वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 811–820

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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किष्किन्धाकाण्डे

मद्दोषकृतदोषां तां यथा तारां तपस्विनीम् ।

सुग्रीव नावमन्ये तथावस्थातुमर्हसि ॥ ५५ ॥

‘ बेचारी ताराकी बड़ी शोचनीय अवस्था हो गयी है । मेरे ही अपराधसे उसे भी अपराधिनी समझकर सुग्रीव उसका तिरस्कार न करे, इस बातकी भी व्यवस्था कीजियेगा ॥

त्वया ह्यनुगृहीतेन शक्यं राज्यमुपासितुम् ।

त्वद्वशे वर्तमानेन तव चित्तानुवर्तिना ॥ ५६ ॥

शक्यं दिवं चार्जयितुं वसुधां चापि शासितुम् । ' सुग्रीव आपका कृपापात्र होकर ही इस राज्यका यथार्थ रूपसे पालन कर सकता है । आपके अधीन होकर आपके चित्तका अनुसरण करनेवाला पुरुष स्वर्ग और पृथ्वीका भी राज्य पा सकता और उसका अच्छी तरह पालन कर सकता है ॥ ५६३ ॥

त्वत्तोऽहं वधमाकांक्षन् वार्यमाणोऽपि तारया ॥ ५७ ॥

सुग्रीवेण सह भ्रात्रा द्वन्द्वयुद्धमुपागतः । ' मैं चाहता था कि आपके हाथसे मेरा वध हो; इसीलिये ताराके मना करनेपर भी मैं अपने भाई सुग्रीवके साथ द्वन्द्वयुद्ध करनेके लिये चला आया ' ॥ ५७३ ॥

इत्युक्त्वा वानरो रामं विरराम हरीश्वरः ॥ ५८ ॥

स तमाश्वासयद् रामो वालिनं व्यक्तदर्शनम् ।

साधुसम्मतया वाचा धर्मतत्त्वार्थयुक्तया ॥ ५ ९ ॥

न संतापस्त्वया कार्य एतदर्थं प्लवङ्गम ।

न वयं भवता चिन्त्या नाप्यात्मा हरिसत्तम ।

वयं भवद्विशेषेण धर्मतः कृतनिश्चयाः ॥ ६० ॥

श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर वानरराज वाली चुप हो गया । उस समय उसकी ज्ञानशक्तिका विकास हो गया था । श्रीरामचन्द्रजीने धर्मके यथार्थ स्वरूपको प्रकट करनेवाली साधु पुरुषोंद्वारा प्रशंसित वाणीमें उससे कहा- ' वानरश्रेष्ठ! तुम्हें इसके लिये संताप नहीं करना चाहिये । कपिप्रवर! तुम्हें हमारे और अपने लिये भी चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि हमलोग तुम्हारी अपेक्षा विशेषज्ञ हैं, इसलिये हमने धर्मानुकूल कार्य करनेका ही निश्चय कर रखा है ॥

दण्ड्ये यः पातयेद् दण्डं दण्ड्यो यश्चापि दण्ड्यते ।

कार्यकारणसिद्धार्थावुभौ तौ नावसीदतः ॥ ६१ ॥

' जो दण्डनीय पुरुषको दण्ड देता है तथा जो दण्डका अधिकारी होकर दण्ड भोगता है, उनमेंसे दण्डनीय व्यक्ति अपने अपराधके फलरूपमें शासकका दिया हुआ दण्ड अष्टादशः सर्गः ७ ९९ भोगकर तथा दण्ड देनेवाला शासक उसके उस फलभोगमें कारण – निमित्त बनकर कृतार्थ हो जाते हैं— अपना - अपना कर्तव्य पूरा कर लेनेके कारण कर्मरूप ऋणसे मुक्त हो जाते हैं । अतः वे दुःखी नहीं होते ॥ ६१ ॥

तद् भवान् दण्डसंयोगादस्माद् विगतकल्मषः ।

गतः स्वां प्रकृतिं धर्म्यं दण्डदिष्टेन वर्त्मना ॥ ६२ ॥

' तुम इस दण्डको पाकर पापरहित हुए और इस दण्डका विधान करनेवाले शास्त्रद्वारा कथित दण्डग्रहणरूप मार्गसे ही चलकर तुम्हें धर्मानुकूल शुद्ध स्वरूपकी प्राप्ति हो गयी ॥ ६२ ॥

त्यज शोकं च मोहं च भयं च हृदये स्थितम् ।

त्वया विधानं हर्यग्र्य न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ ६३ ॥

' अब तुम अपने हृदयमें स्थित शोक, मोह और भयका त्याग कर दो । वानरश्रेष्ठ! तुम दैवके विधानको नहीं लाँघ सकते ॥ ६३ ॥

यथा त्वय्यङ्गदो नित्यं वर्तते वानरेश्वर ।

तथा वर्तेत सुग्रीवे मयि चापि न संशयः ॥ ६४ ॥

' वानरेश्वर! कुमार अङ्गद तुम्हारे जीवित रहनेपर जैसा था, उसी प्रकार सुग्रीवके और मेरे पास भी सुखसे रहेगा, इसमें संशय नहीं है ' ॥ ६४ ॥

स तस्य वाक्यं मधुरं महात्मनः समाहितं धर्मपथानुवर्तितम् । निशम्य रामस्य रणावमर्दिनो वचः सुयुक्तं निजगाद वानरः ॥ ६५ ॥

युद्धमें शत्रुका मानमर्दन करनेवाले महात्मा श्रीरामचन्द्रजीका धर्ममार्गके अनुकूल और मानसिक शङ्काओंका समाधान करनेवाला मधुर वचन सुनकर वानर वालीने यह सुन्दर युक्तियुक्त वचन कहा— ॥६५ ॥

शराभितप्तेन वि मया प्रभाषितस्त्वं यदजानता विभो । इदं महेन्द्रोपमभीमविक्रम प्रसादितस्त्वं क्षम मे नरेश्वर ॥ ६६ ॥

' प्रभो! देवराज इन्द्रके समान भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले नरेश्वर! मैं आपके बाणसे पीड़ित होनेके कारण अचेत हो गया था । इसलिये अनजानमें मैंने जो आपके प्रति कठोर बात कह डाली है, उसे आप क्षमा कीजियेगा । इसके । लिये मैं प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ ॥ ६६ ॥

श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥

इत्यार्षे आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित

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८०० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे एकोनविंशः सर्गः अङ्गदसहित ताराका भागे हुए वानरोंसे बात करके वालीके समीप आना और उसकी दुर्दशा देखकर रोना

स वानरमहाराजः शयानः शरपीडितः ।

प्रत्युक्तो हेतुमद्वाक्यैर्नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ १ ॥

वानरोंका महाराज वाली बाणसे पीड़ित होकर भूमिपर पड़ा था । श्रीरामचन्द्रजीके युक्तियुक्त वचनोंद्वारा अपनी बातका उत्तर पाकर उसे फिर कोई जवाब न सूझा ॥ १ ॥

अश्मभिः परिभिन्नाङ्गः पादपैराहतो भृशम् ।

रामबाणेन चाक्रान्तो जीवितान्ते मुमोह सः ॥ २ ॥

पत्थरोंकी मार पड़नेसे उसके अङ्ग टूट - फूट गये थे । वृक्षोंके आघातसे भी वह बहुत घायल हो गया था और श्रीरामके बाणसे आक्रान्त होकर तो वह जीवनके अन्तकालमें

ही पहुँच गया था । उस समय वह मूच्छित हो गया ॥ २ ॥

तं भार्या बाणमोक्षेण रामदत्तेन संयुगे ।

हतं प्लवगशार्दूलं तारा शुश्राव वालिनम् ॥ ३ ॥

उसकी पत्नी ताराने सुना कि युद्धस्थलमें वानरश्रेष्ठ वाली श्रीरामके चलाये हुए बाणसे मारे गये ॥ ३ ॥

सा सपुत्राप्रियं श्रुत्वा वधं भर्तुः सुदारुणम् ।

निष्पपात भृशं तस्मादुद्विग्ना गिरिकन्दरात् ॥ ४ ॥

अपने स्वामीके वधका अत्यन्त भयंकर एवं अप्रिय समाचार सुनकर वह बहुत उद्विग्न हो उठी और अपने पुत्र अङ्गदको साथ ले उस पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकली ॥ ४ ॥

ये त्वङ्गदपरीवारा वानरा हि महाबलाः ।

ते सकार्मुकमालोक्य रामं त्रस्ताः प्रदुद्रुवुः ॥ ५ ॥

अङ्गदको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करनेवाले जो महाबली वानर थे, वे श्रीरामचन्द्रजीको धनुष लिये देख भयभीत होकर भाग चले ॥ ५ ॥

सा ददर्श ततस्त्रस्तान् हरीनापततो द्रुतम् ।

यूथादेव परिभ्रष्टान् मृगान् निहतयूथपान् ॥ ६ ॥

ताराने वेगसे भागकर आते हुए उन भयभीत वानरोंको देखा । वे जिनके यूथपति मारे गये हों, उन यूथभ्रष्ट मृगोंके समान जान पड़ते थे ॥ ६ ॥

तानुवाच समासाद्य दुःखितान् दुःखिता सती ।

रामवित्रासितान् सर्वाननुबद्धानिवेषुभिः ॥ ७ ॥

वे सब वानर श्रीरामसे इस प्रकार डरे हुए थे, मानो उनके बाण इनके पीछे आ रहे हों । उन दुःखी वानरोंके

पास पहुँचकर सती - साध्वी तारा और भी दुःखी हो गयी ।

तथा उनसे इस प्रकार बोली- ॥ ७ ॥

वानरा राजसिंहस्य यस्य यूयं पुरःसराः ।

तं विहाय सुवित्रस्ताः कस्माद् द्रवत दुर्गताः ॥ ८ ॥

' वानरो! तुम तो उन राजसिंह वालीके आगे - आगे चलनेवाले थे । अब उन्हें छोड़कर अत्यन्त भयभीत हो दुर्गतिमें पड़कर क्यों भागे जा रहे हो? ॥ ८ ॥

राज्यहेतोः स चेद् भ्राता भ्रात्रा क्रूरेण पातितः ।

प्रहितैर्दूरान्मार्गणैर्दूरपातिभिः ॥ ९ ॥

' यदि राज्यके लोभसे उस क्रूर भाई सुग्रीवने श्रीरामको प्रेरित करके उनके द्वारा दूरसे चलाये हुए और दूरतक जानेवाले बाणोंद्वारा अपने भाईको मरवा दिया है तो तुमलोग क्यों भागे जा रहे हो? ' ॥ ९ ॥

कपिपल्या वचः श्रुत्वा कपयः कामरूपिणः ।

प्राप्तकालमविश्लिष्टमूचुर्वचनमङ्गनाम् ॥१० ॥

वालीकी पत्नीका वह वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन वानरोंने कल्याणमयी तारा देवीको सम्बोधित करके सर्वसम्मतिसे स्पष्ट शब्दोंमें यह समयोचित बात कही — ॥१० ॥

जीवपुत्रे निवर्तस्व पुत्रं रक्षस्व चाङ्गदम् ।

अन्तको रामरूपेण हत्वा नयति वालिनम् ॥ ११ ॥

' देवि! अभी तुम्हारा पुत्र जीवित है । तुम लौट चलो और अपने पुत्र अङ्गदकी रक्षा करो । श्रीरामका रूप धारण करके स्वयं यमराज आ पहुँचा है, जो वालीको मारकर अपने साथ ले जा रहा है ॥ ११ ॥

क्षिप्तान् वृक्षान् समाविध्य विपुलाश्च तथा शिलाः ।

वाली वज्रसमैर्बाणैर्वज्रेणेव निपातितः ॥ १२ ॥

' वालीके चलाये हुए वृक्षों और बड़ी - बड़ी शिलाओंको अपने वज्रतुल्य बाणोंसे विदीर्ण करके श्रीरामने वालीको मार गिराया है । मानो वज्रधारी इन्द्रने अपने वज्रके द्वारा किसी महान् पर्वतको धराशायी कर दिया हो ॥ १२ ॥

अभिभूतमिदं सर्वं विद्रुतं वानरं बलम् ।

अस्मिन् प्लवगशार्दूले हते शक्रसमप्रभे ॥ १३ ॥

' इन्द्रके समान तेजस्वी इन वानरश्रेष्ठ वालीके मारे जानेपर यह सारी वानर - सेना श्रीरामसे पराजित - सी होकर भाग खड़ी हुई है ॥ १३ ॥

रक्ष्यतां नगरी शूरैरङ्गदश्चाभिषिच्यताम् ।

पदस्थं वालिनः पुत्रं भजिष्यन्ति प्लवंगमाः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 813

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किष्किन्धाकाण्डे ' तुम शूरवीरोंद्वारा इस नगरीकी रक्षा करो । कुमार अङ्गदका किष्किन्धाके राज्यपर अभिषेक कर दो । राजसिंहासनपर बैठे हुए वालिकुमार अङ्गदकी सभी वानर सेवा करेंगे ॥ १४ ॥

अथवारुचितं स्थानमिह ते रुचिरानने ।

आविशन्ति च दुर्गाणि क्षिप्रमद्यैव वानराः ॥ १५ ॥

अभार्याः सहभार्याश्च सन्त्यत्र वनचारिणः ।

लुब्धेभ्यो विप्रलब्धेभ्यस्तेभ्यो नः सुमहद्भयम् ॥ १६ ॥

' अथवा सुमुखि! अब इस नगरमें तुम्हारा रहना हमें अच्छा नहीं जान पड़ता; क्योंकि किष्किन्धाके दुर्गम स्थानोंमें अभी सुग्रीवपक्षीय वानर शीघ्र प्रवेश करेंगे । यहाँ बहुत - से ऐसे वनचारी वानर हैं, जिनमेंसे कुछ तो अपनी स्त्रियोंके साथ हैं और कुछ स्त्रियोंसे बिछुड़े हुए हैं । उनमें राज्यविषयक लोभ पैदा हो गया है और पहले हमलोगोंके द्वारा राज्य-सुखसे वञ्चित किये गये हैं । अतः इस समय उन सबसे हमलोगोंको महान् भय प्राप्त हो सकता है ' ॥ १५ - १६ ॥

अल्पान्तरगतानां तु श्रुत्वा वचनमङ्गना ।

आत्मनः प्रतिरूपं सा बभाषे चारुहासिनी ॥ १७ ॥

अभी थोड़ी ही दूरतक आये हुए उन वानरोंकी यह बात सुनकर मनोहर हासवाली कल्याणी ताराने उन्हें अपने अनुरूप उत्तर दिया – ॥ १७ ॥

पुत्रेण मम किं कार्यं राज्येनापि किमात्मना ।

कपिसिंहे महाभागे तस्मिन् भर्तरि नश्यति ॥ १८ ॥

' वानरो! जब मेरे महाभाग पतिदेव कपिसिंह वाली ही नष्ट हो रहे हैं, तब मुझे पुत्रसे, राज्यसे तथा अपने इस जीवनसे भी क्या प्रयोजन है? ॥ १८ ॥

पादमूलं गमिष्यामि तस्यैवाहं महात्मनः ।

योऽसौ रामप्रयुक्तेन शरेण विनिपातितः ॥ १ ९ ॥

' मैं तो, जिन्हें श्रीरामके चलाये हुए बाणने मार गिराया है, उन महात्मा वालीके चरणोंके समीप ही जाऊँगी ' ॥

एवमुक्त्वा प्रदुद्राव रुदती शोकमूर्च्छिता ।

शिरश्चोरश्च बाहुभ्यां दुःखेन समभिघ्नती ॥ २० ॥

ऐसा कहकर शोकसे व्याकुल हुई तारा रोती और अपने दोनों हाथोंसे दुःखपूर्वक सिर एवं छाती पीटती हुई बड़े जोरसे दौड़ी ॥ २० ॥

सा व्रजन्ती ददर्शाथ पतिं निपतितं भुवि ।

हन्तारं दानवेन्द्राणां समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥२१ ॥

आगे बढ़ती हुई ताराने देखा, जो युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले दानवराजका भी वध करनेमें समर्थ थे, वे मेरे पति वानरराज वाली पृथ्वीपर पड़े हुए हैं ॥ २१ ॥

एकोनविंशः सर्गः | क्षेतारं पर्वतेन्द्राणां महावातसमाविष्टं शक्रतुल्यपराक्रान्तं नर्दन्तं नर्दतां भीमं | शार्दूलेनामिषस्यार्थे वज्र चलानेवाले बड़े पर्वतोंको उठाकर ८०१

वज्राणामिव वासवम् ।

महामेघौघनिःस्वनम् ॥ २२ ॥

वृष्ट्वेवोपरतं घनम् ।

शूरं शूरेण पातितम् ।

मृगराजमिवाहतम् ॥ २३ ॥

इन्द्रके समान जो रणभूमिमें बड़े-फेंकते थे, जिनके वेगमें प्रचण्ड आँधीका समावेश था, जिनका सिंहनाद महान् मेघोंकी गम्भीर गर्जनाको भी तिरस्कृत कर देता था तथा जो इन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे, वे ही इस समय वर्षा करके शान्त हुए बादलके समान चेष्टासे विरत हो गये हैं । जो स्वयं गर्जना करके गर्जनेवाले वीरोंके मनमें भय उत्पन्न कर देते थे, वे शूरवीर वाली एक दूसरे शूरवीरके द्वारा मार गिराये गये हैं । जैसे मांसके लिये एक सिंहने दूसरे सिंहको मार डाला हो, उसी प्रकार राज्यके लिये अपने भाईके द्वारा ही इनका वध किया गया है ॥। २२-२३ ॥

अर्चितं सर्वलोकस्य सपताकं सवेदिकम् ।

नागहेतोः सुपर्णेन चैत्यमुन्मथितं यथा ॥ २४ ॥

जो सब लोगोंके द्वारा पूजित हो, जहाँ पताका फहरायी गयी हो तथा जिसके पास देवताकी वेदी शोभा पाती हो, उस चैत्य वृक्ष या देवालयको वहाँ छिपे हुए किसी नागको पकड़नेके लिये यदि गरुड़ने मथ डाला हो— नष्ट - भ्रष्ट कर दिया हो तो उसकी जैसी दुरवस्था देखी जाती है, वैसी ही दशा आज वालीकी हो रही है ( यह सब ताराने देखा ) ॥

अवष्टभ्यावतिष्ठन्तं ददर्श धनुरूर्जितम् ।

रामं रामानुजं चैव भर्तुश्चैव तथानुजम् ॥ २५ ॥

आगे जानेपर उसने देखा, अपने तेजस्वी धनुषको धरतीपर टेककर उसके सहारे श्रीरामचन्द्रजी खड़े हैं । साथ ही उनके छोटे भाई लक्ष्मण हैं और वहीं पतिके छोटे भाई सुग्रीव भी मौजूद हैं ॥ २५ ॥

तानतीत्य समासाद्य भर्तारं निहतं रणे ।

समीक्ष्य व्यथिता भूमौ सम्भ्रान्ता निपपात ह ॥ २६ ॥

उन सबको पार करके वह रणभूमिमें घायल पड़े हुए अपने पतिके पास पहुँची । उन्हें देखकर उसके मनमें बड़ी व्यथा हुई और वह अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २६ ॥

सुप्तेव पुनरुत्थाय आर्यपुत्रेति वादिनी ।

रुरोद सा पतिं दृष्ट्वा संवीतं मृत्युदामभिः ॥२७ ॥

फिर मानो वह सोकर उठी हो, इस प्रकार ' हा | आर्यपुत्र! ' कहकर मृत्युपाशसे बँधे हुए पति 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) Section_27_1_Front

पृष्ठ 814

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८०२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे देखती हुई रोने लगी ॥ २७ ॥ उस समय कुररीके समान करुण क्रन्दन करत

तामवेक्ष्य तु सुग्रीवः क्रोशन्तीं कुररीमिव । हुई तारा तथा उसके साथ आये हुए अङ्गदको देखकर विषादमगमत् कष्टं दृष्ट्वा चाङ्गदमागतम् ॥ २८ ॥ सुग्रीवको बड़ा कष्ट हुआ । वे विषादमें डूब गये ॥ २८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥१ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ विंशः ताराका

रामचापविसृष्टेन शरेणान्तकरेण तम् ।

दृष्ट्वा विनिहतं भूमौ तारा ताराधिपानना ॥ १ ॥

सा समासाद्य भर्तारं पर्यष्वजत भामिनी ।

इषुणाभिहतं दृष्ट्वा वालिनं कुञ्जरोपमम् ॥ २ ॥

वानरं पर्वतेन्द्राभं शोकसंतप्तमानसा ।

तारा तरुमिवोन्मूलं पर्यदेवयतातुरा ॥३ ॥

चन्द्रमुखी ताराने देखा, मेरे स्वामी वानरराज वाली श्रीरामचन्द्रजीके धनुषसे छूटे हुए प्राणान्तकारी बाणसे घायल होकर धरतीपर पड़े हैं, उस अवस्थामें उनके पास पहुँचकर वह भामिनी उनके शरीरसे लिपट गयी । जो अपने शरीरसे गजराज और गिरिराजको भी मात करते थे, उन्हीं वानरराजको बाणसे आहत होकर जड़से उखड़े हुए वृक्षकी भाँति धराशायी हुआ देख ताराका हृदय शोकसे संतप्त हो उठा और वह आतुर होकर विलाप करने लगी- ॥१-३ ॥

रणे दारुणविक्रान्त प्रवीर प्लवतां वर ।

किमिदानीं पुरोभागामद्य त्वं नाभिभाषसे ॥ ४ ॥

' रणमें भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाले महान् वीर वानरराज! आज इस समय मुझे अपने सामने पाकर भी आप बोलते क्यों नहीं हैं? ॥ ४ ॥

उत्तिष्ठ हरिशार्दूल भजस्व शयनोत्तमम् ।

नैवंविधाः शेरते हि भूमौ नृपतिसत्तमाः ॥ ५ ॥

कपिश्रेष्ठ! उठिये और उत्तम शय्याका आश्रय लीजिये ।

आप - जैसे श्रेष्ठ भूपाल पृथ्वीपर नहीं सोते हैं ॥ ५ ॥

अतीव खलु ते कान्ता वसुधा वसुधाधिप ।

गतासुरपि तां गात्रैर्मां विहाय निषेवसे ॥ ६ ॥

' पृथ्वीनाथ! निश्चय ही यह पृथ्वी आपको अत्यन्त प्यारी है, तभी तो निष्प्राण होनेपर भी आप आज मुझे छोड़कर अपने अङ्गोंसे इस वसुधाका ही आलिङ्गन किये सो रहे हैं ।

व्यक्तमद्य त्वया वीर धर्मतः सम्प्रवर्तता ।

किष्किन्धेव पुरी रम्या स्वर्गमार्गे विनिर्मिता ॥ ७ ॥

' वीरवर! आपने धर्मयुक्त युद्ध करके स्वर्गके सर्गः विलाप मार्गमें भी अवश्य ही किष्किन्धाकी भाँति कोई रमणीय पुरी बना ली है, यह बात आज स्पष्ट हो गयी ( अन्यथा आप किष्किन्धाको छोड़कर यहाँ क्यों सोते ) ॥ ७ ॥

यान्यस्माभिस्त्वया सार्धं वनेषु मधुगन्धिषु ।

विहृतानि त्वया काले तेषामुपरमः कृतः ॥ ८ ॥

' आपके साथ मधुर सुगन्धयुक्त वनोंमें हमने जो-जो विहार किये हैं, उन सबको इस समय आपने सदाके लिये समाप्त कर दिया ॥ ८ ॥

निरानन्दा निराशाहं निमग्ना शोकसागरे ।

त्वयि पञ्चत्वमापन्ने महायूथपयूथपे॥९ ॥

' नाथ! आप बड़े - बड़े यूथपतियोंके भी स्वामी थे । आज आपके मारे जानेसे मेरा सारा आनन्द लुट गया । मैं सब प्रकारसे निराश होकर शोकके समुद्रमें डूब गयी हूँ ॥

हृदयं सुस्थितं मह्यं दृष्ट्वा निपतितं भुवि ।

यन्न शोकाभिसंतप्तं स्फुटतेऽद्य सहस्त्रधा ॥१० ॥

' निश्चय ही मेरा हृदय बड़ा कठोर है, जो आज आपको पृथ्वीपर पड़ा देखकर भी शोकसे संतप्त हो फट नहीं जाता- - इसके हजारों टुकड़े नहीं हो जाते ॥ १० ॥

सुग्रीवस्य त्वया भार्या हृता स च विवासितः ।

यत् तत् तस्य त्वया व्युष्टिः प्राप्तेयं प्लवगाधिप ॥११ ॥

' वानरराज! आपने जो सुग्रीवकी स्त्री छीन ली और उन्हें घरसे बाहर निकाल दिया, उसीका यह फल आपको प्राप्त हुआ है ॥ ११ ॥

निःश्रेयसपरा मोहात् त्वया चाहं विगर्हिता ।

यैषाब्रुवं हितं वाक्यं वानरेन्द्र हितैषिणी ॥ १२ ॥

‘ वानरेन्द्र! मैं आपका हित चाहती थी और आपके कल्याण - साधनमें ही लगी रहती थी तो भी मैंने आपसे जो हितकर बात कही थी, उसे मोहवश आपने नहीं माना और उलटे मेरी ही निन्दा की ॥ १२ ॥

रूपयौवनदृप्तानां दक्षिणानां च मानद ।

नूनमप्सरसामार्य चित्तानि प्रमथिष्यसि ॥ १३ ॥

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पृष्ठ 815

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किष्किन्धाकाण्डे विंशः सर्गः ८०३ ' दूसरोंको मान देनेवाले आर्यपुत्र! निश्चय ही आप । स्वर्गमें जाकर रूप और यौवनके अभिमानसे मत्त रहनेवाली केलिकलामें निपुण अप्सराओंके मनको अपने दिव्य सौन्दर्यसे मथ डालेंगे ॥ १३ ॥

कालो निःसंशयो नूनं जीवितान्तकरस्तव ।

बलाद् येनावपन्नोऽसि सुग्रीवस्यावशो वशम् ॥ १४ ॥

' निश्चय ही आज आपके जीवनका अन्त कर देनेवाला संशयरहित काल यहाँ आ पहुँचा था, जिसने किसीके भी वशमें न आनेवाले आपको बलपूर्वक सुग्रीवके वशमें डाल दिया ' ॥ १४ ॥

अस्थाने वालिनं हत्वा युध्यमानं परेण च ।

न संतप्यति काकुत्स्थः कृत्वा कर्मसुगर्हितम् ॥ १५ ॥

( अब श्रीरामको सुनाकर बोली ) – ‘ ककुत्स्थ-कुलमें अवतीर्ण हुए श्रीरामचन्द्रजीने दूसरेके साथ युद्ध करते हुए वालीको मारकर अत्यन्त निन्दित कर्म किया है । इस कुत्सित कर्मको करके भी जो ये संतप्त नहीं हो रहे हैं, यह सर्वथा अनुचित है ' ॥ १५ ॥

वैधव्यं शोकसंतापं कृपणाकृपणा सती ।

अदुःखोपचिता पूर्वं वर्तयिष्याम्यनाथवत् ॥ १६ ॥

( फिर वालीसे बोली— ) ' मैंने कभी दीनतापूर्ण जीवन नहीं बिताया था, ऐसे महान् दुःखका सामना नहीं किया था; परंतु आज आपके बिना मैं दीन हो गयी, अब मुझे अनाथकी भाँति शोक संतापसे पूर्ण वैधव्य जीवन व्यतीत करना होगा ॥ १६ ॥

लालितश्चाङ्गदो वीरः सुकुमारः सुखोचितः ।

वत्स्यते कामवस्थां मे पितृव्ये क्रोधमूर्च्छिते ॥ १७ ॥

' नाथ! आपने अपने वीरपुत्र अङ्गदको, जो सुख भोगने योग्य और सुकुमार है, बड़ा लाड़ - प्यार किया था । अब क्रोधसे पागल हुए चाचाके वशमें पड़कर मेरे बेटेकी क्या दशा होगी? ॥ १७ ॥

कुरुष्व पितरं पुत्र सुदृष्टं धर्मवत्सलम् ।

दुर्लभं दर्शनं तस्य तव वत्स भविष्यति ॥ १८ ॥

' बेटा अङ्गद! अपने धर्मप्रेमी पिताको अच्छी तरह देख लो । अब तुम्हारे लिये उनका दर्शन दुर्लभ हो जायगा ॥ १८ ॥

समाश्वासय पुत्रं त्वं संदेशं संदिशस्व मे ।

मूर्ध्नि चैनं समाघ्राय प्रवासं प्रस्थितो ह्यसि ॥ १ ९ ॥

‘ प्राणनाथ! आप दूसरे देशको जा रहे हैं । अपने पुत्रका मस्तक सूँघकर इसे धैर्य बँधाइये और मेरे लिये भी कुछ संदेश दीजिये ॥ १ ९ ॥ 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_27_2_Front

रामेण हि महत् कर्म कृतं त्वामभिनिघ्नता ।

आनृण्यं तु गतं तस्य सुग्रीवस्य प्रतिश्रवे ॥ २० ॥

श्रीरामने आपको मारकर बहुत बड़ा कर्म किया है ।

उन्होंने सुग्रीवसे जो प्रतिज्ञा की थी, उसके ऋणको उतार दिया ' ॥

सकामो भव सुग्रीव रुमां त्वं प्रतिपत्स्यसे ।

भुङ्क्ष्व राज्यमनुद्विग्नः शस्तो भ्राता रिपुस्तव ॥ २१ ॥

( अब सुग्रीवको सुनाकर कहने लगी- ) ' सुग्रीव! तुम्हारा मनोरथ सफल हो । तुम्हारे भाई, जिन्हें तुम अपना शत्रु समझते थे, मारे गये । अब बेखटके राज्य भोगो । रुमाको भी प्राप्त कर लोगे ' ॥ २१ ॥

किं मामेवं प्रलपतीं प्रियां त्वं नाभिभाषसे ।

इमाः पश्य वरा बायो भार्यास्ते वानरेश्वर ॥ २२ ॥

( फिर वालीसे बोली- ' वानरेश्वर! मैं आपकी प्यारी पत्नी हूँ और इस तरह रोती- कलपती हूँ, फिर भी आप मुझसे बोलते क्यों नहीं हैं? देखिये, आपकी ये बहुत - सी सुन्दरी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं ' ॥ २२ ॥

तस्या विलपितं श्रुत्वा वानर्यः सर्वतश्च ताः ।

परिगृह्याङ्गदं दीना दुःखार्ताः प्रतिचुक्रुशुः ॥ २३ ॥

ताराका विलाप सुनकर अन्य वानर - पलियाँ भी सब ओरसे अङ्गदको पकड़कर दीन एवं दुःखसे व्याकुल हो जोर - जोरसे क्रन्दन करने लगीं ॥ २३ ॥

किमङ्गदं साङ्गदवीरबाहो विहाय यातोऽसि चिरं प्रवासम् । न युक्तमेवं गुणसंनिकृष्टं विहाय पुत्रं प्रियचारुवेषम् ॥ २४ ॥

( तदनन्तर ताराने फिर कहा- ) ' बाजूबन्दसे विभूषित वीर भुजाओंवाले वानरराज! आप अङ्गदको छोड़कर दीर्घकालके लिये दूसरे देशमें क्यों जा रहे हैं? जो गुणोंमें आपके सर्वथा निकट है— जो आपके समान ही गुणवान् है तथा जिसका प्रिय एवं मनोहर वेश है, ऐसे प्रिय पुत्रको त्यागकर इस प्रकार चला जाना आपके लिये कदापि उचित नहीं है ॥२४ ॥

यद्यप्रियं किंचिदसम्प्रधार्य कृतं मया स्यात् तव दीर्घबाहो । क्षमस्व तद्धरिवंशनाथ व्रजामि मूर्ध्ना तव वीर पादौ ॥ २५ ॥

' महाबाहो! यदि नासमझीके कारण मैंने आपका कोई अपराध किया हो तो आप उसे क्षमा कर दें । वानरवंशके स्वामी वीर आर्यपुत्र! मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह प्रार्थना करती हूँ ' ॥ २५ ॥

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८०४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तथा तु तारा करुणं रुदन्ती इस प्रकार अन्य वानर - पत्नियोंके साथ पतिके भर्तुः समीपे सह वानरीभिः । समीप करुण विलाप करती हुई अनिन्द्य सुन्दरी व्यवस्थत प्रायमनिन्द्यवर्णा जहाँ वाली पृथ्वीपर पड़ा था, वहीं उसके समीप बैठ

उपोपवेष्टुं भुवि यत्र वाली ॥ २६ ॥ । आमरण अनशन करनेका निश्चय किया ॥२६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे विंशः सर्गः ॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २० ॥

एकविंशः सर्गः हनुमान्जीका ताराको समझाना और ताराका पतिके अनुगमनका ही निश्चय करना

ततो निपतितां तारां च्युतां तारामिवाम्बरात् ।

शनैराश्वासयामास हनुमान् हरियूथपः ॥ १ ॥

ताराको आकाशसे टूटकर गिरी हुई तारिकाके समान पृथ्वीपर पड़ी देख वानरयूथपति हनुमान्ने धीरे-धीरे समझाना आरम्भ किया — ॥ १ ॥

गुणदोषकृतं जन्तुः स्वकर्म फलहेतुकम् ।

अव्यग्रस्तदवाप्नोति सर्वं प्रेत्य शुभाशुभम् ॥ २ ॥

' देवि! जीवके द्वारा गुणबुद्धिसे अथवा दोषबुद्धिसे किये हुए जो अपने कर्म हैं, वे ही सुख - दुःखरूप फलकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं । परलोकमें जाकर प्रत्येक जीव शान्तभावसे रहकर अपने शुभ और अशुभ - सभी कर्मोंका फल भोगता है ॥२ ॥

शोच्या शोचसि कं शोच्यं दीनं दीनानुकम्पसे ।

कश्च कस्यानुशोच्योऽस्ति देहेऽस्मिन् बुदबुदोपमे ॥ ३ ॥

' तुम स्वयं शोचनीया हो; फिर दूसरे किसको शोचनीय समझकर शोक कर रही हो? स्वयं दीन होकर दूसरे किस दीनपर दया करती हो? पानीके बुलबुलेके समान इस शरीरमें रहकर कौन जीव किस जीवके लिये शोचनीय है? ॥ ३ ॥

अङ्गदस्तु कुमारोऽयं द्रष्टव्यो जीवपुत्रया ।

आयत्यां च विधेयानि समर्थान्यस्य चिन्तय ॥ ४ ॥

' तुम्हारे पुत्र कुमार अङ्गद जीवित हैं । अब तुम्हें इन्हींकी ओर देखना चाहिये और इनके लिये भविष्यमें जो उन्नतिके साधक श्रेष्ठ कार्य हों, उनका विचार करना चाहिये ॥४ ॥

जानास्यनियतामेवं भूतानामागतिं गतिम् ।

तस्माच्छुभं हि कर्तव्यं पण्डिते नेह लौकिकम् ॥५ ॥

देवि! तुम विदुषी हो, अतः जानती ही हो कि प्राणियोंके जन्म और मृत्युका कोई निश्चित समय नहीं है । इसलिये शुभ ( परलोकके लिये सुखद ) कर्म ही करना चाहिये । अधिक रोना - धोना आदि जो लौकिक कर्म ( व्यवहार ) है, उसे नहीं करना चाहिये ॥ ५ ॥

यस्मिन् हरिसहस्राणि शतानि नियुतानि च ।

वर्तयन्ति कृताशानि सोऽयं दिष्टान्तमागतः ॥ ६ ॥

' सैकड़ों, हजारों और लाखों वानर जिनपर आशा लगाये जीवन - निर्वाह करते थे, वे ही ये वानरराज आज अपनी प्रारब्धनिर्मित आयुकी अवधि पूरी कर चुके ॥ ६ ॥

यदयं न्यायदृष्टार्थः सामदानक्षमापरः ।

गतो धर्मजितां भूमिं नैनं शोचितुमर्हसि ॥ ७ ॥

' इन्होंने नीतिशास्त्र के अनुसार अर्थका साधन-राज्य - कार्यका संचालन किया है । ये उपयुक्त समयपर साम, दान और क्षमाका व्यवहार करते आये हैं । अतः धर्मानुसार प्राप्त होनेवाले लोकमें गये हैं । इनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥७ ॥

सर्वे च हरिशार्दूलाः पुत्रश्चायं तवाङ्गदः ।

हर्वृक्षपतिराज्यं च त्वत्सनाथमनिन्दिते ॥। ८ ॥

' सती साध्वी देवि! ये सभी श्रेष्ठ वानर, ये तुम्हारे पुत्र अङ्गद तथा वानर और भालुओंका यह राज्य — सब तुमसे ही सनाथ हैं - तुम्हीं इन सबकी स्वामिनी हो ॥ ८ ॥

ताविमौ शोकसंतप्तौ शनैः प्रेरय भामिनि ।

त्वया परिगृहीतोऽयमङ्गदः शास्तु मेदिनीम् ॥ ९ ॥

‘ भामिनि! ये अङ्गद और सुग्रीव दोनों ही शोकसे

संतप्त हो रहे हैं । तुम इन्हें भावी कार्यके लिये प्रेरित करो ।

तुम्हारे अधीन रहकर अङ्गद इस पृथ्वीका शासन करें ॥ ९ ॥

संततिश्च यथा दृष्टा कृत्यं यच्चापि साम्प्रतम् ।

राज्ञस्तत् क्रियतां सर्वमेष कालस्य निश्चयः ॥ १० ॥

' शास्त्रमें संतान होनेका जो प्रयोजन बतलाया गया है तथा इस समय राजा वालीके पारलौकिक कल्याणके लिये जो कुछ कर्तव्य है, वही करो — यही समयकी निश्चित प्रेरणा है ॥ १० ॥

75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) Section_27_2_Back

पृष्ठ 817

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किष्किन्धाकाण्डे

संस्कार्यों हरिराजस्तु अङ्गदश्चाभिषिच्यताम् ।

सिंहासनगतं पुत्रं पश्यन्ती शान्तिमेष्यसि ॥ ११ ॥

‘ वानरराजका अन्त्येष्टि - संस्कार और कुमार अङ्गदका राज्याभिषेक किया जाय । बेटेको राजसिंहासनपर बैठा देखकर तुम्हें शान्ति मिलेगी ' ॥ ११ ॥

सा तस्य वचनं श्रुत्वा भर्तृव्यसनपीडिता ।

अब्रवीदुत्तरं तारा हनूमन्तमवस्थितम् ॥ १२ ॥

तारा अपने स्वामीके विरह - शोकसे पीड़ित थी । वह उपर्युक्त वचन सुनकर सामने खड़े हुए हनुमान्जीसे बोली-अङ्गदप्रतिरूपाणां पुत्राणामेकतः शतम् । हतस्याप्यस्य वीरस्य गात्रसंश्लेषणं वरम् ॥ १३ ॥

4 ' अङ्गदके समान सौ पुत्र एक ओर और मरे होनेपर भी इस वीरवर स्वामीका आलिङ्गन करके सती होना दूसरी ओर – इन दोनोंमेंसे अपने वीर पतिके शरीरका आलिङ्गन ही मुझे श्रेष्ठ जान पड़ता है ॥ १३ ॥

न चाहं हरिराज्यस्य प्रभवाम्यङ्गदस्य वा ।

पितृव्यस्तस्य सुग्रीवः सर्वकार्येष्वनन्तरः ॥ १४ ॥

' मैं न तो वानरोंके राज्यकी स्वामिनी हूँ और न । द्वाविंशः सर्गः ८०५ मुझे अङ्गदके लिये ही कुछ करनेका अधिकार है । इसके चाचा सुग्रीव ही समस्त कार्योंके लिये समर्थ हैं और वे ही मेरी अपेक्षा इसके निकटवर्ती भी हैं ॥ १४ ॥

नह्येषा बुद्धिरास्थेया हनूमन्नङ्गदं प्रति ।

पिता हि बन्धुः पुत्रस्य न माता हरिसत्तम ॥ १५ ॥

' कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी! अङ्गदके विषयमें आपकी यह सलाह मेरे लिये काममें लाने योग्य नहीं है । आपको यह समझना चाहिये कि पुत्रके वास्तविक बन्धु ( सहायक )

पिता और चाचा ही हैं । माता नहीं ॥१५ ॥

नहि मम हरिराजसंश्रयात् क्षमतरमस्ति परत्र चेह वा । अभिमुखहतवीरसेवितं शयनमिदं मम सेवितुं क्षमम् ॥ १६ ॥

मेरे लिये वानरराज वालीका अनुगमन करनेसे बढ़कर इस लोक या परलोकमें कोई भी कार्य उचित नहीं है । युद्धमें शत्रुसे जूझकर मरे हुए अपने वीर स्वामीके द्वारा सेवित चिता आदिको शय्यापर शयन करना ही मेरे लिये सर्वथा योग्य है ' ॥ १६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २१ ॥

द्वाविंशः सर्गः वालीका सुग्रीव और अङ्गदसे अपने मनकी बात कहकर प्राणोंको त्याग देना

वीक्षमाणस्तु मन्दासुः सर्वतो मन्दमुच्छ्वसन् ।

आदावेव तु सुग्रीवं ददर्शानुजमग्रतः ॥ १ ॥

वालीके प्राणोंकी गति शिथिल पड़ गयी थी । वह धीरे - धीरे ऊर्ध्व साँस लेता हुआ सब ओर देखने लगा । सबसे पहले उसने अपने सामने खड़े हुए छोटे भाई सुग्रीवको देखा ॥१ ॥

तं प्राप्तविजयं वाली सुग्रीवं प्लवगेश्वरम् ।

आभाष्य व्यक्तया वाचा सस्नेहमिदमब्रवीत् ॥ २ ॥

युद्धमें जिन्हें विजय प्राप्त हुई थी, उन वानरराज सुग्रीवको सम्बोधित करके वालीने बड़े स्नेहके साथ स्पष्ट वाणीमें कहा - ॥२ ॥

सुग्रीव दोषेण न मां गन्तुमर्हसि किल्बिषात् ।

कृष्यमाणं भविष्येण बुद्धिमोहेन मां बलात् ॥ ३ ॥

' सुग्रीव! पूर्वजन्मके किसी पापसे अवश्यम्भावी बुद्धिमोहने मुझे बलपूर्वक आकृष्ट कर लिया था, इसीलिये मैं तुम्हें शत्रु समझने लगा था और इस कारण । मेरे द्वारा जो तुम्हारे प्रति अपराध हुए, उसके लिये तुम्हें मेरे प्रति दोष -दृष्टि नहीं करनी चाहिये ॥३ ॥

युगपद् विहितं तात न मन्ये सुखमावयोः ।

सौहार्दं भ्रातृयुक्तं हि तदिदं जातमन्यथा ॥४ ॥

' तात! मैं समझता हूँ हम दोनोंके लिये एक साथ रहकर सुख भोगना नहीं बदा था, इसीलिये दो भाइयोंमें जो प्रेम होना चाहिये, वह न होकर हमलोगों में उसके विपरीत वैरभाव उत्पन्न हो गया ॥४ ॥

प्रतिपद्य त्वमद्यैव राज्यमेषां वनौकसाम् ।

मामप्यद्यैव गच्छन्तं विद्धि वैवस्वतक्षयम् ॥ ५ ॥

' भाई! तुम आज ही यह वानरोंका राज्य स्वीकार करो तथा मुझे अभी यमराजके घर जानेको तैयार समझो ॥

जीवितं च हि राज्यं च श्रियं च विपुलां तथा ।

प्रजहाम्येष वै तूर्णमहं चागर्हितं यशः ॥६ ॥

' मैं अपने जीवन, राज्य, विपुल सम्पत्ति औ प्रशंसित यशका भी तुरंत ही त्याग कर रहा हूँ ॥६ ॥

पृष्ठ 818

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८०६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

अस्यां त्वहमवस्थायां वीर वक्ष्यामि यद् वचः ।

यद्यप्यसुकरं राजन् कर्तुमेव त्वमर्हसि ॥ ७ ॥

' वीर! राजन्! इस अवस्थामें मैं जो कुछ कहूँगा, वह यद्यपि करनेमें कठिन है, तथापि तुम उसे अवश्य करना ॥ ७ ॥

सुखार्हं सुखसंवृद्धं बालमेनमबालिशम् ।

बाष्पपूर्णमुखं पश्य भूमौ पतितमङ्गदम् ॥ ८ ॥

' देखो, मेरा बेटा अङ्गद धरतीपर पड़ा है । इसका मुँह आँसुओंसे भीगा है । यह सुखमें पला है और सुख भोगनेके ही योग्य है । बालक होनेपर भी यह मूढ़ नहीं है ॥ ८ ॥

मम प्राणैः प्रियतरं पुत्रं पुत्रमिवौरसम् ।

मया ही महीनार्थं सर्वतः परिपालय ॥ ९ ॥

' यह मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है । मेरे न रहनेपर तुम इसे सगे पुत्रकी भाँति मानना । इसके लिये किसी भी सुख - सुविधाकी कमी न होने देना और सदा सब जगह इसकी रक्षा करते रहना ॥ ९ ॥

त्वमप्यस्य पिता दाता परित्राता च सर्वशः ।

भयेष्वभयदश्चैव यथाहं प्लवगेश्वर ॥ १० ॥

' वानरराज! मेरे ही समान तुम भी इसके पिता, दाता, सब प्रकारसे रक्षक और भयके अवसरोंपर अभय देनेवाले हो ॥ १० ॥

एष तारात्मजः श्रीमांस्त्वया तुल्यपराक्रमः ।

रक्षसां च वधे तेषामग्रतस्ते भविष्यति ॥ ११ ॥

' ताराका यह तेजस्वी पुत्र तुम्हारे समान ही पराक्रमी है । उन राक्षसोंके वधके समय यह सदा तुम्हारे आगे रहेगा ॥

अनुरूपाणि कर्माणि विक्रम्य बलवान् रणे ।

करिष्यत्येष तारेयस्तेजस्वी तरुणोऽङ्गदः ॥ १२ ॥

' यह बलवान् तेजस्वी तरुण ताराकुमार अङ्गद रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करते हुए अपने योग्य कर्म करेगा ॥ १२ ॥

सुषेण दुहिता चेयमर्थसूक्ष्मविनिश्चये ।

औत्पातिके च विविधे सर्वतः परिनिष्ठिता ॥ १३ ॥

' सुषेणकी पुत्री यह तारा सूक्ष्म विषयोंके निर्णय करने तथा नाना प्रकारके उत्पातोंके चिह्नोंको समझनेमें सर्वथा निपुण है ॥ १३ ॥

यदेषा साध्विति ब्रूयात् कार्यं तन्मुक्तसंशयम् ।

नहि तारामतं किंचिदन्यथा परिवर्तते ॥ १३ ॥

' जिस कार्यको अच्छा बताये, उसे संदेहरहित होकर करना । ताराकी किसी भी सम्मतिका परिणाम उलटा नहीं होता ॥ १४ ॥

राघवस्य च ते कार्यं कर्तव्यमविशङ्कया ।

स्यादधर्मो ह्यकरणे त्वां च हिंस्यादमानितः ॥ १५ ॥ ।

— श्रीरामचन्द्रजीका काम तुम्हें निःशङ्क होकर करना चाहिये । उसको न करनेसे तुम्हें पाप लगेगा और अपमानित होनेपर श्रीरामचन्द्रजी तुझे मार डालेंगे ॥ १५ ॥

इमां च मालामाधत्स्व दिव्यां सुग्रीव काञ्चनीम् ।

उदारा श्रीः स्थिता ह्यस्यां सम्प्रजह्यान्मृते मयि ॥ १६ ॥

' सुग्रीव! मेरी यह सोनेकी दिव्यमाला तुम धारण कर लो । इसमें उदार लक्ष्मीका वास है । मेरे मर जानेपर

इसकी श्री नष्ट हो जायगी । अत: अभीसे पहन लो ' ॥ १६ ॥

इत्येवमुक्तः सुग्रीवो वालिना भ्रातृसौहृदात् ।

हर्षं त्यक्त्वा पुनर्दीनो ग्रहग्रस्त इवोडुराट् ॥ १७ ॥

वालीने भ्रातृस्नेहके कारण जब ऐसी बातें कहीं, तब उसके वधके कारण जो हर्ष हुआ था, उसे त्यागकर सुग्रीव फिर दुःखी हो गये, मानो चन्द्रमापर ग्रहण लग गया हो ॥ १७ ॥

तद्बालिवचनाच्छान्तः कुर्वन् युक्तमतन्द्रितः ।

जग्राह सोऽभ्यनुज्ञातो मालां तां चैव काञ्चनीम् ॥ १८ ॥

वालीके उस वचनसे सुग्रीवका वैरभाव शान्त हो गया । वे सावधान होकर उचित बर्ताव करने लगे । उन्होंने भाईकी आज्ञासे वह सोनेकी माला ग्रहण कर ली ॥ १८ ॥

तां मालां काञ्चनीं दत्त्वा दृष्ट्वा चैवात्मजं स्थितम् ।

संसिद्धः प्रेत्यभावाय स्नेहादङ्गदमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥

सुग्रीवको वह सुवर्णमयी माला देनेके पश्चात् वालीने मरनेका निश्चय कर लिया । फिर अपने सामने खड़े हुए पुत्र अङ्गदकी ओर देखकर स्नेहके साथ कहा— ॥ १ ९ ॥

देशकालौ भजस्वाद्य क्षममाणः प्रियाप्रिये ।

सुखदुःखसहः काले सुग्रीववशगो भव ॥ २० ॥

' बेटा! अब देश - कालको समझो - कब और कहाँ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इसका निश्चय करके वैसा ही आचरण करो । समयानुसार प्रिय - अप्रिय, सुख - दुःख - जो कुछ आ पड़े उसको सहो । अपने हृदयमें क्षमाभाव रखो और सदा सुग्रीवकी आज्ञाके अधीन रहो ॥ २० ॥

यथा हि त्वं महाबाहो लालितः सततं मया ।

न तथा वर्तमानं त्वां सुग्रीवो बहु मन्यते ॥ २१ ॥

' महाबाहो! सदा मेरा दुलार पाकर जिस प्रकार तुम रहते आये हो, यदि वैसा ही बर्ताव अब भी करोगे तो सुग्रीव तुम्हारा विशेष आदर नहीं करेंगे ॥ २१ ॥

नास्यामित्रैर्गतं गच्छेर्मा शत्रुभिररिंदम ।

भर्तुरर्थपरो दान्तः सुग्रीववशगो भव ॥ २२ ॥

' शत्रुदमन अङ्गद! तुम इनके शत्रुओंका साथ मत दो । जो इनके मित्र न हों, उनसे भी न मिलो और

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किष्किन्धाकाण्डे अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर सदा अपने स्वामी । सुग्रीवके कार्य - साधनमें संलग्न रहते हुए उन्हींके अधीन रहो ॥ २२ ॥

न चातिप्रणयः कार्यः कर्तव्योऽप्रणयश्च ते ।

उभयं हि महादोषं तस्मादन्तरदृग् भव ॥ २३ ॥

' किसीके साथ अत्यन्त प्रेम न करो और प्रेमका सर्वथा अभाव भी न होने दो; क्योंकि ये दोनों ही महान् दोष हैं । अतः मध्यम स्थितिपर ही दृष्टि रखो ' ॥ २३ ॥

इत्युक्त्वाथ विवृत्ताक्षः शरसम्पीडितो भृशम् ।

विवृतैर्दशनैर्भीमैर्बभूवोत्क्रान्तजीवितः ॥ २४ ॥

ऐसा कहकर बाणके आघातसे अत्यन्त घायल हुए वालीकी आँखें घूमने लगीं । उसके भयंकर दाँत खुल गये और प्राण - पखेरू उड़ गये ॥ २४ ॥

ततो विचुक्रुशुस्तत्र वानरा हतयूथपाः ।

परिदेवयमानास्ते प्लवगसत्तमाः ॥ २५ ॥

उस समय अपने यूथपतिकी मृत्यु हो जानेसे सभी श्रेष्ठ वानर जोर - जोरसे रोने और विलाप करने लगे - ॥ २५ ॥

किष्किन्धा ह्यद्य शून्या च स्वर्गते वानरेश्वरे ।

उद्यानानि च शून्यानि पर्वताः काननानि च ॥ २६ ॥

' हाय! आज वानरराज वालीके स्वर्गलोक चले जानेसे सारी किष्किन्धापुरी सूनी हो गयी । उद्यान, पर्वत और वन भी सूने हो गये ॥ २६ ॥

हते प्लवगशार्दूले निष्प्रभा वानराः कृताः ।

यस्य वेगेन महता काननानि वनानि च ॥ २७ ॥

पुष्पौघेणानुबद्ध्यन्ते करिष्यति तदद्य कः । ' वानरश्रेष्ठ वालीके मारे जानेसे सारे वानर श्रीहीन हो गये । जिनके महान् वेग ( प्रताप ) से समस्त कानन और वन पुष्पसमूहोंसे सदा संयुक्त बने रहते थे, आज उनके न रहनेसे कौन ऐसा चमत्कारपूर्ण कार्य करेगा? ॥ त्रयोविंशः सर्गः ८०७ येन दत्तं महद् युद्धं गन्धर्वस्य महात्मनः ॥ २८ ॥

गोलभस्य महाबाहोर्दश वर्षाणि पञ्च च ।

नैव रात्रौ न दिवसे तद् युद्धमुपशाम्यति ॥ २ ९ ॥

' उन्होंने महामना महाबाहु गोलभ नामक गन्धर्वको महान् युद्धका अवसर दिया था । वह युद्ध पंद्रह वर्षोंतक लगातार चलता रहा । न दिनमें बंद होता था, न रातमें ॥ २ ९ ॥ ततः षोडशमे वर्षे गोलभो विनिपातितः ।

तं हत्वा दुर्विनीतं तु वाली दंष्ट्राकरालवान् ।

सर्वाभयंकरोऽस्माकं कथमेष निपातितः ॥ ३० ॥

' तदनन्तर सोलहवाँ वर्ष आरम्भ होनेपर गोलभ वालीके हाथसे मारा गया । उस दुष्ट गन्धर्वका वध करके जिन विकराल दाढ़वाले वालीने हम सबको अभय दान स्वयं कैसे हते तु वनेचराः उस दिया था, वे ही ये हमारे स्वामी वानरराज मार गिराये गये? ' ॥ ३० ॥

वीरे प्लवगाधिपे तदा प्लवङ्गमास्तत्र न शर्म लेभिरे । सिंह महावने यथा हि गावो निहते गवां पतौ ॥ ३१ ॥

समय वीर वानरराज वालीके मारे जानेपर वनोंमें विचरनेवाले वानर वहाँ चैन न पा सके । जैसे सिंहसे युक्त विशाल वनमें साँड़के मारे जानेपर गौएँ दुःखी हो जाती हैं, वही दशा उन वानरोंकी हुई ॥ ३१ ॥

ततस्तु तारा व्यसनार्णवप्लुता मृतस्य भर्तुर्वदनं समीक्ष्य सा । जगाम भूमिं परिरभ्य वालिनं महाद्रुमं छिन्नमिवाश्रिता लता ॥ ३२ ॥

तदनन्तर शोकके समुद्रमें डूबी हुई ताराने जब अपने मरे हुए स्वामीकी ओर दृष्टिपात किया, तब वह वालीका आलिङ्गन करके कटे हुए महान् वृक्षसे लिपटी । हुई लताकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २२ ॥

त्रयोविंशः सर्गः ताराका विलाप

ततः समुपजिघ्रन्ती कपिराजस्य तन्मुखम् । शेषे त्वं विषमे दुःखमकृत्वा वचनं मम ।

पतिं लोकश्रुता तारा मृतं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥ उपलोपचिते वीर सुदुःखे वसुधातले ॥२ ॥

उस समय वानरराजका मुख सूँघती हुई लोकविख्यात ' वीर! दुःखकी बात है कि आपने मेरी बात नहीं ताराने रोकर अपने मृत पतिसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥ | मानी और अब आप प्रस्तरसे पूर्ण अत्यन्त दुःखदायक

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८०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे और ऊँचे - नीचे भूतलपर शयन कर रहे हैं ॥ २ ॥

मत्तः प्रियतरा नूनं वानरेन्द्र मही तव ।

शेषे हि तां परिष्वज्य मां च न प्रतिभाषसे ॥ ३ ॥

' वानरराज! निश्चय ही यह पृथ्वी आपको मुझसे भी बढ़कर प्रिय है, तभी तो आप इसका आलिङ्गन करके सो रहे हैं और मुझसे बाततक नहीं करते ॥ ३ ॥

सुग्रीवस्य वशं प्राप्तो विधिरेष भवत्यहो ।

सुग्रीव एव विक्रान्तो वीर साहसिकप्रिय ॥ ४ ॥

' वीर! साहसपूर्ण कार्योंसे प्रेम रखनेवाले वानरराज! यह श्रीरामरूपी विधाता सुग्रीवके वशमें हो गया है ( - आपके नहीं ) यह बड़े आश्चर्यकी बात है, अतः अब इस राज्यपर सुग्रीव ही पराक्रमी राजाके रूपमें आसीन होंगे ॥ ४ ॥

ऋक्षवानरमुख्यास्त्वां बलिनं पर्युपासते ।

तेषां विलपितं कृच्छ्रमङ्गदस्य च शोचतः ॥ ५ ॥

मम चेमा गिरः श्रुत्वा किं त्वं न प्रतिबुध्यसे । ' प्राणनाथ! प्रधान - प्रधान भालू और वानर जो आप महावीरकी सेवामें रहा करते थे, इस समय बड़े दुःखसे विलाप कर रहे हैं । बेटा अङ्गद भी शोकमें पड़ा है । उन वानरोंका दुःखमय विलाप, अङ्गदका शोकोद्गार तथा मेरी यह अनुनय - विनयभरी वाणी सुनकर भी आप जागते क्यों नहीं हैं? ॥ ५३ ॥

इदं तद् वीरशयनं तत्र शेषे हतो युधि ॥ ६ ॥

शायिता निहता यत्र त्वयैव रिपवः पुरा । ' यही वह वीर- र - शय्या है, जिसपर पूर्वकालमें आपने ही बहुत - से शत्रुओंको मारकर सुलाया था, किंतु आज

स्वयं ही युद्धमें मारे जाकर आप इसपर शयन कर रहे हैं ।

विशुद्धसत्त्वाभिजन प्रिययुद्ध मम प्रिय ॥ ७ ॥

मामनाथां विहायैकां गतस्त्वमसि मानद । ' विशुद्ध बलशाली कुलमें उत्पन्न युद्धप्रेमी तथा दूसरोंको मान देनेवाले मेरे प्रियतम! तुम मुझ अनाथाको अकेली छोड़कर कहाँ चले गये? ॥ ७३ ॥

शूराय न प्रदातव्या कन्या खलु विपश्चिता ॥ ८ ॥

शूरभार्यां हतां पश्य सद्यो मां विधवां कृताम् । ' निश्चय ही बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह अपनी कन्या किसी शूरवीरके हाथमें न दे । देखो, मैं शूरवीरकी पत्नी होनेके कारण तत्काल विधवा बना दी गयी और इस प्रकार सर्वथा मारी गयी ॥ ८३ ॥

अवभग्नश्च मे मानो भग्ना मे शाश्वती गतिः ॥ ९ ॥

अगाधे च निमग्नास्मि विपुले शोकसागरे । ' राजरानी होनेका जो मेरा अभिमान था, वह भङ्ग हो ।

गया । नित्य - निरन्तर सुख पानेकी मेरी आशा नष्ट हो गयी ।

तथा मैं अगाध एवं विशाल शोकसमुद्रमें डूब गयी हूँ ॥ ९ ३ ॥

अश्मसारमयं नूनमिदं मे हृदयं दृढम् ॥ १० ॥

भर्तारं निहतं दृष्ट्वा यन्नाद्य शतधा कृतम् । ' निश्चय ही यह मेरा कठोर हृदय लोहेका बना हुआ है । तभी तो अपने स्वामीको मारा गया देखकर इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते ॥ १०३ ॥

सुहृच्चैव च भर्ता च प्रकृत्या च मम प्रियः ॥ ११ ॥

प्रहारे च पराक्रान्तः शूरः पञ्चत्वमागतः । ' हाय! जो मेरे सुहृद्, स्वामी और स्वभावसे प्रिय थे तथा संग्राममें महान् पराक्रम प्रकट करनेवाले शूरवीर थे, वे संसारसे चल बसे ॥ ११३ ॥

पतिहीना तु या नारी कामं भवतु पुत्रिणी ॥ १२ ॥

धनधान्यसमृद्धापि विधवेत्युच्यते जनैः । ' पतिहीन नारी भले ही पुत्रवती एवं धन - धान्यसे समृद्ध भी हो, किन्तु लोग उसे विधवा ही कहते हैं ॥ १२३ ॥

स्वगात्रप्रभवे वीर शेषे रुधिरमण्डले ॥ १३ ॥

कृमिरागपरिस्तोमे स्वकीये शयने यथा । ' वीर! अपने ही शरीरसे प्रकट हुई रक्तराशिमें आप उसी तरह शयन करते हैं, जैसे पहले इन्द्रगोप नामक कीड़ेके - से रंगवाले बिछौनेसे युक्त अपने पलंगपर सोया करते थे ॥ १३३ ॥

रेणुशोणितसंवीतं गात्रं तव समन्ततः ॥ १४ ॥

परिरब्धुं न शक्नोमि भुजाभ्यां प्लवगर्षभ । ' वानरश्रेष्ठ! आपका सारा शरीर धूल और रक्तसे लथपथ हो रहा है; इसलिये मैं अपनी दोनों भुजाओंसे आपका आलिङ्गन नहीं कर पाती ॥ १४३ ॥

कृतकृत्योऽद्य सुग्रीवो वैरेऽस्मिन्नतिदारुणे ॥ १५ ॥

यस्य रामविमुक्तेन हृतमेकेषुणा भयम् । ' इस अत्यन्त भयंकर वैरमें आज सुग्रीव कृतकृत्य हो गये । श्रीरामके छोड़े हुए एक ही बाणने उनका सारा भय हर लिया ॥ १५३ ॥

शरेण हृदि लग्नेन गात्रसंस्पर्शने तव ॥ १६ ॥

वार्यांमि त्वां निरीक्षन्ती त्वयि पञ्चत्वमागते । ‘ आपकी छातीमें जो बाण धँसा हुआ है; वह मुझे आपके शरीरका आलिङ्गन करनेसे रोक रहा है, इस कारण आपकी मृत्यु हो जानेपर भी मैं चुपचाप देख रही हूँ ( आपको हृदयसे लगा नहीं पाती ) ' ॥ १६३ ॥

उद्वबर्ह शरं नीलस्तस्य गात्रगतं तदा ॥ १७ ॥

गिरिगह्वरसंलीनं दीप्तमाशीविषं यथा । उस समय नीलने वालीके शरीरमें धँसे हुए उस बाणको निकाला, मानो पर्वतकी कन्दरामें छिपे हुए प्रज्वलित