Ramayana 2 — पृष्ठ 511–520
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520
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१३०८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे विरथो वसुधास्थः स मकराक्षो निशाचरः ॥ ३० ॥ तच्छूलं निहतं दृष्ट्रा रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
फिर अनेक बाणोंसे रथको छिन्न - भिन्न करके श्रीरामने घोड़ोंको भी मार गिराया । रथहीन हो जानेपर निशाचर मकराक्ष भूमिपर खड़ा हो गया ॥ ३० ॥
तत्तिष्ठद् वसुधां रक्षः शूलं जग्राह पाणिना ।
त्रासनं सर्वभूतानां युगान्ताग्निसमप्रभम् ॥ ३१ ॥
पृथ्वीपर खड़े हुए उस राक्षसने शूल हाथमें लिया, जो प्रलयकालकी अग्नि के समान दीप्तिमान् तथा समस्त प्राणियों को भयभीत करनेवाला था ॥ ३१ ॥
दुरवापं महच्छूलं रुद्रदत्तं भयंकरम् ।
जाज्वल्यमानमाकाशे संहारास्त्रमिवापरम् ॥ ३२ ॥
वह परम दुर्लभ और महान् शूल भगवान् शंकरका दिया हुआ था, जो बहुत ही भयंकर था । वह दूसरे संहारास्त्रकी भाँति आकाशमें प्रज्वलित हो उठा ॥ ३२ ॥
यं दृष्ट्वा देवताः सर्वा भयार्ता विद्रुता दिशः ।
विभ्राम्य च महच्छूलं प्रज्वलन्तं निशाचरः ॥ ३३ ॥
स क्रोधात् प्राहिणोत् तस्मै राघवाय महाहवे । उसे देखकर सम्पूर्ण देवता भयसे पीड़ित हो सब दिशाओं-में भाग गये । उस निशाचरने प्रज्वलित होते हुए उस महान् शूलको घुमाकर 1 महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऊपर क्रोधपूर्वक चलाया ॥ ३३३ ॥
तमापतन्तं ज्वलितं खरपुत्रकराच्च्युतम् ॥ ३४ ॥
वाणैश्चतुर्भिराकाशे शूलं चिच्छेद राघवः । खरपुत्र मकराक्षके हाथसे छूटे हुए उस प्रज्वलित शूलको अपनी ओर आते देख श्रीरामचन्द्रजीने चार बाण मारकर आकाश में ही उसको काट डाला ॥ ३४३ ॥
स भिन्नो नैकधा शूलो दिव्यहाटकमण्डितः ।
व्यशीर्यत महोल्केव रामवाणार्दितो भुवि ॥ ३५ ॥
दिव्य सुवर्णसे विभूषित वह शूल श्रीराम के बाणोंसे खण्डित हो अनेक टुकड़ोंमें बँट गया और बड़ी भारी उल्काके समान भूतलपर बिखर गया ॥ ३५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये साधु साध्विति भूतानि व्याहरन्ति नभोगताः ॥ ३६ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके द्वारा उस शूलको खण्डित हुआ देख आकाशमें स्थित हुए सभी प्राणी उन्हें साधुवाद देने लगे ॥ ३६ ॥
तं दृष्ट्वा निहतं शूलं मकराक्षो निशाचरः ।
मुष्टिमुद्यम्य काकुत्स्थं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ३७ ॥
उस शूलके टुकड़े - टुकड़े हुए देख निशाचर मकराक्षने घूसा तानकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा – ' अरे! खड़ा रह, खड़ा रह ' || ३७ ॥
सतं दृष्ट्वा पतन्तं तु प्रहस्य रघुनन्दनः ।
पावकास्त्रं ततो रामः संदधे तु शरासने ॥ ३८ ॥
उसे आक्रमण करते देख श्रीरामचन्द्रजीने हँसकर अपने धनुषपर आग्नेयास्त्रका संधान किया ॥ ३८ ॥
तेनास्त्रेण हतं रक्षः काकुत्स्थेन तदा रणे ।
संछिन्नहृदयं तत्र पपात च ममार च ॥ ३ ९ ॥
और उस अस्त्र के द्वारा उन्होंने रणभूमिमें तत्काल उस राक्षसपर प्रहार किया । बाणके आघातसे राक्षसका हृदय विदीर्ण हो गया; अतः वह गिरा और मर गया ॥ ३ ९ ॥
दृष्ट्वा ते राक्षसाः सर्वे मकराक्षस्य पातनम् ।
लङ्कामेव प्रधावन्त रामबाणभयार्दिताः ॥ ४० ॥
मकराक्षका धराशायी होना देख वे सब राक्षस श्रीराम-चन्द्रजीके बाणोंके भयसे व्याकुल हो लङ्कामें ही भाग गये | दशरथनृपसूनुबाणवेगै रजनिचरं निहतं खरात्मजं तम् । प्रददृशुरथ देवताः प्रहृष्टा गिरिमिव वज्रहतं यथा विकीर्णम् ॥ ४१ ॥
देवताओंने देखा, जैसे वज्रका मारा हुआ पर्वत बिखर जाता है, उसी प्रकार खरका पुत्र निशाचर मकराक्ष दशरथ-कुमार श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंके वेगसे मार डाला गया । इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४१ ॥
युद्धकाण्डे एकोनाशीतितमः सर्गः ॥ ७ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उनासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ९ ॥ अशीतितमः सर्गः रावणकी आज्ञा से इन्द्रजित्का घोर युद्ध तथा उसके वधके विषय में श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत मकराक्षं हतं श्रुत्वा रावणः समितिंजयः । कुपितश्च तदा तत्र किं कार्यमिति चिन्तयन् । रोषेण महताविष्टो दन्तान् कटकटाय्य च ॥ १ ॥ आदिदेशाथ संक्रुद्धो रणायेन्द्रजितं सुतम् ॥ २ ॥
मकराक्षको मारा गया सुनकर समरविजयी रावण महान् कुपित हुआ वह निशाचर उस समय वहाँ इस चिन्तामें रोषसे भरकर दाँत पीसने लगा ॥ १ ॥ पड़ गया कि अब क्या करना चाहिये । उसने अत्यन्त क्रोधसे
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१३० ९ युद्धकाण्डे अशीतितमः सर्गः देवने स्वयं प्रकट होकर हविष्य ग्रहण किया । उनकी ज्वाला भरकर अपने पुत्र इन्द्रजित् को युद्ध के लिये जाने की आज्ञा दी । दक्षिणावर्त होकर निकल रही थी ॥ १० ॥
जहि वीर महावीर्यौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
दृश्यमानो वा सर्वथा त्वं बलाधिकः ॥ ३ ॥
अदृश्यो वह बोला – “ वीर! तुम महापराक्रमी राम और लक्ष्मण भाइयोंको छिपकर या प्रत्यक्षरूपसे मार डालो; क्योंकि दोनों तुम बलमें सर्वथा बढ़े- चढ़े हो ॥ ३ ॥
जयसि संयुगे ।
त्वमप्रतिमकर्माणमिन्द्रं न वधिष्यसि संयुगे ॥ ४ ॥
किं पुनर्मानुषौ दृष्ट्रा ' जिसके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है, उस इन्द्रको भी तुम युद्ध में परास्त कर देते भूमिमें अपने सामने पाकर तथोको राक्षसेन्द्रेण भूविधिवत् राक्षसराज रावणके आज्ञा शिरोधार्य की और हो; फिर उन दो मनुष्योंको रण-क्यों नहीं मार सकोगे? ' ॥ ४ ॥
प्रतिगृह्य पितुर्वचः ।
पावकं जुहुवेन्द्रजित् ॥ ५ ॥
ऐसा कहनेपर इन्द्रजित्ने पिताकी यज्ञभूमिमें जाकर अग्निकी स्थापना करके उसमें विधिपूर्वक हवन किया ॥ ५ ॥
तत्रानि रक्तोष्णीषधराः स्त्रियः ।
जुह्वतश्चापि यत्र रावणिः ॥ ६ ॥
आजग्मुस्तन सम्भ्रान्ता राक्षस्यो उसके अग्निमें हवन करते समय लाल वस्त्र धारण किये घबरायी हुई उस स्थानपर आयीं, जहाँ वह बहुत - सी स्त्रियाँ हवन कर रहा था ॥ ६ ॥
रावणपुत्र समिधोऽथ विभीतकाः । शरपत्राणि
हुत्वाग्निं तर्पयित्वाथ देवदानवराक्षसान् ।
आरुरोह रथश्रेष्ठमन्तर्धानगतं शुभम् ॥ ११ ॥
आहुति दे आभिचारिक यज्ञ - सम्बन्धी देवता, अग्निमें दानव तथा राक्षसोंको तृप्त करनेके पश्चात् इन्द्रजित् होनेकी शक्तिसे सम्पन्न सुन्दर रथपर आरूढ़ हुआ ॥ स वाजिभिश्चतुर्भिस्तु बाणैस्तु निशितैर्युतः आरोपितमहाचापः शुशुभे स्यन्दनोत्तमः चार घोड़ों, पैने बाणों तथा अपने भीतर विशाल धनुषसे युक्त वह उत्तम रथ बड़ी शोभा पा अन्तर्धान ११ ॥
।
॥ १२ ॥
रखे हुए रहा था ॥
जाज्वल्यमानो वपुषा तपनीयपरिच्छदः ।
स रथः समलंकृतः ॥ १३ ॥
मृगैश्चन्द्रार्धचन्द्रैश्च उसके सब सामान सोनेके बने हुए थे, अतः वह रथ अपने स्वरूपसे प्रज्वलित - सा जान पड़ता था । उसमें मृग, अर्धचन्द्र और पूर्णचन्द्र अङ्कित किये गये थे, जिनसे उसकी सजावट आकर्षक दिखायी देती थी ॥ १३ ॥
जाम्बूनदमहाकम्बुर्दीप्तपावकसंनिभः केतुर्वैदूर्यसमलंकृतः ॥ १४ ॥
बभूवेन्द्र जितः इन्द्रजित् का ध्वज प्रज्वलित अग्निके समान दीप्तिमान् था । उसमें सोनेके बड़े - बड़े कड़े पहनाये गये थे और उसे नीलमसे अलंकृत किया गया था ॥ १४ ॥
चादित्यकल्पेन ब्रह्मास्त्रेण च पालितः ।
शस्त्राणि स्रुवं कार्ष्णायसं तथा ॥ ७ ॥ तेन दुराधर्षो रावणिः सुमहाबलः ॥ १५ ॥
लोहितानि च वासांसि स बभूव उसके तलवार आदि शस्त्र ही सरपत कुशास्तरणका उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ और ब्रह्मास्त्रसे सुरक्षित हुआ रहे थे, बहेड़ेकी लकड़ी समिधा थी, लाल वस्त्र और वह महाबली रावणकुमार इन्द्रजित् दूसरोंके लिये दुर्जय हो काम दे — ये सब वस्तुएँ उपयोगमें लायी गयी थीं ॥ ७ ॥ गया था ॥ १५ ॥
लोहेका स्रवा । समास्तीर्य शरपत्रैः सतोमरैः । सोऽभिनिर्याय नगरादिन्द्रजित् समितिंजयः सर्वतोऽग्नि राक्षसैर्मन्त्रैरन्तर्धानगतोऽब्रवीत् ॥ १६ ॥
छागस्य सर्वकृष्णस्य गलं जग्राह जीवतः ॥ ८ ॥ हुत्वाग्नि
सरपत अग्निके चारों ओर समरविजयी इन्द्रजित् नगरसे निकलकर निर्ऋति देवता-उसने तोमरसहित शस्त्ररूपी जीवित बकरेका गला सम्बन्धी मन्त्रोंसे अग्निमें आहुति दे अन्तर्धानकी शक्तिसे बिछा दिये । उसके बाद काले रंगके उसे अग्निमें होम दिया ॥ ८ ॥
पकड़कर महार्चिषः । सकृद्धोमसमिद्धस्य विधूमस्य विजयं दर्शयन्ति च ॥ ९ बभूवुस्तानि लिङ्गानि एक ही बार किये गये उस होमसे अग्नि प्रज्वलित उसमें धुआँ नहीं था और बड़ी - बड़ी लपटें उठ रही थीं । उठी अग्निमें , वे सभी चिह्न प्रकट हुए, जो विजयकी सूचना देते सम्पन्न हो इस प्रकार बोला – ॥ १६ ॥
अद्य हत्वा रणे यौ तौ मिथ्या प्रव्रजितौ वने ।
॥ जयं पित्रे प्रदास्यामि रावणाय रणेऽधिकम् ॥ १७ ॥
हो ' जो व्यर्थ ही वनमें आये हैं ( अथवा झूठे ही तपस्वीका उस बाना धारण किये हुए हैं ), उन दोनों भाई राम और लक्ष्मण-थे । को आज रणभूमिमें मारकर मैं अपने पिता रावणको उत्कृष्ट जय प्रदान करूँगा ॥ १७ ॥
प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तहाटकसंनिभः ॥ १० ॥ अद्य निर्वानरामुर्वी हत्वा रामं च लक्ष्मणम् ।
हविस्तत् प्रतिजग्राह पावकः स्वयमुत्थितः परमां प्रीतिमित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ १८ ॥
उस समय तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् अग्नि करिष्ये
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१३१० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ' आज राम और लक्ष्मणको मारकर पृथ्वीको वानरोंसे सूनी करके मैं पिताको परम संतोष दूँगा । ' ऐसा कहकर वह अदृश्य हो गया ॥ १८ ॥
आपपाताथ संक्रुद्धो दशग्रीवेण चोदितः ।
तीक्ष्णकार्मुकनाराचैस्तीक्ष्णस्त्विन्द्ररिपू रणे ॥ १ ९ ॥
तत्पश्चात् दशमुख रावणसे प्रेरित हो इन्द्रशत्रु इन्द्रजित् कुपित होकर रणभूमिमें आया । उसके हाथमें धनुष और तीखे नाराच थे ॥ १ ९ ॥
स ददर्श महावीयौं नाग । त्रिशिरसाविव ।
सृजन्ताविषुजालानि वीरौ वानरमध्यगौ ॥ २० ॥
युद्धस्थलमें आकर उस निशाचरने वानरों के बीच में खड़े हो बाण - समूहोंकी वर्षा करते हुए महापराक्रमी वीर श्रीराम और लक्ष्मणको वहाँ ( ऊँचे और मोटे कंधोंसे युक्त, होनेके कारण ) तीन सिरवाले नागों के समान देखा ॥ २० ॥
इमौ ताविति संचिन्त्य सज्यं कृत्वा च कार्मुकम् ।
संततानेषुधाराभिः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ २१ ॥
‘ ये ही वे दोनों हैं ' ऐसा सोचकर इन्द्रजित्ने अपने धनुष-पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और जलकी वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति अपनी बाण - धाराओंसे सम्पूर्ण दिशाओंको भर दिया ॥
स तु वैहायसरथो युधि तौ रामलक्ष्मणौ ।
अचक्षुर्विषये तिष्ठन् विव्याध निशितैः शरैः ॥ २२ ॥
उसका रथ आकाशमें खड़ा था और श्रीराम तथा लक्ष्मण युद्धभूमिमें विराजमान थे । उन दोनोंकी दृष्टिसे ओझल होकर वह राक्षस उन्हें पैने बाणोंसे बींधने लगा ॥ २२ ॥
तौ तस्य शरवेगेन परीतौ रामलक्ष्मणौ ।
धनुषी सशरे कृत्वा दिव्यमस्त्रं प्रचक्रतुः ॥ २३ ॥
उसके बाणोंके वेगसे व्याप्त हुए, श्रीराम और लक्ष्मणने भी अपने - अपने धनुषपर बाणोंका संधान करके दिव्य अस्त्र प्रकट किये ॥ २३ ॥
प्रच्छादयन्तौ गगनं शरजालैर्महाबलौ ।
तमस्त्रैः सूर्यसंकाशैर्नैव पस्पर्शतुः शरैः ॥ २४ ॥
उन महाबली बन्धुओंने सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणसमूहोंसे आकाशको आच्छादित करके भी इन्द्रजितका अपने बाणोंसे स्पर्श नहीं किया ॥ २४ ॥
स हि धूमान्धकारं च चक्रे प्रच्छादयन्नभः ।
दिशश्चान्तर्दधे श्रीमान् नीहारतमसा वृताः ॥ २५ ॥
उस तेजस्वी राक्षसने मायासे धूमजनित अन्धकारकी सृष्टि की और आकाशको ढक दिया । साथ ही कुहरेका अन्धकार फैलाकर दिशाओंको भी ढक दिया ॥ २५ ॥
नैव ज्यातलनिर्घोषो न च नेमिखुरखनः ।
शुश्रुवे चरतस्तस्य न च रूपं प्रकाशते ॥ २६ ॥
उसकी प्रत्यञ्चाकी टंकार नहीं सुनायी देती थी । पहियोंकी घर्घराहट तथा घोड़ोंकी टापकी आवाज भी कानों में नहीं पड़ती थी और सब ओर विचरते हुए उस राक्षसका रूप भी दृष्टि-गोचर नहीं होता था ॥ २६ ॥
घनान्धकारे तिमिरे शिला वर्षमिवाद्भुतम् ।
स ववर्ष महाबाहुर्नाराचशरवृष्टिभिः ॥ २७ ॥
महाबाहु इन्द्रजित् उस घने अन्धकारमें जहाँ दृष्टि काम नहीं करती थी, पत्थरोंकी अद्भुत वृष्टिके समान नाराच नामक बाणों की वर्षा करने लगा ॥ २७ ॥
स रामं सूर्यसंकाशैः शरैर्दत्तवरैर्भृशम् ।
विव्याध समरे क्रुद्धः सर्वगात्रेषु रावणिः ॥ २८ ॥
समराङ्गणमें कुपित हुए उस रावणकुमारने वरदान में प्राप्त हुए सूर्य तुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा श्रीरामचन्द्रजी के सम्पूर्ण अङ्गोंमें घाव कर दिया ॥ २८ ॥
तौ हन्यमानौ नाराचैर्धाराभिरिव पर्वतौ ।
हेमपुङ्खान् नरव्याघ्रौ तिग्मान् मुमुचतुः शरान् ॥ २ ९ ॥
जैसे दो पर्वतोंपर जलकी धाराएँ बरस रही हों, उसी प्रकार उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंपर नाराचोंकी मार पड़ने लगी । उसी अवस्था में वे दोनों वीर भी सोनेके पंखोंसे सुशोभित तीखे बाण छोड़ने लगे ॥ २ ९ ॥
अन्तरिक्षे समासाद्य रावणिं कङ्कपत्रिणः ।
निकृत्य पतगा भूमौ पेतुस्ते शोणिताप्लुताः ॥ ३० ॥
वे कङ्कपत्रयुक्त बाण आकाशमें पहुँचकर रावणकुमार इन्द्रजित्को क्षत - विक्षत करके रक्तमें डूबे हुए पृथ्वी पर गिर पड़ते थे ॥ ३० ॥
अतिमात्रं शरौघेण दीप्यमानौ नरोत्तमौ ।
तानिषून् पततो भल्लैरनेकैर्विचकर्ततुः ॥ ३१ ॥
बाणसमूहोंसे अत्यन्त देदीप्यमान वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर अपने ऊपर गिरते हुए सायकोंको अनेक भल्ल मारकर काट गिराते थे ॥ ३१ ॥
यतो हि ददृशाते तौ शरान् निपतिताञ्छितान् ।
ततस्तु तौ दाशरथी ससृजातेऽस्त्रमुत्तमम् ॥ ३२ ॥
जिस ओरसे तीखे बाण आते दिखायी देते, उसी ओर वे दोनों भाई दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण अपने उत्तम अस्त्रोंको चलाया करते थे ॥ ३२ ॥
रावणिस्तु दिशः सर्वा रथेनातिरथोऽपतत् ।
विव्याध तौ दाशरथी लघ्वस्त्रो निशितैः शरैः ॥ ३३ ॥
अतिरथी वीर रावणपुत्र इन्द्रजित् अपने रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओं में दौड़ लगाता और बड़ी फुर्तीसे अस्त्र चलाता
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युद्धकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः १३११ था । उसने अपने पैने बार्णोद्वारा उन दोनों दशरथकुमारोंको घायल कर दिया ॥ ३३ ॥
तेनातिविद्धौ तौ वीरौ रुक्मपुङ्खैः सुसंहतैः ।
पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ३४ ॥
बभूवतुर्दाशरथी उसके सोनेके पंखवाले सुदृढ़ सायकद्वारा अत्यन्त घायल हुए वे दोनों वीर दशरथकुमार रक्तरञ्जित हो खिले हुए पलाशवृक्षोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ३४ ॥
नास्य वेगगतिं कश्चिन्न च रूपं धनुः शरान् ।
न चास्य विदितं किंचित् सूर्यस्येवाभ्रसम्प्लवे ॥ ३५ ॥
इन्द्रजित्की वेगपूर्णं गति, रूप, धनुष और बाणोंको कोई देख नहीं पाता था । मेघोंकी घटामें छिपे हुए सूर्यकी भाँति उसकी कोई भी बात किसीको ज्ञात नहीं हो पाती थी ॥ ३५ ॥
तेन विद्धाश्च हरयो निहताश्च गतासवः ।
शतशस्तत्र पतिता धरणीतले ॥ ३६ ॥
बभूवुः उसके द्वारा घायल और आहत होकर कितने ही वानर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे तथा सैकड़ों योद्धा मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े || ३६ ||
लक्ष्मणस्तु ततः क्रुद्धो भ्रातरं वाक्यमब्रवीत् ।
ब्राह्ममत्रं प्रयोक्ष्यामि वधार्थं सर्वरक्षसाम् ॥ ३७ ॥
तब लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने अपने भाई-से कहा- ' आर्य! अब मैं समस्त राक्षसोंके संहारके लिये ' ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करूँगा ' ॥ ३७ ॥
तमुवाच ततो रामो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ।
नैकस्य हेतो रक्षांसि पृथिव्यां हन्तुमर्हसि ॥ ३८ ॥
तस्यैव तु वधे यत्नं करिष्यामि महाभुज ।
आदेक्ष्यावो महावेगानस्त्रानाशीविषोपमान् ॥ ४० ॥
' महाबाहो! जो युद्ध न करता हो, छिपा हो, हाथ जोड़-कर शरणमें आया हो, युद्धसे भाग रहा हो अथवा पागल हो गया हो, ऐसे व्यक्तिको तुम्हें नहीं मारना चाहिये । अब मैं उस इन्द्रजित् के ही वधका प्रयत्न करता हूँ । आओ, हमलोग विषैले सर्पोंकी भाँति भयंकर तथा अत्यन्त वेगशाली अस्त्रोंका प्रयोग करें ॥ ३ ९ -४० ॥
तमेनं मायिनं क्षुद्रमन्तर्हितरथं बलात् ।
राक्षसं निहनिष्यन्ति दृष्ट्रा वानरयूथपाः ॥ ४१ ॥
" यह मायावी राक्षस बड़ा नीच है । इसने अन्तर्धान - शक्ति-से अपने रथको छिपा लिया है । यदि यह दीख जाय तो वानरयूथपति इस राक्षसको अवश्य मार डालेंगे ॥ ४१ ॥
यद्येष भूमिं विशते दिवं वा रसातलं वापि नभस्तलं वा । एवं विगूढोऽपि ममास्त्रदग्धः पतिष्यते भूमितले गतासुः ॥ ४२ ॥
‘ यदि यह पृथ्वीमें समा जाय, स्वर्गको चला जाय, रसातल-में प्रवेश करे अथवा आकाशमें ही स्थित रहे तथापि इस तरह छिपे होनेपर भी मेरे अस्त्रोंसे दग्ध होकर प्राणशून्य हो भूतलपर अवश्य गिरेगा ' ॥ ४२ ॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थ
रघुप्रवीरः प्लवगर्षभैर्वृतः ।
वधाय रौद्रस्य नृशंसकर्मण-स्तदा महात्मा त्वरितं निरीक्षते ॥ ४३ ॥
उनकी यह बात सुनकर श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न महान् अभिप्रायसे युक्त वचन कहकर वानर लक्ष्मणसे कहा- ' भाई! एकके कारण भूमण्डलके समस्त इस प्रकार राक्षसों का वध करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ ३८ ॥ शिरोमणियोंसे घिरे हुए रघुकुलके प्रमुख वीर महात्मा श्रीराम-चन्द्रजी उस क्रूरकर्मा भयानक राक्षसका वध करनेके लिये
अयुध्यमानं प्रच्छन्नं प्राञ्जलिं शरणागतम् । तत्काल ही इधर - उधर दृष्टिपात करने लगे || ४३ || पलायमानं मत्तं वा न हन्तुं त्वमिहार्हसि ॥ ३ ९ ॥ वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽशीतितमः सर्गः ॥ ८० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अस्सीवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिमित एकाशीतितमः सर्गः इन्द्रजित् के द्वारा मायामयी सीताका वध विज्ञाय तु मनस्तस्य राघवस्य स निवृत्याहवात् तस्मात् प्रविवेश महात्मा रघुनाथजीके मनोभावको युद्धसे निवृत्त हो लङ्कापुरीमें चला गया सोऽनुस्मृत्य वधं तेषां राक्षसानां महात्मनः । क्रोधताम्रेक्षणः शूरो निर्जगामाथ रावणिः ॥ २ ॥
पुरं ततः ॥ १ ॥ वहाँ जानेपर बलवान् राक्षसोंके वधका स्मरण हो आनेसे
समझकर इन्द्रजित् शूरवीर रावणकुमारकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं । वह पुनः ॥ १ ॥ युद्धके लिये निकला ॥ २ ॥
तरखिनाम् । स पश्चिमेन द्वारेण निर्ययौ राक्षसैर्वृतः ।
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१३१२ श्रीमदवाल्मीकीयरामायणे इन्द्रजित् सुमहावीर्यः पौलस्त्यो देवकण्टकः ॥ ३ ॥
पुलस्त्यकुलमें उत्पन्न महापराक्रमी इन्द्रजित् देवताओंके लिये कण्टकरूप था । वह राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर नगरके पश्चिम द्वारसे पुनः बाहर आया ॥ ३ ॥
इन्द्रजित्तु ततो दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
रणायाभ्युद्यतौ वीरौ मायां प्रादुष्करोत् तदा ॥ ४ ॥
दोनों भाई बीर श्रीराम और लक्ष्मणको युद्धके लिये उद्यत देख इन्द्रजित्ने उस समय माया प्रकट की ॥ ४ ॥
इन्द्रजितु रथे स्थाप्य सीतां मायामयीं तदा ।
बलेन महतावृत्य तस्या वधमरोचयत् ॥ ५ ॥
उसने मायामयी सीताका निर्माण करके उसे अपने रथपर बिठा लिया और विशाल सेनाके घेरे में रखकर उसका वध करनेका विचार किया ॥ ५ ॥
मोहनार्थं तु सर्वेषां बुद्धिं कृत्वा सुदुर्मतिः ।
हन्तुं सीतां व्यवसितो वानराभिमुखो ययौ ॥ ६ ॥
उसकी बुद्धि बहुत ही खोटी थी । उसने सबको मोह में डालनेका विचार करके मायासे बनी हुई सीताको मारनेका निश्चय किया । इसी अभिप्रायसे वह वानरोंके सामने गया ॥ ६ ॥
तं दृष्ट्वा त्वभिनिर्यान्तं सर्वे ते काननौकसः ।
उत्पेतुरभिसंक्रुद्धाः शिलाहस्ता युयुत्सवः ॥ ७ ॥
उसे युद्ध के लिये निकलते देख सभी वानर क्रोधसे भर गये और हाथमें शिला उठाये युद्धकी इच्छासे उसके ऊपर टूट पड़े ॥ ७ ॥
हनूमान् पुरतस्तेषां जगाम कपिकुञ्जरः ।
प्रगृह्य सुमहच्छृङ्गं पर्वतस्य दुरासदम् ॥ ८ ॥
कपिकुञ्जर हनुमानजी उन सबके आगे - आगे चले । उन्होंने पर्व॑तका एक बहुत बड़ा शिखर ले रक्खा था, जिसे उठाना दूसरे के लिये नितान्त कठिन था ॥ ८ ॥
स ददर्श हतानन्दां सीतामिन्द्रजितो रथे ।
एकवेणीधरां दीनामुपवासकृशाननाम् ॥ ९ ॥
उन्होंने इन्द्रजित् रथपर सीताको देखा । उनकी खुशी मारी गयी थी । वे एक वेणी धारण किये बहुत दुखी दिखायी देती थीं और उपवास करनेके कारण उनका मुख दुबला - पतला हो गया था ॥ ९ ॥
परिक्लिष्टैकवसनाममृजां राघवप्रियाम् ।
रजोमलाभ्यामालिप्तैः सर्वगात्रैर्वरस्त्रियम् ॥ १० ॥
उनके शरीरपर एक ही मलिन बस्न था । श्रीरघुनाथजी-की प्रिया सीता अङ्गों में उबटन आदि नहीं लगे थे । उनके सारे शरीर में धूल और मैल भरी थी तो भी वे श्रेष्ठ और सुन्दर दिखायी देती थीं ॥ १० ॥
तां निरीक्ष्य मुहूर्त तु मैथिलीमध्यवस्य च ।
बभूवाचिरदृष्टा हि तेन सा जनकात्मजा ॥ ११ ॥
हनुमान्जी कुछ देर तक उनकी ओर देखते रहे । अन्तमें यह निश्चय किया कि ये मिथिलेशकुमारी ही हैं । उन्होंने जनक-किशोरीको थोड़े ही दिन पहले देखा था, इसलिये वे शीघ्र ही उन्हें पहचान सके थे ॥ ११ ॥
अब्रवीत् तां तु शोकार्ता निरानन्दां तपस्विनीम् ।
रथस्थितां दीनां राक्षसेन्द्रसुतश्रिताम् ॥ १२ ॥
राक्षसराजके पुत्र इन्द्रजित् के पास रथपर बैठी हुई । तपस्विनी सीता शोकसे पीड़ित, दीन एवं आनन्दशून्य हो रही थीं ॥ १२ ॥
किं समर्थितमस्येति चिन्तयन् स महाकपिः ।
सह तैर्वानरश्रेष्ठैरभ्यधावत रावणिम् ॥ १३ ॥
सीताको वहाँ देखकर महाकपि हनुमानजी यह सोचने लगे कि आखिर इस राक्षसका अभिप्राय क्या है? फिर वे मुख्य-मुख्य वानरोंको साथ लेकर रावणपुत्रकी ओर दौड़े ॥। १३ ॥
तद् वानरबलं दृष्ट्रा रावणिः क्रोधमूर्च्छितः ।
कृत्वा विकोश नित्रिंशं मूर्ध्नि सीतामकर्षयत् ॥ १४ ॥
वानरोंकी उस सेनाको अपनी ओर आती देख रावण-कुमारके क्रोधकी सीमा न रही । उसने तलवारको म्यानसे बाहर निकाला और सीताके सिरके केश पकड़कर उन्हें घसीटा ॥ १४ ॥
तां स्त्रियं पश्यतां तेषां ताडयामास राक्षसः ।
क्रोशन्तीं राम रामेति मायया योजितां रथे ॥ १५ ॥
मायाद्वारा रथपर बैठायी हुई वह स्त्री ' हा राम, हा राम ' कहकर चिल्ला रही थी और वह राक्षस उन सबके देखते-देखते उस स्त्रीको पीट रहा था ॥ १५ ॥
गृहीतमूर्धजां दृष्ट्वा हनूमान् दैन्यमागतः ।
दुःखजं वारि नेत्राभ्यामुत्सृजन् मारुतात्मजः ॥ १६ ॥
सीताका केश पकड़ा गया देख हनुमानजी को बड़ा दुःख हुआ । वे ' पवनकुमार हनुमान् अपने नेत्रोंसे दुःखजनित आँसू बहाने लगे ॥ १६ ॥
तां दृष्ट्रा चारुसर्वाङ्गीं रामस्य महिषीं प्रियाम् ।
अब्रवीत् परुषं वाक्यं क्रोधाद् रक्षोधिपात्मजम् ॥ १७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी सर्वाङ्गसुन्दरी प्यारी पटरानी सीताको उस अवस्थामें देख हनुमानजी कुपित हो उठे और उस राक्षस-राजकुमार इन्द्रजित्से कठोर वाणीमें बोले— || १७ ॥
दुरात्मनात्मनाशाय केशपक्षे परामृशः ।
ब्रह्मर्षीणां कुले जातो राक्षसीं योनिमाश्रितः ॥ १८ ॥
' दुरात्मन्! तू अपने विनाशके लिये ही तुला हुआ है,
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युद्धकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः १३१३ तभी सीताके केशोंका स्पर्श कर रहा है । तेरा जन्म ब्रह्मर्षियों-के कुलमें हुआ है तथापि तूने राक्षस जातिके स्वभावका ही
आश्रय लिया है । १८ ॥
धिक् त्वां पापसमाचारं यस्य ते मतिरीदृशी ।
नृशंसानार्य दुर्वृत्त क्षुद्र पापपराक्रम ।
अनार्यस्येदृशं कर्म घृणा ते नास्ति निर्घृण ॥ १ ९ ॥
‘ अरे! तेरी बुद्धि ऐसी बिगड़ी हुई है? धिक्कार है तुझ जैसे पापाचारीको । नृशंस! अनार्यं! दुराचारी तथा पापपूर्ण पराक्रम करनेवाले नीच! तेरी यह करतूत नीच पुरुषोंके ही योग्य है । निर्दयी! तेरे हृदयमें तनिक भी दया नहीं है ॥ १ ९ ॥
च्युता गृहाच्च राज्याच्च रामहस्ताच्च मैथिली ।
किं तवैषापराद्धा हि यदेनां हंसि निर्दय ॥ २० ॥
' बेचारी मिथिलेशकुमारी घरसे, राज्यसे और श्रीरामचन्द्र-जीके करकमलोंके आश्रयसे भी बिछुड़ गयी हैं । निष्ठुर! इन्होंने तेरा क्या अपराध किया है, जो तू इन्हें इतनी निर्दयता-से मार रहा है? || २० ॥
सीतां हत्वा तु न चिरं जीविष्यसि कथंचन ।
वधार्ह कर्मणा तेन मम हस्तगतो ह्यसि ॥ २१ ॥
" सीताको मारकर तू अधिक कालतक किसी तरह जीवित नहीं रह सकेगा । वधके योग्य नीच! तू अपने पापकर्मके कारण मेरे हाथमें पड़ गया है ( अब तेरा जीना कठिन है ) ।
ये च स्त्रीघातिनां लोका लोकबध्यैश्च कुत्सिताः ।
इह जीवितमुत्सृज्य प्रेत्य तान् प्रति लप्स्यसे ॥ २२ ॥
' लोक में अपने पापके कारण वधके योग्य माने गये जो चोर आदि हैं, वे भी जिन लोकोंकी निन्दा करते हैं तथा जो स्त्री - हत्यारोंको ही मिलते हैं, तू यहाँ अपने प्राणोंका परित्याग करके उन्हीं नरक - लोकोंमें जायगा ' ॥ २२ ॥
इति ब्रुवाणो हनुमान् सायुधैर्हरिभिर्वृतः ।
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो राक्षसेन्द्रसुतं प्रति ॥ २३ ॥
ऐसी बातें कहते हुए हनुमानजी अत्यन्त कुपित हो शिला आदि आयुध धारण करनेवाले वानरवीरोंके साथ राक्षसराज -कुमारपर टूट पड़े ॥ २३ ॥
आपतन्तं महावीर्ये तदनीकं वनौकसाम् ।
रक्षसां भीमकोपानामनीकेन न्यवारयत् ॥ २४ ॥
कर इन्द्रजित्ने कपिश्रेष्ठ हनुमानजी से कहा- ॥ २५ ॥
सुग्रीवस्त्वं च रामश्च यन्निमित्तमिहागताः ।
तां वधिष्यामि वैदेहीमचैव तव पश्यतः ॥ २६ ॥
इमां हत्वा ततो रामं लक्ष्मणं त्वां च वानर ।
सुग्रीवं च वधिष्यामि तं चानार्य विभीषणम् ॥ २७ ॥
‘ वानर! सुग्रीव, राम और तुम सब लोग जिसके लिये यहाँ तक आये हो, उस विदेहकुमारी सीताको मैं अभी तुम्हारे देखते - देखते मार डालूँगा । इसे मारकर मैं क्रमश: राम-लक्ष्मणका, तुम्हारा, सुग्रीवका तथा उस अनार्यं विभीषणका भी वध कर डालूँगा ॥ २६-२७ ॥
न हन्तव्याः स्त्रियश्चेति यद् ब्रवीषि लवंगम ।
पीडाकरममित्राणां यच्च कर्तव्यमेव तत् ॥ २८ ॥
' बंदर! तुम जो यह कह रहे थे कि स्त्रियोंको मारना नहीं चाहिये, उसके उत्तरमें मुझे यह कहना है कि जिस कार्यके करनेसे शत्रुओंको अधिक कष्ट पहुँचे, वह कर्तव्य ही माना गया है ॥ २८ ॥
तमेवमुक्त्वा रुदतीं सीतां मायामयीं च ताम् ।
शितधारेण खङ्गेन निजघानेन्द्रजित् स्वयम् ॥ २ ९ ॥
हनुमान् जीसे ऐसा कहकर इन्द्रजित्ने स्वयं ही तेज धार-वाली तलवारसे उस रोती हुई मायामयी सीतापर घातक प्रहार किया ॥ २ ९ ॥
यज्ञोपवीतमार्गेण छिन्ना तेन तपस्विनी ।
सा पृथिव्यां पृथुश्रोणी पपात प्रियदर्शना ॥ ३० ॥
शरीरमें यज्ञोपवीत धारण करनेका जो स्थान उसी जगह से उस मायामयी सीताके दो टुकड़े हो गये और वह स्थूल कटिप्रदेशवाली प्रियदर्शना तपस्विनी पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३० ॥
तामिन्द्रजित् स्त्रियं हत्वा हनूमन्तमुवाच ह ।
मया रामस्य पश्येमां प्रियां शस्त्रनिषूदिताम् ।
एषा विशस्ता वैदेही निष्फलो वः परिश्रमः ॥३१ ॥
उस स्त्रीका वध करके इन्द्रजित्ने हनुमान् से कहा-' देख लो, मैंने रामकी इस प्यारी पत्नीको तलवारसे काट डाला । यह रही कटी हुई विदेह - राजकुमारी सीता । अब तुमलोगों का युद्धके लिये परिश्रम व्यर्थ है ' ॥ ३१ ॥
वानरोंके उस महापराक्रमी सैन्य समुदायको आक्रमण ततः खड्गेन महता हत्वा तामिन्द्रजित्स्वयम् । भयानक क्रोधवाले राक्षसोंकी सेनाके हृष्टः स रथमास्थाय ननाद च महास्वनम् ॥ ३२ ॥
करते देख इन्द्रजित्ने द्वारा उसे आगे बढ़ने से रोका ॥ २४ ॥ इस प्रकार स्वयं इन्द्रजित् विशाल खड्गसे उस मायामयी
विक्षोभ्य हरिवाहिनीम् । स्त्रीका वध करके रथपर बैठा - बैठा बड़े हर्ष के साथ जोर - जोर से सतां वाणसहस्रेण हनूमन्तं हरिश्रेष्ठमिन्द्रजित् प्रत्युवाच ह ॥ २५ ॥ सिंहनाद करने लगा ॥ ३२ ॥
फिर सहस्रों बाणोंद्वारा उस वानरवाहिनीमें हलचल मचा- वानराः शुश्रुवुः शब्दमदूरे प्रत्यवस्थिताः । वा ० रा ० ५. १०.३--
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१३१४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे व्यादितास्यस्य नदतस्तद्दुर्गे संश्रितस्य तु ॥ ३३ ॥ तं हृष्टरूपं समुदीक्ष्य वानरा
पास ही खड़े हुए वानरोंने उसकी उस गर्जनाको सुना । विषण्णरूपाः समभिप्रदुद्रुवुः ॥ ३४ ॥
वह उस दुर्गम रथपर बैठकर मुँह बाये विकट सिंहनाद रावणके उस पुत्रकी बुद्धि बड़ी खोटी थी । उसने इस करता था ॥ ३३ ॥ प्रकार मायामयी सीताका वध करके अपने मनमें बड़ी प्रसन्नता-तथा तु सीतां विनिहत्य दुर्मतिः का अनुभव किया । उसे हर्षसे उत्फुल्ल देख वानर विषाद-प्रहृष्टचेताः स बभूव रावणिः । ग्रस्त हो भाग खड़े हुए || ३४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में इक्यासोवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८१ ॥
द्वयशीतितमः सर्गः हनुमानजी के नेतृत्व में वानरों और निशाचरोंका युद्ध, हनुमान्जीका श्रीरामके पास लौटना और इन्द्रजित् का निकुम्भिला - मन्दिरमें जाकर होम करना
श्रुत्वा तु भीमनिर्ह्रादं शक्राशनिसमस्वनम् ।
वीक्ष्यमाणा दिशः सर्वा दुद्रुवुर्वानरा भृशम् ॥ १ ॥
इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान उस भयंकर सिंहनादको सुनकर वानर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए जोर - जोर से भागने लगे ॥ १ ॥
तानुवाच ततः सर्वान् हनूमान् मारुतात्मजः ।
विषण्णवदनान् दीनांस्त्र स्तान् विद्रवतः पृथक् ॥ २ ॥
उन सबको विषादग्रस्त, दीन एवं भयभीत होकर भागते देख पवनकुमार हनुमानजीने कहा- ॥ २ ॥
कस्माद् विषण्णवदना विद्रवध्वं लवंगमाः ।
त्यक्तयुद्धसमुत्साहाः शूरत्वं क्व नु वो गतम् ॥ ३ ॥
' वानरो! तुम क्यों मुखपर विषाद लिये युद्ध - विषयक उत्साह छोड़कर भागे जा रहे हो? तुम्हारा वह शौर्य कहाँ चला गया? ॥ ३ ॥
पृष्ठतोऽनुव्रजध्वं मामग्रतो यान्तमाहवे ।
शूरैरभिजनोपेतैरयुक्तं हि निवर्तितुम् ॥ ४ ॥
" मैं युद्ध में आगे - आगे चलता हूँ । तुम सब लोग मेरे पीछे आ जाओ । उत्तम कुलमें उत्पन्न शूरवीरोंके लिये युद्ध में पीठ दिखाना सर्वथा अनुचित है ' ॥ ४ ॥
एवमुक्ताः सुसंक्रुद्धा वायुपुत्रेण धीमता ।
शैलशृङ्गान् द्रुमांचैव जगृहुर्हृष्टमानसाः ॥ ५ ॥
बुद्धिमान् वायुपुत्रके ऐसा कहनेपर वानरोंका चित्त प्रसन्न हो गया और राक्षसोंके प्रति अत्यन्त कुपित हो उन्होंने हाथोंमें पर्वतशिखर और वृक्ष उठा लिये ॥ ५ ॥
अभिपेतुश्च गर्जन्तो राक्षसान् वानरर्षभाः ।
परिवार्य हनूमन्तमन्वयुश्च महाहवे ॥ ६ ॥
वे श्रेष्ठ वानरवीर उस महासमर में हनुमानजीको चारों ओरसे घेरकर उनके पीछे - पीछे चले और जोर - जोर से गर्जना करते हुए वहाँ राक्षसोंपर टूट पड़े ॥ ६ ॥
स तैर्वानरमुख्यैस्तु हनूमान् सर्वतो वृतः ।
हुताशन इवार्चिष्मानदहच्छत्रुवाहिनीम् ॥ ७ ॥
उन श्रेष्ठ वानरोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए हनुमानजी ज्वालामालाओं से युक्त प्रज्वलित अग्निकी भाँति शत्रु सेनाको दग्ध करने लगे || ७ ||
स राक्षसानां कदनं चकार सुमहाकपिः ।
वृतो वानरसैन्येन कालान्तकयमोपमः ॥ ८ ॥
वानर- सैनिकों से घिरे हुए उन महाकपि हनुमानजीने प्रलयकालके संहारकारी यमराजके समान राक्षसों का संहार आरम्भ किया ॥ ८ ॥
स तु शोकेन चाविष्टः कोपेन महता कपिः ।
हनूमान् रावणिरथे महतीं पातयच्छिलाम् ॥ ९ ॥
सीताके वधसे उनके मनमें बड़ा शोक हो रहा था और इन्द्रजितका अत्याचार देखकर उनका क्रोध भी बहुत बढ़ गया था, इसलिये हनुमानजीने रावणकुमारके रथपर एक बहुत बड़ी शिला फेंकी ॥ ९ ॥
तामापतन्तीं दृट्रैव रथः सारथिना तदा ।
विधेयाश्वसमायुक्तः विदूरमपवाहितः ॥ १० ॥
उसे अपने ऊपर आती देख सारथिने तत्काल ही अपने अधीन रहनेवाले घोड़ोंसे जुते हुए उस रथको बहुत दूर हटा दिया ॥ १० ॥
तमिन्द्रजितमप्राप्य रथस्थं सहसारथिम् ।
विवेश धरणीं भित्त्वा सा शिला व्यर्थमुद्यता ॥ ११ ॥
अतः सारथिसहित रथपर बैठे हुए इन्द्रजित् के पासतक
न पहुँचकर वह शिला धरती फोड़कर उसके भीतर समा गयी ।
उसके चलानेका सारा उद्योग व्यर्थ हो गया ॥ ११ ॥
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युद्धकाण्डे द्व्यशीतितमः सर्गः १३१५
पतितायां शिलायां तु व्यथिता रक्षसां चमूः ।
निपतन्त्या च शिलया राक्षसा मथिता भृशम् ॥ १२ ॥
उस शिलाके गिरनेपर उस राक्षस - सेनाको बड़ी पीड़ा हुई । गिरती हुई उस शिलाने बहुतेरे राक्षसोंको कुचल डाला ।
तमभ्यधावञ्शतशो नदन्तः काननौकसः ।
ते द्रुमांश्च महाकाया गिरिशृङ्गाणि चोद्यताः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् सैकड़ों विशालकाय वानर हाथमें वृक्ष एवं पर्वतशिखर उठाये गर्जना करते हुए इन्द्रजितूकी ओर दौड़े ।
क्षिपन्तीन्द्रजितं संख्ये वानरा भीमविक्रमाः ।
वृक्षशैलमहावर्षे विसृजन्तः प्लवंगमाः ॥ १४ ॥
शत्रूणां कदनं चक्रर्नेदुश्च विविधैः स्वनैः । वे भयानक पराक्रमी वानर वीर युद्धस्थलमें इन्द्रजित्पर उन वृक्षों और पर्वत - शिखरोंको फेंकने लगे । वृक्षों और शैलशिखरोंकी बड़ी भारी वृष्टि करते हुए वे वानर शत्रुओंका संहार करने और भाँति - भाँतिकी आवाजमें गर्जने लगे ॥१४३ ॥
वानरैस्तैर्महाभीमैर्घोररूपा निशाचराः ॥ १५ ॥
वीर्यादभिहता वृक्षैर्व्यचेष्टन्त रणक्षितौ । उन महाभयंकर वानरोंने वृक्षोंद्वारा घोररूपधारी निशाचरोंको
बलपूर्वक मार गिराया । वे रणभूमिमें गिरकर छटपटाने लगे ॥
स सैन्यमभिवीक्ष्याथ वानरार्दितमिन्द्रजित् ॥ १६ ॥
प्रगृहीतायुधः क्रुद्धः परानभिमुखो ययौ । अपनी सेनाको वानरोंद्वारा पीड़ित हुई देख इन्द्रजित् क्रोधपूर्वक अस्त्र - शस्त्र लिये शत्रुओंके सामने गया ॥ १६३ ॥
स शरौघानवसृजन् स्वसैन्येनाभिसंवृतः ॥ १७ ॥
जघान कपिशार्दूलान् सुबहून् दृढविक्रमः ।
शूलैरशनिभिः खगैः पट्टिशैः शूलमुद्गरैः ॥ १८ ॥
अपनी सेनासे घिरे हुए उस सुदृढ़ पराक्रमी वीर निशाचरने बाण - समूहों की वर्षा करते हुए शूल, वज्र, तलवार, पट्टिश तथा मुद्गरोंकी मारसे बहुत - से वानरवीरों को हताहत कर दिया ॥
ते चाप्यनुचरांस्तस्य वानरा जघ्नुराहवे ।
सुस्कन्धविटपैः शैलैः शिलाभिश्च महाबलः ॥ १ ९ ॥
हनूमान् कदनं चक्रे रक्षसां भीमकर्मणाम् । वानरोंने भी युद्धस्थलमें इन्द्रजित् के अनुचरोंको मारा । महाबली हनुमानजी सुन्दर शाखाओं और डालियोंवाले शाल-वृक्षों तथा शिलाओं द्वारा भीमकर्मा राक्षसोंका संहार करने लगे । संनिवार्य परानीकमत्रवीत् तान् वनौकसः ॥ २० ॥
हनूमान् संनिवर्तध्वं न नः साध्यमिदं बलम् । इस तरह शत्रुसेनाका वेग रोककर हनुमानजीने वानरोंसे कहा-- - " ' बन्धुओ! अब लौट चलो, अब हमें इस सेनाके संहार करनेकी आवश्यकता नहीं रह गयी है ॥ २०३ ॥
त्यक्त्वा प्राणान् विचेष्टन्तो रामप्रियचिकीर्षवः ॥२१ ॥
यन्निमित्तं हि युध्यामो हता सा जनकात्मजा । हमलोग ' जिनके लिये श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर प्राणोंका मोह छोड़ पूरी चेष्टाके साथ युद्ध करते थे, वे जनक किशोरी सीता मारी गयीं ॥ २१३ ॥
इममर्थ हि विज्ञाप्य रामं सुग्रीवमेव च ॥ २२ ॥
तौ यत् प्रतिविधास्येते तत् करिष्यामहे वयम् । ' अब इस बात की सूचना भगवान् श्रीराम और सुग्रीवको दे देनी चाहिये । फिर वे दोनों इसके लिये जैसा प्रतीकार सोचेंगे, वैसा ही हम भी करेंगे ' ॥ २२३ ॥
इत्युक्त्वा वानरश्रेष्ठो वारयन् सर्ववानरान् ॥ २३ ॥
शनैः शनैरसंत्रस्तः सबलः संन्यवर्तत । ऐसा कहकर वानरश्रेष्ठ हनुमानजीने सब वानरों को युद्धसे मना कर दिया और धीरे - धीरे सारी सेना के साथ निर्भय होकर लौट आये ॥ २३३ ॥
ततः प्रेक्ष्य हनूमन्तं व्रजन्तं यत्र राघवः ॥ २४ ॥
स होतुकामो दुष्टात्मा ] गतश्चैत्यं निकुम्भिलाम् । हनुमान्जीको श्रीरामचन्द्रजीके पास जाते देख दुरात्मा
इन्द्रजित् होम करनेकी इच्छासे निकुम्भिलादेवीके मन्दिरमें गया ।
निकुम्भिलामधिष्ठाय पावकं जुहवेन्द्रजित् ॥ २५ ॥
यज्ञभूम्यां ततो गत्वा पावकस्तेन रक्षसा ।
हूयमानः प्रजज्वाल होमशोणितभुक् तदा ॥ २६ ॥
सार्चिः पिनद्धो ददृशे होमशोणिततर्पितः ।
संध्यागत इवादित्यः सुतीव्रोऽग्निः समुत्थितः ॥ २७ ॥
निकुम्भिला - मन्दिर में जाकर उस निशाचर इन्द्रजित्ने अग्निमें आहुति दी । तदनन्तर यज्ञभूमिमें भी जाकर उस राक्षसने अग्निदेवको होमके द्वारा तृप्त किया । वे होमशोणित-भोजी आभिचारिक अग्निदेवता आहुति पाते ही होम और शोणितसे तृप्त हो प्रज्वलित हो उठे और ज्वालाओंसे आवृत दिखायी देने लगे । वे तीव्र तेजवाले अग्निदेवता संध्याकालके सूर्य की भाँति प्रकट हुए थे ॥ २५-२७ ॥ अथेन्द्रजिद् राक्षसभूतये तु जुहाव हव्यं विधिना विधानवित् । दृष्ट्वा व्यतिष्ठन्त च राक्षसास्ते महासमूहेषु नयानयज्ञाः ॥ २८ ॥
इन्द्रजित् यज्ञके विधानका ज्ञाता था । उसने समस्त राक्षसोंके अभ्युदयके लिये विधिपूर्वक हवन करना आरम्भ किया । उस होम को देखकर महायुद्धके अवसरोंपर नीति - अनीति-कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञाता राक्षस खड़े हो गये ॥ २८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वयशीतितमः सर्गः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में बयासीवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
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१३१६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे व्यशीतितमः सर्गः सीताके मारे जाने की बात सुनकर श्रीरामका शोकसे मूच्छित होना और लक्ष्मणका उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थके लिये उद्यत होना
राघवचापि विपुलं तं राक्षसवनौकसाम् ।
श्रुत्वा संग्रामनिर्घोषं जाम्बवन्तमुवाच ह ॥ १ ॥
भगवान् श्रीरामने भी राक्षसों और वानरोंके उस महान् युद्धघोषको सुनकर जाम्बवान्से कहा -- ॥ १ ॥
सौम्य नूनं हनुमता कृतं कर्म सुदुष्करम् ।
श्रूयते च यथा भीमः सुमहानायुधस्वनः ॥ २ ॥
‘ सौम्य! निश्चय ही हनुमान्जीने अत्यन्त दुष्कर कर्म आरम्भ किया है; क्योंकि उनके आयुधों का यह महाभयंकर शब्द स्पष्ट सुनायी पड़ता है ॥ २ ॥
तद् गच्छ कुरु साहाय्यं स्वबलेनाभिसंवृतः ।
क्षिप्रमृक्षपते तस्य कपिश्रेष्ठस्य युध्यतः ॥ ३ ॥
' अतः ऋक्षराज! तुम अपनी सेनाके साथ शीघ्र जाओ और जूझते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्की सहायता करो ' ॥ ३ ॥
ऋक्षराजस्तथेत्युक्त्वा स्वेनानीकेन संवृतः ।
आगच्छत् पश्चिमं द्वारं हनूमान् यत्र वानरः ॥ ४ ॥
तब ' बहुत अच्छा ' कहकर अपनी सेनासे घिरे हुए ऋक्षराज जाम्बवान् लङ्काके पश्चिम द्वारपर, जहाँ वानरवीर हनुमानजी विराजमान थे, आये ॥ ४ ॥
अथायान्तं हनूमन्तं ददर्शर्क्षपतिस्तदा ।
वानरैः कृतसंग्रामैः श्वसद्भिरभिसंवृतम् ॥ ५ ॥
वहाँ ऋक्षराजने युद्ध करके लौटे और लंबी साँस खींचते हुए वानरोंके साथ हनुमानजीको आते देखा ॥ ५ ॥
दृष्ट्रा पथि हनूमांश्च तदृक्षबलमुद्यतम् ।
नीलमेघनिभं भीमं संनिवार्य न्यवर्तत ॥ ६ ॥
हनुमानजीने भी मार्गमें नील मेघके समान भयंकर ऋक्ष-सेनाको युद्धके लिये उद्यत देख उसे रोका और सबके साथ ही वे लौट आये ॥ ६ ॥
स तेन सह सैन्येन संनिकर्ष महायशाः ।
शीघ्रमागम्य रामाय दुःखितो वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥
महायशस्वी हनुमान्जी उस सेनाके साथ शीघ्र भगवान् श्रीरामके निकट आये और दुखी होकर बोले -- ॥ ७ ॥
समरे युध्यमानानामस्माकं प्रेक्षतां च सः ।
जघान रुदतीं सीतामिन्द्रजिद् रावणात्मजः ॥ ८ ॥
' प्रभो! हमलोग युद्ध करनेमें लगे थे, उसी समय समर भूमिमें रावणपुत्र इन्द्रजित्ने हमारे देखते - देखते रोती हुई सीताको मार डाला है ॥ ८ ॥
उद्भ्रान्तचित्तस्तां दृष्ट्रा विषण्णोऽहमरिंदम ।
तदहं भवतो वृत्तं विज्ञापयितुमागतः ॥ ९ ॥
' शत्रुदमन! उन्हें उस अवस्थामें देख मेरा चित्त उद्भ्रान्त हो उठा है । मैं विषादमें डूब गया हूँ । इसलिये मैं आपको यह समाचार बतानेके लिये आया हूँ ' ॥ ९ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवः शोकमूच्छितः ।
निपपात तदा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ १० ॥
हनुमानूजीकी यह बात सुनकर श्रीरामजी उस समय शोकसे मूर्छित हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १० ॥
तं भूमौ देवसंकाशं पतितं दृश्य राघवम् ।
अभिपेतुः समुत्पत्य सर्वतः कपिसत्तमाः ॥ ११ ॥
देवतुल्य तेजस्वी श्रीरघुनाथजीको भूमिपर पड़ा देख समस्त श्रेष्ठ वानर सब ओरसे उछलकर वहाँ आ पहुँचे ॥ ११ ॥
आसिञ्चन् सलिलैश्चैनं पद्मोत्पलसुगन्धिभिः ।
प्रदहन्तमसंहार्य सहसाग्निमिवोत्थितम् ॥ १२ ॥
वे कमल और उत्पलकी सुगन्धसे युक्त जल ले आकर उनके ऊपर छिड़कने लगे । उस समय वे सहसा प्रज्वलित होकर दहन - कर्म करनेवाली और बुझायी न जा सकनेवाली अग्नि के समान दिखायी देते थे ॥ १२ ॥
तं लक्ष्मणोऽथ बाहुभ्यां परिष्वज्य सुदुःखितः ।
उवाच राममस्वस्थं वाक्यं हेत्वर्थसंयुतम् ॥ १३ ॥
भाईकी यह अवस्था देखकर लक्ष्मणको बड़ा दुःख हुआ । वे उन्हें दोनों भुजाओंमें भरकर बैठ गये और अस्वस्थ हुए श्रीरामसे यह युक्तियुक्त एवं प्रयोजनभरी बात बोले ॥१३ ॥
शुभे वर्त्मनि तिष्ठन्तं त्वामार्य विजितेन्द्रियम् ।
अनर्थेभ्यो न शक्नोति त्रातुं धर्मो निरर्थकः ॥ १४ ॥
' आर्य! आप सदा शुभ मार्गपर स्थिर रहनेवाले और जितेन्द्रिय हैं, तथापि धर्म आपको अनर्थोंसे बचा नहीं पाता है । इसलिये वह निरर्थक ही जान पड़ता है ॥ १४ ॥
भूतानां स्थावराणां च जङ्गमानां च दर्शनम् ।
यथास्ति न तथा धर्मस्तेन नास्तीति मे मतिः ॥ १५ ॥
' स्थावरों तथा पशु आदि जङ्गम प्राणियोंको भी सुखका प्रत्यक्ष अनुभव होता है; किंतु उनके सुखमें धर्मं कारण नहीं है ( क्योंकि न तो उनमें धर्माचरणकी शक्ति है और न धर्म में उनका अधिकार ही है ) । अतः धर्मं सुखका साधन नहीं है; ऐसा मेरा विचार है ॥ १५ ॥
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युद्धकाण्डे श्यशीतितमः सर्गः १३१७
यथैव स्थावरं व्यक्तं जङ्गमं च तथाविधम् ।
नायमर्थस्तथा युक्तस्त्वद्विधो न विपद्यते ॥ १६ ॥
‘ जैसे स्थावर भूत धर्माधिकारी न होनेपर भी सुखी देखा जाता है, उसी प्रकार जङ्गम प्राणी ( पशु आदि ) भी सुखी है, यह बात स्पष्ट ही समझ में आती है । यदि कहें जहाँ धर्मं है, वहाँ सुख अवश्य है तो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उस दशामें आप - जैसे धर्मात्मा पुरुषको विपत्तिमें नहीं पड़ना चाहिये ॥ १६ ॥
यद्यधर्मो भवेद् भूतो रावणो नरकं व्रजेत् ।
भवांश्च धर्मसंयुक्तो नैव व्यसनमाप्नुयात् ॥ १७ ॥
‘ यदि अधर्मकी भी सत्ता होती अर्थात् अधर्म अवश्य ही दुःखका साधन होता तो रावणको नरकमें पड़े रहना चाहिये था और आप जैसे धर्मात्मा पुरुषपर संकट नहीं आना चाहिये था ॥ १७ ॥
तस्य च व्यसनाभावाद् व्यसनं चागते त्वयि ।
धर्मो भवत्यधर्मश्च परस्परविरोधिनी ॥ १८ ॥
' रावणपर तो कोई संकट नहीं है और आप संकटमें पड़ गये हैं; अतः धर्म और अधर्मं दोनों परस्परविरोधी हो गये हैं— धर्मात्माको दुःख और पापात्माको सुख मिलने लगा है ॥ १८ ॥
धर्मेणोपलभेद् धर्ममध चाप्यधर्मतः ।
mar युज्येयुर्येष्वधर्मः प्रतिष्ठितः ॥ १ ९ ॥
न धर्मेण वियुज्येरन्नाधर्मरुचयो जनाः ।
धर्मेणाचरतां तेषां तथा धर्मफलं भवेत् ॥ २० ॥
' यदि धर्मसे धर्मका फल ( सुख ) और अधर्मसे अधर्म-का फल ( दु: ख ) ही मिलनेका नियम होता तो जिन रावण आदिमें अधर्म ही प्रतिष्ठित है, वे अधर्मंके फलभूत दुःखसे ही युक्त होते और जो लोग अधर्म में रुचि नहीं रखते हैं, वे धर्मसे — धर्मके फलभूत सुखसे कभी वञ्चित न होते । धर्म-मार्गसे चलनेवाले इन धर्मात्मा पुरुषोंको केवल धर्मका फल -सुख ही प्राप्त होता । १ ९ -२० ॥
यस्मादर्था विवर्धन्ते येष्वधर्मः प्रतिष्ठितः ।
क्लिश्यन्ते धर्मशीलाश्च तस्मादेतौ निरर्थकौ ॥ २१ ॥
" किंतु जिनमें अधर्मं प्रतिष्ठित है, उनके तो धन बढ़ रहे हैं और जो स्वभावसे ही धर्माचरण करनेवाले हैं, वे क्लेशमें पड़े हुए हैं । इसलिये ये धर्म और अधर्मं दोनों निरर्थक हैं ॥ २१ ॥
वध्यन्ते पापकर्माणो यद्यधर्मेण राघव ।
वधकर्महतोऽधर्मः स हतः कं वधिष्यति ॥ २२ ॥
मध्य और अन्त ) तीन ही क्षणोंतक रह सकता है । चतुर्थ क्षणमें तो वह स्वयं ही नष्ट हो जायगा; फिर नष्ट हुआ वह धर्म या अधर्म किसका वध करेगा? ॥ २२ ॥
अथवा विहितेनायं हन्यते हन्ति चापरम् ।
विधिः स लिप्यते तेन न स पापेन कर्मणा ॥ २३ ॥
' अथवा यह जीव यदि विधिपूर्वक किये गये कर्मविशेष ( श्येनयाग आदि ) के द्वारा मारा जाता है या स्वयं वैसा कर्म करके दूसरेको मारता है तो विधि ( विहित कर्मजनित अदृष्ट ) को ही हत्या के दोषसे लिप्स होना चाहिये, कर्मका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषका उस पापकर्मसे सम्बन्ध नहीं होना चाहिये ( क्योंकि पुत्रके किये हुए अपराधका दण्ड पिताको नहीं मिलता है ) ॥ २३ ॥
अदृष्टप्रतिकारेण अव्यक्तेनासता सता ।
कथं शक्यं परं प्राप्तुं धर्मेणारिविकर्षण ॥ २४ ॥
' शत्रुसूदन! जो चेतन न होनेके कारण प्रतीकार- ज्ञानसे शून्य है, अव्यक्त है और असत् के समान विद्यमान है, उस धर्मं द्वारा दूसरे ( पापात्मा ) को वध्यरूपसे प्राप्त करना कैसे सम्भव है? ॥ २४ ॥
यदि सत् स्यात् सतां मुख्य नासत् स्यात् तव किंचन ।
त्वया यदीदृशं प्राप्तं तस्मात् तन्नोपपद्यते ॥ २५ ॥
' सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ रघुवीर! यदि सत्कर्मजनित अदृष्ट सत् या शुभ ही होता तो आपको कुछ भी अशुभ या दुःख नहीं प्राप्त होता । यदि आपको ऐसा दुःख प्राप्त हुआ है तो सत्कर्म-जनित अदृष्ट सत् ही है, इस कथनकी संगति नहीं बैठती * ॥
अथवा दुर्बलः क्लीबो बलं धर्मोऽनुवर्तते ।
दुर्बलो हृतमर्यादो न सेव्य इति मे मतिः ॥ २६ ॥
' यदि दुर्बल और कातर ( स्वतः कार्य - साधन में असमर्थ ) होनेके कारण धर्मं पुरुषार्थका अनुसरण करता है, तब तो दुर्बल और फलदानकी मर्यादासे रहित धर्मका सेवन ही नहीं करना चाहिये- —यह मेरी स्पष्ट राय है ॥ २६ ॥
* इस अध्यायके १४ वैसे २५ वें श्लोकतक लक्ष्मणजीने जो धर्म और अधर्मकी सत्ताका खण्डन किया है, वह श्रीरामको दुखी देखकर स्वयं उनसे भी अधिक दुखी होकर हो किया है । जिस प्रकार परात्पर श्रीरामके लिये अपनी प्रियाकी माया - मूर्तिके वधको देखकर शोकसे अभिभूत हो जाना प्रेमको लीलामात्र है, उसी प्रकार प्रियतम प्रभुके दुःखको देखकर दुःखावेशकी लीलासे इस प्रकारकी असंगत - सी लगनेवाली बातें कहना भी प्रेमजनित कातरताका ही परिचायक है 1 । आगे चलकर दुःखका आवेश कुछ कम हो जानेपर. तो स्वयं लक्ष्मणजीने ही ४४ वें श्लोकमें स्पष्ट कहा है कि श्रीरामका ! यदि पापाचारी पुरुष धर्म या अधर्मसे मारे शोकापनोदन करके उन्हें युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये ही उन्होंने ये " रघुनन्दन जाते हैं तो धर्मं या अधर्मं क्रियारूप होनेके कारण ( आदि, सब बातें कही थीं । -सम्पादक