Ramayana 2 — पृष्ठ 41–50

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50

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८६८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे स्वयं स्वयम्भुवा दत्तं वरदानं यथा मम ॥ ४६ ॥

' वानरेश्वर! मैं आपसे एक सच्ची बात कहती हूँ । आप इसे सुनिये । साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्माजीने मुझे जैसा वरदान दिया था, वह बता रही हूँ ॥ ४६ ॥

यदा त्वां वानरः कश्चिद् विक्रमाद् वशमानयेत् ।

तदा त्वया हि विज्ञेयं रक्षसां भयमागतम् ॥ ४७ ॥

" उन्होंने कहा था – “ जब कोई वानर तुझे अपने पराक्रमसे वशमें कर ले, तब तुझे यह समझ लेना चाहिये कि अब राक्षसोंपर बड़ा भारी भय आ पहुँचा है ' ॥ ४७ ॥

स हि मे समयः सौम्य प्राप्तोऽद्य तव दर्शनात् ।

स्वयम्भूविहितः सत्यो न तस्यास्ति व्यतिक्रमः ॥ ४८ ॥

' सौम्य! आपका दर्शन पाकर आज मेरे सामने वही घड़ी आ गयी है । ब्रह्माजीने जिस सत्यका निश्चय कर दिया है, उसमें कोई उलट - फेर नहीं हो सकता ॥ ४८ ॥

सीतानिमित्तं राशस्तु रावणस्य दुरात्मनः ।

रक्षसां चैव सर्वेषां विनाशः समुपागतः ॥ ४ ९ ॥

' अब सीताके कारण दुरात्मा राजा रावण तथा समस्त राक्षसोंके विनाशका समय आ पहुँचा है ॥ ४ ९ ॥

तत् प्रविश्य हरिश्रेष्ठ पुरीं रावणपालिताम् ।

विधत्स्व सर्वकार्याणि यानि यानीह वाञ्छसि ॥ ५० ॥

' कपिश्रेष्ठ! अतः आप इस रावणपालित पुरीमें प्रवेश कीजिये और यहाँ जो - जो कार्य करना चाहते हों, उन सबको पूर्ण कर लीजिये ॥ ५० ॥

प्रविश्य शापोपहतां हरीश्वर पुरीं शुभां राक्षस मुख्यपालिताम् । यदृच्छया त्वं जनकात्मजां सत विमार्ग सर्वत्र गतो यथासुखम् ॥५१ ॥

' वानरेश्वर! राक्षसराज रावणके द्वारा पालित यह सुन्दर पुरी अभिशापसे नष्टप्राय हो चुकी है । अतः इसमें प्रवेश करके आप स्वेच्छानुसार सुखपूर्वक सर्वत्र सती-साध्वी जनकनन्दिनी सीताकी खोज कीजिये ॥ ५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ॥

चतुर्थः सर्गः हनुमानजीका लङ्कापुरी एवं

स निर्जित्य पुरीं लङ्कां श्रेष्ठां तां कामरूपिणीम् ।

विक्रमेण महातेजा हनूमान् कपिसत्तमः ॥ १ ॥

अद्वारेण महावीर्यः प्राकारमवपुप्लुवे ।

निशि लङ्कां महासत्त्वो विवेश कपिकुञ्जरः ॥ २ ॥

इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली श्रेष्ठ राक्षसी लङ्कापुरी-को अपने पराक्रमसे परास्त करके महातेजस्वी महाबली महान् सत्वशाली वानरशिरोमणि कपिकुञ्जर हनुमान् बिना दरवाजे के ही रात में चहारदीवारी फाँद गये और लङ्काके भीतर घुस गये ॥ १-२ ॥

प्रविश्य नगरीं लङ्कां कपिराजद्दितंकरः ।

चक्रेऽथ पादं सव्यं च शत्रूणां स तु मूर्धनि ॥ ३ ॥

कपिराज सुग्रीवका हित करनेवाले हनुमानजीने इस तरह लङ्कापुरी में प्रवेश करके मानो शत्रुओंके सिरपर अपना बायाँ पैर रख दिया ॥ ३ ॥

प्रविष्टः सत्त्वसम्पन्नो निशायां मारुतात्मजः ।

स महापथमास्थाय मुक्तपुष्पविराजितम् ॥ ४ ॥

ततस्तु तां पुरीं लङ्कां रम्यामभिययौ कपिः । सत्त्वगुणसे सम्पन्न पवनपुत्र हनुमान् उस रातमें परकोटेके भीतर प्रवेश करके बिखेरे गये फूलोंसे सुशोभित राजमार्गका आश्रय ले उस रमणीय लङ्कापुरीकी ओर चले ॥ ४१ ॥

रावणके अन्तःपुरमें प्रवेश इसितोत्कृष्ट निनदैस्तूर्य घोष पुरस्कृतैः ॥ ५ ॥

वज्राङ्कुशनिकाशैश्च वज्रजालविभूषितैः ।

गृहमेधैः पुरी रम्या बभासे द्यौरिवाम्बुदैः ॥ ६ ॥

जैसे आकाश श्वेत बादलोंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार वह रमणीय पुरी अपने श्वेत मेघसदृश गृहोंसे उत्तम शोभा पा रही थी । वे गृह अटूट्टहासजनित उत्कृष्ट शब्दों तथा वाद्यघोषोंसे मुखरित थे । उनमें वज्रों तथा अङ्कुशोंके चित्र अङ्कित थे और हीरोंके बने हुए झरोखे उनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ५-६ ॥

प्रजज्वाल तदा लङ्का रक्षोगणगृहैः शुभैः ।

सिताभ्रसदृशैश्चित्रैः पद्मस्वस्तिकसंस्थितैः ॥ ७ ॥

वर्धमान गृहैश्चापि सर्वतः सुविभूषितैः । उस समय लङ्का श्वेत बादलोंके विचित्र राक्षस - गृहों से प्रकाशित हो रही कोई तो कमलके आकार में बने हुए थे के चिह्न या आकारसे युक्त थे और वर्धमानसंज्ञक गृहोंके रूपमें हुआ था । वे सजाये गये थे ॥ ७३ ॥

१- २. वाराहमिहिर की संहितामें गृहोंके ( आकृतियों ) का वर्णन किया गया है समान सुन्दर एवं थी । उन गृहों में से १ । कोई स्वस्तिक-किन्हींका निर्माण सभी सब ओरसे विभिन्न संस्थानों । उन्हीं संस्थानोंके

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सुन्दरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ८६ ९ तां चित्रमाल्याभरणां कपिराजद्दितंकरः ॥ ८ ॥

राघवार्थे वरश्रीमान् ददर्श च ननन्द च । वानरराज सुग्रीवका हित करनेवाले श्रीमान् हनुमान् श्रीरघुनाथजीकी कार्यसिद्धि के लिये विचित्र पुष्पमय आभरणोंसे अलंकृत लङ्कार्मे विचरने लगे । उन्होंने उस पुरीको अच्छी तरह देखा और देखकर प्रसन्नताका अनुभव किया ॥ ८३ ॥

भवनाद् भवनं गच्छन् ददर्श कपिकुञ्जरः ॥ ९ ॥

विविधाकृतिरूपाणि भवनानि ततस्ततः ।

शुभाव रुचिरं गीतं त्रिस्थानस्वरभूषितम् ॥ १० ॥

उन कपिश्रेष्ठने जहाँ - तहाँ एक घरसे दूसरे घरपर जाते हुए विविध आकार - प्रकार के भवन देखे तथा हृदय, कण्ठ और मूर्धा - इन तीन स्थानोंसे निकलनेवाले मन्द, मध्यम और उच्च स्वरसे विभूषित मनोहर गीत सुने ॥ ९ -१० ॥

स्त्रीणां मदनविद्धानां दिवि चाप्सरसामिव ।

शुश्राव काञ्चीनिनदं नूपुराणां च निःखनम् ॥ ११ ॥

उन्होंने स्वर्गीय अप्सराओंके समान सुन्दरी तथा काम-वेदनासे पीड़ित कामिनियोंकी करधनी और पायजेबों की झनकार सुनी ॥ ११ ॥

सोपाननिनदांश्चापि भवनेषु महात्मनाम् ।

आस्फोटितनिनादांश्च क्ष्वेडितांश्च ततस्ततः ॥ १२ ॥

इसी तरह जहाँ - तहाँ महामनस्वी राक्षसोंके घरोंमें सीढ़ियों पर चढ़ते समय स्त्रियोंकी काञ्ची और मंजीरकी मधुरध्वनि तथा पुरुषों के ताल ठोकने और गर्जने की भी आवाजें उन्हें सुनायी दीं ॥ १२ ॥

शुश्राव जपतां तत्र मन्त्रान् रक्षोगृहेषु वै ।

स्वाध्यायनिरतांश्चैव यातुधानान् ददर्श सः ॥ १३ ॥

अनुसार उनके नाम दिये गये हैं । जहाँ स्वस्तिकसंस्थान और वर्धमानसंज्ञक गृहका उल्लेख हुआ है, इनके लक्षणोंको स्पष्ट करनेवाले वचनों को यहाँ उद्धृत किया जाता है—

चतुःशालं चतुर्द्वारं सर्वतोभद्रसंशितम् ।

पश्चिमद्वाररहितं नन्द्यावर्ता यन्तु तत् ॥

दक्षिणद्वार रहितं वर्धमानं धनप्रदम् ।

प्राग्द्वाररहितं स्वस्तिकाख्यं पुत्रधनप्रदम् ॥

चार शालाओंसे युक्त गृहको, जिसके प्रत्येक दिशा में एक-एक करके चार द्वार हों, ' सर्वतोभद्र ' कहते हैं । जिसमें तीन ही द्वार हों, पश्चिम दिशाकी ओर द्वार न हो, उसका नाम ' नन्द्यावर्त ' है । जिसमें दक्षिणके सिवा अन्य तीन दिशाओंमें द्वार हों, उसे ' वर्धमान ' गृह कहते हैं । वह धन देनेवाला होता है तथा जिसमें केवल पूर्व दिशा की ओर द्वार न हो, उस गृहका नाम ' स्वस्तिक ' है । वह पुत्र और धन देनेवाला होता है । राक्षसों के घरोंमें बहुतों को तो उन्होंने वहाँ मन्त्र जपते हुए सुना और कितने ही निशाचरोंको स्वाध्याय में तत्पर देखा ॥ १३ ॥

रावणस्तवसंयुक्तान् गर्जतो राक्षसानपि ।

राजमार्ग समावृत्य स्थितं रक्षोगणं महत् ॥ १४ ॥

कई राक्षसों को उन्होंने रावणकी स्तुति के साथ गर्जना करते और निशाचरोंकी एक बड़ी भीड़को राजमार्ग रोककर खड़ी हुई देखा ॥ १४ ॥

ददर्श मध्यमे गुल्मे राक्षसस्य चरान् बहून् ।

दीक्षिताअटिलान् मुण्डान् गोजिनाम्बरवाससः ॥१५ ॥

दर्भमुष्टिप्रहरणानग्निकुण्डायुधांस्तथा 1 कूटमुद्गरपाणश्च दण्डायुधधरानपि ॥ १६ ॥

नगर के मध्य भागमें उन्हें रावण के बहुत - से गुप्तचर दिखायी दिये । उनमें कोई योगकी दीक्षा लिये हुए, कोई जटा बढ़ाये, कोई मूड़ मुँड़ाये, कोई गोचर्म या मृगचर्म धारण किये और कोई नंग - धड़ंग थे । कोई मुट्ठीभर कुशको ही अस्त्ररूपसे धारण किये हुए थे । किन्हींका अग्निकुण्ड ही आयुध था । किन्हीं के हाथमें कूट या मुद्गर था । कोई डंडेको ही हथियाररूप में लिये हुए थे ॥ १५-१६ ॥

एकाक्षानेकवर्णाश्च लंबोदर पयोधरान् ।

करालान् भुग्नवक्त्रांश्च विकटान् वामनांस्तथा ॥ १७ ॥

किन्हीं के एक ही आँख थी तो किन्हींके रूप बहुरंगे थे । कितनोंके पेट और स्तन बहुत बड़े थे । कोई बड़े विकराल थे । किन्हींके मुँह टेढ़े - मेढ़े थे । कोई विकट थे तो कोई बौने ॥ १७ ॥

धन्विनः खङ्गिनश्चैव शतघ्नीमुसलायुधान् ।

परिघोत्तम हस्तांश्च विचित्रकवचोज्ज्वलान् ॥ १८ ॥

किन्हींके पास धनुष, खड्ग, शतघ्नी और मूसलरूप आयुध थे । किन्हीं के हाथोंमें उत्तम परिघ विद्यमान थे और कोई विचित्र कवचोंसे प्रकाशित हो रहे थे ॥ १८ ॥

नातिस्थूलान् नाति कृशान् नातिदीर्घातिहस्वकान् ।

नातिगौरान नातिकृष्णान्नाति कुब्जान्न वामनान् ॥ १ ९ ॥

कुछ निशाचर न तो अधिक मोटे थे, न अधिक दुर्बल, न बहुत लंबे थे न अधिक छोटे, न बहुत गोरे थे न अधिक काले तथा न अधिक कुबड़े थे न विशेष बौने ही ॥ १ ९ ॥

विरूपान् बहुरूपांश्च सुरूपांश्च सुवर्चसः ।

ध्वजिनः पताकिनश्चैव ददर्श विविधायुधान् ॥ २० ॥

कोई बड़े कुरूप थे, कोई अनेक प्रकार के रूप धारण कर सकते थे, किन्हीं का रूप सुन्दर था, कोई बड़े तेजस्वी थे तथा किन्हींके पास ध्वजा, पताका और अनेक प्रकारके अस्त्र - शस्त्र थे ॥ २० ॥

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८७० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

शक्तिवृक्षायुधश्चैव पट्टिशाशनिधारिणः ।

क्षेपणीपाशहस्तांश्च ददर्श स महाकपिः ॥ २१ ॥

कोई शक्ति और वृक्षरूप आयुध धारण किये देखे जाते थे तथा किन्हींके पास पट्टिश, वज्र, गुलेल और पाश थे । महाकपि हनुमान्ने उन सबको देखा ॥ २१ ॥

स्रग्विणस्त्वनुलिप्तांश्च वराभरणभूषितान् ।

नानावेषसमायुक्तान् यथास्वैरचरान् बहून् ॥ २२ ॥

किन्हींके गलेमें फूलोंके हार थे और ललाट आदि अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे । कोई श्रेष्ठ आभूषणोंसे सजे हुए थे । कितने ही नाना प्रकारके वेषभूषासे संयुक्त थे और बहुतेरे स्वेच्छानुसार विचरनेवाले जान पड़ते थे ॥ २२ ॥

तीक्ष्णशूलधरांश्चैव वज्रिणश्च महाबलान् ।

शतसाहस्रमव्यग्रमारक्षं मध्यमं कपिः ॥ २३ ॥

रक्षोऽधिपतिनिर्दिष्टं ददर्शान्तःपुराग्रतः । कितने ही राक्षस तीखे शूल तथा वज्र लिये हुए थे । वे सब - के - सब महान् बलसे सम्पन्न थे । इनके सिवा कपिवर इनुमान्ने एक लाख रक्षक सेनाको राक्षसराज रावणकी आज्ञासे सावधान होकर नगर के मध्यभागकी रक्षा में संलग्न देखा । वे सारे सैनिक रावणके अन्तःपुरके अग्रभाग में स्थित थे ॥ २३३ ॥

स तदा तद् गृहं दृष्ट्वा महाहाटकतोरणम् ॥ २४ ॥

राक्षसेन्द्रस्य विख्यातमद्रिमूर्ध्नि प्रतिष्ठितम् ।

पुण्डरीकावतंसाभिः परिखाभिः समावृतम् ॥ २५ ॥

प्राकारावृतमत्यन्तं ददर्श स महाकपिः ।

त्रिविष्टपनिभं दिव्यं दिव्यनादविनादितम् ॥ २६ ॥

रक्षक सेनाके लिये जो विशाल भवन बना था, उसका फाटक बहुमूल्य सुवर्णद्वारा निर्मित हुआ था । उस आरक्षाभवनको देखकर महाकपि हनुमानजीने राक्षसराज रावण के सुप्रसिद्ध राजमहलपर दृष्टिपात किया, जो त्रिकूट पर्वतके एक शिखरपर प्रतिष्ठित था । वह सब ओरसे श्वेत कमलद्वारा अलंकृत खाइयोंसे घिरा हुआ था । उसके चारों ओर बहुत ऊँचा परकोटा था, जिसने उस राजभवनको घेर रक्खा था । वह दिव्य भवन स्वर्गलोकके समान मनोहर था और वहाँ संगीत आदिके दिव्य शब्द गूँज रहे थे ॥ २४-२६ ॥

वाजिहेषित संघुष्टं नादितं भूषणैस्तथा ।

रथैर्यानैर्विमानैश्च तथा हयगजैः शुभैः ॥ २७ ॥

वारणैश्च चतुर्दन्तैः श्वेताभ्रनिचयोपमैः ।

भूषितै रुचिरद्वारं मत्तैश्च मृगपक्षिभिः ॥ २८ ॥

घोड़ोंकी हिनहिनाइट की आवाज भी वहाँ सब ओर फैली हुई थी । आभूषणोंकी रुनझुन भी कानों में पड़ती रहती थी । नाना प्रकारके रथ, पालकी आदि सवारी, विमान, सुन्दर हाथी, घोड़े, श्वेत बादलोंकी घटा के समान दिखायी देनेवाले चार दाँतोंसे युक्त सजे - सजाये मतवाले हाथी तथा मदमत्त पशु - पक्षियों के संचरणसे उस राजमहलका द्वार बड़ा सुन्दर दिखायी देता था ॥ २७-२८ ॥

रक्षितं सुमहावीर्यैर्यातुधानैः सहस्रशः ।

राक्षसाधिपतेर्गुप्तमाविवेश गृहं कपिः ॥ २ ९ ॥

सहस्रों महापराक्रमी निशाचर राक्षसराजके उस महलकी रक्षा करते थे । उस गुप्त भवनमें भी कपिवर हनुमानजी जा पहुँचे ॥ २ ९ ॥ समजाम्बूनदचक्रवालं महार्हमुक्तामणिभूषितान्तम् । पराकालागुरुचन्दना स रावणान्तःपुरमाविवेश ॥ ३० ॥

तदनन्तर जिसके चारों ओर सुवर्ण एवं जाम्बूनदका परकोटा था, जिसका ऊपरी भाग बहुमूल्य मोती और मणियों से विभूषित था तथा अत्यन्त उत्तम काले अगुरु एवं चन्दनसे जिसकी अर्चना की जाती थी, रावणके उस अन्तः-पुरमें हनुमानजीने प्रवेश किया ॥ ३० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकान्यके सुन्दरक ण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ || ४ || 3-3 ---पञ्चमः सर्गः हनुमानजी का रावणके अन्तःपुर में घर - घर में सीताको ढूँढ़ना और उन्हें न देखकर दुखी होना ततः स मध्यं गतमंशुमन्तं उसी प्रकार पृथ्वी के ऊपर बारंबार अपनी चाँदनीका चंदोवा ज्योत्स्ना वितानं मुहुरुद्वमन्तम् । तानते हुए चन्द्रदेव आकाशके मध्यभागमे तारिकाओं के ददर्श धीमान् भुवि भानुमन्तं बीच विचरण कर रहे हैं ॥ १ ॥

गोष्ठे वृषं मत्तमिव भ्रमन्तम् ॥ १ ॥

तत्पश्चात् बुद्धिमान् हनुमानजी ने देखा, जिस प्रकार लोकस्य पापानि विनाशयन्तं गोशाला के भीतर गौओं के झुंडमें मतवाला साँड़ विचरता है, महोदधि चापि समेधयन्तम् ।

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सुन्दरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ८७१ भूतानि सर्वाणि विराजयन्तं ददर्श शीतांशुमथाभियान्तम् ॥ २ ॥

वे शीतरश्मि चन्द्रमा जगत्के पाप तापका नाश कर रहे हैं, महासागरमें ज्वार उठा रहे हैं, समस्त प्राणियोंको नयी दीसि एवं प्रकाश दे रहे हैं और आकाश में क्रमशः ऊपरकी ओर उठ रहे हैं ॥ २ ॥

या भाति लक्ष्मीर्भुवि मन्दरस्था यथा प्रदोषेषु च सागरस्था । तथैव तोयेषु च पुष्करस्था रराज सा चारुनिशाकरस्था ॥ ३ ॥

भूतलपर मन्दराचलमें, संध्या के समय महासागर में और जलके भीतर कमलों में जो लक्ष्मी जिस प्रकार सुशोभित होती हैं, वे ही उसी प्रकार मनोहर चन्द्रमा में शोभा पा रही थीं ॥ ३ ॥

हंसो यथा राजतपञ्जरस्थः

सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः ।

वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थ-चन्द्रोऽपि बभ्राज तथाम्बरस्थः ॥ ४ ॥

जैसे चाँदी के पिंजरे में इंस, मन्दराचलकी कन्दरा में सिंह तथा मदमत्त हाथीकी पीठपर वीर पुरुष शोभा पाते हैं, उसी प्रकार आकाशमें चन्द्रदेव सुशोभित हो रहे थे ॥ ४ ॥

स्थितः ककुद्मानिव तीक्ष्णशृङ्गो महाचलः श्वेत श्वोर्ध्वशृङ्गः । हस्तीय जाम्बूनदबद्धश्टङ्गो विभाति चन्द्रः परिपूर्णशृङ्गः ॥ ५ ॥

जैसे तीखे सींगवाला बैल खड़ा हो, जैसे ऊपरको उठे शिखरवाला महान् पर्वत श्वेत ( हिमालय ) शोभा पाता हो और जैसे सुवर्णजटित दाँतोंसे युक्त गजराज सुशोभित होता हो, उसी प्रकार हरिणके शृङ्गरूपी चिह्नसे युक्त परिपूर्ण चन्द्रमा छवि पा रहे थे ॥ ५ ॥

विनष्टशीताम्बुतुषारपङ्को महाग्रह ग्राहविनष्टपङ्कः । प्रकाशलक्ष्म्याश्रय निर्मलाङ्को रराज चन्द्रो भगवान् शशाङ्कः ॥ ६ ॥

जिनका शीतल जल और हिमरूपी पङ्कसे संसर्गका दोष नष्ट हो गया है, अर्थात् जो इनके संसर्गसे बहुत दूर है, सूर्य किरणों को ग्रहण करने के कारण जिन्होंने अपने अन्धकार-रूपी पङ्कको भी नष्ट कर दिया है तथा प्रकाशरूप लक्ष्मी-का आश्रयस्थान होने के कारण जिनकी कालिमा भी निर्मल प्रतीत होती है, वे भगवान् शशलाञ्छन चन्द्रदेव आकाश में प्रकाशित हो रहे थे ॥ ६ ॥

शिलातलं प्राप्य यथा मृगेन्द्रो

महारणं प्राप्य यथा गजेन्द्रः ।

राज्यं समासाद्य यथा नरेन्द्र-स्तथा प्रकाशो विरराज चन्द्रः ॥ ७ ॥

जैसे गुफा के बाहर शिलातलपर बैठा हुआ मृगराज ( सिंह ) शोभा पाता है, जैसे विशाल वनमें पहुँचकर गजराज सुशोभित होता है तथा जैसे राज्य पाकर राजा अधिक शोभासे सम्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार निर्मल प्रकाश से युक्त होकर चन्द्र देव सुशोभित हो रहे थे ॥ ७ ॥

प्रकाशचन्द्रोदय नष्टदोषः प्रवृद्ध रक्षः पिशिताशदोषः । रामाभिरामेरितचित्तदोषः स्वर्ग प्रकाशो भगवान् प्रदोषः ॥ ८ ॥

प्रकाशयुक्त चन्द्रमाके उदयसे जिसका अन्धकाररूपी दोष दूर हो गया है, जिसमें राक्षसोंके जीव - हिंसा और मांसभक्षणरूपी दोष बढ़ गये हैं तथा रमणियोंके रमण-विषयक चित्तदोष ( प्रणय- कलह ) निवृत्त हो गये हैं, वह पूजनीय प्रदोषकाल स्वर्गसदृश सुखका प्रकाश करने लगा ॥ ८ ॥

तन्त्रीस्वराः कर्णसुखाः प्रवृत्ताः स्वपन्ति नार्यः पतिभिः सुवृत्ताः । नक्तंचराश्चापि तथा प्रवृत्ता विहर्तुमत्यद्भुतरौद्रवृत्ताः ॥ ९ ॥

वीणा के श्रवणसुखद शब्द झङ्कृत हो रहे थे, सदाचारिणी स्त्रियाँ पतियों के साथ सो रही थीं तथा अत्यन्त अद्भुत और भयंकर शील स्वभाववाले निशाचर निशीथ कालमें विहार कर रहे थे ॥ ९ ॥

मत्तप्रमत्तानि समाकुलानि रथाश्वभद्रासन संकुलानि । वीरश्रिया चापि समाकुलानि ददर्श धीमान् स कपिः कुलानि ॥ १० ॥

बुद्धिमान् वानर हनुमान्ने वहाँ बहुत - से घर देखे । किन्हीं में ऐश्वर्य मदसे मत्त निशाचर निवास करते थे, किन्हीं में मदिरापानसे मतवाले राक्षस भरे हुए थे । कितने ही घर रथ, घोड़े आदि वाहनों और भद्रासनों से सम्पन्न थे तथा कितने ही वीर - लक्ष्मीसे व्याप्त दिखायी देते थे । वे सभी गृह एक - दूसरे से मिले हुए थे ॥ १० ॥

परस्परं बाधिकमाक्षिपन्ति भुजांश्च पीनानधिविक्षिपन्ति । मत्तप्रलापानधिविक्षिपन्ति नामत्तानि चान्योन्यमधिक्षिपन्ति ॥ ११ ॥

राक्षसलोग आपस में एक - दूसरेपर अधिक आक्षेप करते थे । अपनी मोटी - मोटी भुजाओंको भी हिलाते और

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८७२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे चलाते थे । मतवालोंकी - सी बहकी - बहकी बातें करते थे और मदिरासे उन्मत्त होकर परस्पर कटु वचन बोलते थे ॥ ११ ॥

रक्षांसि वक्षांसि च विक्षिपन्ति गात्राणि कान्तासु च विक्षिपन्ति । रूपाणि चित्राणि च विक्षिपन्ति ढानि चापानि च विक्षिपन्ति ॥ १२ ॥

इतना ही नहीं, वे मतवाले राक्षस अपनी छाती भी पीटते थे । अपने हाथ आदि अङ्गको अपनी प्यारी पत्नियोंपर रख देते थे । सुन्दर रूपवाले चित्रोंका निर्माण करते थे और अपने सुदृढ़ धनुषको कानतक खींचा करते थे ॥ १२ ॥

ददर्श कान्ताश्च समालभन्त्य-स्तथापरास्तत्र पुनः स्वपन्त्यः । सुरूपवक्त्राश्च तथा इसन्त्यः क्रुद्धाः पराश्चापि विनिःश्वसन्त्यः ॥ १३ ॥

हनुमानजीने यह भी देखा कि नायिकाएँ अपने अङ्गों में चन्दन आदिका अनुलेपन करती हैं । दूसरी वहीं सोती हैं । तीसरी सुन्दर रूप और मनोहर मुखवाली ललनाएँ हँसती हैं तथा अन्य वनिताएँ प्रणय- कलह से कुपित हो लंबी साँसें खींच रही हैं ॥ १३ ॥

महागजैश्वापि तथा नदद्भिः

सुपूजितैश्वापि तथा सुसद्भिः ।

रराज वीरैश्च विनिःश्वसद्भि-ईदा भुजगैरिव निःश्वसद्भिः ॥ १४ ॥

चिग्वाड़ते हुए महान, गजराजों, अत्यन्त सम्मानित श्रेष्ठ सभासदों तथा लंबी साँसें छोड़नेवाले वीरोंके कारण वह लङ्कापुरी फुफकारते हुए सर्पोंसे युक्त सरोवरोंके समान शोभा पा रही थी ॥ १४ ॥

बुद्धिप्रधानान् रुचिराभिधानान् संश्रद्दधानाञ्जगतः प्रधानान् । नानाविधानान् रुचिराभिधानान् ददर्श तस्यां पुरि यातुधानान् ॥ १५ ॥

हनुमानजीने उस पुरीमें बहुत - से उत्कृष्ट बुद्धिवाले, सुन्दर बोलनेवाले, सम्यक श्रद्धा रखनेवाले, अनेक प्रकारके रूप - रंगवाले और मनोहर नाम धारण करनेवाले विश्व-विख्यात राक्षस देखे ॥ १५ ॥

ननन्द दृष्ट्वा स च तान् सुरूपान्-नाना गुणानात्मगुणानुरूपान् । विद्योतमानान् स च तान् सुरूपान् ददर्श कांश्चिच्च पुनर्विरूपान् ॥ १६ ॥

वे सुन्दर रूपवाले, नाना प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न, अपने गुणों के अनुरूप व्यवहार करनेवाले और तेजस्वी थे । उन्हें देखकर हनुमान्जी बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने बहुतेरे राक्षसोंको सुन्दर रूपसे सम्पन्न देखा और कोई - कोई उन्हें बड़े कुरूप दिखायी दिये ॥ १६ ॥

ततो वराहः सुविशुद्धभावा-स्तेषां स्त्रियस्तत्र महानुभावाः । प्रियेषु पानेषु च सक्तभावा ददर्श तारा इव सुखभावाः ॥ १७ ॥

तदनन्तर वहाँ उन्होंने सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करनेके योग्य सुन्दरी राक्षस- रमणियोंको देखा, जिनका भाव अत्यन्त विशुद्ध था । वे बड़ी प्रभावशालिनी थीं । उनका मन प्रियतममें तथा मधुपानमें आसक्त था । वे तारिकाओंकी भाँति कान्तिमती और सुन्दर स्वभाववाली थीं ॥ १७ ॥

स्त्रियो ज्वलन्तीत्रपयोपगूढा निशीथकाले रमणोपगूढाः । ददर्श काश्चित् प्रमदोपगूढा यथा विहंगा विहगोपगूढाः ॥ १८ ॥

हनुमानजी की दृष्टिमें कुछ ऐसी स्त्रियाँ भी आयीं, जो अपने रूप - सौन्दर्यसे प्रकाशित हो रही थीं । वे बड़ी लजीली थीं और आधी रात के समय अपने प्रियतमके आलिङ्गन-पाशमें इस प्रकार बँधी हुई थीं जैसे पक्षिणी पक्षीके द्वारा आलिङ्गित होती है । वे सब के सब आनन्दमें मग्न थीं ॥ १८ ॥

अन्याः पुनईत लोपविष्टा-स्तत्र प्रियाङ्केषु सुखोपविष्टाः । भर्तुः परा धर्मपरा निविष्टा ददर्श धीमान मदनोपविष्टाः ॥ १ ९ ॥ दूसरी बहुत - सी स्त्रियाँ महलोंकी छतों पर बैठी थीं । वे पतिकी सेवामें तत्पर रहनेवाली, धर्मपरायणा, विवाहिता और कामभावनासे भावित थीं । हनुमानजीने उन सबको अपने प्रियतमके अमें सुखपूर्वक बैठी देखा ॥ १ ९ ॥ अप्रावृताः काञ्चनराजिवर्णाः काश्चित्परार्थ्यास्तपनीयवर्णाः । पुनश्च काश्चिच्छशलक्ष्मवर्णाः कान्तप्रहीणा रुचिराङ्गवर्णाः ॥ २० ॥

कितनी ही कामिनियाँ सुवर्ण - रेखा के समान कान्तिमती दिखायी देती थीं । उन्होंने अपनी ओढ़नी उतार दी थी । कितनी ही उत्तम वनिताएँ तपाये हुए सुवर्णके समान रंगवाली थीं तथा कितनी ही पतिवियोगिनी बालाएँ चन्द्रमा के समान श्वेत वर्णकी दिखायी देती थीं । उनकी अङ्गकान्ति बड़ी ही सुन्दर थी ॥ २० ॥

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सुन्दरकाण्डे षष्ठः सर्गः ८७३ ततः प्रियान् प्राप्य मनोऽभिरामान् सुप्रीतियुक्ताः सुमनोऽभिरामाः । गृहेषु हृष्टाः परमाभिरामा हरिप्रवीरः स ददर्श रामाः ॥ २१ ॥

तदनन्तर वानरोंके प्रमुख वीर हनुमानजीने विभिन्न गृहों में ऐसी परम सुन्दरी रमणियोंका अवलोकन किया, जो मनोभिराम प्रियतमका संयोग पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो रही थीं । फूलोंके हारसे विभूषित होने के कारण उनकी रमणीयता और भी बढ़ गयी थी और वे सब की सब हर्षसे उल्फुल्ल दिखायी देती थीं ॥ २१ ॥

चन्द्रप्रकाशाश्च हि वक्त्रमाला वक्राः सुपक्ष्माश्च सुनेत्र मालाः । विभूषणानां च ददर्श मालाः शतह्रदानामिव चारुमालाः ॥ २२ ॥

. उन्होंने चन्द्रमाके समान प्रकाशमान मुखोंकी पंक्तियाँ, सुन्दर पलकोंवाले तिरछे नेत्रोंकी पंक्तियाँ और चमचमाती हुई विद्युल्लेखाओंके समान आभूषणोंकी भी मनोहर पंक्तियाँ देखीं ॥ २२ ॥

न त्वेव सीतां परमाभिजातां पथि स्थिते राजकुले प्रजाताम् । लतां प्रफुल्लामिव साधुजातां ददर्श तन्वीं मनसाभिजाताम् ॥ २३ ॥

किंतु जो परमात्मा के मानसिक संकल्पसे धर्ममार्गपर स्थिर रहनेवाले राजकुलमें प्रकट हुई थीं, जिनका प्रादुर्भाव परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाला है, जो परम सुन्दर रूपमें उत्पन्न हुई प्रफुल्ल लताके समान शोभा पाती थीं, उन कृशाङ्गी सीताको उन्होंने वहाँ कहीं नहीं देखा था ॥ २३ ॥

सनातने वर्त्मनि संनिविष्टां रामेक्षणीं तां मदनाभिविष्टाम् । भर्तुर्मनः श्री मदनुप्रविष्टां स्त्रीभ्यः पराभ्यश्च सदा विशिष्टाम् ॥ २४ ॥

उष्णार्दितां सानुसृतास्त्रकण्ठीं पुरा वरात्तमनिष्ककण्ठीम् । सुजातपक्ष्मामभिरक्तकण्ठीं वने प्रनृत्तामिव नीलकण्ठीम् ॥ २५ ॥

अव्यक्तरेखामिव चन्द्रलेखां पांसुप्रदिग्धामिव हेमरेखाम् । क्षतप्ररूढामिव वर्णरेखां वायुप्रभुग्नामिव मेघरेखाम् ॥ २६ ॥

सीतामपश्यन्मनुजेश्वरस्य रामस्य पत्नीं वदतां वरस्य । बभूव दुःखोपहतश्चिरस्य लवंगमो मन्द इवाचिरस्य ॥ २७ ॥

जो सदा सनातन मार्गपर स्थित रहनेवाली, श्रीराम-पर ही दृष्टि रखनेवाली, श्रीरामविषयक काम या प्रेमसे परिपूर्ण, अपने पतिके तेजस्वी मनमें बसी हुई तथा दूसरी सभी स्त्रियोंसे सदा ही श्रेष्ठ थीं जिन्हें विरहजनित ताप सदा पीड़ा देता रहता था, जिनके नेत्रोंसे निरन्तर आँसुओं की झड़ी लगी रहती थी और कण्ठ उन आँसुओंसे गद्गद रहता था, पहले संयोगकालमें जिनका कण्ठ श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य निष्क ( पदक ) से विभूषित रहा करता था, जिनकी पलकें बहुत ही सुन्दर थीं और कण्ठस्वर अत्यन्त मधुर था तथा जो वनमें नृत्य करनेवाली मयूरीके समान मनोहर लगती थीं, जो मेघ आदिसे आच्छादित होने के कारण अव्यक्त रेखावाली चन्द्रलेखाके समान दिखायी देती थीं, धूलि धूसर सुवर्ण रेखा - सी प्रतीत होती थीं, बाणके आघातसे उत्पन्न हुई रेखा ( चिह्न ) सी जान पड़ती थीं तथा वायुके द्वारा उड़ायी जाती हुई बादलोंकी रेखा - सी दृष्टिगोचर होती थीं । वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर श्रीरामचन्द्रजी-की पत्नी उन सीताजीको बहुत देरतक ढूँढ़ने पर भी जब हनुमानजी न देख सके, तब वे तत्क्षण अत्यन्त दुखी और

शिथिल हो गये । २४-२७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्डमें पाँचवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ५ ॥

षष्ठः सर्गः हनुमान्जीका रावण तथा अन्यान्य राक्षसोंके घरोंमें सीताजीकी खोज करना स निकामं विमानेषु विचरन् कामरूपधृक् । आससाद च लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम् । विचचार कपिर्लङ्कां लाघवेन समन्वितः ॥ १ ॥ प्राकारेणार्कवर्णेन भाखरेणाभिसंवृतम् ॥ २ ॥

फिर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले कपिवर हनुमान्- अत्यन्त बल - वैभव से सम्पन्न वे पवनकुमार राक्षसराज जी बड़ी शीघ्रताके साथ लङ्का के सतमहले मकानोंमें यथेच्छ रावण के महलमें पहुँचे, जो चारों ओर से सूर्यके समान चम-विचरने लगे ॥ १ ॥ चमाते हुए सुवर्णमय परकोर्टोसे घिरा हुआ था ॥ २ ॥

वा ० रा ० ५.७.२-

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८७४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

रक्षितं राक्षसैर्भीमैः सिंहैरिव महद् वनम् ।

समीक्षमाणो भवनं चकाशे कपिकुञ्जरः ॥ ३ ॥

जैसे सिंह विशाल वनकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार बहुतेरे भयानक राक्षस रावण के उस महलकी रक्षा कर रहे थे | उस भवनका निरीक्षण करते हुए कपिकुञ्जर हनुमान् जी मन - ही - मन हर्षका अनुभव करने लगे ॥ ३ ॥

रूप्य कोपहितैश्विचैस्तोर णैर्हेमभूषणैः 1 विचित्राभिश्च कक्ष्याभिर्द्वारैश्च रुचिरैर्वृतम् ॥ ४ ॥

वह महल चाँदीसे मढ़े हुए चित्रों, सोने जड़े हुए दरवाजों और बड़ी अद्भुत ड्योढ़ियों तथा सुन्दर द्वारोंसे युक्त था ॥ ४ ॥

गजास्थितैर्महामात्रैः शूरैश्च विगतश्रमैः ।

उपस्थितम संहार्यैर्हयैः स्यन्दनयायिभिः ॥ ५ ॥

हाथीपर चढ़े हुए महावत तथा श्रमहीन शूरवीर वहाँ उपस्थित थे । जिनके वेगको कोई रोक नहीं सकता था, ऐसे रथवाहक अश्व भी वहाँ शोभा पा रहे थे ॥ ५ ॥

सिंहव्याघ्रतनुत्राणैर्दान्त काञ्चनराजतीः घोषवद्भिर्विचित्रैश्व सदा विचरितं रथैः ॥ ६ ॥

सिंहों और बाधके चमड़ोंके बने हुए कवचोंसे वे रथ ढके हुए थे, उनमें हाथी - दाँत, सुवर्ण तथा चाँदीकी प्रतिमाएँ रखी हुई थीं । उन रथोंमें लगी हुई छोटी - छोटी घंटिकाओंकी मधुर ध्वनि वहाँ होती रहती थी; ऐसे विचित्र रथ उस रावण-भवन में सदा आ - जा रहे थे ॥ ६ ॥

बहुरत्नसमाकीर्ण परार्थ्यासनभूषितम् ।

महारथसमावाप महारथमहासनम् ॥ ७ ॥

रावणका वह भवन अनेक प्रकार के रत्नोंसे व्याप्त था, बहुमूल्य आसन उसकी शोभा बढ़ाते थे । उसमें सब ओर बड़े - बड़े रथोंके ठहरनेके स्थान बने थे और महारथी वीरोंके लिये विशाल वासस्थान बनाये गये थे ॥ ७ ॥

दृश्यैश्च परमोदारैस्तैस्तैश्च मृगपक्षिभिः ।

विविधैर्बहु साहस्रैः परिपूर्ण समन्ततः ॥ ८ ॥

दर्शनीय एवं परम सुन्दर नाना प्रकार के सहस्रों पशु और पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे ॥ ८ ॥

विनीतैरन्तपालैश्च रक्षोभिश्च सुरक्षितम् ।

मुख्याभिश्च वरस्त्रीभिः परिपूर्ण समन्ततः ॥ ९ ॥

सीमाकी रक्षा करनेवाले विनयशील राक्षस उस भवनकी रक्षा करते थे । वह सब ओरसे मुख्य - मुख्य सुन्दरियोंसे भरा रहता था ॥ ९ ॥

मुदितप्रमदात्नं राक्षसेन्द्र निवेशनम् ।

वराभरणसंहादैः समुद्रखननिःखनम् ॥ १० ॥

वहाँकी रत्नस्वरूपा युवती रमणियाँ सदा प्रसन्न रहा करती थीं । सुन्दर आभूषणोंकी झनकारोंसे झंकृत राक्षसराज-का वह महल समुद्रके कलकलनादकी भाँति मुखरित रहता था ॥ १० ॥

तद् राजगुणसम्पन्नं मुख्यैश्च वरचन्दनैः ।

महाजनसमाकीर्ण सिंहैरिव महद् वनम् ॥ ११ ॥

वह भवन राजोचित सामग्री से पूर्ण था, श्रेष्ठ एवं सुन्दर चन्दनों से चर्चित था तथा सिंहोंसे भरे हुए विशाल वनकी भाँति प्रधान प्रधान पुरुषोंसे परिपूर्ण था ॥ ११ ॥

भेरीमृदङ्गाभिरुतं शङ्खघोषविनादितम् ।

नित्यार्चितं पर्वसुतं पूजितं राक्षसैः सदा ॥ १२ ॥

वहाँ मेरी और मृदङ्गकी ध्वनि सब ओर फैली हुई थी । वहाँ शङ्खकी ध्वनि गूँज रही थी । उसकी नित्य पूजा एवं

सजावट होती थी । पर्वोंके दिन वहाँ होम किया जाता था ।

राक्षसलोग सदा ही उस राजभवनकी पूजा करते थे ॥ १२ ॥

समुद्रमिव गम्भीरं समुद्रसमनिःखनम् ।

महात्मनो महद् वेश्म महारत्नपरिच्छदम् ॥ १३ ॥

वह समुद्र के समान गम्भीर और उसीके समान कोलाहल-पूर्ण था । महामना रावणका वह विशाल भवन महान् रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत था ॥ १३ ॥

महारत्नसमाकीर्ण ददर्श स महाकपिः ।

विराजमानं वपुषा गजाश्वरथसंकुलम् ॥ १४ ॥

उसमें हाथी घोड़े और रथ भरे हुए थे तथा वह महान् रत्नोंसे व्याप्त होने के कारण अपने स्वरूपसे प्रकाशित हो रहा था । महाकपि हनुमान् ने उसे देखा ॥ १४ ॥

लङ्काभरणमित्येव सोऽमन्यत महाकपिः ।

चचार हनुमांस्तत्र रावणस्य समीपतः ॥ १५ ॥

देखकर कपिवर हनुमान्ने उस भवनको लङ्काका आभूषण ही माना । तदनन्तर वे उस रावण भवन के आस-पास ही विचरने लगे ॥ १५ ॥

गृहाद् गृहं राक्षसानामुद्यानानि च सर्वशः ।

वीक्षमाणोऽप्यसंत्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः ॥ १६ ॥

इस प्रकार वे एक घरसे दूसरे घर में जाकर राक्षसोंके बगीचोंके सभी स्थानोंको देखते हुए बिना किसी भयसे अट्टालिकाओंपर विचरण करने लगे ॥ १६ ॥

अवप्लुत्य महावेगः प्रहस्तस्य निवेशनम् ।

ततोऽम्यत् पुप्लुवे वेश्म महापार्श्वस्य वीर्यवान् ॥ १७ ॥

महान् वेगशाली और पराक्रमी वीर हनुमान् वहाँसे कूदकर प्रहस्त के घरमें उतर गये । फिर वहाँसे उछले और महापार्श्व के महल में पहुँच गये ॥ १७ ॥

अथ मेघप्रतीकाशं कुम्भकर्णनिवेशनम् ।

विभीषणस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः ॥ १८ ॥

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सुन्दरकाण्डे षष्ठः सर्गः ८७५ तदनन्तर वे महाकपि हनुमान् मेघके समान प्रतीत होने वाले कुम्भकर्णके भवनमें और वहाँसे विभीषण के महलमें कूद गये ॥ १८ ॥

महोदरस्य च तथा विरूपाक्षस्य चैव हि ।

विधुजिह्रस्य भवनं विद्युन्मालेस्तथैव च ॥ १ ९ ॥

इसी तरह क्रमशः वे महोदर, विरूपाक्ष, विद्युजिह और विद्युन्मालिक घरमें गये ॥ १ ९ ॥

वज्रदंष्ट्रस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः ।

शुकस्य च महावेगः सारणस्य व धीमतः ॥ २० ॥

इसके बाद महान् वेगशाली महाकपि हनुमान्ने फिर छलाँग मारी और वे वज्रदंष्ट्र, शुक तथा बुद्धिमान् सारणके घरोंमें जा पहुँचे ॥ २० ॥

तथा चेन्द्रजितो वेश्म जगाम हरियूथपः ।

जम्बुमालेः सुमालेश्च जगाम हरिसत्तमः ॥ २१ ॥

इसके बाद वे वानरयूथपति कपिश्रेष्ठ इन्द्रजित् के घरमें गये और वहाँसे जम्बुमालि तथा मालिके घरमें पहुँच गये ॥ २१ ॥

रश्मिकेतोश्च भवनं सूर्यशत्रोस्तथैव च ।

वज्रकायस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः ॥ २२ ॥

तदनन्तर वे महाकपिं उछलते - कूदते हुए रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु और वज्रकायके महलोंमें जा पहुँचे ॥ २२ ॥

धूम्राक्षस्याथ सम्पातेर्भवनं मारुतात्मजः ।

विद्युद्रूपस्य भीमस्य घनस्य विघनस्य च ॥ २३ ॥

शुकनाभस्य चक्रस्य शठस्य कपटस्य च ।

हस्वकर्णस्य दंष्ट्रस्य लोमशस्य च रक्षसः ॥ २४ ॥

युद्धोन्मत्तस्य मत्तस्य ध्वजप्रीवस्य सादिनः ।

विद्युजिह द्विजिहानां तथा हस्तिमुखस्य च ॥ २५ ॥

करालस्य पिशाचस्य शोणिताक्षस्य चैव हि ।

लवमानः क्रमेणैव हनुमान् मारुतात्मजः ॥ २६ ॥

तेषु तेषु महार्हेषु भवनेषु महायशाः ।

तेषामृद्धिमतामृद्धिं ददर्श स महाकपिः ॥ २७ ॥

फिर क्रमशः वे कपिवर पवनकुमार धूम्राक्ष, सम्पाति, विद्युद्रूप, भीम, घन, विधन, शुकनाम, चक्र, शठ, कपट, ह्रस्वकर्ण, दंष्ट्र, लोमश, युद्धोन्मत्त, मत्त, ध्वजग्रीव, विद्युजिह्व, द्विजिह्न, हस्तिमुख, कराल, पिशाच और शोणिताक्ष आदिके महलों में गये । इस प्रकार क्रमशः कूदते फाँदते हुए महा-यशस्वी पवनपुत्र हनुमान् उन उन बहुमूल्य भवनोंमें पधारे । वहाँ उन महाकपिने उन समृद्धिशाली राक्षसोंकी समृद्धि देखी ॥ २३ - २७ ॥

सर्वेषां समतिक्रम्य भवनानि समन्ततः ।

आससादाथ लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम् ॥ २८ ॥

तत्पश्चात् बल - वैभवसे सम्पन्न हनुमान् उन सब भवनों को लाँघकर पुनः राक्षसराज रावण के महलपर आ गये ॥ २८ ॥

रावणस्योपशायिन्यो ददर्श हरिसत्तमः ।

विचरन् हरिशार्दूलो राक्षसीविकृतेक्षणाः ॥ २ ९ ॥

वहाँ विचरते हुए उन वानरशिरोमणि कपिश्रेष्ठने रावणके निकट सोनेवाली ( उसके पलंगकी रक्षा करनेवाली ) राक्षसियोंको देखा, जिनकी आँखें बड़ी विकराल थीं । २ ९ ॥

शूलमुद्गरहस्तांश्च शक्तितोमरधारिणः ।

ददर्श विविधान्गुल्मांस्तस्य रक्षः पतेगृहे ॥ ३० ॥

साथ ही, उन्होंने उस राक्षसराज के भवन में राक्षसियोंके बहुत - से समुदाय देखे, जिनके हाथोंमें शूल, मुद्गर, शक्ति और तोमर आदि अस्त्र - शस्त्र विद्यमान थे ॥ ३० ॥

राक्षसांश्च महाकायान् नानाप्रहरणोद्यतान् । रक्ताश्वेतान् सितांश्चापि हरींश्चापि महाजवान् । ३१ । उनके सिवा, वहाँ बहुत - से विशालकाय राक्षस भी दिखायी दिये, जो नाना प्रकार के हथियारोंसे लैस थे । इतना ही नहीं, वहाँ लाल और सफेद रंग के बहुत से अत्यन्त वेगशाली घोड़े भी बँधे हुए थे ॥ ३१ ॥

कुलीनान् रूपसम्पन्नान् गजान् परगजारुजान् ।

शिक्षितान् गजशिक्षायामैरावतसमान् युधि ॥ ३२ ॥

निहन्तृन् परसैन्यानां गृहे तस्मिन् ददर्श सः ।

क्षरतश्च यथा मेघान् स्त्रवतश्च यथा गिरीन् ॥ ३३ ॥

मेघस्तनितनिर्घोषान् दुर्धर्षान् समरे परैः । साथ ही अच्छी जाति के रूपवान् हाथी भी थे, जो शत्रु-सेनाके हाथियोंको मार भगानेवाले थे । वे सब - के - सब गज-शिक्षा में सुशिक्षित, युद्ध में ऐरावत के समान पराक्रमी तथा शत्रु सेनाओंका संहार करने में समर्थ थे । वे बरसते हुए मेघों और झरने बहाते हुए पर्वतोंके समान मदकी धारा बहा रहे थे । उनकी गर्जना मेघ गर्जनाके समान जान पड़ती थी । वे समराङ्गण में शत्रुओंके लिये दुर्जय थे । हनुमान् जीने रावण भवनमें उन सबको देखा ॥ ३२-३३३ ॥ सहस्रं वाहिनीस्तत्र जाम्बूनदपरिष्कृताः ॥ ३४ ॥

हेमजालैरविच्छिन्नास्तरुणादित्य संनिभाः ददर्श राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य निवेशने ॥ ३५ ॥

राक्षसराज रावण के उस महल में उन्होंने सहस्रों ऐसी सेनाएँ देखीं, जो जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित थीं । उनके सारे अङ्ग सोने के गहनोंसे ढके हुए थे तथा वे प्रातः-कालके सूर्य की भाँति उद्दीप्त हो रही थीं ॥ ३४-३५ ॥

शिविका विविधाकाराः स कपिर्मारुतात्मजः ।

लतागृहाणि चित्राणि चित्रशालागृहाणि च ॥ ३६ ॥

क्रीडागृहाणि चान्यानि दारुपर्वतकानि च ।

कामस्य गृहकं रम्यं दिवागृहकमेव च ॥ ३७ ॥

ददर्श राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य निवेशने ।

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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ८७६ पवनपुत्र हनुमान्जीने राक्षसराज रावणके उस भवनमें भाजनानि च शुभ्राणि ददर्श हरियूथपः ॥ ४१ ॥

अनेक प्रकारकी पालकियाँ, विचित्र लता - गृह, चित्रशालाएँ, वानरयूथपति हनुमान्ने वहाँके पलंग, चौकी और क्रीडाभवन, काष्ठमय क्रीडापर्वत, रमणीय विलासगृह और पात्र सभी अत्यन्त उज्ज्वल तथा जाम्बूनद सुवर्णके बने हुए दिनमें उपयोगमें आनेवाले विलासभवन भी देखे ॥ ३६-३७३ ॥ स मन्दरसमप्रख्यं मयूरस्थान संकुलम् ॥ ३८ ॥

ध्वजयष्टिभिराकीर्ण ददर्श भवनोत्तमम् ।

अनन्तरत्ननिचयं निधिजालं समन्ततः ।

धीरनिष्ठितकर्मा गृहं भूतपतेरिव ॥ ३ ९ ॥

उन्होंने वह महल मन्दराचल के समान ऊँचा, क्रीडा-मयूरोंके रहने के स्थानोंसे युक्त, ध्वजाओंसे व्याप्त, अनन्त रत्नोंका भण्डार और सब ओरसे निधियोंसे भरा हुआ देखा । उसमें धीर पुरुषोंने निधिरक्षा के उपयुक्त कर्माङ्गका अनुष्ठान किया था तथा वह साक्षात् भूतनाथ ( महेश्वर या कुबेर ) के भवन के समान जान पड़ता था ॥ ३८-३९ ॥

अर्भिश्चापि रत्नानां तेजसा रावणस्य च ।

विरराज च तद् वेश्म रश्मिवानिव रश्मिभिः ॥ ४० ॥

रत्नोंकी किरणों तथा रावणके तेजके कारण वह घर किरणोंसे युक्त सूर्य के समान जगमगा रहा था ॥ ४० ॥

जाम्बूनदमयान्येव शयनान्यासनानि च ।

ही देखे ॥ ४१ ॥

मध्वासवकृतक्लेदं मणिभाजनसंकुलम् ।

मनोरममसम्बाधं कुबेरभवनं यथा ॥ ४२ ॥

नूपुराणां च घोषेण काञ्चीनां निःस्वनेन च ।

मृदङ्गतलनिर्घोषैर्घोषवद्भिर्विनादितम् ॥ ४३ ॥

उसमें मधु और आसवके गिरने से वहाँकी भूमि गीली हो रही थी । मणिमय पात्रोंसे भरा हुआ वह सुविस्तृत मद्दल कुबेर - भवन के समान मनोरम जान पड़ता था । नूपुरोंकी झनकार, करधनियोंकी खनखनाहट, मृदङ्गों और तालियोंकी मधुर ध्वनि तथा अन्य गम्भीर घोष करनेवाले वाद्यसे वह भवन मुखरित हो रहा था ॥ ४२-४३ ॥

प्रासादसंघातयुतं स्त्रीरत्नशतसंकुलम् ।

सुव्यूढकक्ष्यं हनुमान् प्रविवेश महागृहम् ॥ ४४ ॥

उसमें सैकड़ों अट्टालिकाएँ थीं, सैकड़ों रमणी - रत्नों से वह व्याप्त था । उसकी ड्योढ़ियाँ बहुत बड़ी - बड़ी थीं । ऐसे विशाल भवनमें हनुमानजीने प्रवेश किया ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ॥

सप्तमः सर्गः रावण के भवन एवं पुष्पक विमानका वर्णन स वेश्मजालं बलवान् ददर्श व्यासक्तवैदूर्य सुवर्णजालम् । यथा महत्प्रावृषि मेघजालं विद्युत्पिनद्धं सविहङ्गजालम् ॥ १ ॥

बलवान् वीर हनुमान् जीने नीलमसे जड़ी हुई सोनेकी खिड़कियोंसे सुशोभित तथा पक्षि - समूहोंसे युक्त भवनोंका समुदाय देखा, जो वर्षाकालमें बिजलीसे युक्त महती मेघमाला-के समान मनोहर जान पड़ता था ॥ १ ॥

निवेशनानां विविधाश्च शालाः प्रधानशङ्खायुधचापशालाः मनोहराश्चापि पुनर्विशाला ददर्श वेश्माद्रिषु चन्द्रशालाः ॥ २ ॥

उसमें नाना प्रकार की बैठकें, शङ्ख, आयुध और धनुष-की मुख्य - मुख्य शालाएँ तथा पर्वतोंके समान ऊँचे महलोंके ऊपर मनोहर एवं विशाल चन्द्रशालाएँ ( अट्टालिकाएँ ) देखीं ॥ २ ॥

गृहाणि नानावसुराजितानि देवासुरैश्चापि सुपूजितानि । सर्वेश्व दोषैः परिवर्जितानि कपिर्ददर्श स्वबलार्जितानि ॥ ३ ॥

कपिवर हनुमान्ने वहाँ नाना प्रकार के रत्नोंसे सुशोभित ऐसे - ऐसे घर देखे, जिनकी देवता और असुर भी प्रशंसा करते थे । वे गृह सम्पूर्ण दोषोंसे रहित थे तथा रावणने उन्हें अपने पुरुषार्थ से प्राप्त किया था ॥ ३ ॥

तानि प्रयत्नाभिसमाहितानि मयेन साक्षादिव निर्मितानि । महीतले सर्वगुणोत्तराणि ददर्श लङ्काधिपतेर्गृहाणि ॥ ४ ॥

वे भवन बड़े प्रयत्नसे बनाये गये थे और ऐसे अद्भुत लगते थे, मानो साक्षात् मय दानवने ही उनका निर्माण किया हो । इनुमान् जीने उन्हें देखा, लङ्कापति रावण के वे घर इस भूतल-पर सभी गुणोंमें सबसे बढ़ - चढ़कर ॥ ४ ॥

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सुन्दरकाण्डे सप्तमः सर्गः ८७७ ततो ददर्शोच्छ्रितमेधरूपं मनोहरं काञ्चनचारुरूपम् । रक्षोऽधिपस्यात्मबलानुरूपं गृहोत्तमं प्रतिरूपरूपम् ॥ ५ ॥

फिर उन्होंने राक्षसराज रावणका उसकी शक्ति के अनुरूप अत्यन्त उत्तम और अनुपम भवन ( पुष्पक विमान ) देखा, जो मेघ के समान ऊँचा, सुवर्णके समान सुन्दर कान्तिवाला तथा मनोहर था ॥ ५ ॥

महीतले स्वर्गमि प्रकीर्णे श्रिया ज्वलन्तं बहुरनकीर्णम् । नाना तरूणां कुसुमाकीर्ण गिरेरिवाथं रजसावकीर्णम् ॥ ६ ॥

वह इस भूतलपर बिखरे हुए स्वर्णके समान जान पड़ता था । अपनी कान्तिसे प्रज्वलित - सा हो रहा था । अनेकानेक रत्नोंसे व्याप्त, भाँति - भाँति के वृक्षोंके फूलोंसे आच्छादित तथा पुष्पों के परागसे भरे हुए पर्वत शिखरके समान शोभा पाता था ॥ ६ ॥

दीप्यमानं तडिद्धिरम्भोधर मर्च्यमानम् । हंसप्रवे कैरिव वाद्यमानं श्रिया युतं खे सुकृतं विमानम् ॥ ७ ॥

वह विमानरूप भवन विद्युन्मालाओं से पूजित मेघ के समान रमणी -रत्रोंसे देदीप्यमान हो रहा था और श्रेष्ठ हंसोंद्वारा आकाशमें ढोये जाते हुए विमानकी भाँति जान पड़ता था ।

उस दिव्य विमानको बहुत सुन्दर ढंगसे बनाया गया था ।

वह अद्भुत शोभासे सम्पन्न दिखायी देता था ॥ ७ ॥

यथा नगाग्रं बहुधातुचित्रं

यथा नभश्च ग्रहचन्द्र चित्रम् ।

ददर्श युक्तीकृतचारुमेघ-चित्रं विमानं बहुरत्तचित्रम् ॥ ८ ॥

जैसे अनेक धातुओंके कारण पर्वतशिखर, ग्रहों और चन्द्रमाके कारण आकाश तथा अनेक वर्णोंसे युक्त होने के कारण मनोहर मेघ विचित्र शोभा धारण करते हैं, उसी तरह नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित होनेके कारण वह विमान भी विचित्र शोभासे सम्पन्न दिखायी देता था ॥ ८ ॥

मही कृता पर्वतराजपूर्णा शैलाः कृता वृक्षवितानपूर्णाः । वृक्षाः कृताः पुष्पवितान पूर्णाः पुष्पं कृतं केसरपत्रपूर्णम् ॥ ९ ॥

उस विमानकी आधारभूमि ( आरोहियोंके खड़े होनेका स्थान ) सोने और मणियोंके द्वारा निर्मित कृत्रिम पर्वत - मालाओं से पूर्ण बनायी गयी थी । वे पर्वत वृक्षोंकी विस्तृत पंक्तियोंसे हरे - भरे रचे गये थे । वे वृक्ष फूलों के बाहुल्य से व्याप्त बनाये गये थे तथा वे पुष्प भी केसर एवं पंखुड़ियोंसे पूर्ण निर्मित हुए थे * ॥ ९ ॥

कृतानि वेश्मानि च पाण्डुराणि तथा सुपुष्पाण्यपि पुष्कराणि । पुनश्च पद्मानि सकेसराणि वनानि चित्राणि सरोवराणि ॥ १० ॥

उस विमान में श्वेतभवन बने हुए थे । सुन्दर फूलोंसे सुशोभित पोखरे बनाये गये थे । केसरयुक्त कमल, विचित्र वन और अद्भुत सरोवरोंका भी निर्माण किया गया था ॥ १० ॥

पुष्पाह्वयं नाम विराजमान रत्नप्रभाभिश्च विघूर्णमानम् । वेश्मोत्तमानामपि चोच्यमानं महाकपिस्तत्र महाविमानम् ॥ ११ ॥

महाकपि हनुमान्ने जिस सुन्दर विमानको वहाँ देखा, उसका नाम पुष्पक था । वह रत्नोंकी प्रभासे प्रकाशमान था और इधर - उधर भ्रमण करता था । देवताओं के गृहाकार उत्तम विमानोंमें सबसे अधिक आदर उस महाविमान पुष्पकका ही होता था ॥ ११ ॥

कृताश्च वैदूर्यमया विहङ्गा रूप्यप्रवालैश्च तथा विहङ्गाः । चित्राश्च नानावसुभिर्भुजङ्गा जात्यानुरूपास्तुरगाः शुभाङ्गाः ॥ १२ ॥

उसमें नीलम, चाँदी और मूँगोंके आकाशचारी पक्षी बनाये गये थे । नाना प्रकारके रनोंसे विचित्र वर्णके सर्पोका निर्माण किया गया था और अच्छी जातिके घोड़ों के समान ही सुन्दर अङ्गवाले अश्व भी बनाये गये थे ॥ १२ ॥

प्रवालजाम्बूनदपुष्पपक्षाः सलीलमावर्जितजिह्मपक्षाः 1 कामस्य साक्षादिव भान्ति पक्षाः कृता विहङ्गाः सुमुखाः सुपक्षाः ॥ १३ ॥

उस विमानपर सुन्दर मुख और मनोहर पंखवाले बहुत से ऐसे विहङ्गम निर्मित हुए थे, जो साक्षात् कामदेवके * जहाँ पूर्वकथित वस्तुओंके प्रति उत्तरोत्तर कथित वस्तुओंका विशेषण भावसे स्थापन किया जाय, वहाँ ' एकावली ' अलंकार माना गया है । इस लक्षणके अनुसार इस लोक में एकावली अलंकार है । यहाँ ' मही ' का विशेष पर्वत, पर्वतका वृक्ष और वृक्षका विशेषण पुष्प आदि समझना चाहिये । गोविन्दराजने यहाँ ' अधिक ' नामक अलंकार माना है; परंतु जहाँ आधारसे आधेयकी विशेषता बतायी गयी हो वही इसका विषय हैं; यहाँ ऐसी बात नहीं है ।