Ramayana 2 — पृष्ठ 31–40
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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८५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मुक्त हुए हनुमानजीको देखकर सुरसा देवीने अपने असली रूपमें प्रकट होकर उन वानरवीरसे कहा- ॥ १७० ॥
अर्थसिद्धये हरिश्रेष्ठ गच्छ सौम्य यथासुखम् ।
समानय च वैदेहीं राघवेण महात्मना ॥ १७१ ॥
' कपिश्रेष्ठ! तुम भगवान् श्रीरामके कार्यकी सिद्धिके लिये सुखपूर्वक जाओ । सौम्य! विदेहनन्दिनी सीताको महात्मा श्रीरामसे शीघ्र मिलाओ ' ॥ १७१ ॥
तत् तृतीयं हनुमतो दृष्ट्वा कर्म सुदुष्करम् ।
साधुसाध्विति भूतानि प्रशशंसुस्तदा हरिम् ॥ १७२ ॥
कपिवर हनुमान्जीका यह तीसरा अत्यन्त दुष्कर कर्म देख सब प्राणी वाह - वाह करके उनकी प्रशंसा करने लगे ॥
स सागर मनाधृष्यमभ्येत्य वरुणालयम् ।
जगामाकाशमाविश्य वेगेन गरुडोपमः ॥ १७३ ॥
वे वरुणके निवासभूत अलङ्घ्य समुद्र के निकट आकर आकाशका ही आश्रय ले गरुड़ के समान वेगसे आगे बढ़ने लगे ॥
सेविते वारिधाराभिः पतगैश्च निषेविते ।
चरिते कैशिका चारैरावतनिषेविते ॥ १७४ ॥
सिंहकुञ्जरशार्दूलपतगोरगवाहनैः 1 विमानैः सम्पतद्भिश्च विमलैः समलंकृते ॥ १७५ ॥
वज्राशनिसमस्पर्शैः पावकैरिव शोभिते ।
कृत पुण्यैर्महाभागः स्वर्गजिद्भिरधिष्ठिते ॥ १७६ ॥
वहता हव्यमत्यन्तं सेविते चित्रभानुना ।
ग्रहनक्षत्रचन्द्रार्कतारागणविभूषिते ॥ १७७ ॥
महर्षिगणगन्धर्व नागयक्षसमाकुले 1 विविके मिले विश्वे विश्वावसुनिषेविते ॥ १७८ ॥
देवराजगजाकान्ते चन्द्रसूर्यपथे शिवे ।
विताने जीवलोकस्य वितते ब्रह्मनिर्मिते ॥ १७ ९ ॥
बहुशः सेविते वीरविद्याधरगणैर्वृते ।
जगाम वायुमार्गे च गरुत्मानिव मारुतिः ॥ १८० ॥
जो जलकी धाराओंसे सेवित, पक्षियोंसे संयुक्त, गान-विद्याके आचार्य तुम्बुरु आदि गन्धर्वोके विचरणका स्थान तथा ऐरावत के आने - जानेका मार्ग है, सिंह, हाथी, बाघ, पक्षी और सर्प आदि वाहनोंसे जुते और उड़ते हुए निर्मल विमान जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जिनका स्पर्श वज्र और अशनि के समान दुःसह तथा तेज अग्निके समान प्रकाशमान है तथा जो स्वर्गलोकपर विजय पा चुके हैं, ऐसे महाभाग पुण्यात्मा पुरुषों का जो निवासस्थान है, देवता के लिये अधिक मात्रा में हविष्यका भार वहन करनेवाले अग्निदेव जिसका सदा सेवन करते हैं, ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और तारे आभूषणकी भाँति जिसे सजाते हैं, महर्षियोंके समुदाय, गन्धर्व, नाग और यक्ष जहाँ भरे रहते हैं, जो जगत्का आश्रय स्थान, एकान्त और निर्मल है, गन्धर्वराज विश्वावसु जिसमें निवास करते हैं, देवराज इन्द्रका हाथी जहाँ चलता-फिरता है, जो चन्द्रमा और सूर्यका भी मङ्गलमय मार्ग है, इस जीव जगत् के लिये विमल वितान ( चंदोवा ) है, साक्षात् परब्रहा परमात्माने ही जिसकी सृष्टि की है, जो बहुसंख्यक वीरोंसे सेवित और विद्याधरगणोंसे आवृत है, उस वायुपथ आकाशमें पवननन्दन हनुमानजी गरुड़ के समान वेगसे चले || १७४–१८० ॥
हनुमान् मेघजालानि प्राकर्षन् मारुतो यथा ।
काला गुरुवर्णानि रक्तपीतसितानि च ॥ १८ ९ ॥
वायुके समान हनुमानजी अगरके समान काले तथा लाल, पीले और श्वेत बादलोंको खींचते हुए आगे बढ़ने लगे ॥ १८१ ॥
कपिना कृष्यमाणानि महाभ्राणि चकाशिरे ।
प्रविशन्न भ्रजालानि निष्पतंश्च पुनः पुनः ॥ १८२ ॥
प्रावृषीन्दुरिवाभाति निष्पतन् प्रविशंस्तदा । उनके द्वारा खींचे जाते हुए वे बड़े - बड़े बादल अद्भुत शोभा पा रहे थे । वे बारंबार मेघ - समूहों में प्रवेश करते और बाहर निकलते थे । उस अवस्थामें बादलों में छिपते तथा प्रकट होते हुए वर्षाकालके चन्द्रमाकी भाँति उनकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १८२३ ॥
प्रदृश्यमानः सर्वत्र हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १८३ ॥
भेजेऽम्बरं निरालम्बं पक्षयुक्त इवाद्रिराट् । सर्वत्र दिखायी देते हुए पवनकुमार हनुमान्जी पंखधारी गिरिराजके समान निराधार आकाशका आश्रय लेकर आगे बढ़ रहे थे ॥ १८३३ ॥
लवमानं तु तं दृष्ट्वा सिंहिका नाम राक्षसी ॥ १८४ ॥
मनसा चिन्तयामास प्रवृद्धा कामरूपिणी । इस तरह जाते हुए हनुमानजीको इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली विशालकाया सिंहिका नामवाली राक्षसीने देखा । देखकर वह मन ही मन इस प्रकार विचार करने लगी - ॥ १८४३ ॥
अद्य दीर्घस्य कालस्य भविष्याम्यहमाशिता ॥ १८५ ॥
इदं मम महासत्वं चिरस्य वशमागतम् । ' आज दीर्घकाल के बाद यह विशाल जीव मेरे वश में आया है । इसे खा लेने पर बहुत दिनोंके लिये मेरा पेट भर जायगा || १८५३ ॥ इति संचिन्त्य मनसा च्छायामस्य समाक्षिपत् ॥ १८६ ॥
छायायां गृह्यमाणायां चिन्तयामास वानरः ।
समाक्षिप्तोऽस्मि सहसा पङ्गकृतपराक्रमः ॥ १८७ ॥
प्रतिलोमेन वातेन महानौरिव सागरे । अपने हृदय में ऐसा सोचकर उस राक्षसीने हनुमानजी की छाया पकड़ ली । छाया पकड़ी जानेपर वानरवीर हनुमान्ने
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सुन्दरकाण्डे सोचा- ' अहो! सहसा किसने मुझे पकड़ लिया, इस पकड़ के सामने मेरा पराक्रम पङु हो गया है । जैसे प्रतिकूल हवा चलने पर समुद्र में जहाजकी गति अवरुद्ध हो जाती है, वैसी ही दशा आज मेरी भी हो गयी है ' ॥ १८६ १८७३ ॥ तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव वीक्षमाणस्तदा कपिः ॥ १८८ ॥
ददर्श स महासत्वमुत्थितं लवणाम्भसि । यही सोचते हुए कपिवर हनुमान्ने उस समय अगल-बगल में, ऊपर और नीचे दृष्टि डाली । इतनेही में उन्हें समुद्रके जलके ऊपर उठा हुआ एक विशालकाय प्राणी दिखायी दिया || १८८३ ॥ तद् दृष्ट्वा चिन्तयामास मारुतिर्विकृताननाम् ॥ १८ ९ ॥
कपिराज्ञा यथाख्यातं सत्त्वमद्भुतदर्शनम् ।
छायाग्राहि महावीर्यं तदिदं नात्र संशयः ॥ १ ९ ० ॥
उस विकराल मुखवाली राक्षसीको देखकर पवनकुमार हनुमान् सोचने लगे- वानरराज सुग्रीवने जिस महापराक्रमी छायाग्राही अद्भुत जीवकी चर्चा की थी, वह निःसंदेह यही है ॥ १८ ९ -१ ९ ० ॥
सतां बुद्ध्वार्थतत्त्वेन सिंहिकां मतिमान् कपिः ।
व्यवर्धत महाकायः प्रावृषीव बलाहकः ॥१ ९ १ ॥
तब बुद्धिमान् कपिवर हनुमानजीने यह निश्चय करके कि वास्तव में यही सिंहिका है, वर्षाकालके मेघकी भाँति
अपने शरीरको बढ़ाना आरम्भ किया । इस प्रकार वे विशाल-काय हो गये । १ ९ १ ॥
तस्य सा कायमुद्वीक्ष्य वर्धमानं महाकपेः ।
वक्त्रं प्रसारयामास पातालाम्बर संनिभम् ॥ १ ९ २ ॥
घनराजीव गर्जन्ती वानरं समभिद्रवत् । उन महाकपिके शरीर को बढ़ते देख सिंहिकाने अपना मुँह पाताल और आकाशके मध्यभागके समान फैला लिया और मेघोंकी घटा के समान गर्जना करती हुई उन वानरवीरकी ओर दौड़ी || १ ९ २३ ॥ स ददर्श ततस्तस्या विकृतं सुमहन्मुखम् ॥ १ ९ ३ ॥ कायमात्रं च मेधावी मर्माणि च महाकपिः । हनुमान्जीने उसका अत्यन्त विकराल और बढ़ा हुआ मुँह देखा । उन्हें अपने शरीरके बराबर ही उसका मुँह दिखायी दिया । उस समय बुद्धिमान् महाकपि इनुमान्ने सिंहिका मर्मस्थानोंको अपना लक्ष्य बनाया ॥ १ ९ ३३ ॥ स तस्या विकृते वक्त्रे वज्रसंहननः कपिः ॥ १ ९ ४ ॥ संक्षिप्य मुहुरात्मानं निपपात महाकपिः । तदनन्तर वज्रोपम शरीरवाले महाकपि पवनकुमार अपने शरीरको संकुचित करके उसके विकराल मुखमें आ
गिरे । १ ९ ४३ ॥
प्रथमः सर्गः ८५ ९ आस्ये तस्या निमज्जन्तं ददृशुः सिद्धचारणाः ॥ १ ९ ५ ॥ ग्रस्यमानं यथा चन्द्रं पूर्ण पर्वणि राहुणा । उस समय सिद्धों और चारणोंने हनुमानजीको सिंहिका के मुखमें उसी प्रकार निमग्न होते देखा, जैसे पूर्णिमाकी रात में पूर्ण चन्द्रमा राहुके ग्रास बन गये द्द ॥ १ ९ ५३ ॥ ततस्तस्या नखैस्तीक्ष्णैर्मर्माण्युत्कृत्य वानरः ॥ १ ९ ६ ॥ उत्पपाताथ वेगेन मनःसम्पातविक्रमः । मुखमें प्रवेश करके उन वानरवीरने अपने तीखे नखोंसे उस राक्षसी के मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर डाला । इसके पश्चात् वे मनके समान गतिसे उछलकर वेगपूर्वक बाहर निकल आये ॥ १ ९ ६३ ॥ तां तु दिष्टया च धृत्या च दाक्षिण्येन निपान्य सः ॥ १ ९ ७ ॥ कपिप्रवीरो वेगेन ववृधे पुनरात्मवान् । दैवके अनुग्रह, स्वाभाविक धैर्यं तथा कौशलसे उस राक्षसीको मारकर वे मनस्वी वानरवीर पुनः वेगसे बढ़कर बड़े हो गये ॥ १ ९ ७३ ॥
हृतहृत्सा हनुमता पपात विधुराम्भसि ।
स्वयंभुवैव हनुमान् सृष्टस्तस्या निपातने ॥ १ ९ ८ ॥
हनुमानजीने प्राणोंके आश्रयभूत उसके हृदयस्थलको ही नष्ट कर दिया, अतः वह प्राणशून्य होकर समुद्र के जलमें गिर पड़ी । विधाताने ही उसे मार गिरानेके लिये हनुमानजी को निमित्त बनाया था ॥ १ ९ ८ ॥
तां तां वानरेणाशु पतितां वीक्ष्य सिंहिकाम् ।
भूतान्याकाशचारीणि तमूचुः प्लवगोत्तमम् ॥ १ ९९ ॥
उन वानरवीर के द्वारा शीघ्र ही मारी जाकर सिंहिका जलमें गिर पड़ी । यह देख आकाश में विचरनेवाले प्राणी उन कपिश्रेष्ठ से बोले ॥ १ ९९ ॥
भीममद्य कृतं कर्म महत्सत्त्वं त्वया हतम् ।
साधयार्थमभिप्रेतंमरिष्टं लवतां वर ॥ २०० ॥
' कपिवर | तुमने यह बड़ा ही भयंकर कर्म किया है, जो इस विशालकाय प्राणीको मार गिराया है । अब तुम बिना किसी विघ्न - बाघाके अपना अभीष्ट कार्य सिद्ध करो ॥ २०० ॥
यस्य त्वेतानि चत्वारि वानरेन्द्र यथा तव ।
धृतिर्दृष्टिर्मतिर्दाक्ष्यं स कर्मसु न सीदति ॥ २० ९ ॥
" वानरेन्द्र! जिस पुरुषमें तुम्हारे समान धैर्य, सूझ, बुद्धि और कुशलता- - ये चार गुण होते हैं, उसे अपने कार्य में कभी असफलता नहीं होती ' ॥ २०१ ॥
स तैः सम्पूजितः पूज्यः प्रतिपन्नप्रयोजनैः ।
जगामाकाशमाविश्य पन्नगाशनवत् कपिः ॥ २०२ ॥
इस प्रकार अपना प्रयोजन सिद्ध हो जाने से उन आकाश-
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८६० श्रीमवाल्मीकीय रामायणे चारी प्राणियोंने हनुमानजीका बड़ा सत्कार किया । इसके बाद वे आकाशमें चढ़कर गरुड़के समान वेगसे चलने लगे ॥ २०२ ॥
प्राप्तभूयिष्ठपारस्तु सर्वतः परिलोकयन् ।
योजनानां शतस्यान्ते वनराजीं ददर्श सः ॥२०३ ॥
सौ योजन के अन्त में प्रायः समुद्र के पार पहुँचकर जब उन्होंने सब ओर दृष्टि डाली, तब उन्हें एक हरी - भरी वन-श्रेणी दिखायी दी ॥ २०३ ॥
ददर्श च पतन्नेव विविधद्रुमभूषितम् ।
द्वीपं शाखामृगश्रेष्ठो मलयोपवनानि च ॥ २०४ ॥
आकाश में उड़ते हुए ही शाखामृगोंमें श्रेष्ठ हनुमान् जीने भाँति - भाँति के वृक्षोंसे सुशोभित लङ्का नामक द्वीप देखा । उत्तर तटकी भाँति समुद्र के दक्षिण तटपर भी मलय नामक पर्वत और उसके उपवन दिखायी दिये ॥ २०४ ॥
सागरं सागरानूपान् लागरानूपजान् द्रुमान् ।
सागरस्य च पत्नीनां मुखान्यपि विलोकयत् ॥२०५ ॥
समुद्र, सागरतटवर्ती जलप्राय देश तथा वहाँ उगे हुए वृक्ष एवं सागरपत्नी सरिताओंके मुहानोंको भी उन्होंने देखा ॥ २०५ ॥
स महामेघसंकाशं समीक्ष्यात्मानमात्मवान् ।
निरुन्धन्तमिवाकाशं चकार मतिमान् मतिम् ॥ २०६ ॥
मनको वशमें रखनेवाले बुद्धिमान् हनुमानजीने अपने शरीरको महान् मेघोंकी घटाके समान विशाल तथा आकाश-को अवरुद्ध करता - सा देख मन - ही - मन इस प्रकार विचार किया – ॥ २०६ ॥
कायवृद्धि प्रवेगं च मम दृष्द्दैव राक्षसाः ।
मयि कौतूहलं कुर्युरिति मेने महामतिः ॥ २०७ ॥
" अहो! मेरे शरीर की विशालता तथा मेरा यह तीव्र वेग देखते ही राक्षसके मनमें मेरे प्रति बड़ा कौतूहल होगा — वे मेरा भेद जाननेके लिये उत्सुक हो जायँगे । ' परम बुद्धिमान् हनुमानजी के मन में यह धारणा पक्की हो गयी ॥ २०७ ॥
ततः शरीरं संक्षिप्य तन्महीधर संनिभम् ।
पुनः प्रकृतिमापेदे वीतमोह इवात्मवान् ॥ २०८ ॥
मनस्वी हनुमान् अपने पर्वताकार शरीरको संकुचित करके पुनः अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित हो गये । ठीक उसी तरह, जैसे मनको वशमें रखनेघाला मोहरहित पुरुष अपने मूल स्वरूपमें प्रतिष्ठित होता है ॥ २०८ ॥
तद्रूपमतिसंक्षिप्य हनूमान् प्रकृतौ स्थितः ।
त्रीन् क्रमानिव विक्रम्य बलिवीर्यहरो हरिः ॥ २० ९ ॥
जैसे बलिके पराक्रमसम्बन्धी अभिमानको हर लेनेवाले श्रीहरिने विराट्रूपसे तीन पग चलकर तीनों लोकोंको नाप लेने के पश्चात् अपने उम्र स्वरूपको समेट लिया था, उसी प्रकार हनुमानजी समुद्रको लाँघ जानेके बाद अपने उस विशाल रूपको संकुचित करके अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित हो गये ॥ २० ९ ॥ स चारुनानाविधरूपधारी परं समासाद्य समुद्रतीरम् । परैरशक्यं प्रतिपन्नरूपः समीक्षितात्मा समवेक्षितार्थः ॥ २१० ॥
हनुमान जी बड़े ही सुन्दर और नाना प्रकार के रूप धारण कर लेते थे । उन्होंने समुद्र के दूसरे तटपर, जहाँ दूसरोंका पहुँचना असम्भव था, पहुँचकर अपने विशाल शरीर की ओर दृष्टिपात किया । फिर अपने कर्तव्यका विचार करके छोटा - सा रूप धारण कर लिया ॥ २१० ॥
ततः स लम्बस्य गिरेः समृद्धे विचित्रकूटे निपपात कूटे । सकेतकोद्दालकनारिकेले महाभ्रकूटप्रतिमो महात्मा ॥ २१ ९ ॥ महान् मेघ - समूह के समान शरीरवाले महात्मा हनुमानजी केवड़े, लसोड़े और नारियल के वृक्षोंसे विभूषित लम्बपर्वत के विचित्र लघु शिखरोंवाले महान् समृद्धिशाली शृङ्गपर कूद पड़े ॥ २११ ॥
ततस्तु सम्प्राप्य समुद्रतीरं समीक्ष्य लङ्कां गिरिवर्य मूर्ध्नि । कपिस्तु तस्मिन् निपपात पर्वते विधूय रूपं व्यथयन्मृगद्विजान् ॥ २१२ ॥
तदनन्तर समुद्र तटपर पहुँचकर वहाँसे उन्होंने एक श्रेष्ठ पर्वत के शिखर पर बसी हुई लङ्काको देखा । देखकर अपने पहले रूपको तिरोहित करके वे वानरवीर वहाँके पशु - पक्षियोंको व्यथित करते हुए उसी पर्वतपर उतर पड़े ॥ २१२ ॥
स सागरं दानवपन्नगायुतं बलेन विक्रम्य महोर्मिमालिनम् । निपत्य तीरे च महोदधेस्तदा ददर्श लङ्काममरावतीमिव ॥ २१३ ॥
इस प्रकार दानवों और सर्पोंसे भरे हुए तथा बड़ी - बड़ी उत्ताल तरङ्गमालाओंसे अलंकृत महासागरको बलपूर्वक लाँघकर वे उसके तटपर उतर गये और अमरावती के समान सुशोभित लङ्कापुरीकी शोभा देखने लगे ॥ २१३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें पहला सगँ पूरा हुआ ॥ १ ॥
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सुन्दरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ८६१ द्वितीयः सर्गः लङ्कापुरीका वर्णन, उसमें प्रवेश करनेके विषय में हनुमान् जीका विचार, उनका लघुरूपसे पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदयका वर्णन
स सागर मनाधृष्यमतिक्रम्य महाबलः ।
त्रिकूटस्य तटे लङ्कां स्थितः स्वस्थो ददर्श ह ॥ १ ॥
महाबली हनुमान्जी अलङ्घनीय समुद्रको पार करके त्रिकूट ( लम्ब ) नामक पर्वत के शिखर पर स्वस्थ भावसे खड़े हो लङ्कापुरीकी शोभा देखने लगे ॥ १ ॥
ततः पादपमुकेन पुष्पवर्षेण वीर्यवान् ।
अभिवृष्टस्ततस्तत्र बभौ पुष्पमयो हरिः ॥ २ ॥
उस समय उनके ऊपर वहाँ वृक्षोंसे झड़े हुए फूलोंकी वर्षा होने लगी । इससे वहाँ बैठे हुए पराक्रमी हनुमान् फूलके बने हुए वानरके समान प्रतीत होने लगे ॥ २ ॥
योजनानां शतं श्रीमांस्तीर्त्वाप्युतमविक्रमः ।
अनिःश्वसन् कपिस्तत्र न ग्लानिमधिगच्छति ॥ ३ ॥
उत्तम पराक्रमी श्रीमान् वानरवीर हनुमान् सौ योजन समुद्र लाँघकर भी वहाँ लंबी साँस नहीं खींच रहे थे और न ग्लानिका ही अनुभव करते थे ॥ ३ ॥
शतान्यहं योजनानां क्रमेयं सुबहून्यपि ।
किं पुनः सागरस्यान्तं संख्यातं शतयोजनम् ॥ ४ ॥
उलटे वे यह सोचते थे, मैं सौ - सौ योजनोंके बहुत - से समुद्र लाँघ सकता हूँ; फिर इस गिने - गिनाये सौ योजन समुद्रको पार करना कौन बड़ी बात है १ ॥ ४ ॥
स तु वीर्यवतां श्रेष्ठः प्लवतामपि चोत्तमः ।
जगाम वेगवाँल्लङ्कां लङ्घयित्वा महोदधिम् ॥ ५ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ तथा वानरोंमें उत्तम वे वेगवान् पवन-कुमार महासागरको लाँघकर शीघ्र ही लङ्कामें जा पहुँचे ॥५ ॥
• शाद्वलानि च नीलानि गन्धवन्ति वनानि च ।
मधुमन्ति च मध्येन जगाम नगवन्ति च ॥ ६ ॥
रास्ते में हरी - हरी दूब और वृक्षोंसे भरे हुए मकरन्द-पूर्ण सुगन्धित वन देखते हुए वे मध्यमार्ग से जा रहे थे ॥६ ॥
शैलांश्च तरुसंछन्नान् वनराजीश्च पुष्पिताः ।
अभिचक्राम तेजस्वी हनूमान् प्लवगर्षभः ॥ ७ ॥
तेजस्वी वानरशिरोमणि हनुमान् वृक्षोंसे आच्छादित पर्वतों और फूलोंसे भरी हुई वन श्रेणियों में विचरने लगे ॥ ७ ॥
स तस्मिन्नचले तिष्ठन् वनान्युपवनानि च ।
स नगाग्रे स्थितां लङ्कां ददर्श पवनात्मजः ॥ ८ ॥
उस पर्वत पर स्थित हो पवनपुत्र हनुमान्ने बहुत - से वन और उपवन देखे तथा उस पर्वतके अग्रभागमै बसी हुई लङ्काका भी अवलोकन किया ॥ ८ ॥
सरलान् कर्णिकारांश्च खर्जूरांश्च सुपुष्पितान् ।
प्रियालान् मुचुलिन्दांश्च कुटजान् केतकानपि ॥ ९ ॥
प्रियङ्गून् गन्धपूर्णाश्च नीपान् सप्तच्छदांस्तथा ।
असनान् कोविदारश्चि करवीरांश्च पुष्पितान् ॥१० ॥
पुष्पभारनिबद्धांश्च तथा मुकुलितानपि ।
पादपान् विहगाकीर्णान् पवनाधूतमस्तकान् ॥ १ ९ ॥
उन कपिश्रेष्ठ ने वहाँ सरल ( चीड़ ), कनेर, खिले हुए खजूर, प्रियाल ( चिरौंजी ), मुचुलिन्द ( जम्बीरी नीबू ), कुटज, केतक ( केवड़े ), सुगन्धपूर्ण प्रियङ्गु ( पिप्पली ), नीप ( कदम्ब या अशोक ), छितवन, असन, कोविदार तथा खिले हुए करवीर भी देखे । फूलोंके भारसे लदे हुए तथा मुकुलित ( अधखिले ) बहुत - से वृक्ष उन्हें दृष्टिगाचर हुए, जिनमें पक्षी भरे हुए थे और हवाके झोंके से जिनकी डालियाँ झूम रही थीं ॥ ९ -११ ॥
हंसकारण्डवाकीर्णा वापीः पद्मोत्पलावृताः ।
आक्रीडान् विविधान् रम्यान् विविधांश्च जलाशयान् ॥
हंसों और कारण्डवोंसे व्याप्त तथा कमल और उत्पलसे आच्छादित हुई बहुत - सी बावड़ियाँ, भाँति - भाँति के रमणीय क्रीड़ास्थान तथा नाना प्रकार के जलाशय उनके दृष्टिपथमें आये ॥ १२ ॥
संततान् विविधैर्वृक्षैः सर्वर्तुफलपुष्पितैः ।
उद्यानानि च रम्याणि ददर्श कपिकुञ्जरः ॥ १३ ॥
उन जलाशयोंके चारों ओर सभी ऋतुओंमें फल - फूल देनेवाले अनेक प्रकारके वृक्ष फैले हुए थे । उन वानर-शिरोमणिने वहाँ बहुत - से रमणीय उद्यान भी देखे || १३ ॥
समासाद्य च लक्ष्मीवाँलङ्कां रावणपालिताम् ।
परिखाभिः सपद्माभिः सोत्पलाभिरलंकृताम् ॥ १४ ॥
सीतापहरणात् तेन रावणेन सुरक्षिताम् ।
समन्ताद् विचरद्भिश्च राक्षसैरुग्रन्वभिः ॥ १५ ॥
अद्भुत शोभासे सम्पन्न हनुमानजी धीरे - धीरे रावण पालित लङ्कापुरीके पास पहुँचे । उसके चारों ओर खुदी हुई खाइयाँ उस नगरीकी शोभा बढ़ा रही थीं । उनमें उत्पल और पद्म आदि कई जातियोंके कमल खिले थे । सीताको हर लाने के कारण रावणने लङ्कापुरी की रक्षाका विशेष प्रबन्ध कर रक्खा था । उसके चारों ओर भयंकर धनुष धारण करनेवाले राक्षस घूमते रहते थे ॥ १४-१५ ॥
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८६२ श्रीमदवाल्मीकीय रामायणे
काञ्चनेनावृतां रम्यां प्राकारेण महापुरीम् ।
गृहैश्च गिरिसंकाशैः शारदाम्बुदसंनिभैः ॥ १६ ॥
वह महापुरी सोनेकी चहारदीवारीसे घिरी हुई थी तथा पर्वतके समान ऊँचे और शरद् ऋतुके बादलोंके समान श्वेत भवनों से भरी हुई थी ॥ १६ ॥
पाण्डुराभिः प्रतोलीभिरुच्चाभिरभिसंवृताम् ।
अट्टालकशताकीर्णो पताकाध्वजशोभिताम् ॥ १७ ॥
श्वेत रंगकी ऊँची - ऊँची सड़कें उस पुरीको सब ओरसे घेरे हुए थीं । सैकड़ों अट्टालिकाएँ वहाँ शोभा पा रही थीं तथा फहराती हुई ध्वजा पताकाएँ उस नगरीकी शोभा बढ़ा रही थीं ॥ १७ ॥
तोरणैः काञ्चनैर्दिव्यैर्द्धतापङ्क्तिविराजितैः ।
ददर्श हनुमॉलङ्कां देवो देवपुरीमिव ॥ १८ ॥
उसके बाहरी फाटक सोनेके बने हुए थे और उनकी दीवारें लता - वेळोंके चित्र से सुशोभित थीं । हनुमान्जीने उन फाटकोंसे सुशोभित लङ्काको उसी प्रकार देखा, जैसे कोई देवता देवपुरीका निरीक्षण कर रहा हो ॥ १८ ॥
गिरिमूर्ध्नि स्थितां लङ्कां पाण्डुरैर्भवनैः शुभैः ।
ददर्श स कपिः श्रीमान् पुरीमाकाशगामिव ॥ १ ९ ॥
तेजस्वी कपि हनुमान्ने सुन्दर शुभ्र सदनोंसे सुशोभित और पर्वत के शिखर पर स्थित लङ्काको इस तरह देखा, मानो वह आकाशमें विचरनेवाली नगरी हो ॥ १ ९ ॥
पालितां राक्षसेन्द्रेण निर्मितां विश्वकर्मणा ।
लवमानामिवाकाशे ददर्श हनुमान् कपिः ॥ २० ॥
कपिवर हनुमान्ने विश्वकर्माद्वारा निर्मित तथा राक्षस-राज रावणद्वारा सुरक्षित उस पुरीको आकाशमें तैरती-सी देखा ॥ २० ॥
वप्रप्राकार जघनां विपुलाम्बुवनाम्बराम् ।
शतघ्नीशूल केशान्तामट्टालकावतंसकाम् ॥ २१ ॥
मनसेव कृतां लङ्कां निर्मितां विश्वकर्मणा । विश्वकर्माकी बनायी हुईं लङ्का मानो उनके मानसिक संकल्पसे रची गयी एक सुन्दरी स्त्री थी । चहारदीवारी और उसके भीतर की वेदी उसकी जघनस्थली जान पड़ती थीं, समुद्रका विशाल जलराशि और वन उसके वस्त्र थे, शतघ्नी और शूल नामक अस्त्र ही उसके केश थे और बड़ी - बड़ी अट्टालिकाएँ उसके लिये कर्णभूषण - सी प्रतीत हो रही थीं ॥ २१३ ॥
द्वारमुत्तरमासाद्य चिन्तयामास वानरः ॥ २२ ॥
कैलासनिलयप्रख्यमालिखन्तमिवास्वरम् I प्रियमाणमिवाकाशमुच्छ्रितैर्भवनोत्तमैः ॥ २३ ॥
उस पुरीके उत्तर द्वारपर पहुँचकर वानरवीर हनुमानजी चिन्तामें पड़ गये । वह द्वार कैलास पर्वतपर बसी हुई अलकापुरी के बहिर्द्वारके समान ऊँचा था और आकाशमें रेखा - सी खींचता जान पड़ता था । ऐसा जान पड़ता था मानो अपने ऊँचे - ऊँचे प्रासादोंपर आकाशको उठा रक्खा है ॥ २२-२३ ॥
सम्पूर्णा राक्षसै धेरै नगेभगवतीमिव ।
अचिन्त्यां सुकृतां स्पष्टां कुबेराध्युषितां पुरा ॥२४ ॥
दंष्ट्राभिर्बहुभिः शूरैः शूलपट्टिशपाणिभिः ।
रक्षितां राक्षसे घर गुहामाशीविषैरिव ॥ २५ ॥
लङ्कापुरी भयानक राक्षसों से उसी तरह भरी थी, जैसे पातालकी भोगवतीपुरी नागों से भरी रहती है । उसकी निर्माणकला अचिन्त्य थी । उसकी रचना सुन्दर ढंगसे की गयी थी । वह हनुमानजी को स्पष्ट दिखायी देती थी । पूर्वकालमें साक्षात् कुबेर वहाँ निवास करते थे । हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये बड़ी - बड़ी दाढ़वाले बहुत - से शूरवीर घोर राक्षस लङ्कापुरीकी उसी प्रकार रक्षा करते थे, जैसे विषधर सर्प अपनी पुरीकी करते हैं ॥ २४-२५ ॥
तस्याश्च महतीं गुप्ति सागरं च निरीक्ष्य सः ।
रावणं च रिपुं घोरं चिन्तयामास वानरः ॥ २६ ॥
उस नगरकी बड़ी भारी चौकसी, उसके चारों ओर समुद्रकी खाई तथा रावण- जैसे भयंकर शत्रुको देखकर हनुमानजी इस प्रकार विचारने लगे— ॥ २६ ॥
आगत्यापीह हरयो भविष्यन्ति निरर्थकाः ।
नहि युद्धेन वै लङ्का शक्या जेतुं सुरैरपि ॥ २७ ॥
" यदि वानर यहाँतक आ जायँ तो भी वे व्यर्थ ही सिद्ध होंगे; क्योंकि युद्धके द्वारा देवता भी लङ्कापर विजय नहीं पा सकते ॥ २७ ॥
इमां त्वविषमां लङ्कां दुर्गा रावणपालिताम् ।
प्राप्यापि सुमहाबाहुः किं करिष्यति राघवः ॥ २८ ॥
‘ जिससे बढ़कर विषम ( संकटपूर्ण ) स्थान और कोई नहीं है, उस रावणपालित इस दुर्गम लङ्कामें आकर महाबाहु श्रीरघुनाथजी भी क्या करेंगे? ॥ २८ ॥
अवकाशो न साम्नस्तु राक्षसेष्वभिगम्यते ।
न दानस्य न भेदस्य नैव युद्धस्य दृश्यते ॥ २ ९ ॥
' राक्षसोंपर सामनीतिके प्रयोगके लिये तो कोई गुंजाइश ही नहीं है । इनपर दान, भेद और युद्ध ( दण्ड ) नीतिका प्रयोग भी सफल होता नहीं दिखायी देता ॥ २ ९ ॥
चतुर्णामेव हि गतिर्वानराणां तरखिनाम् ।
वालिपुत्रस्य नीलस्य मम राशश्च धीमतः ॥ ३० ॥
" यहाँ चार ही वेगशाली वानरोंकी पहुँच हो सकती है— वालिपुत्र अङ्गदकी, नीलकी, मेरी और बुद्धिमान् राजा सुग्रीवकी ॥ ३० ॥
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सुन्दरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ८६३
यावजानामि वैदेहीं यदि जीवति वा न वा ।
तत्रैव चिन्तयिष्यामि दृष्ट्वा तां जनकात्मजाम् ॥ ३१ ॥
' अच्छा, पहले यह तो पता लगाऊँ कि विदेहकुमारी सीता जीवित हैं या नहीं । जनक किशोरीका दर्शन करने के पश्चात् मैं इस विषय में कोई विचार करूँगा ' ॥ ३१ ॥
ततः स चिन्तयामास मुहूर्त कपिकुञ्जरः ।
गिरेः शृङ्गे स्थितस्तस्मिन् रामस्याभ्युदयं ततः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर उस पर्वत शिखर पर खड़े हुए कपिश्रेष्ठ हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदय के लिये सीताजीका पता लगाने के उपायपर दो घड़ीतक विचार करते रहे ॥ ३२ ॥
अनेन रूपेण मया न शक्या रक्षसां पुरी ।
प्रवेष्टुं राक्षसैर्गुप्ता क्रूरैर्बलसमन्वितैः ॥ ३३ ॥
उन्होंने सोचा -- मैं इस रूपसे राक्षसोंकी इस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि बहुत से क्रूर और बलवान् राक्षस इसकी रक्षा कर रहे हैं ॥ ३३ ॥
महौजसो महावीर्या बलवन्तश्च राक्षसाः ।
वञ्चनीया मया सर्वे जानकीं परिमार्गता ॥ ३४ ॥
" जान की की खोज करते समय मुझे अपने को छिपाने के लिये यहाँके सभी महातेजस्वी महापराक्रमी और बलवान् राक्षसोंसे आँख बचानी होगी ॥ ३४ ॥
लक्ष्यालक्ष्येण रूपेण रात्रौ लङ्कापुरी मया ।
प्राप्तकालं प्रवेष्टुं मे कृत्यं साधयितुं महत् ॥ ३५ ॥
' अतः मुझे रात्रिके समय ही नगर में प्रवेश करना चाहिये और सीताका अन्वेषणरूप यह महान् समयोचित कार्यं सिद्ध करनेके लिये ऐसे रूपका आश्रय लेना चाहिये, जो आँखसे देखा न जा सके । केवल कार्यसे यह अनुमान हो कि कोई आया था ' ॥ ३५ ॥
तां पुरीं तादृशीं दृष्ट्रा दुराधर्षा सुरासुरैः ।
हनूमांश्चिन्तयामास विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः ॥ ३६ ॥
देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय बैसी लङ्कापुरीको देखकर हनुमानजी बारंबार लंबी साँस खींचते हुए यो विचार करने लगे ॥ ३६ ॥
केनोपायेन पश्येयं मैथिलीं जनकात्मजाम् ।
अदृष्ट राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना ॥ ३७ ॥
" किस उपाय से काम लूँ, जिससे दुरात्मा राक्षसराज रावण की दृष्टिसे ओझल रहकर मैं मिथिलेशनन्दिनी जनक-किशोरी सीताका दर्शन प्राप्त कर सकूँ ॥ ३७ ॥
न विनश्येत् कथं कार्य रामस्य विदितात्मनः ।
एकमेकस्तु पश्येयं रहिते जनकात्मजाम् ॥ ३८ ॥
" किस रीति से कार्य किया जाय, जिससे जगद्विख्यात श्रीरामचन्द्र जी का काम भी न बिगड़े और मैं एकान्तमें अकेली जानकीजी से भेंट भी कर लूँ ॥ ३८ ॥
भूताश्चार्था विनश्यन्ति देशकालविरोधिताः ।
विक्लवं दूतमासाद्य तमः सूर्योदये यथा ॥ ३ ९ ॥
' कई बार कातर अथवा अविवेकपूर्ण कार्य करनेवाले दूतके हाथमें पड़कर देश और कालके विपरीत व्यवहार होने के कारण बने बनाये काम भी उसी तरह बिगड़ जाते हैं, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार नष्ट हो जाता है ॥३ ९ ॥
अर्थानर्थान्तरे बुद्धिर्निश्चितापि न शोभते ।
घातयन्तीह कार्याणि दूताः पण्डितमानिनः ॥ ४० ॥
" राजा और मन्त्रियोंके द्वारा निश्चित किया हुआ कर्तव्याकर्तव्यविषयक विचार भी किसी अविवेकी दूतका आश्रय लेनेसे शोभा ( सफलता नहीं पाता है । अपनेको पण्डित माननेवाले अविवेकी दूत सारा काम ही चौपट कर देते हैं ॥ ४० ॥
न विनश्येत् कथं कार्य वैक्लव्यं न कथं भवेत् ।
लङ्घनं च समुद्रस्य कथं नु न भवेद् वृथा ॥ ४१ ॥
" अच्छा तो किस उपायका अवलम्बन करने से स्वामीका कार्य नहीं बिगड़ेगा, मुझे घबराहट या अविवेक नहीं होगा और मेरा यह समुद्रका लाँघना भी व्यर्थ नहीं होने पायेगा ॥ ४१ ॥
मयि दृष्टे तु रक्षोभी रामस्य विदितात्मनः ।
भवेद् व्यर्थमिदं कार्य रावणानर्थमिच्छतः ॥ ४२ ॥
' यदि राक्षसोंने मुझे देख लिया तो रावणका अनर्थ चाहनेवाले उन विख्यातनामा भगवान् श्रीरामका यह कार्य सफल न हो सकेगा ॥ ४२ ॥
नहि शक्यं कवित् स्थातुमविज्ञातेन राक्षसैः ।
अपि राक्षसरूपेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ४३ ॥
' यहाँ दूसरे किसी रूपकी तो बात ही क्या है, राक्षसका रूप धारण करके भी राक्षसोंसे अज्ञात रहकर कहीं ठहरना असम्भव है ॥ ४३ ॥
वायुरप्यत्र नाज्ञातश्चरेदिति मतिर्मम ।
नात्रा विदितं किंचिद् रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥ ४४ ॥
' मेरा तो ऐसा विश्वास है कि राक्षसोंसे छिपे रहकर वायुदेव भी इस पुरी में विचरण नहीं कर सकते । यहाँ कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जो इन भयंकर कर्म करनेवाले राक्षसोंको ज्ञात न हो ॥ ४४ ॥
इहाहं यदि तिष्ठामि स्वेन रूपेण संवतः ।
विनाशमुपयास्यामि भर्तुरर्थश्च हास्यति ॥ ४५ ॥
' यदि यहाँ मैं अपने इस रूपसे छिपकर भी रहूँगा तो मारा जाऊँगा और मेरे स्वामी के कार्य में भी हानि पहुँचेगी ॥ ४५ ॥
तदहं स्वेन रूपेण रजन्यां ह्रस्वतां गतः ।
लङ्कामभिपतिष्यामि राघवस्यार्थसिद्धये ॥ ४६ ॥
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८६४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ' अतः मैं श्रीरघुनाथजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये रातमें अपने इसी रूपसे छोटा - सा शरीर धारण करके लङ्कामें प्रवेश करूँगा ॥ ४६ ॥
रावणस्य पुरीं रात्रौ प्रविश्य सुदुरासदाम् ।
प्रविश्य भवनं सर्व द्रक्ष्यामि जनकात्मजाम् ॥ ४७ ॥
यद्यपि रावणकी इस पुरीमें जाना बहुत ही कठिन है । तथापि रातको इसके भीतर प्रवेश करके सभी घरों में घुसकर मैं जानकी जी की खोज करूँगा ' ॥ ४७ ॥
इति निश्चित्य हनुमान सूर्यस्यास्तमयं कपिः ।
आचका तदा वीरो वैदेह्या दर्शनोत्सुकः ॥ ४८ ॥
ऐसा निश्चय करके वीर वानर हनुमान् विदेहनन्दिनी के दर्शनके लिये उत्सुक हो उस समय सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे ॥ ४८ ॥
सूर्ये चास्तं गते रात्रौ देहं संक्षिप्य मारुतिः ।
वृषदंशक मात्रोऽथ बभूवाद्भुतदर्शनः ॥ ४ ९ ॥
सूर्यास्त हो जानेपर रात के समय उन पवनकुमारने अपने शरीर को छोटा बना लिया । वे बिल्ली के बराबर होकर अत्यन्त अद्भुत दिखायी देने लगे ॥ ४ ९ ॥
प्रदोषकाले हनुमांस्तूर्णमुत्पत्य वीर्यवान् ।
प्रविवेश पुरीं रम्यां प्रविभक्तमहापथाम् ॥ ५० ॥
प्रदोषकाल में पराक्रमी हनुमान् तुरंत ही उछलकर उस रमणीय पुरीमें घुस गये । वह नगरी पृथक - पृथक बने हुए चौड़े और विशाल राजमार्गों से सुशोभित थी ॥ ५० ॥
प्रासादमालाविततां स्तम्भैः काञ्चनसंनिभैः ।
शातकुम्भनिभैर्वालैर्गन्धर्वनगरोपमाम् ॥ ५१ ॥
उसमें प्रासादोंकी लंबी पंक्तियाँ दूरतक फैली हुई थीं । सुनहरे रंग के खम्भों और सोनेकी जालियोंसे विभूषित वह नगरी गन्धर्वनगर के समान रमणीय प्रतीत होती थी ।
सप्तभीमाटीमैश्च स ददर्श महापुरीम् ।
तलैः स्फटिकसंकीर्णैः कार्तखरविभूषितैः ॥ ५२ ॥
वैदूर्यमणिचित्रेश्च मुक्ताजालविभूषितैः ।
तैस्तैः शुशुभिरे तानि भवनान्यत्र रक्षसाम् ॥ ५३ ॥
हनुमान् जीने उस विशाल पुरीको सतमहले, अठमहले मकानों और सुवर्णजटित स्फटिक मणिकी फशोंसे सुशोभित देखा । उनमें वैदूर्य ( नीलम ) भी जड़े गये थे, जिससे उनकी विचित्र शोभा होती थी । मोतियोंकी जालियाँ भी उन महलोंकी शोभा बढ़ाती थीं । उन सबके कारण राक्षसोंके वे भवन बड़ी सुन्दर शोभासे सम्पन्न हो रहे थे ॥ ५२-५३ ॥
काञ्चनानि विचित्राणि तोरणानि च रक्षसाम् ।
लङ्कामुद्योतयामासुः सर्वतः समलंकृताम् ॥ ५४ ॥
हुए विचित्र फाटक सब ओरसे सजी हुई ।
राक्षसोंकी उस लङ्काको और भी उद्दीप्त कर रहे थे ॥ ५४ ॥
अचिन्त्यामद्भुताकारां दृष्ट्वा लङ्कां महाकपिः ।
आसीद् विषण्णो हृष्टश्च वैदेह्या दर्शनोत्सुकः ॥ ५५ ॥
ऐसी अचिन्त्य और अद्भुत आकारवाली देखकर महाकपि हनुमान् विषाद में पड़ गये; परंतु जी के दर्शन के लिये उनके मनमें बड़ी उत्कण्ठा थी, उनका हर्ष और उत्साह भी कम नहीं हुआ ॥ ५५ स पाण्डुराविद्धविमानमालिनीं महाजाम्बूनदजालतोरणाम् यशखिनीं रावणबाहुपालितां लङ्काको जानकी-इसलिये ॥
।
क्षपाचरैर्भीमबलैः सुपालिताम् ॥ ५६ ॥
परस्पर सटे हुए श्वेतवर्णके सतमंजिले महलोंकी पंक्तियाँ लङ्कापुरीकी शोभा बढ़ा रही थीं । बहुमूल्य जाम्बूनद नामक सुवर्णकी जालियों और वन्दनवारोंसे वहाँके घरोंको सजाया गया था । भयंकर बलशाली निशाचर उस पुरीकी अच्छी तरह रक्षा करते थे । रावण के बाहुबल से भी वह
सुरक्षित थी । उसके यशकी ख्याति सुदूरतक फैली हुई थी ।
ऐसी लङ्कापुरीमें हनुमानजीने प्रवेश किया ॥ ५६ ॥
चन्द्रोऽपि साचिव्यमिवास्य कुर्वे-स्तारागणैर्मध्यगतो विराजन् ।
ज्योत्स्नावितानेन वितत्य लोका-नुतिष्टतेऽनेकसहस्ररश्मिः ॥ ५७ ॥
उस समय तारागणों के साथ उनके बीच में विराजमान अनेक सहस किरणोंवाले चन्द्रदेव भी हनुमानजीकी सहायता-सी करते हुए समस्त लोकोंपर अपनी चाँदनीका चंदोवा - सा तानकर उदित हो गये ॥ ५७ ॥
शङ्खप्रभं क्षीरमृणालवर्ण-मुद्रच्छमानं व्यवभासमानम् । ददर्श चन्द्र स कपिप्रवीरः पोलूयमानं सरसीव हंसम् ॥ ५८ ॥
वानरोंके प्रमुख वीर श्रीहनुमानजीने शङ्खकी - सी कान्ति तथा दूध और मृणालके से वर्णवाले चन्द्रमाको आकाशमें इस प्रकार उदित एवं प्रकाशित होते देखा, मानो किसी सरोवर में कोई हंस तैर रहा हो ॥ ५८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में दूसरा सगँ पूरा हुआ ॥ २ ॥
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सुन्दरकाण्डे तृतीयः सर्गः ८६५ तृतीयः सर्गः लङ्कापुरीका अवलोकन करके हनुमान् जीका विस्मित होना, उसमें प्रवेश करते समय निशाचरी लङ्काका उन्हें रोकना और उनकी मारसे विह्वल होकर उन्हें पुरी में प्रवेश करनेकी अनुमति देना
स लंबशिखरे लंबे लंबतोयदसंनिभे ।
सवमास्थाय मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः ॥ १ ॥
निशि लङ्कां महासत्त्वो विवेश कपिकुञ्जरः ।
रम्यकाननतोयाढ्यां पुरीं रावणपालिताम् ॥ २ ॥
ऊँचे शिखरवाले लंब ( त्रिकूट ) पर्वतपर जो महान् मेघों की घटा के समान जान पड़ता था, बुद्धिमान् महाशक्ति-शाली कपिश्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान्ने सत्वगुणका आश्रय ले रातके समय रावणपालित लङ्कापुरीमें प्रवेश किया । वह नगरी सुरम्य वन और जलाशयोंसे सुशोभित थी ॥ १-२ ॥ शारदाम्बुधरप्रख्यैर्भवनैरुपशोभिताम् सागरोपमनिर्घोषां सागरानिलसेविताम् ॥ ३ ॥
शरत्कालके बादलोंकी भाँति श्वेत कान्तिवाले सुन्दर भवन उसकी शोभा बढ़ाते थे । वहाँ समुद्रकी गर्जना के समान गम्भीर शब्द होता रहता था । सागर की लहरों को छूकर बहनेवाली वायु इस पुरीकी सेवा करती थी ॥ ३ ॥
सुपुष्टबलसम्पुष्टां यथैव विटपावतीम् ।
चारुतोरणनिर्यूहां पाण्डुरद्वारतोरणाम् ॥ ४ ॥
वह अलकापुरीके समान शक्तिशालिनी सेनाओंसे सुरक्षित थी । उस पुरीके सुन्दर फाटकोपर मतवाले हाथी शोभा पाते थे । उस पुरीके अन्तर्द्वार और बहिर्द्वार दोनों ही श्वेत कान्तिसे सुशोभित थे ॥ ४ ॥
भुजगाचरितां गुप्तां शुभां भोगवतीमिव ।
तां सविद्युधनाकीर्णा ज्योतिर्गणनिषेविताम् ॥ ५ ॥
चण्डमारुतनिर्ह्रादां यथा चाप्यमरावतीम् । उस नगरीकी रक्षाके लिये बड़े - बड़े सर्पोका संचरण ( आना - जाना ) होता रहता है, इसलिये वह नार्गोसे सुरक्षित सुन्दर भोगवती पुरीके समान जान पड़ती थी । अमरावती पुरीके समान वहाँ आवश्यकता के अनुसार बिजलियों सहित मेघ छाये रहते थे । ग्रहों और नक्षत्रोंके सदृश विद्युत् - दीपके प्रकाशसे वह पुरी प्रकाशित थी तथा प्रचण्ड वायुकी ध्वनि वहाँ सदा होती रहती थी ॥ ५३ ॥
शातकुम्भेन महता प्राकारेणाभिसंवृताम् ॥ ६ ॥
किङ्किणीजालघोषाभिः पताकाभिरलंकृताम् । सोनेके बने हुए विशाल परकोटेसे घिरी हुई लङ्कापुरी क्षुद्र घंटिकाओंकी झनकारसे युक्त पताकाओं द्वारा अलंकृत थी ॥ ६३ ॥
वा ० रा ० ५. ७. १-आसाद्य सहसा हृष्टः प्राकारमभिपेदिवान् ॥ ७ ॥
विस्मयाविष्टहृदयः पुरीमालोक्य सर्वतः । उस पुरीके समीप पहुँचकर हर्ष और उत्साहसे भरे हुए हनुमानजी सहसा उछलकर उसके परकोटेपर चढ़ गये । वहाँ सब ओरसे लङ्कापुरीका अवलोकन करके हनुमानजी-का चित्त आश्चर्य से चकित हो उठा ॥ ७३ ॥
जाम्बूनदमयैद्वारे वैदूर्य कृतवेदिकैः ॥ ८ ॥
वज्रस्फटिकमुक्ताभिर्मणिकुट्टिमभूषितैः ।
तप्तहार कनिर्यूहै राजतामलपाण्डुरैः ॥ ९ ॥
वैदूर्यकृत सोपानैः स्फाटिकान्तरपांसुभिः ।
चारुसंजवनोपेतैः खमिवोत्पतितैः शुभैः ॥ १० ॥
सुवर्णके बने हुए द्वारोंसे उस नगरीकी अपूर्व शोभा हो रही थी । उन सभी द्वारोंपर नीलमके चबूतरे बने हुए थे । वे सब द्वार हीरों, स्फटिकों और मोतियोंसे जड़े गये थे । मणिमयी फरों उनकी शोभा बढ़ा रही थीं । उनके दोनों ओर तपाये सुवर्णके बने हुए हाथी शोभा पाते थे । उन द्वारोंका ऊपरी भाग चाँदीसे था । उनकी सीढ़ियाँ भीतरी भाग स्फटिक वे सभी द्वार रमणीय इतने ऊँचे थे कि थे ॥ ८–१० ॥ क्रौञ्चवर्हिणसंघुष्टै तूर्याभरणनिर्घोषैः वहाँ क्रौञ्च और निर्मित होने के कारण स्वच्छ और श्वेत नीलमकी बनी हुई थीं । उन द्वारोंके मणिके बने हुए और धूलसे रहित थे । सभा भवनोंसे युक्त और सुन्दर थे तथा आकाशमें उठे हुए - से जान पड़ते
राजहंस निषेवितैः ।
सर्वतः परिनादिताम् ॥ ११ ॥
मयूरोंके कलरव गूँजते रहते थे, उन द्वारोंपर राजहंस नामक पक्षी भी निवास करते थे । वहाँ भाँति - भाँति के वाद्यों और आभूषणोंकी मधुर ध्वनि होती रहती थी, जिससे लङ्कापुरी सब ओरसे प्रतिध्वनित हो रही थी ॥११ ॥
वस्वोकसारप्रतिमां समीक्ष्य नगरी ततः ।
स्खमिवोत्पतितां लङ्कां जहर्ष हनुमान् कपिः ॥ १२ ॥
कुबेरकी अलका के समान शोभा पानेवाली लङ्का नगरी त्रिकूट के शिखर पर प्रतिष्ठित होने के कारण आकाशमें उठी हुई - सी प्रतीत होती थी । उसे देखकर कपिवर हनुमान्को बड़ा हर्ष हुआ ॥ १२ ॥
तां समीक्ष्य पुरीं लङ्कां राक्षसाधिपतेः शुभाम् ।
अनुत्तमामृद्धिमतीं चिन्तयामास वीर्यवान् ॥ १३ ॥
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८६६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे राक्षसराजकी वह सुन्दर पुरी लङ्का सबसे उत्तम और समृद्धिशालिनी थी । उसे देखकर पराक्रमी हनुमान् इस प्रकार सोचने लगे ॥ १३ ॥
नेयमन्येन नगरी शक्या धर्षयितुं बलात् ।
रक्षित रावण बलैरुद्यतायुधपाणिभिः ॥ १४ ॥
' रावणके सैनिक हाथोंमें अस्त्र - शस्त्र लिये इस पुरीकी रक्षा करते हैं, अतः दूसरा कोई बलपूर्वक इसे अपने काबू-में नहीं कर सकता ॥ १४ ॥
कुमुदाङ्गदयोर्वापि सुषेणस्य महाकपेः ।
प्रसिद्धेयं भवेद् भूमिमैन्दद्विविदयोरपि ॥ १५ ॥
विवस्वतस्तनूजस्य हरेश्च कुशपर्वणः ।
ऋक्षस्य कपिमुख्यस्य मम चैव गतिर्भवेत् ॥ १६ ॥
' केवल कुमुद, अङ्गद, महाकपि सुषेण, मैन्द, द्विविद, सूर्यपुत्र सुग्रीव, वानर कुशपर्वा और वानरसेना के प्रमुख वीर ऋक्षराज जाम्बवान्की तथा मेरी भी पहुँच इस पुरीके भीतर हो सकती है ' ॥ १५-१६ ॥
समीक्ष्य च महाबाहो राघवस्य पराक्रमम् ।
लक्ष्मणस्य च विक्रान्तमभवत् प्रीतिमान् कपिः ॥१७ ॥
फिर महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मणके पराक्रमका विचार करके कविवर हनुमान्को बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १७ ॥
तां रत्नवसनोपेतां गोष्ठागारावतंसिकाम् ।
यन्त्रागारस्तनीमृद्धां प्रमदामिव भूषिताम् ॥ १८ ॥
तां नष्टतिमिरां दीपैर्भाखरैश्च महाग्रहैः ।
नगरी राक्षसेन्द्रस्य स ददर्श महाकपिः ॥ १ ९ ॥
महाकपि हनुमानूने देखा, राक्षसराज रावणकी नगरी ङ्का वस्त्राभूषणों से विभूषित सुन्दरी युवती के समान जान पड़ती है । रत्नमय परकोटे ही इसके वस्त्र हैं, गोष्ठ ( गोशाला ) तथा दूसरे- दूसरे भवन आभूषण हैं । परकोटोंपर लगे हुए यन्त्रोंके जो गृह हैं, ये ही मानो इस लङ्कारूपी युवतीके स्तन हैं । यह सब प्रकार के समृद्धियोंसे सम्पन्न है । प्रकाश-पूर्ण द्वीपों और महान् ग्रहोंने यहाँका अन्धकार नष्ट कर दिया है ॥ १८-१९ ॥
अथ सा हरिशार्दूलं प्रविशन्तं महाकपिम् ।
नगरी स्वेन रूपेण ददर्श पवनात्मजम् ॥ २० ॥
तदनन्तर वानरश्रेष्ठ महाकपि पवनकुमार हनुमान् उस पुरीमें प्रवेश करने लगे । इतने मेंही उस नगरीकी अधिष्ठात्री देवी लङ्काने अपने स्वाभाविक रूपमें प्रकट होकर उन्हें देखा ॥ २० ॥
सा तं हरिवरं दृष्ट्वा लङ्का रावणपालिता ।
स्वयमेवोत्थिता तत्र विकृताननदर्शना ॥ २१ ॥
वानरश्रेष्ठ हनुमान्को देखते ही रावणपालित लङ्का स्वयं ही उठ खड़ी हुई । उसका मुँह देखनेमें बड़ा विकट था ॥ २१ ॥
पुरस्तात् तस्य वीरस्य वायुसूनोरतिष्ठत ।
मुञ्चमाना महानादमब्रवीत् पवनात्मजम् ॥ २२ ॥
वह उन वीर पवनकुमार के सामने खड़ी हो गयी और बड़े जोरसे गर्जना करती हुई उनसे इस प्रकार बोली- ॥२२ ॥
कस्त्वं केन च कार्येण इह प्राप्तो वनालय ।
कथयस्वेह यत् तत्त्वं यावत् प्राणा धरन्ति ते ॥ २३ ॥
' वनचारी वानर! तू कौन है और किस कार्यसे यहाँ आया है? तुम्हारे प्राण जबतक बने हुए हैं, तबतक ही यहाँ आनेका जो यथार्थ रहस्य है, उसे ठीक - ठीक बता दो ॥ २३ ॥
न शक्यं खल्वियं लङ्का प्रवेष्टुं वानर त्वया ।
रक्षिता रावणबलैरभिगुप्ता समन्ततः ॥ २४ ॥
' वानर | रावणकी सेना सब ओरसे इस पुरीकी रक्षा करती है, अतः निश्चय ही तू इस लङ्कामें प्रवेश नहीं कर सकता ' ॥ २४ ॥
अथ तामब्रवीद् वीरो हनुमानग्रतः स्थिताम् ।
कथयिष्यामि तत् तत्त्वं यन्मां त्वं परिपृच्छसे ॥ २५ ॥
का त्वं विरूपनयना पुरद्वारेऽवतिष्ठसे ।
किमर्थं चापि मां क्रोधान्निर्भत्सयसि दारुणे ॥ २६ ॥
तब वीरवर हनुमान् अपने सामने खड़ी हुई लङ्का से बोले -- ' क्रूर स्वभाववाली नारी! तू मुझसे जो कुछ पूछ रही है, उसे मैं ठीक - ठीक बता दूंगा; किंतु पहले यह तो बता, तू है कौन? तेरी आँखें बड़ी भयंकर हैं । तू इस नगर के द्वारपर खड़ी है । क्या कारण है कि तू इस प्रकार क्रोध करके मुझे डाँट रही है? ' ॥ २५-२६ ॥
हनुमद्वचनं श्रुत्वा लङ्का सा कामरूपिणी ।
उवाच वचनं क्रुद्धा परुषं पवनात्मजम् ॥ २७ ॥
हनुमानजी की यह बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली लङ्का कुपित हो उन पवनकुमारसे कठोर वाणी में बोली- ॥ २७ ॥
अहं राक्षसराजस्य रावणस्य महात्मनः ।
आशाप्रतीक्षा दुर्धर्षा रक्षामि नगरीमिमाम् ॥ २८ ॥
" मैं महामना राक्षसराज रावणकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करने-वाली उनकी सेविका हूँ । मुझपर आक्रमण करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है । मैं इस नगरीकी रक्षा करती हूँ ॥ २८ ॥
न शक्यं मामवशाय प्रवेष्टुं नगरीमिमाम् ।
अद्य प्राणैः परित्यक्तः स्वप्स्यसे निहतो मया ॥ २ ९ ॥
' मेरी अवहेलना करके इस पुरीमें प्रवेश करना किसी
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सुन्दरकाण्डे तृतीयः सर्गः ८६७ के लिये भी सम्भव नहीं है । आज मेरे हाथसे मारा जाकर तू प्राणहीन हो इस पृथ्वीपर शयन करेगा ॥ २ ९ ॥
अहं हि नगरी लङ्का स्वयमेव प्लवङ्गम ।
सर्वतः परिरक्षामि अतस्ते कथितं मया ॥ ३० ॥
" वानर! मैं स्वयं ही लङ्का नगरी हूँ, अतः सब ओरसे इसकी रक्षा करती हूँ । यही कारण है कि मैंने तेरे प्रति कठोर वाणीका प्रयोग किया है ' ॥ ३० ॥
लङ्काया वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः ।
यत्नवान् स हरिश्रेष्ठः स्थितः शैल इवापरः ॥ ३१ ॥
लङ्काकी यह बात सुनकर पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् उसे जीतनेके लिये यत्नशील हो दूसरे पर्वतके समान वहाँ खड़े हो गये ॥ ३१ ॥
स तां स्त्रीरूपविकृतां दृष्ट्वा वानरपुङ्गवः ।
आवभाषेऽथ मेधावी सत्त्ववान् प्लवगर्षभः ॥ ३२ ॥
लङ्काको विकराल राक्षसीके रूपमें देखकर बुद्धिमान् वानरशिरोमणि शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने उससे इस प्रकार कहा- ॥ ३२ ॥
द्रक्ष्यामि नगरीं लङ्कां साट्टप्राकारतोरणाम् ।
इत्यर्थमिह सम्प्राप्तः परं कौतूहलं हि मे ॥ ३३ ॥
“ मैं अट्टालिकाओं, परकोटों और नगरद्वारोंसहित
इस लङ्का नगरीको देखूँगा । इसी प्रयोजनसे यहाँ आया हूँ ।
इसे देखनेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है ॥ ३३ ॥
वनान्युपवनानीह लङ्कायाः काननानि च ।
सर्वतो गृहमुख्यानि द्रष्टुमागमनं हि मे ॥ ३४ ॥
‘ इस लङ्काके जो वन, उपवन, कानन और मुख्य-मुख्य भवन हैं, उन्हें देखने के लिये ही यहाँ मेरा आगमन हुआ है ' ॥ ३४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लङ्का सा कामरूपिणी ।
भूय एव पुनर्वाक्यं बभाषे परुषाक्षरम् ॥ ३५ ॥
हनुमान जी का यह कथन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली लङ्का पुनः कठोर वाणी में बोली- ॥ ३५ ॥
मामनिर्जित्य दुर्बुद्धे राक्षसेश्वरपालिताम् ।
न शक्यं ह्यद्य ते द्रष्टुं पुरीयं वानराधम ॥ ३६ ॥
' खोटी बुद्धिवाले नीच वानर । राक्षश्वर रावणके द्वारा मेरी रक्षा हो रही है । तू मुझे परास्त किये बिना आज इस पुरीको नहीं देख सकता ' ॥ ३६ ॥
ततः स हरिशार्दूलस्तामुवाच निशाचरीम् ।
दृष्ट्रा पुरीमिमां भद्रे पुनर्यास्ये यथागतम् ॥ ३७ ॥
तब उन वानरशिरोमणिने उस निशाचरीसे कहा— ' भद्रे! इस पुरीको देखकर मैं फिर जैसे आया हूँ, उसी तरह लौट जाऊँगा ' ॥ ३७ ॥
ततः कृत्वा महानादं सा वै लङ्का भयंकरम् ।
तलेन वानरश्रेष्ठं ताडयामास वेगिता ॥ ३८ ॥
यह सुनकर लङ्काने बड़ी भयंकर गर्जना करके वानरश्रेष्ठ हनुमान्को बड़े जोरसे एक थप्पड़ मारा ॥ ३८ ॥
ततः स हरिशार्दूलो लङ्कया ताडितो भृशम् ।
ननाद सुमहानादं वीर्यवान् मारुतात्मजः ॥ ३ ९ ॥
लङ्काद्वारा इस प्रकार जोरसे पीटे जानेपर उन परम पराक्रमी पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने बड़े जोर से सिंहनाद किया ॥ ३ ९ ॥
ततः संवर्तयामास वामहस्तस्य सोऽङ्गुलीः ।
मुष्टिनाभिजघानैनां हनुमान् क्रोधमूर्च्छितः ॥ ४० ॥
फिर उन्होंने अपने बायें हाथकी अङ्गुलियोंको मोड़कर मुट्ठी बाँध ली और अत्यन्त कुपित हो उस लङ्काको एक मुक्का जमा दिया ॥ ४० ॥
स्त्री चेति मन्यमानेन नातिक्रोधः स्वयं कृतः ।
सा तु तेन प्रहारेण विह्वलाङ्गी निशाचरी ।
पपात सहसा भूमौ विकृताननदर्शना ॥ ४१ ॥
उसे स्त्री समझकर हनुमानजीने स्वयं ही अधिक क्रोध नहीं किया । किंतु इस लघु प्रहारसे ही उस निशाचरीके सारे अङ्ग व्याकुल हो गये । वह सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी । उस समय उसका मुख बड़ा विकराल दिखायी देता था ॥ ४१ ॥
ततस्तु हनुमान् वीरस्तां दृष्ट्वा विनिपातिताम् ।
कृपां चकार तेजस्वी मन्यमानः स्त्रियं चताम् ॥ ४२ ॥
अपने ही द्वारा गिरायी गयी उस लङ्काकी ओर देखकर और उसे स्त्री समझकर तेजस्वी वीर हनुमानको
उसपर दया आ गयी । उन्होंने उसपर बड़ी कृपा की ॥
ततो वै भृशमुद्विग्ना लङ्का सा गद्गदाक्षरम् ।
उवाच गर्वितं वाक्यं हनुमन्तं प्लवङ्गमम् ॥ ४३ ॥
उधर अत्यन्त उद्विग्न हुई लङ्का उन वानरवीर हनुमानूसे अभिमानशून्य गद्गदवाणीमें इस प्रकार बोली- 1
प्रसीद सुमहाबाहो त्रायस्व हरिसप्तम ।
समये सौम्य तिष्ठन्ति सत्त्ववन्तो महाबलाः ॥ ४४ ॥
' महाबाहो! प्रसन्न होइये । कपिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिये | सौम्य | महाबली सत्त्वगुणशाली वीर पुरुष शास्त्रकी मर्यादापर स्थिर रहते हैं ( शास्त्र में स्त्रीको अवस्य बताया है, इसलिये आप मेरे प्राण न लीजिये ) ॥ ४४ ॥
अहं तु नगरी लङ्का स्वयमेव प्लवङ्गम ।
निर्जिताहं त्वया वीर विक्रमेण महाबल ॥ ४५ ॥
' महाबली वीर वानर! मैं स्वयं लङ्कापुरी ही हूँ, आपने अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर दिया है ॥ ४५ ॥
इदं च तथ्यं शृणु मे ब्रुवन्त्या वै हरीश्वर ।