Ramayana 2 — पृष्ठ 541–550
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550
पृष्ठ 541
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३३८ भीमव्वाल्मीकीयरामायणे
सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुघातिना ।
असक्तं प्रेषयामास लक्ष्मणाय बहूञ्शरान् ॥ २६ ॥
शत्रुहन्ता प्रबल शत्रुके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर इन्द्रजित्ने लक्ष्मणपर लगातार बहुत बाण बरसाये ॥ २६ ॥
तानप्राप्ताञ्शितैर्बाणैश्चिच्छेद परवीरहा ।
सारथेरस्य च रणे रथिनो रथसत्तमः ॥ २७ ॥
शिरो जहार धर्मात्मा भल्लेनानतपर्वणा । परंतु शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले रथियों में श्रेष्ठ धर्मात्मा लक्ष्मणने अपने पासतक पहुँचनेसे पहले ही उन बाणको अपने तीखे सायकोंद्वारा काट डाला और रणभूमिमें रथी इन्द्रजित् के सारथिका मस्तक भी झुकी हुई गाँठवाले भल्लसे उड़ा दिया ॥ २७३ ॥
असूतास्ते हयास्तत्र रथमूहुरविक्लवाः ॥ २८ ॥
मण्डलान्यभिधावन्ति तदद्भुतमिवाभवत् । सारथिके न रहनेपर भी वहाँ उसके घोड़े व्याकुल नहीं हुए । पूर्ववत् शान्तभावसे रथको ढोते रहे और विभिन्न
प्रकारके पैंतरे बदलते हुए मण्डलाकार गतिसे दौड़ लगाते रहे ।
वह एक अद्भुत - सी बात थी ॥ २८३ ॥
अमर्षवशमापन्नः सौमित्रिर्दृढविक्रमः ॥ २ ९ ॥
प्रत्यविध्यद्धयांस्तस्य शरैर्वित्रासयन् रणे । सुदृढ़ पराक्रमी सुमित्राकुमार लक्ष्मण अमर्षके वशीभूत हो रणक्षेत्रमें उसके घोड़ोंको भयभीत करनेके लिये उन्हें बाणोंसे बेधने लगे ॥ २ ९ ३ ॥ अमर्षमाणस्तत्कर्म रावणस्य सुतो रणे ॥ ३० ॥
विव्याध दशभिर्बाणैः सौमित्रिं तममर्षणम् । रावणकुमार इन्द्रजित् युद्धस्थलमें लक्ष्मणके इस पराक्रम-को नहीं सह सका । उसने उन अमर्षशील सुमित्राकुमारको दस बाण मारे || ३०३ ॥
ते तस्य वज्रप्रतिमाः शराः सर्पविषोपमाः ।
विलयं जग्मुरागत्य कवचं काञ्चनप्रभम् ॥ ३१ ॥
उसके वे वज्रतुल्य बाण सर्पके विषकी भाँति प्राणघाती थे, तथापि लक्ष्मण के सुनहरी कान्तिवाले कवचसे टकराकर वहीं नष्ट हो गये ॥ ३१ ॥
अभेद्यकवचं मत्वा लक्ष्मणं रावणात्मजः ।
ललाटे लक्ष्मणं बाणैः सुपुङ्खैस्त्रिभिरिन्द्रजित् ॥ ३२ ॥
अविध्यत् परमक्रुद्धः शीघ्रमस्त्रं प्रदर्शयन् ।
तैः पृषत्कैर्ललाटस्थैः शुशुभे रघुनन्दनः ॥ ३३ ॥
रणा समरश्लाघी त्रिश्टङ्ग इव पर्वतः । लक्ष्मणका कवच अभेद्य है, ऐसा जानकर रावणकुमार १. पहले लक्ष्मणके कवचके टूटनेका वर्णन आ चुका है । इन्द्रजित्ने उनके ललाटमें सुन्दर पंखवाले तीन बाण मारे । उसने अपनी अस्त्र चलानेकी फुर्ती दिखाते हुए अत्यन्त क्रोधपूर्वक उन्हें घायल कर दिया । ललाटमें धँसे हुए उन चाणोंसे युद्धकी श्लाघा रखनेवाले रघुकुलनन्दन लक्ष्मण संग्रामके मुहाने पर तीन शिखरोंवाले पर्वतके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३२-३३३ ॥ स तथाप्यर्दितो बाणै राक्षसेन तदा मृधे ॥ ३४ ॥
तमाशु प्रतिविव्याध लक्ष्मणः पञ्चभिः शरैः ।
विकृष्येन्द्रजितो युद्धे वदने शुभकुण्डले ॥ ३५ ॥
उस राक्षसके द्वारा युद्ध में बाणोंसे इस प्रकार पीड़ित किये जानेपर भी लक्ष्मणने उस समय तुरंत पाँच बाणोंका संघान किया और धनुषको खींचकर चलाये हुए उन बाणोंके द्वारा सुन्दर कुण्डलोंसे सुशोभित इन्द्रजित् के मुखमण्डलको क्षत-विक्षत कर दिया || ३४-३५ ॥
लक्ष्मणेन्द्रजितौ वीरौ महाबलशरासनौ ।
अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ विशिखैर्भीमविक्रमौ ॥ ३६ ॥
लक्ष्मण तथा इन्द्रजित् दोनों वीर महाबलवान् थे । उनके धनुष भी बहुत बड़े थे । भयंकर पराक्रम करनेवाले वे दोनों योद्धा एक दूसरेको बाणोंसे घायल करने लगे ॥ ३६ ।
ततः शोणितदिग्धाङ्गौ लक्ष्मणेन्द्रजितावुभौ ।
रणे तौ रेजतुर्वीरौ पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ३७ ॥
इससे लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनोंके शरीर लहूलुहान हो गये । रणभूमिमें वे दोनों वीर फूले हुए पलाशके वृक्षोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३७ ॥
तौ परस्परमभ्येत्य सर्वगात्रेषु धन्विनौ ।
घोरैर्विव्यधतुर्बाणैः कृतभावावुभौ जये ॥ ३८ ॥
उन दोनों धनुर्धर वीरोंके मनमें विजय पानेके लिये दृढ़ संकल्प था, अतः वे आपसमें भिड़कर एक दूसरेके सभी अङ्गोंको भयंकर बाणोंका निशाना बनाने लगे ॥ ३८ ॥
ततः समरकोपेन संयुतो रावणात्मजः ।
विभीषणं त्रिभिर्बाणैर्विव्याध वदने शुभे ॥ ३ ९ ॥
इसी बीचमें समरोचित क्रोधसे युक्त हुए रावणकुमारने विभीषणके सुन्दर मुखपर तीन बाणोंका प्रहार किया ॥ ३ ९ ॥
अयोमुखैस्त्रिभिर्विद्ध्वा राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।
एकैकेनाभिविव्याध तान् सर्वान् हरियूथपान् ॥ ४० ॥
जिनके अग्रभागमें लोहेके फल लगे हुए थे, ऐसे तीन बाणोंसे राक्षसराज विभीषणको घायल करके इन्द्रजित्ने उन सभी वानर - यूथपतियोंपर एक - एक बाणका प्रहार किया ॥ ४० ॥
तस्मै दृढतरं क्रुद्धो जघान गदया हयान् । उसके बाद लक्ष्मणने फिर अभेद्य कवच धारण किया था । यह इस विभीषणो महातेजा रावणेः स दुरात्मनः ॥ ४१ ॥
प्रसंगसे जाना जाता है 1 इससे महातेजस्वी विभीषणको उसपर बड़ा क्रोध आया
पृष्ठ 542
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
युद्धकाण्डे नवतितमः सर्गः १३३ ९ और उन्होंने अपनी गदासे उस दुरात्मा रावणकुमार के चारों घोड़ोंको मार डाला ॥ ४१ ॥
स हताश्वादवप्लुत्य रथान्निहतसारथेः ।
अथ शक्ति महातेजाः पितृव्याय मुमोच ह ॥ ४२ ॥
जिसका सारथि पहले ही मारा जा चुका था और अब घोड़े भी मार डाले गये, उस रथसे नीचे कूदकर महातेजस्वी इन्द्रजित्ने अपने चाचापर शक्तिका प्रहार किया ॥ ४२ ॥
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य सुमित्रानन्दवर्धनः ।
चिच्छेद निशितैर्बाणैर्दशधापातयद् भुवि ॥ ४३ ॥
उस शक्तिको आती देख सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मणने तीखे बाणोंसे काट डाला और दस टुकड़े करके उसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ४३ ॥
तस्मै दृढधनुः क्रुद्धो हताश्वाय विभीषणः ।
वज्रस्पर्शसमान् पञ्च ससर्जोरसि मार्गणान् ॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले विभीषणने जिसके घोड़े मारे गये थे, उस इन्द्रजित्पर कुपित हो उसकी छाती में पाँच बाण मारे, जिनका स्पर्श वज्रके समान दुःसह था ॥ ४४ ॥
ते तस्य कार्यं भित्त्वा तु रुक्मपुङ्खा निमित्तगाः ।
बभूवुर्लोहितादिग्धा रक्ता इव महोरगाः ॥ ४५ ॥
सुनहरे पङ्क्ङ्खोंसे सुशोभित और लक्ष्यतक पहुँचनेवाले वे बाण इन्द्रजित्के शरीरको विदीर्णं करके उसके रक्त में सन गये और लाल रंग बड़े - बड़े सपके समान दिखायी देने लगे ॥ ४५ ॥
स पितृव्यस्य संक्रुद्ध इन्द्रजिच्छरमाददे ।
उत्तमं रक्षसां मध्ये यमदत्तं महाबलः ॥ ४६ ॥
द्वारा जोर - जोरसे खींचे जाते हुए उन दोनोंके श्रेष्ठ धनुष दो क्रौञ्च पक्षियोंके समान शब्द करने लगे ॥ ४ ९ ॥
ताभ्यां तु धनुषि श्रेष्ठे संहितौ सायकोत्तमौ ।
विकृष्यमाणौ वीराभ्यां भृशं जज्वलतुः श्रिया ॥ ५० ॥
उन वीरोंने अपने - अपने श्रेष्ठ धनुषपर जो उत्तम सायक रक्खे थे, वे खींचे जाते ही अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो उठे ॥ ५० ॥
तौ भासयन्तावाकाशं धनुर्भ्यां विशिखौ च्युतौ ।
मुखे मुखमाहत्य संनिपेततुरोजसा ॥ ५१ ॥
दोनोंके बाण एक साथ ही धनुषसे छूटे और अपनी प्रभासे आकाशको प्रकाशित करने लगे । दोनोंके मुखभाग बड़े वेगसे आपस में टकरा गये ॥ ५१ ॥
संनिपातस्तयोश्वासीच्छरयो घोररूपयोः 1 सधूमविस्फुलिङ्गश्च तज्जोऽग्निर्दारुणोऽभवत् ॥ ५२ ॥
उन दोनों भयानक बाणोंकी ज्यों ही टक्कर हुई, उससे दारुण अग्नि प्रकट हो गयी; जिससे धूआँ उठने लगा और चिनगारियाँ दिखायी दीं ॥ ५२ ॥
तौ महाग्रहसंकाशावन्योन्यं संनिपत्य च ।
संग्रामे शतधा यातौ मेदिन्यां चैव पेततुः ॥ ५३ ॥
वे दोनों बाण दो महान् ग्रहोंकी भाँति आपस में टकराकर सैकड़ों टुकड़े हो संग्रामभूमिमें गिर पड़े ॥ ५३ ॥
शरौ प्रतिहतौ दृष्ट्रा तावुभौ रणमूर्धनि ।
व्रीडितौ जातरोषौ च लक्ष्मणेन्द्रजितौ तदा ॥ ५४ ॥
युद्धके मुहाने पर उन दोनों बाणोंको आपसके आघात-प्रतिघातसे व्यर्थ हुआ देख लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनोंको ही उस समय लज्जा हुई । फिर दोनों एक दूसरेके प्रति अत्यन्त तब महाबली इन्द्रजित् के मनमें अपने चाचाके प्रति बड़ा रोषसे भर गये ॥ ५४ ॥
क्रोध हुआ । उसने राक्षसोंके बीचमें यमराजका दिया हुआ सुसंरब्धस्तु सौमित्रिरस्त्रं वारुणमाददे । उत्तम बाण हाथमें लिया ॥ ४६ ॥ रौद्रं महेन्द्रजिद्युद्धेऽप्यसृजद् युधि निष्ठितः ॥ ५५ ॥
तं समीक्ष्य महातेजा महेषु तेन संहितम् । सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने कुपित होकर वारुणास्त्र उठाया । लक्ष्मणोऽप्याददे बाणमन्यद् भीमपराक्रमः ॥ ४७ ॥ साथ ही उस रणभूमिमें खड़े हुए इन्द्रजित्ने रौद्रास्त्र उठाया
उस महान् बाणको इन्द्रजित् के द्वारा धनुषपर रक्खा और उसे वारुणास्त्र के प्रतीकारके लिये छोड़ दिया ॥ ५५ ॥
गया देख भयानक पराक्रम करनेवाले महातेजस्वी लक्ष्मणने तेन तद्विहितं शस्त्रं वारुणं परमाद्भुतम् । भी दूसरा बाण उठाया ॥ ४७ ॥ ततः क्रुद्धो महातेजा इन्द्रजित् समितिंजयः ।
कुबेरेण स्वयं स्वप्ने यद् दत्तममितात्मना । आग्नेयं संदधे दीप्तं स लोकं संक्षिपन्निव ॥ ५६ ॥
दुर्जयं दुर्विषह्यं च सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ ४८ ॥ उस रौद्रास्त्रसे आहत होकर लक्ष्मणका अत्यन्त अद्भुत
उस बाणकी शिक्षा महात्मा कुबेरने स्वप्नमें प्रकट होकर वारुणास्त्र शान्त हो गया । तदनन्तर समरविजयी महातेजस्वी स्वयं उन्हें दी थी । वह बाण इन्द्र आदि देवताओं तथा इन्द्रजित्ने कुपित होकर दीप्तिमान् आग्नेयास्त्रका संधान किया, असुरोंके लिये भी असह्य एवं दुर्जय था ॥ ४८ ॥ मानो वह उसके द्वारा समस्त लोकोंका प्रलय कर देना चाहता
तयोस्तु धनुषी श्रेष्ठे बाहुभिः परिघोपमैः । हो ॥ ५६ ॥
विकृष्यमाणे बलवत् क्रौञ्चाविव चुकूजतुः ॥ ४ ९ ॥ सौरेणास्त्रेण तद् वीरो लक्ष्मणः पर्यवारयत् । उन दोनोंकी परिधके समान मोटी और बलिष्ठ भुजाओं- अस्त्रं निवारितं दृष्ट्वा रावणिः क्रोधमूच्छितः ॥ ५७ ॥
पृष्ठ 543
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३४० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे परंतु वीर लक्ष्मणने सूर्यास्त्र प्रयोगसे उसे शान्त कर दिया । अपने अस्त्रको प्रतिहत हुआ देख रावणकुमार इन्द्रजित् अचेत - सा हो गया ॥ ५७ ॥
आददे निशितं वाणमासुरं शत्रुदारणम् ।
तस्माच्चापाद् विनिष्पेतुर्भाखराः कूटमुद्गराः ॥ ५८ ॥
शूलानि च भुशुण्ड्यश्च गदाः खड्गाः परश्वधाः । उसने आसुर नामक शत्रुनाशक तीखे बाणका प्रयोग किया, फिर तो उसके उस धनुषसे चमकते हुए कूट, मुद्गर, शूल, भुशुण्डि, गदा, खड्ग और फरसे निकलने लगे ॥ ५८३ ॥
तद् दृष्ट्वा लक्ष्मणः संख्ये घोरमस्त्रमथासुरम् ॥ ५ ९ ॥
अवार्य सर्वभूतानां सर्वशस्त्रविदारणम् ।
माहेश्वरेण द्युतिमांस्तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ॥ ६० ॥
रणभूमिमें उस भयंकर आसुरास्त्रको प्रकट हुआ देख तेजस्वी लक्ष्मणने सम्पूर्ण अस्त्र - शस्त्रोंको विदीर्ण करनेवाले माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, जिसका समस्त प्राणी मिलकर भी निवारण नहीं कर सकते थे । उस माहेश्वरास्त्र के द्वारा उन्होंने उस आसुरास्त्रको नष्ट कर दिया ॥ ५ ९ -६० ॥
तयोः समभवद् युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम् ।
गगनस्थानि भूतानि लक्ष्मणं पर्यवारयन् ॥ ६१ ॥
इस प्रकार उन दोनोंमें अत्यन्त अद्भुत और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा । आकाशमें रहनेवाले प्राणी लक्ष्मण को घेरकर खड़े हो गये ॥ ६१ ॥
भैरवाभिरुते भीमे युद्धे वानररक्षसाम् ।
भूतैर्बहुभिराकाशं विस्मितैरावृतं बभौ ॥ ६२ ॥
भैरव - गर्जनासे गूँजते हुए वानरों और राक्षसोंके उस भयानक युद्धके छिड़ जानेपर आश्चर्यचकित हुए बहुसंख्यक प्राणी आकाशमें आकर खड़े हो गये । उनसे घिरे हुए उस आकाशकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ ६२ ॥
ऋषयः पितरो देवा गन्धर्वगरुडोरगाः ।
शतक्रतुं पुरस्कृत्य ररक्षुर्लक्ष्मणं रणे ॥ ६३ ॥
ऋषि, पितर, देवता, गन्धर्व्वं, गरुड़ और नाग भी इन्द्रको आगे करके रणभूमिमें सुमित्राकुमारकी रक्षा करने लगे ॥६३ ॥
अथान्यं मार्गणश्रेष्ठं संदधे राघवानुजः ।
हुताशनसमस्पर्श रावणात्मजदारणम् ॥ ६४ ॥
तत्पश्चात् लक्ष्मणने दूसरा उत्तम बाण अपने धनुषपर रक्खा, जिसका स्पर्श आगके समान जलानेवाला था । उसमें रावणकुमारको विदीर्ण कर देनेकी शक्ति थी ॥ ६४ ॥
सुपत्रमनुवृत्ताङ्गं सुपर्वाणं सुसंस्थितम् ।
सुवर्णविकृतं वीरः शरीरान्तकरं शरम् ॥ ६५ ॥
दुरावारं दुर्विषहं राक्षसानां भयावहम् ।
आशीविषविषप्रख्यं देवसंघैः समर्चितम् ॥ ६६ ॥
येन शक्रो महातेजा दानवानजयत् प्रभुः ।
पुरा देवासुरे युद्धे वीर्यवान् हरिवाहनः ॥ ६७ ॥
अथैन्द्रमस्त्रं सौमित्रिः संयुगेष्वपराजितम् ।
शरश्रेष्ठं धनुश्रेष्ठे विकर्षन्निदमब्रवीत् ॥ ६८ ॥
लक्ष्मीवाँलक्ष्मणो वाक्यमर्थसाधकमात्मनः ।
धर्मात्मा सत्यसंधच रामो दाशरथिर्यदि ।
पौरुषे चाप्रतिद्वन्द्वस्तदैनं जहि रावणिम् ॥ ६ ९ ॥
उसमें सुन्दर पर लगे थे । उस बाणका सारा अङ्ग सुडौल एवं गोल था । उसकी गाँठ भी सुन्दर थी । वह बहुत ही मजबूत और सुवर्णसे भूषित था । उसमें शरीरको चीर डालने-की क्षमता थी । उसे रोकना अत्यन्त कठिन था । उसके आघात-को सह लेना भी बहुत मुश्किल था । वह राक्षसोंको भयभीत करनेवाला तथा विषधर सर्पके विषकी भाँति शत्रुके प्राण लेने-वाला था । देवताओं द्वारा उस बाणकी सदा ही पूजा की गयी थी । पूर्वकाल के देवासुर संग्राम में हरे रंग के घोड़ोंसे युक्त रथवाले, पराक्रमी, शक्तिमान् एवं महातेजस्वी इन्द्रने उसी बाणसे दानवोंपर विजय पायी थी । उसका नाम था ऐन्द्रास्त्र । वह युद्धके अवसरों पर कभी पराजित या असफल नहीं हुआ था । शोभासम्पन्न वीर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने अपने उत्तम धनुष-पर उस श्रेष्ठ बाणको रखकर उसे खींचते हुए अपने अभिप्राय-को सिद्ध करनेवाली यह बात कही —— ' यदि दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं तथा पुरुषार्थमें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई वीर नहीं है तो हे अस्त्र! तुम इस रावणपुत्रका वध कर डालो ' ॥ ६५–६९ ॥ इत्युक्त्वा वाणमाकर्ण विकृष्य तमजिह्मगम् ।
लक्ष्मणः समरे वीरः ससर्जेन्द्रजितं प्रति ।
ऐन्द्रास्त्रेण समायुज्य लक्ष्मणः परवीरहा ॥ ७० ॥
समराङ्गणमें ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वीर लक्ष्मणने सीधे जानेवाले उस बाणको कानतक खींचकर ऐन्द्रा से संयुक्त करके इन्द्रजित् की ओर छोड़ दिया ॥ ७० ॥
तच्छिरः सशिरस्त्राणं श्रीमज्ज्वलितकुण्डलम् ।
प्रमथ्येन्द्रजितः कायात् पातयामास भूतले ॥ ७१ ॥
धनुषसे छूटते ही ऐन्द्रास्त्रने जगमगाते हुए कुण्डलोंसे युक्त इन्द्रजित् के शिरस्त्राणसहित दीप्तिमान् मस्तकको धड़से काटकर धरतीपर गिरा दिया ॥ ७१ ॥
तद् राक्षसतनूजस्य भिन्नस्कन्धं शिरो महत् ।
तपनीयनिभं भूमौ ददृशे रुधिरोक्षितम् ॥ ७२ ॥
राक्षसपुत्र इन्द्रजितका कंधेपरसे कटा हुआ वह विशाल सिर, जो खून से लथपथ हो रहा था, भूमिपर सुवर्ण के समान दिखायी देने लगा ॥ ७२ ॥
हतः स निपपाताथ धरण्यां रावणात्मजः ।
कवची सशिरस्त्राणो विप्रविद्धशरासनः ॥ ७३ ॥
पृष्ठ 544
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 545
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 546
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
युद्धकाण्डे नवतितमः सर्गः १३४१ इस प्रकार मारा जाकर कवच, सिर और शिरस्त्राणसहित रावणकुमार धराशायी हो गया । उसका धनुष दूर जा गिरा ॥ ७३ ॥
चुक्रुशुस्ते ततः सर्वे वानराः सविभीषणाः ।
हृष्यन्ते निहते तस्मिन् देवा वृत्रवधे यथा ॥ ७४ ॥
जैसे वृत्रासुरका वध होनेपर देवता प्रसन्न हुए थे, उसी प्रकार इन्द्रजित् के मारे जानेपर विभीषणसहित समस्त वानर हर्षसे भर गये और जोर - जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ७४ ॥
अथान्तरिक्षे देवानामृषीणां च महात्मनाम् ।
जज्ञेऽथ जयसंनादो गन्धर्वाप्सरसामपि ॥ ७५ ॥
आकाशमें देवताओं, महात्मा ऋषियों, गन्धर्वो तथा अप्सराओंका भी विजयजनित हर्षनाद गूँज उठा ॥ ७५ ॥
पतितं समभिज्ञाय राक्षसी सा महाचमूः ।
वध्यमाना दिशो भेजे हरिभिर्जितकाशिभिः ॥ ७६ ॥
इन्द्रजित् को धराशायी हुआ जान राक्षसोंकी वह विशाल सेना विजयसे उल्लसित हुए वानरोंकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओं में भागने लगी ॥ ७६ ॥
वानरैर्वध्यमानास्ते शस्त्राण्युत्सृज्य राक्षसाः ।
लङ्कामभिमुखाः सस्नुर्भ्रष्टसंज्ञाः प्रधाविताः ॥ ७७ ॥
वानरोंद्वारा मारे जाते हुए राक्षस अपनी सुध - बुध खो बैठे और अस्त्र - शस्त्रोंको छोड़कर तेजीसे भागते हुए लङ्काकी ओर चले गये ॥ ७७ ॥
दुद्रुवुर्बहुधा भीता राक्षसाः शतशो दिशः ।
त्यक्त्वा प्रहरणान् सर्वे पट्टिशासिपरश्वधान् ॥ ७८ ॥
बहुत डर गये थे; इसलिये वे सब के सब पट्टिश,
शान्तरश्मिरिवादित्यो निर्वाण इव पावकः ।
स महाबाहुर्व्यपास्तगतजीवितः ॥ ८२ ॥
बभूव महाबाहु इन्द्रजित् निष्प्राण हो जानेपर शान्त किरणोंवाले सूर्य अथवा बुझी हुई आगके समान निस्तेज हो गया ॥ ८२ ॥
प्रशान्तपीडाबहुलो विनष्टारः प्रहर्षवान् ।
बभूव लोकः पतिते राक्षसेन्द्रसुते तदा ॥ ८३ ॥
उस समय राक्षसराजकुमार इन्द्रजित् के समरभूमिमें गिर जानेपर सारे संसारकी अधिकांश पीडा नष्ट हो गयी । सबका शत्रु मारा गया और सभी हर्षसे भर गये ॥ ८३ ॥
हर्ष च शक्रो भगवान् सह सर्वैर्महर्षिभिः ।
जगाम निहते तस्मिन् राक्षसे पापकर्मणि ॥ ८४ ॥
उस पापकर्मा राक्षसके मारे जानेपर सम्पूर्ण महर्षियोंके • साथ भगवान् इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ८४ ॥
आकाशे चापि देवानां शुश्रुवे दुन्दुभिस्वनः ।
नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च गन्धर्वैश्च महात्मभिः ॥ ८५ ॥
आकाशमें नाचती हुई अप्सराओं और गाते हुए महामना के नृत्य और गानकी ध्वनिके साथ देवताओंकी दुन्दुभि-का शब्द भी सुनायी देने लगा ॥ ८५ ॥
ववर्षुः पुष्पवर्षाणि तदद्भुतमिवाभवत् ।
प्रशशाम हते तस्मिन् राक्षसे क्रूरकर्मणि ॥ ८६ ॥
देवता आदि वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे । वह दृश्य अद्भुत - सा प्रतीत हुआ । उस क्रूरकर्मा राक्षसके मारे जानेपर वहाँकी उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी ॥ ८६ ॥
शुद्धा आपो नभश्चैव जहपुर्देवदानवाः ।
आजग्मुः पतिते तस्मिन् सर्वलोकभयावहे ॥ ८७ ॥
राक्षस फरसे आदि शस्त्रोंको त्यागकर सैकड़ोंकी संख्यामें ऊचुश्च सहितास्तुष्टा देवगन्धर्वदानवाः । खड्ग और विज्वराः शान्तकलुषा ब्राह्मणा विचरन्त्विति ॥ ८८ ॥
एक साथ ही सब दिशाओं में भागने लगे ॥ ७८ ॥ इन्द्रजित् के धराशायी
परित्रस्ताः प्रविष्टा वानरार्दिताः । सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाले केचिल्लङ्कां पर्वतमाश्रिताः ॥ ७ ९ ॥ होनेपर जल स्वच्छ हो गया, आकाश भी निर्मल दिखायी देने समुद्रे पतिताः केचित् केचित् लगा और देवता तथा दानव हर्षसे खिल उठे । देवता, गन्धर्व वानरोंसे पीड़ित होकर कोई डर के मारे लङ्कामें घुस गये, आये और सब एक साथ संतुष्ट होकर बोले— कोई समुद्रमें कूद पड़े और कोई - कोई पर्वतकी चोटीपर चढ़ और दानव वहाँ एवं क्लेशशून्य होकर सर्वत्र विचरें ॥ अब ब्राह्मणलोग निश्चिन्त
गये ॥ ७ ९ ॥ ततोऽभ्यनन्दन् संहृष्टाः समरे हरियूथपाः ।
हतमिन्द्रजितं दृष्ट्रा शयानं च रणक्षितौ । दृष्ट्वा हतं नैर्ऋतपुङ्गवम् ॥ ८ ९ ॥
राक्षसानां सहस्रेषु न कश्चित् प्रत्यदृश्यत ॥ ८० ॥ तमप्रतिबलं इन्द्र-इन्द्रजित् मारा गया और रणभूमिमें सो रहा है, यह समराङ्गणमें अप्रतिम बलशाली निशाचरशिरोमणि
एक भी वहाँ खड़ा नहीं दिखायी जितको मारा गया देख हर्षसे भरे हुए वानर - यूथपति लक्ष्मणका देख हजारों राक्षसोंमेंसे अभिनन्दन करने लगे ॥ ८ ९ ॥ दिया ॥ ८० ॥ हनूमांश्च जाम्बवांश्चर्क्षयूथपः ।
यथास्तंगत आदित्ये नावतिष्ठन्ति रश्मयः । विभीषणो तथा तस्मिन् निपतिते राक्षसास्ते गता दिशः ॥ ८१ ॥ विजयेनाभिनन्दन्तस्तुष्टुवुश्चापि लक्ष्मणम् ॥ ९ ० ॥
उसकी किरणें यहाँ नहीं विभीषण, हनुमान् और रीछ -यूथपति जाम्बवान् — ये इस जैसे सूर्य अस्त हो जानेपर विजयके लिये लक्ष्मणजीका अभिनन्दन करते हुए उनकी ठहरती हैं, उसी प्रकार इन्द्रजित् के धराशायी होनेपर वे राक्षस लगे ॥ ९ ० ॥ वहाँ रुक न सके, सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ८१ ॥ भूरि - भूरि प्रशंसा करने
पृष्ठ 547
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३४२ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे
क्ष्वेडन्तश्च लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः ।
लब्धलक्षा रघुसुतं परिवार्योपतस्थिरे ॥ ९ १ ॥
हर्ष एवं रक्षाका अवसर पाकर वानर किलकिलाते, कूदते और गर्जते हुए वहाँ रघुकुलनन्दन लक्ष्मणको घेरकर खड़े हो गये ॥ ९ १ ॥
लाङ्गूलानि प्रविध्यन्तः स्फोटयन्तश्च वानराः ।
लक्ष्मणो जयतीत्येव वाक्यं विश्रावयंस्तदा ॥ ९ २ ॥
उस समय अपनी पूँछोंको हिलाते और फटकारते हुए वानर वीर ' लक्ष्मणकी जय हो ' यह नारा लगाने लगे ॥९ २ ॥
अन्योन्यं च समाश्लिष्य हरयो हृष्टमानसाः ।
चक्रुरुच्चावचगुणा राघवाश्रयसत्कथाः ॥ ९ ३ ॥
वानरोंका चित्त हर्षसे भरा हुआ था । वे विविध गुणों-वाले वानर एक - दूसरेको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजी से सम्बन्ध रखनेवाली कथाएँ कहने लगे ॥ ९ ३ ॥ तदसुकरमथाभिवीक्ष्य हृष्टाः प्रियसुहृदो युधि लक्ष्मणस्य कर्म । परममुपलभन्मनः प्रहर्ष विनिहतमिन्द्ररिपुं निशम्य देवाः ॥ ९ ४ ॥ युद्धस्थलमें लक्ष्मणके प्रिय सुहृद् वानर उनका वह दुष्कर एवं महान् पराक्रम देख बड़े प्रसन्न हुए । देवता भी उस इन्द्रद्रोही राक्षसका वध हुआ देख मनमें बड़े भारी हर्षका अनुभव करने लगे ॥ ९ ४ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे नवतितमः सर्गः ॥ ९ ० ॥ इस प्रकार श्रीबाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ० ॥ एकनवतितमः सर्गः लक्ष्मण और विभीषण आदिका श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर इन्द्रजित् के वधका समाचार सुनाना, प्रसन्न हुए श्रीरामके द्वारा लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर उनकी प्रशंसा तथा सुषेणद्वारा लक्ष्मण आदिकी चिकित्सा
रुधिरक्लिन्नगात्रस्तु लक्ष्मणः शुभलक्षणः ।
बभूव हृष्टस्तं हत्वा शत्रुजेतारमाहवे ॥ १ ॥
संग्रामभूमिमें शत्रुविजयी इन्द्रजित् का वध करके रक्तसे भीगे हुए शरीरवाले शुभलक्षण लक्ष्मण बहुत प्रसन्न हुए ।
ततः स जाम्बवन्तं च हनूमन्तं च वीर्यवान् ।
संनिपत्य महातेजास्तांश्च सर्वान् वनौकसः ॥ २ ॥
आजगाम ततः शीघ्रं यत्र सुग्रीवराघवौ ।
विभीषणमवष्टभ्य हनूमन्तं च लक्ष्मणः ॥ ३ ॥
बल - विक्रमसे सम्पन्न वे महातेजस्वी सुमित्राकुमार जाम्बवान् और हनुमानजीसे दौड़कर मिले और उन समस्त वानरोंको साथ ले शीघ्रतापूर्वक उस स्थानपर आये, जहाँ वानरराज सुग्रीव और भगवान् श्रीराम विद्यमान थे । उस समय लक्ष्मण विभीषण और हनुमान्जीका सहारा लेकर चल रहे थे ॥ २-३ ॥
ततो राममभिक्रम्य सौमित्रिरभिवाद्य च ।
' तस्थौ भ्रातृसमीपस्थः शक्रस्येन्द्रानुजो यथा ॥ ४ ॥
श्रीरामचन्द्रजी के सामने आकर उनके चरणोंमें प्रणाम करके सुमित्राकुमार अपने उन ज्येष्ठ भ्राताके पास उसी तरह खड़े हो गये, जैसे इन्द्रके पास उपेन्द्र ( वामनरूपधारी श्रीहरि ) खड़े होते हैं ॥ ४ ॥
निष्टनन्निव चागत्य राघवाय महात्मने ।
आचचक्षे तदा वीरो घोरमिन्द्रजितो वधम् ॥ ५ ॥
उस समय वीर विभीषण प्रसन्नतापूर्वक लौटनेके द्वारा ही शत्रुके मारे जाने की बात सूचित - सी करते हुए आये और महात्मा श्रीरघुनाथजीसे बोले – ' प्रभो! इन्द्रजित् के वधका भयंकर कार्य सम्पन्न हो गया ' ॥ ५ ॥
रावणेस्तु शिरश्छिन्नं लक्ष्मणेन महात्मना ।
न्यवेदयत रामाय तदा हृष्टो विभीषणः ॥ ६ ॥
विभीषणने बड़े हर्ष के साथ श्रीरामसे यह निवेदन किया कि महात्मा लक्ष्मणने ही रावणकुमार इन्द्रजितका मस्तक काटा है ॥ ६ ॥
श्रुत्वैव तु महावीर्यो लक्ष्मणेनेन्द्रजिद्वधम् ।
प्रहर्षमतुलं लेभे वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ७ ॥
' लक्ष्मणके द्वारा इन्द्रजित् का वध हुआ है ' यह समाचार सुनते ही महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ और वे इस प्रकार बोले – ॥ ७ ॥
साधु लक्ष्मण तुष्टोऽस्मि कर्म चासुकरं कृतम् ।
रावणेर्हि विनाशेन जितमित्युपधारय ॥ ८ ॥
' शाबाश! लक्ष्मण! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । आज तुमने बड़ा दुष्कर पराक्रम किया । रावणपुत्र इन्द्रजित्के मारे जानेसे तुम यह निश्चित समझ लो कि अब हमलोग युद्ध जीत गये ' ॥ ८ ॥
स तं शिरस्युपाघ्राय लक्ष्मणं कीर्तिवर्धनम् ।
लज्जमानं बलात् स्नेहादङ्कमारोप्य वीर्यवान् ॥ ९ ॥
पृष्ठ 548
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
युद्धकाण्डे एकनवतितमः सर्गः १३४३ परिष्वज्यावपीडितम् । तं पुत्रवधसंतप्तं निर्यान्तं राक्षसाधिपम् । उपवेश्य तमुत्सङ्गे पुनः पुनरुदैक्षत ॥ १० ॥ बलेनावृत्य महता निहनिष्यामि दुर्जयम् ॥ १८ ॥
भ्रातरं लक्ष्मणं स्निग्धं अपनी ‘ पुत्रके वधसे संतप्त होकर निकले हुए उस दुर्जय राक्षस-यशकी वृद्धि करनेवाले लक्ष्मण ( उस समय रावणको मैं अपनी बड़ी भारी सेनाके द्वारा घेरकर मार प्रशंसा सुनकर ) लजा रहे थे; किंतु पराक्रमी श्रीरामने उन्हें राज बलपूर्वक खींचकर गोदमें ले लिया और बड़े स्नेहसे उनका डालूँगा ॥ १८ ॥
आघातसे पीड़ित हुए स्नेही बन्धु त्वया लक्ष्मण नाथेन सीता च पृथिवी च मे ।
मस्तक सूँघा । शस्त्रोंके हते तस्मिञ्शक्रजेतरि चाहवे ॥ १ ९ ॥
लक्ष्मणको गोद में बिठाकर और हृदयसे लगाकर वे बड़े न दुष्प्रापा प्यारसे उनकी ओर बारंबार देखने लगे ॥ ९ -१० ॥
शल्यसम्पीडितं शस्तं निःश्वसन्तं तु लक्ष्मणम् ।
रामस्तु दुःखसंतप्तं तं तु निःश्वासपीडितम् ॥ ११ ॥
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय भूयः संस्पृश्य च त्वरन् ।
उवाच लक्ष्मणं वाक्यमाश्वास्य पुरुषर्षभः ॥ १२ ॥
लक्ष्मण अपने शरीरमें धँसे हुए बाणोंके द्वारा अत्यन्त पीड़ित थे । उनके अङ्गोंमें जगह - जगह घाव हो गया था । वे बारंबार लंबी साँस खींचते थे, आघातजनित क्लेश से संतप्त हो रहे थे तथा उन्हें साँस लेनेमें भी पीड़ा होती थी । उस अवस्थामें पुरुषोत्तम श्रीरामने स्नेहसे उनका मस्तक सूँघकर पीड़ा दूर करनेके लिये पुनः जल्दी - जल्दी उनके शरीरपर हाथ फेरा और आश्वासन देकर लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा- ॥
कृतं परमकल्याणं कर्म दुष्करकर्मणा ।
अद्य मन्ये हते पुत्रे रावणं निहतं युधि ॥ १३ ॥
अद्याहं विजयी शत्रौ हते तस्मिन् दुरात्मनि ।
रावणस्य नृशंसस्य दिष्ट्या वीर त्वया रणे ॥ १४ ॥
छिनो हि दक्षिणो बाहुः स हि तस्य व्यपाश्रयः । ' वीर! तुमने अपने दुष्कर पराक्रमसे परम कल्याणकारी कार्यं सम्पन्न किया है । आज बेटेके मारे जानेपर युद्धस्थलमें रावणको भी मैं मारा गया ही मानता हूँ । उस दुरात्मा शत्रुका वध हो जानेसे आज मैं वास्तवमें विजयी हो गया । सौभाग्यकी बात है कि तुमने रणभूमिमें इन्द्रजित्का वध करके निर्दयी निशाचर रावणकी दाहिनी बाँह ही काट डाली; क्योंकि वही उसका सबसे बड़ा सहारा था ॥ १३-१४३ ॥ कृतं कर्म महद् रणे ॥ १५ ॥
विभीषणहनूमद्भयां
अहोरात्रैस्त्रिभिर्वीरः कथंचिद् विनिपातितः ।
निर्यास्यति हि रावणः ॥ १६ ॥
' लक्ष्मण! इन्द्रजित् इन्द्रको भी जीत चुका था । जब उसे भी तुमने युद्धभूमिमें मार गिराया, तब तुम जैसे रक्षक और सहायक के होते हुए मुझे सीता और भूमण्डलके राज्यको प्राप्त करनेमें कोई कठिनाई नहीं होगी ' ॥ १ ९ ॥
स तं भ्रातरमाश्वास्य परिष्वज्य च राघवः ।
रामः सुषेणं मुदितः समाभाष्येदमब्रवीत् ॥ २० ॥
इस प्रकार भाईको आश्वासन देकर रघुकुलनन्दन श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रसन्नतापूर्वक सुषेणको बुलाकर कहा- ॥ २० ॥
विशल्योऽयं महाप्राज्ञ सौमित्रिर्मित्रवत्सलः ।
यथा भवति सुखस्थस्तथा त्वं समुपाचर ॥ २१ ॥
' परम बुद्धिमान् सुषेण! तुम शीघ्र ही ऐसा उपचार करो जिससे ये मित्रवत्सल सुमित्राकुमार पूर्णतः स्वस्थ हो जायँ और इनके शरीरसे बाण निकलकर घाव भरनेके साथ ही सारी पीड़ा दूर हो जाय ॥ २१ ॥
विशल्यः क्रियतां क्षिप्रं सौमित्रिः सविभीषणः ।
ऋक्षवानरसैन्यानां शूराणां द्रुमयोधिनाम् ॥ २२ ॥
ये चाप्यन्येऽत्र युध्यन्ति सशल्या व्रणिनस्तथा ।
तेऽपि सर्वे प्रयत्नेन क्रियन्ते सुखिनस्त्वया ॥ २३ ॥
' सुमित्राकुमार लक्ष्मण और विभीषण दोनोंके शरीरसे तुम शीघ्र ही बाण निकाल दो और घाव अच्छा कर दो । वृक्षद्वारा युद्ध करनेवाले जो शूरवीर रीछ तथा वानर सैनिक हैं, उनमें भी जो दूसरे दूसरे लोग बाणसे बिंधे हुए और घायल होकर युद्ध कर रहे हैं, उन सभीको तुम प्रयत्न करके सुखी एवं स्वस्थ कर दो ॥ २२-२३ ॥
एवमुक्तः स रामेण महात्मा हरियूथपः ।
लक्ष्मणाय ददौ नस्तः सुषेणः परमौषधम् ॥ २४ ॥
निरमित्रः कृतोऽस्म्यद्य महान् पराक्रम महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वानरयूथपति ' विभीषण और हनुमान्ने भी समरभूमिमें लक्ष्मणकी नाकमें एक बहुत ही उत्तम ओषधि कर दिखाया है । तुम सब लोगोंने मिलकर तीन दिन और सुषेणने तीन रातमें किसी तरह उस वीर राक्षसको मार गिराया तथा मुझे लगा दी ॥ २४ ॥
बना दिया । अब रावण ही युद्धके लिये निकलेगा || स तस्य गन्धमाघ्राय विशल्यः समपद्यत । २५ ॥ शत्रुहीन तदा निर्वेदनश्चैव संरूढवण एव च ॥ बलव्यूहेन महता निर्यास्यति हि रावणः । सुँघते ही लक्ष्मणके शरीरसे बाण निकल बलव्यूहेन महता श्रुत्वा पुत्रं निपातितम् ॥ १७ ॥ उसकी गन्ध
गया सुनकर गये और उनकी सारी पीड़ा दूर हो गयी । उनके शरीरमें ' महान् सैन्य - समुदायसहित पुत्रको मारा ॥ १७ ॥ जितने भी घाव थे, सब भर गये ॥ २५ ॥
रावण विशाल सेना साथ लेकर युद्धके लिये आयेगा
पृष्ठ 549
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३४४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
विभीषणमुखानां च सुहृदां राघवाज्ञया ।
सर्ववानरमुख्यानां चिकित्सामकरोत् तदा ॥ २६ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे सुषेणने विभीषण आदि सुहृदों तथा समस्त वानरशिरोमणियोंकी तत्काल चिकित्सा की ॥ २६ ॥
ततः प्रकृतिमापन्नो इतशल्यो गतक्लमः ।
सौमित्रिर्मुमुदे तत्र क्षणेन विगतज्वरः ॥ २७ ॥
फिर तो क्षणभरमें बाण निकल जाने और पीड़ा दूर हो जानेसे सुमित्राकुमार स्वस्थ एवं नीरोग हो हर्षका अनुभव करने लगे ॥ २७ ॥
तदैव रामः प्लवगाधिपस्तथा विभीषणश्चर्क्षपतिश्च वीर्यवान् । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अवेक्ष्य सौमित्रिमरोगमुत्थितं मुदा ससैन्याः सुचिरं जहर्षिरे ॥ २८ ॥
उस समय भगवान् श्रीराम, वानरराज सुग्रीव, विभीषण तथा पराक्रमी ऋक्षराज जाम्बवान् लक्ष्मणको निरोग होकर खड़ा हुआ देख सेनासहित बड़े प्रसन्न हुए ॥ २८ ॥
अपूजयत् कर्म स लक्ष्मणस्य सुदुष्करं दाशरथिर्महात्मा । बभूव हृष्टो युधि वानरेन्द्र निशम्य तं शक्रजितं निपातितम् ॥ २ ९ ॥ दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामने लक्ष्मण के उस अत्यन्त दुष्कर पराक्रमकी पुनः भूरि - भूरि प्रशंसा की । इन्द्रजित् युद्धमें मार गिराया गया, यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको भी बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २ ९ ॥ युद्धकाण्डे एकनवतितमः सर्गः ॥ ९ १ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आरामायण आदिकान्यके युद्धकाण्ड में इक्यानवेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ १ ॥ द्विनवतितमः सर्गः रावणका शोक तथा सुपार्श्व के समझाने से उसका सीता - वधसे निवृत्त होना
ततः पौलस्त्य सचिवाः श्रुत्वा चेन्द्रजितो वधम् ।
आचचक्षुरभिज्ञाय दशग्रीवाय सत्वराः ॥ १ ॥
रावणके मन्त्रियोंने जब इन्द्रजित् के वधका समाचार सुना, तब उन्होंने स्वयं भी प्रत्यक्ष देखकर इसका निश्चय कर लेनेके बाद तुरंत जाकर दशमुख रावणसे सारा हाल कह सुनाया ॥
युद्धे हतो महाराज लक्ष्मणेन तवात्मजः ।
विभीषण सहायेन मिषतां नो महाद्युतिः ॥ २ ॥
वे बोले – “ महाराज! युद्धमें विभीषणकी सहायता पाकर लक्ष्मणने आपके महातेजस्वी पुत्रको हमारे सैनिकोंके देखते-देखते मार डाला ॥ २ ॥
शूरः शूरेण संगम्य संयुगेष्वपराजितः ।
लक्ष्मणेन हतः शूरः पुत्रस्ते विबुधेन्द्रजित् ॥ ३ ॥
गतः स परमाँल्लोकाञ्शरैः संतर्प्य लक्ष्मणम् । ' जिसने देवताओंके राजा इन्द्रको भी परास्त किया था और पहले के युद्धोंमें जिसकी कभी पराजय नहीं हुई थी, वही आपका शूरवीर पुत्र इन्द्रजित् शौर्य सम्पन्न लक्ष्मणके साथ भिड़कर उनके द्वारा मारा गया । वह अपने बाणोंद्वारा लक्ष्मणको पूर्णतः तृप्त करके उत्तम लोकोंमें गया ' ॥ ३३ ॥
स तं प्रतिभयं श्रुत्वा वधं पुत्रस्य दारुणम् ॥ ४ ॥
घरमिन्द्रजितः संख्ये कश्मलं प्राविशन्महत् । युद्धमें अपने पुत्र इन्द्रजित् के भयानक वधका घोर एवं दारुण समाचार सुननेपर रावणको बड़ी भारी मूर्च्छाने धर दबाया ॥ ४३ ॥
उपलभ्य चिरात् संज्ञां राजा राक्षसपुंगवः ॥ ५ ॥
पुत्रशोकाकुलो दीनो विललापाकुलेन्द्रियः । फिर दीर्घकाल के बाद होशमें आकर राक्षसप्रबर राजा रावण पुत्रशोकसे व्याकुल हो गया । उसकी सारी इन्द्रियाँ
अकुला उठीं और वह दीनतापूर्वक विलाप करने लगा ।
हा राक्षसचमूमुख्य मम वत्स महाबल ॥ ६ ॥
जित्वेन्द्रं कथमद्य त्वं लक्ष्मणस्य वशं गतः । ' हा पुत्र! हा राक्षस - सेनाके महाबली कर्णधार! तुम तो पहले इन्द्रपर भी विजय पा चुके थे; फिर आज लक्ष्मणके वशमें कैसे पड़ गये? ॥ ६३ ॥
ननु त्वमिषुभिः क्रुद्धो भिन्द्याः कालान्तकावपि ॥ ७ ॥
मन्दरस्यापि शृङ्गाणि किं पुनर्लक्ष्मणं युधि । " बेटा! तुम तो कुपित होनेपर अन्तकको भी विदीर्ण कर सकते थे, भी तोड़ - फोड़ सकते थे; फिर युद्धमें तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात थी? ॥ अद्य वैवस्वतो राजा भूयो येनाद्य त्वं महाबाहो संयुक्तः ' महाबाहो! आज सूर्यके पुत्र अपने बाणसे काल और मन्दराचलके शिखरोंको लक्ष्मणको मार गिराना ७३ ॥ बहुमतो मम ८ ॥ कालधर्मणा । प्रेतराज यमका महत्त्व मुझे अधिक जान पड़ने लगा है, जिन्होंने तुम्हें भी कालधर्मसे संयुक्त कर दिया ॥ ८३ ॥
एष पन्थाः सुयोधानां सर्वामरगणेष्वपि ।
यः कृते हन्यते भर्तुः स पुमान् स्वर्गमृच्छति ॥ ९ ॥
पृष्ठ 550
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सर्गः १३४५ मुखकाण्डे द्विमवतितमः चिन्ताओंने उसे उत्तेजित कर दिया -- जलते हुएको और ‘ समस्त देवताओंमें भी अच्छे योद्धाओंका यही मार्ग है । जो अपने स्वामी के लिये युद्धमें सारा जाता है, वह पुरुष स्वर्गलोक में जाता है ॥ ९ ॥
अद्य देवगणाः सर्वे लोकपाला महर्षयः ।
हतमिन्द्रजितं श्रुत्वा सुखं स्वप्स्यन्ति निर्भयाः ॥ १० ॥
' आज समस्त देवता, लोकपाल तथा महर्षि इन्द्रजित् का मारा जाना सुनकर निडर हो सुखकी नींद सो सकेंगे ॥ १० ॥
अद्य लोकास्त्रयः कृत्स्ना पृथिवी च सकानना ।
हीना शून्येव प्रतिभाति मे ॥ ११ ॥
एकेनेन्द्रजिता ' आज तीनों लोक और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी भी अकेले इन्द्रजितके न होनेसे मुझे सूनी - सी दिखायी देती है ।
अद्य नैर्ऋतकन्यानां श्रोष्याम्यन्तःपुरे रवम् ।
करेणुसङ्घस्य यथा निनादं गिरिगह्वरे ॥ १२ ॥
‘ जैसे गजराजकेमारे जानेपर पर्वतकी कन्दरा में हथिनियोंका आर्तनाद सुनायी पड़ता है, उसी प्रकार आज अन्तःपुरमें मुझे राक्षस- कन्याओंका करुण क्रन्दन सुनना पड़ेगा ॥ १२ ॥
यौवराज्यं च लङ्कां च रक्षांसि च परंतप ।
मातरं मां च भार्याश्च क्व गतोऽसि विहाय नः ॥ १३ ॥
‘ शत्रुओंको संताप देनेवाले पुत्र! आज अपने युवराज-पदको, लङ्कापुरीको, समस्त राक्षसोंको, अपनी माँको, मुझको और अपनी पत्नियोंको— हम सब लोगोंको छोड़कर तुम कहाँ चले गये १ ॥ १३ ॥
मम नाम त्वया वीर गतस्य यमसादनम् ।
प्रेतकार्याणि कार्याणि विपरीते हि वर्तसे ॥ १४ ॥
' वीर! होना तो यह चाहिये था कि मैं पहले यमलोक में जाता और तुम यहाँ रहकर मेरे प्रेतकार्य करते; परंतु तुम भी जला दिया । जैसे सूर्यको किरणें ग्रीष्म ऋतुमें उसे अधिक प्रचण्ड बना देती हैं ॥ १७ ॥
भ्रुकुटीभिश्च संगताभिर्व्यरोचत ।
ललाटे सह नकैस्तु महोर्मिभिरिवोदधिः ॥ १८ ॥
युगान्ते ललाटमें टेढ़ी भौंहोंके कारण वह उसी तरह शोभा पाता था, जैसे प्रलयकाल में मगरों और बड़ी - बड़ी लहरोंसे महा-सागर सुशोभित होता है ॥ १८ ॥
कोपाद् विजृम्भमाणस्य वक्त्राद् व्यक्तमिव ज्वलन् ।
वदनादिव ॥ १ ९ ॥
उत्पपात सधूमाग्निर्वृत्रस्य वृत्रासुरके मुखसे · धूमसहित अग्नि प्रकट हुई थी, जैसे रोषसे जँभाई लेते हुए रावण के मुखसे प्रकटरूपमें उसी तरह निकलने लगी ॥ १ ९ ॥ धूमयुक्त प्रज्वलित अग्निशूरः क्रोधवशं गतः । स समीक्ष्य पुत्रवधसंतप्तः रावणो बुद्धया वैदेह्या रोचयद् वधम् ॥ २० ॥
अपने पुत्रके वध से संतप्त हुआ शूरवीर रावण सहसा हो गया । उसने बुद्धिसे सोच - विचार कर क्रोधके वशीभूत मार डालना ही अच्छा समझा ॥ २० ॥
विदेहकुमारी सीताको
प्रकृत्या रक्ते च रक्ते क्रोधाग्निनापि च ।
तस्य दीप्ते नेत्रे बभूवतुः ॥ २१ ॥
रावणस्य महाघोरे रावणकी आँखें एक तो स्वभावसे ही लाल थीं । दूसरे क्रोधाग्निने उन्हें और भी रक्तवर्णकी बना दिया था । अतः उसके वे दीप्तिमान् नेत्र महान् घोर प्रतीत होते थे ॥ २१ ॥
घोरं प्रकृत्या रूपं तत् तस्य क्रोधाग्निमूच्छितम् ।
रूपं क्रुद्धस्य रुद्रस्येव दुरासदम् ॥ २२ ॥
वभूव रावणका रूप स्वभावसे ही भयंकर था । उसपर क्रोधाग्नि-और भी भयानक हो चला और विपरीत अवस्थामें स्थित हो गये ( तुम परलोकवासी हुए का प्रभाव पड़ने से वह प्रतीत होने लगा || २२ || और मुझे तुम्हारा प्रेतकार्यं करना पड़ेगा ) ॥ १४ ॥ कुपित हुए रुद्रके समान दुर्जय ।
स त्वं जीवति सुग्रीवे लक्ष्मणे च सराघवे । तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां सार्चिषः प्रापतन्नश्रुविन्दवः स्नेहबिन्दवः ॥ २३ ॥
व गतोऽसि विहाय नः ॥ १५ ॥ दीपाभ्यामिव दीप्ताभ्यां बूँदें
मम शल्यमनुद्धृत्य जीवित हैं; ऐसी क्रोधसे भरे हुए उस निशाचरके नेत्रोंसे आँसुओंकी ' हाय! राम, लक्ष्मण और सुग्रीव अभी गिरने लगीं, मानो जलते हुए दीपकोंसे लौके साथ ही तेलकै अबस्थामें मेरे हृदयका काँटा निकाले बिना ही तुम हमें छोड़ बिंदु झड़ रहे हों ॥। २३ ॥
कर कहाँ चले गये ११ ॥ १५ ॥ श्रूयते दशनस्वनः ।
एवमादिविलापात रावणं राक्षसाधिपम् । दन्तान् विदशतस्तस्य दानवैरिव ॥ २४ ॥
आविवेश महान कोपः पुत्रव्यसनसम्भवः ॥ १६ ॥ यन्त्रस्याकृष्यमाणस्य मथ्नतो उसके दाँतोंके
वह दाँत पीसने लगा । उस समय इस प्रकार आर्तभावसे विलाप करते हुए राक्षसराज जो शब्द सुनायी देता था, वह समुद्र - मन्थनके रावणके हृदयमें अपने पुत्रके वधका स्मरण करके महान् कटकटानेका हुए मन्थन यन्त्रस्वरूप मन्दरा-समय दानवोंद्वारा खींचे जाते क्रोधका आवेश हुआ ॥ १६ ॥ चलकी ध्वनिके समान जान पड़ता था ॥ २४ ॥
प्रकृत्या कोपनं ह्येनं पुत्रस्य पुनराधयः ॥ दीप्तं संदीपयामासुर्धर्मेऽर्कमिव रश्मयः ॥ १७ ॥ कालाग्निरिव संक्रुद्धो यां दिशमवैक्षत
तस्यां तस्यां भयत्रस्ता राक्षसाः संविलिल्यिरे ॥ २५ ॥
एक तो वह स्वभावसे ही क्रोधी था । दूसरे पुत्रकी वा ० रा ० ५. १०.७-