Ramayana 2 — पृष्ठ 421–430
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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१२२० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे कच्चित् सुकुशलं राज्ञो भयं वा नेह किंचन ॥ ६७ ॥
' तुम लोगोंने इस प्रकार आदर करके मुझे किस लिये जगाया है? राक्षसराज रावण कुशलसे हैं न? यहाँ कोई भय तो नहीं उपस्थित हुआ है? ॥ ६७ ॥
अथवा ध्रुवमन्येभ्यो भयं परमुपस्थितम् ।
यदर्थमेव त्वरितैर्भवद्भिः प्रतिबोधितः ॥ ६८ ॥
" अथवा निश्चय ही यहाँ दूसरोंसे कोई महान् भय उपस्थित हुआ है, जिसके निवारण के लिये तुमलोगोंने इतनी उतावलीके साथ मुझे जगाया है ॥ ६८ ॥
अद्य राक्षसराजस्य भयमुत्पाटयाम्यहम् ।
दारयिष्ये महेन्द्रं वा शीतयिष्ये तथानलम् ॥ ६ ९ ॥
' अच्छा तो आज मैं राक्षसराजके भयको उखाड़ फेंकूँगा । महेन्द्र ( पर्वत या इन्द्र ) को भी चीर डालूँगा और अग्निको भी ठंडा कर दूँगा ॥ ६ ९ ॥
न ह्यल्पकारणे सुप्तं बोधयिष्यति मादृशम् ।
तदाख्यातार्थतत्त्वेन मत्प्रबोधनकारणम् ॥ ७० ॥
" मुझ जैसे पुरुषको किसी छोटे - मोटे कारणवश नींदसे नहीं जगाया जायगा । अतः तुमलोग ठीक - ठीक बताओ, मेरे जगाये जानेका क्या कारण है? ' ॥ ७० ॥
एवं ब्रुवाणं संरब्धं कुम्भकर्णमरिंदमम् ।
यूपाक्षः सचिवो राशः कृताञ्जलिरभाषत ॥ ७१ ॥
शत्रुसूदन कुम्भकर्ण जब रोषमें भरकर इस प्रकार पूछने कुमारो निहतश्चाक्षः सानुयात्रः सकुञ्जरः ॥ ७५ ॥
' पहले एक ही वानरने यहाँ आकर इस महापुरीको जला दिया था और हाथियों तथा साथियोंसहित राजकुमार अक्षको भी मार डाला था ॥ ७५ ॥
स्वयं रक्षोधिपश्चापि पौलस्त्यो देवकण्टकः ।
व्रजेति संयुगे मुक्तो रामेणादित्यवर्चसा ॥ ७६ ॥
" श्रीराम सूर्य के समान तेजस्वी हैं । उन्होंने देवशत्रु पुलस्त्य कुलनन्दन साक्षात् राक्षसराज रावणको भी युद्ध में हरा-कर जीवित छोड़ दिया और कहा - ' लङ्काको लौट जाओ ' ॥
यन्न देवैः कृतो राजा नापि दैत्यैर्न दानवैः ।
कृतः स इह रामेण विमुक्तः प्राणसंशयात् ॥ ७७ ॥
' महाराजकी जो दशा देवता, दैत्य और दानव भी नहीं कर सके थे, वह रामने कर दी । उनके प्राण बड़े संकट से बचे हैं ' ॥ ७७ ॥
स यूपाक्षवचः श्रुत्वा भ्रातुर्युधि पराभवम् ।
कुम्भकर्णो विवृत्ताक्षो यूपाक्षमिदमब्रवीत् ॥ ७८ ॥
युद्धमें भाईकी पराजयसे सम्बन्ध रखनेवाली यूपाक्षकी यह बात सुनकर कुम्भकर्ण आँखें फाड़ - फाड़कर देखने लगा और यूपाक्षसे इस प्रकार बोला ॥ ७८ ॥
सर्वमद्यैव यूपाक्ष हरिसैन्यं सलक्ष्मणम् ।
राघवं च रणे जित्वा ततो द्रक्ष्यामि रावणम् ॥ ७ ९ ॥
" यूपाक्ष! मैं अभी सारी वानरसेनाको तथा लक्ष्मणसहित रामको भी रणभूमि में परास्त करके रावणका दर्शन करूँगा ॥ लगा, तब राजा रावणके सचिव यूपाक्षने हाथ जोड़कर राक्षसांस्तर्पयिष्यामि हरीणां मांसशोणितैः । कहा ॥ ७१ ॥ रामलक्ष्मणयोश्चापि स्वयं पास्यामि शोणितम् ॥ ८० ॥
न नो देवकृतं किंचिद् भयमस्ति कदाचन । ' आज वानरों के मांस और रक्तसे राक्षसोंको तृप्त मानुषान्नो भयं राजंस्तुमुलं सम्प्रबाधते ॥ ७२ ॥ करूँगा और स्वयं भी राम और लक्ष्मणके खून पीऊँगा || ८० ||
' महाराज! हमें देवताओंकी ओरसे तो कभी कोई भय निशम्य तत् तस्य वाक्यं ब्रुवतो हो ही नहीं सकता । इस समय केवल एक मनुष्यसे तुमुल भय गर्वितं रोषविवृद्धदोषम् । प्राप्त हुआ है, जो हमें सता रहा है ॥ ७२ ॥ मोद नैर्ऋतयोधमुख्यः
न दैत्यदानवेभ्यो वा भयमस्ति न नः क्वचित् । कृताञ्जलिर्वाक्यमिदं बभाषे ॥ ८१ ॥
यादृशं मानुषं राजन् भयमस्मानुपस्थितम् ॥ ७३ ॥ कुम्भकर्णके बढ़े हुए रोब - दोषसे युक्त अहङ्कारपूर्ण वचन
' राजन्! इस समय एक मनुष्यसे हमारे लिये जैसा भय सुनकर राक्षस योद्धाओं में प्रधान महोदरने हाथ जोड़कर यह उपस्थित हो गया है, वैसा तो कभी दैत्यों और दानवोंसे भी बात कही ॥ ८१ ॥
नहीं हुआ था ॥ ७३ ॥ रावणस्य वचः श्रुत्वा गुणदोषौ विमृश्य च ।
बानरैः पर्वताकारैर्लयं परिवारिता । पश्चादपि महाबाहो शत्रून् युधि विजेष्यसि ॥ ८२ ॥
खीताहरणसंतप्ताद् रामान्नस्तुमुलं भयम् ॥ ७४ ॥ ' महाबाहो! पहले चलकर महाराज रावणकी बात सुन
' पर्वताकार बानरोंने आकर इस लङ्कापुरीको चारों ओरसे लीजिये । फिर गुण - दोषका विचार करनेके पश्चात् युद्धमें घेर लिया है । सीताहरणसे संतप्त हुए श्रीराम की ओरसे हमें शत्रुओंको परास्त कीजियेगा ' ॥ ८२ ॥
तुमुल भयकी प्राप्ति हुई है ॥ ७४ ॥ महोदरवचः श्रुत्वा राक्षसैः परिवारितः ।
एकेन वानरेणेयं पूर्व दग्धा महापुरी । कुम्भकर्णो महातेजाः सम्प्रतस्थे महाबलः ॥ ८३ ॥
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युद्धकाण्डे षष्टितमः सर्गः १२२३ महोदर की यह बात सुनकर राक्षसोंसे घिरा हुआ महा-तेजस्वी महाबली कुम्भकर्ण वहाँसे चलनेकी तैयारी करने लगा ॥ ८३ ॥
सुप्तमुत्थाप्य भीमाक्षं भीमरूपपराक्रमम् ।
राक्षसास्त्वरिता जग्मुर्दशग्रीवनिवेशनम् ॥ ८४ ॥
इस तरह सोये हुए भयानक नेत्र, रूप और पराक्रमवाले कुम्भकर्णको उठाकर वे राक्षस शीघ्र ही दशमुख रावणके महलमें गये ॥ ८४ ॥
तेऽभिगम्य दशग्रीवमासीनं परमासने ।
ऊचुर्वद्धाञ्जलिपुटाः सर्व एव निशाचराः ॥ ८५ ॥
दशग्रीव उत्तम सिंहासनपर बैठा हुआ था, उसके पास जा सभी निशाचर हाथ जोड़कर बोले - ॥ ८५ ॥
कुम्भकर्णः प्रबुद्धोऽसौ भ्राता ते राक्षसेश्वर ।
कथं तत्रैव निर्यातु द्रक्ष्यसे तमिहागतम् ॥ ८६ ॥
' राक्षसेश्वर! आपके भाई कुम्भकर्ण जाग उठे हैं । कहिये, वे क्या करें? सीधे युद्धस्थलमें ही पधारें या आप उन्हें यहाँ उपस्थित देखना चाहते हैं? ' ॥ ८६ ॥
रावणस्त्वब्रवीद्धृष्टो राक्षसांस्तानुपस्थितान् ।
द्रष्टुमेन मिच्छामि यथान्यायं च पूज्यताम् ॥ ८७ ॥
तब रावणने बड़े हर्ष के साथ उन उपस्थित हुए राक्षसोंसे कहा - " मैं कुम्भकर्ण को यहाँ देखना चाहता हूँ, उनका यथो-चित सत्कार किया जाय ॥ ८७ ॥
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे पुनरागम्य राक्षसाः ।
कुम्भकर्णमिदं वाक्यमूचू रावणचोदिताः ॥ ८८ ॥
तब ' जो आज्ञा ' कहकर रावण के भेजे हुए वे सब राक्षस पुनः कुम्भकर्णके पास आ इस प्रकार बोले ॥ ८८ ॥
द्रष्टुं त्वां काङ्गते राजा सर्वराक्षसपुङ्गवः ।
गमने क्रियतां बुद्धिर्भ्रातरं सम्प्रहर्षय ॥ ८ ९ ॥
' प्रभो! सर्वराक्षस शिरोमणि महाराज रावण आपको देखना चाहते हैं । अतः आप वहाँ चलनेका विचार करें और पधार-कर अपने भाईका हर्ष बढ़ावें ॥। ८ ९ ॥
कुम्भकर्णस्तु दुर्धर्षो भ्रातुराज्ञाय शासनम् ।
तथेत्युक्त्वा महावीर्यः शयनादुत्पपात ह ॥ ९ ० ॥
भाई का यह आदेश पाकर महापराक्रमी दुर्जय वीर कुम्भकर्ण ' बहुत अच्छा ' कहकर शय्यासे उठकर खड़ा हो गया ॥
प्रक्षाल्य वदनं हृष्टः स्नातः परमहर्षितः ।
पिपासुस्त्वरयामास पानं बलसमीरणम् ॥ ९ १ ॥
उसने बड़े हर्ष और प्रसन्नताके साथ मुँह धोकर स्नान किया और पीने की इच्छासे तुरंत बलवर्धक पेय ले आनेकी आज्ञा दी ॥ ९ १ ॥
ततस्ते त्वरितास्तत्र राक्षसा रावणाज्ञया ।
मद्यं भक्ष्यांश्च विविधान् क्षिप्रमेवोपहारयन् ॥ ९ २ ॥
तब रावणके आदेशसे वे सब राक्षस तुरंत मद्य तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ ले आये ॥ ९ २ ॥
पीत्वा घटसहस्रे द्वे गमनायोपचक्रमे ।
ईषत्समुत्को मत्तस्तेजोबलसमन्वितः ॥ ९ ३ ॥
कुम्भकर्ण दो हजार घड़े मद्य गटककर चलनेको उद्यत हुआ । इससे उसमें कुछ ताजगी आ गयी तथा वह मतवाला, तेजस्वी और शक्तिसम्पन्न हो गया ॥ ९ ३ ॥ कुम्भकर्णो बभौ रुष्टः कालान्तकयमोपमः ।
भ्रातुः स भवनं गच्छन् रक्षोबलसमन्वितः ।
कुम्भकर्णः पदन्यासैरकम्पयत मेदिनीम् ॥ ९ ४ ॥
फिर जब राक्षसोंकी सेनाके साथ कुम्भकर्ण भाईके महल-की ओर चला, उस समय वह रोषसे भरे हुए प्रलयकाल के विनाशकारी यमराजके समान जान पड़ता था । कुम्भकर्ण अपने पैरोंकी धमकसे सारी पृथ्वीको कम्पित कर रहा था ॥ स राजमार्ग वपुषा प्रकाशयन् सहस्ररश्मिर्धरणीमिवांशुभिः । जगाम तत्राञ्जलिमालया वृतः शतक्रतुर्गेहमिव स्वयंभुवः ॥ ९ ५ ॥ जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंसे भूतलको प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार वह अपने तेजस्वी शरीरसे राजमार्गको उद्भासित करता हुआ हाथ जोड़े अपने भाईके महलमें गया । ठीक उसी ' तरह, जैसे देवराज इन्द्र ब्रह्माजीके धाममें जाते हैं ॥९ ५ ॥ तं राजमार्गस्थममित्रघातिनं वनौकसस्ते सहसा बहिः स्थिताः । मे गिरिश्टङ्गकल्पं वितत्रसुस्ते सह यूथपालैः ॥ ९ ६ ॥ राजमार्ग पर चलते समय शत्रुघाती कुम्भकर्ण पर्वतशिखर-के समान जान पड़ता था । नगरके बाहर खड़े हुए वानर सहसा उस विशालकाय राक्षसको देखकर सेनापतियों सहित सहम गये ॥ ९ ६ ॥ केचिच्छरण्यं शरणं स्म रामं व्रजन्ति केचिद् व्यथिताः पतन्ति । केचिद् दशश्च व्यथिताः पतन्ति केचिद् भयार्ता भुवि शेरते स्म ॥ ९ ७ ॥ उनमें से कुछ वानरोंने शरणागतवत्सल भगवान् श्रीरामकी शरण ली । कुछ व्यथित होकर गिर पड़े । कोई पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओं में भाग गये और जहाँ - तहाँ धराशायी हो गये और कितने ही वानर भयसे पीड़ित हो धरतीपर लेट गये ॥ ९ ७ ॥
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१२२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तमद्विश्टङ्गप्रतिमं किरीटिनं वह पर्वतशिखरके समान ऊँचा था । उसके मस्तक पर । मुकुट शोभा देता था । वह अपने तेजसे सूर्यका स्पर्श करता-स्पृशन्तमादित्यमिवात्मतेजसा सा जान पड़ता था । उस बढ़े हुए विशालकाय एवं अद्भुत वनौकसः प्रेक्ष्य विवृद्धमद्भुतं राक्षसको देखकर सभी वनवासी वानर भयसे पीड़ित हो इधर-भयार्दिता दुदुविरे यतस्ततः ॥ ९ ८ ॥ उधर भागने लगे ॥ ९ ८ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६० ॥
एकषष्टितमः सर्गः विभीषणका श्रीरामसे कुम्भकर्णका परिचय देना और श्रीरामकी आज्ञासे arrior युद्धके लिये लङ्काके द्वारोंपर डट जाना
ततो रामो महातेजा धनुरादाय वीर्यवान् ।
किरीटिनं महाकायं कुम्भकर्ण ददर्श ह ॥ १ ॥
तदनन्तर हाथमें धनुष लेकर बल - विक्रमसे सम्पन्न महा-तेजस्वी श्रीरामने किरीटधारी महाकाय राक्षस कुम्भकर्णको देखा ॥ १ ॥
तं दृा राक्षसश्रेष्ठं पर्वताकारदर्शनम् ।
क्रममाणमिवाकाशं पुरा नारायणं यथा ॥ २ ॥
सतोयाम्बुदसंकाशं काञ्चनाङ्गदभूषणम् ।
दृष्टी पुनः प्रदुद्राव वानराणां महाचमूः ॥ ३ ॥
वह पर्वतके समान दिखायी देता था और राक्षसोंमें सबसे बड़ा था । जैसे पूर्वकालमें भगवान् नारायणने आकाशको नापने के लिये डग भरे थे, उसी प्रकार वह भी डग बढ़ाता जा रहा था । सजल जलधरके समान काला कुम्भकर्ण सोनेके बाजूबन्द से विभूषित था । उसे देखकर वानरोंकी वह विशाल सेना पुनः बड़े वेग से भागने लगी ॥ २-३ ॥
विद्रुतां वाहिनीं दृष्ट्रा वर्धमानं च राक्षसम् ।
सविस्मितमिदं रामो विभीषणमुवाच ह ॥ ४ ॥
अपनी सेनाको भागते तथा राक्षस कुम्भकर्णको बढ़ते देख श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा आश्चर्यं हुआ और उन्होंने विभीषणसे पूछा- ॥ ४ ॥
कोऽसौ पर्वतसंकाशः किरीटी हरिलोचनः ।
लङ्कायां दृश्यते वीरः सविद्युदिव तोयदः ॥ ५ ॥
" यह लङ्कापुरीमें पर्वत के समान विशालकाय वीर कौन है, जिसके मस्तकपर किरीट शोभा पाता है और नेत्र भूरे हैं? यह ऐसा दिखायी देता है मानो बिजलीसहित मेघ हो ॥ ५ ॥
पृथिव्यां केतुभूतोऽसौ महानेकोऽत्र दृश्यते ।
यं दृष्ट्रा वानराः सर्वे विद्रवन्ति ततस्ततः ॥ ६ ॥
' इस भूतलपर यह एकमात्र महान् ध्वज - सा दृष्टिगोचर होता है । इसे देखकर सारे वानर इधर - उधर भाग चले हैं ।
आचक्ष्व सुमहान् कोऽसौ रक्षो वा यदि वासुरः ।
न मयैवंविधं भूतं दृष्टपूर्व कदाचन ॥ ७ ॥
' विभीषण! बताओ । यह इतने बड़े डील - डौलका कौन पुरुष है? कोई राक्षस है या असुर १ मैंने ऐसे प्राणीको पहले कभी नहीं देखा था ' ॥ ७ ॥
सम्पृष्टो राजपुत्रेण रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
विभीषणो महाप्राज्ञः काकुत्स्थमिदमब्रवीत् ॥ ८ ॥
अनायास ही बड़े - बड़े कर्म करनेवाले राजकुमार श्रीरामने जब इस प्रकार पूछा, तब परम बुद्धिमान् विभीषणने उन ककुत्स्थ कुलभूषण रघुनाथजीसे इस प्रकार कहा- ॥ ८ ॥
येन वैवखतो युद्धे वासवश्च पराजितः ।
सैष विश्रवसः पुत्रः कुम्भकर्णः प्रतापवान् ।
अस्य प्रमाणसदृशो राक्षसोऽन्यो न विद्यते ॥ ९ ॥
' भगवन्! जिसने युद्ध में वैवस्वत यम और देवराज इन्द्रको भी पराजित किया था, वही यह विश्रवाका प्रतापी पुत्र कुम्भकर्ण है । इसके बराबर लंबा दूसरा कोई राक्षस नहीं है ॥ ९ ॥
एतेन देवा युधि दानवाश्च यक्षा भुजंगाः पिशिताशनाश्च । गन्धर्वविद्याधर किंनराश्च सहस्रशो राघव सम्प्रभग्नाः ॥ १० ॥
रघुनन्दन! इसने देवता, दानव, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरोंको सहस्रों बार युद्धमें मार भगाया है ॥ १० ॥
शूलपाणि विरूपाक्षं कुम्भकर्ण महाबलम् ।
हन्तुं न शेकुस्त्रिदशाः कालोऽयमिति मोहिताः ॥ ११ ॥
" इसके नेत्र बड़े भयंकर हैं । यह महाबली कुम्भकर्ण जब हाथमें शूल लेकर युद्धमें खड़ा हुआ, उस समय देवता
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युद्धकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः भी इसे मारनेमें समर्थं न हो सके । यह कालरूप है, ऐसा समझकर वे सब - के - सब मोहित हो गये थे ॥ ११ ॥
प्रकृत्या ह्येष तेजस्वी कुम्भकर्णो महाबलः ।
अन्येषां राक्षसेन्द्राणां वरदानकृतं बलम् ॥ १२ ॥
' कुम्भकर्णं स्वभावसे ही तेजस्वी और महाबलवान् है । अन्य राक्षसपतियोंके पास जो बल है, वह वरदान से प्राप्त हुआ है ॥ १२ ॥
बालेन जातमात्रेण क्षुधार्तेन महात्मना ।
भक्षितानि सहस्राणि प्रजानां सुबहून्यपि ॥ १३ ॥
' इस महाकाय राक्षसने जन्म लेते ही बाल्यावस्थामें भूख-से पीड़ित हो कई सहस्र प्रजाजनोंको खा डाला था ॥ १३ ॥
तेषु सम्भक्ष्यमाणेषु प्रजा भयनिपीडिताः ।
यान्ति स्म शरणं शक्रं तमप्यर्थं न्यवेदयन् ॥ १४ ॥
' जब सहस्रों प्रजाजन इसका आहार बनने लगे, तब भयसे पीड़ित हो वे सब के सब देवराज इन्द्रकी शरण में गये और उन सबने उनके समक्ष अपना कष्ट निवेदन किया ॥ १४ ॥
सकुम्भकर्ण कुपितो महेन्द्रो जघान वज्रेण शितेन वज्री । स शक्रवज्राभिहतो महात्मा चचाल कोपाच्च भृशं ननाद ॥ १५ ॥
" इससे वज्रधारी देवराज इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने अपने तीखे वज्रसे कुम्भकर्णको घायल कर दिया । इन्द्रके वज्रकी चोट खाकर यह महाकाय राक्षस क्षुब्ध हो उठा और रोषपूर्वक जोर - जोर से सिंहनाद करने लगा ॥ १५ ॥
तस्य नानद्यमानस्य कुम्भकर्णस्य रक्षसः ।
श्रुत्वा निनादं वित्रस्ताः प्रजा भूयो वितत्रसुः ॥ १६ ॥
' ' राक्षस कुम्भकर्णके बारंबार गर्जना करनेपर उसका भयंकर सिंहनाद सुनकर प्रजावर्ग के लोग भयभीत हो और भी डर गये ॥ १६ ॥
ततः क्रुद्धो महेन्द्रस्य कुम्भकर्णो महाबलः ।
निष्कृष्यैरावताद् दन्तं जघानोरसि वासवम् ॥ १७ ॥
' तदनन्तर कुपित हुए महाबली कुम्भकर्णने इन्द्र के ऐरावत-के मुँहसे एक दाँत उखाड़ लिया और उसीसे देवेन्द्रकी छाती-पर प्रहार किया || १७ ॥
कुम्भकर्णप्रहारार्तो विजज्वाल स वासवः ।
ततो विषेदुः सहसा देवा ब्रह्मर्षिदानवाः ॥ १८ ॥
' कुम्भकर्णके प्रहारसे इन्द्र व्याकुल हो गये और उनके हृदयमें जलन होने लगी । यह देखकर सब देवता, ब्रह्मर्षि और दानव सहसा विषादमें डूब गये ॥ १८ ॥
प्रजाभिः सह शक्रश्च ययौ स्थानं स्वयंभुवः । वा ० रा ० ५.९.१०-१२२५ कुम्भकर्णस्य दौरात्म्यं शशंसुस्ते प्रजापतेः ॥ १ ९ ॥ ' तत्पश्चात् इन्द्र उन प्रजाजनोंके साथ ब्रह्माजी के धाम में गये । वहाँ जाकर उन सबने प्रजापतिके समक्ष कुम्भकर्णकी दुष्टताका विस्तारपूर्वक वर्णन किया ॥ १ ९ ॥
प्रजानां भक्षणं चापि देवानां चापि धर्षणम् ।
आश्रमध्वंसनं चापि परस्त्रीहरणं भृशम् ॥ २० ॥
' इसके द्वारा प्रजा के भक्षण, देवताओंके घर्षण ( तिरस्कार ), ऋषियोंके आश्रमोंके विध्वंस तथा परायी स्त्रियोंके बारंबार हरण होने की भी बात बतायी ॥ २० ॥
एवं प्रजा यदि त्वेष भक्षयिष्यति नित्यशः ।
अचिरेणैव कालेन शून्यो लोको भविष्यति ॥ २१ ॥
' इन्द्र ने कहा - ' भगवन्! यदि यह नित्यप्रति इसी प्रकार प्रजाजनोंका भक्षण करता रहा तो थोड़े ही समय में सारा संसार सूना हो जायगा ॥ २१ ॥
वासवस्य वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः ।
रक्षांस्यावाहयामास कुम्भकर्ण ददर्श ह ॥ २२ ॥
' इन्द्रकी यह बात सुनकर सर्वलोकपितामह ब्रह्माने ब राक्षसोंको बुलाया और कुम्भकर्णसे भी भेंट की ॥ २२ ॥
कुम्भकर्ण समीक्ष्यैव वितत्रास प्रजापतिः ।
कुम्भकर्णमथाश्वास्तः स्वयंभूरिदमब्रवीत् ॥ २३ ॥
' कुम्भकर्णको देखते ही स्वयम्भू प्रजापति थर्रा उठे ।
फिर अपनेको सँभालकर वे उस राक्षससे बोले -- ॥ २३ ॥
ध्रुवं लोकविनाशाय पौलस्त्येनासि निर्मितः ।
तस्मात् त्वमद्यप्रभृति मृतकल्पः शयिष्यसे ॥ २४ ॥
" कुम्भकर्ण! निश्चय ही इस जगत्का विनाश करनेके लिये ही विश्रवाने तुझे उत्पन्न किया अतः मैं शाप देता हूँ, आजसे तू मुर्दे के समान सोता रहेगा ' ॥ २४ ॥
ब्रह्मशापाभिभूतोऽथ निपपाताग्रतः प्रभोः ।
ततः परमसम्भ्रान्तो रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ २५ ॥
' ब्रह्माजी के शापसे अभिभूत होकर वह रावणके सामने ही गिर पड़ा । इससे रावणको बड़ी घबराहट हुई और उसने कहा -- ॥ २५ ॥
प्रवृद्धः काञ्चनो वृक्षः फलकाले निकृत्यते ।
न नप्तारं स्वकं न्याय्यं शप्तुमेवं प्रजापते ॥ ६६ ॥
“ प्रजापते! अपने द्वारा लगाया और बढ़ाया हुआ सुवर्ण-रूप फल देनेवाला वृक्ष फल देनेके समय नहीं काटा जाता है । यह आपका नाती है, इसे इस प्रकार शाप देना कदापि उचित नहीं है ॥ २६ ॥
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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १२२६
त्वं स्वप्स्यत्येव न संशयः । विभीषणवचः श्रुत्वा हेतुमत् सुमुखोद्गतम् ।
न मिथ्यावचनश्च उवाच राघवो वाक्यं नीलं सेनापतिं तदा ॥ ३४ ॥
कालस्तु क्रियतामस्य शयने जागरे तथा ॥ २७ ॥
" आपकी बात कभी झूठी नहीं होती, इसलिये अब इसे सोना ही पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है; परंतु आप इसके सोने और जागनेका कोई समय नियत कर दें ॥ २७ ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा स्वयंभूरिदमब्रवीत् ।
शयिता ह्येष षण्मासमेकाहं जागरिष्यति ॥ २८ ॥
' रावणका यह कथन सुनकर स्वयम्भू ब्रह्माने कहा -- ' यह छः मास तक सोता रहेगा और एक दिन जगेगा ॥ २८ ॥
एकेनाह्ना त्वसौ वीरश्वरन् भूमिं बुभुक्षितः ।
व्यात्तास्यो भक्षयेल्लोकान् संवृद्ध इव पावकः ॥ २ ९ ॥
“ उस एक दिन ही यह वीर भूखा होकर पृथ्वीपर अग्निके समान मुँह फैलाकर बहुत - से विचरेगा और प्रज्वलित लोगोंको खा जायगा ' ॥ २ ९ ॥
सोऽसौ व्यसनमापन्नः कुम्भकर्णमबोधयत् ।
त्वत्पराक्रमभीतश्च राजा सम्प्रति रावणः ॥ ३० ॥
' महाराज! इस समय आपत्ति में पड़कर और आपके पराक्रमसे भयभीत होकर राजा रावणने कुम्भकर्णको जगाया है ॥ ३० ॥
स एष निर्गतो वीरः शिबिराद् भीमविक्रमः ।
भृशसंक्रुद्धो भक्षयन् परिधावति ॥ ३१ ॥
वानरान् विभीषणके सुन्दर मुखसे निकली हुई यह युक्तियुक्त बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने सेनापति नीलसे कहा- ॥ ३४ ॥
गच्छ सैन्यानि सर्वाणि व्यूह्य तिष्ठस्व पावके ।
द्वाराण्यादाय लङ्कायाश्चर्याश्चास्याथ संक्रमान् ॥ ३५ ॥
' अग्निनन्दन! जाओ, समस्त सेनाओंकी मोर्चेबंदी करके युद्धके लिये तैयार रहो और लङ्काके द्वारों तथा. राजमार्गों पर अधिकार जमाकर वहीं डटे रहो ॥ ३५ ॥
शैलशृङ्गाणि वृक्षांश्च शिलाश्चाप्युपसंहरन् ।
भवन्तः सायुधाः सर्वे वानराः शैलपाणयः ॥ ३६ ॥
' पर्वतोंके शिखर, वृक्ष और शिलाएँ एकत्र कर लो तथा और सब वानर अस्त्र - शस्त्र एवं पत्थर लिये तैयार रहो ' ॥ तुम
राघवेण समादिष्टो नीलो हरिचमूपतिः ।
शशास वानरानीकं यथावत् कपिकुञ्जरः ॥ ३७ ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह आज्ञा पाकर वानरसेनापति कपिश्रेष्ठ नीलने वानरसैनिकोंको यथोचित कार्यके लिये आदेश दिया ॥ ३७ ॥
ततो गवाक्षः शरभो हनूमानङ्गदस्तथा ।
शैलशृङ्गाणि शैलाभा गृहीत्वा द्वारमभ्ययुः ॥ ३८ ॥
तदनन्तर गवाक्ष, शरभ, हनुमान् और अङ्गद आदि पर्वताकार वानर पर्वतशिखर लिये लङ्काके द्वारपर डट ' यह भयानक पराक्रमी वीर अपने शिबिरसे निकला है । गये ॥ ३८ ॥
और अत्यन्त कुपित हो वानर्रोको खा जानेके लिये सब ओर दौड़ रहा है ॥ ३१ ॥
कुम्भकर्ण समीक्ष्यैव हरयोऽद्य प्रदुद्रुवुः ।
कथमेनं रणे क्रुद्धं वारयिष्यन्ति वानराः ॥ ३२ ॥
' जब कुम्भकर्णको देखकर ही आज सारे वानर भाग चले, तब रणभूमिमें कुपित हुए इस वीरको ये आगे बढ़नेसे कैसे रोक सकेंगे? ॥ ३२ ॥
उच्यन्तां वानराः सर्वे यन्त्रमेतत् समुच्छ्रितम् ।
इति विज्ञाय हरयो भविष्यन्तीह निर्भयाः ॥ ३३ ॥
रामवाक्यमुपश्रुत्य हरयो जितकाशिनः ।
पादपैरर्दयन् वीरा वानराः परवाहिनीम् ॥ ३ ९ ॥
विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वीर वानर श्रीरामचन्द्र-जीकी पूर्वोक्त आज्ञा सुनकर वृक्षोंद्वारा शत्रुसेनाको पीड़ित करने लगे ॥ ३ ९ ॥ ततो हरीणां तदनीकमुग्रं रराज शैलोद्यतवृक्षहस्तम् । गिरेः समीपानुगतं यथैव महन्महाम्भोधरजालमुग्रम् ॥ ४० ॥
यह कह दिया जाय कि यह कोई व्यक्ति तदनन्तर हाथोंमें शैल - शिखर और वृक्ष लिये वानरोंको ' सब वानरोंसे सेना पर्वतके समीप घिरी हुई मेघों की बड़ी भारी नहीं, कायाद्वारा निर्मित ऊँचा यन्त्रमात्र है । ऐसा जानकर वह भयंकर उग्र घटा समान सुशोभित होने लगी ॥ ४० ॥
वानर निर्भय हो जायँगे ' ॥ ३३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥ ६१ ॥
श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकसठवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ ६१ ॥
इस प्रकार
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युद्धकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः १२२७ द्विषष्टितमः सर्गः कुम्भकर्णका रावण के भवनमें प्रवेश तथा रावणका रामसे भय बताकर उसे शत्रु सेना के विनाशके लिये प्रेरित करना
स तु राक्षसशार्दूलो निद्रामदसमाकुलः ।
राजमार्ग श्रिया जुष्टं ययौ विपुलविक्रमः ॥ १ ॥
महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि कुम्भकर्ण निद्रा और मदसे व्याकुल हो अलसाया हुआ - सा शोभाशाली राजमार्गसे जा रहा था ॥ १ ॥
राक्षसानां सहस्रैश्च वृतः परमदुर्जयः ।
गृहेभ्यः पुष्पवर्षेण कीर्यमाणस्तदा ययौ ॥ २ ॥
वह परम दुर्जय वीर हजारों राक्षसोंसे घिरा हुआ यात्रा कर रहा था । सड़क के किनारेपर जो मकान थे, उनमेंसे उसके ऊपर फूल बरसाये जा रहे थे ॥ २ ॥
स हेमजालविततं भानुभास्वरदर्शनम् ।
ददर्श विपुलं रम्यं राक्षसेन्द्र निवेशनम् ॥ ३ ॥
उसने राक्षसराज रावणके रमणीय एवं विशाल भवनका दर्शन किया, जो सोनेकी जालीसे आच्छादित होनेके कारण सूर्यदेव के समान दीप्तिमान् दिखायी देता था ॥ ३ ॥
स तत्तदा सूर्य इवाभ्रजालं प्रविश्य रक्षोधिपतेर्निवेशनम् । ददर्श दूरेऽग्रजमासनस्थं स्वयंभुवं शक्र इवासनस्थम् ॥ ४ ॥
जैसे सूर्यं मेघोंकी घटामें छिप जायँ, उसी प्रकार कुम्भकर्णने राक्षसराजके महलमें प्रवेश किया और राजसिंहासनपर बैठे हुए अपने भाईको दूरसे ही देखा, मानो देवराज इन्द्रने दिव्य कमलासनपर विराजमान स्वयम्भू ब्रह्माका दर्शन किया हो ॥ ४ ॥
भ्रातुः स भवनं गच्छन् रक्षोगणसमन्वितः ।
कुम्भकर्णः पदन्यासैरकम्पयत मेदिनीम् ॥ ५ ॥
राक्षसोंसहित कुम्भकर्णं अपने भाईके भवनमें जाते समय जब - जब एक - एक पैर आगे बढ़ाता था, तब - तब पृथ्वी काँप उठती थी ॥ ५ ॥
सोऽभिगम्य गृहं भ्रातुः कक्ष्यामभिविगाह्य च ।
ददर्शोद्विग्नमासीनं विमाने पुष्पके गुरुम् ॥ ६ ॥
भाई के भवनमें जाकर जब वह भीतरकी कक्षा में प्रविष्ट हुआ, तब उसने अपने बड़े भाईको उद्विग्न अवस्थामें पुष्पक विमानपर विराजमान देखा ॥ ६ ॥
अथ दृष्ट्वा दशग्रीवः कुम्भकर्णमुपस्थितम् ।
तूर्णमुत्थाय संहृष्टः संनिकर्षमुपानयत् ॥ ७ ॥
कुम्भकर्णको उपस्थित देख दशमुख रावण तुरंत उठकर खड़ा हो गया और बड़े हर्ष के साथ उसे अपने समीप बुला लिया ॥ ७ ॥
अथासीनस्य पर्यङ्के कुम्भकर्णो महाबलः ।
भ्रातुर्ववन्दे चरणौ किं कृत्यमिति चाब्रवीत् ॥ ८ ॥
महाबली कुम्भकर्णने सिंहासनपर बैठे हुए अपने भाईके चरणोंमें प्रणाम किया और पूछा — ' कौन - सा कार्यं आ पड़ा है? ' ॥ ८ ॥
उत्पत्य चैनं मुदितो रावणः परिषस्वजे ।
स भ्रात्रा सम्परिष्वको यथावच्चाभिनन्दितः ॥ ९ ॥
रावणने उछलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ कुम्भकर्णको हृदयसे लगा लिया । भाई रावणने उसका आलिंगन करके यथावत् रूपसे अभिनन्दन किया ॥ ९ ॥
कुम्भकर्णः शुभं दिव्यं प्रतिपेदे वरासनम् ।
स तदासनमाश्रित्य कुम्भकर्णो महाबलः ॥ १० ॥
संरक्तनयनः क्रोधाद् रावणं वाक्यमब्रवीत् । इसके बाद कुम्भकर्ण सुन्दर दिव्य सिंहासनपर बैठा । उस आसनपर बैठकर महाबली कुम्भकर्णने क्रोधसे लाल आँखें किये रावणसे पूछा- ॥ १०३ ॥
किमर्थमहमादृत्य त्वया राजन् प्रबोधितः ॥ ११ ॥
शंस कस्माद् भयं तेऽत्र को वा प्रेतो भविष्यति । ' राजन्! किस लिये तुमने बड़े आदरके साथ मुझे जगाया है? बताओ, यहाँ तुम्हें किससे भय प्राप्त हुआ है? अथवा कौन परलोकका पथिक होनेवाला है ११ ॥ ११३ ॥
भ्रातरं रावणः क्रुद्धं कुम्भकर्णमवस्थितम् ॥ १२ ॥
रोषेण परिवृत्ताभ्यां नेत्राभ्यां वाक्यमब्रवीत् । तब रावण अपने पास बैठे हुए कुपित भाई कुम्भकर्णसे रोषसे चञ्चल आँखें किये बोला – ॥ १२३ ॥
अद्य ते सुमहान् कालः शयानस्य महाबल ॥ १३ ॥
सुषुप्तस्त्वं न जानीषे मम रामकृतं भयम् । ' महाबली वीर! तुम्हारे सोये - सोये दीर्घकाल व्यतीत हो गया । तुम गाढ़ निद्रामें निमग्न होनेके कारण नहीं जानते कि मुझे रामसे भय प्राप्त हुआ है ॥ १३३ ॥
एष दाशरथिः श्रीमान् सुग्रीवसहितो बली ॥ १४ ॥
समुद्रं लङ्घयित्वा तु मूलं नः परिकृन्तति । “ ये दशरथकुमार बलवान् श्रीमान् राम सुग्रीवके साथ
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श्रीमवाल्मीकीय रामायणे १२२८ समुद्र लाँचकर यहाँ आये हैं और हमारे कुलका विनाश कर रहे हैं ॥ १४३ ॥
हन्त पश्यस्व लङ्कायां वनान्युपवनानि च ॥ १५ ॥
सेतुना सुखमागत्य वानरैकार्णवं कृतम् । ‘ हाय! देखो तो सही, समुद्रमें पुल बाँधकर सुखपूर्वक यहाँ आये हुए वानरोंने लङ्काके समस्त वनों और उपवनोंको बना दिया है — यहाँ वानररूपी जलका समुद्र - सा एकार्णवमय लहरा रहा है || १५३ ॥ ये राक्षसा मुख्यतमा हतास्ते वानरैर्युधि ॥ १६ ॥
वानराणां क्षयं युद्धे न पश्यामि कथंचन ।
न चापि वानरा युद्धे जितपूर्वाः कदाचन ॥ १७ ॥
हमारे ' मुख्य - मुख्य राक्षस वीर थे, उन्हें वानरोंने युद्धमें मार डाला; किंतु रणभूमिमें वानरोंका संहार होता मुझे किसी तरह नहीं दिखायी देता । युद्धमें कभी कोई वानर पहले जीते नहीं गये हैं ॥ १६-१७ ॥
तदेतद् भयमुत्पन्नं त्रायस्वेह महाबल ।
नाशय त्वमिमानद्य तदर्थ बोधितो भवान् ॥ १८ ॥
' महाबली वीर! इस समय हमारे ऊपर यही भय उपस्थित है । तुम इससे हमारी रक्षा करो और आज इन वानरोंको हुआ नष्ट कर दो ॥ इसीलिये हमने तुम्हें जगाया है ॥ १८ ॥
सर्वक्षपितकोशं च स त्वमभ्युपपद्य माम् ।
त्रायस्वेमां पुरीं लङ्कां बालवृद्धावशेषिताम् ॥ १ ९ ॥
' हमारा सारा खजाना खाली हो गया है; अतः मुझपर अनुग्रह करके तुम इस लङ्कापुरीकी रक्षा करो; अब यहाँ केवल बालक और वृद्ध ही शेष रह गये हैं ॥ १ ९ ॥
भ्रातुरर्थे महाबाहो कुरु कर्म सुदुष्करम् ।
मयैवं नोक्तपूर्वो हि भ्राता कश्चित् परंतप ॥ २० ॥
' महाबाहो! तुम अपने इस भाईके लिये अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करो । परंतप! आजसे पहले कभी किसी भाई से मैंने ऐसी अनुनय - विनय नहीं की थी ॥ २० ॥
त्वय्यस्ति मम च स्नेहः परा सम्भावना च मे ।
युद्धेषु बहुशो राक्षसर्षभ ॥ २१ ॥
देवासुरेषु निर्जिताश्चासुरा युधि ॥ २२ ॥
त्वया देवाः प्रतिव्यूह्य ' तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा स्नेह है और मुझे तुमसे बड़ी आशा है । राक्षसशिरोमणे! तुमने देवासुर संग्राम के अवसरों-पर अनेक बार प्रतिद्वन्द्वीका स्थान लेकर रणभूमिमें देवताओं और असुरों को भी परास्त किया है ॥ २१-२२ ॥
तदेतत् सर्वमातिष्ठ वीर्य भीमपराक्रम ।
नहि ते सर्वभूतेषु दृश्यते सदृशो बली ॥ २३ ॥
' अतः भयंकर पराक्रमी वीर! तुम्हीं यह सारा पराक्रम-पूर्ण कार्य सम्पन्न करो; क्योंकि समस्त प्राणियोंमें तुम्हारे समान बलवान् मुझे दूसरा कोई नहीं दिखायी देता है ॥ २३ ॥
कुरुष्व मे प्रियहितमेतदुत्तमं यथाप्रियं प्रियरण बान्धवप्रिय । स्वतेजसा व्यथय सपत्नवाहिनीं शरद्धनं पवन इवोद्यतो महान् ॥ २४ ॥
' तुम युद्धप्रेमी तो हो ही, अपने बन्धु बान्धवोंसे भी बड़ा प्रेम रखते हो । इस समय तुम मेरा यही प्रिय और उत्तम हित करो । अपने तेजसे शत्रुओंकी सेनाको उसी तरह व्यथित कर दो, जैसे वेगसे उठी हुई प्रचण्ड वायु शरद् ऋतुके बादलोंको छिन्न - भिन्न कर देती है ' ॥ २४ ॥
वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥ ६२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित त्रिषष्टितमः सर्गः रावणको उसके कुकृत्योंके लिये उपालम्भ देना और उसे कुम्भकर्णका धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना
तस्य राक्षसराजस्य निशम्य परिदेवितम् ।
कुम्भकर्णो वभाषेदं वचनं प्रजहास च ॥
राक्षसराज रावणका यह विलाप सुनकर कुम्भकर्ण मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला ॥ १ ॥
दृष्टो दोषो हि योऽस्माभिः पुरा मन्त्रविनिर्णये ।
हितेष्वनभियुक्तेन सोऽयमासादितस्त्वया ॥
' भाईसाहब! पहले ( विभीषण आदिके साथ ) करते समय हमलोगोंने जो दोष देखा था, वही तुम्हें इस १ ॥ समय प्राप्त हुआ है; क्योंकि तुमने हितै त्री पुरुषों और उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया था ॥ २ ॥
ठहाका
शीघ्रं खल्वभ्युपेतं त्वां फलं पापस्य कर्मणः ।
निरयेष्वेव पतनं यथा दुष्कृतकर्मणः ॥ ३ ॥
२ ॥ ' तुम्हें शीघ्र ही अपने पापकर्म का फल मिल गया । जैसे विचार कुकर्मी पुरुषोंका नरकोंमें पड़ना निश्चित है, उसी प्रकार
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युद्धकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः १२२ ९ तुम्हें भी अपने दुष्कर्मका फल मिलना अवश्यम्भावी था ॥
प्रथमं वै महाराज कृत्यमेतदचिन्तितम् ।
केवलं वीर्यदर्पण नानुबन्धो विचारितः ॥ ४ ॥
' महाराज! केवल बलके घमंडसे तुमने पहले इस पाप-कर्मकी कोई परवा नहीं की । इसके परिणामका कुछ भी विचार नहीं किया था ॥ ४ ॥
यः पश्चात्पूर्वकार्याणि कुर्यादैश्वर्यमास्थितः ।
पूर्व चोत्तरकार्याणि न स वेद नयानयौ ॥ ५ ॥
' जो ऐश्वर्य के अभिमानमें आकर पहले करनेयोग्य कार्योंको पीछे करता है और पीछे करनेयोग्य कार्योंको पहले कर डालता है, वह नीति तथा अनीतिको नहीं जानता है ॥ ५ ॥
देशकालविहीनानि कर्माणि विपरीतवत् ।
क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥ ६ ॥
‘ जो कार्यं उचित देश - काल न होनेपर विपरीत स्थिति में किये जाते हैं, वे संस्कारहीन अग्नियोंमें होमे गये हविष्य की भाँति केवल दुःखके ही कारण होते हैं ॥ ६ ॥
त्रयाणां पञ्चधा योगं कर्मणां यः प्रपद्यते ।
सचिवैः समयं कृत्वा स सम्यग् वर्तते पथि ॥ ७ ॥
' जो राजा सचिवोंके साथ विचार करके क्षय, वृद्धि और स्थानरूपसे उपलक्षित साम, दान और दण्ड – इन तीनों कर्मोंके पाँच प्रकारके प्रयोगको काममें लाता है, वही उत्तम नीति मार्गपर विद्यमान है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ७ ॥
यथागमं च यो राजा समयं च चिकीर्षति ।
बुध्यते सचिवैर्बुद्धया सुहृदश्चानुपश्यति ॥ ८ ॥
" जो नरेश नीतिशास्त्र के अनुसार मन्त्रियोंके साथ क्षयं आदिके लिये उपयुक्त समयका विचार करके तदनुरूप कार्यं करता है और अपनी बुद्धिसे सुहृदोंकी भी पहचान कर लेता है, वही कर्तव्य और अकर्तव्यका विवेक कर पाता है ॥ ८ ॥
धर्ममर्थ हि कामं वा सर्वान् वा रक्षसां पते ।
भजेत पुरुषः काले त्रीणि द्वन्द्वानि वा पुनः ॥ ९ ॥
' राक्षसराज! नीतिज्ञ पुरुषको चाहिये कि धर्म, अर्थ या कामका अथवा सबका अपने समयपर सेवन करे अथवा १. कार्यको आरम्भ करनेका उपाय, पुरुष और द्रव्यरूप सम्पत्ति, देश - कालका विभाग, विपत्तिको टालने का उपाय और कार्य की सिद्धि – ये पाँच प्रकारके योग हैं । २. जब अपनी वृद्धि और शत्रुकी हानिका समय हो तब दण्डोपयोगी यान ( युद्धयात्रा ) उचित है । अपनी और शत्रुकी समान स्थिति हो तो सामपूर्वक संधि कर लेना उचित है । तथा जब अपनी हानि और शत्रु की वृद्धिका समय हो, तब उसे कुछ देकर उसका आश्रय ग्रहण करना उचित होता है । तीनों द्वन्द्वोंका - धर्म - अर्थ, अर्थ - धर्म और काम - अर्थं इन सबका भी उपयुक्त समय में ही सेवन करे * ॥ ९ ॥
त्रिषु चैतेषु यच्छ्रेष्ठं श्रुत्वा तन्नावबुध्यते ।
राजा वा राजमात्रो वा व्यर्थ तस्य बहुश्रुतम् ॥ १० ॥
' धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंमें धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः विशेष अवसरोंपर अर्थ और कामकी उपेक्षा करके भी धर्मका ही सेवन करना चाहिये- इस बातको विश्वसनीय पुरुषों-से सुनकर भी जो राजा या राजपुरुष नहीं समझता अथवा समझकर भी स्वीकार नहीं करता, उसका अनेक शास्त्रोंका अध्य व्यर्थ ही है ॥ १० ॥
उपप्रदानं सान्त्वं च भेदं काले च विक्रमम् ।
योगं च रक्षसां श्रेष्ठ तावुभौ च नयानयौ ॥ ११ ॥
काले धर्मार्थकामान् यः सम्मन्त्र्य सचिवैः सह ।
निषेवेतात्मवाँल्लोके न स व्यसनमाप्नुयात् ॥ १२ ॥
' राक्षसशिरोमणे! जो मनस्वी राजा मन्त्रियोंसे अच्छी तरह सलाह करके समय के अनुसार दान, भेद और पराक्रमका, इनके पूर्वोक्त पाँच प्रकारके योगका, नय और अनयका तथा ठीक समयपर धर्म, अर्थ और कामका सेवन करता है, वह इस लोकमें कभी दुःख या विपत्तिका भागी नहीं होता ११-१२
हितानुबन्धमालोक्य कुर्यात् कार्यमिहात्मनः ।
राजा सहार्थतत्त्वज्ञैः सचिवैर्बुद्धिजीविभिः ॥ १३ ॥
" राजाको चाहिये कि वह अर्थतत्त्वज्ञ एवं बुद्धिजीवी मन्त्रियोंकी सलाह लेकर जो अपने लिये परिणाममें हितकर दिखायी देता हो, वही कार्य करे ॥ १३ ॥
अनभिज्ञाय शास्त्रार्थान् पुरुषाः पशुबुद्धयः ।
प्रागल्भ्याद् वक्तुमिच्छन्ति मन्त्रिष्वभ्यन्तरीकृताः ॥ १४ ॥
" जो पशु के समान बुद्धिवाले किसी तरह मन्त्रियोंके भीतर सम्मिलित कर लिये गये हैं, वे शास्त्र के अर्थको तो जानते नहीं, केवल धृष्टतावश बातें बनाना चाहते हैं ॥ १४ ॥
अशास्त्रविदुषां तेषां कार्य नाभिहितं वचः ।
अर्थशास्त्रानभिज्ञानां विपुलां श्रियमिच्छताम् ॥ १५ ॥
" शास्त्र के ज्ञानसे शून्य और अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ होते हुए भी प्रचुर सम्पत्ति चाहनेवाले उन अयोग्य मन्त्रियोंकी कही हुई बात कभी नहीं माननी चाहिये ॥ १५ ॥
* यहाँ यह बात कही गयी है कि शास्त्र के अनुसार प्रातः काल धर्मका, मध्याह्नकालमें अर्थका और रात्रिमें कामसेवनका विधान है; अतः उन - उन समयोंमें धर्म आदिका सेवन करना चाहिये अथवा प्रातः काल में धर्म और अर्थरूप द्वन्द्वका, मध्याह्नकालमें अर्थ और धर्म-का और रात्रिमें काम और अर्थका सेवन करे । जो हर समय केवल कामका ही सेवन करता है, वह पुरुषों में अधम कोटिका है ।
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१२३० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
अहितं च हिताकारं धाष्टर्याज्जल्पन्ति ये नराः ।
अवश्यं मन्त्रबाह्यास्ते कर्तव्याः कृत्यदूषकाः ॥ १६ ॥
' जो लोग धृष्टताके कारण अहितकर बातको हितका रूप देकर कहते हैं, वे निश्चय ही सलाह लेने योग्य नहीं हैं । अतः उन्हें इस कार्य से अलग कर देना चाहिये । वे तो काम बिगाड़नेवाले ही होते हैं ॥ १६ ॥
विनाशयन्तो भर्तारं सहिताः शत्रुभिर्बुधैः ।
विपरीतानि कृत्यानि कारयन्तीहि मन्त्रिणः ॥ १७ ॥
" कुछ बुरे मन्त्री साम आदि उपायोंके ज्ञाता शत्रुओंके साथ मिल जाते हैं और अपने स्वामीका विनाश करनेके लिये ही उससे विपरीत कर्म करवाते हैं ॥ १७ ॥
तान् भर्ता मित्रसंकाशानमित्रान् मन्त्रनिर्णये ।
व्यवहारेण जानीयात् सचिवानुपसंहितान् ॥ १८ ॥
' जब किसी वस्तु या कार्यके निश्चयके लिये मन्त्रियोंकी सलाह ली जा रही हो, उस समय राजा व्यवहारके द्वारा ही उन मन्त्रियों को पहचानने का प्रयत्न करे, जो घूस आदि लेकर शत्रुओंसे मिल गये हैं और अपने मित्र से बने रहकर वास्तव में शत्रुका काम करते हैं ॥ १८ ॥
चपलस्येह कृत्यानि सहसानुप्रधावतः ।
छिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः ॥ १ ९ ॥
' जो राजा चञ्चल है – आपातरमणीय वचनोंको सुनकर ही संतुष्ट हो जाता है और सहसा बिना सोचे - विचारे ही किसी भी कार्य की ओर दौड़ पड़ता है, उसके इस छिद्र ( दुर्बलता ) को शत्रुलोग उसी तरह ताड़ जाते हैं, जैसे क्रौञ्च पर्वतके छेद-मान्यो गुरुरिवाचार्यः किं मां त्वमनुशाससे । किमेवं वाक्श्रमं कृत्वा यद् युक्तं तद् विधीयताम् ॥ २३ ॥
' तुम माननीय गुरु और आचार्यकी भाँति मुझे उपदेश क्यों दे रहे हो? इस तरह भाषण देनेका परिश्रम करनेसे क्या लाभ होगा? इस समय जो उचित और आवश्यक हो, वह काम करो ॥ २३ ॥
विभ्रमाश्चित्तमोहाद् वा बलवीर्याश्रयेण वा ।
नाभिपन्नमिदानीं यद् व्यर्था तस्य पुनः कथा ॥ २४ ॥
" मैंने भ्रमसे, चित्तके मोहसे अथवा अपने बल पराक्रम के भरोसे पहले जो तुमलोगों की बात नहीं मानी थी, उसकी इस समय पुनः चर्चा करना व्यर्थ है ॥ २४ ॥
अस्मिन् काले तु यद् युक्तं तदिदानीं विचिन्त्यताम् ।
गतं तु नानुशोचन्ति गतं तु गतमेव हि ॥ २५ ॥
ममापनयजं दोषं विक्रमेण समीकुरु । " जो बात बीत गयी, सो तो बीत ही गयी । बुद्धिमान् लोग बीती बात के लिये बारंबार शोक नहीं करते हैं । अब इस समय हमें क्या करना चाहिये, इसका विचार करो । अपने पराक्रमसे मेरे अनीतिजनित दुःखको शान्त कर दो ॥ २५३ ॥
यदि खल्वस्ति मे स्नेहो विक्रमं वाधिगच्छसि ॥ २६ ॥
यदि कार्य ममैतत्ते हृदि कार्यतमं मतम् । ' यदि मुझपर तुम्हारा स्नेह है, यदि अपने भीतर यथेष्ट पराक्रम समझते हो और यदि मेरे इस कार्यको परम कर्तव्य समझकर हृदयमें स्थान देते हो युद्ध करो ॥ २६३ ॥
स सुहृद् यो विपन्नार्थे दीनमभ्युपपद्यते ॥ २७ ॥
को पक्षी । ( क्रौञ्चपर्वतके छेदसे होकर पक्षी जैसे पर्वतके उस स बन्धुर्योऽपनीतेषु साहाय्यायोपकल्पते । पार आते - जाते हैं, उसी तरह शत्रु भी राजाके उस छिद्र या ' वही सुहृद् है, जो सारा कार्य नष्ट हो जानेसे दुखी हुए कमजोरीसे लाभ उठाते हैं ) ॥ १ ९ ॥ स्वजनपर अकारण अनुग्रह करता है तथा वही बन्धु है, जो यो हि शत्रुमवज्ञाय आत्मानं नाभिरक्षति । अनीतिके मार्गपर चलनेसे संकटमें पड़े हुए पुरुषोंकी सहायता अवाप्नोति हि सोऽनर्थान् स्थानाच्च व्यवरोप्यते ॥ २० ॥ करता है ' ॥ २७३ ॥
" जो राजा शत्रु की अवहेलना करके अपनी रक्षाका प्रबन्ध तमथैवं ब्रुवाणं स वचनं धीरदारुणम् ॥ २८ ॥
नहीं करता है, वह अनेक अनर्थों का भागी होता और अपने रुष्टोऽयमिति विज्ञाय शनैः लक्ष्णमुवाच ह । स्थान ( राज्य ) से नीचे उतार दिया जाता है ॥ २० ॥ रावणको इस प्रकार धीर एवं दारुण वचन बोलते देख
यदुक्तमिह ते पूर्व प्रियया मेऽनुजेन च । उसे रुष्ट समझकर कुम्भकर्ण धीरे - धीरे मधुर वाणीमें कुछ तदेव नो हितं वाक्यं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २१ ॥ कहनेको उद्यत हुआ ॥ २८३ ॥
' तुम्हारी प्रिय पत्नी मन्दोदरी और मेरे छोटे भाई अतीव हि समालक्ष्य भ्रातरं क्षुभितेन्द्रियम् ॥ २ ९ ॥ विभीषणने पहले तुमसे जो कुछ कहा था, वही हमारे लिये कुम्भकर्णः शनैर्वाक्यं बभाषे परिसान्त्वयन् । हितकर था । यों तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो ' ॥ २१ ॥ उसने देखा मेरे भाईकी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त विक्षुब्ध
तु श्रुत्वा दशग्रीवः कुम्भकर्णस्य भाषितम् । हो उठी हैं; अतः कुम्भकर्णने धीरे - धीरे उसे सान्त्वना देते तत् भ्रुकुटिं चैव संचक्रे क्रुद्धश्चैनमभाषत ॥ २२ ॥ हुए कहा ॥ २ ९ ३ ॥
यह बात सुनकर दशमुख रावणने भौंहें शृणु राजन्नवद्दितो मम वाक्यमरिंदम ॥ ३० ॥
टेढ़ी कर कुम्भकर्णकी लीं और कुपित होकर उससे कहा- ॥ २२ ॥ अलं राक्षसराजेन्द्र संतापमुपपद्य ते ।
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युद्धकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः १२३१ रोषं च सम्परित्यज्य स्वस्थो भवितुमर्हसि ॥ ३१ ॥ ' आज पर्वत के समान विशालकाय वानरराज सुग्रीवको
' शत्रुदमन महाराज! सावधान होकर मेरी बात सुनो । समराङ्गणमें खून से लथपथ होकर गिरे हुए देखोगे, जो सूर्य-राक्षसराज! संताप करना व्यर्थ है । अब तुम्हें रोष त्यागकर सहित मेघ के समान दृष्टिगोचर होंगे ॥ ३ ९ ॥ स्वस्थ हो जाना चाहिये ॥ ३०-३१ ॥
नैतन्मनसि कर्तव्यं मयि जीवति पार्थिव ।
तमहं नाशयिष्यामि यत् कृते परितप्यते ॥ ३२ ॥
' पृथ्वीनाथ! मेरे जीते - जी तुम्हें मनमें ऐसा भाव नहीं लाना चाहिये । तुम्हें जिसके कारण संतप्त होना पड़ रहा है, उसे मैं नष्ट कर दूँगा ॥ ३२ ॥
अवश्यं तु हितं वाच्यं सर्वावस्थं मया तव ।
बन्धुभावादभिहितं भ्रातृस्नेहाच पार्थिव ॥ ३३ ॥
' महाराज! अवश्य ही सब अवस्थाओं में मुझे तुम्हारे हितकी बात कहनी चाहिये । अतः मैंने बन्धुभाव और भ्रातृ-स्नेहके कारण ही ये बातें कही हैं ॥ ३३ ।
सदृशं यच्च कालेऽस्मिन् कर्तुं स्नेहेन बन्धुना ।
शत्रूणां कदनं पश्य क्रियमाणं मया रणे ॥ ३४ ॥
" इस समय एक भाईको स्नेहवश जो कुछ करना उचित है, वही करूँगा । अब रणभूमिमें मेरे द्वारा किया जानेवाला शत्रुओंका संहार देखो ॥ ३४ ॥
अद्य पश्य महाबाहो मया समरमूर्धनि ।
हते रामे सह भ्रात्रा द्रवन्तीं हरिवाहिनीम् ॥ ३५ ॥
‘ महाबाहो! आज युद्धके मुहानेपर मेरे द्वारा भाईसहित रामके मारे जानेके पश्चात् तुम देखोगे कि वानरोंकी सेना किस तरह भागी जा रही है ॥ ३५ ॥
अद्य रामस्य तद् दृष्ट्वा मयाऽऽनीतं रणाच्छिरः ।
सुखी भव महाबाहो सीता भवतु दुःखिता ॥ ३६ ॥
' महाबाहो! आज मैं संग्रामभूमिसे रामका सिर काट लाऊँगा । उसे देखकर तुम सुखी होना और सीता दुःखमें डूब जायगी ॥ ३६ ॥
अद्य रामस्य पश्यन्तु निधनं सुमहत् प्रियम् ।
लङ्कायां राक्षसाः सर्वे ये ते निहतबान्धवाः ॥ ३७ ॥
' लङ्कामें जिन राक्षसोंके सगे - सम्बन्धी मारे गये हैं, वे भी आज रामकी मृत्यु देख लें । यह उनके लिये बहुत ही प्रिय बात होगी ॥ ३७ ॥
अद्य शोकपरीतानां स्वबन्धुवधशोचिनाम् ।
शत्रोर्युधि विनाशेन करोम्यश्रुप्रमार्जनम् ॥ ३८ ॥
' अपने भाई - बन्धुओंके मारे जानेसे जो लोग अत्यन्त शोक में डूबे हुए हैं, आज युद्धमें शत्रुका नाश करके मैं उनके आँसू पोंछूंगा ॥ ३८ ॥
अद्य पर्वतसंकाशं ससूर्यमिव तोयदम् ।
विकीर्ण पश्य समरे सुग्रीवं प्लवगेश्वरम् ॥ ३ ९ ॥
कथं च राक्षसैरेभिर्मया च परिसान्त्वितः ।
जिघांसुभिर्दाशरथिं व्यथसे त्वं सदानघ ॥ ४० ॥
' निष्पाप निशाचरराज! ये राक्षस तथा मैं सब लोग दशरथपुत्र रामको मार डालने की इच्छा रखते हैं और तुम्हें इस बात के लिये आश्वासन देते हैं तो भी तुम सदा व्यथित क्यों रहते हो? ॥ ४० ॥
मां निहत्य किल त्वां हि निहनिष्यति राघवः ।
नाहमात्मनि संतापं गच्छेयं राक्षसाधिप ॥ ४१ ॥
' राक्षसराज! पहले मेरा वध करके ही राम तुम्हें मार सकेंगे; किंतु मैं अपने विषय में रामसे संताप या भय नहीं मानता ॥ ४१ ॥
कामं त्विदानीमपि मां व्यादिश त्वं परंतप ।
न परः प्रेक्षणीयस्ते युद्धायातुलविक्रम ॥ ४२ ॥
' शत्रुओं को संताप देनेवाले अनुपम पराक्रमी वीर! इस समय तुम इच्छानुसार मुझे युद्धके लिये आदेश दो । शत्रुओंसे जूझनेके लिये तुम्हें दूसरे किसीकी ओर देखनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४२ ॥
अहमुत्सादयिष्यामि शत्रूंस्तव महाबलान् ।
यदि शक्रो यदि यमो यदि पावकमारुतौ ॥ ४३ ॥
योधयिष्यामि कुबेरवरुणावपि । ' तुम्हारे महाबली शत्रु यदि इन्द्र, यम, अग्नि, वायु, कुबेर और वरुण भी हों तो मैं उनसे भी युद्ध करूँगा तथा उन सबको उखाड़ फेंकूँगा ॥ ४३३ ॥
गिरिमात्रशरीरस्य शितशूलधरस्य मे ॥ ४४ ॥
नर्दतस्तीक्ष्णदंष्ट्रस्य बिभीयाद् वै पुरंदरः । ' मेरा पर्वतके समान विशाल शरीर है । मैं हाथमें तीखा
त्रिशूल धारण करता हूँ और मेरी दाढ़े भी बहुत तीखी हैं ।
मेरे सिंहनाद करनेपर इन्द्र भी भयसे थर्रा उठेंगे ॥ ४४३ ॥
अथ वा त्यक्तशस्त्रस्य मृद्गतस्तरसा रिपून् ॥ ४५ ॥
न मे प्रतिमुखः कश्चित् स्थातुं शक्तो जिजीविषुः । ' अथवा यदि मैं शस्त्र त्याग करके भी वेगपूर्वक शत्रुओं-को रौंदता हुआ रणभूमि में विचरने लगू तो कोई भी जीवित
रहने की इच्छावाला पुरुष मेरे सामने नहीं ठहर सकता । ४५३ ।
नैव शक्त्या न गदया नासिना निशितैः शरैः ॥ ४६ ॥
हस्ताभ्यामेव संरभ्य हनिष्यामि सवज्रिणम् । " मैं न तो शक्तिसे, न गदासे, न तलवारसे और न पैने बाणोंसे ही काम लूँगा । रोषसे भरकर केवल दोनों हाथोंसे ही वज्रधारी इन्द्र- जैसे शत्रुको भी मौतके घाट उतार दूँगा । ४६३ ।