Ramayana 2 — पृष्ठ 521–530
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 521–530
पृष्ठ 521
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३१८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे
बलस्य यदि चेद् धर्मो गुणभूतः पराक्रमैः ।
धर्ममुत्सृज्य वर्तस्व यथा धर्मे तथा बले ॥ २७ ॥
' यदि धर्म बल अथवा पुरुषार्थका अङ्ग या उपकरण-मात्र है तो धर्मको छोड़कर पराक्रमपूर्ण बर्ताव कीजिये । जैसे आप धर्मको प्रधान मानकर धर्म में लगे हैं, उसी प्रकार बलको प्रधान मानकर बल या पुरुषार्थ में ही प्रवृत्त होइये ॥ २७ ॥
अथ चेत् सत्यवचनं धर्मः किल परंतप ।
अनृतं त्वय्यकरणे किं न बद्धस्त्वया विना ॥ २८ ॥
' शत्रुओं को संताप देनेवाले रघुनन्दन! यदि आप सत्य-भाषणरूप धर्मका पालन करते हैं अर्थात् पिताकी आज्ञाको स्वीकार करके उनके सत्यकी रक्षारूप धर्मका अनुष्ठान करते हैं तो आप ज्येष्ठ पुत्रके प्रति युवराजपदपर अभिषिक्त करने की जो बात पिताने कही थी, उस सत्यका पालन न करनेपर पिताको जो असत्यरूप अधर्मं प्राप्त हुआ, उसीके कारण वे आपसे बियुक्त होकर मर गये । ऐसी दशामें क्या आप राजा के पहले कहे हुए अभिषेक सम्बन्धी सत्य वचनसे नहीं बँधे हुए थे? उस सत्यका पालन करनेके लिये बाध्य नहीं थे ( यदि आपने पिताके पहले कहे हुए वचनका ही पालन करके युवराजपदपर अपना अभिषेक करा लिया होता तो न पिताकी मृत्यु हुई होती और न बीता हरण आदि अनर्थं ही संघटित हुए होते ) ॥ २८ ॥
यदि धर्मो भवेद् भूत अधर्मो वा परंतप ।
न म हत्वा मुनिं वज्री कुर्यादिज्यां शतक्रतुः ॥ २ ९ ॥
‘ शत्रुदमन महाराज! यदि केवल धर्म अथवा अधर्म ही प्रधानरूपसे अनुष्ठानके योग्य होता तो वज्रधारी इन्द्र पौरुष-द्वारा विश्वरूप मुनिकी हत्या ( अधर्म ) करके फिर यश ( धर्म ) का अनुष्ठान नहीं करते ॥ २ ९ ॥
अधर्मसंश्रितो धर्मो विनाशयति राघव ।
सर्वमेतद् यथाकामं काकुत्स्थ कुरुते नरः ॥ ३० ॥
‘ रघुनन्दन! धर्मसे भिन्न जो पुरुषार्थ है, उससे मिला हुआ धर्म ही शत्रुओंका नाश करता है । अतः काकुत्स्थ! प्रत्येक मनुष्य आवश्यकता एवं रुचिके अनुसार इन सबका ( धर्मं एवं पुरुषार्थका ) अनुष्ठान करता है ॥ ३० ॥
मम चेदं मतं तात धर्मोऽयमिति राघव ।
धर्ममूलं त्वया छिन्नं राज्यमुत्सृजता तदा ॥ ३१ ॥
‘ तात राघव! इस प्रकार समयानुसार धर्म एवं पुरुषार्थ-मेंसे किसी एकका आश्रय लेना धर्मं ही है; ऐसा मेरा मत है । आपने उस दिन राज्यका त्याग करके धर्मके मूलभूत अर्थका उच्छेद कर डाला ॥ ३१ ॥
अर्थेभ्योऽथ प्रवृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्ततस्ततः ।
क्रियाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ३२ ॥
" जैसे पर्वतोंसे नदियाँ निकलती हैं, उसी तरह जहाँ - तहाँसे संग्रह करके लाये और बढ़े हुए अर्थसे सारी क्रियाएँ ( चाहे वे योगप्रधान हों या भोगप्रधान ) सम्पन्न होती हैं ( निष्काम भाव होनेपर सभी क्रियाएँ योगप्रधान हो जाती हैं और सकाम भाव होनेपर भोगप्रधान ) ॥ ३२ ॥
अर्थेन हि विमुक्तस्य पुरुषस्याल्पचेतसः ।
विच्छिद्यन्ते क्रियाः सर्वा ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ ३३ ॥
' जो मन्दबुद्धि मानव अर्थसे वञ्चित है, उसकी सारी क्रियाएँ उसी तरह छिन्न - भिन्न हो जाती हैं, जैसे ग्रीष्म ऋतुमें छोटी-छोटी नदियाँ सूख जाती हैं ॥ ३३ ॥
सोऽयमर्थ परित्यज्य सुखकामः सुखैधितः ।
पापमाचरते कर्तुं तदा दोषः प्रवर्तते ॥ ३४ ॥
' जो पुरुष सुखमें पला हुआ है, वह यदि प्राप्त हुए अर्थको त्यागकर सुख चाहता है तो उस अभीष्ट सुखके लिये अन्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करनेमें प्रवृत्त होता है; इसलिये उसे ताड़न, बन्धन आदि दोष प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ ३५ ॥
' जिसके पास धन है, उसीके अधिक मित्र होते हैं । जिसके पास धनका संग्रह है, उसीके सब लोग भाई - बन्धु बनते हैं । जिसके यहाँ पर्याप्त धन है, वही संसारमें श्रेष्ठ पुरुष कहलाता है और जिसके पास धन है, वही विद्वान् समझा जाता है । ३५ ।
यस्यार्थाः स च विक्रान्तो यस्यार्थाः स च बुद्धिमान् ।
यस्यार्थाः स महाभागो यस्यार्थाः स गुणाधिकः ॥३६ ॥
' जिसके यहाँ धनराशि एकत्र है, वह पराक्रमी कहा जाता है । जिसके पास धनकी अधिकता है । वह बुद्धिमान् माना जाता है, जिसके यहाँ अर्थसंग्रह है, वह महान् भाग्यशाली कहलाता है तथा जिसके यहाँ धन - सम्पत्ति है, वह गुणोंमें भी बढ़ा - चढ़ा समझा जाता है ॥ ३६ ॥
अर्थस्यैते परित्यागे दोषाः प्रव्याहृता मया ।
राज्यमुत्सृजता धीर येन बुद्धिस्त्वया कृता ॥ ३७ ॥
' अर्थका त्याग करनेसे जो मित्रका अभाव आदि दोष प्राप्त होते हैं, उनका मैंने स्पष्टरूपसे वर्णन किया है । आपने राज्य छोड़ते समय क्या लाभ सोचकर अपनी बुद्धिमें अर्थ-त्यागकी भावनाको स्थान दिया, यह मैं नहीं जानता ॥ ३७ ॥
यस्यार्था धर्मकामार्थास्तस्य सर्वे प्रदक्षिणम् ।
अधनेनार्थकामेन नार्थः शक्यो विचिन्वता ॥ ३८ ॥
' जिसके पास धन है, उसके धर्म और कामरूप सारे प्रयोजन सिद्ध होते हैं । उसके लिये सब कुछ अनुकूल बन जाता है । जो निर्धन है, वह अर्थकी इच्छा रखकर उसका अनुसंधान करनेपर भी पुरुषार्थके बिना उसे नहीं पा सकता ॥ ३८ ॥
पृष्ठ 522
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
युद्धकाण्डे चतुरशीतितमः सर्गः १३१ ९
हर्षः कामश्च दर्पश्च धर्मः क्रोधः शमो दमः ।
अर्थादेतानि सर्वाणि प्रवर्तन्ते नराधिप ॥ ३ ९ ॥
' नरेश्वर! हर्ष, काम, दर्प, धर्म, क्रोध, राम और दम-ये सब धन होनेसे ही सफल होते हैं ॥ ३ ९ ॥
येषां नश्यत्ययं लोकश्चरतां धर्मचारिणाम् ।
तेऽस्त्वयि न दृश्यन्ते दुर्दिनेषु यथा ग्रहाः ॥ ४० ॥
‘ जो धर्मका आचरण करनेवाले और तपस्यामें लगे हुए हैं, उन पुरुषोंका यह लोक ( ऐहिक पुरुषार्थं ) अर्थाभाव के कारण ही नष्ट हो जाता है; यह स्पष्ट देखा जाता है । वही अर्थ इस दुर्दिनमें आपके पास उसी तरह नहीं दिखायी देता है, जैसे आकाश में बादल घिर आनेपर ग्रहोंके दर्शन नहीं होते हैं ॥ ४० ॥
त्वयि प्रव्रजिते वीर गुरोश्च वचने स्थिते ।
रक्षसापहृता भार्या प्राणैः प्रियतरा तव ॥ ४१ ॥
' वीर! आप पूज्य पिताकी आज्ञा पालन करनेके लिये राज्य छोड़कर वनमें चले आये और सत्यके पालनपर ही डटे रहे; परंतु राक्षसने आपकी पत्नीको, जो आपको प्राणोंसे भी अधिक प्यारी थी, हर लिया ॥ ४१ ॥
तदद्य विपुलं वीर दुःखमिन्द्रजिता कृतम् ।
कर्मणा व्यपनेष्यामि तस्मादुत्तिष्ठ राघव ॥ ४२ ॥
' वीर रघुनन्दन! आज इन्द्रजित् ने हमलोगोंको जो महान् दुःख दिया है, उसे मैं अपने पराक्रमसे दूर करूँगा; अतः चिन्ता छोड़कर उठिये ॥ ॥ ४२ ॥
उत्तिष्ठ नरशार्दूल दीर्घबाहो धृतव्रत ।
किमात्मानं महात्मानमात्मानं नावबुध्यसे ॥ ४३ ॥
" नरश्रेष्ठ! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महाबाहो! उठिये । आप परम बुद्धिमान् और परमात्मा हैं, इस रूप में अपने - आपको क्यों नहीं समझ रहे हैं १ ॥ ४३ ॥
अयमनघ तवोदितः प्रियार्थ जनकसुतानिधनं निरीक्ष्य रुष्टः । सरथगजहयां सराक्षसेन्द्रां भृशमिषुभिर्विनिपातयामि लङ्काम् ॥४४ ॥
‘ निष्पाप रघुवीर! यह मैंने आपसे जो कुछ कहा है, वह सब आपका प्रिय करनेके लिये आपका ध्यान शोककी ओरसे हटाकर पुरुषार्थकी ओर आकृष्ट करनेके लिये कहा है । अब जनकनन्दिनीकी मृत्युका वृत्तान्त जानकर मेरा रोष बढ़ गया है, अतः आज अपने बाणोंद्वारा हाथी, घोड़े, रथ और राक्षसराज रावणसहित सारी लङ्काको धूलमें मिला दूँगा ' ॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे व्यशीतितमः सर्गः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८३ ॥
चतुरशीतितमः सर्गः विभीषणका श्रीरामको इन्द्रजित् की मायाका रहस्य बताकर सीताके जीवित होनेका विश्वास दिलाना और लक्ष्मणको सेनासहित निकुम्भिला - मन्दिरमें भेजनेके लिये अनुरोध करना
राममाश्वासमाने तु लक्ष्मणे भ्रातृवत्सले ।
निक्षिप्य गुल्मान् स्वस्थाने तत्रागच्छद् विभीषणः ॥ १ ॥
भ्रातृभक्त लक्ष्मण जब श्रीरामको इस प्रकार आश्वासन दे रहे थे, उसी समय विभीषण वानर सैनिकोंको अपने - अपने स्थान-पर स्थापित करके वहाँ आये ॥ १ ॥
नानाप्रहरणैर्वीरैश्चतुर्भिरभिसंवृतः 1 नीलाञ्जनचयाकारैर्मातगैरिव यूथपैः ॥ २ ॥
नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र धारण किये चार निशाचर वीर, जो काली कजल - राशिके समान काले शरीरवाले यूथपति गजराजोंके समान जान पड़ते थे, चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा कर रहे थे ॥ २ ॥
सोऽभिगम्य महात्मानं राघवं शोकलालसम् ।
वानरांश्चापि ददृशे बाष्पपर्याकुलेक्षणान् ॥ ३ ॥
वहाँ आकर उन्होंने देखा महात्मा लक्ष्मण शोकमें मग्न हैं तथा वानरोंके नेत्रोंमें भी आँसू भरे हुए हैं ॥ ३ ॥
राघवं च महात्मानमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम् ।
ददर्श मोहमापन्नं लक्ष्मणस्याङ्कमाश्रितम् ॥ ४ ॥
साथ ही इक्ष्वाकु कुलनन्दन महात्मा श्रीरघुनाथजीपर भी उनकी दृष्टि पड़ी, जो मूच्छित हो लक्ष्मणकी गोद में लेटे हुए थे ॥ ४ ॥
व्रीडितं शोकसंतप्तं दृष्ट्वा रामं विभीषणः ।
अन्तर्दुःखेन दीनात्मा किमेतदिति सोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीको लजित तथा शोकसे संतप्त देख विभीषण-का हृदय आन्तरिक दुःखसे दीन हो गया । उन्होंने पूछा-' यह क्या बात है? ' ॥ ५ ॥
विभीषणमुखं दृष्ट्रा सुग्रीवं तांश्च वानरान् ।
लक्ष्मणोवाच मन्दार्थमिदं बाष्पपरिप्लुतः ॥ ६ ॥
तब लक्ष्मणने विभीषणके मुँहकी ओर देखकर तथा सुग्रीव और दूसरे - दूसरे वानरोंपर दृष्टिपात करके आँसू बहाते हुए, मन्दस्वर में कहा ॥ ६ ॥
पृष्ठ 523
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
हता इन्द्रजिता सीता इति श्रुत्वैव राघवः ।
हनूमद्वचनात् सौम्य ततो मोहमुपाश्रितः ॥ ७ ॥
' सौम्य! हनुमान जीके मुँहसे यह सुनकर कि ' इन्द्रजित्ने सीताजीको मार डाला ' श्रीरघुनाथजी तत्काल मूच्छित हो गये हैं ' ॥ ७ ॥
कथयन्तं तु सौमित्रिं संनिवार्य विभीषणः ।
पुष्कलार्थमिदं वाक्यं विसंज्ञं राममब्रवीत् ॥ ८ ॥
इस प्रकार कहते हुए लक्ष्मणको विभीषणने रोका और अचेत पड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीसे यह निश्चित बात कही ॥८ ॥
मनुजेन्द्रार्तरूपेण यदुक्तस्त्वं हनूमता ।
तदयुक्तमहं मन्ये सागरस्येव शोषणम् ॥ ९ ॥
“ महाराज! हनुमान्जीने दुखी होकर जो आपको समाचार सुनाया है, उसे मैं समुद्रको सोख लेनेके समान असम्भव मानता हूँ ॥ ९ ॥
अभिप्रायं तु जानामि रावणस्य दुरात्मनः ।
सीतां प्रति महाबाहो न च घातं करिष्यति ॥ १० ॥
‘ महाबाहो! दुरात्मा रावणका सीताके प्रति क्या भाव है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ । वह उनका वध कदापि नहीं करने देगा ॥ १० ॥
याच्यमानः सुबहुशो मया हितचिकीर्षुणा ।
वैदेहीमुत्सृजस्वेति न च तत् कृतवान् वचः ॥ ११ ॥
हित करनेकी इच्छासे अनेक बार यह अनुरोध तेन मोहयता नूनमेषा माया प्रयोजिता ॥ १५ ॥
विघ्नमन्विच्छता तत्र वानराणां पराक्रमे । ' निश्चय ही उसने हमलोगोंको मोहमें डालने के लिये ही यह मायाका प्रयोग किया है । उसने सोचा होगा - यदि वानरोंका पराक्रम चलता रहा तो मेरे इस कार्य में विघ्न पड़ेगा ( इजीलिये उसने ऐसा किया है ) ॥ १५३ ॥
ससैन्यास्तत्र गच्छामो यावत्तन्न समाप्यते ॥ १६ ॥
त्यजैनं नरशार्दूल मिथ्या संतापमागतम् । ' जबतक उसका होम - कर्म समाप्त नहीं होता, उसके पहले ही हमलोग सेनासहित निकुम्भिला - मन्दिरमें चले चलें । नरश्रेष्ठ! झूठे ही प्राप्त हुए इस संतापको त्याग दीजिये ॥ १६३ ॥
सीदते हि बलं सर्व दृष्ट्वा त्वां शोककर्शितम् ॥ १७ ॥
इह त्वं स्वस्थहृदयस्तिष्ठ सत्त्वसमुच्छ्रितः ।
लक्ष्मणं प्रेषयास्माभिः सह सैन्यानुकर्षिभिः ॥ १८ ॥
' प्रभो! आपको शोकसे संतप्त होते देख सारी सेना दुःखमें पड़ी हुई है । आप तो धैर्य में सबसे बढ़े - चढ़े हैं; अतः स्वस्थचित्त होकर यहीं रहिये और सेनाको लेकर जाते हुए हम लोगोंके साथ लक्ष्मणजी को भेज दीजिये ॥ १७-१८ ।
एष तं नरशार्दूलो राणि निशितैः शरैः ।
त्याजयिष्यति तत्कर्म ततो वध्यो भविष्यति ॥ १ ९ ॥
" ये नरश्रेष्ठ लक्ष्मण अपने पैने बाणोंसे मारकर रावण-कुमार को वह होमकर्म त्याग देनेके लिये विवश कर देंगे । इससे “ मैंने उसका उसने मेरी बात वह मारा जा सकेगा ॥ १ ९ ॥ किया कि विदेहकुमारीको छोड़ दो; किंतु तस्यैते निशितास्तीक्ष्णाः पत्रिपत्राङ्गवाजिनः । नहीं मानी ॥ ११ ॥ पतत्रिण इवासौम्याः शराः पास्यन्ति शोणितम् ॥ २० ॥
नैव साम्ना न दानेन न भेदेन कुतो युधा । शक्येत नैव चान्येन केनचित् ॥ १२ ॥ ' लक्ष्मणके ये पैने बाण जो पक्षियोंके अङ्गभूत परोंसे युक्त
सा द्रष्टुमपि भेदनीति के होनेके कारण बड़े वेगशाली हैं, कंक आदि क्रूर पक्षियोंके समान ' सीताको दूसरा कोई पुरुष साम, दाम और के रक्तका पान करेंगे ॥ २० ॥
द्वारा भी नहीं देख सकता; फिर युद्धके द्वारा कैसे देख सकता इन्द्रजित्
तत् संदिश महाबाहो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ।
है? ॥ १२ ॥ विनाशाय वज्रं वज्रधरो यथा ॥ २१ ॥
वानरान् मोहयित्वा तु प्रतियातः स राक्षसः । राक्षसस्य मायामयीं महाबाहो तां विद्धि जनकात्मजाम् ॥ १३ ॥ ' अतः महाबाहो! जैसे वज्रधारी इन्द्र दैत्योंके वध के लिये
महाबाहो! राक्षस इन्द्रजित् वानरोंको मोहमें डालकर वज्रका प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार आप उस राक्षसके चला ' गया है । जिसका उसने वध किया था, वह मायामयी विनाशके लिये शुभलक्षण सम्पन्न लक्ष्मणको जानेकी आज्ञा जानकी थीं, ऐसा निश्चित समझिये ॥ १३ ॥ दीजिये ॥ २१ ॥
प्राप्य होमं करिष्यति । मनुजवर न कालविप्रकर्षो चैत्यं निकुम्भिलामद्य देवैरपि सवासवैः ॥ १४ ॥ • रिपुनिधनं प्रति यत्क्षमोऽद्य कर्तुम् ।
हुतवानुपयातो हि त्वमतिसृज रिपोर्वधाय वज्रं
दुराधर्षो भवत्येष संग्रामे रावणात्मजः । दिविजरिपोर्मथने यथा महेन्द्रः ॥ २२ ॥
“ वह इस समय निकुम्भिला - मन्दिरमें जाकर होम करेगा ' नरेश्वर! शत्रुका विनाश करनेमें अब यह कालक्षेप करना और जब होम करके लौटेगा, उस समय उस रावणकुमारको आप शत्रुवधके लिये उसी संग्राममें परास्त करना इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी उचित नहीं है । इसलिये विनाशके तरह लक्ष्मणको भेजिये, जैसे देवद्रोही दैत्योंके कठिन होगा ॥ १४३ ॥
पृष्ठ 524
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चाशीतितमः सर्गः १३२१ युद्धकाण्डे लिये देवराज इन्द्र वज्रका प्रयोग करते हैं ॥ २२ ॥
समाप्तकर्मा हि स राक्षसर्षभो भवत्यदृश्यः समरे सुरासुरैः । युयुत्सता तेन समाप्तकर्मणा भवेत् सुराणामपि संशयो महान् ॥ २३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये ' वह राक्षस शिरोमणि इन्द्रजित् जब अपना अनुष्ठान पूरा कर लेगा, तब समराङ्गण में देवता और असुर भी उसे देख नहीं सकेंगे । अपना कर्म पूरा करके जब वह युद्धकी इच्छासे रणभूमिमें खड़ा होगा, उस समय देवताओंको भी अपने जीवनकी रक्षा के विषयमें महान् संदेह होने लगेगा ' ॥ २३ ॥
युद्धकाण्डे चतुरशीतितमः सर्गः ॥ ८४ ॥
आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण पञ्चाशीतितमः सर्गः लक्ष्मणको इन्द्रजित् के वध के लिये जानेकी आज्ञा विभीषण के अनुरोधसे श्रीरामचन्द्रजीका देना और सेनासहित लक्ष्मणका निकुम्भिला - मन्दिर के पास पहुँचना
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवः शोककर्शितः ।
नोपधारयते व्यक्तं यदुक्तं तेन रक्षसा ॥ १ ॥
भगवान् श्रीराम शोकसे पीड़ित थे, अतः राक्षस विभीषण-जो कुछ कहा, उनकी उस बातको सुनकर भी वे उसे स्पष्ट-रूपसे समझ न सके – उसपर पूरा ध्यान न दे सके ॥ १ ॥
ततो धैर्यमवष्टभ्य रामः परपुरंजयः ।
विभीषणमुपासीनमुवाच कपिसंनिधौ ॥ २ ॥
तदनन्तर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीराम धैर्य धारण करके हनुमानजी के समीप बैठे हुए विभीषणसे बोले –॥२ ॥
नैर्ऋताधिपते वाक्यं यदुक्तं ते विभीषण ।
भूयस्तच्छ्रोतुमिच्छामि ब्रूहि यत्ते विवक्षितम् ॥ ३ ॥
' राक्षसराज विभीषण! तुमने अभी - अभी जो बात कही है, उसे मैं फिर सुनना चाहता हूँ । बोलो, तुम क्या कहना चाहते हो? ' ॥ ३ ॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा वाक्यं वाक्यविशारदः ।
यत् तत् पुनरिदं वाक्यं वभाषेऽथ विभीषणः ॥ ४ ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर बातचीत में कुशल विभीषण-नै, वह जो बात कही थी, उसे पुनः दुहराते हुए इस प्रकार कहा -- ॥ ४ ॥
यथाऽऽज्ञप्तं महाबाहो त्वया गुल्मनिवेशनम् ।
तत् तथानुष्ठितं वीर त्वद्वाक्यसमनन्तरम् ॥ ५ ॥
' महाबाहो! आपने जो सेनाओंको यथास्थान स्थापित करनेकी आज्ञा दी थी, वीर! वह काम तो मैंने आपकी आज्ञा होते ही पूरा कर दिया ॥ ५ ॥
तान्यनीकानि सर्वाणि विभक्तानि समन्ततः ।
विन्यस्ता यूथपाश्चैव यथान्यायं विभागशः ॥ ६ ॥
' उन सब सेनाओंको विभक्त करके सब ओरके दरवाजों-पर स्थापित किया और यथोचित रीतिसे वहाँ अलग - अलग यूथपतियोंको भी नियुक्त कर दिया है ॥ ६ ॥
वा ० रा ० ५. १०.४-भूयस्तु मम विज्ञाप्यं तच्छृणुष्व महाप्रभो ।
त्वय्यकारण संतप्ते संतप्तहृदया वयम् ॥ ७ ॥
' महाराज! अब पुनः मुझे जो बात आपकी सेवामें निवेदन करनी है, उसे भी सुन लीजिये । बिना किसी कारण के आपके संतप्त होनेसे हमलोगों के हृदयमें भी बड़ा संताप हो रहा है ॥ ७ ॥
त्यज राजन्निमं शोकं मिथ्या संतापमागतम् ।
त्यज्यतां चिन्ता शत्रुहर्षविवर्धिनी ॥ ८ ॥
यदियं ' राजन्! मिथ्या प्राप्त हुए इस शोक और संतापको त्याग दीजिये; साथ ही इस चिन्ताको भी अपने मनसे निकाल दीजिये; क्योंकि यह शत्रुओंका हर्ष बढ़ानेवाली है ॥ ८ ॥
उद्यमः क्रियतां वीर हर्षः समुपसेव्यताम् ।
यदि ते सीता हन्तव्याश्च निशाचराः ॥ ९ ॥
प्राप्तव्या ' वीर! यदि आप सीताको पाना और निशाचरोंका वध करना चाहते हैं तो उद्योग कीजिये; हर्ष और उत्साहका सहारा लीजिये ॥ ९ ॥
वक्ष्यामि श्रूयतां मे हितं वचः । रघुनन्दन साध्वयं यातु सौमित्रिर्बलेन महता वृतः ॥ १० ॥
निकुम्भिलायां सम्प्राप्तं हन्तुं रावणिमाहवे । ‘ रघुनन्दन! मैं एक आवश्यक बात बताता हूँ, मेरी इस हितकर बातको सुनिये । रावणकुमार इन्द्रजित् निकुम्भिला-मन्दिरकी ओर गया है, अतः ये सुमित्राकुमार लक्ष्मण विशाल सेना साथ लेकर अभी उसपर आक्रमण करें-- युद्ध-में उस रावणपुत्रका वध करनेके लिये उसपर चढ़ाई कर दें-यही अच्छा होगा ॥ १०३ ॥
॥ ११ ॥
धनुर्मण्डलनिर्मुक्तैराशीविषविषोपमैः शरैर्हन्तुं महेष्वासो रावणि समितिंजयः । ' युद्ध विजयी महाधनुर्धर लक्ष्मण अपने मण्डलाकार धनुष-द्वारा छोड़े गये विषधर सपके तुल्य भयानक बार्णोसे रावण-पुत्रका वध करनेमें समर्थ हैं ॥ ११३ ॥
पृष्ठ 525
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३२२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
तेन वीरेण तपसा वरदानात् स्वयंभुवः ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरः प्राप्तं कामगाश्च तुरङ्गमाः ॥ १२ ॥
' उस वीरने तपस्या करके ब्रह्माजीके वरदानसे ब्रह्मशिर नामक अस्त्र और मनचाही गति से चलनेवाले घोड़े प्राप्त किये हैं! १२ ॥
स एष किल सैन्येन प्राप्तः किल निकुम्भिलाम् ।
यद्युत्तिष्ठेत् कृतं कर्म हतान् सर्वाश्च विद्धि नः ॥ १३ ॥
‘ निश्चय ही इस समय सेनाके साथ वह निकुम्भिलामें गया है । वहाँसे अपना हवन कर्म समाप्त करके यदि वह उठेगा तो हम सब लोगों को उसके हाथसे मरा ही समझिये ॥ १३ ॥
निकुम्भिलाम सम्प्राप्तमकृताग्निं च यो रिपुः ।
त्वामाततायिनं हन्यादिन्द्रशत्रो स ते वधः ॥ १४ ॥
वरो दत्तो महाबाहो सर्वलोकेश्वरेण वै ।
इत्येवं विहितो राजन् वधस्तस्यैष धीमतः ॥ १५ ॥
' महाबाहो! सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी ब्रह्माजीने उसे वरदान देते हुए कहा था- ' इन्द्रशत्रो! निकुम्भिला नामक वटवृक्ष-के पास पहुँचने तथा हवन सम्बन्धी कार्य पूर्ण करने के पहले ही जो शत्रु तुझ आततायी ( शस्त्रधारी ) को मारने के लिये आक्रमण करेगा, उसीके हाथसे तुम्हारा वध होगा । ' राजन्! इस प्रकार बुद्धिमान् इन्द्रजित् की मृत्युका विधान किया गया है ॥ १४-१५ ॥
वधायेन्द्रजितो राम संदिशख महाबलम् ।
हते तस्मिन् हतं विद्धि रावणं ससुहृद्गणम् ॥ १६ ॥
" इसलिये श्रीराम! आप इन्द्रजित् का वध करने के लिये महाबली लक्ष्मणको आज्ञा दीजिये । उसके मारे जानेपर रावण-को अपने सुहृदों सहित मरा ही समझिये ' ॥ १६ ॥
विभीषणवचः श्रुत्वा रामो वाक्यमथाब्रवीत् ।
जानामि तस्य रौद्रस्य मायां सत्यपराक्रम ॥ १७ ॥
विभीषणके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी शोकका परित्याग करके बोले – ' सत्यपराक्रमी विभीषण! उस भयंकर राक्षसकी मायाको मैं जानता हूँ! १७ ॥
स हि ब्रह्मास्त्रवित् प्राज्ञो महामायो महाबलः ।
करोत्यसंज्ञान् संग्रामे देवान् सवरुणानपि ॥ १८ ॥
" वह ब्रह्मास्त्रका ज्ञाता, बुद्धिमान्, बहुत बड़ा मायावी और महान् बलवान् है । वरुणसहित सम्पूर्ण देवताओं को भी वह युद्ध में अचेत कर सकता है ॥ १८ ॥
तस्यान्तरिक्षे चरतः सरथस्य महायशः ।
न गतिर्ज्ञायते वीर सूर्यस्येवाभ्रसम्प्लवे ॥ १ ९ ॥
राघवस्तु रिपोर्ज्ञात्वा मायावीर्य दुरात्मनः ।
लक्ष्मणं कीर्तिसम्पन्नमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥
' महायशस्वी वीर! जब इन्द्रजित् रथसहित आकाशमें विचरने लगता है, उस समय बादलों में छिपे हुए सूर्य की भाँति उसकी गतिका कुछ पता ही नहीं चलता । ' विभीषणसे ऐसा कह कर भगवान् श्रीरामने अपने शत्रु दुरात्मा इन्द्रजित् की माया-शक्तिको जानकर यशस्वी वीर लक्ष्मणसे यह बात कही -- १ ९ -२०
यद् वानरेन्द्रस्य बलं तेन सर्वेण संवृतः ।
हनूमत्प्रमुखैश्चैव यूथपैः सह लक्ष्मण ॥ २१ ॥
जाम्बवेनर्क्षपतिना सह सैन्येन संवृतः ।
जहि तं राक्षससुतं मायाबलसमन्वितम् ॥ २२ ॥
' लक्ष्मण! वानरराज सुग्रीवकी जो भी सेना है, वह सब साथ ले हनुमान् आदि यूथपतियों, ऋक्षराज जाम्बवान् तथा अन्य सैनिकोंसे घिरे रहकर तुम मायाबलसे सम्पन्न राक्षसराज -कुमार इन्द्रजितका वध करो ॥ २१-२२ ॥
अयं त्वां सचिवैः सार्धं महात्मा रजनीचरः ।
अभिशस्तस्य मायानां पृष्ठतोऽनुगमिष्यति ॥ २३ ॥
' ये महामना राक्षसराज विभीषण उसकी मायाओंसे अच्छी तरह परिचित हैं, अतः अपने मन्त्रियोंके साथ ये भी तुम्हारे पीछे - पीछे जायेंगे ' ॥ २३ ॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः सविभीषणः ।
जग्राह कार्मुकश्रेष्ठमन्यद् भीमपराक्रमः ॥ २४ ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर विभीषणसहित भयानक पराक्रमी लक्ष्मणने अपना श्रेष्ठ धनुष हाथमें लिया ॥ २४ ॥
संनद्धः कवची खड्गी सशरी वामचापभृत् ।
रामपादावुपस्पृश्य हृष्टः सौमित्रिरब्रवीत् ॥ २५ ॥
वे युद्ध की सब सामग्री लेकर तैयार हो गये । उन्होंने कवच धारण किया, तलवार बाँध ली और उत्तम बाण तथा बायें हाथमें धनुष ले लिये । तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीके चरण छूकर हर्षसे भरे हुए सुमित्रा कुमारने कहा— ॥ २५ ॥
अद्य मत्कार्मुकोन्मुक्ताः शरा निर्भिद्य रावणिम् ।
लङ्कामभिपतिष्यन्ति हंसाः पुष्करिणीमिव ॥ २६ ॥
' आर्य! आज मेरे धनुषसे छूटे हुए बाण रावणकुमार को विदीर्ण करके उसी तरह लङ्कामें गिरेंगे, जैसे हंस कमलों से भरे हुए सरोवर में उतरते हैं ॥ २६ ॥
अद्यैव तस्य रौद्रस्य शरीरं मामकाः शराः ।
विधमिष्यन्ति भित्त्वा तं महाचापगुणच्युताः ॥ २७ ॥
" इस विशाल धनुषसे छूटे हुए मेरे बाण आज ही उस भयंकर राक्षसके शरीर को विदीर्ण करके उसे कालके गाल में डाल देंगे ' || २७ ॥
एवमुक्त्वा तु वचनं द्युतिमान् भ्रातुरग्रतः ।
स रावणवधाकाङ्क्षी लक्ष्मणस्त्वरितं ययौ ॥ २८ ॥
इन्द्रजित् के वधकी अभिलाषा रखनेवाले तेजस्वी लक्ष्मण अपने भाई के सामने ऐसी बात कहकर तुरंत वहाँसे चल दिये ॥
सोऽभिवाद्य गुरोः पादौ कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
निकुम्भिलामभिययौ चैत्यं रावणिपालितम् ॥ ॥ २ ९ ॥
पृष्ठ 526
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
युद्धकाण्डे षडशीतितमः सर्गः १३२३ पहले उन्होंने अपने बड़े भाईके चरणों में प्रणाम किया, फिर उनकी परिक्रमा करके रावणकुमारद्वारा पालित निकुम्भिला मन्दिरकी ओर प्रस्थान किया ॥ २ ९ ॥
विभीषणेन सहितो राजपुत्रः प्रतापवान् ।
कृतस्वस्त्ययनो भ्रात्रा लक्ष्मणस्त्वरितो ययौ ॥ ३० ॥
भाई श्रीरामद्वारा स्वस्तिवाचन किये जानेके पश्चात् विभीषणसहित प्रतापी राजकुमार लक्ष्मण बड़ी उतावलीके साथ चले ॥ ३० ॥
वानराणां सहस्रैस्तु हनूमान् बहुभिर्वृतः ।
विभीषणश्च सामान्य लक्ष्मणं त्वरितं ययौ ॥ ३१ ॥
कई हजार वानरवीरोंके साथ हनुमान् और मन्त्रियों सहित विभीषण भी लक्ष्मणके पीछे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए ॥ ३१ ॥
महता हरिसैन्येन सवेगमभिसंवृतः ।
ऋक्षराजबलं चैव ददर्श पथि विष्ठितम् ॥ ३२ ॥
विशाल वानर सेनासहित घिरे हुए लक्ष्मणने वेगपूर्वक आगे बढ़कर मार्ग में खड़ी हुई ऋक्षराज जाम्बवान्की सेनाको देखा || ३२ ॥
स गत्वा दूरमध्वानं सौमित्रिर्मित्रनन्दनः ।
राक्षसेन्द्रबलं दूरादपश्यद् व्यूहमाश्रितम् ॥ ३३ ॥
रास्ता तैं कर लेनेपर मित्रोंको आनन्दित करने वाले सुमित्रा कुमारने कुछ दूरसे ही देखा, राक्षसराज रावणकी सेना मोर्चा बाँधे खड़ी है ॥ ३३ ॥
स सम्प्राप्य धनुष्पाणिर्मायायोगमरिंदमः ।
तस्थौ ब्रह्मविधानेन • विजेतुं रघुनन्दनः ॥ ३४ ॥
शत्रुओं का दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन लक्ष्मण हाथमें धनुष ले ब्रह्माजीके निश्चित किये हुए विधान के अनुसार उस मायावी राक्षसको जीतनेके लिये निकुम्भिला नामक स्थानमें पहुँचकर एक जगह खड़े हो गये ॥ ३४ ॥
विभीषणेन सहितो राजपुत्रः प्रतापवान् ।
अङ्गदेन च वीरेण तथानिलसुतेन च ॥ ३५ ॥
उस समय प्रतापी राजकुमार लक्ष्मणके साथ विभीषण, वीर अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमान् भी थे ॥ ३५ ॥
विविधममलशस्त्रभास्वरं तद् ध्वजगहनं गहनं महारथैश्च । प्रतिभयतममप्रमेयवेगं तिमिरमिव द्विषतां बलं विवेश ॥ ३६ ॥
चमकीले अस्त्र - शस्त्रोंसे जो प्रकाशित हो रही थी, ध्वजों और महारथियोंके कारण गहन दिखायी देती थी, जिसके वेगका कोई माप नहीं था तथा जो अनेक प्रकारकी वेशभूषा में दृष्टिगोचर होती थी, अन्धकारके समान काली उस शत्रुसेना में विभीषण आदिके साथ लक्ष्मणने प्रवेश किया ॥ ३६ ॥
दूरतकका इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकी आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चाशीतितमः सर्गः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८५ ॥
षडशीतितमः सर्गः वानरों और राक्षसोंका युद्ध, हनुमानजीके द्वारा राक्षससेनाका संहार और उनका इन्द्रजितको द्वन्द्वयुद्धके लिये ललकारना तथा लक्ष्मणका उसे देखना अथ तस्यामवस्थायां लक्ष्मणं रावणानुजः । स त्वमिन्द्राशनिप्रख्यैः शरैरवाकिरन् परान् । वाक्यमर्थसाधकमब्रवीत् ॥ १ ॥ अभिद्रवाशु यावद् वै नैतत् कर्म समाप्यते ॥ ४ ॥
परेषामहितं रावणके छोटे भाई विभीषणने लक्ष्मणसे ' अतः आप इस हवन - कर्मकी समाप्तिके पहले ही वज्र-उस अवस्था में सिद्ध करनेवाली तुल्य बाणोंकी वर्षा करते हुए शत्रुओंपर शीघ्र धावा कीजिये || ऐसी बात कही, जो उनके अभीष्ट अर्थको तथा शत्रुओंके लिये अहितकर थी ॥ १ ॥
यदेतद् राक्षसानीकं मेघश्यामं विलोक्यते ।
एतदायोध्यतां शीघ्रं कपिभिश्च शिलायुधैः ॥ २
तस्यानीकस्य महतो भेदने यत लक्ष्मण ।
राक्षसेन्द्रसुतोऽप्यत्र भिन्ने दृश्यो भविष्यति ॥ ३
जहि वीर दुरात्मानं मायापरमधार्मिकम् ।
रावणि क्रूरकर्माणं सर्वलोकभयावहम् ॥ ५ ॥
॥ " वीर! वह दुरात्मा रावणकुमार बड़ा ही मायावी, अधर्मी, क्रूर कर्म करनेवाला और सम्पूर्ण लोकोंके लिये भयंकर ॥ है; अतः इसका वध कीजिये ' ॥ ५ ॥
वे बोले - ' लक्ष्मण! यह सामने जो मेघोंकी काली विभीषणवचः श्रुत्वा लक्ष्मणः शुभलक्षणः । समान राक्षसोंकी सेना दिखायी देती है, उसके साथ ववर्ष शरवर्षेण राक्षसेन्द्रसुतं प्रति ॥ ६ ॥
घटा करनेवाले वानरवीर शीघ्र ही युद्ध विभीषणकी यह बात सुनकर शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणने शिलारूपी आयुध धारण राक्षसराजके पुत्रको लक्ष्य करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी । छेड़ दें और आप भी इस विशाल वाहिनीके व्यूहका भेदन करनेका प्रयत्न करें । इसका मोर्चा टूटनेपर राक्षसराजका ऋक्षाः शाखामृगाश्चैव द्रुमप्रवरयोधिनः । पुत्र इन्द्रजित् भी हमें यहीं दिखायी देगा ॥ २-३ ॥ अभ्यधावन्त सहितास्तदनीकमवस्थितम् ॥ ७ ॥
पृष्ठ 527
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे साथ ही बड़े - बड़े वृक्ष लेकर युद्ध करनेवाले वानर और भालू भी वहाँ खड़ी हुई राक्षस - सेनापर एक साथ ही टूट पड़े ।
राक्षसाश्च शितैर्वाणैरसिभिः शक्तितोमरैः ।
अभ्यवर्तन्त समरे कपिसैन्यजिघांसवः ॥ ८ ॥
उधरसे राक्षस भी वानरसेनाको नष्ट करनेकी इच्छासे समराङ्गणमें तीखे बाण, तलवारों, शक्तियों और तोमरोंका प्रहार करते हुए उनका सामना करने लगे ॥ ८ ॥
स सम्प्रहारस्तुमुलः संजज्ञे कपिरक्षसाम् ।
शब्देन महता लङ्कां नादयन् वै समन्ततः ॥ ९ ॥
इस प्रकार वानरों और राक्षसोंमें घमासान युद्ध होने लगा । उसके महान् कोलाहलसे समूची लङ्कापुरी सब ओरसे गूँज उठी ॥ ९ ॥
शस्त्रैश्च विविधाकारैः शितैर्बाणैश्च पादपैः ।
उद्यतैर्गिरिश्टङ्गैश्व घोरैराकाशमावृतम् ॥ १० ॥
नाना प्रकारके शस्त्रों, पैने बाणों, उठे हुए वृक्षों और भयानक पर्वत - शिखरोंसे वहाँका आकाश आच्छादित हो गया ॥
राक्षसा वानरेन्द्रेषु विकृताननबाहवः ।
निवेशयन्तः शस्त्राणि चक्रुस्ते सुमहद्भयम् ॥ ११ ॥
विकट मुँह और बाँहोंवाले राक्षसोंने वानरयूथपतियोंपर ( नाना प्रकारके ) शस्त्रोंका प्रहार करते हुए उनके लिये महान् भय उपस्थित कर दिया ॥ ११ ॥
तथैव सकलैर्वृक्षैर्गिरिश्टङ्गैश्व वानराः ।
अभिजघ्नुर्निजघ्नुश्च समरे सर्वराक्षसान् ॥ १२ ॥
उसी प्रकार वानर भी समराङ्गणमें सम्पूर्ण वृक्षों और पर्वत - शिखरोंद्वारा समस्त राक्षसों को मारने एवं हताहत करने लगे ॥ १२ ॥
ऋक्षवानरमुख्यैश्च महाकायैर्महाबलैः ।
रक्षसां युध्यमानानां महद्भयमजायत ॥ १३ ॥
मुख्य - मुख्य महाकाय महाबली रीछों और वानरोंसे जूझते हुए राक्षसोंको महान् भय लगने लगा ॥ १३ ॥
स्वमनीकं विषण्णं तु श्रुत्वा शत्रुभिरर्दितम् ।
उदतिष्ठत दुर्धर्षः स कर्मण्यननुष्ठिते ॥ १४ ॥
रावणकुमार इन्द्रजित् बड़ा दुर्धर्ष वीर था । उसने जब सुना कि मेरी सेना शत्रुओंद्वारा पीड़ित होकर बड़े दुःखमें पड़ गयी है, तब अनुष्ठान समाप्त होनेके पहले ही वह युद्धके लिये उठ खड़ा हुआ ॥ १४ ॥
वृक्षान्धकारान्निर्गत्य जातक्रोधः स रात्रणिः ।
आरुरोह रथं सज्जं पूर्वयुक्तं सुसंयतम् ॥ १५ ॥
उस समय उसके मनमें बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ था । वह वृक्षोंके अन्धकारसे निकलकर एक सुसज्जित रथपर आरूढ़ हुआ, जो पहलेसे ही जोतकर तैयार रक्खा गया था । वह रथ बहुत ही सुदृढ़ था ॥ १५ ॥
स भीमकार्मुकशरः कृष्णाञ्जनचयोपमः ।
रक्तास्यनयनो भीमो बभौ मृत्युरिवान्तकः ॥ १६ ॥
इन्द्रजित् के हाथमें भयंकर धनुष और बाण थे । वह काले कोयले के ढेर - सा जान पड़ता था । उसके मुँह और नेत्र लाल थे । वह भयंकर राक्षस विनाशकारी मृत्युके समान प्रतीत होता था ॥ १६ ॥
दैव तु रथस्थं तं पर्यवर्तत तद् बलम् ।
रक्षसां भीमवेगानां लक्ष्मणेन युयुत्सताम् ॥ १७ ॥
इन्द्रजित् रथपर बैठ गया, यह देखते ही लक्ष्मणके साथ युद्धकी इच्छा रखनेवाले भयंकर वेगशाली राक्षसों की वह सेना उसके आसपास सब ओर खड़ी हो गयी ॥ १७ ॥
तस्मिंस्तु काले हनुमानरुजत् स दुरासदम् ।
धरणीधरसंकाशो महावृक्षमरिंदमः ॥ १८ ॥
उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले पर्वतके समान विशालकाय हनुमान् जीने एक बहुत बड़े वृक्षको, जिसे तोड़ना या उखाड़ना कठिन था, उखाड़ लिया ॥ १८ ॥
स राक्षसानां तत् सैन्यं कालाग्निरिव निर्दहन् ।
चकार बहुभिर्वृक्षैर्निःसंज्ञं युधि वानरः ॥ १ ९ ॥
फिर तो वे वानरवीर प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठे और युद्धस्थलमें राक्षसोंकी उस सेनाको दग्ध करते हुए बहु-संख्यक वृक्षोंकी मारसे अचेत करने लगे ॥ १ ९ ॥ विध्वंसयन्तं तरसा दृष्ध्रुव पवनात्मजम् ।. राक्षसानां सहस्राणि हनूमन्तमवाकिरन् ॥ २० ॥
पवनकुमार हनुमानजी बड़े वेगसे राक्षस - सेनाका विध्वंस कर रहे हैं, यह देखते ही सहस्रों राक्षस उनपर अस्त्र - शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ २० ॥
शितशूलधराः शूलैरसिभिश्चासिपाणयः ।
शक्तिहस्ताश्च शक्तीभिः पट्टिशैः पट्टिशायुधाः ॥ २१ ॥
चमकीले शूल धारण करनेवाले राक्षस शूलोंसे, जिनके हाथोंमें तलवारें थीं वे तलवारोंसे, शक्तिधारी शक्तियोंसे और पट्टिशधारी राक्षस पट्टिशोंसे उनपर प्रहार करने लगे ॥ २१ ॥
परिघैश्च गदाभिश्व कुन्तैश्च शुभदर्शनैः ।
शतशश्च शतघ्नीभिरायसैरपि मुद्गरैः ॥ २२ ॥
घोरैः परशुभिश्चैव भिन्दिपालैश्च राक्षसाः ।
मुष्टिभिर्वज्रकल्पैश्च तलैरशनिसंनिभैः ॥ २३ ॥
अभिजघ्नुः समासाद्य समन्तात् पर्वतोपमम् ।
तेषामपि च संक्रुद्धश्चकार कदनं महत् ॥ २४ ॥
बहुत - से परिघों, गदाओं, सुन्दर भालों, सैकड़ों शतघ्नियों, लोहे के बने हुए मुद्गरों, भयानक फरसों, भिन्दिपालों, वज्रके समान मुक्कों और अशनितुल्य थप्पड़ोंसे वे समस्त राक्षस पास आकर सब ओरसे पर्वताकार हनुमानूजीपर प्रहार करने लगे । हनुमानजीने कुपित होकर उनका भी महान् संहार किया ॥
पृष्ठ 528
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
युद्धकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः १३२५
स ददर्श कपिश्रेष्ठमचलोपममिन्द्रजित् ।
सूक्ष्मानमसंत्रस्तममित्रान् पवनात्मजम् ॥ २५ ॥
इन्द्रजित्ने देखा, कपिवर पवनकुमार हनुमान् पर्वतके समान अचल हो निःशङ्कभावसे अपने शत्रुओंका संहार कर रहे हैं ॥ २५ ॥
स सारथिमुवाचेदं याहि यत्रैष वानरः ।
क्षयमेव हि नः कुर्याद् राक्षसानामुपेक्षितः ॥ २६ ॥
यह देखकर उसने अपने सारथिसे कहा --- ' जहाँ यह वानर युद्ध करता है, वहीं चलो । यदि उसकी उपेक्षा की गयी तो यह हम सब राक्षसों का विनाश ही कर डालेगा ' ॥२६ ॥
इत्युक्तः सारथिस्तेन ययौ यत्र स मारुतिः ।
वहन् परमदुर्धर्ष स्थितमिन्द्रजितं रथे ॥ २७ ॥
उसके ऐसा कहनेपर सारथि रथपर बैठे हुए अत्यन्त दुर्जय वीर इन्द्रजितको ढोता हुआ उस स्थानपर गया, जहाँ पवनपुत्र हनुमान जी विराजमान थे ॥ २७ ॥
सोऽभ्युपेत्य शरान् खङ्गान् पट्टिशांश्च परश्वधान् ।
अभ्यवर्षत दुर्धर्षः कपिमूर्धनि राक्षसः ॥ २८ ॥
वहाँ पहुँचकर उस दुर्जय राक्षसने हनुमान्जीके मस्तकपर बाणों, तलवारों, पट्टिशों और फरसोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।
तानि शस्त्राणि घोराणि प्रतिगृह्य स मारुतिः ।
रोषेण महताविष्टो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ २ ९ ॥
उन भयानक शस्त्रों को अपने शरीरपर झेलकर पवनपुत्र हनुमान्जी महान् रोषसे भर गये और इस प्रकार बोले— ॥
युध्यस्व यदि शूरोऽसि रावणात्मज दुर्मते ।
वायुपुत्रं समासाद्य न जीवन् प्रतियास्यसि ॥ ३० ॥
' दुर्बुद्धि रावणकुमार! यदि बड़े शूरवीर हो तो आओ
बाहुभ्यां सम्प्रयुध्यस्व यदि मे द्वन्द्वमाहवे ।
वेगं सहख दुर्बुद्धे ततस्त्वं रक्षसां वरः ॥ ३१ ॥
‘ दुर्मते! अपनी भुजाओंद्वारा मेरे साथ द्वन्द्व - युद्ध करो । इस बाहुयुद्धमें यदि मेरा वेग सह लो तो तुम राक्षसों में श्रेष्ठ वीर समझे जाओगे ' ॥ ३१ ॥
हनूमन्तं जिघांसन्तं समुद्यतशरासनम् ।
रावणात्मजमाचष्टे लक्ष्मणाय विभीषणः ॥ ३२ ॥
रावणकुमार इन्द्रजित् धनुष उठाकर हनुमान् जीका वध करना चाहता था । इसी अवस्थामें विभीषणने लक्ष्मणको उसका परिचय दिया- ॥ ३२ ॥
यः स वासवनिर्जेता रावणस्यात्मसम्भवः ।
स एष रथमास्थाय हनूमन्तं जिघांसति ॥ ३३ ॥
तमप्रतिमसंस्थानैः शरैः शत्रुनिवारणैः ।
जीवितान्तकरैर्घोरैः सौमित्रे रावणि जहि ॥ ३४ ॥
' सुमित्रानन्दन! रावणका जो पुत्र इन्द्रको भी जीत चुका है, वही यह रथपर बैठकर हनुमान्जीका वध करना चाहता है । अतः आप शत्रुओंका विदारण करनेवाले, अनुपम आकार - प्रकारसे युक्त एवं प्राणान्तकारी भयंकर बार्णोद्वारा उस रावणकुमारको मार डालिये ' ॥ ३३-३४ ॥ इत्येवमुक्तस्तु तदा महात्मा विभीषणेनारिविभीषणेन ददर्श त पर्वतसंनिकाशं रथस्थितं भीमबलं दुरासदम् ॥ ३५ ॥
, शत्रुओंको भयभीत करनेवाले विभीषणके ऐसा कहनेपर मल्लयुद्ध करो । इस वायुपुत्रसे भिड़कर जीवित नहीं उस समय महात्मा लक्ष्मणने रथपर बैठे हुए उस भयंकर मेरे साथ बलशाली पर्वताकार दुर्जय राक्षसको देखा ॥ ३५ ॥
लौट सकोगे ॥ ३० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षडशीतितमः सर्गः ॥ ८६ ॥
श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८६ ॥
इस प्रकार सप्ताशीतितमः सर्गः इन्द्रजित और विभीषणकी रोपपूर्ण बातचीत
एवमुक्त्वा तु सौमित्रिं जातहर्षो विभीषणः ।
धनुष्पाणि तमादाय त्वरमाणो जगाम सः ॥ १ ॥
पूर्वोक्त बात कहकर हर्षंसे भरे हुए विभीषण धनुर्धर सुमित्राकुमारको साथ लेकर बड़े वेगसे आगे बढ़े ॥ १ ॥
अविदूरं ततो गत्वा प्रविश्य तु महद् वनम् ।
अदर्शयत तत्कर्म लक्ष्मणाय विभीषणः ॥ २ ॥
थोड़ी ही दूर जानेपर विभीषणने एक महान् वनमें प्रवेश ॥ करके लक्ष्मणको इन्द्रजित् के कर्मानुष्ठानका स्थान दिखाया । २ ।
नीलजीमूतसंकाशं न्यग्रोधं भीमदर्शनम् ।
तेजस्वी रावणभ्राता लक्ष्मणाय न्यवेदयत् ॥ ३ ॥
वहाँ एक बरगदका वृक्ष था, जो श्याममेघ के समान सघन और देखने में भयंकर था । रावणके तेजस्वी भ्राता विभीषणने लक्ष्मणको वहाँकी सब वस्तुएँ दिखाकर कहा - ॥ ३ ॥
इहोपहारं भूतानां बलवान् रावणात्मजः ।
ततः पश्चात् संग्राममभिवर्तते ॥ ४ ॥
उपहृत्य ' सुमित्रानन्दन! यह बलवान् रावणकुमार प्रतिदिन यहीं
पृष्ठ 529
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३२६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे आकर पहले भूतोंको बलि देता, उसके बाद युद्ध में प्रवृत्त होता है ॥ ४ ॥
• अदृश्यः सर्वभूतानां ततो भवति राक्षसः ।
निहन्ति समरे शत्रून् बध्नाति च शरोत्तमैः ॥ ५ ॥
‘ इसीसे संग्रामभूमिमें यह राक्षस सम्पूर्ण भूतोंके लिये अदृश्य हो जाता है और उत्तम बाणोंसे शत्रुओंको मारता तथा बाँध लेता है ॥ ५ ॥
तमप्रविष्टं न्यग्रोधं बलिनं रावणात्मजम् ।
विध्वंसय शरैर्दीप्तैः सरथं साश्वसारथिम् ॥ ६ ॥
‘ अतः जबतक यह इस बरगद के नीचे आये, उसके पहले ही आप अपने तेजस्वी बाणोंद्वारा इस बलवान् रावणकुमारको रथ, घोड़े और सारथिसहित नष्ट कर दीजिये ' ॥ ६ ॥
तथेत्युक्त्वा महातेजाः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः ।
बभूवावस्थितस्तत्र चित्रं विस्फारयन् धनुः ॥ ७ ॥
तब ' बहुत अच्छा ' कहकर मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी सुमित्राकुमार अपने विचित्र धनुषकी टंकार करते हुए वहाँ खड़े हो गये ॥ ७ ॥
स रथेनाग्निवर्णेन बलवान् रावणात्मजः ।
इन्द्रजित् कवची खड्गी सध्वजः प्रत्यदृश्यत ॥ ८ ॥
इतनेमें ही बलवान् रावणकुमार इन्द्रजित् अग्नि के समान तेजस्वी रथपर बैठा हुआ कवच, खड्ग और ध्वजाके साथ दिखायी पड़ा ॥ ८ ॥
तमुवाच महातेजाः पौलस्त्य मपराजितम् ।
समाह्वये त्वां समरे सम्यग युद्धं प्रयच्छ ॥९ ॥
तब महातेजस्वी लक्ष्मणने पराजित न होनेवाले पुलस्त्य-कुलनन्दन इन्द्रजित्से कहा – ' राक्षसकुमार! मैं तुम्हें युद्ध के लिये ललकारता हूँ । तुम अच्छी तरह सँभलकर मेरे साथ युद्ध करो ' ॥ ९ ॥
एवमुक्तो महातेजा मनस्वी रावणात्मजः ।
अब्रवीत् परुषं वाक्यं तत्र दृष्ट्वा विभीषणम् ॥ १० ॥
लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी और मनस्वी रावण-कुमारने वहाँ विभीषणको उपस्थित देख कठोर शब्दोंमें कहा- ॥ १० ॥
इह त्वं जातसंवृद्धः साक्षाद् भ्राता पितुर्मम ।
कथं द्रुह्यसि पुत्रस्य पितृव्यो मम राक्षस ॥ ११ ॥
' राक्षस! यहीं तुम्हारा जन्म हुआ और यहीं बढ़कर तुम इतने बड़े हुए । तुम मेरे पिता के सगे भाई और मेरे चाचा हो । फिर तुम अपने पुत्रसे- मुझसे क्यों द्रोह करते हो? ॥ ११ ॥
न ज्ञातित्वं न सौहार्द न जातिस्तव दुर्मते ।
प्रमाणं न च सौदर्य न धर्मो धर्मदूषण ॥ १२ ॥
“ दुर्मते । तुममें न तो कुटुम्बीजनोंके प्रति अपनापनका भाव है, न आत्मीयजनोंके प्रति स्नेह है और न अपनी जाति-का अभिमान ही है । तुममें कर्तव्य अकर्तव्यकी मर्यादा, भ्रातृ-प्रेम और धर्मं कुछ भी नहीं है । तुम राक्षस धर्मको कलंकित करनेवाले हो ॥ १२ ॥
शोच्यस्त्वमसि दुर्बुद्धे निन्दनीयश्च साधुभिः ।
यस्त्वं स्वजनमुत्सृज्य परभृत्यत्वमागतः ॥ १३ ॥
' दुर्बुद्धे! तुमने स्वजनोंका परित्याग करके दूसरोंकी गुलामी स्वीकार की है । अतः तुम सत्पुरुषोंद्वारा निन्दनीय और शोकके योग्य हो ॥ १३ ॥
नैतच्छिथिलया बुद्धया त्वं वेत्सि महदन्तरम् ।
क्व च स्वजनसंवासः क्व च नीच पराश्रयः ॥ १४ ॥
' नीच निशाचर! तुम अपनी शिथिल बुद्धिके द्वारा इस महान् अन्तरको नहीं समझ पा रहे हो कि कहाँ तो स्वजनोंके साथ रहकर स्वच्छन्दताका आनन्द लेना और कहाँ दूसरोंकी गुलामी करके जीना है ॥ १४ ॥
गुणवान् वा परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा ।
निर्गुणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव सः ॥ १५ ॥
" दूसरे लोग कितने ही गुणवान् क्यों न हों और स्वजन गुणहीन ही क्यों न हो? वह गुणहीन स्वजन भी दूसरोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ ही है; क्योंकि दूसरा दूसरा ही होता है ( वह कभी अपना नहीं हो सकता ) ॥ १५ ॥
यः स्वपक्षं परित्यज्य परपक्षं निषेवते ।
स स्वपक्षे क्षयं याते पश्चात् तैरेव हन्यते ॥ १६ ॥
' जो अपने पक्षको छोड़कर दूसरे पक्षके लोगोंका सेवन करता है, वह अपने पक्षके नष्ट हो जानेपर फिर उन्हींके द्वारा मार डाला जाता है ॥ १६ ॥
निरनुक्रोशता चेयं यादृशी ते निशाचर ।
स्वजनेन त्वया शक्यं पौरुषं रावणानुज ॥ १७ ॥
' रावणके छोटे भाई निशाचर! तुमने लक्ष्मणको इस स्थान तक ले आकर मेरा वध करानेके लिये प्रयत्न करके यह जैसी निर्दयता दिखायी है, ऐसा पुरुषार्थं तुम्हारे जैसा स्वजन ही कर सकता है — तुम्हारे सिवा दूसरे किसी स्वजनके लिये ऐसा करना सम्भव नहीं है ' ॥ १७ ॥
इत्युक्तो भ्रातृपुत्रेण प्रत्युवाच विभीषणः ।
अजानन्निव मच्छीलं किं राक्षस विकत्थसे ॥ १८ ॥
अपने भतीजे के ऐसा कहनेपर विभीषणने उत्तर दिया-' राक्षस! तू आज ऐसी शेखी क्यों बघारता है? जान पड़ता है तुझे मेरे स्वभावका पता ही नहीं है ॥ १८ ॥
राक्षसेन्द्रसुतासाधो पारुष्यं त्यज गौरवात् ।
कुले यद्यप्यहं जातो रक्षसां क्रूरकर्मणाम् ।
गुणो यः प्रथमो नृणां तन्मे शीलमराक्षसम् ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 530
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
युद्धकाण्डे अष्टाशीतितमः सर्गः १३२७ ' अधम! राक्षसराजकुमार! बड़ोंके बड़प्पनका ख्याल करके तू इस कठोरताका परित्याग कर दे । यद्यपि मेरा जन्म क्रूरकर्मा राक्षसोंके कुलमें ही हुआ है, तथापि मेरा शील - स्वभाव राक्षसोंका - सा नहीं है । सत्पुरुषों का जो प्रधान गुण सत्व है, मैंने उसीका आश्रय ले रक्खा है ॥ १ ९ ॥
न रमे दारुणेनाहं न चाधर्मेण वै रमे ।
भ्रात्रा विषमशीलोऽपि कथं भ्राता निरस्यते ॥ २० ॥
' क्रूरतापूर्ण कर्म में मेरा मन नहीं लगता । अधर्म में मेरी रुचि नहीं होती । यदि अपने भाईका शील - स्वभाव अपनेसे न मिलता हो तो भी बड़ा भाई छोटे भाईको कैसे घरसे निकाल सकता है? ( परंतु मुझे घरसे निकाल दिया गया, फिर मैं दूसरे सत्पुरुषका आश्रय क्यों न लूँ? ) ॥ २० ॥
धर्मात् प्रच्युतशीलं हि पुरुषं पापनिश्चयम् ।
सुखमवाप्नोति हस्तादाशीविषं यथा ॥ २१ ॥
त्यक्त्वा' जिसका शील - स्वभाव धर्मसे भ्रष्ट हो गया हो, जिसने पाप करनेका दृढ़ निश्चय कर लिया हो, ऐसे पुरुषका त्याग करके प्रत्येक प्राणी उसी प्रकार सुखी होता है, जैसे हाथपर बैठे हुए जहरीले सर्पको त्याग देनेसे मनुष्य निर्भय हो जाता है ॥ २१ ॥
परस्वहरणे युक्तं परदाराभिमर्शकम् ।
वेश्म प्रज्वलितं यथा ॥ २२ ॥
त्याज्यमाहुर्दुरात्मानं ' जो दूसरोंका धन लूटता हो और परायी स्त्रीपर हाथ लगाता हो, उस दुरात्माको जलते हुए घरकी भाँति त्याग देने योग्य बताया गया है ॥ २२ ॥
परखानां च हरणं परदाराभिमर्शनम् ।
सुहृदामतिशङ्का च त्रयो दोषाः क्षयावहाः ॥ २३ ॥
मेरे भाईमें मौजूद हैं, जो उसके प्राण और ऐश्वर्य दोनोंका नाश करनेवाले हैं । जैसे बादल पर्वतों को आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार इन दोषोंने मेरे भाईके सारे गुणोंको ढक दिया है ॥ २४-२५ ॥
दोषैरेतैः परित्यक्तो मया भ्राता पिता तव ।
नेयमस्ति पुरी लङ्का न चत्वं नच ते पिता ॥ २६ ॥
" इन्हीं दोषों के कारण मैंने अपने भाई एवं तेरे पिताका त्याग किया है । अब न तो यह लङ्कापुरी रहेगी, न तू रहेगा और न तेरे पिता ही रह जायँगे ॥ २६ ॥
अतिमानश्च बालश्च दुर्विनीतश्च राक्षस ।
बद्धस्त्वं कालपाशेन ब्रूहि मां यद् यदिच्छसि ॥ २७ ॥
' राक्षस! तू अत्यन्त अभिमानी, उद्दण्ड और बालक ( मूर्ख ) है, कालके पाशमें बँधा हुआ है; इसलिये तेरी जो-जो इच्छा हो, मुझे कह ले || २७ ॥
अद्येह व्यसनं प्राप्तं यन्मां परुषमुक्तवान् ।
प्रवेष्टुं न त्वया शक्यं न्यग्रोधं राक्षसाधम ॥ २८ ॥
' नीच राक्षस! तूने मुझसे जो कठोर बात कही है, उसीका यह फल है कि आज तुझपर यहाँ घोर संकट आया है । अब तू बरगद के नीचेतक नहीं जा सकता ॥ २८ ॥
धर्षयित्वा च काकुत्स्थं न शक्यं जीवितुं त्वया ।
युध्यस्व नरदेवेन लक्ष्मणेन रणे सह ।
करिष्यसि यमक्षयम् ॥ २ ९ ॥
हतस्त्वं देवताकार्यं लक्ष्मणका तिरस्कार करके तू जीवित नहीं रह ‘ ककुत्स्थकुलभूषण सकता; अतः इन नरदेव लक्ष्मणके साथ रणभूमि में युद्ध कर । यहाँ मारा जाकर तू यमलोकमें पहुँचेगा और कार्य करेगा ( उन्हें संतुष्ट करेगा ) ॥ २ ९ ॥ ‘ पराये धनका अपहरण, परस्त्रीके साथ संसर्गं और अपने देवताओंका समुद्यतं हितैषी सुहृदोंपर अधिक शङ्का — अविश्वास – ये तीन दोष निदर्शयस्वात्मबलं । कुरुष्व सर्वायुधसायकव्ययम् विनाशकारी बताये गये हैं ॥ २३ ॥ न लक्ष्मणस्यैत्य हि बाणगोचरं
महर्षीणां वधो घोरः सर्वदेवैश्व विग्रहः । त्वमद्य जीवन सबलो गमिष्यसि ॥ ३० ॥
अभिमानश्च रोषश्च वैरत्वं प्रतिकूलता ॥ २४ ॥ बढ़ा हुआ सारा बल दिखा ' समस्त
एते दोषा मम भ्रातुर्जीवितैश्वर्यनाशनाः । ' अब तू अपना व्यय कर ले; परंतु लक्ष्मणके बाणोंका पर्वतानिव तोयदाः ॥ २५ ॥ आयुधों और सायकोंका
गुणान् प्रच्छादयामासुः साथ विरोध, निशाना बनकर आज तू सेनासहित जीवित नहीं लौट ' महर्षियोंका भयंकर वध, सम्पूर्ण देवताओंके अभिमान, रोष, वैर और धर्मके प्रतिकूल चलना - ये दोष सकेगा ' ॥ ३० ॥
वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः ॥ ८७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सतासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण अष्टाशीतितमः सर्गः और इन्द्रजित् की परस्पर रोषभरी बातचीत और घोर युद्ध लक्ष्मण । विभीषणकी यह बात सुनकर रावणकुमार इन्द्रजित् विभीषणवचः श्रुत्वा रावणिः क्रोधमूच्छितः क्रोधसे मूच्छित - सा हो उठा । वह रोषपूर्वक कठोर बातें अब्रवीत् परुषं वाक्यं क्रोधेनाभ्युत्पपात च ॥ १ ॥