Ramayana 2 — पृष्ठ 371–380

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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११७८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे और फुफकारते हुए सपके समान साँस ले रहे थे ॥ १ ॥

सर्वे ते वानरश्रेष्ठाः ससुग्रीव महाबलाः

परिवार्य महात्मानौ तस्थुः शोकपरिप्लुताः ।

॥ २ ॥

उन दोनों महात्माओंको चारों ओरसे घेरकर सुग्रीव आदि सभी श्रेष्ठ महाबली वानर शोकमें डूबे खड़े थे ॥ २ ॥

एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रत्यबुध्यत वीर्यवान् ।

स्थिरत्वात् सव योगाच्च शरैः संदानितोऽपि सन् ॥ ३ ॥

इसी बीचमें पराक्रमी श्रीराम नागपाशसे बँधे होनेपर भी अपने शरीर की दृढ़ता और शक्तिमत्ता के कारण मूर्छासे जाग उठे ॥ ३ ॥

ततो दृष्ट्वा सरुधिरं निषण्णं गाढमर्पितम् ।

भ्रातरं दीनवदनं पर्यदेवयदातुरः ॥ ४ ॥

उन्होंने देखा कि भाई लक्ष्मण बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर खून से लथपथ हुए पड़े हैं और उनका चेहरा बहुत उतर गया है; अतः वे आतुर होकर विलाप करने लगे ॥४ ॥

किं नु मे सीतया कार्य लब्धया जीवितेन वा ।

शयानं योऽद्य पश्यामि भ्रातरं युधि निर्जितम् ॥ ५ ॥

' हाय! यदि मुझे सीता मिल भी गयीं तो मैं उन्हें लेकर क्या करूँगा? अथवा इस जीवनको ही रखकर क्या करना है? जब कि आज मैं अपने पराजित हुए भाईको युद्धस्थलमें पड़ा हुआ देख रहा हूँ ॥ ५ ॥

शक्या सीतासमा नारी मर्त्यलोके विचिन्वता ।

न लक्ष्मणसमो भ्राता सचिवः साम्परायिकः ॥ ६ ॥

' मर्त्यलोक में ढूँढ़ने पर मुझे सीता - जैसी दूसरी स्त्री मिल सकती है; परंतु लक्ष्मणके समान सहायक और युद्धकुशल नहीं मिल सकता ॥ ६ ॥ भाई

परित्यक्ष्याम्यहं प्राणान् वानराणां तु पश्यताम् ।

यदि पञ्चत्वमापन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ७ ॥

' सुमित्रा आनन्दको बढ़ानेवाले लक्ष्मण यदि जीवित न रहे तो मैं वानरोंके देखते - देखते अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा || ७ ||

किं नु वक्ष्यामि कौसल्यां मातरं किं नु कैकयीम् ।

कथमम्बां सुमित्रां च पुत्रदर्शनलालसाम् ॥ ८ ॥

विवत्सां वेपमानां च वेपन्तीं कुररीमिव ।

कथमाश्वासयिष्यामि यदि यास्यामि तं विना ॥ ९ ॥

' लक्ष्मणके बिना यदि मैं अयोध्या को लौहूँ तो माता कौसल्या और कैकेयीको क्या जवाब दूँगा तथा अपने पुत्रको देखनैके लिये उत्सुक हो बछड़ेसे बिछुड़ी गायके समान काँपती और कुररीकी भाँति रोती - बिलखती माता सुमित्रासे क्या कहूँगा? उन्हें किस तरह धैर्य बँधाऊँगा? ॥ ८ - ९ ॥

कथं वक्ष्यामि शत्रुघ्नं भरतं च यशखिनम् ।

मया सह वनं यातो विना तेनाहमागतः ॥ १० ॥

" मैं यशस्वी भरत और शत्रुघ्नसे किस तरह यह कह सकूँगा कि लक्ष्मण मेरे साथ वनको गये थे; किंतु मैं उन्हें वहीं खोकर उनके बिना ही लौट आया हूँ ॥ १० ॥

उपालम्भं न शक्ष्यामि सोदुमम्बासुमित्रया ।

इहैव देहं त्यक्ष्यामि नहि जीवितुमुत्सहे ॥ ११ ॥

' दोनों माताओं सहित सुमित्राका उपालम्भ मैं नहीं सह सकूँगा; अतः यहीं इस देहको त्याग दूँगा । अब मुझमें जीवित रहनेका उत्साह नहीं है ॥ ११ ॥

धियां दुष्कृतकर्माणमनायें यत्कृते ह्यसौ ।

लक्ष्मणः पतितः शेते शरतल्पे गतासुवत् ॥ १२ ॥

' मुझ जैसे दुष्कर्मी और अनार्यको धिक्कार है, जिसके कारण लक्ष्मण मरे हुएके समान बाण - शय्या पर सो रहे हैं ॥ १२ ॥

त्वं नित्यं सुविषण्णं मामाश्वासयसि लक्ष्मण ।

गतासुर्नाद्य शक्तोऽसि मामार्तमभिभाषितुम् ॥ १३ ॥

' लक्ष्मण! जब अत्यन्त विषाद में डूब जाता था, उस समय तुम्हीं सदा मुझे आश्वासन देते थे; परंतु आज तुम्हारे प्राण नहीं रहे, इसलिये आज तुम मुझ दुखियासे बात करने-भी असमर्थ हो । १३ ॥

येनाद्य बहवो युद्धे निहता राक्षसाः क्षितौ ।

तस्यामेवाद्य शूरस्त्वं शेषे विनिहतः शरैः ॥ १४ ॥

“ भैया! जिस रणभूमिमें आज तुमने बहुत - से राक्षसों को मार गिराया था, उसीमें शूरवीर होकर भी तुम बाणोंद्वारा मारे जाकर सो रहे हो ॥ १४ ॥

शयानः शरतल्पेऽस्मिन् सशोणितपरिस्रुतः ।

शरभूतस्ततो भासि भास्करोऽस्तमिव व्रजन् ॥ १५ ॥

' इस बाण - शय्या पर तुम खूनसे लथपथ होकर पड़े हो और बाणोंसे व्याप्त होकर अस्ताचलको जाते हुए सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे हो । १५ ॥

वाणाभिहतमर्मत्वान्न शक्नोषीह भाषितुम् ।

रुजा चाब्रुवतो यस्य दृष्टिरागेण सूच्यते ॥ १६ ॥

' बाणोंसे तुम्हारा मर्मस्थल विदीर्ण हो गया, इसलिये तुम यहाँ बात भी नहीं कर सकते । यद्यपि तुम बोल नहीं रहे हो, तथापि तुम्हारे नेत्रोंकी लालीसे तुम्हारी मार्मिक पीड़ा सूचित हो रही है ॥ १६ ॥

यथैव मां वनं यान्तमनुयातो महाद्युतिः ।

अहमप्यनुयास्यामि तथैवैनं यमक्षयम् ॥ १७ ॥

' जिस तरह वनकी यात्रा करते समय महातेजस्वी लक्ष्मण

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युद्धकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ११७ ९ मेरे पीछे - पीछे चले आये थे, उसी प्रकार मैं भी यमलोक में इनका अनुसरण करूँगा ॥ १७ ॥

इष्टबन्धुजनो नित्यं मां च नित्यमनुव्रतः ।

इमामद्य गतोऽवस्थां ममानार्यस्य दुर्नयैः ॥ १८ ॥

' जो मेरे प्रिय बन्धुजन थे और सदा मुझमें अनुराग एवं भक्तिभाव रखते थे, वे ही लक्ष्मण आज मुझ अनार्य की दुर्नीतियोंके कारण इस अवस्थाको पहुँच गये ॥ १८ ॥

सुरुष्टेनापि वीरेण लक्ष्मणेन न संस्मरे ।

परुषं विप्रियं चापि श्रावितं तु कदाचन ॥ १ ९ ॥

‘ मुझे ऐसा कोई प्रसंग याद नहीं आता, जब कि वीर लक्ष्मणने अत्यन्त कुपित होनेपर भी मुझे कभी कोई कठोर या अप्रिय बात सुनायी हो ॥ १ ९ ॥

विससर्जेकवेगेन पञ्च वाणशतानि यः ।

इष्वत्रेष्वधिकस्तस्मात् कार्तवीर्याच्च लक्ष्मणः ॥ २० ॥

' लक्ष्मण एक ही वेगसे पाँच सौ बाणोंकी वर्षा करते थे; इसलिये धनुर्विद्या में कार्तवीर्य अर्जुनसे भी बढ़कर थे ॥ २० ॥

अस्त्रैरस्त्राणि यो हन्याच्छक्रस्यापि महात्मनः ।

सोऽयमुर्व्या हतः शेते महार्हशयनोचितः ॥ २१ ॥

' जो अपने अस्त्रोंद्वारा महात्मा इन्द्रके भी अस्त्रोंको काट सकते थे, वे ही बहुमूल्य शय्यापर सोने योग्य लक्ष्मण आज स्वयं मारे जाकर पृथ्वीपर सो रहे हैं ॥ २१ ॥

तत्तु मिथ्या प्रलप्तं मां प्रधक्ष्यति न संशयः ।

यन्मया न कृतो राजा राक्षसानां विभीषणः ॥ २२ ॥

“ मैं विभीषणको राक्षसोंका राजा न बना सका; अतः मेरा वह झूठा प्रलाप मुझे सदा जलाता रहेगा, इसमें संशय नहीं है ।

अस्मिन् मुहूर्ते सुग्रीव प्रतियातुमितोऽर्हसि ।

मत्वा हीनं मया राजन् रावणोऽभिभविष्यति ॥ २३ ॥

' वानरराज सुग्रीव! तुम इसी मुहूर्तमें यहाँसे लौट जाओ; क्योंकि मेरे बिना तुम्हें असहाय समझकर रावण तुम्हारा तिरस्कार करेगा ॥ २३ ॥

अङ्गदं तु पुरस्कृत्य ससैन्यं सपरिच्छदम् ।

सागरं तर सुग्रीव नीलेन च नलेन च ॥ २४ ॥

' मित्र सुग्रीव! सेना और सामग्रियों सहित अङ्गदको आगे करके नल और नीलके साथ तुम समुद्र के पार चले जाओ ॥ २४ ॥

कृतं हि सुमहत्कर्म यदन्यैर्दुष्करं रणे ।

ऋक्षराजेन तुष्यामि गोलाङ्गलाधिपेन च ॥ २५ ॥

“ मैं लंगूरोंके स्वामी गवाक्ष तथा ऋक्षराज जाम्बवान् से भी बहुत संतुष्ट हूँ । तुम सब लोगोंने युद्धमें वह महान् पुरुषार्थं कर दिखाया है, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुष्कर था ॥ २५ ॥

अङ्गदेन कृतं कर्म मैन्देन द्विविदेन च ।

युद्धं केसरिणा संख्ये घोरं सम्पातिना कृतम् ॥ २६ ॥

' अङ्गद, मैन्द और द्विविदने भी महान् पराक्रम प्रकट किया है । केसरी और सम्पातिने भी समराङ्गणमें घोर युद्ध किया है ॥ २६ ॥

गवयेन गवाक्षेण शरभेण गजेन च ।

अन्यैश्च हरिभिर्युद्धं मदर्थे त्यक्तजीवितैः ॥ २७ ॥

' गवय, गवाक्ष, शरभ, गज तथा अन्य वानरोंने भी मेरे लिये प्राणों का मोह छोड़कर संग्राम किया है ॥ २७ ॥

न चातिक्रमितुं शक्यं देवं सुग्रीव मानुषैः ।

यत्तु शक्यं वयस्येन सुहृदा वा परं मम ॥ २८ ॥

कृतं सुग्रीव तत् सर्वं भवता धर्मभीरुणा ।

मित्रकार्य कृतमिदं भवद्भिर्वानरर्षभाः ॥ २ ९ ॥

अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं गन्तुमर्हथ । ' किंतु सुग्रीव! मनुष्योंके लिये दैवके विधानको लाँघना असम्भव है । मेरे परम मित्र अथवा उत्तम सुहृद् के नाते तुम-जैसे धर्मभीरु पुरुषके द्वारा जो कुछ किया जा सकता था, वह सब तुमने किया है । वानरशिरोमणियो! तुम सबने मिलकर मित्रके इस कार्य को सम्पन्न किया है । अब मैं आज्ञा देता हूँ तुम सब जहाँ इच्छा हो, वहाँ चले जाओ ' ॥२८-२९ ३ ॥ शुश्रुवुस्तस्य ये सर्वे वानराः परिदेवितम् ॥ ३० ॥

वर्तयांचक्रिरेऽश्रूणि नेत्रैः कृष्णेतरेक्षणाः ॥ ३१ ॥

भगवान् श्रीरामका यह विलाप भूरी आँखोंवाले जिन-जिन वानरोंने सुना, वे सब अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ||

ततः सर्वाण्यनीकानि स्थापयित्वा विभीषणः ।

आजगाम गदापाणिस्त्वरितं यत्र राघवः ॥ ३२ ॥

तदनन्तर समस्त सेनाओं को स्थिरतापूर्वक स्थापित करके विभीषण हाथमें गदा लिये तुरंत उस स्थानपर लौट आये, जहाँ श्रीरामचन्द्रजी विद्यमान थे ॥ ३२ ॥

तं दृष्ट्वा त्वरितं यान्तं नीलाञ्जनचयोपमम् ।

वानरा दुद्रुवुः सर्वे मन्यमानास्तु रावणिम् ॥ ३३ ॥

काले कोयलोंकी राशिके समान कृष्ण कान्तिवाले विभीषणको शीघ्रतापूर्वक आते देख सब वानर उन्हें रावणपुत्र इन्द्रजित् समझकर इधर - उधर भागने लगे ॥ ३३ ॥

इस्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आवरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ९ ॥

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१ ९ ८० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे पञ्चाशः सर्गः विभीषणको इन्द्रजित् समझकर वानरोंका पलायन और सुग्रीवकी आज्ञासे जाम्बवान्का उन्हें सान्त्वना देना, विभीषणका विलाप और सुग्रीवका उन्हें समझाना, गरुड़का आना और श्रीराम - लक्ष्मणको नागपाशसे मुक्त करके चला जाना

अथोवाच महातेजा हरिराजो महाबलः ।

किमियं व्यथिता सेना मूढवातेव नौर्जले ॥ १ ॥

उस समय महातेजस्वी महाबली वानरराज सुग्रीवने पूछा - " वानरो! जैसे जल में बवंडरकी मारी हुई नौका डगमगाने लगती है, उसी प्रकार जो यह हमारी सेना सहसा व्यथित हो उठी है, इसका क्या कारण है? ' ॥ १ ॥

सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा वालिपुत्रोऽङ्गदोऽब्रवीत् ।

न त्वं पश्यसि रामं च लक्ष्मणं च महारथम् ॥ २ ॥

सुग्रीव की यह बात सुनकर वालिपुत्र अङ्गदने कहा-" क्या आप श्रीराम और महारथी लक्ष्मणकी दशा नहीं देख रहे हैं? || २ ||

शरजालाचितौ वीरावुभौ दशरथात्मजौ ।

शरतल्पे महात्मानौ शयानौ रुधिरोक्षितौ ॥ ३ ॥

" ये दोनों वीर महात्मा दशरथकुमार रक्तसे भीगे हुए बाण - शय्या पर पड़े हैं और बाणोंके समूहसे व्याप्त हो रहे हैं ' ॥

अथाब्रवीद् वानरेन्द्रः सुग्रीवः पुत्रमङ्गदम् ।

नानिमित्तमिदं मन्ये भवितव्यं भयेन तु ॥ ४ ॥

तब वानरराज सुग्रीवने पुत्र अङ्गदसे कहा- ' बेटा! मैं ऐसा नहीं मानता कि सेनामें अकारण ही भगदड़ मच गयी है । किसी - न - किसी भयके कारण ऐसा होना चाहिये ॥ ४ ॥

विषण्णवदना होते त्यक्तप्रहरणा दिशः ।

पलायन्तेऽत्र हरयस्त्रासादुत्फुल्ललोचनाः ॥ ५ ॥

" ये वानर उदास मुँह से अपने - अपने हथियार फेंककर सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग रहे हैं और भयके कारण आँखें फाड़ - फाड़कर देख रहे हैं ॥ ५ ॥

अन्योन्यस्य न लज्जन्ते न निरीक्षन्ति पृष्ठतः ।

विप्रकर्षन्ति चान्योन्यं पतितं लङ्घयन्ति च ॥ ६ ॥

' पलायन करते समय उन्हें एक दूसरेसे लज्जा नहीं होती है । वे पीछेकी ओर नहीं देखते हैं । एक दूसरेको घसीटते हैं और जो गिर जाता है, उसे लाँघकर चल देते हैं ( भयके मारे उठाते तक नहीं हैं ) ' ॥ ६ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वीरो गदापाणिर्विभीषणः ।

सुग्रीवं वर्धयामास राघवं च जयाशिषा ॥ ७ ॥

इसी बीच में वीर विभीषण हाथमें गदा लिये वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने विजयसूचक आशीर्वाद देकर सुग्रीव तथा श्रीरघुनाथजीकी अभ्युदय - कामना की ॥ ७ ॥

विभीषणं च सुग्रीवो दृष्ट्वा वानरभीषणम् ।

ऋक्षराजं महात्मानं समीपस्थमुवाच ह ॥ ८ ॥

वानरों को भयभीत करनेवाले विभीषण को देखकर सुग्रीवने अपने पास ही खड़े हुए महात्मा ऋक्षराज जाम्बवान्से कहा ॥ ८ ॥

विभीषणोऽयं सम्प्राप्तो यं दृष्ट्वा वानरर्षभाः ।

द्रवन्त्यायतसंत्रासा रावणात्मजशङ्कया ॥ ९ ॥

ये विभीषण आये हैं, जिन्हें देखकर वानरशिरोमणियों को यह संदेह हुआ है कि रावणका बेटा इन्द्रजित् आ गया । इसीलिये इनका भय बहुत बढ़ गया है और वे भागे जा रहे हैं ॥ ९ ॥

शीघ्रमेतान् सुसंत्रस्तान् बहुधा विप्रधावितान् ।

पर्यवस्थापयाख्याहि विभीषणमुपस्थितम् ॥ १० ॥

' तुम शीघ्र जाकर यह बताओ कि इन्द्रजित् नहीं, विभीषण आये हैं । ऐसा कहकर बहुधा भयभीत हो पलायन - करते हुए इन सब वानरोंको सुस्थिर करो — भागनेसे रोको ' ॥

सुग्रीवेणैवमुक्तस्तु जाम्बवानृक्षपार्थिवः ।

वानरान् सान्वयामास संनिवर्त्य प्रधावतः ॥ ११ ॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर ऋक्षराज जाम्बवान्ने भागते हुए वानरोंको लौटाकर उन्हें सान्त्वना दी ॥ ११ ॥

ते निवृत्ताः पुनः सर्वे वानरास्त्यक्तसाध्वसाः ।

ऋक्षराजवचः श्रुत्वा तं च दृष्ट्वा विभीषणम् ॥ १२ ॥

ऋक्षराजकी बात सुनकर और विभीषण को अपनी आँखों देखकर वानरोंने भयको त्याग दिया तथा वे सब - के - सब फिर लौट आये ॥ १२ ॥

विभीषणस्तु रामस्य गात्रं शरैश्चितम् ।

लक्ष्मणस्य तु धर्मात्मा बभूव व्यथितस्तदा ॥ १३ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरको बाणोंसे व्याप्त हुआ देख धर्मात्मा विभीषणको उस समय बड़ी व्यथा हुई ॥१३ ॥

जलक्लिन्नेन हस्तेन तयोर्नेत्रे विमृज्य च ।

शोकसम्पीडितमना रुरोद विललाप च ॥ १४ ॥

उन्होंने जलसे भीगे हुए उन दोनों भाइयोंके नेत्र पोंछे और मन - ही - मन शोकसे पीड़ित हो वे रोने और विलाप

करने लगे । १४ ॥

इमौ तौ सत्त्वसम्पन्नौ विक्रान्तौ प्रियसंयुगौ ।

• इमामवस्थां गमितौ राक्षसैः कूटयोधिभिः ॥ १५ ॥

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युद्धकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ११८१ " हाय! जिन्हें युद्ध अधिक प्रिय था और जो बल-विक्रमसे सम्पन्न थे, वे ही ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण मायासे युद्ध करनेवाले राक्षसोंद्वारा इस अवस्थाको पहुँचा दिये गये ॥ १५ ॥

भ्रातृपुत्रेण चैतेन दुष्पुत्रेण दुरात्मना ।

राक्षस्या जिह्मया बुद्धया वञ्चितावृजुविक्रमौ ॥ १६ ॥

" ये दोनों वीर सरलतापूर्वक पराक्रम प्रकट कर रहे थे । परंतु भाईके इस दुरात्मा कुपुत्रने अपनी कुटिल राक्षसी बुद्धिके द्वारा इन दोनोंके साथ धोखा किया ॥ १६ ॥

शरैरिमालं विद्धौ रुधिरेण समुक्षितौ ।

वसुधायामिमौ सुतौ दृश्येते शल्यकाविव ॥ १७ ॥

' इन दोनोंके शरीर बाणोंद्वारा पूर्णतः छिद गये हैं । ये दोनों भाई खूनसे नहा उठे हैं और इस अवस्थामें पृथ्वीपर सोये हुए ये दोनों राजकुमार काँटोंसे भरे हुए साही नामक जन्तुके समान दिखायी देते हैं ॥ १७ ॥

ययोर्वीर्यमुपाश्रित्य प्रतिष्ठा काङ्क्षिता मया ।

ताविमो देहनाशाय प्रसुप्तौ पुरुषर्षभौ ॥ १८ ॥

' जिनके बल - पराक्रमका आश्रय लेकर मैंने लङ्काके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेकी अभिलाषा की थी, वे ही दोनों भाई पुरुषशिरोमणि श्रीराम और लक्ष्मण देह त्यागके लिये सो हुए हैं ॥ १८ ॥

जीवन्नद्य विपन्नोऽस्मि नष्टराज्यमनोरथः ।

प्राप्तप्रतिज्ञश्च रिपुः सकामो रावणः कृतः ॥ १ ९ ॥

' आज मैं जीते - जी मर गया । मेरा राज्यविषयक मनोरथ नष्ट हो गया । शत्रु रावणने जो सीताको न लौटाने की प्रतिज्ञा की थी, उसकी वह प्रतिज्ञा पूरी हुई । उसके पुत्रने उसे सफलमनोरथ बना दिया ' ॥ १ ९ ॥

एवं विलपमानं तं परिष्वज्य विभीषणम् ।

सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नो हरिराजोऽब्रवीदिदम् ॥ २० ॥

इस प्रकार विलाप करते हुए विभीषणको हृदयसे लगाकर शक्तिशाली वानरराज सुग्रीवने उनसे यों कहा - ॥ २० ॥

राज्यं प्राप्स्यसि धर्मज्ञ लङ्कायां नेह संशयः ।

रावणः सह पुत्रेण स्वकामं नेह लप्स्यते ॥ २१ ॥

' धर्मज्ञ! तुम्हें लङ्काका राज्य प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है । पुत्रसहित रावण यहाँ अपनी कामना पूरी नहीं कर सकेगा ॥ २१ ॥

गरुडाधिष्ठितावेतावुभौ राघवलक्ष्मणौ ।

त्यक्त्वा मोहं वधिष्येते सगणं रावणं रणे ॥ २२ ॥

“ ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण मूर्छा त्यागनेके पश्चात् गरुड़की पीठपर बैठकर रणभूमिमें राक्षसगणसहित रावणका बध करेंगे ' ॥ २२ ॥

तमेवं सान्त्वयित्वा तु समाश्वास्य तु राक्षसम् ।

सुषेणं श्वशुरं पार्श्वे सुग्रीवस्तमुवाच ह ॥ २३ ॥

राक्षस विभीषणको इस प्रकार सान्त्वना और आश्वासन देकर सुग्रीवने अपने बगलमें खड़े हुए श्वशुर सुषेणसे कहा- ॥ २३ ॥

सह शूरैर्हरिगणैर्लब्धसंज्ञावरिंदमौ ।

गच्छ त्वं भ्रातरौ गृह्य किष्किन्धां रामलक्ष्मणौ ॥ २४ ॥

' आप होश में आ जानेपर इन दोनों शत्रुदमन श्रीराम और लक्ष्मणको साथ ले शूरवीर वानरगणोंके साथ किष्किन्धाको चले जाइये || २४ ||

अहं तु रावणं हत्वा सपुत्रं सहबान्धवम् ।

मैथिलीमानयिष्यामि शक्रो नष्टामिव श्रियम् ॥ २५ ॥

" मैं रावणको पुत्र और बन्धुबान्धवसहित मारकर उसके हाथसे मिथिलेशकुमारी सीताको उसी प्रकार छीन लाऊँगा, जैसे देवराज इन्द्र अपनी खोयी हुई राजलक्ष्मीको दैत्योंके यहाँसे हर लाये थे ' ॥ २५ ॥

श्रुत्वैतद् वानरेन्द्रस्य सुषेणो वाक्यमब्रवीत् ।

देवासुरं महायुद्धमनुभूतं पुरातनम् ॥ २६ ॥

बानरराज सुग्रीवकी यह बात सुनकर सुषेणने कहा--पूर्वकालमें जो देवासुर - महायुद्ध हुआ था, उसे हमने देखा था ॥ २६ ॥

तदा स्म दानवा देवाञ्शरसंस्पर्श कोविदान् ।

निजघ्नुः शस्त्रविदुषश्छादयन्तो मुहुर्मुहुः ॥ २७ ॥

' उस समय अस्त्र - शस्त्रोंके ज्ञाता तथा लक्ष्यवेधमें कुशल देवताओंको बारंबार बाणोंसे आच्छादित करते हुए दानवोंने बहुत घायल कर दिया था ॥ २७ ॥

तानार्तान् नष्टसंज्ञांश्च गतासुंश्च बृहस्पतिः ।

विद्याभिर्मन्त्रयुक्ताभिरोषधीभिश्चिकित्सति ॥ २८ ॥

' उस युद्ध में जो देवता अस्त्र - शस्त्रोंसे पीड़ित, अचेत और प्राणशून्य हो जाते थे, उन सबकी रक्षाके लिये बृहस्पतिजी मन्त्रयुक्त विद्याओं तथा दिव्य ओषधियोंद्वारा उनकी चिकित्सा करते थे ॥ २८ ॥

तान्यौषधान्यानयितुं क्षीरोदं यान्तु सागरम् ।

जवेन वानराः शीघ्रं सम्पातिपनसादयः ॥ २ ९ ॥

' मेरी राय है कि उन ओषधियों को ले आनेके लिये सम्पाति और पनस आदि वानर शीघ्र ही वेगपूर्वक क्षीरसागरके तट-पर जायँ ॥ २ ९ ॥

हरयस्तु विजानन्ति पार्वती ते महौषधी ।

संजीवकरणीं दिव्यां विशल्यां देवनिर्मिताम् ॥ ३० ॥

' सम्पति आदि वानर वहाँ पर्वतपर प्रतिष्ठित हुई दो

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१ ९ ८२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे प्रसिद्ध महौषधियोंको जानते हैं । उनमेंसे एकका नाम है संजीवकरणी और दूसरीका नाम है विशल्यकरणी । इन दोनों दिव्य ओषधियोंका निर्माण साक्षात् ब्रह्माजीने किया है ॥ ३० ॥

चन्द्रश्च नाम द्रोणश्च क्षीरोदे सागरोत्तमे ।

अमृतं यत्र मथितं तत्र ते परमौषधी ॥ ३१ ॥

तौ तत्र विहितौ देवैः पर्वतौ तौ महोदधौ ।

अयं वायुसुतो राजन् हनूमांस्तत्र गच्छतु ॥ ३२ ॥

‘ सागरोंमें उत्तम क्षीरसमुद्रके तटपर चन्द्र और द्रोण नामक दो पर्वत हैं, जहाँ पूर्वकालमें अमृतका मन्थन किया गया था । उन्हीं दोनों पर्वतोंपर वे श्रेष्ठ ओषधियाँ वर्तमान हैं । महासागरमें देवताओंने ही उन दोनों पर्वतोंको प्रतिष्ठित किया था । राजन्! ये वायुपुत्र हनुमान् उन दिव्य ओषधियोंको लाने के लिये वहाँ जायँ ' ॥ ३१-३२ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वायुर्मेधाश्चापि सविद्युतः ।

पर्यस्य सागरे तोयं कम्पयन्निव पर्वतान् ॥ ३३ ॥

ओषधियोंको लाने की वार्ता वहाँ चल ही रही थी कि बड़े जोर-से वायु प्रकट हुई, मेवोंकी घटा घिर आयी और बिजलियाँ चमकने लगीं । वह वायु सागरके जलमें हलचल मचाकर पर्वतोंको कम्पित - सी करने लगी ॥ ३३ ॥

महता पक्षवातेन सर्वद्वीपमहाद्रुमाः ।

निपेतुर्भग्नविपाः सलिले लवणाम्भसि ॥ ३४ ॥

गरुड़के पंखसे उठी हुई प्रचण्ड वायुने सम्पूर्ण द्वीपके बड़े - बड़े वृक्षोंकी डालियाँ तोड़ डालीं और उन्हें लवणसमुद्र के जलमें गिरा दिया ॥ ३४ ॥

अभवन् पन्नगास्त्रस्ता भोगिनस्तत्रवासिनः ।

शीघ्रं सर्वाणि यादांसि जग्मुश्च लवणार्णवम् ॥ ३५ ॥

लङ्कावासी महाकाय सर्प भयसे थर्रा उठे । सम्पूर्ण जल-जन्तु शीघ्रतापूर्वक समुद्र के जलमें घुस गये || ३५ ॥

ततो मुहूर्ताद् गरुडं वैनतेयं महाबलम् ।

वानरा ददृशुः सर्वे ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ ३६ ॥

तदनन्तर दो ही घड़ी में समस्त वानरोंने प्रज्वलित अग्नि-के समान तेजस्वी महाबली विनतानन्दन गरुडको वहाँ उपस्थित देखा ॥ ३६ ॥

तमागतमभिप्रेक्ष्य नागास्ते विप्रदुद्रुवुः ।

यैस्तु तौ पुरुषौ बद्धौ ` शरभूतैर्महाबलैः ॥ ३७ ॥

उन्हें आया देख जिन महाबली नागोंने बाणके रूपमें आकर उन दोनों महापुरुषोंको बाँध रक्खा था, वे सब - के - सब बहाँसे भाग खड़े हुए ॥ ३७ ॥

ततः सुपर्णः काकुत्स्थौ स्पृष्ट्वा प्रत्यभिनन्द्य च ।

त्रिममर्श च पाणिभ्यां मुखे चन्द्रसमप्रभे ॥ ३८ ॥

तत्पश्चात् गरुड़ने उन दोनों रघुवंशी बन्धुओंको स्पर्श करके अभिनन्दन किया और अपने हाथोंसे उनके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखको पोंछा ॥ ३८ ॥

वैनतेयेन संस्पृष्टास्तयोः संरुरुहुर्व्रणाः ।

सुवर्णे च तनू स्निग्धे तयोराशु बभूवतुः ॥ ३ ९ ॥

गरुड़जीका स्पर्श प्राप्त होते ही श्रीराम और लक्ष्मणके सारे घाव भर गये और उनके शरीर तत्काल ही सुन्दर कान्तिसे युक्त एवं स्निग्ध हो गये ॥ ३ ९ ॥

तेजो वीर्य बलं चौज उत्साहश्च महागुणाः ।

प्रदर्शनं च बुद्धिश्च स्मृतिश्च द्विगुणा तयोः ॥ ४० ॥

उनमें तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, दृष्टिशक्ति, बुद्धि और स्मरणशक्ति आदि महान् गुण पहलेसे भी दुगुने हो गये ॥ ४० ॥

तावुत्थाप्य महातेजा गरुडो वासवोपमौ ।

उभौ च सखजे हृष्टो रामश्चैनमुवाच ह ॥ ४१ ॥

फिर महातेजस्वी गरुड़ने उन दोनों भाइयोंको, जो साक्षात् इन्द्रके समान थे, उठाकर हृदयसे लगा लिया । तब श्रीरामजी-ने प्रसन्न होकर उनसे कहा— ॥ ४१ ॥

भवत्प्रसादाद् व्यसनं रावणिप्रभवं महत् ।

उपायेन व्यतिक्रान्तौ शीघ्रं च बलिनौ कृतौ ॥ ४२ ॥

" इन्द्रजित् के कारण हमलोगोंपर जो महान् संकट आ गया था, उसे हम आपकी कृपासे लाँघ गये । आप विशिष्ट उपायके ज्ञाता हैं; अतः आपने हम दोनों को शीघ्र ही पूर्ववत् बल से सम्पन्न कर दिया ॥ ४२ ॥

यथा तातं दशरथं यथाजं च पितामहम् ।

तथा भवन्तमासाद्य हृदयं मे प्रसीदति ॥ ४३ ॥

' जैसे पिता दशरथ और पितामह अजके पास जाने से मेरा मन प्रसन्न हो सकता था, वैसे ही आपको पाकर मेरा हृदय हर्षसे खिल उठा है ॥ ४३ ॥

को भवान् रूपसम्पन्नो दिव्यखगनुलेपनः ।

वसानो विरजे वस्त्रे दिव्याभरणभूषितः ॥ ४४ ॥

' आप बड़े रूपवान् हैं, दिव्य पुष्पोंकी माला और दिव्य अङ्गरागसे विभूषित हैं । आपने दो स्वच्छ वस्त्र धारण कर रक्खे हैं तथा दिव्य आभूषण आपकी शोभा बढ़ाते हैं । हम जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं? ( सर्वज्ञ होते हुए भी भगवान्ने मानवभावका आश्रय लेकर गरुड़से ऐसा प्रश्न किया ) ॥ ४४ ॥

तमुवाच महातेजा वैनतेयो महाबलः ।

पतत्रिराजः प्रीतात्मा हर्षपर्याकुलेक्षणम् ॥ ४५ ॥

तब महातेजस्वी महाबली पक्षिराज विनतानन्दन गरुड़ने मन - ही - मन प्रसन्न हो आनन्द के आँसुओं से भरे हुए नेत्रचाले श्रीरामसे कहा – ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 376

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श्रीराम - लक्ष्मणकी गरुडजी से बातचीत

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युद्धकाण्डे पञ्चाशः सर्गः १ ९ ८३

अहं सखा ते काकुत्स्थ प्रियः प्राणो बहिश्चरः ।

गरुत्मानिह सम्प्राप्तो युवयोः साह्यकारणात् ॥ ४६ ॥

' काकुत्स्थ! मैं आपका प्रिय मित्र गरुड़ हूँ । बाहर विचरनेवाला आपका प्राण हूँ । आप दोनोंकी सहायताके लिये ही मैं इस समय यहाँ आया हूँ ॥ ४६ ॥

असुरा वा महावीर्या दानवा वा महाबलाः ।

सुराश्चापि सगन्धर्वाः पुरस्कृत्य शतक्रतुम् ॥ ४७ ॥

नेमं मोक्षयितुं शक्ताः शरबन्धं सुदारुणम् । ' महापराक्रमी असुर, महाबली दानव, देवता तथा गन्धर्व भी यदि इन्द्रको आगे करके यहाँ आते तो वे भी इस भयंकर सर्पाकार बाणके बन्धनसे आपको छुड़ाने में समर्थ नहीं हो सकते थे ॥ ४७३ ॥

मायाबलादिन्द्रजिता निर्मितं क्रूरकर्मणा ॥ ४८ ॥

एते नागाः काद्रवेयास्तीक्ष्णदंष्ट्रा विषोल्वणाः ।

रक्षोमायाप्रभावेण शरभूतास्त्वदाश्रयाः ॥ ४ ९ ॥

‘ क्रूरकर्मा इन्द्रजित्ने मायाके बलसे जिन नागरूपी बाणोंका बन्धन तैयार किया था, वे नाग ये कद्रू के पुत्र ही थे । इनके दाँत बड़े तीखे होते हैं । इन नागों का विष बड़ा भयंकर होता है । ये राक्षसकी मायाके प्रभावसे बाण बनकर आपके शरीर में लिपट गये थे ॥ ४८-४९ ॥

सभाग्यश्चासि धर्मज्ञ राम सत्यपराक्रम ।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा समरे रिपुघातिना ॥ ५० ॥

' धर्मके ज्ञाता सत्यपराक्रमी श्रीराम! समराङ्गणमें शत्रुओं-का संहार करनेवाले अपने भाई लक्ष्मणके साथ ही आप बड़े सौभाग्यशाली हैं ( जो अनायास ही इस नागपाशसे मुक्त हो गये ) ॥ ५० ॥

इमं श्रुत्वा तु वृत्तान्तं त्वरमाणोऽहमागतः ।

सहसैवात्रयोः स्नेहात् सखित्वमनुपालयन् ॥ ५१ ॥

" मैं देवताओंके मुखसे आपलोगोंके नागपाशमें बँधनेका समाचार सुनकर बड़ी उतावलीके साथ यहाँ आया हूँ । हम दोनोंमें जो स्नेह है, उससे प्रेरित हो मित्रधर्मका पालन करता हुआ सहसा आ पहुँचा हूँ ॥ ५१ ॥

मोक्षितौ च महाघोरादस्मात् सायकबन्धनात् ।

अप्रमादश्च कर्तव्यो युवाभ्यां नित्यमेव हि ॥ ५२ ॥

' आकर मैंने इस महाभयंकर बाण - बन्धनसे आप दोनोंको छुड़ा दिया । अब आपको सदा ही सावधान रहना चाहिये ॥ ५२ ॥

प्रकृत्या राक्षसाः सर्वे संग्रामे कूटयोधिनः ।

शूराणां शुद्धभावानां भवतामार्जवं बलम् ॥ ५३ ॥

' समस्त राक्षस स्वभावसे ही संग्राममें कपटपूर्वक युद्ध करने-वाले होते हैं, परंतु शुद्धभाववाले आप जैसे शूरवीरोंका सरलता ही बल है ॥ ५३ ॥

तन्न विश्वसनीयं वो राक्षसानां रणाजिरे ।

एतेनैवोपमानेन नित्यं जिह्मां हि राक्षसाः ॥ ५४ ॥

' इसलिये इसी दृष्टान्तको सामने रखकर आपको रणक्षेत्र में राक्षसोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि राक्षस सदा ही कुटिल होते हैं ' ॥ ५४ ॥

एवमुक्त्वा तदा रामं सुपर्णः स महाबलः ।

परिष्वज्य च सुस्निग्धमा प्रष्टुमुपचक्रमे ॥ ५५ ॥

ऐसा कहकर महाबली गरुड़ने उस समय परम स्नेही श्री-रामको हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी आज्ञा लेनेका विचार किया ॥ ५५ ॥

सखे राघव धर्मज्ञ रिपूणामपि वत्सल ।

अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि गमिष्यामि यथासुखम् ॥ ५६ ॥

वे बोले – ' शत्रुओंपर भी दया दिखानेवाले धर्मश मित्र रघुनन्दन! अब मैं सुखपूर्वक यहाँसे प्रस्थान करूँगा । इसके लिये आपकी आज्ञा चाहता हूँ ॥ ५६ ॥

न च कौतूहलं कार्य सखित्वं प्रति राघव ।

कृतकर्मा रणे वीर सखित्वं प्रतिवेत्स्यसि ॥ ५७ ॥

' वीर रघुनन्दन! मैंने जो अपनेको आपका सखा बताया है, इसके विषय में आपको अपने मनमें कोई कौतूहल नहीं रखना चाहिये । आप युद्धमें सफलता प्राप्त कर लेनेपर मेरे इस सख्यभावको स्वयं समझ लेंगे ॥ ५७ ॥

बालवृद्धावशेषां तु लङ्कां कृत्वा शरोर्मिभिः ।

रावणं तु रिपुं हत्वा सीतां त्वमुपलप्स्यसे ॥ ५८ ॥

' आप समुद्र की लहरोंके समान अपने बाणोंकी परम्परासे लङ्काकी ऐसी दशा कर देंगे कि यहाँ केवल बालक और बूढ़े ही शेष रह जायँगे । इस तरह अपने शत्रु रावणका संहार करके आप सीताको अवश्य प्राप्त कर लेंगे ' ॥ ५८ ॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं सुपर्णः शीघ्रविक्रमः ।

रामं च नीरुजं कृत्वा मध्ये तेषां वनौकसाम् ॥ ५ ९ ॥

प्रदक्षिणं ततः कृत्वा परिष्वज्य च वीर्यवान् ।

जगामाकाशमाविश्य सुपर्णः पवनो यथा ॥ ६० ॥

ऐसी बातें कहकर शीघ्रगामी एवं शक्तिशाली गरुड़ने श्री-रामको नीरोग करके उन वानरोंके बीचमें उनकी परिक्रमा की और उन्हें हृदयसे लगाकर वे वायुके समान गतिसे आकाशमें चले गये ॥ ५ ९ -६० ॥

नीरुजौ राघवौ दृष्ट्वा ततो वानरयूथपाः ।

सिंहनादं तदा नेदुर्लाङ्गलं दुधुवुश्च ते ॥ ६१ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणको नीरोग हुआ देख उस समय

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१ ९ ८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सारे वानर - यूथपति सिंहनाद करने और पूँछ हिलाने लगे ॥ ६१ ॥

ततो भेरीः समाजघ्नुर्मृदङ्गांश्चाप्यवादद्यन्

दध्मुः शङ्खान् सम्प्रहृष्टाः क्ष्वेलन्त्यपि यथापुरम् ॥ ६२ ॥

फिर तो वानरोंने डंके पीटे, मृदंग बजाये, शङ्खनाद किये और हर्षोल्लास से भरकर पहलेकी भाँति वे गर्जने और ताल ठोंकने लगे ॥ ६२ ॥

अपरे स्फोट्य विक्रान्ता वानरा नगयोधिनः ।

द्रुमानुत्पाट्य विविधांस्तस्थुः शतसहस्रशः ॥ ६३ ॥

दूसरे पराक्रमी वानर जो वृक्षों और पर्वत - शिखरों को हाथ-में लेकर युद्ध करते थे, नाना प्रकारके वृक्ष उखाड़कर लाखों-कौ संख्या में युद्ध के लिये खड़े हो गये || ६३ ॥

विसृजन्तो महानादांस्त्रासयन्तो निशाचरान् ।

लङ्काद्वाराण्युपाजग्मुर्योद्धुकामाः लवंगमाः ॥ ६४ ॥

जोर - जोरसे गर्जते और निशाचरोंको डराते हुए सारे बानर युद्ध की तेषां क्षये उस समय तुमुल सिंहनाद में आधी रातके इच्छासे लङ्काके दरवाजोंपर आकर डट गये ॥ सुभीमस्तुमुलो निनादो बभूव शाखामृगयूथपानाम् । निदाघस्य यथा घनानां नादः सुभीमो नदतां निशीथे ॥ ६५ ॥

उन वानरयूथपतियोंका बड़ा भयंकर एवं सब ओर गूँजने लगा, मानो ग्रीष्म ऋतुके अन्त-समय गर्जंते हुए मेघोंकी गम्भीर गर्जना सब ओर व्याप्त हो रही हो ॥ ६५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥ ५० ॥

इस प्रकार श्री वाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्डमें पचासवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ ५० ॥

एकपञ्चाशः सर्गः श्रीराम के बन्धनमुक्त होने का पता पाकर चिन्तित हुए रावणका धूम्राक्षको युद्ध के लिये भेजना और सेनासहित

तेषां तु तुमुलं शब्दं वानराणां महौजसाम् ।

नईतां राक्षसैः सार्धं तदा शुश्राव रावणः ॥ १ ॥

उस समय भीषण गर्जना करते हुए महाबली वानरोंका वह तुमुलनाद राक्षसोंसहित रावणने सुना ॥ १ ॥

स्निग्धगम्भीरनिर्घोषं श्रुत्वा तं निनदं भृशम् ।

सचिवानां ततस्तेषां मध्ये वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥

मन्त्रियोंके बीच में बैठे हुए रावणने जब वह स्निग्ध गम्भीर घोष, वह उच्चस्वरसे किया हुआ सिंहनाद सुना, तब वह इस प्रकार बोला- ॥ २ ॥

यथासौ सम्प्रहृष्टानां वानराणामुपस्थितः ।

बहूनां सुमहान् नादो मेघानामिव गर्जताम् ॥ ३ ॥

सुव्यक्तं महती प्रीतिरेतेषां नात्र संशयः ।

तथाहि विपुलैर्नादैश्चुक्षुभे लवणार्णवः ॥ ४ ॥

‘ इस समय गर्जते हुए मेघोंके समान जो अधिक हर्षमें भरे हुए बहुसंख्यक वानरोंका यह महान् कोलाहल प्रकट हो रहा है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि इन सबको बड़ा भारी हर्षं प्राप्त हुआ है; इसमें संशय नहीं है । तभी इस तरह बारंबार की गयी गर्जनाओंसे यह खारे पानीका समुद्र विक्षुब्ध हो उठा है ॥ ३-४ ॥

तौ तु बद्धौ शरैस्तीक्ष्णैर्भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।

अयं च सुमहान् नादः शङ्कां जनयतीव मे ॥ ५ ॥

धूम्राक्षका नगरसे बाहर आना " परंतु वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण तो तीखे बाणोंसे बँधे हुए हैं । इधर यह महान् हर्षनाद भी हो रहा है, जो मेरे मनमें शङ्का - सी उत्पन्न कर रहा है ' ॥ ५ ॥

एवं च वचनं चोक्त्वा मन्त्रिणो राक्षसेश्वरः ।

उवाच नैर्ऋतांस्तत्र समीपपरिवर्तिनः ॥ ६ ॥

मन्त्रियोंसे ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने अपने पास ही खड़े हुए राक्षसोंसे कहा ॥ ६ ॥

शायतां तूर्णमेतेषां सर्वेषां च वनौकसाम् ।

शोककाले समुत्पन्ने हर्षकारणमुत्थितम् ॥ ७ ॥

' तुमलोग शीघ्र ही जाकर इस बातका पता लगाओ कि शोकका अवसर उपस्थित होनेपर भी इन सब वानरोंके हर्षका कौन - सा कारण प्रकट हो गया है ' ॥ ७ ॥

तथोक्तास्ते सुसम्भ्रान्ताः प्राकारमधिरुह्य च ।

ददृशुः पालितां सेनां सुग्रीवेण महात्मना ॥ ८ ॥

रावण के इस प्रकार आदेश देनेपर वे राक्षस घबराये हुए गये और परकोटेपर चढ़कर महात्मा सुग्रीवके द्वारा पालित वानरसेनाकी ओर देखने लगे ॥ ८ ॥

तौ च मुक्तौ सुघोरेण शरबन्धेन राघवौ ।

समुत्थितौ महाभागौ विषेदुः सर्वराक्षसाः ॥ ९ ॥

जब उन्हें मालूम हुआ कि महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण उस अत्यन्त भयंकर नागरूपी बाणोंके बन्धनसे मुक्त होकर उठ गये हैं, तब समस्त राक्षसों को बड़ा दुःख हुआ ॥ ९ ॥

पृष्ठ 380

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युद्धकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः १ ९ ८५

संत्रस्तहृदयाः सर्वे प्राकारादवरुह्य ते ।

विवर्णा राक्षसा घोरा राक्षसेन्द्रमुपस्थिताः ॥ १० ॥

उनका हृदय भयसे थर्रा उठा । वे सब भयानक राक्षस परकोटेसे उतरकर उदास हो राक्षसराज रावणकी सेवामें उपस्थित हुए || १० ॥

तदप्रियं दीनमुखा रावणस्य च राक्षसाः ।

कृत्स्नं निवेदयामासुर्यथावद् वाक्यकोविदाः ॥ ११ ॥

वे बातचीत की कला में कुशल थे । उनके मुखपर दीनता छा रही थी । उन निशाचरोंने वह सारा अप्रिय समाचार रावणको यथावत् रूपसे बताया ॥ ११ ॥

यौ ताविन्द्रजिता युद्धे भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।

fresh ara न्धेन निष्प्रकम्पभुजौ कृतौ ॥ १२ ॥

विमुक्तौ शरबन्धेन दृश्येते तो रणाजिरे ।

पाशानिव गजौ छित्वा गजेन्द्रसमविक्रमौ ॥ १३ ॥

( वे बोले - ) ' महाराज! कुमार इन्द्रजित्ने जिन राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको युद्धस्थलमें नागरूपी बाणोंके बन्धनसे बाँधकर हाथ हिलानेमें भी असमर्थ कर दिया था, वे गजराज के समान पराक्रमी दोनों वीर जैसे हाथी रस्सेको तोड़कर स्वतन्त्र हो जायँ, उसी तरह बाणबन्धनसे मुक्त हो समराङ्गण में खड़े दिखायी देते हैं ' ॥ १२-१३ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां राक्षसेन्द्रो महाबलः ।

चिन्ताशोकसमाक्रान्तो विवर्णवदनोऽभवत् ॥ १४ ॥

उनका वह वचन सुनकर महाबली राक्षसराज रावण चिन्ता तथा शोकके वशीभूत हो गया और उसका चेहरा उतर गया ॥ १४ ॥

घोरैर्दत्तवरैर्बद्धो शरैराशीविषोपमैः ।

अमोघैः सूर्यसंकाशैः प्रमथ्येन्द्रजिता युधि ॥ १५ ॥

तदस्त्रबन्धमासाद्य यदि मुक्तौ रिपू मम ।

संशयस्थमिदं सर्वमनुपश्याम्यहं बलम् ॥ १६ ॥

( वह मन - ही - मन सोचने लगा- ) ' जो विषधर सपके समान भयंकर, वरदान में प्राप्त हुए और अमोघ थे तथा जिनका तेज सूर्यके समान था, उन्होंके द्वारा युद्धस्थलमें इन्द्रजित्ने जिन्हें बाँध दिया था, वे मेरे दोनों शत्रु यदि उस अस्त्रबन्धन में पड़कर भी उससे छूट गये, तब तो अब मैं अपनी सारी सेनाको संशयापन्न ही देखता हूँ ॥ १५-१६ ॥

निष्फलाः खलु संवृत्ताः शराः पावकतेजसः ।

आदत्तं यैस्तु संग्रामे रिपूणां जीवितं मम ॥ १७ ॥

‘ ज़िन्होंने पहले युद्धस्थलमें मेरे शत्रुओंके प्राण ले लिये थे, वे अग्नितुल्य तेजस्वी बाण निश्चय ही आज निष्फल हो गये ' ॥ १७ ॥

एवमुक्त्वा तु संक्रुद्धो निःश्वसन्नुरगो यथा । वा ० रा ० ५. ९.५ अब्रवीद् रक्षसां मध्ये धूम्राक्षं नाम राक्षसम् ॥ १८ ॥

ऐसा कहकर अत्यन्त कुपित हुआ रावण फुफकारते हुए सर्पके समान जोर - जोरसे साँस लेने लगा और राक्षसों के बीचमें धूम्राक्ष नामक निशाचरसे बोला- ॥ १८ ॥

बलेन महता युक्तो रक्षसां भीमविक्रम ।

त्वं बधायाशु निर्याहि रामस्य सह वानरैः ॥ १ ९ ॥

' भयानक पराक्रमी वीर! तुम राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर वानरोंसहित रामका वध करनेके लिये शीघ्र जाओ ' ॥ १ ९ ॥

एवमुक्तस्तु धूम्राक्षो राक्षसेन्द्रेण धीमता ।

परिक्रम्य ततः शीघ्रं निर्जगाम नृपालयात् ॥ २० ॥

बुद्धिमान् राक्षसराजके इस प्रकार आज्ञा देनेपर धूम्राक्षने उसकी परिक्रमा की तथा वह तुरंत राजभवन से बाहर निकल गया ॥ २० ॥

अभिनिष्क्रम्य तद् द्वारं बलाध्यक्षमुवाच ह ।

त्वरयस्व बलं शीघ्रं किं चिरेण युयुत्सतः ॥ २१ ॥

रावणके गृहद्वारपर पहुँचकर उसने सेनापतिसे कहा— “ सेनाको उतावलीके साथ शीघ्र तैयार करो । युद्धकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको विलम्ब करनेसे क्या लाभ? ' ॥ २१ ॥

धूम्राक्षवचनं श्रुत्वा बलाध्यक्षो बलानुगः ।

बलमुद्योजयामास रावणस्याज्ञया भृशम् ॥ २२ ॥

धूम्राक्षकी बात सुनकर रावणकी आज्ञाके अनुसार सेनापतिने जिनके पीछे बहुत बड़ी सेना थी, भारी संख्या में सैनिकोंको तैयार कर दिया ॥ २२ ॥

ते बद्धघण्टा बलिनो घोररूपा निशाचराः ।

विनद्यमानाः संहृथ धूम्राक्षं पर्यवारयन् ॥ २३ ॥

वे भयानक रूपधारी बलवान् निशाचर प्रास और शक्ति आदि अस्त्रोंमें घण्टे बाँधकर हर्ष और उत्साहसे युक्त हो जोर-जोरसे गर्जते हुए आये और धूम्राक्षको घेरकर खड़े हो गये ||

विविधायुधहस्ताश्च शूलमुद्गरपाणयः ।

गदाभिः पट्टिशैर्दण्डैरायसैर्मुसलैरपि ॥ २४ ॥

परिघैर्भिन्दिपालैश्च भल्लैः पाशैः परश्वधैः ।

निर्ययू राक्षसा घोरा नर्दन्तो जलदा यथा ॥ २५ ॥

उनके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र थे । कुछ लोगोंने अपने हाथोंमें शूल और मुद्गर ले रक्खे थे । गदा, पट्टिश, लोहदण्ड, मूसल, परिघ, भिन्दिपाल, भाले, पाश

और फरसे लिये बहुतेरे भयानक राक्षस युद्धके लिये निकले ।

वे सभी मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करते थे ॥ २४-२५ ॥

रथैः कवचिनस्त्वन्ये ध्वजैश्च समलंकृतैः ।

सुवर्णजालविहितैः खरैश्च विविधाननैः ॥ २६ ॥