वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 701–710
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710
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अरण्यकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ६८ ९
प्रत्यक्षं यद्यहं तस्य त्वया वै धर्षिता बलात् ।
शयिता त्वं हतः संख्ये जनस्थाने यथा खरः ॥ ५ ॥
' यदि तू उनके सामने बलपूर्वक मेरा अपहरण करता तो अपने भाई खरकी तरह जनस्थानके युद्धस्थलमें ही मारा जाकर सदाके लिये सो जाता ॥ ५ ॥
य एते राक्षसाः प्रोक्ता घोररूपा महाबलाः ।
राघवे निर्विषाः सर्वे सुपर्णे पन्नगा यथा ॥ ६ ॥
' तूने जो इन घोर रूपधारी महाबली राक्षसोंकी चर्चा की है, श्रीरामके पास जाते ही इन सबका विष उतर जायगा; ठीक उसी तरह जैसे गरुड़के पास सारे सर्प विषके प्रभावसे रहित हो जाते हैं ॥ ६ ॥
तस्य ज्याविप्रमुक्तास्ते शराः काञ्चनभूषणाः ।
शरीरं विधमिष्यन्ति गङ्गाकूलमिवोर्मयः ॥ ७ ॥
' जैसे बढ़ी हुई गङ्गाकी लहरें अपने कगारोंको काट गिराती हैं, उसी प्रकार श्रीरामके धनुषकी डोरीसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण तेरे शरीरको छिन्न - भिन्न कर डालेंगे ॥ ७ ॥
असुरैर्वा सुरैर्वा त्वं यद्यवध्योऽसि रावण ।
उत्पाद्य सुमहद् वैरं जीवंस्तस्य न मोक्ष्यसे ॥ ८ ॥
' रावण! तू असुरों अथवा देवताओंसे यदि अवध्य है तो सम्भव है वे तुझे न मार सकें; किंतु भगवान् श्रीरामके साथ यह महान् वैर ठानकर तू किसी तरह जीवित नहीं छूट सकेगा ॥ ८ ॥
स ते जीवितशेषस्य राघवोऽन्तकरो बली ।
पशोर्युपगतस्येव जीवितं तव दुर्लभम् ॥ ९ ॥
' श्रीरघुनाथजी बड़े बलवान् हैं । वे तेरे शेष जीवनका अन्त कर डालेंगे । यूपमें बँधे हुए पशुकी भाँति तेरा जीवन दुर्लभ हो जायगा ॥९ ॥
यदि पश्येत् स रामस्त्वां रोषदीप्तेन चक्षुषा ।
रक्षस्त्वमद्य निर्दग्धो यथा रुद्रेण मन्मथः ॥ १० ॥
' राक्षस! यदि श्रीरामचन्द्रजी अपनी रोषभरी दृष्टिसे तुझे देख लें तो तू अभी उसी तरह जलकर खाक हो जायगा जैसे भगवान् शङ्करने कामदेवको भस्म किया था ॥ १० ॥
यश्चन्द्रं नभसो भूमौ पातयेन्नाशयेत वा ।
सागरं शोषयेद् वापि स सीतां मोचयेदिह ॥ ११ ॥
‘ जो चन्द्रमाको आकाशसे पृथ्वीपर गिराने या नष्ट करनेकी शक्ति रखते हैं अथवा जो समुद्रको भी सुखा सकते हैं, वे भगवान् श्रीराम यहाँ पहुँचकर सीताको भी छुड़ा सकते हैं ॥ ११ ॥
गतासुस्त्वं गतश्रीको गतसत्त्वो गतेन्द्रियः ।
लङ्का वैधव्यसंयुक्ता त्वत्कृतेन भविष्यति ॥ १२ ॥
' तू समझ ले कि तेरे प्राण अब चले गये । तेरी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी । तेरे बल और इन्द्रियोंका भी नाश हो गया तथा तेरे ही पापके कारण तेरी यह लङ्का भी अब विधवा हो जायगी ॥ १२ ॥
न ते पापमिदं कर्म सुखोदर्कं भविष्यति ।
याहं नीता विनाभावं पतिपाश्र्वात् त्वया बलात् ॥ १३ ॥
' तेरा यह पापकर्म तुझे भविष्यमें सुख नहीं भोगने देगा; क्योंकि तूने मुझे बलपूर्वक पतिके पाससे दूर हटाया है ॥ १३ ॥
स हि देवरसंयुक्तो मम भर्ता महाद्युतिः ।
निर्भयो वीर्यमाश्रित्य शून्ये वसति दण्डके ॥ १४ ॥
' मेरे स्वामी महान् तेजस्वी हैं और मेरे देवरके साथ अपने ही पराक्रमका भरोसा करके सूने दण्डकारण्यमें निर्भयतापूर्वक निवास करते हैं ॥१४ ॥
स ते वीर्यं बलं दर्पमुत्सेकं च तथाविधम् ।
अपनेष्यति गात्रेभ्यः शरवर्षेण संयुगे ॥ १५ ॥
' वे युद्धमें बाणोंकी वर्षा करके तेरे शरीरसे बल, पराक्रम, घमंड तथा ऐसे उच्छृङ्खल आचरणको भी निकाल बाहर करेंगे ॥ १५ ॥
यदा विनाशो भूतानां दृश्यते कालचोदितः ।
तदा कार्ये प्रमाद्यन्ति नराः कालवशं गताः ॥ १६ ॥
' जब कालकी प्रेरणासे प्राणियोंका विनाश निकट आता है, उस समय मृत्युके अधीन हुए जीव प्रत्येक कार्यमें प्रमाद करने लगते हैं ॥१६ ॥
मां प्रधृष्य स ते कालः प्राप्तोऽयं राक्षसाधम ।
आत्मनो राक्षसानां च वधायान्तःपुरस्य च ॥१७ ॥
' अधम निशाचर! मेरा अपहरण करनेके कारण तेरे लिये भी वही काल आ पहुँचा है । तेरे अपने लिये, सारे राक्षसोंके लिये तथा इस अन्तःपुरके लिये भी विनाशकी घड़ी निकट आ गयी है ॥ १७ ॥
न शक्या यज्ञमध्यस्था वेदिः स्रुग्भाण्डमण्डिता ।
द्विजातिमन्त्रसम्पूता चण्डालेनावमर्दितुम् ॥ १८ ॥
' यज्ञशालाके बीचकी वेदीपर, जो द्विजातियोंके मन्त्रद्वारा पवित्र की गयी होती है तथा जिसे स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञपात्र सुशोभित करते हैं, चाण्डाल अपना पैर नहीं रख सकता ॥ १८ ॥
तथाहं धर्मनित्यस्य धर्मपत्नी दृढव्रता ।
त्वया स्प्रष्टुं न शक्याहं राक्षसाधम पापिना ॥ १ ९ ॥
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६ ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' उसी प्रकार मैं नित्य धर्मपरायण भगवान् श्रीरामकी । धर्मपत्नी हूँ तथा दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य धर्मका पालन करती हूँ ( अतः यज्ञवेदीके समान हूँ ) और राक्षसाधम! तू महापापी है ( अतः चाण्डालके तुल्य है ); इसलिये मेरा स्पर्श नहीं कर सकता ॥ १ ९ ॥
क्रीडन्ती राजहंसेन पद्मषण्डेषु नित्यशः ।
हंसी सा तृणमध्यस्थं कथं द्रक्ष्येत मद्गुकम् ॥ २० ॥
' जो सदा कमलके समूहों में राजहंसके साथ क्रीड़ा करती है, वह हंसी तृणोंमें रहनेवाले जलकाककी ओर कैसे दृष्टिपात करेगी ॥ २० ॥
इदं शरीरं निःसंज्ञं बन्ध वा घातयस्व वा ।
नेदं शरीरं रक्ष्यं मे जीवितं वापि राक्षस ॥ २१ ॥
' राक्षस! तू इस संज्ञाशून्य जड शरीरको बाँधकर रख ले या काट डाल । मैं स्वयं ही इस शरीर और जीवनको नहीं रखना चाहती ॥ २१ ॥
न तु शक्यमपक्रोशं पृथिव्यां दातुमात्मनः ।
एवमुक्त्वा तु वैदेही क्रोधात् सुपरुषं वचः ॥ २२ ॥ ।
रावणं जानकी तत्र पुनर्नोवाच किंचन । ' मैं इस भूतलपर अपने लिये निन्दा या कलङ्क देनेवाला कोई कार्य नहीं कर सकती । ' रावणसे क्रोधपूर्वक यह अत्यन्त कठोर वचन कहकर विदेहकुमारी जानकी चुप हो गयीं; वे वहाँ फिर कुछ नहीं बोलीं ॥ २२३ ॥
सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं रोमहर्षणम् ॥ २३ ॥
प्रत्युवाच ततः सीतां भयसंदर्शनं वचः । सीताका वह कठोर वचन रोंगटे खड़े कर देनेवाला था । उसे सुनकर रावणने उनसे भय दिखानेवाली बात कही - ॥ २३३ ॥
शृणु मैथिलि मद्वाक्यं मासान् द्वादश भामिनि ॥ २४ ॥
कालेनानेन नाभ्येषि यदि मां चारुहासिनि ।
ततस्त्वां प्रातराशार्थं सूदाश्छेत्स्यन्ति लेशशः ॥ २५ ॥
' मनोहर हास्यवाली भामिनि! मिथिलेशकुमारी! मेरी बात सुन लो । मैं तुम्हें बारह महीनेका समय देता हूँ । इतने समयमें यदि तुम स्वेच्छापूर्वक मेरे पास नहीं आओगी तो मेरे रसोइये सबेरेका कलेवा तैयार करनेके लिये तुम्हारे शरीरके टुकड़े - टुकड़े कर डालेंगे ' ॥
इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणः शत्रुरावणः ।
राक्षसीश्च ततः क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥ २६ ॥
सीतासे ऐसी कठोर बात कहकर शत्रुओंको रुलानेवाला रावण कुपित हो राक्षसियोंसे इस प्रकार बोला- ॥ २६ ॥
शीघ्रमेव हि राक्षस्यो विरूपा घोरदर्शनाः ।
दर्पमस्यापनेष्यन्तु मांसशोणितभोजनाः ॥ २७ ॥
' अपने विकराल रूपके कारण भयङ्कर दिखायी देनेवाली तथा रक्त - मांसका आहार करनेवाली राक्षसियो! तुमलोग शीघ्र ही इस सीताका अहंकार दूर करो ' ॥ २७ ॥
वचनादेव तास्तस्य सुघोरा घोरदर्शनाः ।
कृतप्राञ्जलयो भूत्वा मैथिलीं पर्यवारयन् ॥ २८ ॥
रावणके इतना कहते ही वे भयंकर दिखायी देनेवाली अत्यन्त घोर राक्षसियाँ हाथ जोड़े मैथिलीको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं ॥ २८ ॥
स ताः प्रोवाच राजासौ रावणो घोरदर्शनाः ।
प्रचल्य चरणोत्कर्षैर्दारयन्निव मेदिनीम् ॥ २ ९ ॥
तब राजा रावण अपने पैरोंके धमाकेसे पृथ्वीको विदीर्ण करता हुआ - सा दो - चार पग चलकर उन भयानक राक्षसियोंसे बोला- ॥ २ ९ ॥
अशोकवनिकामध्ये मैथिली नीयतामिति ।
तत्रेयं रक्ष्यतां गूढं युष्माभिः परिवारिता ॥ ३० ॥
' निशाचरियो! तुमलोग मिथिलेशकुमारी सीताको अशोकवाटिकामें ले जाओ और चारों ओरसे घेरकर वहाँ गूढ़ भावसे इसकी रक्षा करती रहो ॥ ३० ॥
तत्रैनां तर्जनैर्घोरैः पुनः सान्त्वैश्च मैथिलीम् ।
आनयध्वं वशं सर्वा वन्यां गजवधूमिव ॥ ३१ ॥
' वहाँ पहले तो भयंकर गर्जन - तर्जन करके इसे डराना; फिर मीठे - मीठे वचनोंसे समझा - बुझाकर जंगलकी हथिनीकी भाँति इस मिथिलेशकुमारीको तुम सब लोग वशमें लानेकी चेष्टा करना ' ॥ ३१ ॥
इति प्रतिसमादिष्टा राक्षस्यो रावणेन ताः ।
अशोकवनिकां जग्मुर्मैथिलीं परिगृह्य तु ॥ ३२ ॥
रावणके इस प्रकार आदेश देनेपर वे राक्षसियाँ मैथिलीको साथ लेकर अशोकवाटिकामें चली गयीं ॥ सर्वकामफलैर्वृक्षैर्नानापुष्पफलैर्वृताम् 1 सर्वकालमदैश्चापि द्विजैः समुपसेविताम् ॥ ३३ ॥
वह वाटिका समस्त कामनाओंको फलरूपमें प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षों तथा भाँति - भाँति के फल - फूलवाले दूसरे - दूसरे वृक्षोंसे भी भरी थी तथा हर समय मदमत्त रहनेवाले पक्षी उसमें निवास करते थे ॥ ३३ ॥
सा तु शोकपरीताङ्गी मैथिली जनकात्मजा ।
राक्षसीवशमापन्ना व्याघ्रीणां हरिणी यथा ॥ ३४ ॥
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अरण्यकाण्डे परंतु वहाँ जानेपर मिथिलेशकुमारी जानकीके अङ्ग - अङ्गमें शोक व्याप्त हो गया । राक्षसियोंके वशमें पड़कर उनकी दशा बाघिनोंके बीचमें घिरी हुई हरिणीके समान हो गयी थी ॥ ३४ ॥
शोकेन महता ग्रस्ता मैथिली जनकात्मजा ।
न शर्म लभते भीरुः पाशबद्धा मृगी यथा ॥ ३५ ॥
महान् शोकसे ग्रस्त हुई मिथिलेशनन्दिनी जानकी जाल में फँसी हुई मृगीके समान भयभीत हो क्षणभरके लिये भी चैन नहीं पाती थीं ॥ ३५ ॥
प्रक्षिप्तः सर्गः ६ ९ १ | न विन्दते तत्र तु शर्म मैथिली विरूपनेत्राभिरतीव तर्जिता । पतिं स्मरन्ती दयितं विचेतनाभूद् भयशोकपीडिता ॥ ३६ ॥
विकराल रूप और नेत्रोंवाली राक्षसियोंकी अत्यन्त डाँट फटकार सुननेके कारण मिथिलेशकुमारी सीताको वहाँ शान्ति नहीं मिली । वे भय और शोकसे पीड़ित हो प्रियतम पति और देवरका स्मरण करती हुई अचेत-सी हो गयीं ॥ ३६ ॥।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५६ ॥
प्रक्षिप्तः सर्गः * ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवराज इन्द्रका निद्रासहित लङ्कामें जाकर सीताको दिव्य खीर अर्पित करना और उनसे विदा लेकर लौटना
प्रवेशितायां सीतायां लङ्कां प्रति पितामहः ।
तदा प्रोवाच देवेन्द्रं परितुष्टं शतक्रतुम् ॥ १ ॥
जब सीताका लङ्कामें प्रवेश हो गया, तब पितामह ब्रह्माजीने संतुष्ट हुए देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहा- ॥१ ॥
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय रक्षसामहिताय च ।
लङ्कां प्रवेशिता सीता रावणेन दुरात्मना ॥ २ ॥
' देवराज! तीनों लोकोंके हित और राक्षसोंके विनाशके लिये दुरात्मा रावणने सीताको लङ्कामें पहुँचा दिया ॥२ ॥
पतिव्रता महाभागा नित्यं चैव सुखैधिता ।
अपश्यन्ती च भर्तारं पश्यन्ती राक्षसीजनम् ॥ ३ ॥
राक्षसीभिः परिवृता भर्तृदर्शनलालसा । ‘ पतिव्रता महाभागा जानकी सदा सुखमें ही पली हैं । इस समय वे अपने पतिके दर्शनसे वंचित हो गयी हैं और राक्षसियोंसे घिरी रहनेके कारण सदा उन्हींको अपने सामने देखती हैं । उनके हृदयमें अपने पतिके दर्शनकी तीव्र लालसा बनी हुई है ॥ ३३ ॥
निविष्टा हि पुरी लङ्का तीरे नदनदीपतेः ॥ ४ ॥
कथं ज्ञास्यति तां रामस्तत्रस्थां तामनिन्दिताम् । ' लङ्कापुरी समुद्रके तटपर बसी हुई है । वहाँ रहती हुई सती - साध्वी सीताका पता श्रीरामचन्द्रजीको कैसे लगेगा ॥ ४३ ॥
दुःखं संचिन्तयन्ती सा बहुशः परिदुर्लभा ॥ ५ ॥
प्राणयात्रामकुर्वाणा प्राणांस्त्यक्ष्यत्यसंशयम् ।
स भूयः संशयो जातः सीतायाः प्राणसंक्षये ॥ ६ ॥
' सीता दुःखके साथ नाना प्रकारकी चिन्ताओंमें डूबी रहती हैं । पतिके लिये इस समय वे अत्यन्त दुर्लभ हो गयी हैं । प्राणयात्रा ( भोजन ) नहीं करती हैं; अतः ऐसी दशामें निःसंदेह वे अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगी । सीताके प्राणोंका क्षय हो जानेपर हमारे उद्देश्यकी सिद्धिमें पुनः पूर्ववत् संदेह उपस्थित हो जायगा ॥ ५-६ ॥
स त्वं शीघ्रमितो गत्वा सीतां पश्य शुभाननाम् ।
प्रविश्य नगरीं लङ्कां प्रयच्छ हविरुत्तमम् ॥७ ॥
' अतः तुम शीघ्र ही यहाँसे जाकर लङ्कापुरीमें प्रवेश करके सुमुखी सीतासे मिलो और उन्हें उत्तम हविष्य प्रदान करो'॥७ ॥
एवमुक्तोऽथ देवेन्द्रः पुरीं रावणपालिताम् ।
आगच्छन्निद्रया सार्धं भगवान् पाकशासनः ॥८ ॥
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर पाकशासन भगवान् * * यह सर्ग प्रसंगके अनुकूल और उत्तम है । कुछ प्रतियोंमें यह सानुवाद प्रकाशित भी है, परंतु इसपर तिलक आदि संस्कृत टीकाएँ नहीं उपलब्ध होती हैं; इसलिये कुछ लोगोंने इसे प्रक्षिप्त माना है । उपयोगी होनेके कारण इसे भी यहाँ सानुवाद प्रकाशित किया जाता है ।
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६ ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
इन्द्र निद्राको साथ लेकर रावणद्वारा पालित लङ्कापुरीमें ।
आये ॥ ८ ॥
निद्रां चोवाच गच्छ त्वं राक्षसान् सम्प्रमोहय ।
सा तथोक्ता मघवता देवी परमहर्षिता ॥ ९ ॥
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं प्रामोहयत राक्षसान् । वहाँ आकर इन्द्रने निद्रासे कहा- ' तुम राक्षसोंको मोहित करो । ' इन्द्रसे ऐसी आज्ञा पाकर देवी निद्रा बहुत प्रसन्न हुईं । देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उन्होंने राक्षसोंको मोह ( निद्रा ) में डाल दिया ॥ ९ ३ ॥ एतस्मिन्नन्तरे देवः सहस्राक्षः शचीपतिः ॥ १० ॥
आससाद वनस्थां तां वचनं चेदमब्रवीत् । इसी बीचमें सहस्र नेत्रधारी शचीपति देवराज इन्द्र अशोकवाटिकामें बैठी हुई सीताके पास गये और इस प्रकार बोले -॥१०३ ॥
देवराजोऽस्मि भद्रं ते इह चास्मि शुचिस्मिते ॥ ११ ॥
अहं त्वां कार्यसिद्ध्यर्थं राघवस्य महात्मनः ।
साहाय्यं कल्पयिष्यामि मा शुचो जनकात्मजे ॥ १२ ॥
' पवित्र मुसकानवाली देवि! आपका भला हो । मैं देवराज इन्द्र यहाँ आपके पास आया हूँ । जनककिशोरी! मैं. आपके उद्धारकार्यकी सिद्धिके लिये महात्मा श्रीरघुनाथजीकी सहायता करूँगा, अतः आप शोक न करें ॥ ११-१२ ॥
मत्प्रसादात् समुद्रं स तरिष्यति बलैः सह ।
मयैवेह च राक्षस्यो मायया मोहिताः शुभे ॥ १३ ॥
' वे मेरे प्रसादसे बड़ी भारी सेनाके साथ समुद्रको पार करेंगे । शुभे! मैंने ही यहाँ इन राक्षसियोंको अपनी मायासे मोहित किया है ॥ १३ ॥
तस्मादन्नमिदं सीते हविष्यान्नमहं स्वयम् ।
स त्वां संगृह्य वैदेहि आगतः सह निद्रया ॥ १४ ॥
' विदेहनन्दिनी सीते! इसलिये मैं स्वयं ही यह भोजन — यह हविष्यान्न लेकर निद्राके साथ तुम्हारे पास आया हूँ ॥१४ ॥
एतदत्स्यसि मद्धस्तान्न त्वां बाधिष्यते शुभे ।
क्षुधा तृषा च रम्भोरु वर्षाणामयुतैरपि ॥ १५ ॥
‘ शुभे! रम्भोरु! यदि मेरे हाथसे इस हविष्यको लेकर खा लोगी तो तुम्हें हजारों वर्षोंतक भूख और प्यास नहीं सतायेगी ' ॥ १५ ॥
एवमुक्ता तु देवेन्द्रमुवाच परिशङ्किता ।
कथं जानामि देवेन्द्रं त्वामिहस्थं शचीपतिम् ॥ १६ ॥
देवराजके ऐसा कहनेपर शङ्कित हुई सीताने उनसे कहा - ' मुझे कैसे विश्वास हो कि आप शचीपति देवराज इन्द्र ही यहाँ पधारे हैं? ॥ १६ ॥
देवलिङ्गानि दृष्टानि रामलक्ष्मणसंनिधौ ।
तानि दर्शय देवेन्द्र यदि त्वं देवराट् स्वयम् ॥१७ ॥
' देवेन्द्र! मैंने श्रीराम और लक्ष्मणके समीप देवताओंके लक्षण अपनी आँखों देखे हैं । यदि आप साक्षात् देवराज हैं तो उन लक्षणोंको दिखाइये ' ॥ १७ ॥
सीताया वचनं श्रुत्वा तथा चक्रे शचीपतिः ।
पृथिवीं नास्पृशत् पद्भ्यामनिमेषेक्षणानि च ॥ १८ ॥
अरजोऽम्बरधारी च नम्लानकुसुमस्तथा ।
तं ज्ञात्वा लक्षणैः सीता वासवं परिहर्षिता ॥ १ ९ ॥
सीताकी यह बात सुनकर शचीपति इन्द्रने वैसा ही किया । उन्होंने अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श नहीं किया - आकाशमें निराधार खड़े रहे । उनकी आँखोंकी पलकें नहीं गिरती थीं । उन्होंने जो वस्त्र धारण किया था, उसपर धूलका स्पर्श नहीं होता था । उनके कण्ठमें जो पुष्पमाला थी, उसके पुष्प कुम्हलाते नहीं थे । देवोचित लक्षणोंसे इन्द्रको पहचानकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं ॥ १८-१९ ॥
उवाच वाक्यं रुदती भगवन् राघवं प्रति ।
सह भ्रात्रा महाबाहुर्दिष्ट्या मे श्रुतिमागतः ॥ २० ॥
वे भगवान् श्रीरामके लिये रोती हुई बोलीं-' भगवन्! सौभाग्यकी बात है कि आज भाईसहित महाबाहु श्रीरामका नाम मेरे कानोंमें पड़ा है ॥ २० ॥
यथा मे श्वशुरो राजा यथा च मिथिलाधिपः ।
तथा त्वामद्य पश्यामि सनाथो मे पतिस्त्वया ॥ २१ ॥
' मेरे लिये जैसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथ तथा पिता मिथिलानरेश जनक हैं, उसी रूपमें मैं आज आपको देखती हूँ । मेरे पति आपके द्वारा सनाथ हैं ॥ २१ ॥
तवाज्ञया च देवेन्द्र पयोभूतमिदं हविः ।
अशिष्यामि त्वया दत्तं रघूणां कुलवर्धनम् ॥ २२ ॥
‘ देवेन्द्र! आपकी आज्ञासे मैं यह पायसरूप हविष्य
( दूधकी बनी हुई खीर ), जिसे आपने दिया है, खाऊँगी ।
यह रघुकुलकी वृद्धि करनेवाला हो ' ॥ २२ ॥
इन्द्रहस्ताद् गृहीत्वा तत् पायसं सा शुचिस्मिता ।
न्यवेदयत भर्त्रे सा लक्ष्मणाय च मैथिली ॥ २३ ॥
इन्द्रके हाथसे उस खीरको लेकर उन पवित्र मुसकानवाली मैथिलीने मन - ही - मन पहले उसे अपने स्वामी श्रीराम और देवर लक्ष्मणको निवेदन किया और । इस प्रकार कहा- ॥ २३ ॥
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अरण्यकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ६ ९ ३
यदि जीवति मे भर्ता सह भ्रात्रा महाबलः ।
इदमस्तु तयोर्भक्त्या तदाश्नात् पायसं स्वयम् ॥ २४ ॥
' यदि मेरे महाबली स्वामी अपने भाईके साथ जीवित हैं तो यह भक्तिभावसे उन दोनोंके लिये समर्पित है । ' इतना कहनेके पश्चात् उन्होंने स्वयं उस खीरको खाया ॥ २४ ॥
इतीव तत् प्राश्य हविर्वरानना जौ क्षुधादुःखसमुद्भवं च तम् । इन्द्रात् प्रवृत्तिम् उपलभ्य जानकी काकुत्स्थयोः प्रीतमना बभूव ॥ २५ ॥
इस प्रकार उस हविष्यको खाकर सुन्दर मुखवाली जानकीने भूख - प्यासके कष्टको त्याग दिया और इन्द्रके मुखसे श्रीराम तथा लक्ष्मणका समाचार पाकर वे जनकनन्दिनी मन - ही - मन बहुत प्रसन्न हुईं ॥२५ ॥
स चापि शक्रस्त्रिदिवालयं प्रीतो ययौ राघवकार्यसिद्धये । आमन्त्र्य सीतां स ततो महात्मा जगाम निद्रासहितः स्वमालयम् ॥ २६ ॥
तब निद्रासहित महात्मा देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हो सीतासे विदा लेकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये अपने निवासस्थान देवलोकको चले | गये ॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे प्रक्षिप्तः सर्गः ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें प्रक्षिप्त सर्ग पूरा हुआ ॥ सप्तपञ्चाशः सर्गः श्रीरामका लौटना, मार्ग में अपशकुन देखकर चिन्तित होना तथा लक्ष्मणसे मिलनेपर उन्हें उलाहना दे सीतापर सङ्कट आनेकी आशङ्का करना
राक्षसं मृगरूपेण चरन्तं कामरूपिणम् ।
निहत्य रामो मारीचं तूर्णं पथि न्यवर्तत ॥ १ ॥
इधर मृगरूपसे विचरते हुए उस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस मारीचका वध करके श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही आश्रमके मार्गपर लौटे ॥ १ ॥
तस्य संत्वरमाणस्य द्रष्टुकामस्य मैथिलीम् ।
क्रूरस्वनोऽथ गोमायुर्विननादास्य पृष्ठतः ॥ २ ॥
वे सीताको देखनेके लिये जल्दी - जल्दी पैर बढ़ाते हुए आ रहे थे । इतनेहीमें पीछेकी ओरसे एक सियारिन बड़े कठोर स्वरमें चीत्कार करने लगी ॥ २ ॥
स तस्य स्वरमाज्ञाय दारुणं रोमहर्षणम् ।
चिन्तयामास गोमायोः स्वरेण परिशङ्कितः ॥ ३ ॥
गीदड़ीके उस स्वरसे श्रीरामचन्द्रजीके मनमें कुछ शङ्का हुई । उसका स्वर बड़ा ही भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाला था । उसका अनुभव करके वे बड़ी चिन्तामें पड़ गये ॥३ ॥
अशुभं बत मन्येऽहं गोमायुर्वाश्यते यथा ।
स्वस्ति स्यादपि वैदेह्या राक्षसैर्भक्षणं विना ॥ ४ ॥
वे मन - ही - मन कहने लगे- ' यह सियारिन जैसी बोली बोल रही है, इससे तो मुझे मालूम हो रहा है कि कोई अशुभ घटना घटित हो गयी । क्या विदेहनन्दिनी सीता कुशलसे होंगी? उन्हें राक्षस तो नहीं खा गये? ।
मारीचेन तु विज्ञाय स्वरमालक्ष्य मामकम् ।
विक्रुष्टं मृगरूपेण लक्ष्मणः शृणुयाद् यदि ॥ ५ ॥
' मृगरूपधारी मारीचने जान - बूझकर मेरे स्वरका अनुसरण करते हुए जो आर्त - पुकार की थी, वह इसलिये कि शायद इसे लक्ष्मण सुन सकें ॥ ५ ॥
स सौमित्रिः स्वरं श्रुत्वा तां च हित्वाथ मैथिलीम् ।
तयैव प्रहितः क्षिप्रं मत्सकाशमिहैष्यति ॥ ६ ॥
' सुमित्रानन्दन लक्ष्मण वह स्वर सुनते ही सीताके ही भेजनेपर उसे अकेली छोड़कर तुरंत मेरे पास यहाँ पहुँचनेके लिये चल देंगे ॥६ ॥
राक्षसैः सहितैर्नूनं सीताया ईप्सितो वधः ।
काञ्चनश्च मृगो भूत्वा व्यपनीयाश्रमात्तु माम् ॥७ ॥
दूरं नीत्वाथ मारीचो राक्षसोऽभूच्छराहतः ।
हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति यद्वाक्यं व्याजहार ह ॥८ ॥
' राक्षसलोग तो सब - के - सब मिलकर सीताका वध अवश्य कर देना चाहते हैं । इसी उद्देश्यसे यह मारीच राक्षस सोनेका मृग बनकर मुझे आश्रमसे दूर हटा ले आया था और मेरे बाणोंसे आहत होनेपर जो उसने आर्तनाद करते हुए कहा था कि ' हा लक्ष्मण! मैं मारा गया ' इसमें भी उसका वही उद्देश्य छिपा था ॥ ७-८ ॥
अपि स्वस्ति भवेद् द्वाभ्यां रहिताभ्यां मया वने ।
। जनस्थाननिमित्तं हि कृतवैरोऽस्मि राक्षसैः॥९ ॥
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६ ९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' वनमें हम दोनों भाइयोंके आश्रमसे अलग हो । जानेपर क्या सीता सकुशल वहाँ रह सकेंगी? जनस्थानमें जो राक्षसोंका संहार हुआ है, उसके कारण सारे राक्षस मुझसे वैर बाँधे ही हुए हैं ॥ ९ ॥
निमित्तानि च घोराणि दृश्यन्तेऽद्य बहूनि च ।
इत्येवं चिन्तयन् रामः श्रुत्वा गोमायुनिःस्वनम् ॥ १० ॥
निवर्तमानस्त्वरितो जगामाश्रममात्मवान् । ' आज बहुत - से भयङ्कर अपशकुन भी दिखायी देते हैं । ' सियारिनकी बोली सुनकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए मनको वशमें रखनेवाले श्रीराम तुरंत लौटकर आश्रमकी ओर चले ॥ १०३ ॥
आत्मनश्चापनयनं मृगरूपेण रक्षसा ॥ ११ ॥
आजगाम जनस्थानं राघवः परिशङ्कितः । मृगरूपधारी राक्षसके द्वारा अपनेको आश्रमसे दूर हटानेकी घटनापर विचार करके श्रीरघुनाथजी शङ्कितहृदयसे जनस्थानको आये ॥ ११३ ॥
तं दीनमानसं दीनमासेदुर्मृगपक्षिणः ॥ १२ ॥
सव्यं कृत्वा महात्मानं घोरांश्च ससृजुः स्वरान् । उनका मन बहुत दुःखी था । वे दीन हो रहे थे । उसी अवस्थामें वनके मृग और पक्षी उन्हें बाँयें रखते हुए वहाँ आये और भयङ्कर स्वरमें अपनी बोली बोलने लगे ॥
तानि दृष्ट्वा निमित्तानि महाघोराणि राघवः ।
न्यवर्तताथ त्वरितो जवेनाश्रममात्मनः ॥ १३ ॥
उन महाभयङ्कर अपशकुनोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही बड़े वेगसे अपने आश्रमकी ओर लौटे ॥ १३ ॥
ततो लक्ष्मणमायान्तं ददर्श विगतप्रभम् ।
ततोऽविदूरे रामेण समीयाय स लक्ष्मणः ॥ १४ ॥
इतनेहीमें उन्हें लक्ष्मण आते दिखायी दिये । उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी । थोड़ी ही देरमें निकट आकर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजीसे मिले ॥ १४ ॥
विषण्णः सन् विषण्णेन दुःखितो दुःखभागिना ।
स जगर्हेऽथ तं भ्राता दृष्ट्वा लक्ष्मणमागतम् ॥ १५ ॥
विहाय सीतां विजने वने राक्षससेविते । दुःख और विषादमें डूबे हुए लक्ष्मणने दुःखी और विषादग्रस्त श्रीरामचन्द्रजीसे भेंट की । उस समय राक्षसोंसे सेवित निर्जन वनमें सीताको अकेली छोड़कर आये हुए लक्ष्मणको देख भाई श्रीरामने उनकी निन्दा की ॥ १५३ ॥
गृहीत्वा च करं सव्यं लक्ष्मणं रघुनन्दनः ॥ १६ ॥
उवाच मधुरोदर्कमिदं परुषमार्तवत् । लक्ष्मणका बायाँ हाथ पकड़कर रघुनन्दन आर्त-से हो गये और पहले कठोर तथा अन्तमें मधुर वाणीद्वारा इस प्रकार बोले - ॥ १६३ ॥
अहो लक्ष्मण ग ते कृतं यत् त्वं विहाय ताम् ॥ १७ ॥
सीतामिहागतः सौम्य कच्चित् स्वस्ति भवेदिति । ' अहो सौम्य लक्ष्मण! यह तुमने बहुत बुरा किया, जो सीताको अकेली छोड़कर यहाँ चले आये । क्या वहाँ सीता सकुशल होगी? ॥ १७३ ॥
न मेऽस्ति संशयो वीर सर्वथा जनकात्मजा ॥ १८ ॥
विनष्टा भक्षिता वापि राक्षसैर्वनचारिभिः । ' वीर! मुझे इस बातमें संदेह नहीं है कि वनमें विचरनेवाले राक्षसोंने जनककुमारी सीताको या तो सर्वथा नष्ट कर दिया होगा या वे उन्हें खा गये होंगे ॥ अशुभान्येव भूयिष्ठं यथा प्रादुर्भवन्ति मे ॥ १ ९ ॥
अपि लक्ष्मण सीताया: सामग्र्यं प्राप्नुयामहे ।
जीवन्त्याः पुरुषव्याघ्र सुताया जनकस्य वै ॥ २० ॥
' क्योंकि मेरे आस - पास बहुत - से अपशकुन हो रहे हैं । पुरुषसिंह लक्ष्मण! क्या हमलोग जीती - जागती हुई जनकदुलारी सीताको पूर्णतः स्वस्थ एवं सकुशल पा सकेंगे? ॥ १ ९ -२० ॥ यथा वै मृगसंघाश्च गोमायुश्चैव भैरवम् ।
वाश्यन्ते शकुनाश्चापि प्रदीप्तामभितो दिशम् ।
अपि स्वस्ति भवेत् तस्या राजपुत्र्या महाबल ॥ २१ ॥
' महाबली लक्ष्मण! ये मृगोंके झुंड ( दाहिनी ओरसे आकर ) जैसा अमङ्गल सूचित कर रहे हैं, ये गीदड़ जिस तरह भैरवनाद कर रहे हैं तथा जलती - सी प्रतीत होनेवाली सम्पूर्ण दिशाओंमें पक्षी जिस तरहकी बोली बोल रहे हैं - इन सबसे यही अनुमान होता है कि राजकुमारी सीता शायद ही कुशलसे हों ॥ २१ ॥
इदं हि रक्षो मृगसंनिकाशं प्रलोभ्य मां दूरमनुप्रयातम् । तं श्रमेण स राक्षसोऽभून्प्रियमाण एव ॥ २२ ॥
' यह राक्षस मृगके समान रूप धारण करके मुझे लुभाकर दूर चला आया था । महान् परिश्रम करके जब मैंने इसे किसी तरह मारा, तब यह मरते ही राक्षस हो गया ॥ मनश्च मे दीनमिहाप्रहृष्टं चक्षुश्च सव्यं कुरुते विकारम् । असंशयं लक्ष्मण नास्ति सीता हृता मृता वा पथि वर्तते वा ॥ २३ ॥
' लक्ष्मण! अतः मेरा मन अत्यन्त दीन और
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अरण्यकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः ६ ९ ५ अप्रसन्न हो रहा है । मेरी बायीं आँख फड़क रही है, | उसे कोई हर ले गया, वह मारी गयी अथवा ( किसी इससे जान पड़ता है, नि: संदेह आश्रमपर सीता नहीं है । राक्षसके साथ ) मार्गमें होगी ' ॥२३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
अष्टपञ्चाशः सर्गः मार्गमें अनेक प्रकारकी आशङ्का करते हुए लक्ष्मणसहित श्रीरामका आश्रममें आना और वहाँ सीताको न पाकर व्यथित होना
स दृष्ट्वा लक्ष्मणं दीनं शून्यं दशरथात्मजः ।
पर्यपृच्छत धर्मात्मा वैदेहीमागतं विना ॥ १ ॥ ।
लक्ष्मणको दीन, संतोषशून्य तथा सीताको साथ लिये बिना आया देख धर्मात्मा दशरथनन्दन श्रीरामने पूछा —॥१ ॥
प्रस्थितं दण्डकारण्यं या मामनुजगाम ह ।
क्व सा लक्ष्मण वैदेही यां हित्वा त्वमिहागतः ॥ २ ॥
' लक्ष्मण! जो दण्डकारण्यकी ओर प्रस्थित होनेपर अयोध्यासे मेरे पीछे - पीछे चली आयी तथा जिसे तुम अकेली छोड़कर यहाँ आ गये, वह विदेहराजकुमारी सीता इस समय कहाँ है? ॥ २ ॥
राज्यभ्रष्टस्य दीनस्य दण्डकान् परिधावतः ।
क्व सा दुःखसहाया मे वैदेही तनुमध्यमा ॥ ३ ॥
' मैं राज्यसे भ्रष्ट और दीन होकर दण्डकारण्यमें चक्कर लगा रहा हूँ । इस दुःखमें जो मेरी सहायिका हुई, वह तनुमध्यमा ( सूक्ष्मकटिप्रदेशवाली ) विदेहराजकुमारी कहाँ है? ॥३ ॥
यां विना नोत्सहे वीर मुहूर्तमपि जीवितुम् ।
क्व सा प्राणसहाया मे सीता सुरसुतोपमा ॥ ४ ॥
' वीर! जिसके बिना मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता तथा जो मेरे प्राणोंकी सहचरी है, वह देवकन्याके समान सुन्दरी सीता इस समय कहाँ है? ॥
पतित्वममराणां हि पृथिव्याश्चापि लक्ष्मण ।
विना तां तपनीयाभां नेच्छेयं जनकात्मजाम् ॥ ५ ॥
' लक्ष्मण! तपाये हुए सोनेके समान कान्तिवाली जनकनन्दिनी सीताके बिना मैं पृथ्वीका राज्य और देवताओंका आधिपत्य भी नहीं चाहता ॥ ५ ॥
कच्चिज्जीवति वैदेही प्राणैः प्रियतरा मम ।
कच्चित् प्रव्राजनं वीर न मे मिथ्या भविष्यति ॥ ६ ॥
' वीर! जो मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है, वह विदेहराजकुमारी सीता क्या अब जीवित होगी? मेरा वनमें आना सीताको खो देनेके कारण व्यर्थ तो नहीं हो जायगा? ॥६ ॥
सीतानिमित्तं सौमित्रे मृते मयि गते त्वयि ।
कच्चित् सकामा कैकेयी सुखिता सा भविष्यति ॥ ७ ॥
' सुमित्रानन्दन! सीताके नष्ट हो जानेके कारण जब मैं मर जाऊँगा और तुम अकेले ही अयोध्याको लौटोगे, उस समय क्या माता कैकेयी सफलमनोरथ एवं सुखी होगी? ॥
सपुत्रराज्यां सिद्धार्थं मृतपुत्रा तपस्विनी ।
उपस्थास्यति कौसल्या कच्चित् सौम्येन कैकयीम् ॥ ८ ॥
' जिसका इकलौता पुत्र मैं मर जाऊँगा, वह तपस्विनी माता कौसल्या क्या पुत्र और राज्यसे सम्पन्न तथा कृतकृत्य हुई कैकेयीकी सेवामें विनीतभावसे उपस्थित होगी? ॥ ८ ॥
यदि जीवति वैदेही गमिष्याम्याश्रमं पुनः ।
संवृत्ता यदि वृत्ता सा प्राणांस्त्यक्ष्यामि लक्ष्मण ॥ ९ ॥
' लक्ष्मण! यदि विदेहनन्दिनी सीता जीवित होगी, तभी मैं फिर आश्रममें पैर रखूँगा । यदि सदाचार-परायणा मैथिली मर गयी होगी तो मैं भी प्राणोंका परित्याग कर दूँगा ॥ ९ ॥
यदि मामाश्रमगतं वैदेही नाभिभाषते ।
पुरः प्रहसिता सीता विनशिष्यामि लक्ष्मण ॥ १० ॥
' लक्ष्मण! यदि आश्रममें जानेपर विदेहराजकुमारी सीता हँसते हुए मुखसे सामने आकर मुझसे बात नहीं करेगी तो मैं जीवित नहीं रहूँगा ॥ १० ॥
ब्रूहि लक्ष्मण वैदेही यदि जीवति वा न वा ।
त्वयि प्रमत्ते रक्षोभिर्भक्षिता वा तपस्विनी ॥११ ॥
' लक्ष्मण! बोलो तो सही! वैदेही जीवित है या नहीं? तुम्हारे असावधान होनेके कारण राक्षस उस तपस्विनीको खा तो नहीं गये? ॥११ ॥
सुकुमारी च बाला च नित्यं चादुःखभागिनी ।
। मद्वियोगेन वैदेही व्यक्तं शोचति दुर्मनाः ॥१२ ॥
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६ ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' जो सुकुमारी है, बाला ( भोली - भाली ) है तथा जिसने वनवासके पहले दुःखका अनुभव नहीं किया था, वह वैदेही आज मेरे वियोगसे व्यथित - चित्त होकर अवश्य ही शोक कर रही होगी ॥ १२ ॥
सर्वथा रक्षसा तेन जिह्येन सुदुरात्मना ।
वदता लक्ष्मणेत्युच्चैस्तवापि जनितं भयम् ॥ १३ ॥
' उस कुटिल एवं दुरात्मा राक्षसने उच्च स्वरसे ' हा लक्ष्मण! ' ऐसा पुकारकर तुम्हारे मनमें भी सर्वथा भय उत्पन्न कर दिया ॥ १३ ॥
श्रुतश्च मन्ये वैदेह्या स स्वरः सदृशो मम ।
त्रस्तया प्रेषितस्त्वं च द्रष्टुं मां शीघ्रमागतः ॥ १४ ॥
' जान पड़ता है, वैदेहीने भी मेरे स्वरसे मिलता -जुलता उस राक्षसका स्वर सुन लिया और भयभीत होकर तुम्हें भेज दिया और तुम भी शीघ्र ही मुझे देखनेके लिये चले आये ॥ १४ ॥
सर्वथा तु कृतं कष्टं सीतामुत्सृजता वने ।
प्रतिकर्तुं नृशंसानां रक्षसां दत्तमन्तरम् ॥ १५ ॥
' जो भी हो - तुमने वनमें सीताको अकेली छोड़कर सर्वथा दुःखद कार्य कर डाला । क्रूर कर्म करनेवाले राक्षसोंको बदला लेनेका अवसर दे दिया ॥ १५ ॥
दुःखिताः खरघातेन राक्षसाः पिशिताशनाः ।
तैः सीता निहता घोरैर्भविष्यति न संशयः ॥ १६ ॥
' मांसभक्षी निशाचर मेरे हाथों खरके मारे जानेसे बहुत दु: खी थे । उन घोर राक्षसोंने सीताको मार डाला होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १६ ॥
अहोऽस्मि व्यसने मग्नः सर्वथा रिपुनाशन ।
किं त्विदानीं करिष्यामि शङ्के प्राप्तव्यमीदृशम् ॥ १७ ॥
' शत्रुनाशन! मैं सर्वथा संकटके समुद्रमें डूब गया हूँ । ऐसे दुःखका पड़ेगा - ऐसी शङ्का हो करूँ? ' ॥ १७ ॥
इति सीतां वरारोहां आजगाम जनस्थानं इस प्रकार सुन्दरी हुए ही लक्ष्मणसहित आये ॥ १८ ॥
अवश्य ही अनुभव रही है । अतः अब मैं क्या
चिन्तयन्नेव राघवः ।
त्वरया सहलक्ष्मणः ॥ १८ ॥
सीताके विषयमें चिन्ता करते श्रीरघुनाथजी तुरंत जनस्थानमें विगर्हमाणोऽनुजमार्तरूपं क्षुधाश्रमेणैव पिपासया च । विनिःश्वसन् शुष्कमुखो विषण्णः प्रतिश्रयं प्राप्य समीक्ष्य शून्यम् ॥ १ ९ ॥ अपने दुःखी अनुज लक्ष्मणको कोसते एवं भूख-प्यास तथा परिश्रमसे लंबी साँस खींचते हुए सूखे मुँहवाले श्रीरामचन्द्रजी आश्रमके निकटवर्ती स्थानपर आकर उसे सूना देख विषादमें डूब गये ॥ १ ९ ॥ स्वमाश्रमं स प्रविगाह्य वीरो विहारदेशाननुसृत्य कांश्चित् । एतत्तदित्येव निवासभूमौ प्रहृष्टरोमा व्यथितो बभूव ॥ २० ॥
वीर श्रीराम आश्रममें प्रवेश करके उसे भी सूना देख कुछ ऐसे स्थलोंमें अनुसंधान किया, जो सीताके विहारस्थान थे । उन्हें भी सूना पाकर उस क्रीड़ाभूमिमें यही वह स्थान है, जहाँ मैंने अमुक प्रकारकी क्रीड़ा की थी, ऐसा स्मरण करके उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया । और वे व्यथासे पीड़ित हो गये ॥ २० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५८ ॥
एकोनषष्टितमः सर्गः श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत
अथाश्रमादुपावृत्तमन्तरा रघुनन्दनः ।
परिपप्रच्छ सौमित्रिं रामो दुःखादिदं वचः ॥ १ ॥
( आश्रममें आनेसे पहले मार्गमें श्रीराम और लक्ष्मणने परस्पर जो बातें की थीं, उन्हें पुनः विस्तारके साथ बता रहे हैं ) सीताके कथनानुसार आश्रमसे अपने पास आये हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे मार्गमें भी रघुकुलनन्दन श्रीरामने बड़े दुःखसे यह बात पूछी - ॥ १ ॥
तमुवाच किमर्थं त्वमागतोऽपास्य मैथिलीम् ।
यदा सा तव विश्वासाद् वने विरहिता मया ॥ २ ॥
' लक्ष्मण! जब मैंने तुम्हारे विश्वासपर ही वनमें सीताको छोड़ा था, तब तुम उसे अकेली छोड़कर क्यों चले आये? ॥२ ॥
दृष्ट्वैवाभ्यागतं त्वां मे मैथिलीं त्यज्य लक्ष्मण ।
शङ्कमानं महत् पापं यत्सत्यं व्यथितं मनः ॥ ३ ॥
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अरण्यकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ६ ९ ७ ‘ लक्ष्मण! मिथिलेशकुमारीको छोड़कर तुम जो । मेरे पास आये हो, तुम्हें देखते ही जिस महान् अनिष्टकी आशङ्का करके मेरा मन व्यथित हो रहा था, वह सत्य जान पड़ने लगा है ॥ ३ ॥
स्फुरते नयनं सव्यं बाहुश्च हृदयं च मे ।
दृष्ट्वा लक्ष्मण दूरे त्वां सीताविरहितं पथि ॥ ४ ॥
' लक्ष्मण! मेरी बायीं आँख और बायीं भुजा फड़क रही है । तुम्हें आश्रमसे दूर सीताके बिना ही मार्गपर आते देख मेरा हृदय भी धक - धक कर रहा है! ॥४ ॥
एवमुक्तस्तु सौमित्रिर्लक्ष्मणः शुभलक्षणः ।
भूयो दुःखसमाविष्टो दुःखितं राममब्रवीत् ॥ ५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण अत्यन्त दुःखी होकर अपने शोकग्रस्त भाई श्रीरामसे बोले - ॥ ५ ॥
न स्वयं कामकारेण तां त्यक्त्वाहमिहागतः ।
प्रचोदितस्तयैवोग्रैस्त्वत्सकाशमिहागतः ॥ ६ ॥
' भैया! मैं स्वयं अपनी इच्छासे उन्हें छोड़कर नहीं आया हूँ । उन्हींके कठोर वचनोंसे प्रेरित होकर मुझे आपके पास आना पड़ा है ॥६ ॥
आर्येणेव परिकुष्टं लक्ष्मणेति सुविस्वरम् ।
परित्राहीति यद्वाक्यं मैथिल्यास्तच्छुतिं गतम् ॥ ७ ॥
' आपके ही समान स्वरमें किसने जोरसे पुकारा, ' लक्ष्मण! मुझे बचाओ । ' यह वाक्य मिथिलेशकुमारीके कानोंमें भी पड़ा ॥ ७ ॥
सा तमार्तस्वरं श्रुत्वा तव स्नेहेन मैथिली ।
गच्छ गच्छेति मामाशु रुदती भयविक्लवा ॥ ८ ॥
‘ उस आर्तनादको सुनकर मैथिली आपके प्रति स्नेहके कारण भयसे व्याकुल हो गयीं और रोती हुई मुझसे तुरंत बोलीं- ' जाओ, जाओ'॥८ ॥
प्रचोद्यमानेन मया गच्छेति बहुशस्तया ।
प्रत्युक्ता मैथिली वाक्यमिदं तत् प्रत्ययान्वितम् ॥ ९ ॥
‘ जब बारंबार उन्होंने ' जाओ ' कहकर मुझे प्रेरित किया, तब उन्हें विश्वास दिलाते हुए मैंने मैथिलीसे यह बात कही - ॥९ ॥
न तत् पश्याम्यहं रक्षो यदस्य भयमावहेत् ।
निर्वृता भव नास्त्येतत् केनाप्येतदुदाहृतम् ॥ १० ॥
' देवि! मैं ऐसे किसी राक्षसको नहीं देखता, जो भगवान् श्रीरामको भी भयमें डाल सके । आप शान्त रहें, यह भैयाकी आवाज नहीं है । किसी दूसरेने इस तरहकी पुकार की है ॥ १० ॥
विगर्हितं च नीचं च कथमार्योऽभिधास्यति ।
त्राहीति वचनं सीते यस्त्रायेत् त्रिदशानपि ॥ ११ ॥
' सीते! जो देवताओंकी भी रक्षा कर सकते हैं, वे मेरे बड़े भाई ' मुझे बचाओ ' ऐसा निन्दित ( कायरतापूर्ण ) वचन कैसे कहेंगे? ॥। ११ ॥
किंनिमित्तं तु केनापि भ्रातुरालम्ब्य मे स्वरम् ।
विस्वरं व्याहृतं वाक्यं लक्ष्मण त्राहि मामिति ॥ १२ ॥
' किसी दूसरेने किसी बुरे उद्देश्यसे मेरे भैयाके स्वरकी नकल करके ‘ लक्ष्मण! मुझे बचाओ ' यह बात जोरसे कही है ॥ १२ ॥
राक्षसेनेरितं वाक्यं त्रासात् त्राहीति शोभने ।
न भवत्या व्यथा कार्या कुनारीजनसेविता ॥ १३ ॥
' शोभने! उस राक्षसने ही भयके कारण ( मुझे बचाओ ) यह बात मुँहसे निकाली है । आपको व्यथित नहीं होना चाहिये । ऐसी व्यथाको नीच श्रेणीकी स्त्रियाँ ही अपने मनमें स्थान देती हैं ॥ १३ ॥
अलं विक्लवतां गन्तुं स्वस्था भव निरुत्सुका ।
न चास्ति त्रिषु लोकेषु पुमान् यो राघवं रणे ॥ १४ ॥
जातो वा जायमानो वा संयुगे यः पराजयेत् ।
अजेयो राघवो युद्धे देवैः शक्रपुरोगमैः ॥ १५ ॥
' तुम व्याकुल मत होओ, स्वस्थ हो जाओ, चिन्ता छोड़ो । तीनों लोकोंमें ऐसा कोई पुरुष न तो उत्पन्न हुआ है, न हो रहा है और न होगा ही, जो युद्धमें श्रीरघुनाथजीको परास्त कर सके । संग्राममें इन्द्र आदि देवता भी श्रीरामको नहीं जीत सकते ' ॥ १४-१५ ॥
एवमुक्ता तु वैदेही परिमोहितचेतना ।
उवाचाश्रूणि मुञ्चन्ती दारुणं मामिदं वचः ॥ १६ ॥
मेरे ऐसा कहनेपर विदेहराजकुमारीकी चेतना । मोहसे आच्छन्न हो गयी । वे आँसू बहाती हुई मुझसे अत्यन्त कठोर वचन बोलीं- ॥ १६ ॥
भावो मयि तवात्यर्थं पाप एव निवेशितः ।
विनष्टे भ्रातरि प्राप्तुं न च त्वं मामवाप्स्यसे ॥ १७ ॥
' लक्ष्मण! तेरे मनमें मेरे लिये अत्यन्त पापपूर्ण भाव भरा है । तू अपने भाईके मरनेपर मुझे प्राप्त करना चाहता है, परंतु मुझे पा नहीं सकेगा ॥ १७ ॥
संकेताद् भरतेन त्वं रामं समनुगच्छसि ।
क्रोशन्तं हि यथात्यर्थं नैनमभ्यवपद्यसे ॥ १८ ॥
' तू भरतके इशारेसे अपने स्वार्थके लिये श्रीरामचन्द्रजीके पीछे - पीछे आया है । तभी तो वे जोर-जोरसे चिल्ला रहे हैं और तू उनके पास जातातक नहीं है ॥
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६ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
रिपुः प्रच्छन्नचारी त्वं मदर्थमनुगच्छसि ।
राघवस्यान्तरं प्रेप्सुस्तथैनं नाभिपद्यसे ॥ १ ९ ॥
' तू अपने भाईका छिपा हुआ शत्रु है । मेरे लिये ही श्रीरामका अनुसरण करता है और श्रीरामके छिद्र ढूँढ़ रहा है तभी तो संकटके समय उनके पास जानेका नाम नहीं लेता है ' ॥ १ ९ ॥
एवमुक्तस्तु वैदेह्या संरब्धो रक्तलोचनः ।
क्रोधात् प्रस्फुरमाणोष्ठ आश्रमादभिनिर्गतः ॥ २० ॥
' विदेहकुमारीके ऐसा कहनेपर मैं रोषसे भर गया । मेरी आँखें लाल हो गयीं और क्रोधसे मेरे होंठ फड़कने लगे । इस अवस्थामें मैं आश्रमसे निकल आया ' ॥ २० ॥
एवं ब्रुवाणं सौमित्रिं रामः संतापमोहितः ।
अब्रवीद् दुष्कृतं सौम्य तां विना त्वमिहागतः ॥ २१ ॥
लक्ष्मणकी ऐसी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी संतापसे मोहित हो गये और उनसे बोले - ' सौम्य! तुमने बड़ा बुरा किया, जो तुम सीताको छोड़कर यहाँ चले आये ॥ २१ ॥
जानन्नपि समर्थं मां रक्षसामपवारणे ।
अनेन क्रोधवाक्येन मैथिल्या निर्गतो भवान् ॥ २२ ॥
' मैं राक्षसोंका निवारण करनेमें समर्थ हूँ, यह जानते हुए भी तुम मैथिलीके क्रोधयुक्त वचनसे उत्तेजित होकर निकल पड़े ॥२२ ॥
नहि ते परितुष्यामि त्यक्त्वा यदसि मैथिलीम् ।
क्रुद्धायाः परुषं श्रुत्वा स्त्रिया यत् त्वमिहागतः ॥ २३ ॥
' क्रोधमें भरी हुई नारीके कठोर वचनको सुनकर जो तुम मिथिलेशकुमारीको छोड़कर यहाँ चले आये, इससे मैं तुम्हारे ऊपर संतुष्ट नहीं हूँ ॥ २३ ॥
सर्वथा त्वपनीतं ते सीतया यत् प्रचोदितः ।
क्रोधस्य वशमागम्य नाकरोः शासनं मम ॥ २४ ॥
' सीतासे प्रेरित होकर क्रोधके वशीभूत हो तुमने मेरे आदेशका पालन नहीं किया; यह सर्वथा तुम्हारा अन्याय है ॥ २४ ॥
असौ हि राक्षसः शेते शरेणाभिहतो मया ।
मृगरूपेण येनाहमाश्रमादपवाहितः ॥ २५ ॥
' जिसने मृगरूप धारण करके मुझे आश्रमसे दूर हटा दिया, वह राक्षस मेरे बाणोंसे घायल होकर सदाके लिये सो रहा है ॥ २५ ॥
विकृष्य चापं परिधाय सायकं सलीलबाणेन च ताडितो मया । मार्गीं तनुं त्यज्य च विक्लवस्वरो बभूव केयूरधरः स राक्षसः ॥ २६ ॥
' धनुष खींचकर उस बाणका संधान करके मैंने लीलापूर्वक चलाये हुए बाणोंसे ज्यों ही उस मृगको मारा, त्यों ही वह मृगके शरीरका परित्याग करके बाँहोंमें बाजूबंद धारण करनेवाला राक्षस बन गया । उसके स्वरमें बड़ी व्याकुलता आ गयी थी ॥२६ ॥
शराहतेनैव तदाता गिरा स्वरं ममालम्ब्य सुदूरसुश्रवम् । उदाहृतं तद् वचनं सुदारुणं त्वमागतो येन विहाय मैथिलीम् ॥ २७ ॥
' बाणसे आहत होनेपर ही उसने आर्तवाणीमें मेरे स्वरकी नकल करके बहुत दूरतक सुनायी देनेवाला वह अत्यन्त दारुण वचन कहा था, जिससे तुम मिथिलेशकुमारी सीताको छोड़कर यहाँ चले आये हो ' ॥ २७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ९ ॥ षष्टितमः सर्गः श्रीरामका विलाप करते हुए वृक्षों और पशुओंसे सीताका पता पूछना, भ्रान्त होकर रोना और बारंबार उनकी खोज करना भृशमाव्रजमानस्य तस्याधो वामलोचनम् । उपालक्ष्य निमित्तानि सोऽशुभानि मुहुर्मुहुः । प्रास्फुरच्चास्खलद् रामो वेपथुश्चास्य जायते ॥ १ ॥ अपि क्षेमं तु सीताया इति वै व्याजहार ह ॥ २ ॥
आश्रमकी ओर आते समय श्रीरामकी बायीं बारंबार इन अपशकुनोंको देखकर वे कहने
आँखकी नीचेवाली पलक जोर - जोरसे फड़कने लगी । लगे - क्या सीता सकुशल होगी? ॥ २ ॥
श्रीराम चलते - चलते लड़खड़ा गये और उनके शरीरमें त्वरमाणो जगामाथ सीतादर्शनलालसः ।
कम्प होने लगा ॥ १ ॥ शून्यमावसथं दृष्ट्वा बभूवोद्विग्नमानसः ॥ ३ ॥