वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 711–720

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720

पृष्ठ 711

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अरण्यकाण्डे षष्टितमः सर्गः ६ ९९ सीताको देखनेके लिये उत्कण्ठित हो वे बड़ी । उतावलीके साथ आश्रमपर गये । वहाँ कुटिया सूनी देख उनका मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा ॥ ३ ॥

उद्भ्रमन्निव वेगेन विक्षिपन् रघुनन्दनः ।

तत्र तत्रोटजस्थानमभिवीक्ष्य समन्ततः ॥४ ॥ ।

ददर्श पर्णशालां च सीतया रहितां तदा ।

श्रिया विरहितां ध्वस्तां हेमन्ते पद्मिनीमिव ॥ ५ ॥

रघुनन्दन बड़े वेगसे इधर - उधर चक्कर लगाने और हाथ - पैर चलाने लगे । उन्होंने वहाँ जहाँ - तहाँ बनी हुई एक - एक पर्णशालाको चारों ओरसे देख डाला, किंतु उस समय उसे सीतासे सूनी ही पाया । जैसे हेमन्त ऋतुमें कमलिनी हिमसे ध्वस्त हो श्रीहीन हो जाती है, उसी प्रकार प्रत्येक पर्णशाला शोभाशून्य हो गयी थी॥४-५ ॥

रुदन्तमिव वृक्षैश्च ग्लानपुष्पमृगद्विजम् ।

श्रिया विहीनं विध्वस्तं संत्यक्तं वनदैवतैः ॥ ६ ॥

वह स्थान वृक्षों ( की सनसनाहट ) के द्वारा मानो रो रहा था, फूल मुरझा गये थे, मृग और पक्षी मन मारे बैठे थे । वहाँकी सम्पूर्ण शोभा नष्ट हो गयी थी । सारी कुटी उजाड़ दिखायी देती थी । वनके देवता भी उस स्थानको छोड़कर चले गये थे ॥६ ॥

विप्रकीर्णाजिनकुशं विप्रविद्धबृसीकटम् ।

दृष्ट्वा शून्योटजस्थानं विललाप पुनः पुनः ॥ ७ ॥

सब ओर मृगचर्म और कुश बिखरे हुए थे । चटाइयाँ अस्त - व्यस्त पड़ी थीं । पर्णशालाको सूनी देख भगवान् श्रीराम बारंबार विलाप करने लगे— ॥ ७ ॥

हृता मृता वा नष्टा वा भक्षिता वा भविष्यति निलीनाप्यथवा भीरुरथवा वनमाश्रिता ॥ ८ ॥

‘ हाय! सीताको किसीने हर तो नहीं लिया । उसकी मृत्यु तो नहीं हो गयी अथवा वह खो तो नहीं गयी या किसी राक्षसने उसे खा तो नहीं लिया । वह भीरु कहीं छिप तो नहीं गयी है अथवा फल - फूल लाने के लिये वनके भीतर तो नहीं चली गयी ॥८ ॥

गता विचेतुं पुष्पाणि फलान्यपि च वा पुनः ।

अथवा पद्मिनीं याता जलार्थं वा नदीं गता ॥ ९ ॥

' सम्भव है, फल - फूल लानेके लिये ही गयी हो या जल लानेके लिये किसी पुष्करिणी अथवा नदीके तटपर गयी हो ' ॥ ९ ॥

यत्नान्मृगयमाणस्तु नाससाद वने प्रियाम् ।

शोकरक्तेक्षणः श्रीमानुन्मत्त इव लक्ष्यते ॥ १० ॥

श्रीरामचन्द्रजीने प्रयत्नपूर्वक अपनी प्रिय पत्नी सीताको वनमें चारों ओर ढूँढा, किंतु कहीं भी उनका पता न लगा । शोकके कारण श्रीमान् रामकी आँखें लाल हो गयीं । वे उन्मत्तके समान दिखायी देने लगे ॥ १० ॥

वृक्षाद् वृक्षं प्रधावन् स गिरींश्चापि नदीनदम् ।

बभ्राम विलपन् रामः शोकपङ्कार्णवप्लुतः ॥ ११ ॥

एक वृक्षसे दूसरे वृक्षके पास दौड़ते हुए वे पर्वतों, नदियों और नदोंके किनारे घूमने लगे । शोकसे समुद्रमें डूबे हुए श्रीरामचन्द्रजी विलाप करते - करते वृक्षोंसे पूछने लगे - ॥ ११ ॥

अस्ति कच्चित्त्वया दृष्टा सा कदम्बप्रिया प्रिया ।

कदम्ब यदि जानीषे शंस सीतां शुभाननाम् ॥ १२ ॥

स्निग्धपल्लवसंकाशां पीतकौशेयवासिनीम् ।

शंसस्व यदि सा दृष्टा बिल्व बिल्वोपमस्तनी ॥ १३ ॥

‘ कदम्ब! मेरी प्रिया सीता तुम्हारे पुष्पसे बहुत प्रेम करती थी, क्या वह यहाँ है? क्या तुमने उसे देखा है? यदि जानते हो तो उस शुभानना सीताका पता बताओ । उसके अङ्ग सुस्निग्ध पल्लवोंके समान कोमल हैं तथा शरीरपर पीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा पाती है । बिल्व! मेरी प्रियाके स्तन तुम्हारे ही समान हैं । यदि तुमने उसे देखा हो तो बताओ ॥ १२-१३ ॥

अथवार्जुन शंस त्वं प्रियां तामर्जुनप्रियाम् ।

जनकस्य सुता तन्वी यदि जीवति वा न वा ॥ १४ ॥

' अथवा अर्जुन! तुम्हारे फूलोंपर मेरी प्रियाका विशेष अनुराग था, अतः तुम्हीं उसका कुछ समाचार बताओ । कृशाङ्गी जनककिशोरी जीवित है या नहीं ॥

ककुभः ककुभोरुं तां व्यक्तं जानाति मैथिलीम् ।

लतापल्लवपुष्पाढ्यो भाति ह्येष वनस्पतिः ॥ १५ ॥

भ्रमरैरुपगीतश्च यथा द्रुमवरो ह्यसि ।

एष व्यक्तं विजानाति तिलकस्तिलकप्रियाम् ॥ १६ ॥

' यह ककुभ * अपने ही समान ऊरुवाली मिथिलेशकुमारीको अवश्य जानता होगा; क्योंकि यह वनस्पति लता, पल्लव तथा फूलोंसे सम्पन्न हो बड़ी । शोभा पा रहा है । ककुभ! तुम सब वृक्षोंमें श्रेष्ठ हो, क्योंकि ये भ्रमर तुम्हारे समीप आकर अपने झंकारोंद्वारा तुम्हारा यशोगान करते हैं । ( तुम्हीं सीताका पता बताओ, * रामायणके व्याख्याकारोंमेंसे किसीने ककुभका अर्थ मरुवक लिखा है और किसीने अर्जुनविशेष, किंतु कोषोंमें यह कुटजका पर्याय बताया गया है ।

पृष्ठ 712

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७०० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अहो! यह भी कोई उत्तर नहीं दे रहा है । ) यह तिलक वृक्ष अवश्य सीताके विषयमें जानता होगा; क्योंकि मेरी प्रिया सीताको भी तिलकसे प्रेम था ॥ १५-१६ ॥

अशोक शोकापनुद शोकोपहतचेतनम् ।

त्वन्नामानं कुरु क्षिप्रं प्रियासंदर्शनेन माम् ॥ १७ ॥

' अशोक! तुम शोक दूर करनेवाले हो । इधर मैं शोकसे.अपनी चेतना खो बैठा हूँ । मुझे मेरी प्रियतमाका दर्शन कराकर शीघ्र ही अपने - जैसे नामवाला बना दो— मुझे अशोक ( शोकहीन ) कर दो ॥ १७ ॥

यदि ताल त्वया दृष्टा पक्वतालोपमस्तनी ।

कथयस्व वरारोहां कारुण्यं यदि ते मयि ॥ १८ ॥

' ताल वृक्ष! तुम्हारे पके हुए फलके समान स्तनवाली सीताको यदि तुमने देखा हो तो बताओ । यदि मुझपर तुम्हें दया आती हो तो उस सुन्दरीके विषयमें अवश्य कुछ कहो ॥ १८ ॥

यदि दृष्टा त्वया जम्बो जाम्बूनदसमप्रभा ।

प्रियां यदि विजानासि निःशङ्क कथयस्व मे ॥ १ ९ ॥

' जामुन! जाम्बूनद ( सुवर्ण ) के समान कान्तिवाली मेरी प्रिया यदि तुम्हारी दृष्टिमें पड़ी हो, यदि तुम उसके विषयमें कुछ जानते हो तो निःशङ्क होकर मुझे बताओ ॥ १ ९ ॥

अहो त्वं कर्णिकाराद्य पुष्पितः शोभसे भृशम् ।

कर्णिकारप्रियां साध्वीं शंस दृष्टा यदि प्रिया ॥ २० ॥

' कनेर! आज तो फूलोंके लगनेसे तुम्हारी बड़ी शोभा हो रही है । अहो! मेरी प्रिया साध्वी सीताको तुम्हारे ये पुष्प बहुत पसंद थे । यदि तुमने उसे कहीं देखा हो तो मुझसे कहो ' ॥२० ॥

चूतनीपमहासालान् पनसान् कुरवान् धवान् ।

दाडिमानपि तान् गत्वा दृष्ट्वा रामो महायशाः ॥ २१ ॥

बकुलानथ पुन्नागांश्चन्दनान् केतकांस्तथा ।

पृच्छन् रामो वने भ्रान्त उन्मत्त इव लक्ष्यते ॥ २२ ॥

इसी प्रकार आम, कदम्ब, विशाल शाल, कटहल, कुरव, धव और अनार आदि वृक्षोंको भी देखकर महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी उनके पास गये और वकुल, पुन्नाग, चन्दन तथा केवड़े आदिके वृक्षोंसे भी पूछते फिरे । उस समय वे वनमें पागलकी तरह इधर - उधर भटकते दिखायी देते थे ॥ २१-२२ ॥

अथवा मृगशावाक्षीं मृग जानासि मैथिलीम् ।

मृगविप्रेक्षणी कान्ता मृगीभिः सहिता भवेत् ॥ २३ ॥

अपने सामने हरिणको देखकर वे बोले- ' मृग! । । अथवा तुम्हीं बताओ! मृगनयनी मैथिलीको जानते हो । मेरी प्रियाकी दृष्टि भी तुम हरिणोंकी - सी है, अतः सम्भव है, वह हरिणियोंके ही साथ हो ॥ २३ ॥

गज सा गजनासोरुर्यदि दृष्टा त्वया भवेत् ।

तां मन्ये विदितां तुभ्यमाख्याहि वरवारण ॥ २४ ॥

' श्रेष्ठ गजराज! तुम्हारी सूँड़के समान ही जिसके दोनों ऊरु हैं, उस सीताको सम्भवतः तुमने देखा होगा । मालूम होता है, तुम्हें उसका पता विदित है, अतः बताओ! वह कहाँ है? ॥ २४ ॥

शार्दूल यदि सा दृष्टा प्रिया चन्द्रनिभानना ।

मैथिली मम विस्त्रब्धः कथयस्व न ते भयम् ॥ २५ ॥

' व्याघ्र! यदि तुमने मेरी प्रिया चन्द्रमुखी मैथिलीको देखा हो तो निःशङ्क होकर बता दो, मुझसे तुम्हें कोई भय नहीं होगा ' ॥ २५ ॥

किं धावसि प्रिये नूनं दृष्टासि कमलेक्षणे ।

वृक्षैराच्छाद्य चात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ २६ ॥

( इतनेहीमें उनको भ्रम हुआ कि सीता उधर भागकर छिप रही है, तब वे बोले- ) ' प्रिये! क्यों भागी जा रही हो । कमललोचने! निश्चय ही मैंने तुम्हें देख लिया है । तुम वृक्षोंकी ओटमें अपने - आपको छिपाकर मुझसे बात क्यों नहीं करती हो? ॥ २६ ॥

तिष्ठ तिष्ठ वरारोहे न तेऽस्ति करुणा मयि ।

नात्यर्थं हास्यशीलासि किमर्थं मामुपेक्षसे ॥ २७ ॥

' वरारोहे! ठहरो दया नहीं आती है । तुम्हारा स्वभाव तो नहीं करती हो? ॥२७ ॥

पीतकौशेयकेनासि धावन्त्यपि मया दृष्टा ' सुन्दरि! पीली , ठहरो । क्या तुम्हें मुझपर अधिक हास - परिहास करनेका था, फिर किसलिये मेरी उपेक्षा

सूचिता वरवर्णिनि ।

तिष्ठ यद्यस्ति सौहृदम् ॥ २८ ॥

रेशमी साड़ीसे ही, तुम कहाँ हो- यह सूचना मिल जाती है । भागी जाती हो तो भी मैंने तुम्हें देख लिया है । यदि मेरे प्रति स्नेह एवं सौहार्द हो तो खड़ी हो जाओ ' ॥२८ ॥

नैव सा नूनमथवा हिंसिता चारुहासिनी ।

कृच्छ्रं प्राप्तं न मां नूनं यथोपेक्षितुमर्हति ॥ २ ९ ॥

( फिर भ्रम दूर होनेपर बोले— ) 4 अथवा निश्चय ही वह नहीं है । उस मनोहर मुसकानवाली सीताको राक्षसोंने मार डाला, अन्यथा इस तरह संकटमें पड़े हुएकी ( मेरी ) वह कदापि उपेक्षा नहीं कर सकती थी ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 713

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अरण्यकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ७०१

व्यक्तं सा भक्षिता बाला राक्षसैः पिशिताशनैः ।

विभज्याङ्गानि सर्वाणि मया विरहिता प्रिया ॥ ३० ॥

' स्पष्ट जान पड़ता है कि मांसभक्षी राक्षसोंने मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी भोली - भाली प्रिया मैथिलीको उसके सारे अङ्ग बाँटकर खा लिया ॥३० ॥

नूनं तच्छुभदन्तोष्ठं सुनासं शुभकुण्डलम् ।

पूर्णचन्द्रनिभं ग्रस्तं मुखं निष्प्रभतां गतम् ॥ ३१ ॥

' सुन्दर दाँत, मनोहर ओष्ठ, सुघड़ नासिकासे युक्त तथा रुचिर कुण्डलोंसे अलंकृत वह पूर्ण चन्द्रमाके समान अभिराम मुख राक्षसोंका ग्रास बनकर निश्चय ही अपनी प्रभा खो बैठा होगा ॥ ३१ ॥

सा हि चम्पकवर्णाभा ग्रीवा ग्रैवेयकोचिता ।

कोमला विलपन्त्यास्तु कान्ताया भक्षिता शुभा ॥ ३२ ॥

' रोती - विलखती हुई प्रियतमा सीताकी वह चम्पाके समान वर्णवाली कोमल एवं सुन्दर ग्रीवा, जो हार और हँसली आदि आभूषण पहननेके योग्य थी, निशाचरोंका आहार बन गयी ॥ ३२ ॥

नूनं विक्षिप्यमाणौ तौ बाहू पल्लवकोमलौ ।

भक्षितौ वेपमानाग्रौ सहस्ताभरणाङ्गदौ ॥ ३३ ॥

' वे नूतन पल्लवोंके समान कोमल भुजाएँ, जो इधर - उधर पटकी जा रही होंगी और जिनके अग्रभाग काँप रहे होंगे, हाथोंके आभूषण तथा बाजूबंदसहित निश्चय ही राक्षसोंके पेटमें चली गयीं ॥ ३३ ॥

मया विरहिता बाला रक्षसां भक्षणाय वै ।

सार्थेनेव परित्यक्ता भक्षिता बहुबान्धवा ॥ ३४ ॥

' मैंने राक्षसोंका भक्ष्य बननेके लिये ही उस बालाको अकेली छोड़ दिया । यद्यपि उसके बन्धु-बान्धव बहुत हैं, तथापि वह यात्रियोंके समुदायसे

विलग हुई किसी अकेली स्त्रीकी भाँति निशाचरोंका ।

ग्रास बन गयी ॥ ३४ ॥

हा लक्ष्मण महाबाहो पश्यसे त्वं प्रियां क्वचित् ।

हा प्रिये क्व गता भद्रे हा सीतेति पुनः पुनः ॥ ३५ ॥

इत्येवं विलपन् रामः परिधावन् वनाद् वनम् ।

क्वचिदुद्भ्रमते वेगात् क्वचिद् विभ्रमते बलात् ॥ ३६ ॥

' हा महाबाहु लक्ष्मण! क्या तुम कहीं मेरी प्रियतमाको देखते हो! हा प्रिये! हा भद्रे! हा सीते! तुम कहाँ चली गयी? ' इस तरह बारंबार विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी एक वनसे दूसरे वनमें दौड़ने लगे । वे कहीं सीताकी समानता पाकर उद्भ्रान्त हो उठते ( उछल पड़ते थे ) और कहीं शोककी प्रबलताके कारण विभ्रान्त हो जाते ( बवंडरकी भाँति चक्कर काटने लगते थे ॥ ३५-३६ ॥ क्वचिन्मत्त इवाभाति कान्तान्वेषणतत्परः ।

स वनानि नदीः शैलान् गिरिप्रस्रवणानि च ।

काननानि च वेगेन भ्रमत्यपरिसंस्थितः ॥ ३७ ॥

अपनी प्रियतमाकी खोज करते हुए वे कभी-कभी पागलोंकी - सी चेष्टा करने लगते थे । उन्होंने बड़ी दौड़ - धूप करके कहीं भी विश्राम न करते हुए वनों, नदियों, पर्वतों, पहाड़ी झरनों और विभिन्न काननोंमें घूम - घूमकर अन्वेषण किया ॥३७ ॥

तदा स गत्वा विपुलं महद् वनं परीत्य सर्वं त्वथ मैथिलीं प्रति । अनिष्ठिताशः स चकार मार्गणे पुनः प्रियायाः परमं परिश्रमम् ॥ ३८ ॥

उस समय मिथिलेशकुमारीको ढूँढ़नेके लिये वे उस विशाल एवं विस्तृत वनमें गये और सबमें चक्कर लगाकर थक गये तो भी निराश नहीं हुए । उन्होंने पुनः अपनी प्रियतमाके अनुसंधानके लिये बड़ा भारी परिश्रम किया ॥ ३८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥६० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६० ॥

एकषष्टितमः सर्गः श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सीताकी खोज और उनके न मिलनेसे श्रीरामकी व्याकुलता दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं शून्यं रामो दशरथात्मजः । स्थान सीतासे सूने हैं तथा पर्णशालामें भी सीता नहीं रहितां पर्णशालां च प्रविद्धान्यासनानि च ॥ १ ॥ हैं और बैठनेके आसन इधर - उधर फेंके पड़े हैं ।

अदृष्ट्वा तत्र वैदेहीं संनिरीक्ष्य च सर्वशः । तब उन्होंने पुनः वहाँके सभी स्थानोंका निरीक्षण उवाच रामः प्राक्रुश्य प्रगृह्य रुचिरौ भुजौ ॥ २ ॥ किया और चारों ओर ढूँढनेपर भी जब विदेहकुमारीका

दशरथनन्दन श्रीरामने देखा कि आश्रमके सभी | कहीं पता नहीं लगा, तब श्रीरामचन्द्रजी अपनी दोनों

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७०२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

सुन्दर भुजाएँ ऊपर उठाकर सीताका नाम ले जोर- ।

जोरसे पुकार करके लक्ष्मणसे बोले - ॥ १-२ ॥

क्व नु लक्ष्मण वैदेही कं वा देशमितो गता ।

केनाहृता वा सौमित्रे भक्षिता केन वा प्रिया ॥ ३ ॥

' भैया लक्ष्मण! विदेहराजकुमारी कहाँ हैं? यहाँसे किस देशमें चली गयीं? सुमित्रानन्दन! मेरी प्रिया सीताको कौन हर ले गया? अथवा किस राक्षसने खा डाला? ॥ ३ ॥

वृक्षेणावार्य यदि मां सीते हसितुमिच्छसि ।

अलं ते हसितेनाद्य मां भजस्व सुदुःखितम् ॥ ४ ॥

( फिर वे सीताको सम्बोधित करके बोले - ) ' सीते! यदि तुम वृक्षोंकी आड़में अपनेको छिपाकर मुझसे हँसी करना चाहती हो तो इस समय यह हँसी ठीक नहीं है । मैं बहुत दुःखी हो रहा हूँ, तुम मेरे पास आ जाओ ॥ ४ ॥

यैः परिक्रीडसे सीते विश्वस्तैर्मृगपोतकैः ।

एते हीनास्त्वया सौम्ये ध्यायन्त्यस्त्राविलेक्षणाः ॥ ५ ॥

' सौम्य स्वभाववाली सीते! जिन विश्वस्त मृगछौनोंके साथ तुम खेला करती थी, वे आज तुम्हारे बिना दुःखी हो आँखोंमें आँसू भरकर चिन्तामग्न हो गये हैं'॥५ ॥

सीतया रहितोऽहं वै नहि जीवामि लक्ष्मण ।

वृतं शोकेन महता सीताहरणजेन माम् ॥ ६ ॥

परलोके महाराजो नूनं द्रक्ष्यति मे पिता । ' लक्ष्मण! सीतासे रहित होकर मैं जीवित नहीं रह सकता । सीताहरणजनित महान् शोकने मुझे चारों ओरसे घेर लिया है । निश्चय ही अब परलोकमें मेरे पिता महाराज दशरथ मुझे देखेंगे ॥ ६३ ॥

कथं प्रतिज्ञां संश्रुत्य मया त्वमभियोजितः ॥ ७ ॥

अपूरयित्वा तं कालं मत्सकाशमिहागतः । वे मुझे उपालम्भ देते हुए कहेंगे- ' मैंने तो तुम्हें वनवासके लिये आज्ञा दी थी और तुमने भी वहाँ रहनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी । फिर उतने समयतक वहाँ रहकर उस प्रतिज्ञाको पूर्ण किये बिना ही तुम यहाँ मेरे पास कैसे चले आये? ॥ ७३ ॥

कामवृत्तमनार्यं वा मृषावादिनमेव च ॥ ८ ॥

धिक् त्वामिति परे लोके व्यक्तं वक्ष्यति मे पिता । ' तुम - जैसे स्वेच्छाचारी, अनार्य और मिथ्यावादीको धिक्कार है । यह बात परलोकमें पिताजी मुझसे अवश्य कहेंगे ' ॥ ८३ ॥

विवशं शोकसंतप्तं दीनं भग्नमनोरथम् ॥ ९ ॥

मामिहोत्सृज्य करुणं कीर्तिर्नरमिवानृजुम् ।

क्व गच्छसि वरारोहे मा मोत्सृज सुमध्यमे ॥ १० ॥

‘ वरारोहे! सुमध्यमे! सीते! मैं विवश, शोकसंतप्त, दीन, भग्नमनोरथ हो करुणाजनक अवस्थामें पड़ गया हूँ । जैसे कुटिल मनुष्यको कीर्ति त्याग देती है, उसी प्रकार तुम मुझे यहाँ छोड़कर कहाँ चली जा रही हो? मुझे न छोड़ो, न छोड़ो ॥ ९ -१० ॥

त्वया विरहितश्चाहं त्यक्ष्ये जीवितमात्मनः ।

इतीव विलपन् रामः सीतादर्शनलालसः ॥ ११ ॥

न ददर्श सुदुःखार्तो राघवो जनकात्मजाम् । ' तुम्हारे वियोगमें मैं अपने प्राण त्याग दूँगा । ' इस प्रकार अत्यन्त दुःखसे आतुर हो विलाप करते हुए रघुकुल-नन्दन श्रीराम सीताके दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये, किंतु वे जनकनन्दिनी उन्हें दिखायी न पड़ीं ॥ अनासादयमानं तं सीतां शोकपरायणम् ॥ १२ ॥

पङ्कमासाद्य विपुलं सीदन्तमिव कुञ्जरम् ।

लक्ष्मणो राममत्यर्थमुवाच हितकाम्यया ॥ १३ ॥

जैसे कोई हाथी किसी बड़ी भारी दलदलमें फँसकर कष्ट पा रहा हो, उसी प्रकार सीताको न पाकर अत्यन्त शोकमें डूबे हुए श्रीरामसे उनके हितकी कामना रखकर लक्ष्मण यों बोले - ॥ १२-१३ ॥

मा विषादं महाबुद्धे कुरु यत्नं मया सह ।

इदं गिरिवरं वीर बहुकन्दरशोभितम् ॥ १४ ॥

प्रियकाननसंचारा वनोन्मत्ता च मैथिली ।

सा वनं वा प्रविष्टा स्यान्नलिनीं वा सुपुष्पिताम् ॥ १५ ॥

सरितं वापि सम्प्राप्ता मीनवञ्जुलसेविताम् ।

वित्रासयितुकामा वा लीना स्यात् कानने क्वचित् ॥१६ ॥

जिज्ञासमाना वैदेही त्वां मां च पुरुषर्षभ । ' महामते! आप विषाद न करें; मेरे साथ जानकीको ढूँढ़नेका प्रयत्न करें । वीरवर! यह सामने जो ऊँचा पहाड़ दिखायी देता है, अनेक कन्दराओंसे सुशोभित है । मिथिलेशकुमारीको वनमें घूमना प्रिय लगता है, वे वनकी शोभा देखकर हर्षसे उन्मत्त हो उठती हैं; अतः वनमें गयी होंगी, अथवा सुन्दर कमलके फूलोंसे भरे हुए इस सरोवरके या मत्स्य तथा वेतसलतासे सुशोभित सरिताके तटपर जा पहुँची होंगी । अथवा पुरुषप्रवर! हमलोगोंको डरानेकी इच्छासे हम दोनों उन्हें खोज पाते हैं कि नहीं, इस जिज्ञासासे कहीं वनमें ही छिप गयी | होंगी ॥ १४–१६३ ॥

पृष्ठ 715

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 715 का मूल पृष्ठ
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अरण्यकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ७०३ तस्या ह्यन्वेषणे श्रीमन् क्षिप्रमेव यतावहे ॥ १७॥

वनं सर्वं विचिनुवो यत्र सा जनकात्मजा । ' अतः श्रीमन्! वनमें जहाँ - जहाँ जानकीके होनेकी सम्भावना हो, उन सभी स्थानोंपर हम दोनों शीघ्र ही उनकी खोजके लिये प्रयत्न करें ॥ १७३ ॥

मन्यसे यदि काकुत्स्थ मा स्म शोके मनः कृथाः ॥ १८ ॥

एवमुक्तः स सौहार्दाल्लक्ष्मणेन समाहितः ।

सह सौमित्रिणा रामो विचेतुमुपचक्रमे ॥ १ ९ ॥

' रघुनन्दन! यदि आपको मेरी यह बात ठीक लगे तो आप शोक छोड़ दें । ' लक्ष्मणके द्वारा इस प्रकार सौहार्दपूर्वक समझाये जानेपर श्रीरामचन्द्रजी सावधान हो गये और उन्होंने सुमित्राकुमारके साथ सीताको खोजना आरम्भ किया ॥ १८-१९ ॥

तौ वनानि गिरींश्चैव सरितश्च सरांसि च ।

निखिलेन विचिन्वन्तौ सीतां दशरथात्मजौ ॥ २० ॥

तस्य शैलस्य सानूनि शिलाश्च शिखराणि च ।

निखिलेन विचिन्वन्तौ नैव तामभिजग्मतुः ॥ २१ ॥

दशरथके वे दोनों पुत्र सीताकी खोज करते हुए वनोंमें, पर्वतोंपर, सरिताओं और सरोवरोंके किनारे घूम - घूमकर पूरी चेष्टाके साथ अनुसंधानमें लगे रहे । उस पर्वतकी चोटियों, शिलाओं और शिखरोंपर उन्होंने अच्छी तरह जानकीको ढूँढा; किंतु कहीं भी उनका पता नहीं लगा ॥ २०-२१ ॥

विचित्य सर्वतः शैलं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।

नेह पश्यामि सौमित्रे वैदेहीं पर्वते शुभाम् ॥ २२ ॥

पर्वतके चारों ओर खोजकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे कहा — ‘ सुमित्रानन्दन! इस पर्वतपर तो मैं सुन्दरी वैदेहीको नहीं देख पाता हूँ ' ॥२२ ॥

ततो दुःखाभिसंतप्तो लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् ।

विचरन् दण्डकारण्यं भ्रातरं दीप्ततेजसम् ॥ २३ ॥

तब दुःखसे संतप्त हुए लक्ष्मणने दण्डकारण्यमें घूमते-घूमते अपने उद्दीप्त तेजस्वी भाईसे इस प्रकार कहा—

प्राप्स्यसे त्वं महाप्राज्ञ मैथिलीं जनकात्मजाम् ।

यथा विष्णुर्महाबाहुर्बलिं बद्ध्वा महीमिमाम् ॥ २४ ॥

' महामते! जैसे महाबाहु भगवान् विष्णुने राजा बलिको बाँधकर यह पृथ्वी प्राप्त कर ली थी, उसी प्रकार आप भी मिथिलेशकुमारी जानकीको पा जायँगे ' ॥ ।

। एवमुक्तस्तु वीरेण लक्ष्मणेन स राघवः ।

उवाच दीनया वाचा दुःखाभिहतचेतनः ॥ २५ ॥

वीर लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर दुःखसे व्याकुलचित्त हुए श्रीरघुनाथजीने दीन वाणीमें कहा— ॥ २५ ॥

वनं सुविचितं सर्वं पद्मिन्यः फुल्लपङ्कजाः ।

गिरिश्चायं महाप्राज्ञ बहुकन्दरनिर्झरः ।

नहि पश्यामि वैदेहीं प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम् ॥ २६ ॥

' महाप्राज्ञ लक्ष्मण! मैंने सारा वन खोज डाला । विकसित कमलोंसे भरे हुए सरोवर भी देख लिये तथा अनेक कन्दराओं और झरनोंसे सुशोभित इस पर्वतको भी सब ओरसे छान डाला; परंतु मुझे अपने प्राणोंसे भी प्यारी वैदेही कहीं दिखायी नहीं पड़ी ' ॥ २६ ॥

एवं स विलपन् रामः सीताहरणकर्षितः ।

दीनः शोकसमाविष्टो मुहूर्तं विह्वलोऽभवत् ॥ २७ ॥

इस प्रकार सीता - हरणके कष्टसे पीड़ित हो विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी दीन और शोकमग्न हो दो घड़ीतक अत्यन्त व्याकुलतामें पड़े रहे ॥ २७ ॥

विह्वलितसर्वाङ्गो गतबुद्धिर्विचेतनः ।

निषसादातुरो दीनो निःश्वस्याशीतमायतम् ॥ २८ ॥

उनका सारा अङ्ग विह्वल ( शिथिल ) हो गया, बुद्धि काम नहीं दे रही थी, चेतना लुप्त सी होती जा रही थी । वे गरम - गरम लंबी साँस खींचते हुए दीन और आतुर होकर विषादमें डूब गये ॥२८ ॥

बहुशः स तु निःश्वस्य रामो राजीवलोचनः ।

हा प्रियेति विचुक्रोश बहुशो बाष्पगद्गदः ॥ २ ९ ॥

बारंबार उच्छ्वास लेकर कमलनयन श्रीराम आँसुओंसे गद्गद वाणीमें ' हा प्रिये! ' कहकर बहुत रोने - विलखने लगे ॥ २ ९ ॥

तं सान्त्वयामास ततो लक्ष्मणः प्रियबान्धवम् ।

बहुप्रकारं शोकार्तः प्रश्रितः प्रनिताञ्जलिः ॥३० ॥

तब शोकसे पीड़ित हुए लक्ष्मणने विनीतभावसे हाथ जोड़कर अपने प्रिय भाईको अनेक प्रकारसे सान्त्वना दी ॥

अनादृत्य तु तद् वाक्यं लक्ष्मणोष्ठपुटच्युतम् ।

अपश्यंस्तां प्रियां सीतां प्राक्रोशत् स पुनः पुनः ॥ ३१ ॥

लक्ष्मणके ओष्ठपुटोंसे निकली हुई इस बातका आदर न करके श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्यारी पत्नी सीताको न देखनेके कारण उन्हें बारंबार पुकारने और रोने लगे ॥ ३१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६१ ॥

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७०४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे द्विषष्टितमः सर्गः श्रीरामका विलाप

सीतामपश्यन् धर्मात्मा शोकोपहतचेतनः ।

विललाप महाबाहू रामः कमललोचनः ॥ १ ॥

सीताको न देखकर शोकसे व्याकुलचित्त हुए धर्मात्मा महाबाहु कमलनयन श्रीराम विलाप करने लगे ॥ १ ॥

पश्यन्निव च तां सीतामपश्यन्मन्मथार्दितः ।

उवाच राघवो वाक्यं विलापाश्रयदुर्वचम् ॥ २ ॥

रघुनाथजी सीताके प्रति अधिक प्रेमके कारण उनके वियोगमें कष्ट पा रहे थे । वे उन्हें न देखकर भी देखते हुएके समान ऐसी बात कहने लगे, जो विलापका आश्रय होनेसे गद्गदकण्ठके कारण कठिनतासे बोली जा रही थी - ॥ २ ॥

त्वमशोकस्य शाखाभिः पुष्पप्रियतरा प्रिये ।

आवृणोषि शरीरं ते मम शोकविवर्धनी ॥ ३ ॥

' प्रिये! तुम्हें फूल अधिक प्रिय हैं, इसलिये खिली हुई अशोककी शाखाओंसे अपने शरीरको छिपाती हो और मेरा शोक बढ़ा रही हो ॥ ३ ॥

कदलीकाण्डसदृशौ कदल्या संवृतावुभौ ।

ऊरू पश्यामि ते देवि नासि शक्ता निगूहितुम् ॥ ४ ॥

' देवि! मैं केलेके तनोंके तुल्य और कदलीदलसे ही छिपे हुए तुम्हारे दोनों ऊरुओं ( जाँघों ) को देख रहा हूँ । तुम उन्हें छिपा नहीं सकती ॥४ ॥

कर्णिकारवनं भद्रे हसन्ती देवि सेवसे ।

अलं ते परिहासेन मम बाधावहेन वै ॥ ५ ॥

' भद्रे! देवि! तुम हँसती हुई कनेर - पुष्पोंकी वाटिकाका सेवन करती हो । बंद करो इस परिहासको, इससे मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है ॥५ ॥

विशेषेणाश्रमस्थाने हासोऽयं न प्रशस्यते ।

अवगच्छामि ते शीलं परिहासप्रियं प्रिये ॥ ६ ॥

आगच्छ त्वं विशालाक्षि शून्योऽयमुटजस्तव । ' विशेषतः आश्रमके स्थानमें यह हास - परिहास अच्छा नहीं बताया जाता है । प्रिये! मैं जानता हूँ, तुम्हारा स्वभाव परिहासप्रिय है । विशाललोचने! आओ । तुम्हारी यह पर्णशाला सूनी है ' ॥ ६३ ॥

सुव्यक्तं राक्षसैः सीता भक्षिता वा हृतापि वा ॥ ७ ॥

न हि सा विलपन्तं मामुपसम्प्रति लक्ष्मण । ( फिर भ्रम दूर होनेपर वे सुमित्राकुमारसे बोले— ) ' लक्ष्मण! अब तो भलीभाँति स्पष्ट हो गया । कि राक्षसोंने सीताको खा लिया अथवा हर लिया; क्योंकि मैं विलाप कर रहा हूँ और वह मेरे पास नहीं आ रही है ॥ ७३ ॥

एतानि मृगयूथानि साश्रुनेत्राणि लक्ष्मण ॥ ८ ॥

शंसन्तीव हि मे देवीं भक्षितां रजनीचरैः । ' लक्ष्मण! ये जो मृगसमूह हैं, ये भी अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर मानो मुझसे यही कह रहे हैं कि देवी सीताको निशाचर खा गये ॥ ८३ ॥

हा ममायें क्व यातासि हा साध्वि वरवर्णिनि ॥ ९ ॥

हा सकामाद्य कैकेयी देवि मेऽद्य भविष्यति । ' हा मेरी आर्ये! ( आदरणीये! ) तुम कहाँ चली गयी? हा साध्वि! हा वरवर्णिनि! तुम कहाँ गयी? हा देवि! आज कैकेयी सफलमनोरथ हो जायगी ॥ ९ ३ ॥ सीतया सह निर्यातो विना सीतामुपागतः ॥ १० ॥

कथं नाम प्रवेक्ष्यामि शून्यमन्तःपुरं मम । ' सीताके साथ अयोध्यासे निकला था । यदि सीताके बिना ही वहाँ लौटा तो अपने सूने अन्तःपुरमें कैसे प्रवेश करूँगा ॥ १०३ ॥

निर्वीर्य इति लोको मां निर्दयश्चेति वक्ष्यति ॥ ११ ॥

कातरत्वं प्रकाशं हि सीतापनयनेन मे । ' सारा संसार मुझे पराक्रमहीन और निर्दय कहेगा । सीताके अपहरणसे मेरी कायरता ही प्रकाशमें आयेगी ॥ ११३ ॥

निवृत्तवनवासश्च जनकं मिथिलाधिपम् ॥ १२ ॥

कुशलं परिपृच्छन्तं कथं शक्ष्ये निरीक्षितुम् । ' जब वनवाससे लौटनेपर मिथिलानरेश जनक मुझसे कुशल पूछने आयेंगे, उस समय मैं कैसे उनकी ओर देख सकूँगा? ॥ १२३ ॥

विदेहराजो नूनं मां दृष्ट्वा विरहितं तया ॥ १३ ॥

सुताविनाशसंतप्तो मोहस्य वशमेष्यति । ' मुझे सीतासे रहित देख विदेहराज जनक अपनी पुत्रीके विनाशसे संतप्त हो निश्चय ही मूर्च्छित हो जायँगे ॥ अथवा न गमिष्यामि पुरीं भरतपालिताम् ॥ १४ ॥

स्वर्गोऽपि हि तया हीनः शून्य एव मतो मम । ' अथवा अब मैं भरतद्वारा पालित अयोध्यापुरीको नहीं जाऊँगा । जानकीके बिना मुझे स्वर्ग भी सूना जान पड़ेगा ॥ १४३ ॥

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अरण्यकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ७०५ तन्मामुत्सृज्य हि वने गच्छायोध्यापुरीं शुभाम् ॥ १५ ॥ ।

न त्वहं तां विना सीतां जीवेयं हि कथंचन । ' इसलिये अब तुम मुझे वनमें ही छोड़कर सुन्दर अयोध्यापुरीको लौट जाओ । मैं तो अब सीताके बिना किसी तरह जीवित नहीं रह सकता ॥ १५३ ॥

गाढमाश्लिष्य भरतो वाच्यो मवचनात् त्वया ॥ १६ ॥

अनुज्ञातोऽसि रामेण पालयेति वसुंधराम् । ' भरतका गाढ़ आलिङ्गन करके तुम उनसे मेरा संदेश कह देना, ' कैकेयीनन्दन! तुम सारी पृथ्वीका पालन करो, इसके लिये रामने तुम्हें आज्ञा दे दी है ' ॥ १६३ ॥

अम्बा च मम कैकेयी सुमित्रा च त्वया विभो ॥ १७॥

कौसल्या च यथान्यायमभिवाद्या ममाज्ञया ।

रक्षणीया प्रयत्नेन भवता सूक्तचारिणा ॥ १८ ॥

‘ विभो! मेरी माता कौसल्या, कैकेयी तथा सुमित्राको प्रतिदिन यथोचित रीतिसे प्रणाम करते हुए उन सबकी रक्षा करना और सदा उनकी आज्ञाके अनुसार चलना, ' यह तुम्हारे लिये मेरी आज्ञा है ॥ १७-१८ ॥

सीतायाश्च विनाशोऽयं मम चामित्रसूदन ।

विस्तरेण जनन्या मे विनिवेद्यस्त्वया भवेत् ॥ १ ९ ॥

' शत्रुसूदन! मेरी माताके समक्ष सीताके विनाशका यह समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाना ' ॥ १ ९ ॥ इति विलपति राघवे तु दीने वनमुपगम्य तया विना सुकेश्या । भयविकलमुखस्तु लक्ष्मणोप व्यथितमना भृशमातुरो बभूव ॥ २० ॥

सुन्दर केशवाली सीताके विरहमें भगवान् श्रीराम वनके भीतर जाकर जब इस तरह दीनभावसे विलाप करने लगे, तब लक्ष्मणके भी मुखपर भयजनित व्याकुलताके चिह्न दिखायी देने लगे । उनका मन व्यथित । हो उठा और वे अत्यन्त घबरा गये ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥ ६२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

त्रिषष्टितमः सर्गः श्रीरामका स राजपुत्रः प्रियया विहीनः । शोकेन मोहेन च पीड्यमानः । विषादयन् भ्रातरमार्तरूपो भूयो विषादं प्रविवेश तीव्रम् ॥ १ ॥

अपनी प्रिया सीतासे रहित हो राजकुमार श्रीराम शोक और मोहसे पीड़ित होने लगे । वे स्वयं तो पीड़ित थे ही, अपने भाई लक्ष्मणको भी विषादमें डालते हुए पुनः तीव्र शोकमें मग्न हो गये ॥ १ ॥

स लक्ष्मणं शोकवशाभिपन्नं

शोके निमग्नो विपुले तु रामः ।

उवाच वाक्यं व्यसनानुरूप-मुष्णं विनिःश्वस्य रुदन् सशोकम् ॥ २ ॥

लक्ष्मण शोकके अधीन हो रहे थे, उनसे महान् शोकमें डूबे हुए श्रीराम दुःखके साथ रोते हुए गरम

उच्छ्वास लेकर अपने ऊपर पड़े हुए संकटके अनुरूप ।

वचन बोले- ॥२ ॥

न मद्विधो दुष्कृतकर्मकारी मन्ये द्वितीयोऽस्ति वसुंधरायाम् । 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_24_1_Front विलाप शोकानुशोको हि परम्पराया मामेति भिन्दन् हृदयं मनश्च ॥३ ॥

' सुमित्रानन्दन! मालूम होता है, मेरे जैसा पापकर्म करनेवाला मनुष्य इस पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि एकके बाद दूसरा शोक मेरे हृदय ( प्राण ) और मनको विदीर्ण करता हुआ लगातार मुझपर आता जा रहा है ॥ ३ ॥

पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि । तत्रायमद्यापतितो विपाको दुःखेन दुःखं यदहं विशामि ॥४ ॥

' निश्चय ही पूर्वजन्ममें मैंने अपनी इच्छाके अनुसार बारंबार बहुत - से पापकर्म किये हैं; उन्हींमेंसे कुछ कर्मोंका यह परिणाम आज प्राप्त हुआ है, जिससे मैं एक दुःखसे दूसरे दुःखमें पड़ता जा रहा हूँ ॥४ ॥

राज्यप्रणाशः स्वजनैर्वियोगः

पितुर्विनाशो जननीवियोगः ।

सर्वाणि मे लक्ष्मण शोकवेग-मापूरयन्ति प्रविचिन्तितानि ॥ ५ ॥

पृष्ठ 718

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७०६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामाय ' पहले तो मैं राज्यसे वञ्चित हुआ; फिर मेरा स्वजनोंसे वियोग हुआ । तत्पश्चात् पिताजीका परलोकवास हुआ, फिर मातासे भी मुझे बिछुड़ जाना पड़ा । लक्ष्मण! ये सारी बातें जब मुझे याद आती हैं, तब मेरे शोकके वेगको बढ़ा देती हैं ॥ ५ ॥

सर्वं तु दुःखं मम लक्ष्मणेदं शान्तं शरीरे वनमेत्य क्लेशम् । सीतावियोगात् पुनरप्युदीर्ण काष्ठैरिवाग्निः सहसोपदीप्तः ॥ ६ ॥

' लक्ष्मण! वनमें आकर क्लेशका अनुभव करके भी यह सारा दुःख सीताके समीप रहनेसे मेरे शरीरमें ही शान्त हो गया था, परंतु सीताके वियोगसे वह फिर उद्दीत हो उठा है, जैसे सूखे काठका संयोग पाकर आग सहसा प्रज्वलित हो उठती है ॥ ६ ॥

सा नूनमार्या मम राक्षसेन ह्यभ्याहृता खं समुपेत्य भीरुः । अपस्वरं सुस्वरविप्रलापा भयेन विक्रन्दितवत्यभीक्ष्णम् ॥ ७ ॥

' हाय! मेरी श्रेष्ठ स्वभाववाली भीरु पत्नीको अवश्य ही राक्षसने आकाशमार्गसे हर लिया । उस समय सुमधुर स्वरमें विलाप करनेवाली सीता भयके मारे बारंबार विकृत स्वरमें क्रन्दन करने लगी होगी ॥ ७ ॥

तौ लोहितस्य प्रियदर्शनस्य सदोचितावुत्तमचन्दनस्य ' 1 वृत्तौ स्तनौ शोणितपङ्कदिग्धौ नूनं प्रियाया मम नाभिपातः ॥ ८ ॥

' मेरी प्रियाके वे दोनों गोल - गोल स्तन, जो सदा लाल चन्दनसे चर्चित होनेयोग्य थे, निश्चय ही रक्तकी कीचमें सन गये होंगे । हाय! इतनेपर भी मेरे शरीरका पतन नहीं होता ॥ ८ ॥

तच्छ्लक्ष्णसुव्यक्तमृदुप्रलापं तस्या मुखं कुञ्चितकेशभारम् । रक्षोवशं नूनमुपागताया न भ्राजते राहुमुखे यथेन्दुः ॥ ९ ॥

' राक्षसके वशमें पड़ी हुई मेरी प्रियाका वह मुख जो स्निग्ध एवं सुस्पष्ट मधुर वार्तालाप करनेवाला तथा काले - काले घुँघराले केशोंके भारसे सुशोभित था, वैसे ही श्रीहीन हो गया होगा, जैसे राहुके मुखमें पड़ा हुआ चन्द्रमा शोभा नहीं पाता है ॥ ९ ॥

| तां हारपाशस्य सदोचितान्तां ग्रीवां प्रियाया मम सुव्रतायाः । रक्षांसि नूनं परिपीतवन्ति शून्ये हि भित्त्वा रुधिराशनानि ॥ १० ॥

' हाय! उत्तम व्रतका पालन करनेवाली मेरी प्रियतमाका कण्ठ हर समय हारसे सुशोभित होनेयोग्य था, किंतु रक्तभोजी राक्षसोंने सूने वनमें अवश्य उसे फाड़कर उसका रक्त पिया होगा ॥ १० ॥

मया विहीना विजने वने सा रक्षोभिराहृत्य विकृष्यमाणा । नूनं विनादं कुररीव दीना सा मुक्तवत्यायतकान्तनेत्रा ॥ ११ ॥

' मेरे न रहनेके कारण निर्जन वनमें राक्षसोंने उसे ले - लेकर घसीटा होगा और विशाल एवं मनोहर नेत्रोंवाली वह जानकी अत्यन्त दीनभावसे कुररीकी भाँति विलाप करती रही होगी ॥ ११ ॥

अस्मिन् मया सार्धमुदारशीला शिलातले पूर्वमुपोपविष्टा । कान्तस्मिता लक्ष्मण जातहासा त्वामाह सीता बहुवाक्यजातम् ॥ १२ ॥

' लक्ष्मण! यह वही शिलातल है, जिसपर उदार स्वभाववाली सीता पहले एक दिन मेरे साथ बैठी हुई थी । उसकी मुसकान कितनी मनोहर थी, उस समय उसने हँस - हँसकर तुमसे भी बहुत - सी बातें कही थीं ॥ गोदावरीयं सरितां वरिष्ठा प्रिया प्रियाया मम नित्यकालम् । अप्यत्र गच्छेदिति चिन्तयामि नैकाकिनी याति हि सा कदाचित् ॥ १३ ॥

' सरिताओंमें श्रेष्ठ यह गोदावरी मेरी प्रियतमाको सदा ही प्रिय रही है । सोचता हूँ, शायद वह इसीके तटपर गयी हो, किंतु अकेली तो वह कभी वहाँ नहीं जाती थी ॥ पद्मानना पद्मपलाशनेत्रा

पद्मानि वानेतुमभिप्रयाता ।

तदप्ययुक्तं नहि सा कदाचि-न्मया विना गच्छति पङ्कजानि ॥ १४ ॥

' उसका मुख और विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलोंके समान सुन्दर हैं, सम्भव है, वह कमलपुष्प लानेके लिये ही गोदावरीतटपर गयी हो, परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वह मुझे साथ लिये बिना कभी कमलोंके पास नहीं जाती थी ॥ १४ ॥

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पृष्ठ 719

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अरण्यकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ७०७ कामं त्विदं पुष्पितवृक्षषण्डं

नानाविधैः पक्षिगणैरुपेतम् ।

वनं प्रयाता नु तदप्ययुक्त-मेकाकिनी सातिबिभेति भीरुः ॥ १५ ॥

' हो सकता है कि वह इन पुष्पित वृक्षसमूहोंसे युक्त और नाना प्रकारके पक्षियोंसे सेवित वनमें भ्रमणके लिये गयी हो; परंतु यह भी ठीक नहीं लगता; क्योंकि वह भीरु तो अकेली वनमें जानेसे बहुत डरती थी । आदित्य भो लोककृताकृतज्ञ लोकस्य सत्यानृतकर्मसाक्षिन् । मम प्रिया सा क्व गता हृता वा शंसस्व मे शोकहतस्य सर्वम् ॥ १६ ॥

' सूर्यदेव! संसारमें किसने क्या किया और क्या नहीं किया — इसे तुम जानते हो; लोगोंके सत्य - असत्य ( पुण्य और पाप ) कर्मोंके तुम्हीं साक्षी हो । मेरी प्रिया सीता कहाँ गयी अथवा उसे किसने हर लिया, यह सब मुझे बताओ; क्योंकि मैं उसके शोकसे पीड़ित हूँ ॥ १६ ॥

लोकेषु सर्वेषु न नास्ति किंचिद् यत् ते न नित्यं विदितं भवेत् तत् । शंसस्व वायो कुलपालिनीं तां मृता हृता वा पथि वर्तते वा ॥ १७ ॥

' वायुदेव! समस्त विश्वमें ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें सदा ज्ञात न रहती हो । मेरी कुलपालिका सीता कहाँ है, यह बता दो । वह मर गयी, हर ली गयी अथवा मार्गमें ही है ' ॥ १७ ॥

| इतीव तं शोकविधेयदेहं रामं विसंज्ञं विलपन्तमेव । उवाच सौमित्रिरदीनसत्त्वो न्याय्ये स्थितः कालयुतं च वाक्यम् ॥ १८ ॥

इस प्रकार शोकके अधीन होकर जब श्रीरामचन्द्रजी संज्ञाशून्य हो विलाप करने लगे, तब उनकी ऐसी अवस्था देख न्यायोचित मार्गपर स्थित रहनेवाले उदारचित्त सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उनसे यह समयोचित बात कही - ॥ १८ ॥

शोकं विसृज्याद्य धृतिं भजस्व सोत्साहता चास्तु विमार्गणेऽस्याः । उत्साहवन्तो हि नरा न लोके सीदन्ति कर्मस्वतिदुष्करेषु ॥ १ ९ ॥ ' आर्य! आप शोक छोड़कर धैर्य धारण करें; सीताकी खोजके लिये मनमें उत्साह रखें; क्योंकि उत्साही मनुष्य जगत्‌में अत्यन्त दुष्कर कार्य आ पड़नेपर भी कभी दुःखी नहीं होते हैं ' ॥ १ ९ ॥ इतीव सौमित्रिमुदग्रपौरुषं ब्रुवन्तमार्तो रघुवंशवर्धनः । न चिन्तयामास धृतिं विमुक्तवान् पुनश्च दुःखं महदभ्युपागमत् ॥ २० ॥

बढ़े हुए पुरुषार्थवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकारकी बातें कह रहे थे, उस समय रघुकुलकी वृद्धि करनेवाले श्रीरामने आर्त होकर उनके कथनके औचित्यपर कोई ध्यान नहीं दिया; उन्होंने धैर्य छोड़ दिया और वे पुनः महान् दुःखमें पड़ गये ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥ ६३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६३ ॥

चतुःषष्टितमः सर्गः श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सीताकी खोज, श्रीरामका शोकोद्गार, मृगोंद्वारा संकेत पाकर दोनों भाइयोंका दक्षिण दिशाकी ओर जाना, पर्वतपर क्रोध, सीताके बिखरे हुए फूल, आभूषणोंके कण और युद्धके चिह्न देखकर श्रीरामका देवता आदि सहित समस्त त्रिलोकीपर रोष प्रकट करना स दीनो दीनया वाचा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । नदीके तटपर जाकर पता लगाओ । सीता कमल लानेके शीघ्रं लक्ष्मण जानीहि गत्वा गोदावरीं नदीम् ॥ १ ॥ लिये तो नहीं चली गयीं ' ॥१३ ॥

अपि गोदावरीं सीता पद्मान्यानयितुं गता । एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः पुनरेव हि ॥२ ॥

तदनन्तर दीन हुए श्रीरामचन्द्रजीने दीन वाणीमें नदीं गोदावरीं रम्यां जगाम लघुविक्रमः । लक्ष्मणसे कहा — ' लक्ष्मण! तुम शीघ्र ही गोदावरी श्रीरामकी ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मण शीघ्र गतिसे 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_24_2_Front

पृष्ठ 720

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १, पृष्ठ 720 का मूल पृष्ठ
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७०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पुनः रमणीय गोदावरी नदीके तटपर गये ॥ २३ ॥

तां लक्ष्मणस्तीर्थवतीं विचित्वा राममब्रवीत् ॥ ३ ॥

नैनां पश्यामि तीर्थेषु क्रोशतो न शृणोति मे । अनेक तीर्थों ( घाटों ) -से युक्त गोदावरीके तटपर खोजकर लक्ष्मण पुनः लौट आये और श्रीरामसे बोले — ' भैया! मैं गोदावरीके घाटोंपर सीताको नहीं देख पाता हूँ; जोर - जोरसे पुकारनेपर भी वे मेरी बात नहीं सुनती हैं ॥ ३३ ॥

कं नु सा देशमापन्ना वैदेही क्लेशनाशिनी ॥ ४ ॥

नहि तं वेद्मि वै राम यत्र सा तनुमध्यमा । ' श्रीराम! क्लेशोंका नाश करनेवाली विदेहराजकुमारी न जाने किस देशमें चली गयीं । भैया श्रीराम! जहाँ कृशकटि प्रदेशवाली सीता गयी हैं, उस स्थानको मैं नहीं जानता ' ॥४३ ॥

लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा दीनः संतापमोहितः ॥ ५ ॥

रामः समभिचक्राम स्वयं गोदावरीं नदीम् । लक्ष्मणकी यह बात सुनकर दीन एवं संतापसे मोहित हुए श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही गोदावरी नदीके तटपर गये ॥ ५३ ॥

स तामुपस्थितो रामः क्व सीतेत्येवमब्रवीत् ॥ ६ ॥

भूतानि राक्षसेन्द्रेण वधार्हेण हृतामपि ।

न तां शशंसू रामाय तथा गोदावरी नदी ॥ ७ ॥

वहाँ पहुँचकर श्रीरामने पूछा- ' सीता कहाँ है? ' परंतु वधके योग्य राक्षसराज रावणद्वारा हरी गयी सीताके विषयमें समस्त भूतोंमेंसे किसीने कुछ नहीं कहा । गोदावरी नदीने भी श्रीरामको कोई उत्तर नहीं दिया ॥ ६-७ ॥

ततः प्रचोदिता भूतैः शंस चास्मै प्रियामिति ।

न च सा ह्यवदत् सीतां पृष्टा रामेण शोचता ॥ ८ ॥

तदनन्तर वनके समस्त प्राणियोंने उन्हें प्रेरित किया कि ‘ तुम श्रीरामको उनकी प्रियाका पता बता दो! ' किंतु शोकमग्र श्रीरामके पूछनेपर भी गोदावरीने सीताका पता नहीं बताया ॥ ८ ॥

रावणस्य च तद्रूपं कर्मापि च दुरात्मनः ।

ध्यात्वा भयात् तु वैदेहीं सा नदी न शशंस ह ॥ ९ ॥

दुरात्मा रावणके उस रूप और कर्मको याद करके भयके मारे गोदावरी नदीने वैदेहीके विषयमें श्रीरामसे कुछ नहीं कहा ॥ ९ ॥

निराशस्तु तया नद्या सीताया दर्शने कृतः ।

उवाच रामः सौमित्रिं सीतादर्शनकर्शितः ॥ १० ॥ ।

सीताके दर्शनके विषयमें जब नदीने उन्हें पूर्ण निराश कर दिया, तब सीताको न देखनेसे कष्टमें पड़े हुए श्रीराम सुमित्राकुमारसे इस प्रकार बोले - ॥ १० ॥

एषा गोदावरी सौम्य किंचिन्न प्रतिभाषते ।

किं नु लक्ष्मण वक्ष्यामि समेत्य जनकं वचः ॥ ११ ॥

मातरं चैव वैदेह्या विना तामहमप्रियम् । ' सौम्य लक्ष्मण! यह गोदावरी नदी तो मुझे कोई उत्तर ही नहीं देती है । अब मैं राजा जनकसे मिलनेपर उन्हें क्या जवाब दूँगा? जानकीके बिना उसकी मातासे मिलकर भी मैं उनसे यह अप्रिय बात कैसे सुनाऊँगा? ॥ या मे राज्यविहीनस्य वने वन्येन जीवतः ॥ १२ ॥

सर्वं व्यपानयच्छोकं वैदेही क्व नु सा गता । ' राज्यहीन होकर वनमें जंगली फल- मूलोंसे निर्वाह करते समय भी जो मेरे साथ रहकर मेरे सभी दुःखोंको दूर किया करती थी, वह विदेहराजकुमारी कहाँ चली गयी?॥ १२३ ॥

ज्ञातिवर्गविहीनस्य वैदेहीमप्यपश्यतः ॥ १३ ॥

मन्ये दीर्घा भविष्यन्ति रात्रयो मम जाग्रतः । ' बन्धु - बान्धवोंसे तो मेरा बिछोह हो ही गया था, अब सीताके दर्शनसे भी मुझे वञ्चित होना पड़ा; उसकी चिन्तामें निरन्तर जागते रहनेके कारण अब मेरी सभी रातें बहुत बड़ी हो जायँगी ॥ १३३ ॥

मन्दाकिनीं जनस्थानमिमं प्रस्रवणं गिरिम् ॥ १४ ॥

सर्वाण्यनुचरिष्यामि यदि सीता हि लभ्यते । ' मन्दाकिनी नदी, जनस्थान तथा प्रस्रवण पर्वत-इन सभी स्थानोंपर मैं बारंबार भ्रमण करूँगा । शायद वहाँ सीताका पता चल जाय ॥ १४३ ॥

एते महामृगा वीर मामीक्षन्ते पुनः पुनः ॥ १५ ॥

वक्तुकामा इह हि मे इङ्गितान्युपलक्षये । ' वीर लक्ष्मण! ये विशाल मृग मेरी ओर बारंबार

देख रहे हैं, मानो यहाँ ये मुझसे कुछ कहना चाहते हैं ।

मैं इनकी चेष्टाओंको समझ रहा हूँ ' ॥ १५३ ॥

तांस्तु दृष्ट्वा नरव्याघ्रो राघवः प्रत्युवाच ह ॥ १६ ॥

क्व सीतेति निरीक्षन् वै बाष्पसंरुद्धया गिरा ।

एवमुक्ता नरेन्द्रेण ते मृगाः सहसोत्थिताः ॥ १७ ॥

दक्षिणाभिमुखाः सर्वे दर्शयन्तो नभःस्थलम् । तदनन्तर उन सबकी ओर देखकर पुरुषसिंह श्रीरामचन्द्रजीने उनसे कहा- ' बताओ, सीता कहाँ हैं? " उन मृगोंकी ओर देखते हुए राजा श्रीरामने जब अश्रुगद्गद वाणीसे इस प्रकार पूछा, तब वे मृग सहसा 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_24_2_Back