Ramayana 2 — पृष्ठ 481–490
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490
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१२८० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे किं पुनर्मानुषं धृष्यं निहनिष्यसि राघवम् ॥ १८ ॥
' बेटा! कोई भी ऐसा प्रतिद्वन्द्वी रथी नहीं है, जो तुम्हारा सामना कर सके । तुमने देवराज इन्द्रको भी पराजित किया है । फिर आसानीसे जीत लेने योग्य एक मनुष्यको परास्त करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात है? तुम अवश्य ही रघुवंशी रामका वध करोगे ' ॥ १८ ॥
तथोक्तो राक्षसेन्द्रेण प्रत्यगृह्णान्महाशिषः ।
ततस्त्विन्द्रजिता लङ्का सूर्यप्रतिमतेजसा ॥ १ ९ ॥
राजा प्रतिवीर्येण द्यौरिवार्केण भास्वता । राक्षसराजके ऐसा कहने पर इन्द्रजित्ने उसके उस महान् आशीर्वादको सिर झुकाकर ग्रहण किया । फिर तो जैसे अनुपम तेजस्वी सूर्य॑से आकाशकी शोभा होती है, उसी प्रकार अप्रतिम शक्तिशाली और सूर्यतुल्य तेजस्वी इन्द्रजित् से लङ्कापुरी सुशोभित होने लगी ॥ १ ९ ३ ॥ स सम्प्राप्य महातेजा युद्धभूमिमरिंदमः ॥ २० ॥
स्थापयामास रक्षांसि रथं प्रति समन्ततः । महातेजस्वी शत्रुदमन इन्द्रजित्ने रणभूमिमें पहुँचकर अपने रथके चारों ओर राक्षसोंको खड़ा कर दिया ॥ २०३ ॥
ततस्तु हुतभोक्तारं हुतभुक्सदृशप्रभः ॥ २१ ॥
जुहुवे राक्षसश्रेष्ठो विधिवन्मन्त्रसत्तमैः ।
स हविर्लाजसत्कारैर्माल्यगन्धपुरस्कृतैः ॥ २२ ॥
जुहुवे पावकं तत्र राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् । फिर बीचमें रथसे उतरकर पृथ्वीपर अग्निकी स्थापना करके अग्नितुल्य तेजस्वी उस राक्षसशिरोमणि वीरने चन्दन, फूल तथा लावा आदिके द्वारा अग्निदेवका पूजन किया । उसके बाद उस प्रतापी राक्षसराजने विधिपूर्वक श्रेष्ठ मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उस अग्निमें हविष्य की आहुति दी२१-२२३ शस्त्राणि शरपत्राणि समिधोऽथ बिभीतकाः ॥ २३ ॥
लोहितानि च वासांसि स्रुवं कार्ष्णायसं तथा । उस समय शस्त्र ही अग्निवेदीके चारों ओर बिछाने के लिये कुश या कासके पत्ते थे । बहेड़े की लकड़ीसे ही समिधा-का काम लिया गया था । लाल रंगके वस्त्र उपयोगमें लाये गये और उस आभिचारिक यज्ञमें जो स्रुवा था, वह लोहेका बना हुआ था ॥ २३३ ॥
स तत्राग्निं समास्तीर्य शरपत्रैः सतोमरैः ॥ २४ ॥
छागस्य कृष्णवर्णस्य गलं जग्राह जीवतः । उसने वहाँ तोमरसहित शस्त्ररूपी कासके पत्तोंको अग्नि चारों ओर फैलाकर होमके लिये काले रंगके जीवित बकरेका गला पकड़ा || २४३ ॥ सकृदेव समिद्धस्य विधूमस्य महार्चिषः ॥ २५ ॥
बभूवुस्तानि लिङ्गानि विजयं यान्यदर्शयन् । एक ही बार दी हुई उस आहुतिसे अग्नि प्रज्वलित हो उठी । उसमें धूम नहीं दिखायी देता था और आग की बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं । उस समय उस अग्निसे वे सभी चिह्न प्रकट हुए, जो पूर्वकालमें उसे अपनी विजय दिखा चुके थे— युद्धस्थलमें उसको विजयकी प्राप्ति करा चुके थे ॥ २५३ ॥
प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तकाञ्चनसंनिभः ॥ २६ ॥
हविस्तत् प्रतिजग्राह पावकः स्वयमुत्थितः । अग्निदेवकी शिखा दक्षिणावर्त दिखायी देने लगी । उनका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान सुन्दर था । इस रूपमें वे स्वयं प्रकट होकर उसके दिये हुए हविष्यको ग्रहण कर रहे थे ॥ २६३ ॥
सोऽस्त्रमाहारयामास ब्राह्ममस्त्रविशारदः ॥ २७ ॥
धनुश्चात्मरथं चैव सर्व तत्राभ्यमन्त्रयत् । तदनन्तर अस्त्रविद्याविशारद इन्द्रजित्ने ब्रह्मास्त्रका आवाहन किया और अपने धनुष तथा रथ आदि सब वस्तुओं-को वहाँ सिद्ध ब्रह्मास्त्रमन्त्रसे अभिमन्त्रित किया ॥ २७३ ॥
तस्मिन्नाहूयमानेऽस्त्रे हूयमाने च पावके ।
सार्कग्रहेन्दुनक्षत्रं वितत्रास नभस्थलम् ॥ २८ ॥
जब अग्निमें आहुति देकर उसने ब्रह्मास्त्रका आवाहन किया, तब सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह तथा नक्षत्रोंके साथ अन्तरिक्ष-लोकके सभी प्राणी भयभीत हो गये । २८ ॥ स पावकं पावकदीप्ततेजा हुत्वा महेन्द्रप्रतिमप्रभावः । सचापबाणासिरथाश्व सूतः खेऽन्तर्दधेऽत्मानमचिन्त्यवीर्यः ॥ २ ९ ॥ जिसका तेज अग्निके समान उद्दीप्त हो रहा था तथा जो देवराज इन्द्रके समान अनुपम प्रभावसे युक्त था; उस अचिन्त्य
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त्रिसप्ततितमः सर्गः १२८१ युद्धकाण्डे पराक्रमी इन्द्रजित्ने अग्निमें आहुति देनेके पश्चात् धनुष, बाण, रथ, खड्ग, घोड़े और सारथिसहित अपने - आपको आकाशमें अदृश्य कर लिया ॥ २ ९ ॥
ततो हयरथाकीर्ण पताकाध्वजशोभितम् ।
निर्ययौ राक्षसवलं नर्दमानं युयुत्सया ॥ ३० ॥
इसके बाद वह घोड़े और रथोंसे व्याप्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित राक्षससेनामें गया, जो युद्धकी इच्छासे गर्जना कर रही थी ॥ ३० ॥
ते शरैर्बहुभिश्चित्रैस्तीक्ष्णवेगैरलंकृतैः ।
तोमरैरङ्कुशैश्वापि वानराञ्जघ्नुराहवे ॥ ३१ ॥
वे राक्षस दुःसह वेगवाले, सुवर्णभूषित, विचित्र एवं बहु-संख्यक बाणों, तोमरों और अङ्कुशोद्वारा रणभूमिमें वानरोंपर प्रहार कर रहे थे ॥ ३१ ॥
रावणिस्तु सुसंक्रुद्ध स्तान् निरीक्ष्य निशाचरान् ।
हृष्टा भवन्तो युध्यन्तु वानराणां जिघांसया ॥ ३२ ॥
रावणपुत्र इन्द्रजित् शत्रुओंके प्रति अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ था । उसने निशाचरोंकी ओर देखकर कहा— ' तुम लोग वानरोंको मार डालने की इच्छासे हर्ष और उत्साहपूर्वक युद्ध करो ' ॥ ३२ ॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे गर्जन्तो जयकाङ्क्षिणः ।
अभ्यवर्षस्ततो घोरं वानराञ्शरवृष्टिभिः ॥ ३३ ॥
इन्द्रजित् तु तदा क्रुद्धो महातेजा महाबलः ।
वानराणां शरीराणि व्यधमद् रावणात्मजः ॥ ३६ ॥
उस समय कुपित हुए महातेजस्वी महाबली रावणपुत्र इन्द्रजित्ने वानरोंके शरीरों को छिन्न - भिन्न कर डाला ॥ ३६ ॥
शरेणैकेन च हरीन् नव पञ्च च सप्त च ।
विभेद समरे क्रुद्धो राक्षसान् सम्प्रहर्षयन् ॥ ३७ ॥
रणभूमिमें राक्षसोंका हर्ष बढ़ाता हुआ इन्द्रजित् रोषसे भरकर एक - एक बाणसे पाँच - पाँच, सात - सात तथा नौ - नौ वानरोंको विदीर्ण कर डालता था ॥ ३७ ॥
स शरैः सूर्यसंकाशैः शातकुम्भविभूषणैः ।
वानरान् समरे वीरः प्रममाथ सुदुर्जयः ॥ ३८ ॥
उस अत्यन्त दुर्जय वीरने सुवर्णभूषित सूर्यतुल्य तेजस्वी सायकोंद्वारा समरभूमिमें वानरोंको मथ डाला ॥ ३८ ॥
ते भिन्नगात्राः समरे वानराः शरपीडिताः ।
पेतुर्मथितसंकल्पाः सुरैरिव महासुराः ॥ ३ ९ ॥
रणक्षेत्रमें देवताओं द्वारा पीड़ित हुए बड़े - बड़े असुरों की भाँति इन्द्रजित् के बाणोंसे व्यथित हुए वानरोंके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये । उनकी विजयकी आशापर तुषारपात हो गया और वे अचेत - से होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३ ९ ॥
ते तपन्तमिवादित्यं घोरैर्बाणगभस्तिभिः ।
संक्रुद्धाः संयुगे वानरर्षभाः ॥ ४० ॥
अभ्यधावन्त उसके इस प्रकार प्रेरणा देनेपर विजयकी अभिलाषा बाणरूपी भयंकर किरणोंद्वारा सूर्यके रखनेवाले वे समस्त राक्षस जोर - जोर से गर्जना करते हुए वहाँ उस समय युद्धस्थलमें वानरोंने बड़े रोष समान तपते हुए इन्द्रजित्पर प्रधान प्रधान वानरोंपर बाणोंकी भयंकर वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥
साथ धावा किया ॥ ४० ॥
स तु नालीकनाराचैर्गदाभिर्मुसलैरपि । सर्वे भिन्नदेहा विचेतसः । रक्षोभिः संवृतः संख्ये वानरान् विचकर्ष ह ॥ ३४ ॥ ततस्तु वानराः
व्यथिता विद्रवन्ति स्म रुधिरेण समुक्षिताः ॥ ४१ ॥
उस युद्धस्थलमें राक्षसोंसे घिरे रहकर इन्द्रजित्ने भी बाणोंसे शरीरके क्षत - विक्षत हो जानेसे वे सब नालीक, नाराच, गदा और मुसल आदि अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा परंतु उसके होकर वानर अचेत से हो गये और खूनसे लथपथ हो व्यथित वानरोंका संहार आरम्भ किया ॥ ३४ ॥
इधर - उधर भागने लगे ॥ ४१ ॥
ते वध्यमानाः समरे वानराः पादपायुधाः ॥ अभ्यवर्षन्त सहसा रावणि शैलपादपैः ॥ ३५ ॥ रामस्यार्थे पराक्रम्य वानरास्त्यक्तजीविताः
नर्दन्तस्तेऽनिवृत्तास्तु समरे सशिलायुधाः ॥ ४२ ॥
समराङ्गणमें उसके अस्त्र - शस्त्रोंसे घायल होनेवाले वानर वानरोंने भगवान् श्रीरामके लिये अपने जीवनका मोह भी जो वृक्षोंसे ही हथियारका काम लेते थे, सहसा रावणकुमार-पर शैल - शिखरों और वृक्षोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३५ ॥ छोड़ दिया था । वे पराक्रमपूर्वक गर्जना करते हुए हाथमें
बा ० रा ० ५.९.१७-
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१२८२ भीमवाल्मीकीय रामायणे शिलाएँ लिये समरभूमिमें डटे रहे - युद्धभूमिसे पीछे अईयामास संक्रुद्धः कालाग्निरिव न हटे ॥ ४२ ॥
ते दुमैः पर्वताग्रैश्च शिलाभिश्च प्लवंगमाः ।
अभ्यवर्षन्त समरे रावणि समवस्थिताः ॥ ४३ ॥
समराङ्गणमें खड़े हुए वे वानर रावणकुमारपर वृक्षों, पर्वतशिखरों और शिलाओंकी वर्षा करने लगे ॥ ४३ ॥
तं द्रुमाणां शिलानां च वर्षे प्राणहरं महत् ।
व्यपोहत महातेजा रावणिः समितिंजयः ॥ ४४ ॥
वृक्षों और शिलाओंकी वह भारी दृष्टि राक्षसों के प्राण हर लेनेवाली थी; परंतु समरविजयी महातेजस्वी रावणपुत्रने अपने बाणोंद्वारा उसे दूर हटा दिया ॥ ४४ ॥
ततः पावकसंकाशैः शरैराशीविषोपमैः ।
वानराणामनीकानि बिभेद समरे प्रभुः ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् विषधर सर्पोंके समान भयंकर और अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा उस शक्तिशाली वीरने समराङ्गणमें वानर-सैनिकोंको विदीर्ण करना आरम्भ किया ॥ ४५ ॥
अष्टादशशरैस्तीक्ष्णैः स विद्ध्वा गन्धमादनम् ।
विव्याध नवभिश्चैव नलं दूरादवस्थितम् ॥ ४६ ॥
उसने अठारह तीखे बाणोंसे गन्धमादनको घायल करके दूर खड़े हुए नलपर भी नौ बाणोंका प्रहार किया ॥ ४६ ॥
सप्तभिस्तु महावीर्यो मैन्दं मर्मविदारणैः ।
पञ्चभिर्विशिखैश्चैव गजं विव्याध संयुगे ॥ ४७ ॥
इसके बाद महापराक्रमी इन्द्रजित्ने सात मर्मभेदी सायकों-द्वारा मैन्दको और पाँच बाणोंसे गजको भी युद्धस्थल में बाँध डाला ॥ ४७ ॥
जाम्बवन्तं तु दशभिर्नीलं त्रिंशद्भिरेव च ।
सुग्रीवमृषभं चैव सोऽङ्गदं द्विविदं तथा ॥ ४८ ॥
घोरैर्दत्तवरैस्तीक्ष्णैर्निष्प्राणानकरोत् तदा । फिर दस बाणोंसे जाम्बवान्को और तीस सायकोंसे नीलको घायल कर दिया । तदनन्तर वरदानमें प्राप्त हुए बहुसंख्यक तीखे और भयानक सायकोंका प्रहार करके उस समय उसने सुग्रीव, ऋषभ, अङ्गद और द्विविदको भी निष्प्राण - सा कर दिया || ४८३ ॥ अन्यानपि तथा मुख्यान् वानरान् बहुभिः शरैः ॥४ ९ ॥ मूच्छितः । सब ओर फैली हुई प्रलयाग्नि के समान अत्यन्त रोषसे भरे हुए इन्द्रजित्ने दूसरे दूसरे श्रेष्ठ वानरोंको भी बहुसंख्यक बाणकी मारसे व्यथित कर दिया ॥ ४ ९ ३ ॥ स शरैः सूर्यसंकाशैः सुमुक्तैः शीघ्रगामिभिः ॥ ५० ॥
वानराणामनीकानि निर्ममन्थ महारणे । उस महासमर में रावणकुमारने अच्छी तरह छोड़े हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी शीघ्रगामी सायकोंद्वारा वानरोंकी सेनाओं को मथ डाला || ५०३ ॥ आकुलां वानरी सेनां शरजालेन पीडिताम् ॥ ५१ ॥
हृष्टः स परया प्रीत्या ददर्श क्षतजोक्षिताम् । उसके बाणजालसे पीड़ित हो वानरी सेना व्याकुल हो उठी और रक्तसे नहा गयी । उसने बड़े हर्ष और प्रसन्नता के साथ शत्रुसेनाकी इस दुरवस्थाको देखा ॥ ५१३ ॥
पुनरेव महातेजा राक्षसेन्द्रात्मजो बली ॥ ५२ ॥
संसृज्य बाणवर्षे च शस्त्रवर्षे च दारुणम् ।
ममर्द वानरानीकं परितस्त्विन्द्रजिद् बली ॥ ५३ ॥
वह राक्षसराजकुमार इन्द्रजित् बड़ा तेजस्वी, प्रभावशाली एवं बलवान् था । उसने सब ओरसे बाणों तथा अन्यान्य अस्त्र - शस्त्रोंकी भयंकर वर्षा करके पुनः वानर सेनाको रौंद डाला ॥ ५२-५३ ॥ स्वसैन्यमुत्सृज्य समेत्य तूर्ण महाहवे वानरवाहिनीषु । अदृश्यमानः शरजालमुग्रं ववर्ष नीलाम्बुधरो यथाम्बु ॥ ५४ ॥
तत्पश्चात् वह अपनी सेनाके ऊपरी भागको छोड़कर उस महासमरमें तुरंत वानर सेना के ऊपर जा पहुँचा और स्वयं आकाशमें अदृश्य रहकर भयानक बाणसमूहकी उसी तरह वर्षा करने लगा, जैसे काला मेघ जलकी वृष्टि करता है ॥ ५४ ॥
ते शक्रजिद्वाणविशीर्णदेहा मायाहता विस्वरमुन्नदन्तः । रणे निपेतुर्हरयो ऽद्विकल्पा यथेन्द्रवज्राभिहता नगेन्द्राः ॥ ५५ ॥
जैसे इन्द्रके वज्रसे आहत हो बड़े - बड़े पर्वत धराशायी हो
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युद्धकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः १२८३ जाते हैं, उसी प्रकार वे पर्वताकार वानर रणभूमिमें इन्द्रजित् के बागोद्वारा छलसे मारे जाकर शरीरके क्षत - विक्षत हो जानेसे विकृत स्वर में चीखते - चिल्लाते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५५ ॥
ते केवलं संददृशुः शिताग्रान् वाणान् रणे वानरवाहिनीषु । मायाविगूढं च सुरेन्द्रशत्रुं न चात्र तं राक्षसमप्यपश्यन् ॥ ५६ ॥
रणभूमि में वानर सेनाओंपर जो पैनी धारवाले बाण गिर रहे थे, केवल उन्हींको वे वानर देख रहे थे 1 । मायासे छिपे हुए उस इन्द्रद्रोही राक्षसको कहीं नहीं देख पाते थे । ततः स रक्षोधिपतिर्महात्मा
सर्वा दिशो वाणगणैः शिताग्रैः ।
प्रच्छादयामास रविप्रकाश-विदारयामास च वानरेन्द्रान् ॥ ५७ ॥
उस समय उस महाकाय राक्षसराजने तीखी धारवाले सूर्य तुल्यतेजस्वी बाण समूहद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको ढक दिया और वानर सेनापतियों को घायल कर दिया ॥ ५७ ॥
स शूलनिस्त्रिंशपरश्वधानि व्याविद्धदीप्तानलसप्रभाणि 1 सविस्फुलिङ्गोज्ज्वलपावकानि ववर्ष तीव्रं लवगेन्द्रसैन्ये ॥ ५८ ॥
उदीक्षमाणा गगनं केचिन्नेत्रेषु ताडिताः ।
शरैर्विविशुरन्योन्यं पेतुश्च जगतीतले ॥ ६१ ॥
कितने ही वानर आकाशकी ओर देख रहे थे । उसी समय उनके नेत्रोंमें बाणोंकी चोट लगी, अतः वे एक दूसरे के शरीर से सट गये और पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६१ ॥
हनूमन्तं च सुग्रीवमङ्गदं गन्धमादनम् ।
जाम्बवन्तं सुषेणं च वेगदर्शिनमेव च ॥ ६२ ॥
मैन्दं च द्विविदं नीलं गवाक्षं गवयं तथा ।
केसरिं हरिलोमानं विद्युदंष्ट्रं च वानरम् ॥ ६३ ॥
सूर्याननं ज्योतिर्मुखं तथा दधिमुखं हरिम् ।
पावकाक्षं नलं चैव कुमुदं चैव वानरम् ॥ ६४ ॥
प्रासैः शूलैः शितैर्बाणैरिन्द्रजिन्मन्त्रसंहितैः ।
विव्याध हरिशार्दूलान् सर्वास्तान् राक्षसोत्तमः ॥ ६५ ॥
राक्षसप्रवर इन्द्रजित्ने दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित प्रासों, शूलों और पैने बाणोंद्वारा हनुमान्, सुग्रीव, अंगद, गन्धमादन, जाम्बवान्, सुषेण, वेगदशीं, मैन्द, द्विविद, नील, गवाक्ष, गवय, केसरी, हरिलोमा, विद्युद्दंष्ट्र, सूर्यानन, ज्योतिर्मुख, दधिमुख, पावकाक्ष, नल और कुमुद आदि सभी श्रेष्ठ वानरोंको घायल कर दिया ॥ ६२-६५ ॥ स वै गदाभिर्हरियूथमुख्यान् निर्भिद्य वाणैस्तपनीयवर्णैः । वह वानरराजकी सेनामें बढ़े हुए प्रज्वलित पावकके वर्ष रामं शरवृष्टिजालैः समान दीप्तिमान् तथा चिनगारियोंसहित उज्ज्वल आग प्रकट सलक्ष्मणं भास्कररश्मिकल्पैः ॥ ६६ ॥
करनेवाले शूल, खड्ग और फरसोंकी दु: सह वृष्टि करने गदाओं और सुवर्णके समान कान्तिमान् बाणोंद्वारा वानर-लगा ॥ ५८ ॥ यूथपतियोंको क्षत - विक्षत करके वह लक्ष्मणसहित श्रीरामपर
ततो ज्वलनसंकाशैर्बाणैर्वानरयूथपाः । सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बाणसमूहोंकी वर्षा करने ताडिताः शक्रजिद्वाणैः प्रफुल्ला इव किंशुकाः ॥ ५ ९ ॥ लगा ॥ ६६ ॥
इन्द्रजित् के चलाये हुए अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंसे घायल स बाणवषैरभिवृष्यमाणो हो रक्तसे नहाकर सारे वानर - यूथपति खिले हुए पलाश वृक्षके धारानिपातानिव तानचिन्त्य । समान जान पड़ते थे ॥ ५ ९ ॥ समीक्षमाणः परमाद्भुतश्री
तेऽन्योन्यमभिसर्पन्तो निनदन्तश्च विखरम् । रामस्तदा लक्ष्मणमित्युवाच ॥ ६७ ॥
राक्षसेन्द्रास्त्रनिर्भिन्ना निपेतुर्बानरर्षभाः ॥ ६० ॥ उस बाणवर्षाके लक्ष्य बने हुए परम अद्भुत शोभासे
राक्षसराज इन्द्रजित् के बाणोंसे विदीर्ण हो वे श्रेष्ठ वानर सम्पन्न श्रीराम पानीकी धाराके समान गिरनेवाले उन एक दूसरेके सामने जाकर विकृत स्वरमें चीत्कार करते हुए बाणोंकी कोई परवा न करके लक्ष्मणकी ओर देखते हुए धराशायी हो जाते थे ॥ ६० ॥ बोले ॥ ६७ ॥
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१२८४ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे असौ पुनर्लक्ष्मण राक्षसेन्द्रो ब्रह्मास्त्रमाश्रित्य सुरेन्द्रशत्रुः निपातयित्वा हरिसैन्यमस्मा-शितैः शरैरर्दयति प्रसक्तम् ॥ ६८ ॥
' लक्ष्मण | वह इन्द्रद्रोही राक्षसराज इन्द्रजित् प्राप्त हुए ब्रह्मास्त्रका सहारा लेकर वानर सेनाको धराशायी करने के पश्चात् अब तीखे बाणोंद्वारा हम दोनोंको भी पीड़ित कर रहा है ॥ ६८ ॥
स्वयंभुवा दत्तवरो महात्मा समाहितोऽन्तर्हितभीमकायः कथं नु शक्यो युधि नष्टदेहो निहन्तुमद्येन्द्रजिदुद्यतास्त्रः ॥ ६ ९ ॥ ' ब्रह्माजीसे वरदान पाकर सदा सावधान रहनेवाले इस महामनस्वी वीरने अपने भीषण शरीरको अदृश्य कर लिया है । युद्ध में इस इन्द्रजित् का शरीर तो दिखायी ही नहीं देता, पर यह अस्त्रोंका प्रयोग करता जा रहा है । ऐसी दशा में इसे हमलोग किस तरह मार सकते हैं? ॥ ६ ९ ॥ स्वयंभूर्भगवानचिन्त्य-स्तस्यैतदत्रं प्रभवश्च योऽस्य । बाणावपातं त्वमिहाद्य धीमन् मया सहाव्यग्रमनाः सहस्व ॥ ७० ॥
' स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माका स्वरूप अचिन्त्य है । वे ही इस जगत् के आदि कारण हैं । मैं समझता हूँ, उन्हींका यह अस्त्र अतः बुद्धिमान् सुमित्राकुमार! तुम मनमें किसी प्रकारकी घबराहट न लाकर मेरे साथ यहाँ चुपचाप खड़े हो इन बाणों-की मार सहो ॥ ७० ॥
प्रच्छादयत्येष हि राक्षसेन्द्रः सर्वा दिशः सायकवृष्टिजालैः । एतच्च सर्व पतिताश्यशूरं न भ्राजते वानरराज सैन्यम् ॥ ७१ ॥
" यह राक्षसराज इन्द्रजित् इस समय बाण - समूहोंकी वर्षा करके सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित किये देता है । वानरराज सुग्रीव की यह सारी सेना, जिसके प्रधान प्रधान शूरवीर धराशायी हो गये हैं, अब शोभा नहीं पा रही है ॥ ७१ ॥
तु पतितो विसंज्ञौ
निवृत्तयुद्ध हतहर्षौ ।
ध्रुवं प्रवेक्ष्यत्यमरारिवास-मसौ समासाद्य रणाग्यलक्ष्मीम् ॥ ७२ ॥
' जब हम दोनों हर्ष एवं रोषसे रहित तथा युद्ध से निवृत्त हो अचेत से होकर गिर जायँगे, तब हमें उस अवस्थामें देख युद्ध के मुहाने पर विजय लक्ष्मीको पाकर अवश्य ही यह राक्षस-पुरी लङ्कामें लौट जायगा ' ॥ ७२ ॥
ततस्तु ताविन्द्रजितोऽस्त्रजालै-बभूवतुस्तत्र तदा विशस्तौ । स चापि तौ तत्र विषादयित्वा ननाद हर्षाद् युधि राक्षसेन्द्रः ॥ ७३ ॥
तदनन्तर वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ इन्द्र-जित् के बाण समूहों से बहुत घायल हो गये । उस समय उन दोनोंको युद्ध में पीड़ित करके उस राक्षसराजने बड़े हर्षके साथ गर्जना की ॥ ७३ ॥
ततस्तदा वानरसैन्यमेवं रामं च संख्ये सह लक्ष्मणेन । विषादयित्वा सहसा विवेश पुरीं दशग्रीवभुजाभिगुप्ताम् । संस्तूयमानः स तु यातुधानैः पित्रे च सर्व हृषितोऽभ्युवाच ॥ ७४ ॥
इस प्रकार संग्राममें वानरोंकी सेना तथा लक्ष्मणसहित श्रीरामको मूर्छित करके इन्द्रजित् सहसा दशमुख रावणकी भुजाओं द्वारा पालित लङ्कापुरीमें चला गया । उस समय समस्त निशाचर उसकी स्तुति कर रहे थे । वहाँ जाकर उसने पितासे प्रसन्नतापूर्वक अपनी विजयका सारा समाचार बताया ॥ ७४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७३ ॥
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युद्धकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः १२८५ चतुःसप्ततितमः सर्गः जाम्बवान् के आदेशसे हनुमान् जीका हिमालयसे दिव्य ओषधियोंके पर्वतको लाना और उन ओषधियोंकी गन्धसे श्रीराम, लक्ष्मण एवं समस्त वानरोंका पुनः स्वस्थ होना तयोस्तदासादितयो रणा मुमोह सैन्यं हरियूथपानाम् । सुग्रीवनीलाङ्गद जाम्बवन्तो न चापि किंचित् प्रतिपेदिरे ते ॥ १ ॥
युद्धके मुहानेपर जब वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण निश्चेष्ट होकर पड़ गये, तब वानर सेनापतियोंकी वह सेना किंकर्तव्यविमूढ हो गयी । सुग्रीव, नील, अंगद और जाम्बवान्-को भी उस समय कुछ नहीं सूझता था ॥ १ ॥
ततो विषण्णं समवेक्ष्य सर्वे
विभीषणो बुद्धिमतां वरिष्ठः ।
उवाच शाखामृगराजवीरा-नाश्वासयन्नप्रतिमैर्वचोभिः ॥ २ ॥
उस समय सबको विषादमें डूबा हुआ देख बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विभीषणने वानरराजके उन वीर सैनिकोंको आश्वासन देते हुए अनुपम वाणी में कहा- ॥ २ ॥
मा भैष्ट नास्त्यत्र विषादकालो यदार्यपुत्रौ ह्यवश विषण्णौ । स्वयंभुवो वाक्यमथोद्वहन्ती यत्सादिताविन्द्रजितास्त्रजालैः ॥ ३ ॥
* वानर वीरो! आपलोग भयभीत न हों । यहाँ विषादका अवसर नहीं है; क्योंकि इन दोनों आर्यपुत्रोंने ब्रह्माजीके वचनोंका आदर एवं पालन करते हुए स्वयं ही हथियार नहीं उठाये थे; इसीलिये इन्द्रजित्ने इन दोनोंको अपने अस्त्र-समूहोंसे आच्छादित कर दिया था । अतएव ये दोनों भाई था । ब्रह्मास्त्र के नामसे इसकी प्रसिद्धि है और इसका बल अमोघ है । संग्राममें उसका समादर उसकी मर्यादाकी रक्षा करते हुए ये दोनों राजकुमार धराशायी हुए. हैं; अतः इसमें खेदकी कौन - सी बात है? ' ॥ ४ ॥
ब्राह्ममस्त्रं ततो धीमान् मानयित्वा तु मारुतिः ।
विभीषणवचः श्रुत्वा हनूमानिदमब्रवीत् ॥ ५ ॥
विभीषणकी बात सुनकर बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्ने ब्रह्मास्त्रका सम्मान करते हुए उनसे इस प्रकार कहा – ॥५ ॥
अस्मिन्नहते सैन्ये वानराणां तरस्विनाम् ।
यो यो धारयते प्राणांस्तं तमाश्वासयावहे ॥ ६ ॥
' राक्षसराज! इस अस्त्रसे घायल हुए वेगशाली वानर-सैनिकोंमें जो जो प्राण धारण करते हों, उन - उनको हमें चलकर आश्वासन देना चाहिये ' ॥ ६ ॥
तावुभौ युगपद् वीरौ हनूमद्राक्षसोत्तमौ ।
उल्काहस्तौ तदा रात्रौ रणशीर्षे विचेरतुः ॥ ७ ॥
उस समय रात हो गयी थी, इसलिये हनुमान् और राक्षसप्रवर विभीषण दोनों वीर अपने - अपने हाथमें मसाल लिये एक ही साथ रणभूमिमें विचरने लगे ॥ ७ ॥
भिन्नलाङ्गूलहस्तोरुपादाङ्गुलिशिरोधरैः स्त्रवद्भिः क्षतजं गात्रैः प्रस्रवद्भिः समन्ततः ॥ ८ ॥
पतितैः पर्वताकारैर्वानरैरभिसंवृताम् ।
शस्त्रैश्च पतितैर्दीप्तैर्ददृशाते वसुंधराम् ॥ ९ ॥
जिनकी पूँछ, हाथ, पैर, जाँघ, अंगुलि और ग्रीवा आदि अङ्ग कट गये थे, अतएव जो अपने शरीरोंसे रक्त बहा रहे केवल विषादग्रस्त ( मूर्छित ) हो गये हैं ( इनके प्राणोंपर वानरोंके गिरनेसे वहाँकी सारी भूमि सब थे, ऐसे पर्वताकार संकट नहीं आया है ) ॥ ३ ॥ ओरसे पट गयी थी तथा वहाँ गिरे हुए चमकीले अस्त्र - शस्त्रोंसे
तस्मै तु दत्तं परमास्त्रमेतत् भी आच्छादित हो गयी थी । हनुमान् और विभीषण ने इस
स्वयंभुवा ब्राह्मममोघवीर्यम् । अवस्थामें उस युद्धभूमिका निरीक्षण किया ॥ ८ - ९ ॥
तन्मानयन्तौ युधि राजपुत्रौ निपातितौ कोऽत्र विषादकालः ॥ ४ ॥ सुग्रीवमङ्गदं नीलं शरभं गन्धमादनम् ।
ब्रह्माजीने यह उत्तम अस्त्र इन्द्रजित् को दिया जाम्बवन्तं सुषेणं च वेगदर्शिनमेव च ॥ १० ॥
‘ स्वयम्भू
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१२८६ श्रीमवाल्मीकीय रामाय
मैन्दं नलं ज्योतिर्मुखं द्विविदं चापि वानरम् ।
विभीषणो हनूमांश्च ददृशाते हतान् रणे ॥ ११ ॥
सुग्रीव, अंगद, नील, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान्, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, नल, ज्योतिर्मुख तथा द्विविद इन सभी वानरोंको हनुमान् और विभीषणने युद्धमें घायल होकर पड़ा देखा || १०-११ ॥
सप्तषष्टिर्हताः कोट्यो वानराणां तरखिनाम् ।
भः पञ्चमशेषेण वल्लभेन स्वयंभुवः ॥ १२ ॥
ब्रह्माजीके प्रिय अत्र ब्रह्मास्त्रने दिनके चार भाग व्यतीत होते - होते सरसठ करोड़ वानरोंको हताहत कर दिया था । जब केवल पाँचवाँ भाग -- सायाह्नकाल शेष रह गया, तब ब्रह्मास्त्रका प्रयोग बंद हुआ था ॥ १२ ॥
सागरौघनिभं भीमं दृष्ट्वा बाणार्दितं बलम् ।
मार्ग जाम्बवन्तं च हनूमान् सविभीषणः ॥ १३ ॥
समुद्रके समान विशाल एवं भयंकर वानर सेनाको बाणसे पीड़ित देख विभीषणसहित हनुमान्जी जाम्बवान्को ढूँढ़ने लगे ॥ १३ ॥
स्वभावजरया युक्तं वृद्धं शरशतैश्चितम् ।
प्रजापतिसुतं वीरं शाम्यन्तमिव पावकम् ॥ १४ ॥
दृष्ट्वा समभिसंक्रम्य पौलस्त्यो वाक्यमब्रवीत् ।
कच्चिदार्य शरैस्तीक्ष्णैर्न प्राणा ध्वंसितास्तव ॥ १५ ॥
ब्रह्माजी के पुत्र वीर जाम्बवान् एक तो स्वाभाविक वृद्धा-वस्थासे युक्त थे, दूसरे उनके शरीरमें सैकड़ों बाण से हुए थे; अतः वे बुझती हुई आग के समान निस्तेज दिखायी देते थे । उन्हें देखकर विभीषण तुरंत ही उनके पास गये और बोले –‘आर्यं! इन तीखे बाणोंके प्रहारसे आपके प्राण निकल तो नहीं गये? ' ॥ १४-१५ ॥
विभीषणवचः श्रुत्वा जाम्बवानृक्षपुङ्गवः ।
कृच्छ्रादभ्युद्गिरन् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥
विभीषणकी बात सुनकर ऋक्षराज जाम्बवान् बड़ी कठिनाईसे वाक्यका उच्चारण करते हुए इस प्रकार बोले ॥ १६ ॥
नैर्ऋतेन्द्र महावीर्य स्वरेण त्वाभिलक्षये ।
विद्धगात्रः शितैर्बाणैर्न त्वां पश्यामि चक्षुषा ॥ १७ ॥
' महापराक्रमी राक्षसराज! मैं केवल स्वरसे तुम्हें पहचान रहा हूँ । मेरे सभी अङ्ग पैने बाणोंसे बिंधे हुए हैं, अतः मैं आँख खोलकर तुम्हें नहीं देख सकता ॥ १७ ॥
अञ्जना सुप्रजा येन मातरिश्वा च सुव्रत ।
हनूमान् वानरश्रेष्ठः प्राणान् धारयते क्वचित् ॥ १८ ॥
' उत्तम व्रतके पालक विभीषण! यह तो बताओ, जिनको जन्म देनेसे अञ्जनादेवी उत्तम पुत्रकी जननी और वायुदेव श्रेष्ठ पुत्रके जनक माने जाते हैं, वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् कहीं जीवित हैं? ' । १८ ॥
श्रुत्वा जाम्बवतो वाक्यमुवाचेदं विभीषणः ।
आर्यपुत्रावतिक्रम्य कस्मात् पृच्छसि मारुतिम् ॥ १ ९ ॥
जाम्बवान्का यह प्रश्न सुनकर विभीषणने पूछा-' ऋक्षराज! आप दोनों महाराजकुमारोंको छोड़कर केवल पवनकुमार हनुमानजीको ही क्यों पूछ रहे हैं? ॥ १ ९ ॥
नैव राजनि सुग्रीवे नाङ्गदे नापि राघवे ।
आर्य संदर्शितः स्नेहो यथा वायुसुते परः ॥ २० ॥
' आर्य! आपने न तो राजा सुग्रीवपर, न अंगदपर और न भगवान् श्रीरामपर ही वैसा स्नेह दिखाया है, जैसा पवन-पुत्र हनुमानजी के प्रति आपका प्रगाढ़ प्रेम लक्षित हो रहा है ' ॥ २० ॥
विभीषणवचः श्रुत्वा जाम्बवान् वाक्यमब्रवीत् ।
शृणु नैर्ऋतशार्दूल यस्मात् पृच्छामि मारुतिम् ॥ २१ ॥
विभीषणकी यह बात सुनकर जाम्बवान्ने कहा-' राक्षसराज! सुनो । मैं पवनकुमार हनुमानजीको क्यों पूछता हूँ — यह बता रहा हूँ ॥ २१ ॥
अस्मिञ्जीवति वीरे तु हतमप्यहतं बलम् ।
हनूमत्युज्झितप्राणे जीवन्तोऽपि मृता वयम् ॥ २२ ॥
' यदि वीरवर हनुमान् जीवित हों तो यह मरी हुई सेना भी जीवित ही है — ऐसा समझना चाहिये और यदि उनके प्राण निकल गये हों तो हमलोग जीते हुए भी मृतकके ही तुल्य हैं ॥ २२ ॥
धरते मारुतिस्तात । मारुतप्रतिमो यदि ।
वैश्वानरसमो वीर्ये जीविताशा ततो भवेत् ॥ २३ ॥
' तात! यदि वायुके समान वेगशाली और अग्निके
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युद्धकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः १२८७ समान पराक्रमी पवनकुमार हनुमान् जीवित हैं तो हम सबके जीवित होनेकी आशा की जा सकती है ' ॥ २३ ॥
ततो वृद्धमुपागम्य विनयेनाभ्यवादयत् ।
गृह्य जाम्बवतः पादौ हनूमान् मारुतात्मजः ॥ २४ ॥
बूढ़े जाम्बवान्के इतना कहते ही पवनपुत्र हनुमानजी उनके पास आ गये और दोनों पैर पकड़कर उन्होंने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम किया ॥ २४ ॥
श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं तदा विव्यथितेन्द्रियः ।
पुनर्जातमिवात्मानं मन्यते स्मर्क्षपुङ्गवः ॥ २५ ॥
हनुमान्जीकी बात सुनकर उस समय ऋक्षराज जाम्बवान् ने, जिनकी सारी इन्द्रियाँ बाणोंके प्रहारसे पीड़ित थीं, अपना पुनर्जन्म हुआ - सा माना ॥ २५ ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा हनूमन्तं स जाम्बवान् ।
आगच्छ हरिशार्दूल वानरांस्त्रातुमर्हसि ॥ २६ ॥
फिर उन महातेजस्वी जाम्बवान्ने हनुमान् जीसे कहा— ' वानरसिंह! आओ, सम्पूर्ण वानरोंकी रक्षा करो ॥ २६ ॥
नान्यो विक्रमपर्याप्तस्त्वमेषां परमः सखा ।
त्वत्पराक्रम कालोऽयं नान्यं पश्यामि कंचन ॥ २७ ॥
' तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पूर्ण पराक्रमसे युक्त नहीं है । तुम्हीं इन सबके परम सहायक हो । यह समय तुम्हारे ही पराक्रमका । मैं दूसरे किसीको इसके योग्य नहीं देखता ॥ प्रहर्षय । ऋक्षवानरवीराणामनीकानि विशल्यौ कुरु चाप्येतौ सादितौ रामलक्ष्मणौ ॥ २८ ॥
' तुम रीछों और वानरवीरोंकी सेनाओंको हर्ष प्रदान करो और बाणोंसे पीड़ित हुए इन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण-के शरीरसे बाण निकालकर इन्हें स्वस्थ करो ॥ २८ ॥
गत्वा परममध्वानमुपर्युपरि सागरम् ।
हिमवन्तं नगश्रेष्ठं हनूमन् गन्तुमर्हसि ॥ २ ९ ॥
' हनूमन्! समुद्र के ऊपर - ऊपर उड़कर बहुत दूरका रास्ता ते करके तुम्हें पर्वतश्रेष्ठ हिमालयपर जाना चाहिये ॥ २ ९ ॥
ततः काञ्चनमत्युच्चमृषभं पर्वतोत्तमम् ।
कैलासशिखरं चात्र द्रक्ष्यस्यरिनिषूदन ॥ ३० ॥
' शत्रुसूदन! वहाँ पहुँचनेपर तुम्हें बहुत ही ऊँचे सुवर्णमय उत्तम पर्वत ऋषभका तथा कैलास - शिखरका दर्शन होगा । ३० ।
तयोः शिखरयोर्मध्ये प्रदीप्तमतुलप्रभम् ।
सर्वौषधियुतं वीर द्रक्ष्यस्योषधिपर्वतम् ॥ ३१ ॥
' वीर! उन दोनों शिखरोंके बीचमें एक ओषधियोंका पर्वत दिखायी देगा, जो अत्यन्त दीप्तिमान् है । उसमें इतनी चमक है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है । वह पर्वत सब प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न है ॥ ३१ ॥
तस्य वानरशार्दूल चतस्रो मूर्ध्नि सम्भवाः ।
द्रक्ष्यस्योषधयो दीप्ता दीपयन्तीर्दिशो दश ॥ ३२ ॥
' वानरसिंह! उसके शिखरपर उत्पन्न चार ओषधियाँ तुम्हें दिखायी देंगी, जो अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित किये रहती हैं ॥ ३२ ॥
मृतसंजीवनी चैव विशल्यकरणीमपि ।
सुवर्णकरण चैव संधानीं च महौषधीम् ॥ ३३ ॥
' उनके नाम इस प्रकार हैं— मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संघानी नामक महौषधि ॥ ३३ ॥
ताः सर्वा हनुमन् गृह्य क्षिप्रमागन्तुमर्हसि ।
आश्वासय हरीन् प्राणैर्योज्य गन्धवहात्मज ॥ ३४ ॥
' हनुमन्! पवनकुमार! तुम उन सब ओषधियों को लेकर शीघ्र लौट आओ और वानरोंको प्राणदान देकर आश्वासन दो ' || ३४ ||
श्रुत्वा जाम्बवतो वाक्यं हनूमान् मारुतात्मजः ।
आपूर्य बलोद्धर्षैर्वायुवेगैरिवार्णवः ॥ ३५ ॥
जाम्बवान्की यह बात सुनकर वायुनन्दन हनुमानजी उसी तरह असीम बलसे भर गये, जैसे महासागर वायुके वेग से व्याप्त हो जाता है ॥ ३५ ॥
स पर्वततटाप्रस्थः पीडयन् पर्वतोत्तमम् ।
हनूमान् दृश्यते वीरो द्वितीय इव पर्वतः ॥ ३६ ॥
वीर हनुमान् एक पर्वत के शिखरपर खड़े हो गये और उस उत्तम पर्वतको पैरोंसे दबाते दिखायी देने लगे ॥ ३६ ॥
हरिपादविनिर्भग्नो निषसाद न शशाक तदात्मानं वोढुं हनुमान्जीके चरणोंके भारसे धँस गया । अधिक दबाव पड़नेके भी धारण न कर सका ॥ ३७ ॥
हुए द्वितीय पर्वत समा
स पर्वतः ।
भृशनिपीडितः ॥ ३७ ॥
पीड़ित हो वह पर्वत धरती में कारण वह अपने शरीर को
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१२८८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
तस्य पेतुर्नगा भूमौ हरिवेगाच्च जज्वलुः ।
शृङ्गाणि च व्यकीर्यन्त पीडितस्य हनूमता ॥ ३८ ॥
हनुमानजी के भारसे पीड़ित हुए उस पर्वतके वृक्ष उन्हींके
बेगसे टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही जल उठे ।
साथ ही उस पहाड़की चोटियाँ भी ढहने लगीं ॥ ३८ ॥
तस्मिन् सम्पीड्यमाने तु भग्नद्रुमशिलातले ।
न शेकुर्वानराः स्थातुं घूर्णमाने नगोत्तमे ॥ ३ ९ ॥
हनुमानजी के दबाने पर वह श्रेष्ठ पर्वत हिलने लगा । उसके वृक्ष और शिलाएँ टूट - फूटकर गिरने लगीं; अतः वानर वहाँ ठहर न सके! ३ ९ ॥
सा घूर्णितमहाद्वारा. प्रभग्नगृहगोपुरा ।
लङ्का त्रासाकुला रात्रौ प्रनृत्तेवाभवत् तदा ॥ ४० ॥
लङ्काका विशाल और ऊँचा द्वार भी हिल गया मकान । और दरवाजे ढह गये । समूची नगरी भयसे व्याकुल हो उस रात में नाचती - सी जान पड़ी ॥ ४० ॥
पृथिवीधरसंकाशो निपीडन्य पृथिवीधरम् ।
पृथिवीं क्षोभयामास सार्णयां मारुतात्मजः ॥ ४१ ॥
पर्वताकार पवनकुमार हनुमानजीने उस पर्वतको दबाकर पृथ्वी और समुद्र में भी हलचल पैदा कर दी ॥ ४१ ॥
आरुरोह तदा तस्माद्धरिर्मलयपर्वतम् ।
मेरुमन्दरसंकाशं नानाप्रस्रवणाकुलम् ॥ ४२ ॥
तदनन्तर वहाँसे आगे बढ़कर वे मेरु और मन्दराचलके समान ऊँचे मलयपर्वतपर चढ़ गये । वह पर्वत नाना प्रकार के झरनोंसे व्याप्त था ॥ ४२ ॥
विकासिकमलोत्पलम् ।
सेवितं देवगन्धर्वैः षष्टियोजनमुच्छ्रितम् ॥ ४३ ॥
सर्वानाकुलयंस्तत्र यक्षगन्धर्वकिन्नरान् ।
हनूमान् मेघसंकाशो ववृधे मारुतात्मजः ॥ ४५ ॥
पवनकुमार हनुमानजी वहाँ रहनेवाले यक्ष, गन्धर्व और किन्नर आदि सबको व्याकुल करते हुए मेघके समान बढ़ने लगे ॥ ४५ ॥
पद्धयां तु शैलमापीडय वडवामुखवन्मुखम् ।
विवृत्योत्रं ननादोच्चैस्त्रासयन् रजनीचरान् ॥ ४६ ॥
वे दोनों पैरोंसे उस पर्वतको दबाकर और वडवानलके समान अपने भयंकर मुखको फैलाकर निशाचरोंको डराते हुए जोर - जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४६ ॥
तस्य नानद्यमानस्य श्रुत्वा निनदमुत्तमम् ।
लङ्कास्था राक्षसव्याघ्रा न शेकुः स्पन्दितुं कचित् ॥४७ ॥
उच्च स्वरसे बारंबार गर्जते हुए हनुमान् जीका वह महान् सिंहनाद सुनकर लङ्कावासी श्रेष्ठ राक्षस भयके मारे कहीं हिल-डुल भी न सके । ४७ ॥
नमस्कृत्वा समुद्राय मारुतिर्भीमविक्रमः ।
राघवार्थे परं कर्म समीहत परंतपः ॥ ४८ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले भयानक पराक्रमी पवनकुमार हनुमानजीने समुद्रको नमस्कार करके श्रीरामचन्द्रजीके लिये महान् पुरुषार्थं करनेका निश्चय किया ॥ ४८ ॥
स पुच्छमुद्यम्य भुजङ्गकल्पं
विनम्य पृष्ठ श्रवणे निकुच्य ।
विवृत्य वक्त्रं वडवामुखाभ-मापुप्लुवे व्योम्नि सचण्डवेगः ॥४ ९ ॥
वे अपनी सर्पाकार पूँछको ऊपर उठाकर पीठको झुकाकर दोनों कान सिकोड़कर और वडवामुख अग्निके समान अपना वहाँ भाँति - भाँतिके वृक्ष और लताएँ फैली थीं । कमल मुख फैलाकर प्रचण्डवेगसे आकाशमें उड़े | ४ ९ ॥ और कुमुद खिले हुए थे । देवता और गन्धर्व उस पर्वतका जहार स वृक्षखण्डास्तरसा सेवन करते थे तथा वह साठ योजन ऊँचा था ॥ ४३ ॥
शैलान्शिलाः प्राकृतवानरांश्च । विद्याधरैर्मुनिगणैरप्सरोभिर्निषेवितम् बाहूरुवेगोद्गतसम्प्रणुन्ना-नानामृगगणा बहुकन्दरशोभितम् ॥ ४४ ॥ स्ते क्षीणवेगाः सलिले निपेतुः ॥ ५० ॥
विद्याधर, ऋषि - मुनि तथा अप्सराएँ भी वहाँ निवास कितने ही वृक्षों, पर्वत-करती थीं । अनेक प्रकारके मृगसमूह वहाँ सब ओर फैले हुए हनुमानजी अपने तीव्र वेगसे तथा बहुत - सी कन्दराएँ उस पर्वतकी शोभा बढ़ाती शिखरों, शिलाओं और वहाँ रहनेवाले साधारण वानरोंको भी थे साथ - साथ उड़ाते गये । उनकी भुजाओं और जाँघों के वेगसे थीं ॥ ४४ ॥
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युद्धकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः १२८ ९ दूर फेंक दिये जानेके कारण जब उनका वेग शान्त हो गया, तब वे वृक्ष आदि समुद्र के जलमें गिर पड़े ॥ ५० ॥
स तौ प्रसार्योरगभोगकल्पौ भुजौ भुजंगारिनिकाशवीर्यः । जगामे शैलं नगराजमध्यं दिशः प्रकर्षन्निव वायुसूनुः ॥ ५१ ॥
सर्पके शरीरकी भाँति दिखायी देनेवाली अपनी दोनों भुजाओंको फैलाकर गरुड़के समान पराक्रमी पवनपुत्र हनुमानजी सम्पूर्ण दिशाओंको खींचते हुए - से श्रेष्ठ पर्वत गिरिराज हिमालय-की ओर चले ॥ ५१ ॥
स सागरं घूर्णितवीचिमालं तदम्भसा भ्रामितसर्वसत्त्वम् । समीक्षमाणः सहसा जगाम चक्रं यथा विष्णुकराग्रमुक्तम् ॥ ५२ ॥
जिसकी तरंगमालाएँ झूम रही थीं तथा जिसके जलके द्वारा समस्त जल - जन्तु इधर - उधर घुमाये जा रहे थे, उस महासागर-को देखते हुए हनुमानजी भगवान् विष्णुके हाथसे छूटे हुए चक्रकी भाँति सहसा आगे बढ़ गये ॥ ५२ ॥
स पर्वतान् पक्षिगणान् सरांसि नदीस्त टाकानि पुरोत्तमानि । स्फीताञ्जनांस्तानपि सम्प्रवक्ष्य जगाम वेगात् पितृतुल्यवेगः ॥ ५३ ॥
सम्पूर्ण दिशाओंको शब्दायमान करते हुए वायुके समान वेगसे आगे बढ़े || ५५ ॥
स्मरञ्जाम्बवतो वाक्यं मारुतिर्भीमविक्रमः ।
ददर्श सहसा चापि हिमवन्तं महाकपिः ॥ ५६ ॥
महाकपि हनुमान्जीका बल - विक्रम बड़ा भयंकर था । उन्होंने जाम्बवान् के वचनोंका स्मरण करते हुए सहसा पहुँचकर हिमालय पर्वतका दर्शन किया ॥ ५६ ॥
नानाप्रस्रवणोपेतं बहुकन्दर निर्झरम् ।
श्वेताभ्रचयसंकाशैः शिखरैश्चारुदर्शनैः ।
शोभितं विविधैर्वृक्षैरगमत् पर्वतोत्तमम् ॥ ५७ ॥
वहाँ अनेक प्रकारके सोते बह रहे थे । बहुत - सी कन्दराएँ और झरने उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । श्वेत बादलोंके समूहकी भाँति मनोहर दिखायी देनेवाले शिखरों और नाना
प्रकारके वृक्षोंसे उस श्रेष्ठ पर्वतकी अद्भुत शोभा हो रही थी ।
हनुमान्जी उस पर्वतपर पहुँच गये ॥ ५७ ॥
स तं समासाद्य महानगेन्द्र-मतिप्रवृद्धोत्तम हेमश्टङ्गम् 1 ददर्श पुण्यानि महाश्रमाणि सुरर्षिसङ्घोत्तमसेवितानि ॥ ५८ ॥
उस महापर्वतराजका सबसे ऊँचा श्रेष्ठ शिखर सुवर्णमय दिखायी देता था । वहाँ पहुँचकर हनुमानजीने परम पवित्र बड़े - बड़े आश्रम देखे, जिनमें देवर्षियोंका श्रेष्ठ समुदाय निवास
उनका वेग अपने पिता वायुके ही समान था । वे करता था ॥ ५८ ॥
अनेकानेक पर्वतों, पक्षियों, सरोवरों, नदियों, तालाबों, नगरों स ब्रह्मकोशं रजतालयं च तथा समृद्धिशाली जनपदोंको देखते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़ने शकालयं रुद्रशरप्रमोक्षम् । लगे ॥ ५३ ॥ हयाननं ब्रह्मशिरश्च दीप्तं
ददर्श वैवखतर्किकरांश्च ॥ ५ ९ ॥ आदित्यपथमाश्रित्य जगाम स गतश्रमः । उस पर्वत पर उन्हें हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माका स्थान, हनूमांस्त्वरितो वीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः ॥ ५४ ॥
उन्हीं के दूसरे स्वरूप रजतनाभिका स्थान, इन्द्रका भवन, जहाँ वीर हनुमान् अपने पिताके ही तुल्य पराक्रमी और त्रिपुरासुरपर बाण छोड़ा था, वह स्थान, तीव्रगामी थे । वे सूर्यके मार्गका आश्रय ले बिना थके - माँदे खड़े होकर रुद्रदेवने वासस्थान तथा ब्रह्मास्त्र देवताका दीप्तिमान् भगवान् हयग्रीवका शीघ्रतापूर्वक अग्रसर हो रहे थे || ५४ ॥ स्थान- ये सभी दिव्य स्थान दिखायी दिये । साथ ही यमराजके
जवेन महता युक्तो मारुतिर्वातरंहसा । सेवक भी वहाँ दृष्टिगोचर हुए ॥ ५ ९ ॥
जगाम हरिशार्दूलो दिशः शब्देन नादयन् ॥ ५५ ॥ वह्नयालयं वैश्रवणालयं च
वानरसिंह पवनकुमार हनुमान् महान् वेगसे युक्त थे । वे सूर्यप्रभं सूर्यनिबन्धनं च । वा ० रा ० ५. ९.१८-