वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 691–700
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700
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अरण्यकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ६७ ९
क्रोशन्तीं राम रामेति रामेण रहितां वने ।
जीवितान्ताय केशेषु जग्राहान्तकसंनिभः ॥ ८ ॥
प्रधर्षितायां वैदेह्यां बभूव सचराचरम् ।
जगत् सर्वममर्यादं तमसान्धेन संवृतम् ॥ ९ ॥
वनमें श्रीरामसे रहित होकर सीताको राम - रामकी रट लगाती देख उस कालके समान विकराल राक्षसने अपने ही विनाशके लिये उनके केश पकड़ लिये । सीताका इस प्रकार तिरस्कार होनेपर समस्त चराचर जगत् मर्यादारहित तथा अन्धकारसे आच्छन्न - सा हो गया ॥
न वाति मारुतस्तत्र निष्प्रभोऽभूद् दिवाकरः ।
दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां देवो दिव्येन चक्षुषा ॥ १० ॥ ।
कृतं कार्यमिति श्रीमान् व्याजहार पितामहः । वहाँ वायुकी गति रुक गयी और सूर्यकी भी प्रभा फीकी पड़ गयी । श्रीमान् पितामह ब्रह्माजी दिव्य दृष्टिसे विदेहनन्दिनीका वह राक्षसके द्वारा केशाकर्षणरूप अपमान देखकर बोले- ' बस अब कार्य सिद्ध हो गया ' ॥ १०३ ॥
प्रहृष्टा व्यथिताश्चासन् सर्वे ते परमर्षयः ॥ ११ ॥
दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां दण्डकारण्यवासिनः ।
रावणस्य विनाशं च प्राप्तं बुद्ध्वा यदृच्छया ॥ १२ ॥
सीताके केशोंका खींचा जाना देखकर दण्डकारण्य में निवास करनेवाले वे सब महर्षि मन - ही - मन व्यथित हो उठे । साथ ही अकस्मात् रावणका विनाश निकट आया जान उनको बड़ा हर्ष हुआ ॥ ११-१२ ॥
स तु तां राम रामेति रुदतीं लक्ष्मणेति च ।
जगामादाय चाकाशं रावणो राक्षसेश्वरः ॥ १३ ॥
बेचारी सीता ' हा राम! हा राम ' कहकर रो रही थीं । लक्ष्मणको भी पुकार रही थीं । उसी अवस्थामें राक्षसोंका राजा रावण उन्हें लेकर आकाशमार्गसे चल दिया ॥ १३ ॥
तप्ताभरणवर्णाङ्गी पीतकौशेयवासिनी ।
रराज राजपुत्री तु विद्युत्सौदामनी यथा ॥ १४ ॥
तपाये हुए सोनेके आभूषणोंसे उनका सारा अङ्ग विभूषित था । वे पीले रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए थीं । अतः उस समय राजकुमारी सीता सुदाम पर्वतसे प्रकट हुई विद्युत्के समान प्रकाशित हो रही थीं ॥ १४ ॥
उद्धूतेन च वस्त्रेण तस्याः पीतेन रावणः ।
परिबभ्राज गिरिर्दीप्त इवाग्निना ॥ १५ ॥
तस्याः परमकल्याण्यास्ताम्राणि सुरभीणि च ।
पद्मपत्राणि वैदेह्या अभ्यकीर्यन्त रावणम् ॥ १६ ॥
उन परम कल्याणी विदेहकुमारीके अङ्गोंमें जो कमलपुष्प थे, उनके किंचित् अरुण और सुगन्धित दल बिखर - बिखरकर रावणपर गिरने लगे ॥ १६ ॥
तस्याः कौशेयमुद्धूतमाकाशे कनकप्रभम् ।
बभौ चादित्यरागेण ताम्रमभ्रमिवातपे ॥ १७ ॥
आकाशमें उड़ता हुआ उनका सुवर्णके समान कान्तिमान् रेशमी पीताम्बर संध्याकालमें सूर्य किरणोंसे रँगे हुए ताम्रवर्णके मेघखण्डकी भाँति शोभा पाता था ॥ १७ ॥
तस्यास्तद् विमलं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम् ।
न रराज विना रामं विनालमिव पङ्कजम् ॥१८ ॥
आकाशमें रावणके अङ्कमें स्थित सीताका निर्मल मुख श्रीरामके बिना नालरहित कमलकी भाँति शोभित नहीं होता था ॥ १८ ॥
बभूव जलदं नीलं भित्त्वा चन्द्र इवोदितः ।
सुललाटं सुकेशान्तं पद्मगर्भाभमव्रणम् ॥ १ ९ ॥
शुक्लैः सुविमलैर्दन्तैः प्रभावद्भिरलंकृतम् ।
तस्याः सुनयनं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम् ॥ २० ॥
सुन्दर ललाट और मनोहर केशोंसे युक्त कमलके भीतरी भागके समान कान्तिमान्, चेचक आदिके दागसे रहित, श्वेत, निर्मल और दीतिमान् दाँतोंसे अलंकृत तथा सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित सीताका मुख आकाशमें रावणके अङ्कमें ऐसा जान पड़ता था मानो मेघोंकी काली घटाका भेदन करके चन्द्रमा उदित हुआ हो ॥
रुदितं व्यपमृष्टास्त्रं चन्द्रवत् प्रियदर्शनम् ।
सुनासं चारुताम्रोष्ठमाकाशे हाटकप्रभम् ॥ २१ ॥
राक्षसेन्द्रसमाधूतं तस्यास्तद् वदनं शुभम् ।
शुशुभे न विना रामं दिवा चन्द्र इवोदितः ॥ २२ ॥
चन्द्रमाके समान प्यारा दिखायी देनेवाला सीताका वह सुन्दर मुख तुरंतका रोया हुआ था । उसके आँसू पोंछ दिये गये थे । उसकी सुघड़ नासिका तथा ताँबे-जैसे लाल - लाल मनोहर ओठ थे । आकाशमें वह अपनी सुनहरी प्रभा बिखेर रहा था तथा राक्षसराजके वेगपूर्वक चलनेसे उसमें कम्पन हो रहा था । इस प्रकार वह मनोहर मुख भी श्रीरामके बिना उस समय दिनमें अधिकं उनके फहराते हुए पीले वस्त्रसे उपलक्षित रावण उगे हुए चन्द्रमाके समान शोभाहीन प्रतीत होता था ॥ दावानलसे उद्भासित होनेवाले पर्वतके समान अधिक सा हेमवर्णा नीलाङ्गं मैथिली राक्षसाधिपम् । शुशुभे काञ्चनी काञ्ची नीलं गजमिवाश्रिता ॥ २३ ॥
शोभा पाने लगा ॥ १५ ॥
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६८० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मिथिलेशकुमारी सीताका श्रीअङ्ग सुवर्णके समान । दीप्तिमान् था और राक्षसराज रावणका शरीर बिलकुल काला था । उसकी गोदमें वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो काले हाथीको सोनेकी करधनी पहना दी गयी हो ॥ २३ ॥
सा पद्मपीता हेमाभा रावणं जनकात्मजा ।
विद्युद् घनमिवाविश्य शुशुभे तप्तभूषणा ॥ २४ ॥
कमलके केसरकी भाँति पीली एवं सुनहरी कान्तिवाली जनककुमारी सीता तपे हुए सोनेके आभूषण धारण किये रावणकी पीठपर वैसी ही शोभा पा रही थीं, जैसे मेघमालाका आश्रय लेकर बिजली चमक रही हो ॥२४ ॥
तस्या भूषणघोषेण वैदेह्या राक्षसेश्वरः ।
बभूव विमलो नीलः सघोष इव तोयदः ॥ २५ ॥
विदेहनन्दिनीके आभूषणोंकी झनकारसे राक्षसराज रावण गर्जना करते हुए निर्मल नील मेघके समान प्रतीत होता था ॥ २५ ॥
उत्तमाङ्गच्युता तस्याः पुष्पवृष्टिः समन्ततः ।
सीताया ह्रियमाणायाः पपात धरणीतले ॥ २६ ॥
हरकर ले जायी जाती हुई सीताके सिरसे उनके केशोंमें गुँथे हुए फूल बिखरकर सब ओर पृथ्वीपर गिर रहे थे ॥ २६ ॥
सा तु रावणवेगेन पुष्पवृष्टिः समन्ततः ।
समाधूता दशग्रीवं पुनरेवाभ्यवर्तत ॥ २७ ॥
चारों ओर होनेवाली वह फूलोंकी वर्षा रावणके वेगसे उठी हुई वायुके द्वारा प्रेरित हो फिर उस दशाननपर ही आकर पड़ती थी ॥ २७ ॥
अभ्यवर्तत पुष्पाणां धारा वैश्रवणानुजम् ।
नक्षत्रमाला विमला मेरुं नगमिवोन्नतम् ॥ २८ ॥
कुबेरके छोटे भाई रावणके ऊपर जब वह फूलोंकी धारा गिरती थी, उस समय ऊँचे मेरुपर्वतपर उतरनेवाली निर्मल नक्षत्रमालाकी भाँति शोभा पाती थी ॥ २८ ॥
चरणान्नूपुरं भ्रष्टं वैदेह्या रत्नभूषितम् ।
विद्युन्मण्डलसंकाशं पपात धरणीतले ॥ २ ९ ॥
विदेहनन्दिनीका रत्नजटित नूपुर उनके एक चरणसे खिसककर विद्युन्मण्डलके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २ ९ ॥
तरुप्रवालरक्ता सा नीलाङ्गं राक्षसेश्वरम् ।
प्रशोभयत वैदेही गजं कक्ष्येव काञ्चनी ॥ ३० ॥
वृक्षोंके नूतन पल्लवोंके समान किंचित् अरुण वर्णवाली सीता उस काले - कलूटे राक्षसराजको उसी प्रकार सुशोभित कर रही थीं, जैसे हाथीको कसनेवाला सुनहरा रस्सा उसकी शोभा बढ़ाता हो ॥३० ॥
तां महोल्कामिवाकाशे दीप्यमानां स्वतेजसा ।
जहाराकाशमाविश्य सीतां वैश्रवणानुजः ॥ ३१ ॥
आकाशमें अपने तेजसे बहुत बड़ी उल्काके समान प्रकाशित होनेवाली सीताको रावण आकाशमार्गका ही आश्रय ले हर ले गया ॥ ३१ ॥
तस्यास्तान्यग्निवर्णानि भूषणानि महीतले ।
सघोषाण्यवशीर्यन्त क्षीणास्तारा इवाम्बरात् ॥ ३२ ॥
जानकीके शरीरपर अग्नि के समान प्रकाशमान् आभूषण थे । वे उस समय खन - खनकी आवाज करते हुए एक - एक करके गिरने लगे, मानो आकाशसे ताराएँ टूट - टूटकर पृथ्वीपर गिर रही हों ॥ ३२ ॥
तस्याः स्तनान्तराद् भ्रष्टो हारस्ताराधिपद्युतिः ।
वैदेह्या निपतन् भाति गङ्गेव गगनच्युता ॥ ३३ ॥
उन विदेहनन्दिनी सीताके स्तनोंके बीचसे खिसककर गिरता हुआ चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हार गगनमण्डलसे उतरती हुई गङ्गाके समान प्रतीत हुआ ॥ ३३ ॥
उत्पातवाताभिरता नानाद्विजगणायुताः ।
मा भैरिति विधूताग्रा व्याजह्नुरिव पादपाः ॥ ३४ ॥
रावणके वेगसे उत्पन्न हुई उत्पातसूचक वायुके झकोरोंसे हिलते हुए वृक्षोंपर नाना प्रकारके पक्षी कोलाहल कर रहे थे । उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे वृक्ष अपने सिरोंको हिला - हिलाकर संकेत करते हुए सीतासे कह रहे हैं कि ' तुम डरो मत ' ॥ ३४ ॥
नलिन्यो ध्वस्तकमलास्त्रस्तमीनजलेचराः ।
सखीमिव गतोत्साहां शोचन्तीव स्म मैथिलीम् ॥ ३५ ॥
जिनके कमल सूख गये थे और मत्स्य आदि जलचर जीव डर गये थे, वे पुष्करिणियाँ उत्साहहीन हुई मिथिलेशकुमारी सीताको मानो अपनी सखी मानकर उनके लिये शोक कर रही थीं ॥ ३५ ॥
समन्तादभिसम्पत्य सिंहव्याघ्रमृगद्विजाः ।
। अन्वधावंस्तदा रोषात् सीताच्छायानुगामिनः ॥ ३६ ॥
उस सीताहरणके समय रावणपर रोष - सा करके सिंह, व्याघ्र, मृग और पक्षी सब ओरसे सीताकी परछाहीँका अनुसरण करते हुए दौड़ रहे थे ॥ ३६ ॥
जलप्रपातास्त्रमुखाः शृङ्गैरुच्छ्रितबाहुभिः ।
सीतायां हियमाणायां विक्रोशन्तीव पर्वताः ॥ ३७ ॥
जब सीता हरी जाने लगी, उस समय वहाँके पर्वत झरनोंके रूपमें आँसू बहाते हुए, ऊँचे शिखरोंके रूपमें
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अरण्यकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ६८१
अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर मानो जोर - जोरसे चीत्कार ।
कर रहे थे ॥ ३७ ॥
ह्रियमाणां तु वैदेहीं दृष्ट्वा दीनो दिवाकरः ।
प्रविध्वस्तप्रभः श्रीमानासीत् पाण्डुरमण्डलः ॥ ३८ ॥
सीताका हरण होता देख श्रीमान् सूर्यदेव दुःखी हो गये । उनकी प्रभा नष्ट - सी हो गयी तथा उनका मण्डल पीला पड़ गया ॥ ३८ ॥
नास्ति धर्मः कुतः सत्यं नार्जवं नानृशंसता ।
यत्र रामस्य वैदेहीं सीतां हरति रावणः ॥ ३ ९ ॥
इति भूतानि सर्वाणि गणशः पर्यदेवयन् । ग वित्रस्तका दीनमुखा रुरुदुर्मृगपोतकाः ॥ ४० ॥
हाय! हाय! जब श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीताको रावण हरकर लिये जा रहा है, तब यही कहना पड़ता है कि ' संसारमें धर्म नहीं है, सत्य भी कहाँ है? सरलता और दयाका भी सर्वथा लोप हो गया है । ' इस प्रकार वहाँ झुंड के झुंड एकत्र हो सब प्राणी विलाप कर रहे थे । मृगोंके बच्चे भयभीत हो दीनमुखसे रो रहे थे ॥ ३ ९ -४० ॥
उद्वीक्ष्योद्वीक्ष्य नयनैर्भयादिव विलक्षणैः ।
सुप्रवेपितगान्नाश्च बभूवुर्वनदेवताः ॥ ४१ ॥
विक्रोशन्तीं दृढं सीतां दृष्ट्वा दुःखं तथा गताम् । श्रीरामको जोर - जोरसे पुकारती और वैसे भारी दुःखमें पड़ी हुई सीताको अपनी विलक्षण आँखोंसे बारंबार देख - देखकर भयके मारे वनदेवताओंके अङ्ग थर - थर काँपने लगे ॥ ४१३ ॥
तां तु लक्ष्मण रामेति क्रोशन्तीं मधुरस्वराम् ॥ ४२ ॥
अवेक्षमाणां बहुशो वैदेहीं धरणीतलम् ।
स तामाकुलकेशान्तां विप्रमृष्टविशेषकाम् ।
जहारात्मविनाशाय दशग्रीवो मनस्विनीम् ॥ ४३ ॥
विदेहनन्दिनी मधुर स्वरमें ' हा राम, हा लक्ष्मण ' की पुकार करती हुई बारंबार भूतलकी ओर देख रही थीं । उनके केश खुलकर सब ओर फैल गये थे और ललाटकी बेंदी मिट गयी थी । वैसी अवस्थामें दशग्रीव रावण अपने ही विनाशके लिये मनस्विनी सीताको लिये जा रहा था ॥ ४२-४३ ॥ ततस्तु सा चारुदती शुचिस्मिता विनाकृता बन्धुजनेन मैथिली । अपश्यती राघवलक्ष्मणावुभौ विवर्णवक्त्रा भयभारपीडिता ॥ ४४ ॥
उस समय मनोहर दाँत और पवित्र मुसकानवाली मिथिलेशकुमारी सीता, जो अपने बन्धुजनोंसे बिछुड़ गयी थीं, दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको न देखकर भयके भारसे व्यथित हो उठीं । उनके मुखमण्डलकी कान्ति फीकी पड़ गयी ॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
त्रिपञ्चाशः सर्गः सीताका रावणको धिक्कारना
खमुत्पतन्तं तं दृष्ट्वा मैथिली जनकात्मजा ।
दुःखिता परमोद्विग्ना भये महति वर्तिनी ॥ १ ॥
रावणको आकाशमें उड़ते देख मिथिलेशकुमारी जानकी दुःखमग्न हो अत्यन्त उद्विग्न हो रही थीं । वे बहुत बड़े भयमें पड़ गयी थीं ॥ १ ॥
रोषरोदनताम्राक्षी भीमाक्षं राक्षसाधिपम् ।
रुदती करुणं सीता ह्रियमाणा तमब्रवीत् ॥ २ ॥
रोष और रोदनके कारण उनकी आँखें लाल हो गयी थीं । हरी जाती हुई सीता करुणाजनक स्वरमें रोती हुई उस भयंकर नेत्रवाले राक्षसराजसे इस प्रकार बोलीं-न व्यपत्रपसे नीच कर्मणानेन रावण । ज्ञात्वा विरहितां यो मां चोरयित्वा पलायसे ॥ ३ ॥
' ओ नीच रावण! क्या तुझे अपने इस कुकर्मसे लज्जा नहीं आती है, जो मुझे स्वामीसे रहित अकेली और असहाय जानकर चुराये लिये भागा जाता है? ॥ ३ ॥
त्वयैव नूनं दुष्टात्मन् भीरुणा हर्तुमिच्छता ।
ममापवाहितो भर्ता मृगरूपेण मायया ॥४ ॥
' दुष्टात्मन्! तू बड़ा कायर और डरपोक है । निश्चय ही मुझे हर ले जानेकी इच्छासे तूने ही मायाद्वारा मृगरूपमें उपस्थित हो मेरे स्वामीको आश्रमसे दूर हटा दिया था ॥
यो हि मामुद्यतस्त्रातुं सोऽप्ययं विनिपातितः ।
गृधराजः पुराणोऽसौ श्वशुरस्य सखा मम ॥ ५ ॥
' मेरे श्वशुरके सखा वे जो बूढ़े जटायु मेरी रक्षा । करनेके लिये उद्यत हुए थे, उनको भी तूने मार गिराया ॥
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६८२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
परमं खलु ते वीर्यं दृश्यते राक्षसाधम ।
विश्राव्य नामधेयं हि युद्धे नास्मि जिता त्वया ॥ ६ ॥
ईदृशं गर्हितं कर्म कथं कृत्वा न लज्जसे ।
स्त्रियाश्चाहरणं नीच रहिते च परस्य च ॥ ७ ॥
' नीच राक्षस! अवश्य तुझमें बड़ा भारी बल दिखायी देता है ( क्योंकि — तू बूढ़े पक्षीको भी मार गिराता है! ), तूने अपना नाम बताकर श्रीराम - लक्ष्मणके साथ युद्ध करके मुझे नहीं जीता है । ओ नीच! जहाँ कोई रक्षक न हो-ऐसे स्थानपर जाकर परायी स्त्रीके अपहरण - जैसा निन्दित कर्म करके तू लज्जित कैसे नहीं होता है? ॥
कथयिष्यन्ति लोकेषु पुरुषाः कर्म कुत्सितम् ।
सुनृशंसमधर्मिष्ठं तव शौटीर्यमानिनः ॥ ८ ॥
' तू तो अपनेको बड़ा शूर - वीर मानता है, परंतु संसारके सभी वीर पुरुष तेरे इस कर्मको घृणित, क्रूरतापूर्ण और पापरूप ही बतायेंगे ॥ ८ ॥
धिक् ते शौर्यं च सत्त्वं च यत्त्वया कथितं तदा ।
कुलाक्रोशकरं लोके धिक् ते चारित्रमीदृशम् ॥ ९ ॥
' तूने पहले स्वयं ही जिसका बड़े तावसे वर्णन किया था, तेरे उस शौर्य और बलको धिक्कार है! कुलमें कलङ्क लगानेवाले तेरे ऐसे चरित्रको संसारमें सदा धिक्कार ही प्राप्त होगा ॥ ९ ॥
किं शक्यं कर्तुमेवं हि यज्जवेनैव धावसि ।
मुहूर्तमपि तिष्ठ त्वं न जीवन् प्रतियास्यसि ॥ १० ॥
' किंतु इस समय क्या किया जा सकता है?
क्योंकि तू बड़े वेगसे भागा जा रहा है । अरे! दो घड़ी ।
भी तो ठहर जा, फिर यहाँसे जीवित नहीं लौट सकेगा ॥
नहि चक्षुःपथं प्राप्य तयोः पार्थिवपुत्रयोः ।
ससैन्योऽपि समर्थस्त्वं मुहूर्तमपि जीवितुम् ॥ ११ ॥
‘ उन दोनों राजकुमारोंके दृष्टिपथमें आ जानेपर तू सेनाके साथ हो तो भी दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता ॥ ११ ॥
न त्वं तयोः शरस्पर्शं सोढुं शक्तः कथंचन ।
प्रज्वलितस्येव स्पर्शमग्नेर्विहंगमः ॥ १२ ॥
' जैसे कोई आकाशचारी पक्षी वनमें प्रज्वलित हुए दावानलका स्पर्श सहन करनेमें समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार तू मेरे पति और उनके भाई दोनोंके बाणोंका स्पर्श किसी तरह सह नहीं सकता ॥ १२ ॥
साधु कृत्वाऽऽत्मनः पथ्यं साधु मां मुञ्च रावण ।
मत्प्रधर्षणसंक्रुद्धो भ्रात्रा सह पतिर्मम ॥ १३ ॥
विधास्यति विनाशाय त्वं मां यदि न मुञ्चसि । ' रावण! यदि तू मुझे छोड़ नहीं देता है तो मेरे तिरस्कारसे कुपित हुए मेरे पतिदेव अपने भाईके साथ चढ़ आयँगे और तेरे विनाशका उपाय करेंगे, अतः तू
अच्छी तरह अपनी भलाई सोच ले और मुझे छोड़ दे ।
यही तेरे लिये अच्छा होगा ॥ १३३ ॥
येन त्वं व्यवसायेन बलान्मां हर्तुमिच्छसि ॥ १४ ॥
व्यवसायस्तु ते नीच भविष्यति निरर्थकः । ' नीच! तू जिस संकल्प या अभिप्रायसे बलपूर्वक मेरा हरण करना चाहता है, तेरा वह अभिप्राय व्यर्थ होगा ॥ १४३ ॥
नाहं तमपश्यन्ती भर्तारं विबुधोपमम् ॥ १५ ॥
उत्सहे शत्रुवशगा प्राणान् धारयितुं चिरम् । ' मैं अपने देवोपम पतिका दर्शन न पानेपर शत्रुके अधीनतामें अधिक कालतक अपने प्राणोंको नहीं धारण कर सकूँगी ॥ १५३ ॥
न नूनं चात्मनः श्रेयः पथ्यं वा समवेक्षसे ॥ १६ ॥
मृत्युकाले यथा मर्त्यो विपरीतानि सेवते ।
मुमूर्षूणां तु सर्वेषां यत् पथ्यं तन्न रोचते ॥ १७ ॥
' निश्चय ही तू अपने कल्याण और हितका विचार नहीं करता है । जैसे मरनेके समय मनुष्य स्वास्थ्यके विरोधी पदार्थोंका सेवन करने लगता है, वही दशा तेरी है । प्रायः सभी मरणासन्न मनुष्योंको पथ्य ( हितकारक सलाह या भोजन ) नहीं रुचता है ॥ १६-१७ ॥
पश्यामीह हि कण्ठे त्वां कालपाशावपाशितम् ।
यथा चास्मिन् भयस्थाने न बिभेषि निशाचर ॥ १८ ॥
' निशाचर! मैं देखती हूँ, तेरे गलेमें कालकी फाँसी पड़ चुकी है, इसीसे इस भयके स्थानपर भी तू निर्भय बना हुआ है ॥ १८ ॥
व्यक्तं हिरण्मयांस्त्वं हि सम्पश्यसि महीरुहान् ।
नदीं वैतरणीं घोरां रुधिरौघविवाहिनीम् ॥ १ ९ ॥
खड्गपत्रवनं चैव भीमं पश्यसि रावण ।
तप्तकाञ्चनपुष्पां च वैदूर्यप्रवरच्छ्दाम् ॥ २० ॥
द्रक्ष्यसे शाल्मलीं तीक्ष्णामायसैः कण्टकैश्चिताम् । ' रावण! अवश्य ही तू सुवर्णमय वृक्षोंको देख रहा है, रक्तका स्रोत बहानेवाली भयंकर वैतरणी नदीका दर्शन कर रहा है, भयानक असिपत्र- वनको भी देखना चाहता है तथा जिसमें तपाये हुए सुवर्णके समान फूल तथा श्रेष्ठ वैदूर्यमणि ( नीलम ) के समान पत्ते हैं और जिसमें लोहेके काँटे चिने गये हैं, उस तीखी शाल्मलिका भी अब तू शीघ्र ही दर्शन करेगा ॥ १ ९ -२० ३ ॥
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अरण्यकाण्डे चतुष्पञ्चाशः सर्गः ६८३ नहि त्वमीदृशं कृत्वा तस्यालीकं महात्मनः ॥ २१ ॥
धारितुं शक्ष्यसि चिरं विषं पीत्वेव निर्घृण ।
बद्धस्त्वं कालपाशेन दुर्निवारेण रावण ॥ २२ ॥
' निर्दयी निशाचर! तू महात्मा श्रीरामका ऐसा महान् अपराध करके विषपान किये हुए मनुष्यकी भाँति अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेगा । रावण! तू अटल कालपाशसे बँध गया है ॥ २१-२२ ॥
क्व गतो लप्स्यसे शर्म मम भर्तुर्महात्मनः ।
निमेषान्तरमात्रेण विना भ्रातरमाहवे ॥ २३ ॥
राक्षसा निहता येन सहस्त्राणि चतुर्दश ।
कथं स राघवो वीरः सर्वास्त्रकुशलो बली ॥ २४ ॥
न त्वां हन्याच्छरैस्तीक्ष्णैरिष्टभार्यापहारिणम् । ' मेरे महात्मा पतिसे बचकर तू कहाँ जाकर शान्ति पा सकेगा । जिन्होंने अपने भाई लक्ष्मणकी सहायता लिये बिना ही युद्धमें पलक मारते - मारते चौदह हजार राक्षसोंका विनाश कर डाला, वे सम्पूर्ण अस्त्रोंका प्रयोग करनेमें कुशल बलवान् वीर रघुनाथजी अपनी प्यारी पत्नीका अपहरण करनेवाले तुझ - जैसे पापीको तीखे बाणोंद्वारा क्यों नहीं कालके गालमें भेज देंगे ' ॥ २३-२४३ ॥
एतच्चान्यच्च परुषं वैदेही रावणाङ्का ।
भयशोकसमाविष्टा करुणं विललाप ह ॥ २५ ॥
रावणके चंगुलमें फँसी हुई विदेहराजकुमारी सीता भय और शोकसे व्याकुल हो ये तथा और भी बहुत - से कठोर वचन सुनाकर करुण - स्वरमें विलाप करने लगीं ॥२५ ॥
तदा भृशार्तां बहु चैव भाषिणीं विलापपूर्वं करुणं च भामिनीम् । जहा पापस्तरुणीं विचेष्टत नृपात्मजामागतगात्रवेपथुः ॥ २६ ॥
अत्यन्त दुःखसे आतुर हो विलापपूर्वक बहुत त - - स सी करुणाजनक बातें कहती और छूटनेके लिये नाना प्रकारकी चेष्टा करती हुई तरुणी भामिनी राजकुमारी सीताको वह पापी निशाचर हर ले गया । उस समय । अधिक बोझके कारण उसका शरीर काँप रहा था ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५३ ॥
चतुष्पञ्चाशः सर्गः सीताका पाँच वानरोंके बीच अपने भूषण और वस्त्रको गिराना, रावणका लङ्कामें पहुँचकर सीताको अन्तःपुरमें रखना तथा जनस्थानमें आठ राक्षसोंको गुप्तचरके रूपमें रहनेके लिये भेजना
ह्रियमाणा तु वैदेही कंचिन्नाथमपश्यती ।
ददर्श गिरिशृङ्गस्थान् पञ्च वानरपुङ्गवान् ॥ १ ॥
रावणके द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीताको उस समय कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी देता था । मार्गमें उन्होंने एक पर्वतके शिखरपर पाँच श्रेष्ठ वानरोंको बैठे देखा ॥१ ॥
तेषां मध्ये विशालाक्षी कौशेयं कनकप्रभम् ।
उत्तरीयं वरारोहा शुभान्याभरणानि च ॥ २ ॥
मुमोच यदि रामाय शंसेयुरिति भामिनी ।
वस्त्रमुत्सृज्य तन्मध्ये निक्षिप्तं सहभूषणम् ॥ ३ ॥
तब सुन्दर अङ्गोंवाली विशाललोचना भामिनी सीताने यह सोचकर कि शायद ये भगवान् श्रीरामको कुछ समाचार कह सकें, अपने सुनहरे रंगकी रेशमी चादर उतारी और उसमें वस्त्र और आभूषण रखकर उसे उनके बीचमें फेंक दिया ॥ २-३ ॥
सम्भ्रमात् तु दशग्रीवस्तत्कर्म च न बुद्धवान् ।
पिङ्गाक्षास्तां विशालाक्षीं नेत्रैरनिमिषैरिव ॥४ ॥
विक्रोशन्तीं तदा सीतां ददृशुर्वानरोत्तमाः । रावण बड़ी घबराहटमें था, इसलिये सीताके इस कार्यको वह न जान सका । वे भूरी आँखोंवाले श्रेष्ठ वानर उस समय उच्च स्वरसे विलाप करती हुई विशाल-लोचना सीताकी ओर एकटक नेत्रोंसे देखने लगे ॥ ४३ ॥
स च पम्पामतिक्रम्य लङ्कामभिमुखः पुरीम् ॥ ५ ॥
जगाम मैथिलीं गृह्य रुदतीं राक्षसेश्वरः । राक्षसराज रावण पम्पासरोवरको लाँघकर रोती हुई मैथिली सीताको साथ लिये लङ्कापुरीकी ओर चल दिया ॥ ५३ ॥
तां जहार सुसंहृष्टो रावणो मृत्युमात्मनः ॥६ ॥
उत्सङ्गेनैव भुजगीं तीक्ष्णदंष्ट्रां महाविषाम् । निशाचर रावण बड़े हर्षमें भरकर सीताके रूपमें
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६८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अपनी मौतको ही हरकर लिये जा रहा था । उसने वैदेहीके रूपमें तीखे दाढ़वाली महाविषैली नागिनको ही अपनी गोदमें उठा रखा था ॥ ६३ ॥
वनानि सरितः शैलान् सरांसि च विहायसा ॥ ७ ॥
स क्षिप्रं समतीयाय शरश्चापादिव च्युतः । वह धनुषसे छूटे हुए बाणकी तरह तीव्र गतिसे चलकर आकाशमार्गसे अनेकानेक वनों, नदियों, पर्वतों और सरोवरोंको तुरंत लाँघ गया ॥ ७३ ॥
तिमिनक्रनिकेतं तु वरुणालयमक्षयम् ॥ ८ ॥
सरितां शरणं गत्वा समतीयाय सागरम् । उसने तिमि नामक मत्स्यों और नार्कोंके निवासस्थान एवं वरुणके अक्षय गृह समुद्रको भी, जो समस्त नदियोंका आश्रय है, पार कर लिया ॥ ८३ ॥
सम्भ्रमात् परिवृत्तोर्मी रुद्धमीनमहोरगः ॥ ९ ॥
वैदेह्यां ह्रियमाणायां बभूव वरुणालयः । विदेहनन्दिनी जगन्माता जानकीका अपहरण होते समय वरुणालय समुद्रको बड़ी घबराहट हुई । उससे उसकी उठती हुई लहरें शान्त हो गयीं । उसके भीतर रहनेवाली मछलियों और बड़े - बड़े सर्पोंकी गति रुक गयी॥९ ३ ॥ अन्तरिक्षगता वाचः ससृजुश्चारणास्तदा ॥ १० ॥
एतदन्तो दशग्रीव इति सिद्धास्तथाब्रुवन् । उस समय आकाशमें विचरनेवाले चारण यों बोले- ' अब दशग्रीव रावणका यह अन्तकाल निकट आ पहुँचा है ' तथा सिद्धोंने भी यही बात दुहरायी ॥ १०३ ॥
स तु सीतां विचेष्टन्तीमङ्केनादाय रावणः ॥ ११ ॥
प्रविवेश पुरीं लङ्कां रूपिणीं मृत्युमात्मनः । सीता छटपटा रही थीं । रावणने अपनी साकार मृत्युकी भाँति उन्हें अङ्कमें लेकर लङ्कापुरीमें प्रवेश किया ॥ ११३ ॥
सोऽभिगम्य पुरीं लङ्कां सुविभक्तमहापथाम् ॥ १२ ॥
संरूढकक्ष्यां बहुलां स्वमन्तःपुरमाविशत् । वहाँ पृथक् - पृथक् विशाल राजमार्ग बने हुए थे । पुरीके द्वारपर बहुत - से राक्षस इधर - उधर फैले हुए थे तथा उस नगरीका विस्तार बहुत बड़ा था । उसमें जाकर रावणने अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥ १२३ ॥
तत्र तामसितापाङ्गीं शोकमोहसमन्विताम् ॥ १३ ॥
निदधे रावणः सीतां मयो मायामिवासुरीम् । कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सीता शोक और मोहमें डूबी हुई थीं । रावणने उन्हें अन्तःपुरमें रख दिया, मानो मयासुरने मूर्तिमती आसुरी मायाको वहाँ स्थापित कर दिया हो * ॥ १३३ ॥
अब्रवीच्च दशग्रीवः पिशाचीर्घोरदर्शनाः ॥ १४ ॥
यथा नैनां पुमान् स्त्री वा सीतां पश्यत्यसम्मतः । इसके बाद दशग्रीवने भयंकर आकारवाली पिशाचिनोंको बुलाकर कहा - ' ( तुम सब सावधानी के साथ सीताकी रक्षा करो । ) कोई भी स्त्री या पुरुष मेरी आज्ञाके बिना सीताको देखने या इनसे मिलने न पाये ॥ १४३ ॥
मुक्तामणिसुवर्णानि वस्त्राण्याभरणानि च ॥ १५ ॥
यद् यदिच्छेत् तदैवास्या देयं मच्छन्दतो यथा । ' उन्हें मोती, मणि, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदि जिस - जिस वस्तुकी इच्छा हो, वह तुरंत दी जाय; इसके लिये मेरी खुली आज्ञा है ॥ १५३ ॥
या च वक्ष्यति वैदेहीं वचनं किंचिदप्रियम् ॥ १६ ॥
अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानान्न तस्या जीवितं प्रियम् । ' तुमलोगोंमेंसे जो कोई भी जानकर या बिना जाने विदेहकुमारी सीतासे कोई अप्रिय बात कहेगी, मैं समझँगा, उसे अपनी जिंदगी प्यारी नहीं है ' ॥ १६३ ॥
तथोक्त्वा राक्षसीस्तास्तु राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥ १७ ॥
निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्मात् किं कृत्यमिति चिन्तयन् ।
ददर्शाष्टौ महावीर्यान् राक्षसान् पिशिताशनान् ॥ १८ ॥
राक्षसियोंको वैसी आज्ञा देकर प्रतापी राक्षसराज ' अब आगे क्या करना चाहिये ' यह सोचता हुआ अन्तःपुरसे बाहर निकला और कच्चे मांसका आहार करनेवाले आठ महापराक्रमी राक्षसोंसे तत्काल मिला ॥
स तान् दृष्ट्वा महावीर्यो वरदानेन मोहितः ।
उवाच तानिदं वाक्यं प्रशस्य बलवीर्यतः ॥ १ ९ ॥
उनसे मिलकर ब्रह्माजीके वरदानसे मोहित हुए महापराक्रमी रावणने उसके बल और वीर्यकी प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा —॥१ ९ ॥
नानाप्रहरणाः क्षिप्रमितो गच्छत सत्वराः ।
जनस्थानं हतस्थानं भूतपूर्वं खरालयम् ॥ २० ॥
' वीरो! तुमलोग नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र साथ लेकर शीघ्र ही जनस्थानको, जहाँ पहले खर रहता था, जाओ । वह स्थान इस समय उजाड़ पड़ा है ॥ २० ॥
* रामायणतिलक नामक व्याख्याके विद्वान् लेखकने यह बताया है कि यहाँ जो सीताकी मायासे उपमा दी गयी है, उसके द्वारा यह अभिप्राय व्यक्त किया गया है कि मायामयी सीता ही लङ्कामें आयी थीं; मुख्य सीता तो अग्निमें प्रविष्ट हो चुकी थीं । इसीलिये रावण इन्हें ला सका । मायारूपिणी होनेके कारण ही रावणको इनके स्वरूपका ज्ञान न हो सका ।
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अरण्यकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ६८५
तत्रास्यतां जनस्थाने शून्ये निहतराक्षसे ।
पौरुषं बलमाश्रित्य त्रासमुत्सृज्य दूरतः ॥ २१ ॥
' वहाँके सभी राक्षस मार डाले गये हैं । उस सूने जनस्थानमें तुमलोग अपने ही बल - पौरुषका भरोसा करके भयको दूर हटाकर रहो ॥२१ ॥
बहुसैन्यं महावीर्यं जनस्थाने निवेशितम् ।
सदूषणखरं युद्धे निहतं रामसायकैः ॥ २२ ॥
' मैंने वहाँ बहुत बड़ी सेनाके साथ महापराक्रमी खर और दूषणको बसा रखा था, किंतु वे सब - के - सब युद्धमें रामके बाणोंसे मारे गये ॥ २२ ॥
ततः क्रोधो ममापूर्वी धैर्यस्योपरि वर्धते ।
वैरं च सुमहज्जातं रामं प्रति सुदारुणम् ॥ २३ ॥
' इससे मेरे मनमें अपूर्व क्रोध जाग उठा है और वह धैर्यकी सीमासे ऊपर उठकर बढ़ने लगा है; इसीलिये रामके साथ मेरा बड़ा भारी और भयंकर वैर ठन गया है ॥
निर्यातयितुमिच्छामि तच्च वैरं महारिपोः ।
नहि लप्स्याम्यहं निद्रामहत्वा संयुगे रिपुम् ॥ २४ ॥
' मैं अपने महान् शत्रुसे उस वैरका बदला लेना चाहता हूँ । उस शत्रुको संग्राममें मारे बिना मैं चैनसे सो नहीं सकूँगा ॥२४ ॥
तं त्विदानीमहं हत्वा खरदूषण घातिनम् ।
रामं शर्मोपलप्स्यामि धनं लब्ध्वेव निर्धनः ॥ २५ ॥
' रामने खर और दूषणका वध किया है, अतः मैं भी इस समय उन्हें मारकर जब बदला चुका लूँगा, तभी मुझे शान्ति मिलेगी । जैसे निर्धन मनुष्य धन पाकर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मैं रामका वध करके शान्ति पा सकूँगा ॥२५ ॥
जनस्थाने वसद्भिस्तु भवद्भी राममाश्रिता ।
प्रवृत्तिरुपनेतव्या किं करोतीति तत्त्वतः ॥ २६ ॥
' जनस्थानमें रहकर तुमलोग रामचन्द्रका समाचार जानो और वे कब क्या कर रहे हैं, इसका ठीक - ठीक पता लगाते रहो और जो कुछ मालूम हो, उसकी सूचना मेरे पास भेज दिया करो ॥ २६ ॥
अप्रमादाच्च गन्तव्यं सर्वैरेव निशाचरैः ।
कर्तव्यश्च सदा यत्नो राघवस्य वधं प्रति ॥ २७ ॥
' तुम सभी निशाचर सावधानीके साथ वहाँ जाना और रामके वधके लिये सदा प्रयत्न करते रहना ॥ २७ ॥
युस्माकं तु बलं ज्ञातं बहुशो रणमूर्धनि ।
अतश्चास्मिञ्जनस्थाने मया यूयं निवेशिताः ॥ २८ ॥
' मुझे अनेक बार युद्धके मुहानेपर तुमलोगोंके बलका परिचय मिल चुका है; इसीलिये इस जनस्थानमें मैंने तुम्हीं लोगोंको रखनेका निश्चय किया है ' ॥ २८ ॥
ततः प्रियं वाक्यमुपेत्य राक्षसा महार्थमष्टावभिवाद्य रावणम् । विहाय लङ्कां सहिताः प्रतस्थिरे यतो जनस्थानमलक्ष्यदर्शनाः ॥ २ ९ ॥ रावणकी यह महान् प्रयोजनसे भरी हुई प्रिय बातें सुनकर वे आठों राक्षस उसे प्रणाम करके अदृश्य हो एक साथ ही लङ्काको छोड़कर जनस्थानकी ओर प्रस्थित हो गये ॥ २ ९ ॥ ततस्तु सीतामुपलभ्य रावणः सुसम्प्रहृष्टः परिगृह्य मैथिलीम् । प्रसज्य रामे च वैरमुत्तमं बभूव मोहान्मुदितः स रावणः ॥ ३० ॥
तदनन्तर मिथिलेशकुमारी सीताको पाकर उन्हें राक्षसियोंकी देख - रेखमें सौंपकर रावणको बड़ा हर्ष हुआ । श्रीरामके साथ भारी वैर ठानकर वह राक्षस । मोहवश आनन्द मानने लगा ॥३० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुष्पञ्चाशः सर्गः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥५४ ॥
पञ्चपञ्चाशः सर्गः रावणका सीताको अपने अन्तःपुरका दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जानेके लिये समझाना
राक्षसान् घोरान् रावणोऽष्टौ महाबलान् । कारण अपनेको कृतकृत्य माना ॥१ ॥
संदिश्य कृत्कृत्यममन्यत ॥ १ ॥ स चिन्तयानो वैदेहीं कामबाणैः प्रपीडितः ।
आत्मानं इस प्रकार बुद्धिवैक्लव्यात् आठ महाबली भयंकर राक्षसोंको प्रविवेश गृहं रम्यं सीतां द्रष्टुमभित्वरन् ॥२ ॥
जानेकी आज्ञा दे रावणने विपरीत बुद्धि वह विदेहकुमारी सीताका स्मरण करके काम-जनस्थानमें
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६८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो रहा था; अतः उन्हें देखनेके । लिये उसने बड़ी उतावलीके साथ अपने रमणीय अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥ २ ॥
स प्रविश्य तु तद्वेश्म रावणो राक्षसाधिपः ।
अपश्यद् राक्षसीमध्ये सीतां दुःखपरायणाम् ॥३ ॥
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां शोकभारावपीडिताम् ।
वायुवेगैरिवाक्रान्तां मज्जन्तीं नावमर्णवे ॥४ ॥
मृगयूथपरिभ्रष्टां मृगीं श्वभिरिवावृताम् । उस भवनमें प्रवेश करके राक्षसोंके राजा रावणने देखा कि सीता राक्षसियोंके बीचमें बैठकर दुःखमें डूबी हुई हैं । उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही है और वे शोकके दुस्सह भारसे अत्यन्त पीड़ित एवं दीन हो वायुके वेगसे आक्रान्त हो समुद्रमें डूबती हुई नौकाके समान जान पड़ती हैं । मृगोंके यूथसे बिछुड़कर कुत्तोंसे घिरी हुई अकेली हरिणीके समान दिखायी देती हैं ॥ ३-४३ ॥ अधोगतमुखीं सीतां तामभ्येत्य निशाचरः ॥ ५ ॥
तां तु शोकवशाद् दीनामवशां राक्षसाधिपः ।
सबलाद् दर्शयामास गृहं देवगृहोपमम् ॥ ६ ॥
शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीताके पास पहुँचकर राक्षसोंके राजा निशाचर रावणने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृहके समान सुन्दर भवनका दर्शन कराया॥५-६ ॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधं स्त्रीसहस्त्रनिषेवितम् ।
नानापक्षिगणैर्जुष्टं नानारत्नसमन्वितम् ॥ ७ ॥
वह ऊँचे - ऊँचे महलों और सातमंजिले मकानोंसे भरा हुआ था । उसमें सहस्त्रों स्त्रियाँ निवास करती थीं । झुंड - के - झुंड नाना जातिके पक्षी वहाँ कलरव करते थे । नाना प्रकारके रत्न उस अन्तःपुरकी शोभा बढ़ाते थे ॥७ ॥
दान्तकैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैस्तथा ।
वज्रवैदूर्यचित्रैश्च स्तम्भैर्दृष्टिमनोरमैः ॥ ८ ॥
उसमें बहुत - से मनोहर खंभे लगे थे, जो हाथीदाँत, पक्के सोने, स्फटिकमणि, चाँदी, हीरा और वैदूर्यमणि ( नीलम ) से जटित होनेके कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे ॥ ८ ॥
दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।
सोपानं काञ्चनं चित्रमारुरोह तया सह ॥ ९ ॥
उस महलमें दिव्य दुन्दुभियोंका मधुर घोष होता रहता था । उस अन्तःपुरको तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे सजाया गया था । रावण सीताको साथ लेकर सोनेकी बनी हुई विचित्र सीढ़ीपर चढ़ा ॥ ९ ॥
दान्तका राजताश्चैव गवाक्षाः प्रियदर्शनाः ।
। हेमजालावृताश्चासंस्तत्र प्रासादपङ्क्तयः ॥ १० ॥
वहाँ हाथीदाँत और चाँदीकी बनी हुई खिड़कियाँ थीं, जो बड़ी सुहावनी दिखायी देती थीं । सोने जालियोंसे ढकी हुई प्रासादमालाएँ भी दृष्टिगोचर होती थीं ॥१० ॥
सुधामणिविचित्राणि भूमिभागानि सर्वशः ।
दशग्रीवः स्वभवने प्रादर्शयत मैथिलीम् ॥ ११ ॥
उस महलमें जो भूभाग ( फर्श ) थे, वे सुख-चूनाके पक्के बनाये गये थे और उनमें मणियाँ जड़ी गयी थीं, जिनसे वे सब - के - सब विचित्र दिखायी देते थे । दशग्रीवने अपने महलकी वे सारी वस्तुएँ मैथिलीको दिखायीं ॥ ११ ॥
दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च नानापुष्पसमावृताः ।
रावणो दर्शयामास सीतां शोकपरायणाम् ॥१२ ॥
रावणने बहुत - सी बावड़ियाँ और भाँति - भाँतिके फूलोंसे आच्छादित बहुत - सी पोखरियाँ भी सीताको दिखायीं । सीता वह सब देखकर शोकमें डूब गयीं ॥ १२ ॥
दर्शयित्वा तु वैदेहीं कृत्स्नं तद्भवनोत्तमम् ।
उवाच वाक्यं पापात्मा सीतां लोभितुमिच्छ्या ॥ १३ ॥
वह पापात्मा निशाचर विदेहनन्दिनी सीताको अपना सारा सुन्दर भवन दिखाकर उन्हें लुभानेकी इच्छासे इस प्रकार बोला- ॥ १३ ॥
दश राक्षसकोट्यश्च द्वाविंशतिरथापराः ।
वर्जयित्वा जरावृद्धान् बालांश्च रजनीचरान् ॥ १४ ॥
तेषां प्रभुरहं सीते सर्वेषां भीमकर्मणाम् ।
सहस्रमेकमेकस्य मम कार्यपुरःसरम् ॥ १५ ॥
' सीते! मेरे अधीन बत्तीस करोड़ राक्षस हैं । यह संख्या बूढ़े और बालक निशाचरोंको छोड़कर बतायी गयी है । भयंकर कर्म करनेवाले इन सभी राक्षसोंका मैं ही स्वामी हूँ । अकेले मेरी सेवामें एक हजार राक्षस रहते हैं ॥ १४-१५ ॥
यदिदं राज्यतन्त्रं मे त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
जीवितं च विशालाक्षि त्वं मे प्राणैर्गरीयसी ॥ १६ ॥
‘ विशाललोचने! मेरा यह सारा राज्य और जीवन तुमपर ही अवलम्बित है ( अथवा यह सब कुछ तुम्हारे चरणोंमें समर्पित है ) । तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो ॥ १६ ॥
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अरण्यकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ६८७
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां मम योऽसौ परिग्रहः ।
तासां त्वमीश्वरी सीते मम भार्या भव प्रिये ॥ १७ ॥
' सीते! मेरा अन्तःपुर मेरी बहुत - सी सुन्दरी भार्याओंसे भरा हुआ है, तुम उन सबकी स्वामिनी बनो - प्रिये! मेरी भार्या बन जाओ ॥ १७ ॥
साधु किं तेऽन्यथाबुद्ध्या रोचयस्व वचो मम ।
भजस्व माभितप्तस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ १८ ॥
' मेरे इस हितकर वचनको मान लो - इसे पसंद करो; इससे विपरीत विचारको मनमें लानेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? मुझे अङ्गीकार करो । मैं पीड़ित हूँ, मुझ कृपा करो ॥१८ ॥
परिक्षिप्ता समुद्रेण लङ्केयं शतयोजना ।
नेयं धर्षयितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ १ ९ ॥
' समुद्रसे घिरी हुई इस लङ्काके राज्यका विस्तार सौ योजन है । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकते ॥ १ ९ ॥
न देवेषु न यक्षेषु न गन्धर्वेषु नर्षिषु ।
अहं पश्यामि लोकेषु यो मे वीर्यसमो भवेत् ॥ २० ॥
' देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों तथा ऋषियोंमें भी मैं किसीको ऐसा नहीं देखता, जो पराक्रममें मेरी समानता कर सके ॥ २० ॥
राज्यभ्रष्टेन दीनेन तापसेन पदातिना ।
किं करिष्यसि रामेण मानुषेणाल्पतेजसा ॥ २१ ॥
' राम तो राज्यसे भ्रष्ट, दीन, तपस्वी, पैदल चलनेवाले और मनुष्य होनेके कारण अल्प तेजवाले हैं, उन्हें लेकर क्या करोगी? ॥ २१ ॥
भजस्व सीते मामेव भर्ताहं सदृशस्तव ।
यौवनं त्वध्रुवं भीरु रमस्वेह मया सह ॥ २२ ॥
‘ सीते! मुझको ही अपनाओ! मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ । भीरु! जवानी सदा रहनेवाली नहीं है, अतः यहाँ रहकर मेरे साथ रमण करो ॥ २२ ॥
दर्शने मा कृथा बुद्धिं राघवस्य वरानने ।
कास्य शक्तिरिहागन्तुमपि सीते मनोरथैः ॥ २३ ॥
' वरानने! सीते! अब तुम रामके दर्शनका विचार छोड़ दो । इस राममें इतनी शक्ति कहाँ है कि यहाँतक आनेका मनोरथ भी कर सके ॥ २३ ॥
न शक्यो वायुराकाशे पाशैर्बद्धुं महाजवः ।
विमलाः शिखाः ॥ २४ ॥
अग्निकी निर्मल ज्वालाओंको हाथोंसे नहीं पकड़ा जा सकता ॥ २४ ॥
त्रयाणामपि लोकानां न तं पश्यामि शोभने ।
विक्रमेण नयेद् यस्त्वां मद्बाहुपरिपालिताम् ॥ २५ ॥।
' शोभने! मैं तीनों लोकोंमें किसी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो मेरी भुजाओंसे सुरक्षित तुमको पराक्रम करके यहाँसे ले जा सके ॥ २५ ॥
लङ्कायाः सुमहद्राज्यमिदं त्वमनुपालय ।
त्वत्प्रेष्या मद्विधाश्चैव देवाश्चापि चराचरम् ॥ २६ ॥
' लङ्काके इस विशाल राज्यका तुम्हीं पालन करो । मुझ - जैसे राक्षस, देवता तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारे सेवक बनकर रहेंगे ॥ २६ ॥
अभिषेकजलक्लिन्ना तुष्टा च रमयस्व च ।
दुष्कृतं यत्पुरा कर्म वनवासेन तद्गतम् ॥ २७ ॥
यच्च ते सुकृतं कर्म तस्येह फलमाप्नुहि । ' स्नानके जलसे आर्द्र ( अथवा लङ्काके राज्यपर अपना अभिषेक कराकर उसके जलसे आर्द्र ) होकर संतुष्ट हो तुम अपने - आपको क्रीड़ाविनोदमें लगाओ । तुम्हारा पहलेका जो दुष्कर्म था, वह वनवासका कष्ट देकर समाप्त हो गया । अब जो तुम्हारा पुण्यकर्म शेष है, उसका फल यहाँ भोगो ॥ २७ ॥
इह सर्वाणि माल्यानि दिव्यगन्धानि मैथिलि ॥ २८ ॥
भूषणानि च मुख्यानि तानि सेव मया सह । ' मिथिलेशकुमारी! तुम मेरे साथ यहाँ रहकर सब प्रकारके पुष्पहार, दिव्य गन्ध और श्रेष्ठ आभूषण आदिका सेवन करो ॥ २८३ ॥
पुष्पकं नाम सुश्रोणि भ्रातुर्वैश्रवणस्य मे ॥ २ ९ ॥
विमानं सूर्यसंकाशं तरसा निर्जितं रणे ।
विशालं रमणीयं च तद्विमानं मनोजवम् ॥ ३० ॥
तत्र सीते मया सार्धं विहरस्व यथासुखम् । ' सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरि! वह सूर्य समान प्रकाशित होनेवाला पुष्पकविमान मेरे भाई कुबेरका था । उसे मैंने बलपूर्वक जीता है । यह अत्यन्त रमणीय, विशाल तथा मनके समान वेगसे चलनेवाला है । सीते! तुम उसके ऊपर मेरे साथ बैठकर सुखपूर्वक विहार करो ॥ २ ९ -३०३ ॥ वदनं पद्मसंकाशं विमलं चारुदर्शनम् ॥ ३१ ॥
शोकार्तं तु वरारोहे न भ्राजति वरानने । दीप्यमानस्य वाप्यग्नेर्ग्रहीतुं बहनेवाली वायुको ' वरारोहे सुमुखि! तुम्हारा यह कमलके समान ' आकाशमें महान् वेगसे प्रज्वलित | सुन्दर निर्मल और मनोहर दिखायी देनेवाला मुख रस्सियोंमें नहीं बाँधा जा सकता अथवा
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६८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
शोकसे पीड़ित होनेके कारण शोभा नहीं पा रहा ।
है'॥३१३ ॥
एवं वदति तस्मिन् सा वस्त्रान्तेन वराङ्गना ॥ ३२ ॥
पिधायेन्दुनिभं सीता मन्दमश्रूण्यवर्तयत् । जब रावण ऐसी बातें कहने लगा, तब परम सुन्दरी सीता देवी चन्द्रमाके समान मनोहर अपने मुखको आँचलसे ढककर धीरे - धीरे आँसू बहाने लगीं ॥ ३२३ ॥
ध्यायन्तीं तामिवास्वस्थां सीतां चिन्ताहतप्रभाम् ॥ ३३ ॥
उवाच वचनं वीरो रावणो रजनीचरः । सीता शोकसे अस्वस्थ - सी हो रही थीं, चिन्तासे उनकी कान्ति नष्ट - सी हो गयी थी और वे भगवान् रामका ध्यान करने लगी थीं । उस अवस्थामें उनसे वह वीर निशाचर रावण इस प्रकार बोला- ॥ ३३३ ॥
अलं व्रीडेन वैदेहि धर्मलोपकृतेन ते ॥ ३४ ॥
आर्षोऽयं देवि निष्पन्दो यस्त्वामभिभविष्यति । ‘ विदेहनन्दिनि! अपने पतिके त्याग और परपुरुषके अङ्गीकारसे जो धर्मलोपकी आशङ्का होती है, उसके कारण तुम्हें यहाँ लज्जा नहीं होनी चाहिये, इस तरहकी लाज व्यर्थ है । देवि! तुम्हारे साथ जो मेरा स्नेह सम्बन्ध होगा, यह आर्ष धर्मशास्त्रोंद्वारा * समर्थित है ॥ ३४ ॥
एतौ पादौ मया स्निग्धौ शिरोभिः परिपीडितौ ॥ ३५ ॥
प्रसादं कुरु मे क्षिप्रं वश्यो दासोऽहमस्मि ते । ' तुम्हारे इन कोमल एवं चिकने चरणोंपर मैं अपने ये दसों मस्तक रख रहा हूँ । अब शीघ्र मुझपर कृपा करो । मैं सदा तुम्हारे अधीन रहनेवाला दास हूँ ॥ ३५३ ॥
इमाः शून्या मया वाचः शुष्यमाणेन भाषिताः ॥ ३६ ॥
न चापि रावणः कांचिन्मूर्ध्ना स्त्रीं प्रणमेत ह । ' मैंने कामाग्निसे संतप्त होकर ये बातें कही हैं । ये शून्य ( निष्फल ) न हों, ऐसी कृपा करो; क्योंकि रावण किसी स्त्रीको सिर झुकाकर प्रणाम नहीं करता, ( केवल ) तुम्हारे सामने इसका मस्तक झुका है ' ॥ ३६३ ॥
एवमुक्त्वा दशग्रीवो मैथिलीं जनकात्मजाम् ।
कृतान्तवशमापन्नो ममेयमिति मन्यते ॥ ३७ ॥
मिथिलेशकुमारी जानकीसे ऐसा कहकर कालके वशीभूत हुआ रावण मन - ही - मन मानने लगा कि ' यह । अब मेरे अधीन हो गयी ' ॥ ३७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५५ ॥
षट्पञ्चाशः सर्गः सीताका श्रीरामके प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावणको फटकारना तथा रावणकी आज्ञासे राक्षसियोंका उन्हें
सा तथोक्ता तु वैदेही निर्भया शोककर्शिता ।
तृणमन्तरतः कृत्वा रावणं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥
रावणके ऐसा कहनेपर शोकसे कष्ट पाती हुई विदेह - राजकुमारी सीता बीचमें तिनकेकी ओट करके उस निशाचरसे निर्भय होकर बोलीं- ॥ १ ॥
राजा दशरथो नाम धर्मसेतुरिवाचलः ।
सत्यसंधः परिज्ञातो यस्य पुत्रः स राघवः ॥ २ ॥
रामो नाम स धर्मात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।
दीर्घबाहुर्विशालाक्षो दैवतं स पतिर्मम ॥ ३ ॥
' महाराज दशरथ धर्मके अचल सेतुके समान । अशोकवाटिकामें ले जाकर डराना थे । वे अपनी सत्यप्रतिज्ञताके लिये सर्वत्र विख्यात थे । उनके पुत्र जो रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे भी अपने धर्मात्मापनके लिये तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हैं, उनकी भुजाएँ लंबी और आँखें बड़ी - बड़ी हैं । वे ही मेरे आराध्य देवता और पति हैं ॥ २-३ ॥
इक्ष्वाकूणां कुले जातः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा यस्ते प्राणान् वधिष्यति ॥ ४ ॥
‘ उनका जन्म इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है । उनके कंधे सिंहके समान और तेज महान् है । वे अपने भाई लक्ष्मणके साथ आकर तेरे प्राणोंका विनाश कर डालेंगे ॥४ ॥
* ऐसा कहकर रावण देवी सीताको धोखा देना चाहता है । वास्तवमें ऐसे पापपूर्ण कृत्योंका समर्थन धर्मशास्त्रोंमें कहीं नहीं है । कुमारी कन्याका बलपूर्वक अपहरण शास्त्रोंमें राक्षसविवाह कहा गया है; किंतु वह भी निन्द्य ही माना गया है, यहाँ तो वह भी नहीं है । विवाहिता सती साध्वीका अपहरण घोर पाप माना गया है । इसी पापसे सोनेकी लङ्का मिट्टीमें मिल गयी और रावण दल - बल - कुल- परिवारसहित नष्ट हो गया ।