वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 871–880
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880
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किष्किन्धाकाण्डे
जायँ, राजाज्ञाको कलङ्कित करनेवाले उन दुरात्मा ।
वानरोंको मार डालना चाहिये ॥ १२ ॥
शतान्यथ सहस्त्राणि कोट्यश्च मम शासनात् ।
प्रयान्तु कपिसिंहानां निदेशे मम ये स्थिताः ॥ १३ ॥
' जो मेरी आज्ञाके अधीन रहते हों, ऐसे सैकड़ों, हजारों तथा करोड़ों वानरसिंह मेरे आदेशसे जायँ ॥ १३ ॥
मेघपर्वतसंकाशाश्छादयन्त इवाम्बरम् ।
घोररूपाः कपिश्रेष्ठा यान्तु मच्छासनादितः ॥१४ ॥
' जो मेघ और पर्वतके समान अपने विशाल शरीरसे आकाशको आच्छादित - सा कर लेते हैं, वे घोर रूपधारी श्रेष्ठ वानर मेरा आदेश मानकर यहाँसे यात्रा करें ॥ १४ ॥
ते गतिज्ञा गतिं गत्वा पृथिव्यां सर्ववानराः ।
आनयन्तु हरीन् सर्वांस्त्वरिताः शासनान्मम ॥ १५ ॥
‘ वानरोंके निवासस्थानोंको जाननेवाले सभी वानर तीव्र गतिसे भूमण्डलमें चारों ओर जाकर मेरे आदेशसे उन-उन स्थानोंके सम्पूर्ण वानरगणोंको तुरंत यहाँ ले आवें ' ॥
तस्य वानरराजस्य श्रुत्वा वायुसुतो वचः ।
दिक्षु सर्वासु विक्रान्तान् प्रेषयामास वानरान् ॥ १६ ॥
वानरराज सुग्रीवकी बात सुनकर वायुपुत्र हनुमान्जीने सम्पूर्ण दिशाओंमें बहुत - से पराक्रमी वानरोंको भेजा ॥ १६ ॥
ते पदं विष्णुविक्रान्तं पतत्त्रिज्योतिरध्वगाः ।
प्रयाताः प्रहिता राज्ञा हरयस्तु क्षणेन वै ॥ १७ ॥
राजाकी आज्ञा पाकर वे सब वानर तत्काल आकाशमें पक्षियों और नक्षत्रोंके मार्गसे चल दिये ॥ १७ ॥
ते समुद्रेषु गिरिषु वनेषु च सरस्सु च ।
वानरा वानरान् सर्वान् रामहेतोरचोदयन् ॥ १८ ॥
उन वानरोंने समुद्रोंके किनारे, पर्वतोंपर, वनोंमें और सरोवरोंके तटोंपर रहनेवाले समस्त वानरोंको श्रीरामचन्द्रजीका कार्य करनेके लिये चलनेको कहा ॥ १८ ॥
मृत्युकालोपमस्याज्ञां राजराजस्य वानराः ।
सुग्रीवस्याययुः श्रुत्वा सुग्रीवभयशङ्किताः ॥ १ ९ ॥
अपने सम्राट् सुग्रीवका, जो मृत्यु एवं कालके समान भयानक दण्ड देनेवाले थे, आदेश सुनकर वे सभी वानर उनके भयसे थर्रा उठे और तुरंत ही किष्किन्धाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १ ९ ॥
ततस्तेऽञ्जनसंकाशा गिरेस्तस्मान्महाबलाः ।
कोट्यः प्लवंगानां निर्ययुर्यत्र राघवः ॥ २० ॥
तिस्त्रः गिरिसे काजलके ही समान काले तदनन्तर कज्जल और महान् बलवान् तीन करोड़ वानर उस स्थानपर जानेके लिये निकले, जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे ॥ २० ॥
सप्तत्रिंशः सर्गः ८५ ९
अस्तं गच्छति यत्रार्कस्तस्मिन् गिरिवरे रताः ।
संतप्तहेमवर्णा भास्तस्मात् कोट्यो दश च्युताः ॥ २१ ॥
जहाँ सूर्यदेव अस्त होते हैं, उस श्रेष्ठ पर्वतपर रहनेवाले दस करोड़ वानर, जिनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी, वहाँसे किष्किन्धाके लिये चले ॥
कैलासशिखरेभ्यश्च सिंहकेसरवर्चसाम् ।
ततः कोटिसहस्त्राणि वानराणां समागमन् ॥ २२ ॥
कैलासके शिखरोंसे सिंहके अयालकी - सी श्वेत कान्तिवाले दस अरब वानर आये ॥ २२ ॥
फलमूलेन जीवन्तो हिमवन्तमुपाश्रिताः ।
तेषां कोटिसहस्त्राणां सहस्रं समवर्तत ॥ २३ ॥
जो हिमालयपर रहकर फल- मूलसे जीवननिर्वाह करते थे, वे वानर एक नीलकी संख्यामें वहाँ आये ॥ २३ ॥
अङ्गारकसमानानां भीमानां भीमकर्मणाम् ।
विन्ध्याद् वानरकोटीनां सहस्त्राण्यपतन् द्रुतम् ॥२४ ॥
विन्ध्याचल पर्वतसे मङ्गलके समान लाल रंगवाले भयानक पराक्रमी भयंकर रूपधारी वानरोंकी दस अरब सेना बड़े वेगसे किष्किन्धामें आयी ॥२४ ॥
क्षीरोदवेलानिलयास्तमालवनवासिनः 1 नारिकेलाशनाश्चैव तेषां संख्या न विद्यते ॥ २५ ॥
क्षीरसमुद्र के किनारे और तमालवनमें नारियल खाकर रहनेवाले वानर इतनी अधिक संख्यामें आये कि उनकी गणना नहीं हो सकती थी ॥ २५ ॥
वनेभ्यो गह्वरेभ्यश्च सरिद्भयश्च महाबलाः ।
आगच्छद् वानरी सेना पिबन्तीव दिवाकरम् ॥ २६ ॥
वनोंसे, गुफाओंसे और नदियोंके किनारोंसे असंख्य महाबली वानर एकत्र हुए । वानरोंकी वह सारी सेना सूर्यदेवको पीती ( आच्छादित करती हुई - सी आयी ॥ २६ ॥
ये तु त्वरयितुं याता वानराः सर्ववानरान् ।
ते वीरा हिमवच्छैले ददृशुस्तं महाद्रुमम् ॥ २७ ॥
जो वानर समस्त वानरोंको शीघ्र आनेके लिये प्रेरित करनेके निमित्त किष्किन्धासे दुबारा भेजे गये थे, उन वीरोंने हिमालय पर्वतपर उस प्रसिद्ध विशाल वृक्षको देखा ( जो भगवान् शंकरकी यज्ञशालामें स्थित था ) ॥ २७ ॥
तस्मिन् गिरिवरे पुण्ये यज्ञो माहेश्वरः पुरा ।
सर्वदेवमनस्तोषो बभूव सुमनोरमः ॥ २८ ॥
उस पवित्र एवं श्रेष्ठ पर्वतपर पूर्वकालमें भगवान् शंकरका यज्ञ हुआ था, जो सम्पूर्ण देवताओंके मनको । संतोष देनेवाला और अत्यन्त मनोरम था ॥२८ ॥
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८६० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
अन्ननिस्यन्दजातानि मूलानि च फलानि च ।
अमृतस्वादुकल्पानि ददृशुस्तत्र वानराः ॥ २ ९ ॥
उस पर्वतपर खीर आदि अन्न ( होमद्रव्य ) से घृत आदिका स्राव हुआ था, उससे वहाँ अमृतके समान स्वादिष्ट फल और मूल उत्पन्न हुए थे । उन फलोंको उन वानरोंने देखा ॥ २ ९ ॥
तदन्नसम्भवं दिव्यं फलमूलं मनोहरम् ।
यः कश्चित् सकृदश्नाति मासं भवति तर्पितः ॥ ३० ॥
उक्त अन्नसे उत्पन्न हुए उस दिव्य एवं मनोहर फल - मूलको जो कोई एक बार खा लेता था, वह एक मासतक उससे तृप्त बना रहता था ॥ ३० ॥
तानि मूलानि दिव्यानि फलानि च फलाशनाः ।
औषधानि च दिव्यानि जगृहुर्हरिपुंगवाः ॥ ३१ ॥
फलाहार करनेवाले उन वानरशिरोमणियोंने उन दिव्य मूल- - फलों और दिव्य औषधोंको अपने साथ ले लिया ॥
तस्माच्च यज्ञायतनात् पुष्पाणि सुरभीणि च ।
आनिन्युर्वानरा गत्वा सुग्रीवप्रियकारणात् ॥ ३२ ॥
वहाँ जाकर उस यज्ञ - मण्डपसे वे सब वानर सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये सुगन्धित पुष्प भी लेते आये ॥ ३२ ॥
ते तु सर्वे हरिवराः पृथिव्यां सर्ववानरान् ।
संचोदयित्वा त्वरितं यूथानां जग्मुरग्रतः ॥ ३३ ॥
वे समस्त श्रेष्ठ वानर भूमण्डलके सम्पूर्ण वानरोंको तुरंत चलनेका आदेश देकर उनके यूथोंके पहुँचनेके पहले ही सुग्रीवके पास आ गये ॥ ३३ ॥
ते तु तेन मुहूर्तेन कपयः शीघ्रचारिणः ।
किष्किन्धां त्वरया प्राप्ताः सुग्रीवो यत्र वानरः ॥ ३४ ॥
वे शीघ्रगामी वानर उसी मुहूर्तमें चलकर बड़ी उतावलीके साथ किष्किन्धापुरीमें जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, जा पहुँचे ॥ ३४ ॥
ते गृहीत्वौषधीः सर्वाः फलमूलं च वानराः ।
तं प्रतिग्राहयामासुर्वचनं चेदमब्रुवन् ॥ ३५ ॥
उस सम्पूर्ण ओषधियों और फल -I -मूलोंको लेकर उन वानरोंने सुग्रीवकी सेवामें अर्पित कर दिया और इस प्रकार कहा- ॥ ३५ ॥
सर्वे परिसृताः शैलाः सरितश्च वनानि च ।
पृथिव्यां वानराः सर्वे शासनादुपयान्ति ते ॥ ३६ ॥
' महाराज! हमलोग सभी पर्वतों, नदियों और वनों में घूम आये । भूमण्डलके समस्त वानर आपकी आज्ञासे यहाँ आ रहे हैं ' ॥ ३६ ॥
एवं श्रुत्वा ततो हृष्टः सुग्रीवः प्लवगाधिपः ।
प्रतिजग्राह च प्रीतस्तेषां सर्वमुपायनम् ॥ ३७ ॥
यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने उनकी दी हुई सारी भेंट - सामग्री सानन्द | ग्रहण की ॥ ३७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
अष्टात्रिंशः सर्गः लक्ष्मणसहित सुग्रीवका भगवान् श्रीरामके पास आकर उनके चरणोंमें प्रणाम करना, श्रीरामका उन्हें समझाना, सुग्रीवका अपने किये हुए सैन्यसंग्रहविषयक उद्योगको बताना और उसे
प्रतिगृह्य च तत् सर्वमुपायनमुपाहृतम् ।
वानरान् सान्त्वयित्वा च सर्वानेव व्यसर्जयत् ॥ १ ॥
उनके लाये हुए उन समस्त उपहारोंको ग्रहण करके सुग्रीवने सम्पूर्ण वानरोंको मधुर वचनोंद्वारा
सान्त्वना दी । फिर सबको विदा कर दिया ॥ १ ॥
विसर्जयित्वा स हरीन् सहस्रान् कृतकर्मणः ।
मेने कृतार्थमात्मानं राघवं च महाबलम् ॥ २ ॥
कार्य पूरा करके लौटे हुए उन सहस्रों वानरोंको विदा करके सुग्रीवने अपने - आपको कृतार्थ माना और महाबली श्रीरघुनाथजीका भी कार्य सिद्ध हुआ सुनकर श्रीरामका प्रसन्न होना ही समझा ॥२ ॥
स लक्ष्मणो भीमबलं सर्ववानरसत्तमम् ।
अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवं सम्प्रहर्षयन् ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् लक्ष्मण समस्त वानरोंमें श्रेष्ठ भयंकर बलशाली सुग्रीवका हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनीत वचन बोले- ॥ ३ ॥
किष्किन्धाया विनिष्क्राम यदि ते सौम्य रोचते ।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य सुभाषितम् ॥ ४ ॥
सुग्रीवः परमप्रीतो वाक्यमेतदुवाच ह । ' सौम्य! यदि तुम्हारी रुचि हो तो अब किष्किन्धा
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किष्किन्धाकाण्डे
बाहर निकलो । ' लक्ष्मणकी यह सुन्दर बात सुनकर सुग्रीव ।
अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले - ॥ ४३ ॥
एवं भवतु गच्छाम स्थेयं त्वच्छासने मया ॥ ५ ॥
तमेवमुक्त्वा सुग्रीवो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ।
विसर्जयामास तदा ताराद्याश्चैव योषितः ॥ ६ ॥
' अच्छा, ऐसा ही हो । चलिये, चलें । मुझे तो आपकी आज्ञाका पालन करना है । ' शुभ लक्षणोंसे युक्त लक्ष्मणसे ऐसा कहकर सुग्रीवने तारा आदि सब स्त्रियोंको तत्काल विदा कर दिया ॥५-६ ॥
एहीत्युच्चैर्हरिवरान् सुग्रीवः समुदाहरत् ।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हरयः शीघ्रमाययुः ॥ ७ ॥
बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे ये स्युः स्त्रीदर्शनक्षमाः । इसके बाद सुग्रीवने शेष वानरोंको ' आओ, आओ ' कहकर उच्च स्वरसे पुकारा । उनकी वह पुकार सुनकर सब वानर, जो अन्तःपुरकी स्त्रियोंको देखनेके अधिकारी थे, दोनों हाथ जोड़े शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये ॥ ७३ ॥
तानुवाच ततः प्राप्तान् राजार्कसदृशप्रभः ॥ ८ ॥
उपस्थापयत क्षिप्रं शिबिकां मम वानराः । पास आये हुए उन वानरोंसे सूर्यतुल्य तेजस्वी राजा सुग्रीवने कहा- ' वानरो! तुमलोग शीघ्र मेरी शिबिकाको यहाँ ले आओ ' ॥ ८३ ॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्य हरयः शीघ्रविक्रमाः ॥ ९ ॥
समुपस्थापयामासुः शिबिकां प्रियदर्शनाम् । उनकी बात सुनकर शीघ्रगामी वानरोंने एक सुन्दर शिबिका ( पालकी ) वहाँ उपस्थित कर दी ॥ ९ ३ ॥ तामुपस्थापितां दृष्ट्वा शिबिकां वानराधिपः ॥ १० ॥
लक्ष्मणारुह्यतां शीघ्रमिति सौमित्रिमब्रवीत् । पालकीको वहाँ उपस्थित देख वानरराज सुग्रीवने सुमित्राकुमारसे कहा — ‘ कुमार लक्ष्मण! आप शीघ्र इसपर आरूढ़ हो जायँ ' ॥ १०३ ॥
इत्युक्त्वा काञ्चनं यानं सुग्रीवः सूर्यसंनिभम् ॥ ११ ॥
बहुभिर्हरिभिर्युक्तमारुरोह सलक्ष्मणः । ऐसा कहकर लक्ष्मणसहित सुग्रीव उस सूर्यकी -सी प्रभावाली सुवर्णमयी पालकीपर, जिसे ढोनेके लिये बहुत - से वानर लगे थे, आरूढ़ हुए ॥११३ ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ॥ १२ ॥
शुक्लैश्च वालव्यजनैर्धूयमानैः समन्ततः ।
शंखभेरीनिनादैश्च बन्दिभिश्चाभिनन्दितः ॥ १३ ॥
। अष्टात्रिंशः सर्गः ८६१ और सब ओरसे सफेद चँवर डुलाये जाने लगे । शङ्ख और भेरीकी ध्वनिके साथ वन्दीजनोंका अभिनन्दन सुनते हुए राजा सुग्रीव परम उत्तम राजलक्ष्मीको पाकर किष्किन्धापुरीसे बाहर निकले ॥ १२-१३३ ॥ स वानरशतैस्तीक्ष्णैर्बहुभिः शस्त्रपाणिभिः ॥ १४ ॥
परिकीर्णो ययौ तत्र यत्र रामो व्यवस्थितः । हाथमें शस्त्र लिये तीक्ष्ण स्वभाववाले कई सौ वानरोंसे घिरे हुए राजा सुग्रीव उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् श्रीराम निवास करते थे ॥ १४३ ॥
स तं देशमनुप्राप्य श्रेष्ठं रामनिषेवितम् ॥ १५ ॥
अवातरन्महातेजाः शिबिकायाः सलक्ष्मणः ।
आसाद्य च ततो रामं कृताञ्जलिपुटोऽभवत् ॥ १६ ॥
श्रीरामचन्द्रजीसे सेवित उस श्रेष्ठ स्थानमें पहुँचकर लक्ष्मणसहित महातेजस्वी सुग्रीव पालकीसे उतरे और श्रीरामके पास जा हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ १५-१६ ॥
कृताञ्जलौ स्थिते तस्मिन् वानराश्चाभवंस्तथा ।
तटाकमिव तं दृष्ट्वा रामः कुड्मलपङ्कजम् ॥ १७ ॥
वानराणां महत् सैन्यं सुग्रीवे प्रीतिमानभूत् । वानरराजके हाथ जोड़कर खड़े होनेपर उनके अनुयायी वानर भी उन्हींकी भाँति अञ्जलि बाँधे खड़े हो गये । मुकुलित कमलोंसे भरे हुए विशाल सरोवरकी भाँति वानरोंकी उस बड़ी भारी सेनाको देखकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीवपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १७३ ॥
पादयोः पतितं मूर्ध्ना तमुत्थाप्य हरीश्वरम् ॥ १८ ॥
प्रेम्णा च बहुमानाच्च राघवः परिषस्वजे । वानरराजको चरणोंमें मस्तक रखकर पड़ा हुआ देख श्रीरघुनाथजीने हाथसे पकड़कर उठाया और बड़े आदर तथा प्रेमके साथ उन्हें हृदयसे लगाया ॥ १८३ ॥
परिष्वज्य च धर्मात्मा निषीदेति ततोऽब्रवीत् ॥१ ९ ॥ निषण्णं तं ततो दृष्ट्वा क्षितौ रामोऽब्रवीत् ततः । हृदयसे लगाकर धर्मात्मा श्रीरामने उनसे कहा-' बैठो ' । उन्हें पृथ्वीपर बैठा देख श्रीराम बोले— ॥ धर्ममर्थं च कामं च काले यस्तु निषेवते ॥२० ॥
विभज्य सततं वीर स राजा हरिसत्तम ।
हित्वा धर्मं तथार्थं च कामं यस्तु निषेवते ॥ २१ ॥
स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिबुध्यते । ' वीर! वानरशिरोमणे! जो धर्म, अर्थ और काम लिये समयका विभाग करके सदा उचित समयपर उनका ( न्याययुक्त ) सेवन करता है, वही श्रेष्ठ राजा है । निर्ययौ प्राप्य सुग्रीवो राज्यश्रियमनुत्तमाम् छत्र लगाया गया | किंतु जो धर्म - अर्थका त्याग करके केवल कामका ही उस समय सुग्रीवके ऊपर श्वेत
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८६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सेवन करता है, वह वृक्षकी अगली शाखापर सोये हुए मनुष्यके समान है । गिरनेपर ही उसकी आँख खुलती है ॥ २०-२१३ ॥ अमित्राणां वधे युक्तो मित्राणां संग्रहे रतः ॥ २२ ॥
त्रिवर्गफलभोक्ता च राजा धर्मेण युज्यते । ' जो राजा शत्रुओंके वध और मित्रोंके संग्रहमें संलग्न रहकर योग्य समयपर धर्म, अर्थ और कामका ( न्याययुक्त ) सेवन करता है, वह धर्मके फलका भागी होता है ॥ २२३ ॥
उद्योगसमयस्त्वेष प्राप्तः शत्रुनिषूदन ॥ २३ ॥
संचिन्त्यतां हि पिङ्गेश हरिभिः सह मन्त्रिभिः । ' शत्रुसूदन! यह हमलोगोंके लिये उद्योगका समय आया है । वानरराज! तुम इस विषयमें इन वानरों और मन्त्रियोंके साथ विचार करो ' ॥ २३३ ॥
एवमुक्तस्तु सुग्रीवो रामं वचनमब्रवीत् ॥ २४ ॥
प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम् ।
त्वत्प्रसादान्महाबाहो पुनः प्राप्तमिदं मया ॥ २५ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुग्रीवने उनसे कहा-' महाबाहो! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदासे चला आनेवाला वानरोंका राज्य — ये सब नष्ट हो चुके थे । आपकी कृपासे ही मुझे पुनः इन सबकी प्राप्ति हुई है । २४-२५ ॥
तव देव प्रसादाच्च भ्रातुश्च जयतां वर ।
कृतं न प्रतिकुर्याद् यः पुरुषाणां हि दूषकः ॥ २६ ॥
' विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ देव! आप और आपके भाईकी कृपासे ही मैं वानर - राज्यपर पुनः प्रतिष्ठित हुआ हूँ । जो किये हुए उपकारका बदला नहीं चुकाता है, वह पुरुषोंमें धर्मको कलङ्कित करनेवाला माना गया है ॥ २६ ॥
एते वानरमुख्याश्च शतशः शत्रुसूदन ।
प्राप्ताश्चादाय बलिनः पृथिव्यां सर्ववानरान् ॥ २७ ॥
' शत्रुसूदन! ये सैकड़ों बलवान् और मुख्य वानर भूमण्डलके सभी बलशाली वानरोंको साथ लेकर यहाँ आये हैं ॥ २७ ॥
ऋक्षाश्च वानराः शूरा गोलाङ्गूलाश्च राघव ।
कान्तारवनदुर्गाणामभिज्ञा घोरदर्शनाः ॥ २८॥
* * यहाँ अर्बुद, शंकु, अन्त्य और मध्य आदि संख्या लिये प्राचीन संज्ञाओंका पूर्ण रूपसे उल्लेख किया जाता है ' रघुनन्दन! इनमें रीछ हैं, वानर हैं और शौर्य-सम्पन्न गोलाङ्गूल ( लङ्गूर ) हैं । ये सब - के - सब देखने में बड़े भयंकर हैं और बौहड़ वनों तथा दुर्गम स्थानोंके जानकार हैं ॥ २८ ॥
देवगन्धर्वपुत्राश्च वानराः कामरूपिणः ।
स्वैः स्वैः परिवृताः सैन्यैर्वर्तन्ते पथि राघव ॥ २ ९ ॥
' रघुनाथजी! जो देवताओं और गन्धर्वोंके पुत्र हैं और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं, वे श्रेष्ठ वानर अपनी - अपनी सेनाओंके साथ चल पड़े हैं और । इस समय मार्गमें हैं ॥ २ ९ ॥
शतैः शतसहस्त्रैश्च वर्तन्ते कोटिभिस्तथा ।
अयुतैश्चावृता वीर शङ्कुभिश्च परंतप ॥ ३० ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! इनमेंसे किसीके साथ सौ, किसीके साथ लाख, किसीके साथ करोड़, किसीके साथ अयुत ( दस हजार ) और किसीके साथ एक शंकु वानर हैं ॥ ३० ॥
अर्बुदैरर्बुदशतैर्मध्यैश्चान्त्यैश्च वानराः ।
समुद्राश्च परार्धाश्च हरयो हरियूथपाः ॥ ३१ ॥
' कितने ही वानर अर्बुद ( दस करोड़ ), सौ अर्बुद ( दस अरब ), मध्य ( दस पद्म ) तथा अन्त्य ( एक पद्म ) वानर - सैनिकोंके साथ आ रहे हैं । कितने ही वानरों तथा वानर - यूथपतियोंकी संख्या समुद्र ( दस नील ) तथा परार्ध ( शंख ) तक पहुँच गयी है * ॥ ३१ ॥
आगमिष्यन्ति ते राजन् महेन्द्रसमविक्रमाः ।
। मेघपर्वतसंकाशा मेरुविन्ध्यकृतालयाः ॥ ३२ ॥
‘ राजन्! वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी तथा मेघों और पर्वतोंके समान विशालकाय वानर, जो मेरु और विन्ध्याचलमें निवास करते हैं, यहाँ शीघ्र ही उपस्थित होंगे ॥ ३२ ॥
ते त्वामभिगमिष्यन्ति राक्षसं योद्धुमाहवे ।
निहत्य रावणं युद्धे ह्यानयिष्यन्ति मैथिलीम् ॥ ३३ ॥
' जो युद्धमें रावणका वध करके मिथिलेश-कुमारी सीताको लङ्कासे ला देंगे, वे महान् शक्तिशाली | वानर संग्राममें उस राक्षससे युद्ध करनेके लिये अवश्य वाचक शब्दोंका आधुनिक गणितके अनुसार मान समझनेके और कोष्ठमें उसका आधुनिक मान दिया जा रहा है - एक ( इकाई ), दश ( दहाई ), शत ( सैकड़ा ), सहस्र ( हजार ), अयुत ( दस हजार ), लक्ष ( लाख ), प्रयुत ( दस लाख ), कोटि ( करोड़ ), अर्बुद ( दस करोड़ ), अब्ज ( अरब ), खर्व ( दस अरब ), निखर्व ( खर्व ), महापद्म ( दस खर्व ), शंकु ( नील ), जलधि ( दस नील ), अन्त्य ( पद्म ), मध्य ( दस पद्म ), परार्ध ( शंख ) - ये संख्याबोधक संज्ञाएँ उत्तरोत्तर दसगुनी मानी गयी हैं । ( नारदपुराणसे )
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किष्किन्धाकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ८६३ आपके पास आयेंगे ' ॥ ३३ ॥
ततः समुद्योगमवेक्ष्य वीर्यवान् हरिप्रवीरस्य निदेशवर्तिनः बभूव हर्षाद् वसुधाधिपात्मजः प्रबुद्धनीलोत्पलतुल्यदर्शनः इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये यह सुनकर परम पराक्रमी राजकुमार श्रीराम अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले वानरोंके प्रमुख वीर । सुग्रीवका यह सैन्य - विषयक उद्योग देखकर बड़े प्रसन्न हुए । उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे और प्रफुल्ल नील ॥ ३४॥ । कमलके समान दिखायी देने लगे ॥ ३४ ॥
आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
एकोनचत्वारिंशः सर्गः श्रीरामचन्द्रजीका सुग्रीवके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा विभिन्न वानर - यूथपतियोंका अपनी सेनाओंके साथ आगमन
इति ब्रुवाणं सुग्रीवं रामो धर्मभृतां वरः ।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य प्रत्युवाच कृताञ्जलिम् ॥ १ ॥
सुग्रीवके ऐसा कहने पर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने अपनी दोनों भुजाओंसे उनका आलिङ्गन किया और हाथ जोड़कर खड़े हुए उनसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥
यदिन्द्रो वर्षते वर्षं न तच्चित्रं भविष्यति ।
आदित्योऽसौ सहस्त्रांशुः कुर्याद् वितिमिरं नभः ॥ २ ॥
चन्द्रमा रजनीं कुर्यात् प्रभया सौम्य निर्मलाम् ।
त्वद्विधो वापि मित्राणां प्रीतिं कुर्यात् परंतप ॥ ३ ॥
' सखे! इन्द्र जो जलकी वर्षा करते हैं, सहस्रों किरणोंसे शोभा पानेवाले सूर्यदेव जो आकाशका अन्धकार दूर कर देते हैं तथा सौम्य! चन्द्रमा अपनी प्रभासे जो अँधेरी रातको भी उज्ज्वल कर देते हैं, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि यह उनका स्वाभाविक गुण है । शत्रुओंको संताप देनेवाले सुग्रीव! इसी तरह तुम्हारे समान पुरुष भी यदि अपने मित्रोंका उपकार करके उन्हें प्रसन्न कर दें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिये ॥ २-३ ॥
एवं त्वयि न तच्चित्रं भवेद् यत् सौम्य शोभनम् ।
जानाम्यहं त्वां सुग्रीव सततं प्रियवादिनम् ॥ ४ ॥
' सौम्य सुग्रीव! इसी प्रकार तुममें जो मित्रोंका हितसाधनरूप कल्याणकारी गुण है, वह आश्चर्यका विषय नहीं है; क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम सदा प्रिय बोलनेवाले हो — यह तुम्हारा स्वाभाविक गुण है ॥४ ॥
* * पुलोम दानवकी कन्या शची इन्द्रदेवके प्रति अनुरक्त
त्वत्सनाथः सखे संख्ये जेतास्मि सकलानरीन् ।
त्वमेव मे सुहृन्मित्रं साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥५ ॥
' सखे! तुम्हारी सहायतासे सनाथ होकर मैं युद्धमें समस्त शत्रुओंको जीत लूँगा । तुम्हीं मेरे हितैषी मित्र हो और मेरी सहायता कर सकते हो ॥ ५ ॥
जहारात्मविनाशाय मैथिलीं राक्षसाधमः ।
वञ्चयित्वा तु पौलोमीमनुह्लादो यथा शचीम् ॥ ६ ॥
' राक्षसाधम रावणने अपना नाश करनेके लिये ही मिथिलेशकुमारीको धोखा देकर उसका अपहरण किया है । ठीक उसी तरह, जैसे अनुह्लादने अपने विनाशके लिये ही पुलोमपुत्री शचीको छलपूर्वक हर लिया था * ॥६ ॥
नचिरात् तं वधिष्यामि रावणं निशितैः शरैः ।
पौलोम्याः पितरं दृप्तं शतक्रतुरिवारिहा ॥ ७ ॥
' जैसे शत्रुहन्ता इन्द्रने शचीके घमंडी पिताको मार डाला था, उसी प्रकार मैं भी शीघ्र ही अपने तीखे बाणोंसे रावणका वध कर डालूँगा ' ॥७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे चैव रजः समभिवर्तत ।
उष्णतीव्रां सहस्त्रांशोश्छादयद् गगने प्रभाम् ॥ ८ ॥
श्रीराम और सुग्रीवमें जब इस प्रकार बातें हो रही थीं, उसी समय बड़े जोरकी धूल उठी, जिसने आकाशमें फैलकर सूर्यकी प्रचण्ड प्रभाको ढक दिया ॥८ ॥
दिशः पर्याकुलाश्चासंस्तमसा तेन दूषिताः ।
चचाल च मही सर्वा सशैलवनकानना ॥ ८ ॥
फिर तो उस धूलजनित अन्धकारसे सम्पूर्ण थीं, परंतु अनुह्लादने उनके पिताको फुसलाकर अपने पक्षमें कर अनुमतिसे शचीको हर लिया । जब इन्द्रको इसका पता लगा, तब वे अनुमति देनेवाले पुलोमको और लिया और उसकी भी मारकर शचीको अपने घर ले आये । यह पुराणप्रसिद्ध कथा है । ( रामायणतिलकसे ) अपहरण करनेवाले अनुह्लादको
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८६४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दिशाएँ दूषित एवं व्याप्त हो गयीं तथा पर्वत, वन और काननोंके साथ समूची पृथ्वी डगमग होने लगी ॥ ९ ॥
नगेन्द्रसंकाशैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाबलैः ।
कृत्स्ना संछादिता भूमिरसंख्येयैः प्लवंगमैः ॥ १० ॥
तदनन्तर पर्वतराजके समान शरीर और तीखी दाढ़वाले असंख्य महाबली वानरोंसे वहाँकी सारी भूमि आच्छादित हो गयी ॥ १० ॥
निमेषान्तरमात्रेण ततस्तैर्हरियूथपैः ।
कोटीशतपरीवारैर्वानरैर्हरियूथपैः ॥११ ॥
पलक मारते - मारते अरबों वानरोंसे घिरे हुए अनेकानेक यूथपतियोंने वहाँ आकर सारी भूमिको ढक लिया ॥ ११ ॥
नादेयैः पार्वतेयैश्च सामुद्रैश्च महाबलैः ।
हरिभिर्मेघनिर्ह्रादैरन्यैश्च वनवासिभिः ॥१२ ॥
नदी, पर्वत, वन और समुद्र सभी स्थानोंके निवासी महाबली वानर जुट गये, जो मेघोंकी गर्जनाके समान उच्च स्वरसे सिंहनाद करते थे ॥ १२ ॥
तरुणादित्यवर्णैश्च शशिगौरैश्च वानरैः ।
पद्मकेसरवर्णैश्च श्वेतैर्हेमकृतालयैः ॥ १३ ॥
कोई बालसूर्यके समान लाल रंगके थे तो कोई चन्द्रमाके समान गौर वर्णके । कितने ही वानर कमलके केसरोंके समान पीले रंगके थे और कितने ही हिमाचलवासी वानर सफेद दिखायी देते थे ॥ १३ ॥
कोटीसहस्त्रैर्दशभिः श्रीमान् परिवृतस्तदा ।
वीरः शतबलिर्नाम वानरः प्रत्यदृश्यत ॥ १४ ॥
उस समय परम कान्तिमान् शतबलि नामक वीर वानर दस अरब वानरोंके साथ दृष्टिगोचर हुआ ॥ १४ ॥
ततः काञ्चनशैलाभस्ताराया वीर्यवान् पिता ।
अनेकैर्बहुसाहस्त्रैः कोटिभिः प्रत्यदृश्यत ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् सुवर्णशैलके समान सुन्दर एवं विशाल शरीरवाले ताराके महाबली पिता कई सहस्र कोटि वानरोंके साथ वहाँ उपस्थित देखे गये ॥ १५ ॥
तथापरेण कोटीनां सहस्त्रेण समन्वितः ।
पिता रुमायाः सम्प्राप्तः सुग्रीवश्वशुरो विभुः ॥ १६ ॥
इसी प्रकार रुमाके पिता और सुग्रीवके श्वशुर, जो बड़े वैभवशाली थे, वहाँ उपस्थित हुए । उनके साथ भी दस अरब वानर थे ॥ १६ ॥
पद्मकेसरसंकाशस्तरुणार्कनिभाननः 1 बुद्धिमान् वानरश्रेष्ठः सर्ववानरसत्तमः ॥ १७ ॥
अनेकैर्बहुसास्त्रैर्वानराणां समन्वितः ।
पिता हनुमतः श्रीमान् केसरी प्रत्यदृश्यत ॥ १८ ॥ ।
तदनन्तर हनुमान्जीके पिता कपिश्रेष्ठ श्रीमान् केसरी दिखायी दिये । उनके शरीरका रंग कमलके केसरोंकी भाँति पीला और मुख प्रातःकालके सूर्यके समान लाल था । वे बड़े बुद्धिमान् और समस्त वानरोंमें श्रेष्ठ थे । वे कई सहस्र वानरोंसे घिरे हुए थे ॥ १७ - १८ ॥
गोलाङ्गलमहाराजो गवाक्षो भीमविक्रमः ।
वृतः कोटिसहस्त्रेण वानराणामदृश्यत ॥ १ ९ ॥
फिर लंगूर - जातिवाले वानरोंके महाराज भयंकर पराक्रमी गवाक्षका दर्शन हुआ । उनके साथ दस अरब वानरोंकी सेना थी ॥ १ ९ ॥
ऋक्षाणां भीमवेगानां धूम्रः शत्रुनिबर्हणः ।
। वृतः कोटिसहस्त्राभ्यां द्वाभ्यां समभिवर्तत ॥ २० ॥
शत्रुओंका संहार करनेवाले धूम्र भयंकर वेगशाली बीस अरब रीछोंकी सेना लेकर आये ॥ २० ॥
महाचलनिभैर्घोरैः पनसो नाम यूथपः ।
आजगाम महावीर्यस्तिसृभिः कोटिभिर्वृतः ॥२१ ॥
महापराक्रमी यूथपति पनस तीन करोड़ वानरोंके साथ उपस्थित हुए । वे सब - के - सब बड़े भयंकर तथा महान् पर्वताकार दिखायी देते थे ॥ २१ ॥
नीलाञ्जनचयाकारो नीलो नामैष यूथपः ।
अदृश्यत महाकायः कोटिभिर्दशभिर्वृतः ॥ २२ ॥
यूथपति नीलका शरीर भी बड़ा विशाल था । वे नीले कज्जल गिरिके समान नीलवर्णके थे और दस करोड़ कपियोंसे घिरे हुए थे ॥ २२ ॥
ततः काञ्चनशैलाभो गवयो नाम यूथपः ।
आजगाम महावीर्यः कोटिभिः पञ्चभिर्वृतः ॥ २३ ॥
तदनन्तर यूथपति गवय, जो सुवर्णमय पर्वत मेरुके समान कान्तिमान् और महापराक्रमी थे, पाँच करोड़ वानरोंके साथ उपस्थित हुए ॥ २३ ॥
दरीमुखश्च बलवान् यूथपोऽभ्याययौ तदा ।
वृतः कोटिसहस्त्रेण सुग्रीवं समवस्थितः ॥ २४ ॥
उसी समय वानरोंके बलवान् सरदार दरीमुख भी आ पहुँचे । वे दस अरब वानरोंके साथ सुग्रीवकी सेवामें उपस्थित हुए थे ॥ २४ ॥
मैन्दश्च द्विविदश्चोभावश्विपुत्रौ महाबलौ ।
कोटिकोटिसहस्रेण वानराणामदृश्यताम् ॥ २५ ॥
अश्विनीकुमारोंके महाबली पुत्र मैन्द और द्विविद, ये दोनों भाई भी दस - दस अरब वानरोंकी सेनाके साथ वहाँ दिखायी दिये ॥ २५ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ८६५
गजश्च बलवान् वीरस्तिसृभिः कोटिभिर्वृतः ।
आजगाम महातेजाः सुग्रीवस्य समीपतः ॥ २६ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी बलवान् वीर गज तीन करोड़ वानरोंके साथ सुग्रीवके पास आया ॥२६ ॥
ऋक्षराजो महातेजा जाम्बवान्नाम नामतः ।
कोटिभिर्दशभिर्व्याप्तः सुग्रीवस्य वशे स्थितः ॥ २७ ॥
रीछोंके राजा जाम्बवान् बड़े तेजस्वी थे । वे दस करोड़ रीछोंसे घिरे हुए आये और सुग्रीवके अधीन होकर खड़े हुए ॥ २७ ॥
रुमणो नाम तेजस्वी विक्रान्तैर्वानरैर्वृतः ।
आगतो बलवांस्तूर्णं कोटीशतसमावृतः ॥ २८ ॥
रुमण ( रुमण्वान् ) नामक तेजस्वी और बलवान् वानर एक अरब पराक्रमी वानरोंको साथ लिये बड़ी तीव्र गतिसे वहाँ आया ॥ २८ ॥
ततः कोटिसहस्राणां सहस्त्रेण शतेन च ।
पृष्ठतोऽनुगतः प्राप्तो हरिभिर्गन्धमादनः ॥ २ ९ ॥
इसके बाद यूथपति गन्धमादन उपस्थित हुए ।
उनके पीछे एक पद्म वानरोंकी सेना आयी थी ॥ २ ९ ॥
ततः पद्मसहस्त्रेण वृतः शङ्कुशतेन च ।
युवराजोऽङ्गदः प्राप्तः पितुस्तुल्यपराक्रमः ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् युवराज अङ्गद आये । ये अपने पिताके समान ही पराक्रमी थे । इनके साथ एक सहस्र पद्म और सौ शंकु ( एक पद्म ) वानरोंकी सेना थी ( इनके सैनिकोंकी कुल संख्या दस शंख एक पद्म थी ) ॥ ३० ॥
ततस्ताराद्युतिस्तारो हरिभिर्भीमविक्रमैः ।
पञ्चभिर्हरिकोटीभिर्दूरतः पर्यदृश्यत ॥ ३१ ॥
तदनन्तर तारोंके समान कान्तिमान् तार नामक वानर पाँच करोड़ भयंकर पराक्रमी वानर वीरोंके साथ दूरसे आता दिखायी दिया ॥३१ ॥
इन्द्रजानुः कविवरो यूथपः प्रत्यदृश्यत ।
एकादशानां कोटीनामीश्वरस्तैश्च संवृतः ॥ ३२ ॥
इन्द्रजानु ( इन्द्रभानु ) नामक वीर यूथपति, जो बड़ा ही विद्वान् एवं बुद्धिमान् था, ग्यारह करोड़ वानरोंके साथ उपस्थित देखा गया । वह उन सबका स्वामी था ॥ ३२ ॥
ततो रम्भस्त्वनुप्राप्तस्तरुणादित्यसंनिभः ।
अयुतेन वृतश्चैव सहस्त्रेण शतेन च ॥ ३३ ॥
इसके बाद रम्भ नामक वानर उपस्थित हुआ, जो प्रात: कालके सूर्यकी भाँति लाल रंगका था । उसके साथ ग्यारह हजार एक सौ वानरोंकी सेना थी ॥ ३३ ॥
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ततो यूथपतिर्वीरो दुर्मुखो नाम वानरः ।
प्रत्यदृश्यत कोटीभ्यां द्वाभ्यां परिवृतो बली ॥ ३४ ॥
तत्पश्चात् वीर यूथपति दुर्मुख नामक बलवान् वानर उपस्थित देखा गया, जो दो करोड़ वानर सैनिकोंसे घिरा हुआ था ॥३४ ॥
कैलासशिखराकारैर्वानरैर्भीमविक्रमैः वृतः कोटिसहस्त्रेण हनुमान् प्रत्यदृश्यत ॥ ३५ ॥
इसके बाद हनुमान्जीने दर्शन दिया । उनके साथ कैलासशिखरके समान श्वेत शरीरवाले भयंकर पराक्रमी वानर दस अरबकी संख्यामें मौजूद थे ॥३५ ॥
नलश्चापि महावीर्यः संवृतो द्रुमवासिभिः ।
कोटीशतेन सम्प्राप्तः सहस्त्रेण शतेन च ॥ ३६ ॥
फिर महापराक्रमी नल उपस्थित हुए, जो एक अरब एक हजार एक सौ द्रुमवासी वानरोंसे घिरे हुए थे ।
ततो दधिमुखः श्रीमान् कोटिभिर्दशभिर्वृतः ।
सम्प्राप्तोऽभिनदंस्तस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ ३७ ॥
तदनन्तर श्रीमान् दधिमुख दस करोड़ वानरोंके साथ गर्जना करते हुए किष्किन्धामें महात्मा सुग्रीवके पास आये ॥ ३७ ॥
शरभः कुमुदो वह्निर्वानरो रंह एव च ।
एते चान्ये च बहवो वानराः कामरूपिणः ॥ ३८ ॥
आवृत्य पृथिवीं सर्वां पर्वतांश्च वनानि च ।
यूथपाः समनुप्राप्ता येषां संख्या न विद्यते ॥ ३ ९ ॥
इनके सिवा शरभ, कुमुद, वह्नि तथा रंह- ये और दूसरे भी बहुत - से इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानरयूथपति सारी पृथ्वी, पर्वत और वनोंको आवृत करके वहाँ उपस्थित हुए, जिनकी कोई गणना नहीं की जा सकती ॥ ३८-३९ ॥ आगताश्च निविष्टाश्च पृथिव्यां सर्ववानराः ।
आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः ।
अभ्यवर्तन्त सुग्रीवं सूर्यमभ्रगणा इव ॥४० ॥
वहाँ आये हुए सभी वानर पृथ्वीपर बैठे । वे सब-के - सब उछलते कूदते और गर्जते हुए वहाँ सुग्रीवके चारों ओर जमा हो गये । जैसे सूर्यको सब ओरसे घेरकर बादलोंके समूह छा रहे हों ॥ ४० ॥
कुर्वाणा बहुशब्दांश्च प्रकृष्टा बाहुशालिनः ।
शिरोभिर्वानरेन्द्राय सुग्रीवाय न्यवेदयन् ॥ ४१ ॥
अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले बहुतेरे श्रेष्ठ वानरोंने ( जो भीड़के कारण सुग्रीवके पासतक न पहुँच सके थे ) अनेक प्रकारकी बोली बोलकर तथा
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८६६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मस्तक झुकाकर वानरराज सुग्रीवको अपने आगमनकी सूचना दी ॥ ४१ ॥
अपरे वानरश्रेष्ठाः संगम्य च यथोचितम् ।
सुग्रीवेण समागम्य स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा ॥ ४२ ॥
बहुत - से श्रेष्ठ वानर उनके पास गये और यथोचितरूपसे मिलकर लौटे तथा कितने ही वानर सुग्रीवसे मिलनेके बाद उनके पास ही हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥४२ ॥
सुग्रीवस्त्वरितो रामे सर्वांस्तान् वानरर्षभान् ।
निवेदयित्वा धर्मज्ञः स्थितः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ ४३ ॥
धर्मके ज्ञाता वानरराज सुग्रीवने वहाँ आये हुए उन इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये | सब वानरशिरोमणियोंका समाचार निवेदन करके श्रीरामचन्द्रजीको शीघ्रतापूर्वक उनका परिचय दिया, फिर हाथ जोड़कर वे उनके सामने खड़े हो गये ॥ ४३ ॥
यथासुखं पर्वतनिर्झरेषु वनेषु सर्वेषु च वानरेन्द्राः । निवेशयित्वा विधिवद् बलानि बलं बलज्ञः प्रतिपत्तुमीष्टे ॥ । ४४ ॥ उन वानर- -यूथपतियोंने वहाँके पर्वतीय झरनोंके आस-पास तथा समस्त वनोंमें अपनी सेनाओंको यथोचितरूपसे सुखपूर्वक ठहरा दिया । तत्पश्चात् सब सेनाओंके ज्ञाता । सुग्रीव उनका पूर्णतः ज्ञान प्राप्त करनेमें समर्थ हो सके ॥ किष्किन्धाकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ९ ॥ चत्वारिंशः सर्गः श्रीरामकी आज्ञासे सुग्रीवका सीताकी खोजके लिये पूर्व दिशामें वानरोंको भेजना और वहाँके स्थानोंका वर्णन करना
अथ राजा समृद्धार्थः सुग्रीवः प्लवगेश्वरः ।
उवाच नरशार्दूलं रामं परबलार्दनम् ॥ १ ॥
तदनन्तर बल - वैभवसे सम्पन्न वानरराज राजा सुग्रीव शत्रुसेनाका संहार करनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामसे बोले - ॥ १ ॥
आगता विनिविष्टाश्च बलिनः कामरूपिणः ।
वानरेन्द्रा महेन्द्राभा ये मद्विषयवासिनः ॥ २ ॥
' भगवन्! जो मेरे राज्यमें निवास करते हैं, वे महेन्द्रके समान तेजस्वी, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और बलवान् वानर - यूथपति यहाँ आकर पड़ाव डाले बैठे हैं ॥
त इमे बहुविक्रान्तैर्बलिभिर्भीमविक्रमैः ।
आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसंनिभाः ॥ ३ ॥
' ये अपने साथ ऐसे बलवान् वानर योद्धाओंको ले आये हैं, जो बहुत - से युद्धस्थलोंमें अपना पराक्रम प्रकट कर चुके हैं और भयंकर पुरुषार्थ कर दिखानेवाले हैं । यहाँ ऐसे - ऐसे वानर उपस्थित हुए हैं, जो दैत्यों और दानवोंके समान भयानक हैं ॥ ३ ॥
ख्यातकर्मापदानाश्च बलवन्तो जितक्लमाः ।
पराक्रमेषु विख्याता व्यवसायेषु चोत्तमाः ॥ ४ ॥
' अनेक युद्धोंमें इन वानर वीरोंकी शूर - वीरताका परिचय मिल चुका है । ये बलके भण्डार हैं, युद्धसे थकते नहीं हैं — इन्होंने थकावटको जीत लिया है । ये अपने । पराक्रमके लिये प्रसिद्ध और उद्योग करनेमें श्रेष्ठ हैं ।
पृथिव्यम्बुचरा राम नानानगनिवासिनः ।
कोट्योघाश्च इमे प्राप्ता वानरास्तव किंकराः ॥५ ॥
' श्रीराम! यहाँ आये हुए ये वानरोंके करोड़ों यूथ विभिन्न पर्वतोंपर निवास करनेवाले हैं । जल और थल- दोनोंमें समानरूपसे चलनेकी शक्ति रखते हैं । ये सब - के - सब आपके किंकर ( आज्ञापालक ) हैं ॥५ ॥
निदेशवर्तिनः सर्वे सर्वे गुरुहिते स्थिताः ।
अभिप्रेतमनुष्ठातुं तव शक्ष्यन्त्यरिंदम ॥ ६ ॥
' शत्रुदमन! ये सभी आपकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं । आप इनके गुरु —स्वामी हैं । ये आपके हितसाधनमें तत्पर रहकर आपके अभीष्ट मनोरथको सिद्ध कर सकेंगे ॥ ६ ॥
त इमे बहुसाहस्त्रैरनीकैर्भीमविक्रमैः ।
आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसंनिभाः ॥ ७ ॥
‘ दैत्यों और दानवोंके समान घोर रूपधारी ये सभी वानर - यूथपति अपने साथ भयंकर पराक्रम करनेवाली कई सहस्र सेनाएँ लेकर आये हैं ॥ ७ ॥
यन्मन्यसे नरव्याघ्र प्राप्तकालं तदुच्यताम् ।
त्वत्सैन्यं त्वद्वशे युक्तमाज्ञापयितुमर्हसि ॥ ८ ॥
" पुरुषसिंह! अब इस समय आप जो कर्तव्य उचित समझते हैं, उसे बताइये । आपकी यह सेना 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_29_1_Back
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किष्किन्धाकाण्डे
आपके वशमें है । आप इसे यथोचित कार्यके लिये ।
आज्ञा प्रदान करें ॥ ८ ॥
काममेषामिदं कार्यं विदितं मम तत्त्वतः ।
तथापि तु यथायुक्तमाज्ञापयितुमर्हसि ॥ ९ ॥
‘ यद्यपि सीताजीके अन्वेषणका यह कार्य इन सबको तथा मुझे भी अच्छी तरह ज्ञात है, तथापि आप जैसा उचित हो, वैसे कार्यके लिये हमें आज्ञा दें ' ॥ ९ ॥
तथा ब्रुवाणं सुग्रीवं रामो दशरथात्मजः ।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥
जब सुग्रीवने ऐसी बात कही, तब दशरथनन्दन श्रीरामने दोनों भुजाओंसे पकड़कर उन्हें हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥१० ॥
ज्ञायतां सौम्य वैदेही यदि जीवति वा न वा ।
स च देशो महाप्राज्ञ यस्मिन् वसति रावणः ॥ ११ ॥
' सौम्य! महाप्राज्ञ! पहले यह तो पता लगाओ कि विदेहकुमारी सीता जीवित है या नहीं तथा वह देश, जिसमें रावण निवास करता है, कहाँ है? ॥ ११ ॥
अधिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च ।
प्राप्तकालं विधास्यामि तस्मिन् काले सह त्वया ॥ १२ ॥
' जब सीताके जीवित होनेका और रावणके निवासस्थानका निश्चित पता मिल जायगा, तब जो समयोचित कर्तव्य होगा, उसका मैं तुम्हारे साथ मिलकर निश्चय करूँगा ॥ १२ ॥
नाहमस्मिन् प्रभुः कार्ये वानरेन्द्र न लक्ष्मणः ।
त्वमस्य हेतुः कार्यस्य प्रभुश्च प्लवगेश्वर ॥ १३ ॥
' वानरराज! इस कार्यको सिद्ध करनेमें न तो मैं समर्थ हूँ और न लक्ष्मण ही । कपीश्वर! इस कार्यकी सिद्धि तुम्हारे ही हाथ है । तुम्हीं इसे पूर्ण करनेमें समर्थ हो ॥ १३ ॥
त्वमेवाज्ञापय विभो मम कार्यविनिश्चयम् ।
त्वं हि जानासि मे कार्यं मम वीर न संशयः ॥ १४ ॥
' प्रभो! मेरे कार्यका भलीभाँति निश्चय करके तुम्हीं वानरोंको उचित आज्ञा दो । वीर! मेरा कार्य क्या है? इसे तुम्हीं ठीक - ठीक जानते हो, इसमें संशय नहीं है ॥ १४ ॥
सुहृद्द्द्वितीयो विक्रान्तः प्राज्ञः कालविशेषवित् ।
भवानस्मद्धिते युक्तः सुहृदाप्तोऽर्थवित्तमः ॥ १५ ॥
' लक्ष्मणके बाद तुम्हीं मेरे दूसरे सुहृद् हो । तुम पराक्रमी, बुद्धिमान्, समयोचित कर्तव्यके ज्ञाता, हितमें संलग्न रहनेवाले, हितैषी बन्धु, विश्वासपात्र तथा मेरे प्रयोजनको अच्छी तरह समझनेवाले हो ' ॥ १५ ॥
चत्वारिंशः सर्गः ८६७
एवमुक्तस्तु सुग्रीवो विनतं नाम यूथपम् ।
। अब्रवीद् रामसांनिध्ये लक्ष्मणस्य च धीमतः ॥ १६ ॥
शैलाभं मेघनिर्घोषमूर्जितं प्लवगेश्वरम् ।
सोमसूर्यनिभैः सार्धं वानरैर्वानरोत्तम ॥ १७ ॥
देशकालनयैर्युक्तो विज्ञः कार्यविनिश्चये ।
वृतः शतसहस्त्रेण वानराणां तरस्विनाम् ॥ १८ ॥
अधिगच्छ दिशं पूर्वी सशैलवनकाननाम् ।
तत्र सीतां च वैदेहीं निलयं रावणस्य च ॥ १ ९ ॥
मार्गध्वं गिरिदुर्गेषु वनेषु च नदीषु च । श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सुग्रीवने उनके और बुद्धिमान् लक्ष्मणके समीप ही विनत नामक यूथपतिसे, जो पर्वतके समान विशालकाय, मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले, बलवान् तथा वानरोंके शासक थे और चन्द्रमा एवं सूर्यके समान कान्तिवाले वानरोंके साथ उपस्थित हुए थे, कहा - ' वानरशिरोमणे! तुम देश और कालके अनुसार नीतिका प्रयोग करनेवाले तथा कार्यका निश्चय करनेमें चतुर हो । तुम एक लाख वेगवान् वानरोंके साथ पर्वत, वन और काननोंसहित पूर्व दिशाकी ओर जाओ और वहाँ पहाड़ोंके दुर्गम प्रदेशों, वनों तथा सरिताओंमें विदेहकुमारी सीता एवं रावणके निवास - स्थानकी खोज करो ॥ १६–१९ ३ ॥ नदीं भागीरथीं रम्यां सरयूं कौशिकीं तथा ॥ २० ॥
कालिन्दीं यमुनां रम्यां यामुनं च महागिरिम् ।
सरस्वतीं च सिन्धुं च शोणं मणिनिभोदकम् ॥ २१ ॥
महीं कालमहीं चापि शैलकाननशोभिताम् । ' भागीरथी गङ्गा, रमणीय सरयू, कौशिकी, सुरम्य कलिन्दनन्दिनी यमुना महापर्वत यामुन, सरस्वती नदी, सिंधु, मणिके समान निर्मल जलवाले शोणभद्र, मही तथा पर्वतों और वनोंसे सुशोभित कालमही आदि नदियोंके किनारे ढूँढो ॥ २०-२१३ ॥ ब्रह्ममालान् विदेहांश्च मालवान् काशिकोसलान् ॥ २२ ॥
मागधांश्च महाग्रामान् पुण्ड्रांस्त्वङ्गांस्तथैव च । ' ब्रह्ममाल, विदेह, मालव, काशी, कोसल, मगध देशके बड़े - बड़े ग्राम, पुण्ड्रदेश तथा अङ्ग आदि जनपदोंमें छानबीन करो ॥ २२३ ॥
भूमिं च कोशकाराणां भूमिं च रजताकराम् ॥ २३ ॥
सर्वं च तद् विचेतव्यं मार्गयद्भिस्ततस्ततः ।
रामस्य दयितां भार्यां सीतां दशरथस्नुषाम् ॥ २४ ॥
' रेशमके कीड़ोंकी उत्पत्तिके स्थानों और चाँदी के खानोंमें भी खोज करनी चाहिये । इधर - उधर ढूँढ़ते हुए 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_29_2_Front
पृष्ठ 880
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८६८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तुम सब लोगोंको इन सभी स्थानोंमें राजा दशरथकी । पुत्रवधू तथा श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नी सीताका अन्वेषण करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥
समुद्रमवगाढांश्च पर्वतान् पत्तनानि च ।
मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिताः केचिदालयाः ॥ २५ ॥
' समुद्रके भीतर प्रविष्ट हुए पर्वतोंपर, उसके अन्तर्वर्ती द्वीपोंके विभिन्न नगरोंमें तथा मन्दराचलकी चोटीपर जो कोई गाँव बसे हैं, उन सबमें सीताका अनुसंधान करो ॥ २५ ॥
कर्णप्रावरणाश्चैव तथा चाप्योष्ठकर्णकाः ।
घोरलोमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादकाः ॥ २६ ॥
अक्षया बलवन्तश्च तथैव पुरुषादकाः ।
किरातास्तीक्ष्णचूडाश्च हेमाभाः प्रियदर्शनाः ॥ २७ ॥
आममीनाशनाश्चापि किराता द्वीपवासिनः ।
अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति स्मृताः ॥ २८ ॥
एतेषामाश्रयाः सर्वे विचेयाः काननौकसः । ' जो कर्णप्रावरण ( वस्त्रकी भाँति पैरतक लटके हुए कानवाले ), ओष्ठकर्णक ( ओठतक फैले हुए कानवाले ) तथा घोरलोहमुख ( लोहेके समान काले एवं भयंकर मुखवाले ) हैं, जो एक ही पैरके होते हुए भी वेगपूर्वक चलनेवाले हैं, जिनकी संतानपरम्परा कभी क्षीण नहीं होती, वे पुरुष तथा जो बलवान् नरभक्षी राक्षस हैं, जो सूचीके अग्रभागकी भाँति तीखी चोटीवाले, सुवर्णके समान कान्तिमान्, प्रियदर्शन ( सुन्दर ), कच्ची मछली खानेवाले, द्वीपवासी तथा जलके भीतर विचरनेवाले किरात हैं, जिनके नीचेका आकार मनुष्य-जैसा और ऊपरकी आकृति व्याघ्रके समान है, ऐसे जो भयंकर प्राणी बताये गये हैं; वानरो! इन सबके निवासस्थानोंमें जाकर तुम्हें सीता तथा रावणकी खोज करनी चाहिये ॥ २६–२८३ ॥ गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च ॥ २ ९ ॥ ' जिन द्वीपोंमें पर्वतोंपर होकर जाना पड़ता है, जहाँ समुद्रको तैरकर या नाव आदिके द्वारा पहुँचा जाता है, उन सब स्थानोंमें सीताको ढूँढ़ना चाहिये ॥ २ ९ ॥
यत्नवन्तो यवद्वीपं सप्तराजोपशोभितम् ।
सुवर्णरूप्यकद्वीपं सुवर्णाकरमण्डितम् ॥ ३० ॥
' इसके सिवा तुमलोग यत्नशील होकर सात राज्योंसे सुशोभित यवद्वीप ( जावा ), सुवर्णद्वीप ( सुमात्रा ) तथा रूप्यकद्वीपमें भी जो सुवर्णकी खानोंसे सुशोभित हैं, ढूँढ़नेका प्रयत्न करो ॥ ३० ॥
यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वतः ।
दिवं स्पृशति शृङ्गेण देवदानवसेवितः ॥ ३१ ॥
' यवद्वीपको लाँघकर आगे जानेपर एक शिशिर नामक पर्वत मिलता है, जिसके ऊपर देवता और दानव निवास करते हैं । वह पर्वत अपने उच्च शिखर स्वर्गलोकका स्पर्श करता - सा जान पड़ता है ॥३१ ॥
एतेषां गिरिदुर्गेषु प्रपातेषु वनेषु च ।
मार्गध्वं सहिताः सर्वे रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥ ३२ ॥
' इन सब द्वीपोंके पर्वतों तथा शिशिर पर्वतके दुर्गम प्रदेशोंमें, झरनोंके आस - पास और जंगलोंमें तुम सब लोग एक साथ होकर श्रीरामचन्द्रजीकी यशस्विनी पत्नी सीताका अन्वेषण करो ॥ ३२ ॥
ततो रक्तजलं प्राप्य शोणाख्यं शीघ्रवाहिनम् ।
गत्वा पारं समुद्रस्य सिद्धचारणसेवितम् ॥ ३३ ॥
तस्य तीर्थेषु रम्येषु विचित्रेषु वनेषु च ।
रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ३४ ॥
' तदनन्तर समुद्रके उस पार जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं, जाकर लाल जलसे भरे हुए शीघ्र प्रवाहित होनेवाले शोण नामक नदके तटपर पहुँच जाओगे । उसके तटवर्ती रमणीय तीर्थों और विचित्र वनोंमें जहाँ - तहाँ विदेहकुमारी सीताके साथ रावणकी खोज करना ॥३३-३४ ॥
पर्वतप्रभवा नद्यः सुभीमबहुनिष्कुटाः ।
मार्गितव्या दरीमन्तः पर्वताश्च वनानि च ॥३५ ॥
' पर्वतोंसे निकली हुई बहुत - सी ऐसी नदियाँ मिलेंगी, जिनके तटोंपर बड़े भयंकर अनेकानेक उपवन प्राप्त होंगे । साथ ही वहाँ बहुत - सी गुफाओंवाले पर्वत उपलब्ध होंगे और अनेक वन भी दृष्टिगोचर होंगे । उन सबमें सीताका पता लगाना चाहिये ॥ ३५ ॥
ततः समुद्रद्वीपांश्च सुभीमान् द्रष्टुमर्हथ ।
ऊर्मिमन्तं महारौद्रं क्रोशन्तमनिलोद्धतम् ॥ ३६ ॥
‘ तत्पश्चात् पूर्वोक्त देशोंसे परे जाकर तुम इक्षुरससे परिपूर्ण समुद्र तथा उसके द्वीपोंको देखोगे, जो बड़े ही भयंकर प्रतीत होते हैं । इक्षुरसका वह समुद्र महाभयंकर है । उसमें हवाके वेगसे उत्ताल तरंगें उठती रहती हैं तथा वह गर्जना करता हुआ - सा जान पड़ता है ॥ ३६ ॥
तत्रासुरा महाकायाश्छायां गृह्णन्ति नित्यशः ।
ब्रह्मणा समनुज्ञाता दीर्घकालं बुभुक्षिताः ॥ ३७ ॥
' उस समुद्रमें बहुत - से विशालकाय असुर निवास करते हैं । वे बहुत दिनोंके भूखे होते हैं और छाया 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_29_2_Back