Ramayana 2 — पृष्ठ 451–460

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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१२५२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ततस्तु वातोद्धतमेघकल्पं भुजंगराजोत्तमभोगबाहुः 1 तमापतन्तं धरणीधराभ-मुवाच रामो युधि कुम्भकर्णम् ॥१४३ ॥

तदनन्तर जिनकी भुजाएँ नागराज वासुकिके समान विशाल और मोटी थीं, उन भगवान् श्रीरामने पवनकी प्रेरणा-न वेद्मि संयुगे सक्तः स्वान् परान् वा निशाचर । रक्षणीयोऽसि मे वत्स सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥

एवमुक्तो वचस्तेन कुम्भकर्णेन धीमता ।

विभीषणो महाबाहुः कुम्भकर्णमुवाच ह ॥

गदितं मे कुलस्यास्य रक्षणार्थ मरिंदम ।

न श्रुतं सर्वरक्षोभिस्ततोऽहं राममागतः ॥

कृतं तु तन्महाभाग सुकृतं दुष्कृतं तु वा ।

एवमुक्त्वाश्रुपूर्णाक्षो गदापाणिर्विभीषणः ।

एकान्तमाश्रितो भूत्वा चिन्तयामास संस्थितः ॥

तब श्रीरामचन्द्रजी के लिये युद्ध करनेके निमित्त गदा हाथमें लिये विभीषण उनके आगे आकर खड़े हो गये और उस युद्धस्थल-में भाई होकर भाईका सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आगे बढ़े । विभीषणको सामने देखकर कुम्भकर्ण ने इस प्रकार कहा-' वत्स! तुम भाईका स्नेह छोड़कर श्रीरघुनाथजीका प्रिय करो और रणभूमिमें शीघ्र मेरे ऊपर गदा चलाओ । इस समय तुम क्षात्रधर्म में दृढ़तापूर्वक स्थिर रहो । तुम जो श्रीरामको शरणमें आ गये, इससे तुमने हमलोगोंका कान बना दिया । राक्षसोंमें एक तुम्हीं ऐसे हो, जिसने इस जगत् में सत्य और धर्मकी रक्षा की है । जो धर्ममें अनुरक्त होते हैं, उन्हें कभी कोई दुःख नहीं भोगना पड़ता है । अब एकमात्र तुम्हीं इस कुलकी संतानपरम्पराको सुरक्षित -रखनेके लिये जीवित रहोगे । श्रीरघुनाथजीकी कृपासे तुम्हें राक्षसों-का राज्य प्राप्त होगा । दुर्जय वीर! मेरी प्रकृतिसे तो तुम परिचित ही हो; अतः शीघ्र मेरा रास्ता छोड़कर दूर हट जाओ । इस समय सम्भ्रमके कारण मेरी विचारशक्ति नष्ट हो गयी है; अतः तुम्हें मेरे सामने नहीं खड़ा होना चाहिये । निशाचर! इस समय युद्धमें आसक्त होनेके कारण मुझे अपने अथवा परायेकी पहचान नहीं हो रही है, तथापि वत्स! तुम मेरे लिये रक्षणीय हो— मैं तुम्हारा वध करना नहीं चाहता । यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ । ' बुद्धिमान् कुम्भकर्णके ऐसा कहनेपर महाबाहु विभीषणने उससे कहा-' शत्रुओं का दमन करनेवाले वीर! मैंने इस कुलकी रक्षाके लिये बहुत कुछ कहा था; किंतु समस्त राक्षसोंने मेरी बात नहीं सुनी; अतः मैं निराश होकर श्रीरामकी शरणमें आ गया । महाभाग! यह मेरे लिये पुण्य हो या पाप । अव मैने श्रीरामका आश्रय तो ग्रहण कर ही लिया । ' ऐसा कहकर गदाधारी विभीषणके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे एकान्तका आश्रय ले खड़े होकर चिन्ता करने लगे । से उमड़े हुए मेघके समान काले और पर्वतके समान ऊँचे शरीरवाले कुम्भकर्णको आक्रमण करते देख रणभूमिमें उससे कहा- ॥ १४३ ॥

आगच्छ रक्षोऽधिप मा विषाद-मवस्थितोऽहं प्रगृहीतचापः । अवेहि मां राक्षसवंशनाशनं यस्त्वं मुहूर्ताद् भविता विचेताः ॥ १४४ ॥

' राक्षसराज! आओ, विषाद न करो । मैं धनुष लेकर खड़ा हूँ । मुझे राक्षसवंशका विनाश करनेवाला समझो । अब तुम भी दो ही घड़ी में अपनी चेतना खो बैठोगे ( मर जाओगे ) ' ॥ १४४ ॥

रामोऽयमिति विज्ञाय जहास विकृतस्वनम् ।

अभ्यधावत संक्रुद्धो हरीन् विद्रावयन् रणे ॥ १४५ ॥

' यही राम हैं ' - यह जानकर वह राक्षस विकृत स्वरमें अट्टहास करने लगा और अत्यन्त कुपित हो रणक्षेत्रमें वानरों-को भगाता हुआ उनकी ओर दौड़ा || १४५ ॥

दारयन्निव सर्वेषां हृदयानि वनौकसाम् ।

प्रहस्य विकृतं भीमं स मेघस्तनितोपमम् ॥ १४६ ॥

कुम्भकर्णो महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत् ।

नाहं विराधो विशेयो न कबन्धः खरो न च ।

न वाली न च मारीचः कुम्भकर्णः समागतः ॥ १४७ ॥

महातेजस्वी कुम्भकर्ण समस्त वानरोंके हृदयको विदीर्ण-सा करता हुआ विकृत स्वरमें जोर - जोर से हँसकर मेघ - गर्जनाके समान गम्भीर एवं भयंकर वाणीमें श्रीरघुनाथजीसे बोला-' राम! मुझे विराध, कबन्ध और खर नहीं समझना चाहिये । मैं मारीच और वाली भी नहीं हूँ । यह कुम्भकर्ण तुमसे लड़ने आया है ॥ १४६-१४७ ॥

पश्य मे मुद्गरं भीमं सर्व कालायसं महत् ।

अनेन निर्जिता देवा दानवाश्च पुरा मया ॥ १४८ ॥

' मेरे इस भयंकर एवं विशाल मुद्गरकी ओर देखो । यह सब का सब काले लोहेका बना हुआ है । मैंने पूर्वकालमें इसीके द्वारा समस्त देवताओं और दानवोंको परास्त किया है ॥ १४८ ॥

विकर्णनास इति मां नावज्ञातुं त्वमर्हसि ।

स्वल्पापि हि न मे पीडा कर्णनासाविनाशनात् ॥१४ ९ ॥

' मेरे नाक - कान नीचेसे कट गये हैं, ऐसा समझकर तुम्हें मेरी अवहेलना नहीं करनी चाहिये । इन दोनों अङ्गके नष्ट होनेसे मुझे थोड़ी - सी भी पीड़ा नहीं होती है ॥ १४ ९ ॥

. दर्शयेक्ष्वाकुशार्दूल वीर्य गात्रेषु मेऽनघ ।

ततस्त्वां भक्षयिष्यामि दृष्टपौरुषविक्रमम् ॥ १५० ॥

' निष्पाप घुनन्दन! तुम इक्ष्वाकुवंशके वीर पुरुष

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युद्धकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः १२५३ हो, अतः मेरे अङ्गोंपर अपना पराक्रम दिखाओ । तुम्हारे पौरुष एवं बल - विक्रमको देख लेनेके बाद ही मैं तुम्हें खाऊँगा ' ॥ १५० ॥

स कुम्भकर्णस्य वचो निशम्य

रामः सपुङ्खान् विससर्ज बाणान् ।

तैराहतो वज्रसमप्रवेगै-र्न चुक्षुभे न व्यथते सुरारिः ॥ १५१ ॥

कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर श्रीरामने उसके ऊपर सुन्दर पंखवाले बहुत - से बाण मारे । वज्रके समान वेगवाले उन दाणोंकी गहरी चोट खानेपर भी वह देवद्रोही राक्षस न तो क्षुब्ध हुआ और न व्यथित ही ॥ १५१ ॥

यैः सायकैः सालवरा निकृत्ता वाली हतो वानरपुङ्गवश्च । ते कुम्भकर्णस्य तदा शरीरं वज्रोपमा न व्यथयाम्प्रचक्रुः ॥ १५२ ॥

जिन बाणोंसे श्रेष्ठ सालवृक्ष काटे गये और वानरराज वालीका वध हुआ, वे ही वज्रोपम बाण उस समय कुम्भकर्णके शरीरको व्यथा न पहुँचा सके ॥ १५२ ॥

स वारिधारा इव सायकांस्तान् पिवञ्शरीरेण महेन्द्रशत्रुः । जघान रामस्य शरप्रवेगं व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगम् ॥ १५३ ॥

देवराज इन्द्रका शत्रु कुम्भकर्ण जलकी धाराके समान श्रीरामकी बाणवर्षाको अपने शरीरसे पीने लगा और भयंकर वेगशाली मुद्गरको चारों ओरसे घुमा घुमाकर उनके बाणोंके महान् वेगको नष्ट करने लगा ॥ १५३ ॥

ततस्तु रक्षः क्षतजानुलिप्तं वित्रासनं देवमहाचमूनाम् । व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगं विद्रावयामास चमूं हरीणाम् ॥ १५४ ॥

तदनन्तर वह राक्षस देवताओंकी विशाल सेनाको भयभीत करनेवाले और खूनसे लिपटे हुए उस उग्र वेगशाली मुद्गरको घुमा घुमाकर वानरोंकी वाहिनीको खदेड़ने लगा ॥ १५४ ॥

वायव्यमादाय ततो s पराखं रामः प्रचिक्षेप निशाचराय । समुद्ररं तेन जहार बाहुं स कृत्तबाहुस्तुमुलं ननाद ॥ १५५ ॥

यह देख भगवान् श्रीरामने वायव्य नामक दूसरे अस्त्र-का संधान करके उसे कुम्भकर्णपर चलाया और उसके द्वारा उस निशाचरकी मुगरसहित दाहिनी बाँह काट डाली । बाँह कट जानेपर वह राक्षस भयानक आवाजमें चीत्कार करने लगा ॥ १५५ ॥

स तस्य बाहुर्गिरिश्टङ्गकल्पः समुद्ररो राघववाणकृत्तः । पपात तस्मिन् हरिराज सैन्ये जघान तां वानरवाहिनीं च ॥ १५६ ॥

श्रीरघुनाथजीके बाणसे कटी हुई वह बाँह, जो पर्वत-शिखरके समान जान पड़ती थी, मुद्गरके साथ ही वानरोंकी सेनामें गिरी । उसके नीचे दबकर कितने ही वानर - सैनिक अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे ॥ १५६ ॥

ते वानरा भग्नावशेषाः पर्यन्तमाश्रित्य तदा विषण्णाः । प्रपीडिताङ्गा ददृशुः सुघोरं नरेन्द्ररक्षोऽधिपसंनिपातम् ॥१५७ ॥

जो अङ्ग भङ्ग होने या मरनेसे बचे, वे खिन्नचित्त हो किनारे जाकर खड़े हो गये । उनके शरीरमें बड़ी पीड़ा हो रही थी और वे चुपचाप महाराज श्रीराम और राक्षस कुम्भ-कर्णके घोर संग्रामको देखने लगे || १५७ ॥ स कुम्भकर्णोऽस्त्रनिकृत्तबाहु-महासिकत्ताग्र इवाचलेन्द्रः । उत्पाटयामास करेण वृक्षं ततोऽभिदुद्राव रणे नरेन्द्रम् ॥ १५८ ॥

वायव्यास्त्र से एक बाँह कट जानेपर कुम्भकर्ण शिखरहीन पर्वत के समान प्रतीत होने लगा । उसने एक ही हाथसे एक ताड़का वृक्ष उखाड़ लिया और उसे लेकर रणभूमि में महाराज श्रीरामपर धावा किया ॥ १५८ ॥

तं तस्य बाहुं सहतालवृक्षं समुद्यतं पन्नगभोगकल्पम् । ऐन्द्रास्त्रयुकेन जघान रामो जाम्बूनदचित्रितेन ॥ १५ ९ ॥ तब श्रीरामने एक सुवर्णभूषित बाण निकालकर उसे ऐन्द्रा से अभिमन्त्रित किया और उसके द्वारा सर्प के समान उठी हुई राक्षसकी दूसरी बाँह को भी वृक्षसहित काट गिराया ॥ १५ ९ ॥ स कुम्भकर्णस्य भुजो निकृत्तः

पपात भूमौ गिरिसंनिकाशः ।

विचेष्टमानो निजघान वृक्षा-शैलशिला वानरराक्षसांश्च ॥ १६० ॥

कुम्भकर्णकी वह कटी हुई बाँह पर्वतशिखरके समान पृथ्वी पर गिरी और छटपटाने लगी । उसने कितने ही वृक्षों, शैलशिखरों, शिलाओं, वानरों और राक्षसोंको भी कुचल डाला ॥ १६० ॥

तं छिन्नबाहुं समवेक्ष्य रामः समापतन्तं सहसा नदन्तम् ।

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१२५४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे द्वावर्धचन्द्रौ निशितौ प्रगृह्य चिच्छेद पादौ युधि राक्षसस्य ॥१६१ ॥

उन दोनों भुजाओंके कट जानेपर वह राक्षस सहसा आर्तनाद करता हुआ श्रीरामपर टूट पड़ा । उसे आक्रमण करते देख श्रीरामने दो तीखे अर्धचन्द्राकार बाण लेकर उनके द्वारा युद्धस्थलमें उस राक्षसके दोनों पैर भी उड़ा दिये ॥ तौ तस्य पादौ प्रदिशो दिशश्च गिरेर्गुहाश्चैव महार्णवं च । लङ्कां च सेनां कपिराक्षसानां विद विनिपेततुश्च ॥ १६२ ॥

उसके दोनों पैर दिशा - विदिशा, पर्वतकी कन्दरा, महासागर, लङ्कापुरी तथा वानरों और राक्षसोंकी सेनाओं को भी प्रतिध्वनित करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १६२ ॥

निकृत्तवाहुर्विनिकृत्तपादो विदार्य वक्त्रं वडवामुखाभम् । दुद्राव रामं सहसाभिगर्जन् राहुर्यथा चन्द्रमिवान्तरिक्षे ॥ १६३ ॥

दोनों बाँहों और पैरोंके कट जानेपर उसने वडवानलके समान अपने विकराल मुखको फैलाया और जैसे राहु आकाश में चन्द्रमाको ग्रस लेता है, उसी प्रकार वह श्रीरामको ग्रसने के लिये भयानक गर्जना करता हुआ सहसा उनके ऊपर टूट पड़ा । अपूरयत् तस्य मुखं शिताग्रै रामः शरैर्हेम पिनद्धपुङ्खैः । सम्पूर्णवक्त्रो न शशाक वक्तुं चुकूज कृच्छ्रेण मुमूर्च्छ चापि ॥१६४ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णजटित पंखवाले अपने तीखे बाणोंसे उसका मुँह भर दिया । मुँह भर जानेपर वह बोलने में भी असमर्थ हो गया और बड़ी कठिनाईसे आर्तनाद करके मूर्छित हो गया ॥ १६४ ॥

अथाददे सूर्यमचिकल्पं स ब्रह्मदण्डान्तककालकल्पम् । अरिष्टमैन्द्रं निशितं सुपुङ्ख रामः शरं मारुततुल्यवेगम् ॥ १६५ ॥

तं वज्रजाम्बूनदचारुपुङ्ख प्रदीप्तसूर्यज्वलनप्रकाशम् महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगं रामः प्रचिक्षेप निशाचराय ॥ १६६ ॥

इसके बाद भगवान् श्रीरामने ब्रह्मदण्ड तथा विनाशकारी कालके समान भयंकर एवं तीखा बाण, जो सूर्य की किरणों के समान उद्दीप्त, इन्द्रास्त्र से अभिमन्त्रित, शत्रुनाशक, तेजस्वी सूर्य और प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान, हीरे और सुवर्णसे विभूषित सुन्दर पंखसे युक्त, वायु तथा इन्द्र के वज्र और अशनि के समान वेगशाली था, हाथमें लिया और उस निशाचरको लक्ष्य करके छोड़ दिया ॥ १६५-१६६ ॥ स सायको राघवबाहुचोदितो दिशः स्वभासा दश सम्प्रकाशयन् । विधूमवैश्वानरभीमदर्शनो जगाम शक्राशनिभीमविक्रमः ॥ १६७ ॥

श्रीरघुनाथजी की भुजाओंसे प्रेरित होकर वह बाण अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर वेगसे चला । वह धूमरहित अग्नि के समान भयानक दिखायी देता था ॥ १६७ ॥

स तन्महापर्वतकूटसंनिभं सुवृत्तदंष्ट्रं चलचारुकुण्डलम् । चकर्त रक्षोऽधिपतेः शिरस्तदा यथैव वृत्रस्य पुरा पुरंदरः ॥ १६८ ॥

जैसे पूर्व कालमें देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका मस्तक काट डाला था, उसी प्रकार उस बाणने राक्षसराज कुम्भकर्णके महान् पर्वतशिखरके समान ऊँचे, सुन्दर गोलाकार दाढ़ोंसे युक्त तथा हिलते हुए मनोहर कुण्डलोंसे अलंकृत मस्तकको धड़से अलग कर दिया ॥ १६८ ॥

कुम्भकर्णशिरो भाति कुण्डलालंकृतं महत् ।

आदित्येऽभ्युदिते रात्रौ मध्यस्थ इव चन्द्रमाः ॥ १६ ९ ॥

कुम्भकर्णका वह कुण्डलोंसे अलंकृत विशाल मस्तक प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर आकाशके मध्य में विराजमान चन्द्रमाकी भाँति निस्तेज प्रतीत होता था ॥ १६ ९ ॥ तद् रामबाणाभिहतं पपात रक्षः शिरः पर्वतसंनिकाशम् । बभञ्ज चर्यागृहगोपुराणि प्राकारमुच्चं तमपातयच्च ॥ १७० ॥

श्रीराम के बाणोंसे कटा हुआ राक्षसका वह पर्वताकार मस्तक लङ्कामें जा गिरा । उसने अपने धक्केसे सड़क के आस-पासके कितने ही मकानों, दरवाजों और ऊँचे परकोटेको भी धराशायी कर दिया ॥ १७० ॥

तच्चातिकायं हिमवत् प्रकाशं रक्षस्तदा तोयनिधौ पपात । ग्राहान् परान् मीनवरान् भुजंगमान् ममर्द भूमिं च तथा विवेश ॥ १७१ ॥

इसी प्रकार उस राक्षसका विशाल धड़ भी, जो हिमालय के समान जान पड़ता था, तत्काल समुद्रके जलमें गिर पड़ा और बड़े - बड़े ग्राहों, मत्स्यों तथा साँपोंको पीसता हुआ पृथ्वीके भीतर समा गया ॥ १७१ ॥

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वध -कुम्भकर्ण

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युद्धकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः १२५५ तस्मिन् हते ब्राह्मणदेवशत्रौ महाबले संयति कुम्भकर्णे । चचाल भूर्भूमिधराश्च सर्वे हर्षाच्च देवास्तुमुलं प्रणेदुः ॥ १७२ ॥

ब्राह्मणों और देवताओंके शत्रु महाबली कुम्भकर्णके युद्धमें मारे जानेपर पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत हिलने लगे और सम्पूर्ण देवता हर्षसे भरकर तुमुल नाद करने लगे ॥ १७२ ॥

ततस्तु देवर्षिमहर्षिपन्नगाः सुराश्च भूतानि सुपर्णगुह्यकाः । क्ष नभोगताः प्रहर्षिता रामपराक्रमेण ॥१७३ ॥

उस समय आकाशमें खड़े हुए देवर्षि, महर्षि, सर्प, देवता, भूतगण, गरुड़, गुह्यक, यक्ष और गन्धर्वगण श्रीराम का पराक्रम देखकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १७३ ॥

ततस्तु ते तस्य वधेन भूरिणा मनखिनो नैर्ऋतराजबान्धवाः । विनेदुरुच्चैर्व्यथिता रघूत्तमं हरिं समीक्ष्यैव यथा मतंगजाः ॥१७४ ॥

कुम्भकर्णके महान् वधसे राक्षसराज रावणके मनस्वी बन्धुओंको बड़ा दुःख हुआ । वे रघुकुलतिलक श्रीरामकी ओर देखकर उसी तरह उच्च स्वरसे रोने - कल्पने लगे, जैसे सिंहपर दृष्टि पड़ते ही मतवाले हाथी चीत्कार कर उठते हैं । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये स देवलोकस्य तमो निहत्य सूर्यो यथा राहुमुखाद् विमुक्तः । तथा व्यभासीद्धरिसैन्यमध्ये निहत्य रामो युधि कुम्भकर्णम् ॥ १७५ ॥

देवसमूहको दुःख देनेवाले कुम्भकर्णका युद्ध में वध करके वानर सेना के बीच में खड़े हुए भगवान् श्रीराम अन्धकारका नाश करके राहुके मुखसे छूटे हुए सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ १७५ ॥

प्रहर्षमयुर्ववश्व वानराः प्रबुद्धपद्मप्रतिमैरिवाननैः 1 अपूजयन् राघवमिष्टभागिनं हते रिपौ भीमबले नृपात्मजम् ॥ १७६ ॥

भयानक बलशाली शत्रुके मारे जानेसे बहुसंख्यक वानरों-को बड़ी प्रसन्नता हुई । उनके मुख विकसित कमलकी भाँति हर्षोल्लास से खिल उठे तथा उन्होंने सफलमनोरथ हुए राजकुमार भगवान् श्रीरामकी भूरि - भूरि प्रशंसा की ॥१७६ ॥

स कुम्भकर्ण सुरसैन्यमर्दनं महत्सु युद्धेषु कदाचनाजितम् । ननन्द हत्वा भरताग्रजो रणे महासुरं वृत्रमिवामराधिपः ॥ १७७ ॥

जो बड़े - बड़े युद्धोंमें कभी पराजित नहीं हुआ था तथा देवताओंकी सेनाको भी कुचल डालनेवाला था, उस महान् राक्षस कुम्भकर्णको रणभूमिमें मारकर रघुनाथजीको वैसी ही प्रसन्नता हुई जैसी वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्रको हुई थी ॥ युद्धकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥ ६७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६७ ॥

अष्टषष्टितमः सर्गः कुम्भकर्ण वधका समाचार कुम्भकर्ण हतं दृष्ट्वा राघवेण महात्मना राक्षसा राक्षसेन्द्राय रावणाय न्यवेदयन् महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा कुम्भकर्णको देख राक्षसोंने अपने राजा रावणसे जाकर कहा— ॥ राजन् स कालसंकाशः संयुक्तः कालकर्मणा विद्राव्य वानरीं सेनां भक्षयित्वा च वानरान् “ महाराज! कालके समान भयंकर पराक्रमी

॥ १ ॥

मारा गया १ ॥

॥ २ ॥

कुम्भकर्ण वानरसेनाको भगाकर तथा बहुत - से वानरोंको अपना आहार बनाकर स्वयं भी कालके गालमें चले गये ॥ २ ॥

प्रतपित्वा मुहूर्ते तु प्रशान्तो रामतेजसा ।

कायेनार्धप्रविष्टेन समुद्रं भीमदर्शनम् ॥ ३॥

सुनकर रावणका विलाप

निकृत्तनासाकर्णेन विक्षरद्रुधिरेण च ।

रुद्ध्वा द्वारं शरीरेण लङ्कायाः पर्वतोपमः ॥ ४ ॥

कुम्भकर्णस्तव भ्राता काकुत्स्थशरपीडितः ।

अगण्डभूतो विवृतो दावदग्ध इव द्रुमः ॥ ५ ॥

' वे दो घड़ीतक अपने प्रतापसे तपकर अन्तमें श्रीरामके तेजसे शान्त हो गये । उनका आधा शरीर ( धड़ ) भयानक दिखायी देनेवाले समुद्रमें घुस गया और आधा शरीर ( मस्तक ) नाक - कान कट जानेसे खून बहाता हुआ लङ्काके द्वारपर पड़ा है । उस शरीरके द्वारा आपके भाई पर्वताकार कुम्भकर्ण लङ्काका द्वार रोककर पड़े हैं । वे श्रीरामके बाणोंसे पीड़ित हो हाथ, पैर और मस्तकसे हीन नंग - धड़ंग धड़के रूपमें परिणत हो दावानलसे दग्ध हुए वृक्षकी भाँति नष्ट हो गये ' ॥ ३–५ ॥

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१२५६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे

श्रुत्वा विनिहतं संख्ये कुम्भकर्ण महाबलम् ।

रावणः शोकसंतप्तो मुमोह च पपात च ॥ ६ ॥

' महाबली कुम्भकर्ण युद्धस्थलमें मारा गया ' यह सुनकर रावण शोक संतप्त एवं मूर्छित हो गया और तत्काल पृथ्वी-पर गिर पड़ा ॥ ६ ॥

पितृव्यं निहतं श्रुत्वा देवान्तकनरान्तकौ ।

त्रिशिराश्चातिकायश्च रुरुदुः शोकपीडिताः ॥ ७ ॥

अपने चाचाके निधनका समाचार सुनकर देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय दुःखसे पीड़ित हो फूट - फूट-कर रोने लगे ॥ ७ ॥

भ्रातरं निहतं श्रुत्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।

महोदरमहापार्श्वं शोकाक्रान्तौ बभूवतुः ॥ ८ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके द्वारा भाई कुम्भकर्णं मारे गये, यह सुनकर उसके सौतेले भाई महोदर और महापार्श्व शोकसे व्याकुल हो गये ॥ ८ ॥

ततः कृच्छ्रात् समासाद्य संज्ञां राक्षसपुङ्गवः ।

कुम्भकर्णवधाद् दीनो विललापाकुलेन्द्रियः ॥ ९ ॥

तदनन्तर बड़े कष्टसे होश में आनेपर राक्षसराज रावण कुम्भकर्ण वधसे दुखी हो विलाप करने लगा । उसकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी थीं ॥ ९ ॥

हा वीर रिपुदर्पघ्न कुम्भकर्ण महाबल ।

त्वं मां विहाय वै देवाद्यातोऽसि यमसादनम् ॥१० ॥

( वह रो - रोकर कहने लगा- ) हा वीर! हा महाबली कुम्भकर्ण! तुम शत्रुओंके दर्पका दलन करनेवाले थे; किंतु दुर्भाग्यवश मुझे असहाय छोड़कर यमलोकको चल दिये ।

मम शल्यमनुद्धृत्य बान्धवानां महाबल ।

शत्रुसैन्यं प्रताप्यैकः क्व मां संत्यज्य गच्छसि ॥ ११ ॥

' महाबली वीर! तुम मेरा तथा इन भाई - बन्धुओंका कण्टक दूर किये बिना शत्रुसेनाको संतप्त करके मुझे छोड़ अकेले कहाँ चले जा रहे हो? ॥ ११ ॥

इदानीं खल्वहं नास्मि यस्य मे पतितो भुजः ।

दक्षिणोऽयं समाश्रित्य न विभेमि सुरासुरात् ॥ १२ ॥

यस्य ते वज्रनिष्पेषो न कुर्याद् व्यसनं सदा ।

स कथं रामवाणाः प्रसुप्तोऽसि महीतले ॥ १४ ॥

' भाई! तुम्हें तो वज्रका प्रहार भी कभी कष्ट नहीं पहुँचा सकता था । वही तुम आज रामके बाणोंसे पीड़ित हो भूतल-पर कैसे सो रहे हो? ॥ १४ ॥

एते देवगणाः सार्धमृषिभिर्गगने स्थिताः ।

निहतं त्वां रणे दृष्ट्वा निनदन्ति प्रहर्षिताः ॥ १५ ॥

' आज समराङ्गण में तुम्हें मारा गया देख आकाशमें खड़े हुए ये ऋषियोंसहित देवता हर्षनाद कर रहे हैं ॥ १५ ॥

ध्रुवमद्यैव संहृश लब्धलक्षाः प्लवंगमाः ।

आरोक्ष्यन्तीह दुर्गाणि लङ्काद्वाराणि सर्वशः ॥ १६ ॥

' निश्चय ही अब अवसर पाकर हर्षसे भरे हुए वानर आज ही लङ्काके समस्त दुर्गम द्वारोंपर चढ़ जायँगे ॥ १६ ॥

राज्येन नास्ति मे कार्य किं करिष्यामि सीतया ।

कुम्भकर्णविहीनस्य जीविते नास्ति मे मतिः ॥ १७ ॥

' अब मुझे राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है । सीताको लेकर भी मैं क्या करूँगा? कुम्भकर्णके बिना जीनेका मेरा मन नहीं है ॥ १७ ॥।

यद्यहं भ्रातृहन्तारं न हन्मि युधि राघवम् ।

ननु मे मरणं श्रेयो न चेदं व्यर्थजीवितम् ॥ १८ ॥

' यदि मैं युद्धस्थल में अपने भाईका वध करनेवाले रामको नहीं मार सकता तो मेरा मर जाना ही अच्छा है । इस निरर्थक जीवनको सुरक्षित रखना कदापि अच्छा नहीं है ।

अद्यैव तं गमिष्यामि देशं यत्रानुजो मम ।

नहि भ्रातॄन् समुत्सृज्य क्षणं जीवितुमुत्सहे ॥ १ ९ ॥

" मैं आज ही उस देशको जाऊँगा, जहाँ मेरा छोटा भाई कुम्भकर्ण गया है । मैं अपने भाइयोंको छोड़कर क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता ॥ १ ९ ॥

देवा हि मां हसिष्यन्ति दृष्ट्वा पूर्वापकारिणम् ।

कथमिन्द्रं जयिष्यामि कुम्भकर्ण हते त्वयि ॥ २० ॥

" मैंने पहले देवताओंका अपकार किया था । अब वे मुझे देखकर हँसेंगे । हा कुम्भकर्ण! तुम्हारे मारे जानेपर " इस समय मैं अवश्य ही नहींके बराबर हूँ; क्योंकि अब मैं इन्द्रको कैसे जीत सकूँगा १ ॥ २० ॥

मेरी दाहिनी बाँह कुम्भकर्ण धराशायी हो गया । जिसका तदिदं मामनुप्राप्तं विभीषणवचः शुभम् । भरोसा करके मैं देवता और असुर ' किसीसे नहीं डरता था । यदज्ञानान्मया तस्य न गृहीतं महात्मनः ॥ २१ ॥

वीरो देवदानवदर्पहा । " मैंने महात्मा विभीषणकी कही हुई जिन उत्तम बातों को कथमेवंविधो ह्यद्य राघवेण रणे हतः ॥ १३ ॥ अज्ञानवश स्वीकार नहीं किया था, वे मेरे ऊपर आज प्रत्यक्ष-कालाग्निप्रतिमो

" देवताओं और दानवोंका दर्प चूर करनेवाला ऐसा रूपसे घटित हो रही हैं ॥ २१ ॥

वीर, जो कालाग्निके समान प्रतीत होता था, आज रणक्षेत्रमें विभीषणवचस्तावत् कुम्भकर्णप्रहस्तयोः । रामके हाथसे कैसे मारा गया? ॥ १३ ॥ विनाशोऽयं समुत्पन्नो मां ब्रीडयति दारुणः ॥ २२ ॥

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युद्धकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः १२५७ ' जबसे कुम्भकर्ण और प्रहस्तका यह दारुण विनाश इति बहुविधमाकुलान्तरात्मा उत्पन्न हुआ है, तभीसे विभीषणकी बात याद आकर मुझे कृपणमतीव विलप्य कुम्भकर्णम् । लज्जित कर रही है ॥ २२ ॥ न्यपतदपि दशाननो भृशार्त-तस्यायं कर्मणः प्राप्तो विपाको मम शोकदः । स्तमनुजमिन्द्ररिपुं हतं विदित्वा ॥ २४ ॥

यन्मया धार्मिकः श्रीमान् स निरस्तो विभीषणः ॥ २३ ॥

इस प्रकार भाँति - भाँति से दीनतापूर्वक अत्यन्त विलाप " मैंने धर्मपरायण श्रीमान् विभीषणको जो घरसे करके व्याकुलचित्त हुआ दशमुख रावण अपने छोटे भाई निकाल दिया था, उसी कर्मका यह शोकदायक इन्द्र शत्रु कुम्भकर्णके वधका स्मरण करके बहुत ही व्यथित परिणाम अब मुझे भोगना पड़ रहा है ' ॥ २३ ॥ हो पुनः पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः ॥ ६८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६८ ॥

एकोनसप्ततितमः सर्गः रावण के पुत्रों और भाइयोंका युद्धके लिये

एवं विलपमानस्य रावणस्य दुरात्मनः ।

श्रुत्वा शोकाभिभूतस्य त्रिशिरा वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥

दुरात्मा रावण जब शोकसे पीड़ित हो इस प्रकार विलाप करने लगा, तब त्रिशिराने कहा - ॥ १ ॥

एवमेव महावीर्यो हतो नस्तातमध्यमः ।

न तु सत्पुरुषा राजन् विलपन्ति यथा भवान् ॥ २ ॥

' राजन्! इसमें संदेह नहीं कि हमारे मझले चाचा, जो इस समय युद्धमें मारे गये हैं, ऐसे ही महान् पराक्रमी थे; परंतु आप जिस प्रकार रोते - कलपते हैं, उस तरह श्रेष्ठ पुरुष किसीके लिये विलाप नहीं करते हैं ॥ २ ॥

नूनं त्रिभुवनस्यापि पर्याप्तस्त्वमसि प्रभो ।

स कस्मात् प्राकृत इव शोचस्यात्मानमीदृशम् ॥ ३ ॥

' प्रभो! निश्चय आप अकेले ही तीनों लोकोंसे भी लोहा लेने में समर्थ हैं; फिर इस तरह साधारण पुरुषकी भाँति क्यों अपने - आपको शोक में डाल रहे हैं? ॥ ३ ॥

ब्रह्मदत्तास्ति ते शक्तिः कवचं सायको धनुः ।

सहस्रखरसंयुक्तो रथो मेघसमस्वनः ॥ ४ ॥

' आपके पास ब्रह्माजीकी दी हुई शक्ति, कवच, धनुष तथा बाण हैं; साथ ही मेघ गर्जना के समान शब्द करनेवाला रथ भी है, जिसमें एक हजार गदहे जोते जाते हैं ॥ ४ ॥

त्वयासकृद्धि शस्त्रेण विशस्ता देवदानवाः ।

स सर्वायुधसम्पन्नो राघवं शास्तुमर्हसि ॥ ५ ॥

' आपने एक ही शस्त्रसे देवताओं और दानवोंको अनेक बार पछाड़ा है, अतः सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंसे सुसज्जित होनेपर आप रामको भी दण्ड दे सकते हैं ॥ ५ ॥

बा ० रा ० ५ - ९ -१४ ---जाना और नरान्तकका अङ्गदके द्वारा वध

कामं तिष्ठ महाराज निर्गमिष्याम्यहं रणे ।

उद्धरिष्यामि ते शत्रून् गरुडः पन्नगानिव ॥ ६ ॥

' अथवा महाराज! आपकी इच्छा हो तो यहीं रहें । मैं स्वयं युद्ध के लिये जाऊँगा और जैसे गरुड़ सपका संहार करते हैं, उसी तरह मैं आपके शत्रुओंको जड़ से उखाड़ फेंकूँगा ॥

शम्बरो देवराजेन नरको विष्णुना यथा ।

तथाद्य शयिता रामो मया युधि निपातितः ॥ ७ ॥

“ जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको और भगवान् विष्णुने नरका-सुरको मार गिराया था, उसी प्रकार युद्धस्थलमें आज मेरे द्वारा मारे जाकर राम सदाके लिये सो जायँगे ' ॥ ७ ॥

श्रुत्वा त्रिशिरसो वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः ।

पुनर्जातमिवात्मानं मन्यते कालचोदितः ॥ ८ ॥

त्रिशिराकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावणको इतना

संतोष हुआ कि वह अपना नया जन्म हुआ - सा मानने लगा ।

कालसे प्रेरित होकर ही उसकी ऐसी बुद्धि हो गयी ॥ ८ ॥

श्रुत्वा त्रिशिरसो वाक्यं देवान्तकनरान्तकौ ।

अतिकायश्च तेजस्वी बभूवुर्युद्धहर्षिताः ॥ ९ ॥

त्रिशिराका उपर्युक्त कथन सुनकर देवान्तक, नरान्तक १. यहाँ जिस नरकासुरका नाम आया है, वह विप्रचित्ति नामक दानवके द्वारा सिंहिकाके गर्भसे उत्पन्न हुए वातापि आदि सात पुत्रोंमेंसे एक था । उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं- वातापि, नमुचि, इल्वल, सृमर, अन्धक, नरक और कालनाभ । भगवान् श्रीकृष्णने द्वापर में जिस भूमिपुत्र नरकासुरका वध किया था, वह यहाँ उल्लिखित नरकासुरसे भिन्न था । त्रिशिरा और रावणके समय-में तो उसका जन्म ही नहीं हुआ था ।

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१२५८ श्रीमदवाल्मीकीय रामायणे और तेजस्वी अतिकाय —ये तीनों युद्धके लिये उत्साहित हो गये ॥ ९ ॥

ततोऽहमहमित्येवं गर्जन्तो नैर्ऋतर्षभाः ।

रावणस्य सुता वीराः शक्रतुल्यपराक्रमाः ॥ १० ॥

“ मैं युद्ध के लिये जाऊँगा, मैं जाऊँगा ' ऐसा कहते और

गर्जते हुए वे तीनों श्रेष्ठ निशाचर युद्धके लिये तैयार हो गये ।

रावणके वे वीर पुत्र इन्द्रके समान पराक्रमी थे ॥ १० ॥

अन्तरिक्षगताः सर्वे सर्वे मायाविशारदाः ।

सर्वे त्रिदशदर्पनाः सर्वे समरदुर्मदाः ॥ ११ ॥

वे सब - के - सब आकाशमें विचरण करनेवाले, मायाविशारद, रणदुर्मद तथा देवताओंका भी दर्पं दलन करनेवाले थे ॥ ११ ॥

सर्वे सुबलसम्पन्नाः सर्वे विस्तीर्णकीर्तयः ।

सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्ते स्म निर्जिताः ॥ १२ ॥

देवैरप सगन्धर्वैः सकिंनरमहोरगैः ।

सर्वेऽस्त्रविदुषो वीराः सर्वे युद्धविशारदाः ।

सर्वे प्रवरविज्ञानाः सर्वे लब्धवरास्तथा ॥ १३ ॥

वे सभी उत्तम बलसे सम्पन्न थे । उन सबकी कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई थी और समरभूमिमें आनेपर गन्धर्वों, किन्नरों तथा बड़े - बड़े नागसहित देवताओंसे भी कभी उन सबकी पराजय नहीं सुनी गयी थी । वे सभी अस्त्रवेत्ता, सभी वीर और सभी युद्धकी कलामें निपुण थे । उन सबको शस्त्रों और शास्त्रोंका उत्तम ज्ञान प्राप्त था और सबने तपस्या के द्वारा वरदान प्राप्त किया था ॥ १२-१३ ॥ स तैस्तथा भास्करतुल्यवर्चसैः

सुतैर्वृतः शत्रुबलश्रियार्दनैः ।

रराज राजा मघवान् यथामरै-तो महादानवदर्पनाशनैः ॥ १४ ॥

सूर्य के समान तेजस्वी तथा शत्रुओंकी सेना और सम्पत्ति-को रौंद डालनेवाले उन पुत्रोंसे घिरा हुआ राक्षसोंका राजा रावण बड़े - बड़े दानवोंका दर्प चूर्ण करनेवाले देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ १४ ॥

स पुत्रान् सम्परिष्वज्य भूषयित्वा च भूषणैः ।

आशीर्भिश्च प्रशस्ताभिः प्रेषयामास वै रणे ॥ १५ ॥

उसने अपने पुत्रोंको हृदयसे लगाकर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित किया और उत्तम आशीर्वाद देकर रणभूमिमें भेजा ॥ १५ ॥

युद्धोन्मत्तं च मत्तं च भ्रातरौ चापि रावणः ।

रक्षणार्थ कुमाराणां प्रेषयामास संयुगे ॥ १६ ॥

रावणने अपने दोनों भाई युद्धोन्मत्त ( महापार्श्व ) और मत्त ( महोदर ) को भी युद्धमें कुमारों की रक्षाके लिये भेजा ॥ १६ ॥

तेऽभिवाद्य महात्मानं रावणं लोकरावणम् । कृत्वा प्रदक्षिणं चैव वे सभी महाकाय महामना रावणको प्रणाम लिये प्रस्थित हुए ॥ १७ सर्वोषधीभिर्गन्धैश्च निर्जग्मुनैर्ऋतश्रेष्ठाः त्रिशिराश्चातिकायश्च महाकायाः प्रतस्थिरे ॥ १७ ॥

राक्षस समस्त लोकोंको रुलानेवाले और उसकी परिक्रमा करके युद्धके ॥

समालभ्य महाबलाः ।

पडेते युद्धकाङ्क्षिणः ॥ १८ ॥

देवान्तकनरान्तकौ ।

महोदरमहापार्श्वो निर्जग्मुः कालचोदिताः ॥ १ ९ ॥

सब प्रकारकी ओषधियों तथा गन्धोंका स्पर्श करके युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक, नरान्तक, महोदर और महापार्श्वये छः महाबली श्रेष्ठ निशाचर कालसे प्रेरित हो युद्धके लिये पुरीसे बाहर निकले ॥ १८-१९ ।

ततः सुदर्शनं नागं नीलजीमूतसंनिभम् ।

ऐरावतकुले जातमारुरोह महोदरः ॥ २० ॥

उस समय महोदर ऐरावतके कुलमें उत्पन्न हुए काले मेघ के समान रंगवाले ' सुदर्शन ' नामक हाथीपर सवार हुआ ॥

सर्वायुधसमायुक्तस्तूणीभिश्चाप्यलंकृतः ।

रराज गजमास्थाय सवितेवास्तमूर्धनि ॥ २१ ॥

समस्त आयुधोंसे सम्पन्न और तूणीरोंसे अलंकृत महोदर उस हाथीकी पीठपर बैठकर अस्ताचलके शिखरपर विराजमान सूर्यदेव के समान शोभा पा रहा था ॥ २१ ॥

योत्तमसमायुक्तं सर्वायुधसमाकुलम् ।

आरुरोह रथश्रेष्ठं त्रिशिरा रावणात्मजः ॥ २२ ॥

रावणकुमार त्रिशिरा एक उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ, जिसमें सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्र रक्खे गये थे और उत्तम घोड़े जुते हुए थे ॥ २२ ॥

त्रिशिरा रथमास्थाय विरराज धनुर्धरः ।

सविद्युदुल्कः सज्वालः सेन्द्रचाप इवाम्बुदः ॥ २३ ॥

उस रथमें बैठकर धनुष धारण किये त्रिशिरा विद्युत्, उल्का, ज्वाला और इन्द्रधनुषसे युक्त मेघके समान शोभा पाने लगा ॥ २३ ॥

त्रिभिः किरीटैस्त्रिशिराः शुशुभे स रथोत्तमे ।

हिमवानिव शैलेन्द्रस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः ॥ २४ ॥

उस उत्तम रथमें सवार हो तीन किरीटोंसे युक्त त्रिशिरा तीन सुवर्णमय शिखरोंसे युक्त गिरिराज हिमालयके समान शोभा पा रहा था || २४ ॥

अतिकायोऽतितेजखी राक्षसेन्द्रसुतस्तदा ।

आरुरोह रथश्रेष्ठं श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ २५ ॥

राक्षसराज रावणका अत्यन्त तेजस्वी पुत्र अतिकाय समस्त

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युद्धकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः १२५ ९ धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ था । वह भी उस समय एक उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ || २५ ॥

सुचक्राक्षं सुसंयुक्तं स्वनुकर्ष सुकूबरम् ।

तूणीबाणासनैर्दीप्तं प्रासासिपरिघाकुलम् ॥ २६ ॥

उस रथके पहिये और धुरे बहुत सुन्दर थे । उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे तथा उसके अनुकर्ष और कुबेर भी सुदृढ़ थे । तूणीर, बाण और धनुषके कारण वह रथ उद्दीप्त हो रहा था । प्रास, खड्ग और परिघोंसे वह भरा हुआ था ॥ २६ ॥

स काञ्चनविचित्रेण किरीटेन विराजता ।

भूषणैश्च बभौ मेरुः प्रभाभिरिव भासयन् ॥ २७ ॥

वह सुवर्णनिर्मित विचित्र एवं दीप्तिशाली किरीट तथा अन्य आभूषणोंसे विभूषित हो अपनी प्रभासे प्रकाशका विस्तार ' हुए मेरुपर्वत के समान सुशोभित होता था ॥ २७ ॥

स रराज रथे तस्मिन् राजसूनुर्महाबलः ।

वृतो नैर्ऋतशार्दूलैर्वज्रपाणिरिवामरैः ॥ २८ ॥

उस रथपर श्रेष्ठ निशाचरोंसे घिरकर बैठा हुआ वह महाबली राक्षसराजकुमार देवताओंसे घिरे हुए वज्रपाणि इन्द्र के समान शोभा पाता था ॥ २८ ॥

हयमुच्चैःश्रवः प्रख्यं श्वेतं कनकभूषणम् ।

मनोजवं महाकायमारुरोह नरान्तकः ॥ २ ९ ॥

नरान्तक उच्चैःश्रवाके समान श्वेत वर्णवाले एक सुवर्ण-भूषित विशालकाय और मनके समान वेगशाली अश्वपर आरूढ़ हुआ ॥ २ ९ ॥

गृहीत्वा प्रासमुल्काभं विरराज नरान्तकः ।

शक्तिमादाय तेजस्वी गुहः शिखिगतो यथा ॥ ३० ॥

उल्काके समान दीप्तिमान् प्रास हाथमें लेकर तेजस्वी नरान्तक शक्ति लिये मोरपर बैठे हुए तेजःपुञ्जसे सम्पन्न कुमार कार्तिकेय के समान सुशोभित हो रहा था ॥ ३० ॥

देवान्तकः समादाय परिघं हेमभूषणम् ।

परिगृह्य गिरिं दोर्भ्यां वपुर्विष्णोर्विडम्बयन् ॥ ३१ ॥

देवान्तक स्वर्णभूषित परिघ लेकर समुद्रमन्थनके समय दोनों हाथोंसे मन्दराचल उठाये हुए भगवान् विष्णुके स्वरूप-का अनुकरण - सा कर रहा था ॥ ३१ ॥

महापार्श्वो महातेजा गदामादाय वीर्यवान् ।

विरराज गदापाणिः कुबेर इव संयुगे ॥ ३२ ॥

महातेजस्वी और पराक्रमी महापार्श्व हाथमें गदा लेकर १. रथके धुरेपर कूबरके आधाररूपसे स्थापित काष्ठविशेषको अनुकर्षं कहते हैं । २. कूबर उस काष्ठको कहते हैं, जिसपर जुआ रक्खा जाता है । गाड़ीके हरसोंको भी प्राचीनकाल में कूबर कहा

जाता था ।

युद्धस्थलमें गदाधारी कुबेरके समान शोभा पाने लगा ॥३२ ॥

ते प्रतस्थुर्महात्मानोऽमरावत्याः सुरा इव ।

तान् गजैश्च तुरङ्गैश्च रथैश्चाम्बुदनिःस्वनैः ॥ ३३ ॥

अनूत्पेतुर्महात्मानो राक्षसाः प्रवरायुधाः । अमरावतीपुरीसे निकलनेवाले देवताओंके समान वे सभी महाकाय निशाचर लङ्कापुरीसे चले । उनके पीछे श्रेष्ठ आयुध धारण किये विशालकाय राक्षस हाथी, घोड़ों तथा मेघकी गर्जनाके समान घर्घराहट पैदा करनेवाले रथोंपर सवार हो युद्धके लिये निकले ॥ ३३३ ॥

ते विरेजुर्महात्मानः कुमाराः सूर्यवर्चसः ॥ ३४ ॥

किरीटिनः श्रिया जुष्टा ग्रहा दीप्ता इवाम्बरे । वे सूर्य तुल्य तेजस्वी, महामनस्वी राक्षसराजकुमार मस्तक-पर किरीट धारण करके उत्तम शोभा - सम्पत्तिसे सेवित हो आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ग्रहोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ३४३ ॥

प्रगृहीता बभौ तेषां शस्त्राणामावलिः सिता ॥ ३५ ॥

शरदभ्रप्रतीकाशा हंसावलिरिवाम्बरे । उनके द्वारा धारण की हुई अस्त्र - शस्त्रोंकी श्वेत पङ्क्ति आकाशमें शरदऋतुके बादलोंकी भाँति उज्ज्वल कान्तिसे युक्त हंसों की श्रेणीके समान शोभा पा रही थी ॥ ३५३ ॥

मरणं वापि निश्चित्य शत्रूणां वा पराजयम् ॥ ३६ ॥

इति कृत्वा मतिं वीराः संजग्मुः संयुगार्थिनः । आज या तो हम शत्रुओंको परास्त कर देंगे, या स्वयं ही मृत्युकी गोद में सदा के लिये सो जायँगे —ऐसा निश्चय करके वे वीर राक्षस युद्ध के लिये आगे बढ़े ॥ ३६ ॥

जगर्जुश्च प्रणेदुश्च चिक्षिपुञ्चापि सायकान् ॥ ३७ ॥

जगृहुश्च महात्मानो निर्यान्तो युद्धदुर्मदाः । 7 वे युद्धदुर्मद महामनस्वी निशाचर गर्जते, सिंहनाद करते बाण हाथमें लेते और उन्हें शत्रुओंपर छोड़ देते थे ॥ ३७३ ॥

क्ष्वेडितास्फोटितानां वै संचचालेव मेदिनी ॥ ३८ ॥

रक्षसां सिंहनादैश्च संस्फोटितमिवाम्बरम् । उन राक्षसोंके गर्जने, ताल ठोंकने और सिंहनाद करनेसे पृथ्वी कम्पित - सी होने लगी और आकाश फटने - सा लगा ॥ ३८३ ॥

तेऽभिनिष्क्रम्य मुदिता राक्षसेन्द्रा महाबलाः ॥ ३ ९ ॥ ददृशुर्वानरानीकं समुद्यतशिलानगम् । उन महाबली राक्षसशिरोमणि वीरोंने प्रसन्नतापूर्वक नगर-की सीमासे बाहर निकलकर देखा, वानरोंकी सेना पर्वतशिखर और बड़े- बड़े वृक्ष उठाये युद्धके लिये तैयार खड़ी है ॥ ३ ९ ३ ॥ हरयोऽपि महात्मानो ददृशू राक्षसं बलम् ॥ ४० ॥

हस्त्यश्वरथसम्बाधं किङ्किणीशतनादितम् ।

नीलजीमूतसंकाशं समुद्यतमहायुधम् ॥ ४१ ॥