नियताहारैः शोभितं परमर्षिभिः ।
तद् ब्रह्मभवनप्रख्यं ब्रह्मघोषनिनादितम् ॥ ८ ॥
नियमित आहार करनेवाले पवित्र महर्षियोंसे सुशोभित वह आश्रमसमूह ब्रह्माजीके धामकी भाँति तेजस्वी तथा वेदध्वनिसे निनादित था ॥ ८ ॥
ब्रह्मविद्धिर्महाभागैर्ब्राह्मणैरुपशोभितम् 1 तद् दृष्ट्वा राघवः श्रीमांस्तापसाश्रममण्डलम् ॥ ९ ॥
अभ्यगच्छन्महातेजा विज्यं कृत्वा महद् धनुः । अनेक महाभाग ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण उन आश्रमोंकी शोभा बढ़ाते थे । महातेजस्वी श्रीरामने उस आश्रममण्डलको देखकर अपने महान् धनुषकी प्रत्यञ्चा उतार दी, फिर वे आश्रमके भीतर गये॥९ ३ ॥ दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते रामं दृष्ट्वा महर्षयः ॥ १० ॥
अभिजग्मुस्तदा प्रीता वैदेहीं च यशस्विनीम् । श्रीराम तथा यशस्विनी सीताको देखकर वे दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न महर्षि बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके पास गये ॥ ते तु सोममिवोद्यन्तं दृष्ट्वा वै धर्मचारिणम् ॥ ११ ॥
लक्ष्मणं चैव दृष्ट्वा तु वैदेहीं च यशस्विनीम् ।
मङ्गलानि प्रयुञ्जानाः प्रत्यगृह्णन् दृढव्रताः ॥ १२ ॥
दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे | महर्षि उदयकालके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर, धर्मात्मा
पृष्ठ 566
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे श्रीरामको, लक्ष्मणको और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीताको भी देखकर उन सबके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद देने लगे । उन्होंने उन तीनोंको आदरणीय अतिथिके रूपमें ग्रहण किया ॥ ११-१२ ॥
रूपसंहननं लक्ष्मीं सौकुमार्यं सुवेषताम् ।
ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिनः ॥ १३ ॥
श्रीरामके रूप, शरीरकी गठन, कान्ति, सुकुमारता । तथा सुन्दर वेषको उन वनवासी मुनियोंने आश्चर्यचकित होकर देखा ॥१३ ॥
वैदेहीं लक्ष्मणं रामं नेत्रैरनिमिषैरिव ।
आश्चर्यभूतान् ददृशुः सर्वे ते वनवासिनः ॥ १४ ॥
वनमें निवास करनेवाले वे सभी मुनि श्रीराम, लक्ष्मण और सीता - तीनोंको एकटक नेत्रोंसे देखने लगे । उनका स्वरूप उन्हें आश्चर्यमय प्रतीत होता था ॥ १४ ॥
अनैनं हि महाभागाः सर्वभूतहिते रताः ।
अतिथिं पर्णशालायां राघवं संन्यवेशयन् ॥ १५ ॥
समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले उन महाभाग महर्षियोंने वहाँ अपने प्रिय अतिथि इन भगवान् श्रीरामको पर्णशालामें ले जाकर ठहराया ॥ १५ ॥
ततो रामस्य सत्कृत्य विधिना पावकोपमाः ।
आजह्रुस्ते महाभागाः सलिलं धर्मचारिणः ॥ १६ ॥
अग्नितुल्य तेजस्वी और धर्मपरायण उन महाभाग मुनियोंने श्रीरामको विधिवत् सत्कारके साथ जल समर्पित किया ॥ १६ ॥
मङ्गलानि प्रयुञ्जाना मुदा परमया युताः ।
मूलं पुष्पं फलं सर्वमाश्रमं च महात्मनः ॥ १७ ॥
फिर बड़ी प्रसन्नताके साथ मङ्गलसूचक आशीर्वाद देते हुए उन महात्मा श्रीरामको उन्होंने फल - मूल और फूल आदिके साथ सारा आश्रम भी समर्पित कर दिया ॥
निवेदयित्वा धर्मज्ञास्ते तु प्राञ्जलयोऽब्रुवन् ।
धर्मपालो जनस्यास्य शरण्यश्च महायशाः ॥ १८ ॥
पूजनीयश्च मान्यश्च राजा दण्डधरो गुरुः ।
इन्द्रस्यैव चतुर्भागः प्रजा रक्षति राघव ॥ १ ९ ॥
राजा तस्माद् वरान् भोगान् रम्यान् भुङ्क्ते नमस्कृतः । सब कुछ निवेदन करके वे धर्मज्ञ मुनि हाथ जोड़कर बोले- ' रघुनन्दन! दण्ड धारण करनेवाला राजा धर्मका पालक, महायशस्वी, इस जन - समुदायको शरण देनेवाला माननीय, पूजनीय और सबका गुरु है । इस भूतलपर इन्द्र ( आदि लोकपालों ) का ही चौथा अंश होनेके कारण वह प्रजाकी रक्षा करता है, अत: राजा सबसे वन्दित होता तथा उत्तम एवं रमणीय भोगोंका उपभोग करता है । ( जब साधारण राजाकी यह स्थिति है, तब आपके लिये तो क्या कहना है । आप तो साक्षात् भगवान् हैं ) ॥ १८-१९ ॥
ते वयं भवता रक्ष्या भवद्विषयवासिनः ।
नगरस्थो वनस्थो वा त्वं नो राजा जनेश्वरः ॥ २० ॥
' हम आपके राज्यमें निवास करते हैं, अतः आपको हमारी रक्षा करनी चाहिये । आप नगरमें रहें या वनमें, हमलोगोंके राजा ही हैं । आप समस्त जनसमुदायके शासक एवं पालक हैं ॥ २० ॥
न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ।
रक्षणीयास्त्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधनाः ॥ २१ ॥
' राजन्! हमने जीवमात्रको दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लिया है । अब तपस्या ही हमारा धन है । जैसे माता गर्भस्थ बालककी रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरहसे हमारी रक्षा करनी चाहिये ' ॥ २१ ॥
एवमुक्त्वा फलैर्मूलैः पुष्पैरन्यैश्च राघवम् ।
वन्यैश्च विविधाहारैः सलक्ष्मणमपूजयन् ॥ २२ ॥
ऐसा कहकर उन तपस्वी मुनियोंने वनमें उत्पन्न होनेवाले फल, मूल, फूल तथा अन्य अनेक प्रकारके आहारोंसे लक्ष्मण ( और सीता ) सहित भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका सत्कार किया ॥ २२ ॥
तथान्ये तापसाः सिद्धा रामं वैश्वानरोपमाः ।
न्यायवृत्ता यथान्यायं तर्पयामासुरीश्वरम् ॥ २३ ॥
इनके सिवा दूसरे अग्नितुल्य तेजस्वी तथा न्याययुक्त बर्ताववाले सिद्ध तापसोंने भी सर्वेश्वर भगवान् श्रीरामको । यथोचित रूपसे तृप्त किया ॥ २३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ॥
पृष्ठ 567
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे द्वितीयः सर्गः ५५५ द्वितीयः सर्गः वनके भीतर श्रीराम, लक्ष्मण और सीतापर विराधका आक्रमण
कृतातिथ्योऽथ रामस्तु सूर्यस्योदयनं प्रति ।
आमन्त्र्य स मुनीन् सर्वान् वनमेवान्वगाहत ॥ १ ॥
रात्रिमें उन महर्षियोंका आतिथ्य ग्रहण करके सबेरे सूर्योदय होनेपर समस्त मुनियोंसे विदा ले श्रीरामचन्द्रजी पुनः वनमें ही आगे बढ़ने लगे ॥१ ॥
नानामृगगणाकीर्णमृक्षशार्दूलसेवितम् 1 ध्वस्तवृक्षलतागुल्मं दुर्दर्शसलिलाशयम् ॥ २ ॥
निष्कूजमानशकुनिं झिल्लिकागणनादितम् ।
लक्ष्मणानुचरो रामो वनमध्यं ददर्श ह ॥ ३ ॥
जाते - जाते लक्ष्मणसहित श्रीरामने वनके मध्यभागमें एक ऐसे स्थानको देखा, जो नाना प्रकारके मृगोंसे व्याप्त था । वहाँ बहुत - से रीछ और बाघ रहा करते थे । वहाँके वृक्ष, लता और झाड़ियाँ नष्ट - भ्रष्ट हो गयी थीं । उस वनप्रान्तमें किसी जलाशयका दर्शन होना कठिन था । वहाँके पक्षी वहीं चहक रहे थे । झींगुरोंकी झंकार गूँज रही थी ॥ २-३ ॥
सीतया सह काकुत्स्थस्तस्मिन् घोरमृगायुते ।
ददर्श गिरिशृङ्गाभं पुरुषादं महास्वनम् ॥ ४ ॥
भयंकर जंगली पशुओंसे भरे हुए उस दुर्गम वनमें सीताके साथ श्रीरामचन्द्रजीने एक नरभक्षी राक्षस देखा, जो पर्वतशिखरके समान ऊँचा था और उच्चस्वरसे गर्जना कर रहा था ॥ ४ ॥
गभीराक्षं महावक्त्रं विकटं विकटोदरम् ।
बीभत्सं विषमं दीर्घं विकृतं घोरदर्शनम् ॥ ५ ॥
उसकी आँखें गहरी, मुँह बहुत बड़ा, आकार विकट, और पेट विकराल था । वह देखनेमें बड़ा भयंकर, घृणित, बेडौल, बहुत बड़ा और विकृत वेशसे युक्त था ॥ ५ ॥
वसानं चर्म वैयाघ्रं वसार्द्रं रुधिरोक्षितम् ।
त्रासनं सर्वभूतानां व्यादितास्यमिवान्तकम् ॥ ६ ॥
उसने खूनसे भीगा और चरबीसे गीला व्याघ्रचर्म पहन रखा था । समस्त प्राणियोंको त्रास पहुँचानेवाला वह राक्षस यमराजके समान मुँह बाये खड़ा था ॥६ ॥
त्रीन् सिंहांश्चतुरो व्याघ्रान् द्वौ वृकौ पृषतान् दश ।
सविषाणं वसादिग्धं गजस्य च शिरो महत् ॥ ७ ॥
अवसज्यायसे शूले विनदन्तं महास्वनम् । वह एक लोहेके शूलमें तीन सिंह, चार बाघ, दो भेड़िये, दस चितकबरे हरिण और दाँतोंसहति एक बहुत बड़ा हाथीका मस्तक, जिसमें चर्बी लिपटी हुई थी, गाँथकर जोर - जोरसे दहाड़ रहा था ॥ ७३ ॥
स रामं लक्ष्मणं चैव सीतां दृष्ट्वा च मैथिलीम् ।
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धः प्रजाः काल इवान्तकः ॥ ८ ॥
स कृत्वा भैरवं नादं चालयन्निव मेदिनीम् ॥ ९ ॥
श्रीराम, लक्ष्मण और मिथिलेशकुमारी सीताको देखते ही वह क्रोधमें भरकर भैरवनाद करके पृथ्वीको कम्पित करता हुआ उन सबकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे प्राणान्तकारी काल प्रजाकी ओर अग्रसर होता है ॥
अङ्केनादाय वैदेहीमपक्रम्य तदाब्रवीत् ।
युवां जटाचीरधरौ सभार्यौ क्षीणजीवितौ ॥ १० ॥
प्रविष्टौ दण्डकारण्यं शरचापासिपाणिनौ । वह विदेहनन्दिनी सीताको गोदमें ले कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया । फिर उन दोनों भाइयोंसे बोला-' तुम दोनों जटा और चीर धारण करके भी स्त्रीके साथ रहते हो और हाथमें धनुष - बाण और तलवार लिये दण्डकवनमें घुस आये हो; अतः जान पड़ता है, तुम्हारा जीवन क्षीण हो चला है ॥ १०३ ॥
कथं तापसयोर्वां च वासः प्रमदया सह ॥ ११ ॥
अधर्मचारिणौ पापौ कौ युवां मुनिदूषकौ । ' तुम दोनों तो तपस्वी जान पड़ते हो, फिर तुम्हारा युवती स्त्रीके साथ रहना कैसे सम्भव हुआ? अधर्मपरायण, पापी तथा मुनिसमुदायको कलङ्कित करनेवाले तुम दोनों कौन हो? ॥ ११३ ॥
अहं वनमिदं दुर्गं विराधो नाम राक्षसः ॥ १२ ॥
चरामि सायुधो नित्यमृषिमांसानि भक्षयन् । ' मैं विराध नामक राक्षस हूँ और प्रतिदिन ऋषियोंके मांसका भक्षण करता हुआ हाथमें अस्त्र - शस्त्र लिये इस दुर्गम वनमें विचरता रहता हूँ ॥ १२३ ॥
इयं नारी वरारोहा मम भार्या भविष्यति ॥ १३ ॥
युवयोः पापयोश्चाहं पास्यामि रुधिरं मृधे । ' यह स्त्री बड़ी सुन्दरी है, अतः मेरी भार्या बनेगी और तुम दोनों पापियोंका मैं युद्धस्थलमें रक्त पान करूँगा ' ॥ तस्यैवं ब्रुवतो दुष्टं विराधस्य दुरात्मनः ॥ १४ ॥
श्रुत्वा सगर्वितं वाक्यं सम्भ्रान्ता जनकात्मजा ।
। सीता प्रवेपितोद्वेगात् प्रवाते कदली यथा ॥ १५ ॥
पृष्ठ 568
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५५६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दुरात्मा विराधकी ये दुष्टता और घमंडसे भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलनेपर केलेका वृक्ष जोर - जोरसे हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेगके कारण थरथर काँपने लगीं ॥ १५ ॥
तां दृष्ट्वा राघवः सीतां विराधाङ्कगतां शुभाम् ।
अब्रवील्लक्ष्मणं वाक्यं मुखेन परिशुष्यता ॥ १६ ॥
शुभलक्षणा सीताको सहसा विराधके चंगुलमें फँसी देख श्रीरामचन्द्रजी सूखते हुए मुँहसे लक्ष्मणको सम्बोधित करके बोले - ॥ १६ ॥
पश्य सौम्य नरेन्द्रस्य जनकस्यात्मसम्भवाम् ।
मम भार्यां शुभाचारां विराधाङ्के प्रवेशिताम् ॥ १७ ॥
' सौम्य! देखो तो सही, महाराज जनककी पुत्री और मेरी सती - साध्वी पत्नी सीता विराधके अङ्कमें विवशतापूर्वक जा पहुँची हैं ॥ १७ ॥
अत्यन्तसुखसंवृद्धां राजपुत्रीं यशस्विनीम् ।
यदभिप्रेतमस्मासु प्रियं वरवृतं च यत् ॥ १८ ॥
कैकेय्यास्तु सुसंवृत्तं क्षिप्रमद्यैव लक्ष्मण ।
या न तुष्यति राज्येन पुत्रार्थे दीर्घदर्शिनी ॥ १ ९ ॥
' अत्यन्त सुखमें पली हुई यशस्विनी राजकुमारी सीताकी यह अवस्था! ( हाय! कितने कष्टकी बात है! ) लक्ष्मण! वनमें हमारे लिये जिस दुःखकी प्राप्ति कैकेयीको अभीष्ट थी और जो कुछ उसे प्रिय था, जिसके लिये उसने वर माँगे थे, वह सब आज ही शीघ्रतापूर्वक सिद्ध हो गया । तभी तो वह दूरदर्शिनी
कैकेयी अपने पुत्रके लिये केवल राज्य लेकर नहीं ।
संतुष्ट हुई थी ॥ १८-१९ ॥
ययाहं सर्वभूतानां प्रियः प्रस्थापितो वनम् ।
अद्येदानीं सकामा सा या माता मध्यमा मम ॥ २० ॥
' जिसने समस्त प्राणियोंके लिये प्रिय होनेपर भी मुझे वनमें भेज दिया, वह मेरी मझली माता कैकेयी आज इस समय सफलमनोरथ हुई है ॥ २० ॥
परस्पर्शात् तु वैदेह्या न दुःखतरमस्ति मे ।
पितुर्विनाशात् सौमित्रे स्वराज्य हरणात् तथा ॥ २१ ॥
‘ विदेहनन्दिनीका दूसरा कोई स्पर्श कर ले, इससे बढ़कर दुःखकी बात मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है । सुमित्रानन्दन! पिताजीकी मृत्यु तथा अपने राज्यके अपहरणसे भी उतना कष्ट मुझे नहीं हुआ था, जितना अब हुआ है'॥२१ ॥
इति ब्रुवति काकुत्स्थे बाष्पशोकपरिप्लुतः ।
अब्रवील्लक्ष्मणः क्रुद्धो रुद्धो नाग इव श्वसन् ॥ २२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर शोकके आँसू बहाते हुए लक्ष्मण कुपित हो मन्त्रसे अवरुद्ध हुए सर्पकी भाँति फुफकारते हुए बोले— ॥२२ ॥
अनाथ इव भूतानां नाथस्त्वं वासवोपमः ।
मया प्रेष्येण काकुत्स्थ किमर्थं परितप्यसे ॥ २३ ॥
' ककुत्स्थकुलभूषण! आप इन्द्रके समान समस्त प्राणियोंके स्वामी एवं संरक्षक हैं । मुझ दासके रहते हुए आप किसलिये अनाथकी भाँति संतप्त हो रहे हैं? ॥
शरेण निहतस्याद्य मया क्रुद्धेन रक्षसः ।
विराधस्य गतासोर्हि मही पास्यति शोणितम् ॥ २४ ॥
' मैं अभी कुपित होकर अपने बाणसे इस राक्षसका वध करता हूँ । आज यह पृथ्वी मेरे द्वारा मारे गये प्राणशून्य विराधका रक्त पीयेगी ॥ २४ ॥
राज्यकामे मम क्रोधो भरते यो बभूव ह ।
तं विराधे विमोक्ष्यामि वज्री वज्रमिवाचले ॥ २५ ॥
' राज्यकी इच्छा रखनेवाले भरतपर मेरा जो क्रोध प्रकट हुआ था, उसे आज मैं विराधपर छोडूंगा । जैसे वज्रधारी इन्द्र पर्वतपर अपना वज्र छोड़ते हैं ॥ २५ ॥
मम भुजबलवेगवेगितः पततु शरोऽस्य महान् महोरसि । व्यपनयतु तनोश्च जीवितं पततु ततश्च महीं विघूर्णितः ॥ २६ ॥
' मेरी भुजाओंके बलके वेगसे वेगवान् होकर छूटा हुआ मेरा महान् बाण आज विराधके विशाल वक्षःस्थलपर गिरे । इसके शरीरसे प्राणोंको अलग करे । तत्पश्चात् यह विराध चक्कर खाता हुआ पृथ्वीपर पड़ | जाय ' ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ॥
पृष्ठ 569
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अरण्यकाण्डे तृतीयः सर्गः ५५७ तृतीयः सर्गः विराध और श्रीरामकी बातचीत, श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा विराधपर प्रहार तथा विराधका इन दोनों भाइयोंको साथ लेकर दूसरे वनमें जाना
अथोवाच पुनर्वाक्यं विराधः पूरयन् वनम् ।
पृच्छतो मम हि ब्रूतं कौ युवां क्व गमिष्यथः ॥ १ ॥
तदनन्तर विराधने उस वनको गुँजाते हुए कहा — ' अरे! मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ । तुम दोनों कौन हो और कहाँ जाओगे? ' ॥ १ ॥
तमुवाच ततो रामो राक्षसं ज्वलिताननम् ।
पृच्छन्तं सुमहातेजा इक्ष्वाकुकुलमात्मनः ॥ २ ॥
क्षत्रियौ वृत्तसम्पन्नौ विद्धि नौ वनगोचरौ ।
त्वां तु वेदितुमिच्छावः कस्त्वं चरसि दण्डकान् ॥ ३ ॥
तब महातेजस्वी श्रीरामने अपना परिचय पूछते हुए प्रज्वलित मुखवाले उस राक्षससे इस प्रकार कहा — ' तुझे मालूम होना चाहिये कि महाराज इक्ष्वाकुका कुल ही मेरा कुल है । हम दोनों भाई सदाचारका पालन करनेवाले क्षत्रिय हैं और कारणवश इस समय वनमें निवास करते हैं । अब हम तेरा परिचय जानना चाहते हैं । तू कौन है, जो दण्डकवनमें स्वेच्छासे विचर रहा है? ' ॥ २-३ ॥
तमुवाच विराधस्तु रामं सत्यपराक्रमम् ।
हन्त वक्ष्यामि ते राजन् निबोध मम राघव ॥ ४ ॥
यह सुनकर विराधने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा— ' रघुवंशी नरेश! मैं प्रसन्नतापूर्वक हूँ । तुम मेरे विषयमें सुनो ॥ ४ ॥
पुत्रः किल जवस्याहं माता विराध इति मामाहुः पृथिव्यां ' मैं ' जव ' नामक राक्षसका नाम ' शतह्रदा ' है । भूमण्डलके विराधके नामसे पुकारते हैं ॥ ५ ॥
तपसा चाभिसम्प्राप्ता ब्रह्मणो अपना परिचय देता
मम शतह्रदा ।
सर्वराक्षसाः ॥ ५ ॥
पुत्र हूँ, मेरी माताका समस्त राक्षस मुझे
हि प्रसादजा ।
शस्त्रेणावध्यता लोकेऽच्छेद्याभेद्यत्वमेव च ॥ ६ ॥
' मैंने तपस्याके द्वारा ब्रह्माजीको प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त किया है कि किसी भी शस्त्रसे मेरा वध न हो । मैं संसारमें अच्छेद्य और अभेद्य होकर रहूँ - कोई भी मेरे शरीरको छिन्न - भिन्न नहीं कर सके ॥ ६ ॥
उत्सृज्य प्रमदामेनामनपेक्षौ यथागतम् ।
त्वरमाणौ पलायेथां न वां जीवितमाददे ॥ ७ ॥
' अब तुम दोनों इस युवती स्त्रीको यहीं छोड़कर इसे पानेकी इच्छा न रखते हुए जैसे आये हो उसी प्रकार तुरंत यहाँसे भाग जाओ । मैं तुम दोनोंके प्राण नहीं लूँगा ' ॥ ७ ॥
तं रामः प्रत्युवाचेदं कोपसंरक्तलोचनः ।
राक्षसं विकृताकारं विराधं पापचेतसम् ॥ ८ ॥
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं । वे पापपूर्ण विचार और विकट आकारवाले उस पापी राक्षस विराधसे इस प्रकार बोले - ॥ ८ ॥
क्षुद्र धिक् त्वां तु हीनार्थं मृत्युमन्वेषसे ध्रुवम् ।
रणे प्राप्स्यसि संतिष्ठ न मे जीवन् विमोक्ष्यसे॥९ ॥
' नीच! तुझे धिक्कार है । तेरा अभिप्राय बड़ा ही खोटा है । निश्चय ही तू अपनी मौत ढूँढ़ रहा है और वह तुझे युद्धमें मिलेगी । ठहर, अब तू मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा ' ॥९ ॥
ततः सज्यं धनुः कृत्वा रामः सुनिशितान् शरान् ।
सुशीघ्रमभिसंधाय राक्षसं निजघान ह ॥१० ॥
यह कहकर भगवान् श्रीरामने अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और तुरंत ही तीखे बाणोंका अनुसंधान करके उस राक्षसको बींधना आरम्भ किया ॥१० ॥
धनुषा ज्यागुणवता सप्त बाणान् मुमोच ह ।
रुक्मपुङ्खान् महावेगान् सुपर्णानिलतुल्यगान् ॥ ११ ॥
उन्होंने प्रत्यञ्चायुक्त धनुषके द्वारा विराधके ऊपर लगातार सात बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायुके समान महान् वेगशाली थे और सोनेके पंखोंसे सुशोभित हो रहे थे ॥ ११ ॥
ते शरीरं विराधस्य भित्त्वा बर्हिणवाससः ।
निपेतुः शोणितादिग्धा धरण्यां पावकोपमाः ॥ १२ ॥
प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी और मोरपंख लगे हुए वे बाण विराधके शरीरको छेदकर रक्तरञ्जित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२ ॥
स विद्धो न्यस्य वैदेहीं शूलमुद्यम्य राक्षसः ।
अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धस्तदा रामं सलक्ष्मणम् ॥ १३ ॥
घायल हो जानेपर उस राक्षसने विदेहकुमारी सीताको अलग रख दिया और स्वयं हाथमें शूल लिये अत्यन्त कुपित होकर श्रीराम तथा लक्ष्मणपर तत्काल | टूट पड़ा ॥ १३ ॥
पृष्ठ 570
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
स विनद्य महानादं शूलं शक्रध्वजोपमम् ।
प्रगृह्याशोभत तदा व्यात्तानन इवान्तकः ॥ १४ ॥
वह बड़े जोरसे गर्जना करके इन्द्रध्वजके समान शूल लेकर उस समय मुँह बाये हुए कालके समान शोभा पा रहा था ॥ १४ ॥
अथ तौ भ्रातरौ दीप्तं शरवर्षं ववर्षतुः ।
विराधे राक्षसे तस्मिन् कालान्तकयमोपमे ॥ १५ ॥
तब काल, अन्तक और यमराजके समान उस भयंकर राक्षस विराधके ऊपर उन दोनों भाइयोंने प्रज्वलित बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १५ ॥
स प्रहस्य महारौद्रः स्थित्वाजृम्भत राक्षसः ।
जृम्भमाणस्य ते बाणाः कायान्निष्पेतुराशुगाः ॥ १६ ॥
' यह देख वह महाभयंकर राक्षस अट्टहास करके खड़ा हो गया और जँभाईके साथ अँगड़ाई लेने लगा । उसके वैसा करते ही शीघ्रगामी बाण उसके शरीरसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १६ ॥
स्पर्शात् तु वरदानेन प्राणान् संरोध्य राक्षसः ।
विराधः शूलमुद्यम्य राघवावभ्यधावत ॥१७ ॥
वरदानके सम्बन्धसे उस राक्षस विराधने प्राणोंको रोक लिया और शूल उठाकर उन दोनों रघुवंशी वीरोंपर आक्रमण किया ॥ १७ ॥
तच्छूलं वज्रसंकाशं गगने ज्वलनोपमम् ।
द्वाभ्यां शराभ्यां चिच्छेद रामः शस्त्रभृतां वरः ॥ १८ ॥
उसका वह शूल आकाशमें वज्र और अग्नि समान प्रज्वलित हो उठा; परंतु शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने दो बाण मारकर उसे काट डाला ॥ १८ ॥
तद् रामविशिखैश्छिन्नं शूलं तस्यापतद् भुवि ।
पपाताशनिना छिन्नं मेरोरिव शिलातलम् ॥ १ ९ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे कटा हुआ विराधका वह शूल वज्रसे छिन्न - भिन्न हुए मेरुके शिलाखण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १ ९ ॥
तौ खड्गौ क्षिप्रमुद्यम्य कृष्णसर्पाविवोद्यतौ ।
तूर्णमापेततुस्तस्य तदा प्रहरतां बलात् ॥ २० ॥
फिर तो वे दोनों भाई शीघ्र ही काले सर्पोंके समान दो तलवारें लेकर तुरंत उसपर टूट पड़े और तत्काल बलपूर्वक प्रहार करने लगे ॥ २० ॥
स वध्यमानः सुभृशं भुजाभ्यां परिगृह्य तौ ।
अप्रकम्प्यौ नरव्याघ्रौ रौद्रः प्रस्थातुमैच्छत ॥ २१ ॥
उनके आघातसे अत्यन्त घायल हुए उस भयंकर राक्षसने अपनी दोनों भुजाओंसे उन अकम्प्य पुरुषसिंह वीरोंको पकड़कर अन्यत्र जानेकी इच्छा की ॥ २१ ॥
तस्याभिप्रायमाज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
वहत्वयमलं तावत् पथानेन तु राक्षसः ॥ २२ ॥
यथा चेच्छति सौमित्रे तथा वहतु राक्षसः ।
अयमेव हि नः पन्था येन याति निशाचरः ॥ २३ ॥
उसके अभिप्रायको जानकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा — ' सुमित्रानन्दन! यह राक्षस अपनी इच्छाके अनुसार हम लोगोंको इस मार्गसे ढोकर ले चले । यह जैसा चाहता है, उसी तरह हमारा वाहन बनकर हमें ले चले ( इसमें बाधा डालनेकी आवश्यकता नहीं है ) । जिस मार्गसे यह निशाचर चल रहा है, यही हमलोगोंके लिये आगे जानेका मार्ग है ' ॥ २२-२३ ॥
स तु स्वबलवीर्येण समुत्क्षिप्य निशाचरः ।
बालाविव स्कन्धगतौ चकारातिबलोद्धतः ॥ २४ ॥
अत्यन्त बलसे उद्दण्ड बने हुए निशाचर विराधने अपने बल - पराक्रमसे उन दोनों भाइयोंको बालकोंकी तरह उठाकर अपने दोनों कंधोंपर बिठा लिया ॥ २४ ॥
तावारोप्य ततः स्कन्धं राघवौ रजनीचरः ।
विराधो विनदन् घोरं जगामाभिमुखो वनम् ॥ २५ ॥
उन दोनों रघुवंशी वीरोंको कंधेपर चढ़ा लेनेके बाद राक्षस विराध भयंकर गर्जना करता हुआ वनकी ओर चल दिया ॥ २५ ॥
वनं महामेघनिभं प्रविष्टो द्रुमैर्महद्भिर्विविधैरुपेतम् नानाविधैः पक्षिकुलैर्विचित्रं शिवायुतं व्यालमृगैर्विकीर्णम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर उसने एक ऐसे वनमें प्रवेश किया, जो महान् मेघोंकी घटाके समान घना और नीला था । नाना प्रकारके बड़े - बड़े वृक्ष वहाँ भरे हुए थे । भाँति - भाँतिके पक्षियोंके समुदाय उसे विचित्र शोभासे सम्पन्न बना रहे थे तथा बहुत - से गीदड़ और हिंसक पशु उसमें सब ओर फैले हुए थे ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ॥