Ramayana 2 — पृष्ठ 461–470
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470
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१२६० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे महामना वानरोंने भी राक्षससेनापर दृष्टिपात किया । वह हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी थी, सैकड़ों - हजारों घुँघुरुओं की रुनझुनसे निनादित थी, काले मेत्रोंकी घटा - जैसी दिखायी देती थी और हाथोंमें बड़े - बड़े आयुध लिये हुए थी । ४०-४१ ॥
दीप्तानलरविप्रख्यैनैर्ऋतैः सर्वतो वृतम् ।
तद् दृष्ट्वा बलमायातं लब्धलक्षाः प्रवङ्गमाः ॥ ४२ ॥
समुद्यतमहाशैलाः सम्प्रणेदुर्मुहुर्मुहुः ।
अमृष्यमाणा रक्षांसि प्रतिनर्दन्त वानराः ॥ ४३ ॥
प्रज्वलित अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी राक्षसोंने उसे सब ओरसे घेर रखा था । निशाचरोंकी उस सेनाको आती देख वानर प्रहार करनेका अवसर पाकर महान् पर्वतशिखर उठाये बारंबार गर्जना करने लगे । वे राक्षसोंका सिंहनाद सहन न करनेके कारण बदलेमें जोर - जोरसे दहाड़ने लगे थे । ४२-४३ ॥ ततः समुत्कृष्टरवं निशम्य रक्षोगणा वानरयूथपानाम् । अमृष्यमाणाः परहर्षमु महाबला भीमतरं प्रणेदुः ॥ ४४ ॥
वानरयूथपतियोंका वह उच्च स्वरसे किया हुआ गर्जन-तर्जन सुनकर भयंकर एवं महान् बलसे सम्पन्न राक्षसगण शत्रुओंका हर्ष सहन न कर सके; अतः स्वयं भी अत्यन्त भीषण सिंहनाद करने लगे ॥ ४४ ॥
ते राक्षसबलं घोरं प्रविश्य हरियूथपाः ।
विचेरुरुद्यतैः शैलैर्नगाः शिखरिणो यथा ॥ ४५ ॥
तब वानरयूथपति राक्षसोंकी उस भयंकर सेनामें घुस गये और शैलशृङ्ग उठाये शिखरोंवाले पर्वतोंकी भाँति वहाँ विचरण करने लगे ॥ ४५ ॥
केचिदाकाशमाविश्य केचिदुर्व्या प्लवङ्गमाः ।
रक्षः सैन्येषु संक्रुद्धाः केचिद् द्रुमशिलायुधाः ॥ ४६ ॥
मांश्च विपुलस्कन्धान् गृङ्गः । वृक्षों और शिलाओंको आयुधके रूपमें धारण किये वानर योद्धा राक्षससैनिकोंपर अत्यन्त कुपित हो आकाशमें उड़ उड़-कर विचरने लगे । कितने ही वानरशिरोमणि वीर मोटी - मोटी शाखाओंवाले वृक्षोंको हाथमें लेकर पृथ्वीपर विचरण करने लगे ॥ ४६३ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं रक्षोवानर संकुलम् ॥ ४७ ॥
पादपशिलाशैलैश्चक्रुर्वृष्टिमनूपमाम् ।
बाणौघैर्वार्यमाणाश्च हरयो भीमविक्रमाः ॥ ४८ ॥
उस समय राक्षसों और वानरोंके उस युद्धने बड़ा भयंकर रूप धारण किया । राक्षसोंने बाणसमूहोंकी वर्षाद्वारा जब वानरों-सिंहनादान् विनेदुश्च रणे राक्षसवानराः । शिलाभिश्चूर्णयामासुर्यातुधानान् प्लवङ्गमाः ॥ ४ ९ ॥ निर्जघ्नुः संयुगे क्रुद्धाः कवचाभरणावृतान् । राक्षस और वानर दोनों ही वहाँ रणक्षेत्रमें सिंहोंके समान दहाड़ रहे थे । कुपित हुए वानरोंने कवचों और आभूषणोंसे विभूषित बहुतेरे राक्षसों को युद्धस्थलमें शिलाओंकी मारसे कुचल दिया - मार डाला ॥ ४ ९ ॥ केचिद् रथगतान् वीरान् गजवाजिगतानपि ॥ ५० ॥
निर्जघ्नुः सहसाऽऽप्लुत्य यातुधानान् प्लवङ्गमाः । कितने ही वानर रथ, हाथी और घोड़ेपर बैठे हुए वीर राक्षसोंको भी सहसा उछलकर मार डालते थे ॥ ५०३ ॥
शैलशृङ्गान्विताङ्गास्ते मुष्टिभिर्वान्तलोचनाः ॥ ५१ ॥
चेलुः पेतुश्च नेदुश्च तत्र राक्षसपुङ्गवाः । वहाँ प्रधान प्रधान राक्षसोंके शरीर पर्वत - शिखरोंसे आच्छादित हो गये थे । वानरोंके मुक्कोंकी मार खाकर कितनोंकी आँखें बाहर निकल आयी थीं । वे निशाचर भागते, गिरते - पड़ते और चीत्कार करते थे । ५१३ ॥ राक्षसाश्च शरैस्तीक्ष्णैर्विभिदुः कपिकुञ्जरान् ॥ ५२ ॥
शूलमुद्गरखङ्गैश्च जघ्नुः प्रासैश्च शक्तिभिः । राक्षसोंने भी पैने बाणोंसे कितने ही वानर - शिरोमणियों को विदीर्ण कर दिया था तथा शूलों, मुद्गरों, खड्गों, प्रासों और शक्तियोंसे बहुतों को मार गिराया था ॥ ५२३ ॥
अन्योन्यं पातयामासुः परस्परजयैषिणः ॥ ५३ ॥
रिपुशोणितदिग्धाङ्गास्तत्र वानरराक्षसाः । शत्रुओंके रक्त जिनके शरीरोंमें लिपटे हुए थे, वे वानर और राक्षस वहाँ परस्पर विजय पाने की इच्छासे एक दूसरेको धराशायी कर रहे थे ॥ ५३३ ॥
ततः शैलैश्च खङ्गैश्च विसृष्टैर्हरिराक्षसैः ॥ ५४ ॥
भूमिरभवच्छोणितोक्षिता । थोड़ी ही देर में वह युद्धभूमि वानरों और राक्षसोंद्वारा चलाये गये पर्वत शिखरों तथा तलवारोंसे आच्छादित रक्तके प्रवाहसे सिंच उठी ॥ ५४३ ॥
विकीर्णैः पर्वताकारै रक्षोभिरभिमर्दितैः ।
आसीद् वसुमती पूर्णा तदा युद्धमदान्वितैः ॥ ५५ ॥
युद्धके मदसे उन्मत्त हुए पर्वताकार राक्षस जो शिलाओं-की मारसे कुचल दिये गये थे, सब ओर बिखरे पड़े थे । उनसे वहाँकी सारी भूमि पट गयी थी ॥ ५५ ॥
आक्षिप्ताः क्षिप्यमाणाश्च भग्नशैलाश्च वानराः । को आगे बढ़नेसे रोका, उस समय वे भयंकर पराक्रमी वानर पुनरङ्गैस्तदा चक्रुरासन्ना युद्धमद्भुतम् ॥ ५६ ॥
उनपर वृक्षों, शिलाओं तथा शैलशिखरोंकी अनुपम वृष्टि राक्षसोंने जिनके युद्धके साधनभूत शैल - शिखरोंको तोड़-करने लगे ॥ ४७-४८ ॥ फोड़ डाला था, वे वानर उनके प्रहारोंसे विचलित किये
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युद्धकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः १२६१ जानेपर उन राक्षसोंके अत्यन्त निकट जा अपने हाथ - पैर आदि अङ्गद्वारा ही अद्भुत युद्ध करने लगे ॥ ५६ ॥
वानरान् वानरैरेव जघ्नुस्ते नैर्ऋतर्षभाः ।
राक्षसान् राक्षसैरेव जघ्नुस्ते वानरा अपि ॥ ५७ ॥
राक्षसके प्रधान - प्रधान वीर वानरोंको पकड़कर उन्हें दूसरे वानरोंपर पटक देते थे । इसी प्रकार वानर भी राक्षसोंसे ही राक्षसों को मार रहे थे ॥ ५७ ॥
आक्षिप्य च शिलाः शैला अनुस्ते राक्षसास्तदा ।
तेषां चाच्छिद्य शस्त्राणि जघ्नू रक्षांसि वानराः ॥ ५८ ॥
उस समय राक्षस अपने शत्रुओंके हाथसे शिलाओं और शैल - शिखरों को छीनकर उन्हींसे उनपर प्रहार करने लगे तथा वानर भी राक्षसोंके हथियार छीनकर उन्हीं के द्वारा उनका बध करने लगे || ५८ ॥
निर्जघ्नुः शैलशृङ्गैश्च विभिदुश्च परस्परम् ।
सिंहनादान् विनेदुश्च रणे राक्षसवानराः ॥ ५ ९ ॥
इस तरह राक्षस और वानर दोनों ही दलोंके योद्धा एक-दूसरेको पर्वत - शिखरसे मारने, अस्त्र - शस्त्रोंसे विदीर्ण करने तथा रणभूमि में सिंहोंके समान दहाड़ने लगे ॥ ५ ९ ॥
वितनुत्राणा राक्षसा वानरैर्हताः ।
रुधिरं प्रसृतास्तत्र रससारमिव द्रुमाः ॥ ६० ॥
राक्षसोंकी शरीर - रक्षा के साधनभूत कवच आदि छिन्न-भिन्न हो गये । वानरोंकी मार खाकर वे अपने शरीरसे उसी प्रकार रक्त बहाने लगे, जैसे वृक्ष अपने तनोंसे गोंद बहाया करते हैं ॥ ६० ॥
रथेन च रथं चापि वारणेनापि वारणम् ।
हयेन च हयं केचिन्निर्जघ्नुर्वानरा रणे ॥ ६१ ॥
कितने ही वानर रणभूमिमें रथसे रथको, हाथीसे हाथीको और घोड़ेसे घोड़े को मार गिराते थे ॥ ६१ ॥
क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च भल्लैश्च निशितैः शरैः ।
राक्षसा वानरेन्द्राणां विभिदुः पादपाञ्शिलाः ॥ ६२ ॥
वानरयूथपतियोंके चलाये हुए वृक्षों और शिलाओंको निशाचर योद्धा तीखे क्षुरप्र, अर्धचन्द्र और भल्ल नामक बाणोंसे तोड़ - फोड़ डालते थे ॥ ६२ ॥
विकीर्णाः पर्वतास्तैश्च द्रुमच्छिन्नैश्च संयुगे ।
हतैश्च कपिरक्षोभिर्दुर्गमा वसुधाभवत् ॥ ६३ ॥
टूट - फूटकर गिरे हुए पर्वतों, कटे हुए वृक्षों तथा राक्षसों और वानरोंकी लाशोंसे पट जानेके कारण उस भूमिमें चलना-फिरना कठिन हो गया ॥ ६३ ॥
ते बानरा गर्वितष्टचेष्टाः संग्राममासाद्य भयं विमुच्य । युद्धं स्म सर्वे सह राक्षसैस्ते नानायुधाश्चक्रुरदीनसत्त्वाः ॥ ६४ ॥
वानरोंकी सारी चेष्टाएँ गर्वसे भरी हुई तथा हर्ष और उत्साहसे युक्त थीं । उनके हृदयमें दीनता नहीं थी तथा उन्होंने राक्षसोंके ही नाना प्रकार के आयुध छीनकर हस्तगत कर लिये थे, अतः वे सब संग्राममें पहुँचकर राक्षसोंके साथ भय छोड़कर युद्ध कर रहे थे ॥ ६४ ॥
तस्मिन् प्रवृत्ते तुमुले विमर्दे प्रहृष्यमाणेषु वलीमुखेषु 1 निपात्यमानेषु च राक्षसेषु महर्षयो देवगणाश्च नेदुः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार जब भयंकर मारकाट मची हुई थी, वानर प्रसन्न थे और राक्षसोंकी लाशें गिर रही थीं, उस समय महर्षि तथा देवगण हर्षनाद करने लगे ॥ ६५ ॥
ततो हयं मारुततुल्यवेग-मारुह्य शक्तिं निशितां प्रगृह्य । नरान्तको वानरसैन्यमुग्रं महार्णवं मीन इवाविवेश ॥ ६६ ॥
तदनन्तर वायुके समान तीत्र वेगवाले घोड़ेपर सवार हो हाथमें तीखी शक्ति लिये नरान्तक वानरोंकी भयंकर सेनामें उसी तरह घुसा, जैसे कोई मत्स्य महासागर में प्रवेश कर रहा हो ॥ ६६ ॥
स वानरान् सप्त शतानि वीरः प्रासेन दीप्तेन विनिर्बिभेद । एकः क्षणेन्द्रात्मा जघान सैन्यं हरिपुङ्गवानाम् ॥ ६७ ॥
उस महाकाय इन्द्रद्रोही वीर निशाचरने चमचमाते हुए भालेसे अकेले ही सात सौ वानरोंको चीर डाला और क्षणभर में वानरयूथपतियोंकी एक बहुत बड़ी सेनाका संहार कर डाला ॥
ददृशुश्च महात्मानं हयपृष्ठप्रतिष्ठितम् ।
चरन्तं हरिसैन्येषु विद्याधरमहर्षयः ॥ ६८ ॥
घोड़े की पीठपर बैठे हुए उस महामनस्वी वीरको विद्याधरों और महर्षियोंने वानरोंकी सेना में विचरते देखा ॥ ६८ ॥
स तस्य ददृशे मार्गो मांसशोणितकर्दमः ।
पतितैः पर्वताकारैर्वानरैरभिसंवृतः ॥ ६ ९ ॥
वह जिस मार्गसे निकल जाता, वही धराशायी हुए पर्वताकार वानरोंसे ढका दिखायी देता था और वहाँ रक्त एवं मांसकी कीच मच जाती थी ॥ ६ ९ ॥
यावद् विक्रमितुं बुद्धिं चक्रुः प्लवगपुङ्गवाः ।
तावदेतानतिक्रम्य निर्बिभेद नरान्तकः ॥ ७० ॥
बानरोंके प्रधान प्रधान वीर जबतक पराक्रम करनेका
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१२६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे विचार करते, तबतक ही नरान्तक इन सबको लाँघकर भाले-की मारसे घायल कर देता था ॥ ७० ॥
ज्वलन्तं प्रासमुद्यम्य संग्रामाग्रे नरान्तकः ।
ददाह हरिसैन्यानि वनानीव विभावसुः ॥ ७१ ॥
जैसे दावानल सूखे जंगलोंको जलाता है, उसी प्रकार प्रज्वलित प्रास लिये नरान्तक युद्ध के मुहानेपर वानर सेनाओंको दग्ध करने लगा ॥ ७१ ॥
यावदुत्पाटयामासुर्वृक्षाशैलान् वनौकसः ।
तावत् प्रासहताः पेतुर्वज्रकृत्ता इवाचलाः ॥ ७२ ॥
वानरलोग जबतक वृक्ष और पर्वत - शिखरोंको उखाड़ते, तबतक ही उसके भालेकी चोट खाकर वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति ढह जाते थे ॥ ७२ ॥
दिक्षु सर्वासु बलवान् विचचार नरान्तकः ।
प्रमृगन् सर्वतो युद्धे प्रावृट्काले यथानिलः ॥ ७३ ॥
जैसे वर्षाकालमें प्रचण्ड वायु सब ओर वृक्षोंको तोड़ती-उखाड़ती हुई विचरती है, उसी प्रकार बलवान् नरान्तक रणभूमि में वानरों को रौंदता हुआ सम्पूर्ण दिशाओं में विचरने लगा ॥ ७३ ॥
न शेकुर्धावितुं वीरा न स्थातुं स्पन्दितुं भयात् ।
उत्पतन्तं स्थितं यान्तं सर्वान् विव्याध वीर्यवान् ॥ ७४ ॥
वानर वीर भयके मारे न तो भाग पाते थे, न खड़े रह पाते थे और न उनसे दूसरी ही कोई चेष्टा करते बनती थी । पराक्रमी नरान्तक उछलते हुए, पड़े हुए और जाते हुए सभी वानरोंपर भालेकी चोट कर देता था ॥ ७४ ॥
एकेनान्तककल्पेन प्रासेनादित्यतेजसा ।
भग्नानि हरिसैन्यानि निपेतुर्धरणीतले ॥ ७५ ॥
उसका प्रास ( भाला ) अपनी प्रभासे सूर्यके समान उद्दीप्त हो रहा था और यमराजके समान भयंकर जान पड़ता था । उस एक ही भालेकी मारसे घायल होकर झुंड के झुंड वानर धरतीपर सो गये ॥ ७५ ॥
वज्रनिष्पेषसदृशं प्रासस्याभिनिपातनम् ।
न शेकुर्वानराः सोढुं ते विनेदुर्महास्वनम् ॥ ७६ ॥
वज्रके आघातको भी मात करनेवाले उस प्रासके दारुण प्रहारको वानर नहीं सह सके । वे जोर - जोरसे चीत्कार करने लगे ॥ ७६ ॥
पततां हरिवीराणां रूपाणि प्रचकाशिरे ।
वज्रभिन्नाग्रकूटानां शैलानां पततामिव ॥ ७७ ॥
वहाँ गिरते हुए वानर- वीरोंके रूप उन पर्वतोंके समान दिखायी देते थे, जो वज्रके आघातसे शिखरोंके विदीर्ण हो जानेसे धराशायी हो रहे हों ॥ ७७ ॥
ये तु पूर्व महात्मानः कुम्भकर्णेन पातिताः ।
ते स्वस्था वानरश्रेष्ठाः सुग्रीवमुपतस्थिरे ॥ ७८ ॥
पहले कुम्भकर्ण ने जिन्हें रणभूमिमें गिरा दिया था, वे महामनस्वी श्रेष्ठ वानर उस समय स्वस्थ हो सुग्रीवकी सेवामें उपस्थित हुए || ७८ ॥
प्रेक्षमाणः स सुग्रीवो दद्दशे हरिवाहिनीम् ।
नरान्तकभयत्रस्तां विद्रवन्तीं यतस्ततः ॥ ७ ९ ॥
सुग्रीवने जब सब वानरों की सेना नरान्तकसे रही है ॥ ७ ९ ॥ विद्रुतां वाहिनीं दृष्ट्वा गृहीतप्रासमायान्तं सेनाको भागती देख जो घोड़े की पीठ पर बैठकर दृष्ट्रोवाच महातेजाः कुमारमङ्गदं वीरं ओर दृष्टिपात किया, तब देखा कि भयभीत होकर इधर - उधर भाग
स ददर्श नरान्तकम् ।
हयपृष्ठप्रतिष्ठितम् ॥ ८० ॥
उन्होंने नरान्तकपर भी दृष्टि डाली, हाथमें भाला लिये आ रहा था ।
सुग्रीवो वानराधिपः ।
शक्रतुल्यपराक्रमम् ॥ ८१ ॥
उसे देखकर महातेजस्वी वानरराज सुग्रीवने इन्द्रतुल्य पराक्रमी वीर कुमार अङ्गदसे कहा -- ॥ ८१ ॥
गच्छैनं राक्षसं वीरं योऽसौ तुरगमास्थितः ।
क्षोभयन्तं हरिवलं क्षिप्रं प्राणैर्वियोजय ॥ ८२ ॥
“ बेटा! वह जो घोड़ेपर बैठा हुआ वानर सेनामें हलचल मचा रहा है, उस वीर राक्षसका सामना करनेके लिये जाओ और उसके प्राणोंका शीघ्र ही अन्त कर दो ' ॥ ८२ ॥
स भर्तुर्वचनं श्रुत्वा निष्पपाताङ्गदस्तदा ।
अनीकान्मेघसंकाशादंशुमानिव वीर्यवान् ॥ ८३ ॥
स्वामीकी यह आज्ञा सुनकर पराक्रमी अङ्गद उस समय मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होनेवाली वानर सेनासे उसी तरह निकले, जैसे सूर्यदेव बादलोंके ओटसे प्रकट हो रहे हों ॥८३ ॥
शैलसंघातसंकाशो हरीणामुत्तमोऽङ्गदः ।
रराजाङ्गदसंनद्धः धातुरिव पर्वतः ॥ ८४ ॥
वानरोंमें श्रेष्ठ अङ्गद शैल - समूह के समान विशालकाय थे । वे अपनी बाँहोंमें बाजूबंद धारण किये हुए थे, इसलिये सुवर्ण आदि धातुओंसे युक्त पर्वतके समान शोभा पाते थे ॥
निरायुधो महातेजाः केवलं नखदंष्ट्रवान् ।
नरान्तकमभिक्रम्य वालिपुत्रोऽब्रवीद् वचः ॥ ८५ ॥
वालिपुत्र अङ्गद महातेजस्वी थे । उनके पास कोई हथियार
नहीं था । केवल नख और दाढ़ ही उनके अस्त्र - शस्त्र थे ।
वे नरान्तकके पास पहुँचकर इस प्रकार बोले -- ॥ ८५ ॥
तिष्ठ किं प्राकृतैरेभिर्हरिभिस्त्वं करिष्यसि ।
अस्मिन् वज्रसमस्पर्श प्रासं क्षिप ममोरसि ॥ ८६ ॥
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युद्धकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः १२६३ " ओ निशाचर! ठहर जा । इन साधारण बंदरों को मारकर तू क्या करेगा? तेरे भालेकी चोट वज्रके समान असह्य है; किंतु जरा इसे मेरी इस छातीपर तो मार ' ॥ ८६ ॥
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा प्रचुक्रोध नरान्तकः ।
संदश्य दशनैरोष्ठं निःश्वस्य च भुजंगवत् ।
अभिगम्याङ्गदं क्रुद्धो वालिपुत्रं नरान्तकः ॥ ८७ ॥
अङ्गदकी यह बात सुनकर नरान्तकको बड़ा क्रोध हुआ । वह कुपित हो, दाँतोंसे ओठ दबा सर्पकी भाँति लंबी साँस ले, वालिपुत्र अङ्गदके पास आकर खड़ा हो गया ॥ ८७ ॥
स प्रासमाविध्य तदाङ्गदाय समुज्ज्वलन्तं सहसोत्ससर्ज । स वालिपुत्रेोरसि वज्रकल्पे बभूव भग्नो न्यपतच्च भूमौ ॥ ८८ ॥
उसने उस चमकते हुए भालेको घुमाकर सहसा उसे अङ्गदपर दे मारा । वालिपुत्र अङ्गदका वक्षःस्थल वज्र के समान कठोर था । नरान्तकका भाला उसपर टकराकर टूट गया और जमीनपर जा पड़ा ॥ ८८ ॥
तं प्रासमालोक्य तदा विभग्नं
सुपर्णकृत्तोरगभोगकल्पम् ।
तलं समुद्यम्य स वालिपुत्र-स्तुरंगमस्याभिजघान मूर्ध्नि ॥ ८ ९ ॥
उस भालेको गरुड़के द्वारा खण्डित किये गये सर्पके शरीरकी भाँति टूक - टूक होकर पड़ा देख वालिपुत्र अङ्गदने हथेली ऊँची करके नरान्तकके घोड़े के मस्तकपर बड़े जोरसे थप्पड़ मारा ॥ ८ ९ ॥ निमन्नपादः स्फुटिताक्षितारो निष्क्रान्तजिह्नोऽचलसंनिकाशः । स तस्य वाजी निपपात भूमौ तलप्रहारेण विकीर्णमूर्धा ॥ ९ ० ॥ उस प्रहारसे घोड़ेका सिर फट गया, पैर नीचेको बैँस गये, आँखें फूट गयीं और जीभ बाहर निकल आयी । वह पर्वताकार अश्व प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९ ० ॥ नरान्तकः क्रोधवशं जगाम हतं तुरंगं पतितं समीक्ष्य । स मुष्टिमुद्यम्य महाप्रभावो जघान शीर्ष युधि वालिपुत्रम् ॥ ९ १ ॥ घोड़े को मरकर पृथ्वीपर पड़ा देख नरान्तकके क्रोधकी सीमा न रही । उस महाप्रभावशाली निशाचरने युद्धस्थलमें मुक्का तानकर वालिकुमार के मस्तकपर मारा ॥ ९ १ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामाय वाल्मीकीये आदिकाव्ये अथाङ्गदो मुष्टिविशीर्णमूर्धा सुस्राव तीव्रं रुधिरं भृशोष्णम् । मुहुर्विजज्वाल मुमोह चापि संज्ञां समासाद्य विसिस्मिये च ॥ ९ २ ॥ मुक्की मारसे अङ्गदका सिर फूट गया । उससे वेगपूर्वक गर्म - गर्म रक्तकी धारा बहने लगी । उनके माथेमें बड़ी जलन हुई । वे मूच्छित हो गये और थोड़ी देरमें जब होश हुआ, तब उस राक्षसकी शक्ति देखकर आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ९ २ ॥ अथादो मृत्युसमान वेगं संवर्त्य मुष्टिं गिरिश्टङ्गकल्पम् । निपातयामास तदा महात्मा नरान्तकस्योरसि वालिपुत्रः ॥ ९ ३ ॥ फिर अङ्गदने पर्वत शिखरके समान अपना मुक्का ताना, जिसका वेग मृत्युके समान था । फिर उन महात्मा वालिकुमार-ने उससे नरान्तककी छाती में प्रहार किया ॥ ९ ३ ॥ स मुष्टिनिर्भिन्ननिमग्नवक्षा . ज्वाला वमञ्शोणितदिग्धगात्रः । नरान्तको भूमितले पपात यथाचलो वज्रनिपातभग्नः ॥ ९ ४ ॥ मुक्केके आघातसे नरान्तकका हृदय विदीर्ण हो गया । वह मुँहसे आगकी ज्वाला - सी उगलने लगा । उसके सारे अङ्ग लहूलुहान हो गये और वह वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९ ४ ॥ तदान्तरिक्षे त्रिदशोत्तमानां वनौकसां चैव महाप्रणादः । बभूव तस्मिन् निहतेऽध्यवीर्ये नरान्तके वालिसुतेन संख्ये ॥ ९ ५ ॥ वालिकुमारके द्वारा युद्धस्थलमें उत्तम पराक्रमी नरान्तक के मारे जानेपर उस समय आकाशमें देवताओंने और भूतलपर वानरोंने बड़े जोरसे हर्षनाद किया ॥ ९ ५ ॥ राममनः प्रहर्षणं सुदुष्करं तं कृतवान् हि विक्रमम् । विसिस्मिये सोऽप्यथ भीमकर्मा पुनश्च युद्धे स बभूव हर्षितः ॥ ९ ६ ॥ अङ्गदने श्रीरामचन्द्रजीके मनको अत्यन्त हर्ष प्रदान करनेवाला वह परम दुष्कर पराक्रम किया था । उससे श्रीराम-चन्द्रजीको भी बड़ा विस्मय हुआ । तत्पश्चात् भीषण कर्म
करनेवाले अङ्गद पुनः युद्धके लिये हर्ष और उत्साहसे भर गये ।
युद्धकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥ ६ ९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ९ ॥
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श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे १२६४ सप्ततितमः सर्गः हनुमान्जीके द्वारा देवान्तक और त्रिशिराका, नीलके द्वारा महोदरका तथा ऋषभके द्वारा महापार्श्वका वध
नरान्तकं हतं दृष्ट्रा चुकुशुनैर्ऋतर्षभाः ।
देवान्तकत्रिमूर्धा च पौलस्त्यश्च महोदरः ॥ १ ॥
नरान्तको मारा गया देख देवान्तक, पुलस्त्यकुलनन्दन त्रिशिरा और महोदर — ये श्रेष्ठ राक्षस हाहाकार करने लगे ॥ १ ॥
आरूढो मेघसंकाशं वारणेन्द्रं महोदरः ।
वालिपुत्रं महावीर्यमभिदुद्राव वेगवान् ॥ २ ॥
महोदरने मेघ के समान गजराजपर बैठकर महापराक्रमी अङ्गदके ऊपर बड़े वेगसे धावा किया ॥ २ ॥
भ्रातृव्यसनसंतप्तस्तदा देवान्तको बली ।
आदाय परिघं घोरमङ्गदं समभिद्रवत् ॥ ३ ॥
भाईके मारे जानेसे संतप्त हुए बलवान् देवान्तकने भयानक परिघ हाथमें लेकर अङ्गदपर आक्रमण किया ॥ ३ ॥
रथमादित्यसंकाशं युक्तं परमवाजिभिः ।
आस्थाय त्रिशिरा वीरो वालिपुत्रमथाभ्यगात् ॥ ४ ॥
इस प्रकार वीर त्रिशिरा उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए सूर्य तुल्य तेजस्वी रथपर बैठकर वालिकुमारका सामना करने के लिये आया ॥ ४ ॥
स त्रिभिर्देवदनै राक्षसेन्द्रैरभिद्रुतः ।
महाविटपमङ्गदः ॥ ५ ॥
वृक्षमुत्पाटयामास
देवान्तकाय तं वीरश्चिक्षेप सहसाङ्गदः ।
महावृक्षं महाशाखं शक्रो दीप्तामिवाशनिम् ॥ ६ ॥
देवताओंका दर्प दलन करनेवाले उन तीनों निशाचर-पतियोंके आक्रमण करनेपर वीर अङ्गदने विशाल शाखाओंसे युक्त एक वृक्षको उखाड़ लिया और जैसे इन्द्र प्रज्वलित वज्रका करते हैं, उसी प्रकार उन वालिकुमारने बड़ी - बड़ी प्रहार शाखाओंसे युक्त उस महान् वृक्षको सहसा देवान्तकपर दे मारा ॥ ५-६ ॥
त्रिशिरास्तं प्रचिच्छेद शरैराशीविषोपमैः ।
स वृक्षं कृत्तमालोक्य उत्पपात तदाङ्गदः ॥ ७ ॥
स ववर्ष ततो वृक्षान्शिलाश्च कपिकुञ्जरः ।
तान् प्रचिच्छेद संक्रुद्धस्त्रिशिरा निशितैः शरैः ॥ ८ ॥
परंतु त्रिशिराने विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण मार-कर उस वृक्षके टुकड़े - टुकड़े कर दिये । वृक्षको खण्डित हुआ
तत्काल आकाशमें उछले और त्रिशिरा-परिघाग्रेण तान् वृक्षान् बभञ्ज स महोदरः ।
त्रिशिराश्चाङ्गदं वीरमभिदुद्राव सायकैः ॥ ९ ॥
महोदरने अपने परिघके अग्रभागसे उन वृक्षोंको तोड़-फोड़ डाला । तत्पश्चात् सायकों की वर्षा करते हुए त्रिशिराने वीर अङ्गदपर धावा किया ॥ ९ ॥
गजेन समभिद्रुत्य वालिपुत्रं महोदरः ।
जघानोरसि संक्रुद्धस्तोमरैर्वज्रसंनिभैः ॥ १० ॥
साथ ही कुपित हुए महोदरने हाथीके द्वारा आक्रमण करके वालिकुमारकी छातीमें वज्रतुल्य तोमरोंका प्रहार किया ॥ १० ॥
देवान्तकश्च संक्रुद्धः परिघेण तदाङ्गदम् ।
उपगम्याभिहत्याशु व्यपचक्राम वेगवान् ॥ ११ ॥
इसी प्रकार देवान्तक भी अङ्गदके निकट आ अत्यन्त क्रोधपूर्वक परिधके द्वारा उन्हें चोट पहुँचाकर तुरंत वेगपूर्वक वहाँसे दूर हट गया ॥ ११ ॥
स त्रिभिर्नैर्ऋतश्रेष्ठैर्युगपत् समभिद्रुतः ।
न विव्यथे महातेजा वालिपुत्रः प्रतापवान् ॥ १२ ॥
उन तीनों प्रमुख निशाचरोंने एक साथ ही धावा किया था, तो भी महातेजस्वी और प्रतापी वालिकुमार अङ्गदके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई ॥ १२ ॥
स वेगवान् महावेगं कृत्वा परमदुर्जयः ।
तलेन समभिद्रुत्य जघानास्य महागजम् ॥ १३ ॥
वे अत्यन्त दुर्जय और बड़े वेगशाली थे । उन्होंने महान् वेग प्रकट करके महोदरके महान् गजराजपर आक्रमण किया और उसके मस्तकपर जोरसे थप्पड़ मारा ॥ १३ ॥
तस्य तेन प्रहारेण नागराजस्य संयुगे ।
पेततुर्नयने तस्य विननाश स कुञ्जरः ॥ १४ ॥
युद्धस्थलमें उनके उस प्रहारसे गजराजकी दोनों आँखें निकलकर पृथ्वी पर गिर गयीं और वह तत्काल मर गया ॥ १४ ॥
विषाणं चास्य निष्कृष्य वालिपुत्रो महाबलः ।
देवान्तकमभिद्रुत्य ताडयामास संयुगे ॥ १५ ॥
फिर महाबली वालिकुमारने उस हाथीका एक दाँत उखाड़ लिया और युद्धस्थलमें दौड़कर उसीके द्वारा देवान्तक-पर चोट की ॥ १५ ॥
देख कपिकुञ्जर अङ्गद वर्षा करने लगे; किंतु क्रोधसे भरे स विलस्तु तेजखी वातोद्धूत इव द्रुमः । पर वृक्षों तथा शिलाओंकी उनको भी काट गिराया । ७-८ । लाक्षारससवर्ण व सुस्राव रुधिरं महत् ॥ १६ ॥
ए त्रिशिराने पैने बाणोंद्वारा
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युद्धकाण्डे सप्ततितमः सर्गः १२६५ तेजस्वी देवान्तक उस प्रहारसे व्याकुल हो गया और शिरसि प्राहरद् वीरस्तदा वायुसुतो बली । हिलाये हुए वृक्षकी भाँति काँपने लगा । उसके शरीरसे नादेनाकम्पयच्चैव राक्षसान् स महाकपिः ॥ २५ ॥
वायुके महावर के समान रंगवाला रक्तका महान् प्रवाह बह चला ॥ बलवान् वायुकुमार महाकपि हनुमानजीने उस समय देवान्तक के मस्तक पर प्रहार किया और अपनी भीषण गर्जनासे
अथाश्वस्य महातेजाः कृच्छ्राद् देवान्तको बली । राक्षसोंको कम्पित कर दिया ॥ २५ ॥
आविध्य परिघं वेगादाजघान तदाङ्गदम् ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी बलवान् देवान्तकने बड़ी कठिनाई से अपनेको सँभालकर परिघ उठाया और उसे वेगपूर्वक घुमाकर अङ्गदपर दे मारा ॥ १७ ॥
परिघाभिहतश्चापि वानरेन्द्रात्मजस्तदा ।
जानुभ्यां पतितो भूमौ पुनरेवोत्पपात ह ॥ १८ ॥
स मुष्टिनिष्पिष्टविभिन्नमूर्धा
निर्वान्तदन्ताक्षिविलम्बिजिह्नः ।
देवान्तको राक्षसराजसूनु-र्गतासुरुर्व्या सहसा पपात ॥ २६ ॥
उनके मुष्टि - प्रहारसे देवान्तकका मस्तक फट गया और । दाँत, आँखें और लंबी जीभ बाहर निकल आयीं उस परिधकी चोट खाकर वानरराजकुमार अङ्गदने भूमि पिस उठा प्राणशून्य होकर सहसा पृथ्वीपर पर घुटने टेक दिये । फिर तुरंत ही उठकर वे ऊपर की ओर उछले ॥ १८ ॥
तमुत्पतन्तं त्रिशिरास्त्रिभिर्बाणैरजिह्मगैः ।
घोरैर्हरिपतेः पुत्रं ललाटेऽभिजघान ह ॥ १ ९ ॥
उछलते समय त्रिशिराने तीन सीधे जानेवाले भयंकर बाणों द्वारा वानरराजकुमारके ललाटमें गहरी चोट पहुँचायी ॥
ततोऽङ्गदं परिक्षिप्तं त्रिभिर्नैर्ऋतपुङ्गवैः ।
हनूमानथ विज्ञाय नीलश्चापि प्रतस्थतुः ॥ २० ॥
तदनन्तर अङ्गदको तीन प्रमुख निशाचरोंसे घिरा हुआ जान हनुमान् और नील भी उनकी सहायता के लिये अग्रसर हुए ॥ २० ॥
ततश्चिक्षेप शैलाग्रं नीलस्त्रिशिरसे तदा ।
तद् रावणसुतो धीमान् विभेद निशितैः शरैः ॥ २१ ॥
उस समय नीलने त्रिशिरापर एक पर्वतशिखर चलाया; किंतु उस बुद्धिमान् रावणपुत्रने तीखे बाण मारकर उसे तोड़ फोड़ डाला ॥ २१ ॥
तद्वाणशतनिर्भिन्नं विदारितशिलातलम् ।
सविस्फुलिङ्गं सज्वालं निपपात गिरेः शिरः ॥ २२ ॥
उसके सैकड़ों बाणोंसे विदीर्ण होकर उसकी एक - एक शिला बिखर गयी और वह पर्वतशिखर आगकी चिनगारियों तथा ज्वालाके साथ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २२ ॥
स विजृम्भितमालोक्य हर्षाद् देवान्तको बली ।
परिघेणाभिदुद्राव मारुतात्मजमाहवे ॥ २३ ॥
अपने भाईका पराक्रम बढ़ता देख बलवान् देवान्तकको बड़ा हर्ष हुआ और उसने परिघ लेकर युद्धस्थलमें हनुमानजी-पर धावा किया ॥ २३ ॥
तमापतन्तमुत्पत्य हनूमान् कपिकुञ्जरः ।
आजघान तदा मूर्ध्नि वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ २४ ॥
तथा वह राक्षसराजकुमार गिर पड़ा || २६ ॥ तस्मिन् हते राक्षसयोधमुख्ये महाबले संयति देवशत्रौ क्रुद्धस्त्रिशीर्षा निशितास्त्रमुग्रं ववर्ष नीलोरसि बाणवर्षम् राक्षस योद्धाओं में प्रधान महाबली देवद्रोही
।
॥ २७ ॥
देवान्तकके युद्धमें मारे जानेपर त्रिशिराको बड़ा क्रोध हुआ और उसने नीलकी छातीपर पैने बाणोंकी भयंकर वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २७ ॥
महोदरस्तु संक्रुद्धः कुञ्जरं पर्वतोपमम् ।
भूयः समधिरुह्याशु मन्दरं रश्मिवानिव ॥ २८ ॥
तदनन्तर अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ महोदर पुनः शीघ्र ही एक पर्वताकार हाथी पर सवार हुआ, मानो सूर्यदेव मन्दरा-चलपर आरूढ़ हुए हों ॥ २८ ॥
ततो वाणमयं वर्षे नीलस्योपर्यपातयत् ।
गिरौ वर्षे तडिच्चक्रचापवानिव तोयदः ॥ २ ९ ॥
हाथीपर चढ़कर उसने नीलके ऊपर बाणोंकी विकट वर्षा की, मानो इन्द्रधनुष एवं विद्युन्मण्डलसे युक्त मेघ किसी पर्वतपर जलकी वर्षा कर रहा हो ॥ २ ९ ॥ ततः शरौघैरभिवृष्यमाणो विभिन्नगात्रः कपिसैन्यपालः । नीलो बभूवाथ विसृष्टगात्रो विष्टम्भितस्तेन महाबलेन ॥ ३० ॥
बाण - समूहों की निरन्तर वर्षा होनेसे वानरसेनापति नीलके सारे अङ्ग क्षत - विक्षत हो गये । उनका शरीर शिथिल हो गया । इस प्रकार महाबली महोदरने उन्हें मूर्छित करके उनके बल-विक्रमको कुण्ठित कर दिया ॥ ३० ॥
उसे आते देख कपिकुञ्जर हनुमानजीने उछलकर अपने ततस्तु नीलः प्रतिलब्धसंज्ञः वज्र- सरीखे मुक्केसे उसके सिरपर मारा ॥ २४ ॥ शैलं समुत्पाट्य सवृक्षखण्डम् ।
वा ० रा ० ५. ९. १५-
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१२६६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे ततः समुत्पत्य महोग्रवेगो महोदरं तेन जघान मूर्ध्नि ॥ ३१ ॥
तत्पश्चात् होशमें आनेपर नीलने वृक्ष - समूहोंसे युक्त एक
शैल - शिखरको उखाड़ लिया । उनका वेग बड़ा भयंकर था ।
उन्होंने उछलकर उस वृक्षको महोदरके मस्तकपर दे मारा ॥३१ ॥
ततः स शैलाभिनिपातभग्नो महोदरस्तेन महाद्विपेन । व्यामोहितो भूमितले गतासुः पपात वज्राभिहतो यथाद्रिः ॥ ३२ ॥
उस पर्वतशिखर के आघातसे महोदर उस महान् गजराज-के साथ ही चूर - चूर हो गया और मूच्छित एवं प्राणशून्य हो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३२ ॥
पितृव्यं निहतं दृष्ट्वा त्रिशिराश्चापमाददे ।
हनूमन्तं च संक्रुद्धो विव्याध निशितैः शरैः ॥ ३३ ॥
पिताके भाईको मारा गया देख त्रिशिराके क्रोधकी सीमा न रही । उसने धनुष हाथमें ले लिया और हनुमानजीको पैने बाणोंसे बींधना आरम्भ किया ॥ ३३ ॥
स वायुसूनुः कुपितश्चिक्षेप शिखरं गिरेः ।
त्रिशिरास्तच्छरैस्तीक्ष्णैर्बिभेद बहुधा बली ॥ ३४ ॥
तब पवनकुमारने कुपित होकर उस राक्षसके ऊपर पर्वतका शिखर चलाया, परंतु बलवान् त्रिशिराने अपने तीखे सायकों से उसके कई टुकड़े कर डाले ॥ ३४ ॥
तद् व्यर्थ शिखरं दृष्ट्वा द्रुमवर्षे तदा कपिः ।
विससर्ज रणे तस्मिन् रावणस्य सुतं प्रति ॥ ३५ ॥
उस पर्वतशिखरके प्रहारको व्यर्थ हुआ देख कपिवर हनुमान् ने उस रणभूमिमें रावणपुत्र त्रिशिराके ऊपर वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ ३५ ॥
तमापतन्तमाकाशे द्रुमवर्ष प्रतापवान् ।
त्रिशिरा निशितैर्बाणैश्चिच्छेद च ननाद च ॥ ३६ ॥
किंतु प्रतापी त्रिशिराने आकाशमें होनेवाली वृक्षोंकी उस वृष्टिको अपने पैने बाणोंसे छिन्न - भिन्न कर दिया और बड़े जोरसे गर्जना की । ३६ ॥
हनूमांस्तु समुत्पत्य हयं त्रिशिरसस्तदा ।
विददार नखैः क्रुद्धो नागेन्द्रं मृगराडिव ॥ ३७ ॥
तब हनुमान्जी कूदकर त्रिशिराके पास जा पहुँचे और जैसे कुपित सिंह गजराजको अपने पंजोंसे चीर डालता है, उसी प्रकार रोषसे भरे हुए उन पवनकुमारने त्रिशिराके घोड़े-को अपने नखोंसे विदीर्ण कर डाला || ३७ ॥
अथ शक्तिं समासाद्य कालरात्रिमिवान्तकः ।
चिक्षेपानिलपुत्राय त्रिशिरा रावणात्मजः ॥ ३८ ॥
यह देख रावणकुमार त्रिशिराने शक्ति हाथमें ली, मानो यमराजने कालरात्रिको साथ ले लिया हो, वह शक्ति लेकर उसने पवनकुमार हनुमान्पर चलायी ॥ ३८ ॥
दिवः क्षिप्तामिवोल्कां तां शक्तिं क्षिप्तामसङ्गताम् ।
गृहीत्वा हरिशार्दूलो बभञ्ज च ननाद च ॥ ३ ९ ॥
जैसे आकाशसे उल्कापात हुआ हो, उसी प्रकार वह शक्ति, जिसकी गति कहीं कुण्ठित नहीं होती थी, चली; परंतु वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीने उसे अपने शरीरमें लगनेसे पहले ही हाथसे पकड़ लिया और तोड़ डाला, तोड़नेके बाद उन्होंने भयंकर गर्जना की ॥ ३ ९ ॥
तां दृष्ट्वा घोरसंकाशां शकिं भग्नां हनूमता ।
प्रहृष्टा वानरगणा विनेदुर्जलदा यथा ॥ ४० ॥
हनुमानजीने वह भयानक शक्ति तोड़ दी, यह देख वानर-वृन्द अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करने लगे ॥ ४० ॥
ततः खङ्गं समुद्यम्य त्रिशिरा राक्षसोत्तमः ।
निचखान तदा खङ्गं वानरेन्द्रस्य वक्षसि ॥ ४१ ॥
तब राक्षसशिरोमणि त्रिशिराने तलवार उठायी और कपि-श्रेष्ठ हनुमान्जीकी छातीपर उसकी भरपूर चोट की ॥ ४१ ॥
खड्गप्रहाराभिहतो हनूमान् मारुतात्मजः ।
आजघान त्रिमूर्धानं तलेनोरसि वीर्यवान् ॥ ४२ ॥
तलवारकी चोटसे घायल हो पराक्रमी पवनकुमार हनुमान्-ने त्रिशिराकी छाती में एक तमाचा जड़ दिया ॥ ४२ ॥
स तलाभिहतस्तेन स्रस्तहस्तायुधो भुवि ।
निपपात महातेजास्त्रिशिरास्त्यक्तचेतनः ॥ ४३ ॥
उनका थप्पड़ लगते ही महातेजस्वी त्रिशिरा अपनी चेतना खो बैठा । उसके हाथसे हथियार खिसक गया और वह स्वयं भी पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४३ ॥
स तस्य पततः खङ्गं तमाच्छिद्य महाकपिः ।
ननाद गिरिसंकाशस्त्रासयन् सर्वराक्षसान् ॥ ४४ ॥
गिरते समय उस राक्षसके खगको छीनकर पर्वताकार महाकपि हनुमानजी सब राक्षसोंको भयभीत करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४४ ॥
अमृष्यमाणस्तं घोषमुत्पपात निशाचरः ।
उत्पत्य च हनूमन्तं ताडयामास मुष्टिना ॥ ४५ ॥
उनकी वह गर्जना उस निशाचरसे सही नहीं गयी, अतः
वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया । उठते ही उसने हनुमान्-जीको एक मुक्का मारा ॥ ४५ ॥
तेन मुष्टिप्रहारेण संचुकोप महाकपिः ।
कुपितश्च निजग्राह किरीटे राक्षसर्षभम् ॥ ४६ ॥
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युद्धकाण्डे सप्ततितमः सर्गः १२६७ उसके मुक्केकी चोट खाकर महाकपि हनुमानजीको बड़ा क्रोध हुआ । कुपित होनेपर उन्होंने उस राक्षसका मुकुटमण्डित मस्तक पकड़ लिया ॥ ४६ ॥
स तस्य शीर्षाण्यसिना शितेन किरीटजुष्टानि सकुण्डलानि । क्रुद्धः प्रचिच्छेद सुतोऽनिलस्य त्वष्टुः सुतस्येव शिरांसि शक्रः ॥ ४७ ॥
फिर तो जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपके तीनों मस्तकोंको वज्रसे काट गिराया था, उसी प्रकार कुपित हुए पवनपुत्र हनुमान्ने रावणपुत्र त्रिशिराके किरीट और कुण्डलसहित तीनों मस्तकों को तीखी तलवारसे काट डाला ॥ तान्यायताक्षाण्यग संनिभानि प्रदीप्तवैश्वानरलोचनानि 1 पेतुः शिरांसीन्द्ररिपोः पृथिव्यां ज्योतींषि मुक्तानि यथार्कमार्गात् ॥ ४८ ॥
उन मस्तकोंकी सभी इन्द्रियाँ विशाल थीं । उनकी आँखें प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रही थीं । उस इन्द्रद्रोही त्रिशिराके वे तीनों सिर उसी प्रकार पृथ्वीपर गिरे, जैसे आकाश-से तारे टूटकर गिरते हैं ॥ ४८ ॥
तस्मिन् हते देवरिपौ त्रिशीर्षे हनूमता शक्रपराक्रमेण । नेदुः लवंगाः प्रचचाल भूमी रक्षांस्यथो दुदुविरे समन्तात् ॥ ४ ९ ॥ देवद्रोही त्रिशिरा जब इन्द्रतुल्य पराक्रमी हनुमानजी के हाथसे मारा गया, तब समस्त वानर हर्षनाद करने लगे, धरती काँपने लगी तथा राक्षस चारों दिशाओंकी ओर भाग चले ॥ ४ ९ ॥
हतं त्रिशिरसं दृष्ट्वा तथैव च महोदरम् ।
हतौ प्रेक्ष्य दुराधर्षौ देवान्तकनरान्तकौ ॥ ५० ॥
परमामर्षी मत्तो राक्षसपुङ्गवः ।
जग्राहार्चिष्मतीं चापि गदां सर्वायसीं तदा ॥ ५१ ॥
त्रिशिरा तथा महोदरको मारा गया देख और दुर्जय वीर देवान्तक एवं नरान्तकको भी कालके गालमें गया हुआ जान अत्यन्त अमर्षशील राक्षसशिरोमणि मत्त ( महापार्श्व ) कुपित हो उठा । उसने एक तेजस्विनी गदा हाथमें ली, जो सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई थी ॥ ५०-५१ ॥
हेमपट्टपरिक्षिप्तां मांसशोणित फेनिलाम् ।
विराजमानां विपुलां शत्रुशोणिततर्पिताम् ॥ ५२ ॥
उसपर सोनेका पत्र जड़ा हुआ था । युद्धस्थलमें पहुँचने-पर वह शत्रुओंके रक्त और मांसमें सन जाती थी । उसका आकार विशाल था । वह सुन्दर शोभासे सम्पन्न तथा शत्रुओं-के रक्तसे तृप्त होनेवाली थी ॥ ५२ ॥
तेजसा सम्प्रदीप्ताग्रां रक्तमाल्यविभूषिताम् ।
ऐरावतमहापद्मसार्वभौम भयावहाम् ॥ ५३ ॥
उसका अग्रभाग तेजसे प्रज्वलित होता था । वह लाल रंगके फूलोंसे सजायी गयी थी तथा ऐरावत, पुण्डरीक और सार्वभौम नामक दिग्गजोंको भी भयभीत करनेवाली थी ॥५३ ॥
गदामादाय संक्रुद्धो मत्तो राक्षसपुङ्गवः ।
हरीन् समभिदुद्राव युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ॥ ५४ ॥
उस गदाको हाथमें लेकर क्रोधसे भरा हुआ राक्षस-शिरोमणि मत्त ( महापार्श्व ) प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा और वानरोंकी ओर दौड़ा ॥ ५४ ॥
अथर्षभः समुत्पत्य वानरो रावणानुजम् ।
मत्तानीकमुपागम्य तस्थौ तस्याग्रतो बली ॥ ५५ ॥
तब ऋषभ नामक बलवान् वानर उछलकर रावणके छोटे भाई मत्तानीक ( महापार्श्व ) के पास आ पहुँचे और उसके सामने खड़े हो गये ॥ ५५ ॥
तं पुरस्तात् स्थितं दृष्ट्रा वानरं पर्वतोपमम् । आजघानोरसि क्रुद्धो पर्वताकार वानरवीर हुए महापार्श्वने अपनी प्रहार किया ॥ ५६ ॥
स तयाभिहतस्तेन भिन्नवक्षाः समाधूतः उसकी उस गदाके वक्षःस्थल क्षत - विक्षत हो गदया वज्रकल्पया ॥ ५६ ॥
ऋषभको सामने खड़ा देख कुपित वज्रतुल्य गदासे उनकी छातीपर
गदया वानरर्षभः ।
सुस्राव रुधिरं बहु ॥ ५७ ॥
आघातसे वानरशिरोमणि ऋषभका गया । वे काँप उठे और अधिक मात्रामें खूनकी धारा बहाने लगे ॥ ५७ ॥।
स सम्प्राप्य चिरात् संज्ञामृषभो वानरेश्वरः ।
क्रुद्धो विस्फुरमाणौष्टो महापार्श्वमुदैक्षत ॥ ५८ ॥
बहुत देरके बाद होश में आनेपर वानरराज ऋषभ कुपित हो उठे और महापार्श्वकी ओर देखने लगे । उस समय उनके ओठ फड़क रहे थे ॥ ५८ ॥
स वेगवान् वेगवदभ्युपेत्य तं राक्षसं वानरवीरमुख्यः । संवर्त्य मुष्टिं सहसा जघान बाह्नन्तरे शैलनिकाशरूपः ॥ ५ ९ ॥ वानरवीरोंमें प्रधान ऋषभका रूप पर्वतके समान जान पड़ता था । वे बड़े वेगशाली थे । उन्होंने वेगपूर्वक उस राक्षसके पास पहुँचकर मुक्का ताना और सहसा उसकी छातीपर प्रहार किया ॥ ५ ९ ॥ स कृत्तमूलः सहसेव वृक्षः क्षितौ पपात क्षतजोक्षिताङ्गः ।
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१२६८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे तां चास्य घोरां यमदण्डकल्पां गदां प्रगृह्याशु तदा ननाद ॥ ६० ॥
फिर तो महापार्श्व जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे । इधर ऋषभ उस निशाचरकी यमदण्डके समान भयंकर गदाको शीघ्र ही हाथमें लेकर जोर - जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ६० ॥
मुहूर्तमासीत् स गतासुकल्पः
प्रत्यागतात्मा सहसा सुरारिः ।
उत्पत्य संध्याभ्रसमानवर्ण-स्तं वारिराजात्मजमाजघान ॥ ६१ ॥
देवद्रोही महापार्श्वं दो घड़ीतक मुर्देकी भाँति पड़ा रहा । फिर होशमें आनेपर वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया । उसका रक्तरञ्जित शरीर संध्याकालके बादलोंके समान लाल दिखायी देता था । उसने वरुणपुत्र ऋषभको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ६१ ॥
स मूच्छितो भूमितले पपात मुहूर्तमुत्पत्य पुनः ससंज्ञः । तामेव तस्याद्रिवराद्विकल्पां गदां समाविध्य जघान संख्ये ॥ ६२ ॥
उस चोटसे ऋषभ मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर वे पुनः उछलकर सामने आ गये और उन्होंने युद्धस्थलमें महापार्श्वकी उसी गदाको, जो किसी पर्वतराजकी चट्टानके समान जान पड़ती थी, घुमाकर उस निशाचरपर दे मारा ॥ ६२ ॥
सा तस्य रौद्रा समुपेत्य देहं रौद्रस्य देवाध्वरविप्रशत्रोः । बिभेद वक्षः क्षतजं च भूरि सुस्राव धात्वम्भ इवाद्रिराजः ॥ ६३ ॥
उसकी उस भयंकर गदाने देवता, यज्ञ और ब्राह्मणसे शत्रुता रखनेवाले उस रौद्र - राक्षसके शरीरपर चोट करके उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया । फिर तो जैसे पर्वतराज हिमालय गेरु आदि धातुओंसे मिला हुआ जल बहाता है, उसी प्रकार वह भी अधिक मात्रामें रक्त बहाने लगा ॥ ६३ ॥
अभिदुद्राव वेगेन गदां तस्य महात्मनः ।
तां गृहीत्वा गदां भीमामाविध्य च पुनः पुनः ॥ ६४ ॥
मत्तानीकं महात्मा स जघान रणमूर्धनि । उस समय उस राक्षसने महामना ऋषभके हाथसे अपनी गदा लेनेके लिये उनपर धावा किया; किंतु ॠषभने उस भयानक गदाको हाथमें लेकर बारंबार घुमाया और बड़े वेगसे महापार्श्वपर आक्रमण किया । इस तरह उन महामनस्वी वानर-वीरने युद्ध के मुहाने पर उस निशाचरकी जीवन लीला समाप्त कर दी थी ॥ ६४३ ॥
स स्वया गदया भग्नो विशीर्णदशनेक्षणः ॥ ६५ ॥
निपपात तदा मत्तो वज्राहत इवाचलः । अपनी ही गदाकी चोट खाकर महापार्श्वके दाँत टूट गये और आँखें फूट गयीं । वह वज्रके मारे हुए पर्वत - शिखर-की भाँति तत्काल धराशायी हो गया । ६५३ ॥
विशीर्णनयने भूमौ गतसत्त्वे गतायुषि ।
पतिते राक्षसे तस्मिन् विद्रुतं राक्षसं बलम् ॥ ६६ ॥
जिसकी आँखें नष्ट और चेतना विलुप्त हो गयी थी, वह राक्षस महापार्श्व जब गतायु होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब राक्षसों की सेना सब ओर भाग चली ॥ ६६ ॥
तस्मिन् हते भ्रातरि रावणस्य तन्नैर्ऋतानां बलमर्णवाभम् । त्यक्तायुधं केवलजीवितार्थ दुद्राव भिन्नार्णवसंनिकाशम् ॥ ६७ ॥
रावणके भाई महापार्श्वका वध हो जानेपर राक्षसोंकी वह समुद्र के समान विशाल सेना हथियार फेंककर केवल जान बचाने के लिये सब ओर भागने लगी, मानो महासागर फूटकर सब ओर बहने लगा हो ॥ ६७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्तरवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ ७० ॥
एकसप्ततितमः सर्गः अतिकायका भयंकर युद्ध और लक्ष्मणके द्वारा उसका वध स्वबलं व्यथितं दृष्ट्वा तुमुलं लोमहर्षणम् । अतिकायोऽद्विसंकाशो देवदानवदर्पहा ॥ ३ ॥
भ्रातॄंश्च निहतान् दृष्ट्वा शक्रतुल्यपराक्रमान् ॥ १ ॥ अतिकायने देखा, शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाली
पितृव्यौ चापि संदृश्य समरे संनिपातितौ । मेरी भयंकर सेना व्यथित हो उठी है, इन्द्रके तुल्य पराक्रमी युद्धोन्मत्तं च मत्तं च भ्रातरौ राक्षसोत्तमौ ॥ २ ॥ मेरे भाइयोंका संहार हो गया है तथा मेरे चाचा — दोनों भाई
चुकोप च महातेजा ब्रह्मदत्तवरो युधि । युद्धोन्मत्त ( महोदर ) और मत्त ( महापार्श्व ) भी समराङ्गण-
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युद्धकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः १२६ ९ में मार गिराये गये हैं, तब उस महातेजस्वी निशाचरको बड़ा क्रोध हुआ । उसे ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त हो चुका था । अतिकाय पर्वतके समान विशालकाय तथा देवता और दानवोंके दर्पका दलन करनेवाला था । १-३ ॥
स भास्करसहस्रस्य संघातमिव भाखरम् ।
रथमारुह्य शक्रारिरभिदुद्राव वानरान् ॥ ४ ॥
वह इन्द्रका शत्रु था । उसने सहस्रों सूर्योके समूहकी भाँति देदीप्यमान तेजस्वी रथपर आरूढ़ होकर वानरोंपर धावा किया ॥ ४ ॥
स विस्फार्य तदा चापं किरीटी मृष्टकुण्डलः ।
नाम संश्रावयामास ननाद च महाखनम् ॥ ५ ॥
उसके मस्तकपर किरीट और कानोंमें शुद्ध सुवर्णके बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे । उसने धनुषकी टङ्कार करके अपना नाम सुनाया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ५ ॥
तेन सिंहप्रणादेन नामविश्रावणेन च ।
ज्याशब्देन च भीमेन त्रासयामास वानरान् ॥ ६ ॥
उस सिंहनादसे, अपने नामकी घोषणासे और प्रत्यञ्चा-की भयानक टङ्कारसे उसने वानरोंको भयभीत कर दिया |
ते दृष्ट्ा देहमाहात्म्यं कुम्भकर्णोऽयमुत्थितः ।
भयार्ता वानराः सर्वे संश्रयन्ते परस्परम् ॥ ७ ॥
उसके शरीरकी विशालता देखकर वे वानर ऐसा मानने लगे कि यह कुम्भकर्ण ही फिर उठकर खड़ा हो गया । यह सोचकर सब वानर भयसे पीड़ित एक - दूसरेका सहारा लेने लगे ॥ ७ ॥
ते तस्य रूपमालोक्य यथा विष्णोस्त्रिविक्रमे ।
भयाद् वानरयोधास्ते विद्रवन्ति ततस्ततः ॥ ८ ॥
त्रिविक्रम - अवतारके समय बढ़े हुए भगवान् विष्णुके विराट् रूपकी भाँति उसका शरीर देखकर वे वानर - सैनिक भयके मारे इधर - उधर भागने लगे ॥ ८ ॥
तेऽतिकायं समासाद्य वानरा मूढचेतसः ।
शरण्यं शरणं जग्मुर्लक्ष्मणाग्रजमाहवे ॥ ९ ॥
अतिकायके निकट जाते ही वानरोंके चित्तपर मोह छा गया । वे युद्धस्थलमें लक्ष्मणके बड़े भाई शरणागतवत्सल भगवान् श्रीरामकी शरण में गये ॥ ९ ॥
ततोऽतिकायं काकुत्स्थो रथस्थं पर्वतोपमम् ।
ददर्श धन्विनं दूराद् गर्जन्तं कालमेघवत् ॥ १० ॥
रथपर बैठे हुए पर्वताकार अतिकायको श्रीरामचन्द्रजीने भी देखा । वह हाथमें धनुष लिये कुछ दूरपर प्रलयकालके मेघकी भाँति गर्जना कर रहा था ॥ १० ॥
स तं दृष्ट्वा महाकायं राघवस्तु सुविस्मितः ।
वानरान् सान्त्वयित्वा च विभीषणमुवाच ह ॥ ११ ॥
उस महाकाय निशाचर को देखकर श्रीरामचन्द्रजीको भी बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने वानरोंको सान्त्वना देकर विभीषणसे पूछा ॥ ११ ॥
कोऽसौ पर्वतसंकाशो धनुष्मान् हरिलोचनः ।
युक्ते हयसहस्रेण विशाले स्यन्दने स्थितः ॥ १२ ॥
' विभीषण! हजार घोड़ोंसे जुते हुए विशाल रथपर बैठा हुआ वह पर्वताकार निशाचर कौन है? उसके हाथमें धनुष है और आँखें सिंहके समान तेजस्विनी दिखायी देती हैं ।
य एष निशितैः शूलैः सुतीक्ष्णैः प्रासतोमरैः ।
अर्चिष्मद्भिर्वृतो भाति भूतैरिव महेश्वरः ॥ १३ ॥
" यह भूतोंसे घिरे हुए भूतनाथ महादेवजीके समान तीखे शूल तथा अत्यन्त तेजधारवाले तेजस्वी प्रासों और तोमरोंसे घिरकर अद्भुत शोभा पा रहा है ॥ १३ ॥
कालजिह्वाप्रकाशाभिर्य एषोऽभिविराजते ।
आवृतो रथशक्तीभिर्विद्युद्भिरिव तोयदः ॥ १४ ॥
" इतना ही नहीं, कालकी जिहाके समान प्रकाशित होने-वाली रथशक्तियोंसे घिरा हुआ यह वीर निशाचर विद्यु-न्मालाओंसे आवृत मेघके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १४ ॥
धनूंषि चास्य सज्जानि हेमपृष्ठानि सर्वशः ।
शोभयन्ति रथश्रेष्ठं शक्रचापमिवाम्बरम् ॥ १५ ॥
" जिनके पृष्ठभागमें सोने मढ़े हुए हैं, ऐसे अनेकानेक सुसज्जित धनुष उसके श्रेष्ठ रथकी सब ओरसे उसी तरह शोभा बढ़ा रहे हैं, जैसे इन्द्रधनुष आकाशको सुशोभित करता है ॥
य एष रक्षःशार्दूलो रणभूमिं विराजयन् ।
अभ्येति रथिनां श्रेष्ठो रथेनादित्यवर्चसा ॥ १६ ॥
" यह राक्षसों में सिंहके समान पराक्रमी और रथियोंमें श्रेष्ठ वीर अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा रणभूमिकी शोभा बढ़ाता हुआ मेरे सामने आ रहा है ॥ १६ ॥
ध्वजशृङ्गप्रतिष्ठेन राहुणाभिविराजते ।
सूर्यरश्मिप्रभैर्बाणैर्दिशो दश विराजयन् ॥ १७ ॥
“ इसके ध्वजके शिखरपर पताकामें राहुका चिह्न अङ्कित जिससे रथकी बड़ी शोभा हो रही है । यह सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बाणोंसे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहा है ॥ १७ ॥
त्रिनतं मेघनिर्ह्रादं हेमपृष्ठमलंकृतम् ।
शतक्रतुधनुःप्रख्यं धनुश्चास्य विराजते ॥ १८ ॥
" इसके धनुषका पृष्ठभाग सोनेसे मढ़ा हुआ तथा पुष्प आदिसे अलंकृत है । वह आदि, मध्य और अन्त तीन स्थानोंमें झुका हुआ है । उसकी प्रत्यञ्चासे मेघोंकी गर्जनाके