Ramayana 2 — पृष्ठ 561–570

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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१३५६ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे लगाये श्रीरघुनाथजीके साथ युद्ध करनेके लिये आ रहा है; इस प्रकारकी कलह - ध्वनि कानोंमें पड़ रही थी ॥ ३६ ॥

तेन नादेन महता पृथिवी समकम्पत ।

तं शब्दं सहसा श्रुत्वा वानरा दुद्रुवुर्भयात् ॥ ३७ ॥

उस महानादसे पृथ्वी काँप उठी । उस भयानक शब्दको सुनकर सब बानर सहसा भयसे भाग चले ॥ ३७ ॥

रावणस्तु महाबाहुः सचिवैः परिवारितः ।

आजगाम महातेजा जयाय विजयं प्रति ॥ ३८ ॥

मन्त्रियोंसे घिरा हुआ महातेजस्वी महाबाहु रावण युद्ध में विजयकी प्राप्तिका उद्देश्य लेकर वहाँ आया ॥ ३८ ॥

रावणेनाभ्यनुज्ञा महापार्श्वमहोदरौ ।

विरूपाक्षश्च दुर्धर्षो रथानारुरुदुस्तदा ॥ ३ ९ ॥

रावणकी आज्ञा पाकर उस समय महापार्श्व, महोदर तथा दुर्जय वीर विरूपाक्ष -- तीनों ही रथोंपर आरूढ़ हुए ॥ ३ ९ ॥

ते तु हृष्टाभिनर्दन्तो भिन्दन्त इव मेदिनीम् ।

नादं घोरं विमुञ्चन्तो निर्ययुर्जयकाङ्क्षिणः ॥ ४० ॥

वे हर्षपूर्वक जोर - जोर से इस तरह दहाड़ रहे थे, मानो पृथिवीको विदीर्ण कर डालेंगे । वे विजयकी इच्छा मन में लिये घोर सिंहनाद करते हुए पुरीसे बाहर निकले ॥ ४० ॥

ततो युद्धाय तेजस्वी रक्षोगणबलैर्वृतः ।

निर्ययाबुद्यतधनुः कालान्तकयमोपमः ॥ ४१ ॥

तदनन्तर काल, मृत्यु और यमराजके समान भयंकर तेजस्वी रावण धनुष हाथमें ले राक्षसों की सेनासे घिरकर युद्धके लिये आगे बढ़ा ॥ ४१ ॥

ततः प्रजविताश्वेन रथेन स महारथः ।

द्वारेण निर्ययौ तेन यत्र तौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४२ ॥

उसके रथके घोड़े बहुत तेज चलनेवाले थे । उसके द्वारा वह महारथी वीर लङ्काके उसी द्वारसे बाहर निकला, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण मौजूद थे ॥ ४२ ॥

ततो नष्टप्रभः सूर्यो दिशश्च तिमिरावृताः ।

द्विजाश्च नेदुर्घोराश्च संचचाल च मेदिनी ॥ ४३ ॥

उस समय सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गयी । समस्त दिशाओं-में अन्धकार छा गया, भयंकर पक्षी अशुभ बोली बोलने लगे और धरती डोलने लगी ॥ ४३ ॥

ववर्ष रुधिरं देवश्वस्खलुश्च तुरंगमाः ।

ध्वजाग्रे न्यपतद् गृध्रो विनेदुश्चाशिवं शिवाः ॥ ४४ ॥

बादल रक्तकी वर्षा करने लगे । घोड़े लड़खड़ाकर गिर पड़े । ध्वजके अग्रभागपर गीध आकर बैठ गया और गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं ॥ ४४ ॥

नयनं चास्फुरद् वामं वामो बाहुरकम्पत ।

विवर्णवदनश्चासीत् किंचिदभ्रश्यत स्वनः ॥ ४५ ॥

बाँयीं आँख फड़कने लगी । बाँयीं भुजा सहसा काँप उठी । उसके चेहरेका रंग फीका पड़ गया और आवाज कुछ बदल गयी ॥ ४५ ॥

ततो निष्पततो युद्धे दशग्रीवस्य रक्षसः ।

रणे निधनशंसीनि रूपाण्येतानि जज्ञिरे ॥ ४६ ॥

राक्षस दशग्रीव ज्यों ही युद्धके लिये निकला, त्यों ही रणभूमिमें उसकी मृत्युके सूचक लक्षण प्रकट होने लगे ॥ ४६ ॥

अन्तरिक्षात् पपातोल्का निर्घातसमनिःस्वना ।

विनेदुरशिवा गृधा वायसैरभिमिश्रिताः ॥ ४७ ॥

आकाशसे उल्कापात हुआ । उससे वज्रपातके समान गड़गड़ाहट पैदा हुई । अमङ्गलसूचक पक्षी गीध कौओंसे मिलकर अशुभ बोली बोलने लगे ॥ ४७ ॥

एतानचिन्तयन् घोरानुत्पातान् समवस्थितान् ।

निर्ययौ रावणो मोहाद् वधार्थ कालचोदितः ॥ ४८ ॥

इन भयंकर उत्पातोंको सामने उपस्थित देखकर भी रावणने उनकी कोई परवा नहीं की । वह कालसे प्रेरित हो मोहवश अपने ही वधके लिये निकल पड़ा ॥ ४८ ॥

तेषां तु रथघोषेण राक्षसानां महात्मनाम् ।

वानराणामपि चमूर्युद्धायैवाभ्यवर्तत ॥ ४ ९ ॥

उन महाकाय राक्षसोंके रथका गम्भीर घोष सुनकर वानरोंकी सेना भी युद्धके लिये ही उनके सामने आकर डट गयी ॥ ४ ९ ॥

तेषां तु तुमुलं युद्धं बभूव कपिरक्षसाम् ।

अन्योन्यमाह्वयानानां क्रुद्धानां जयमिच्छताम् ॥ ५० ॥

फिर तो अपनी - अपनी जीत चाहते हुए रोषपूर्वक एक-दूसरेको ललकारनेवाले वानरों और राक्षसोंमें तुमुल युद्ध छिड़ गया ॥ ५० ॥

ततः क्रुद्धो दशग्रीवः शरैः काञ्चनभूषणैः ।

वानराणामनीकेषु चकार कदनं महत् ॥ ५१ ॥

उस समय दशमुख रावण अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा वानरोंकी सेनाओं में रोषपूर्वक बड़ी भारी मार - काट मचाने लगा ॥ ५१ ॥

निकृत्तशिरसः केचिद् रावणेन वलीमुखाः ।

केचिद् विच्छिन्नहृदयाः केचिच्छ्रोत्रविवर्जिताः ॥ ५२ ॥

रावणने कितने ही वानरोंके सिर काट लिये, कितनोंकी छाती छेद डाली और बहुतोंके कान उड़ा दिये ॥ ५२ ॥

निरुच्छ्वासा हताः केचित् केचित् पार्श्वेषु दारिताः ।

केचिद् विभिन्नशिरसः केचिच्चक्षुर्विनाकृताः ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 562

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` युद्धकाण्डे षण्णवतितमः सर्गः १३५७ कितनोंने घायल होकर प्राण त्याग दिये । रावणने कितने ततस्ततस्तस्य शरप्रवेगं ही वानरोंकी पसलियाँ फाड़ डालीं, कितनोंके मस्तक कुचल सोढुं न शेकुर्हरियूथपास्ते ॥ ५४ ॥

डाले और कितनों की आँखें चौपट कर दीं ॥ ५३ ॥ दशमुख रावणके नेत्र क्रोधसे घूम रहे थे । वह अपने

दशाननः क्रोधविवृत्तनेत्रो रथके द्वारा युद्धस्थलमें जहाँ - जहाँ गया, वहाँ - वहाँ वे वानर-यतो यतोऽभ्येति रथेन संख्ये । यूथपति उसके बाणोंका वेग न सह सके || ५४ || इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्गः ॥ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्री वाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकान्यके युद्धकाण्डमें पश्चानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ५ ॥ षण्णवतितमः सर्गः सुग्रीवद्वारा राक्षससेनाका

तथा तैः कृत्तगात्रैस्तु दशग्रीवेण मार्गणैः ।

बभूव वसुधा तत्र प्रकीर्णा हरिभिस्तदा ॥ १ ॥

इस प्रकार जब रावणने अपने बाणोंसे वानरोंके अङ्ग भङ्ग कर डाले, तब वहाँ धराशायी हुए वानरोंसे वह सारी रणभूमि पट गयी ॥ १ ॥

रावणस्याप्रसां तं शरसम्पातमेकतः ।

न शेकुः सहितुं दीप्तं पतङ्गा ज्वलनं यथा ॥ २ ॥

रावणके उस असह्य बाणप्रहारको वे वानर एक क्षण भी नहीं सह सके; ठीक वैसे ही, जैसे पतंग जलती आगका स्पर्शं क्षणभर भी नहीं सह सकते हैं ॥ २ ॥

तेऽर्दिता निशितैर्बाणैः क्रोशन्तो विप्रदुद्रुवुः ।

पावकार्चिः समाविष्टा दह्यमाना यथा गजाः ॥ ३ ॥

राक्षसराजके तीखे बाणोंकी मारसे पीड़ित हो वे वानर उसी तरह चीखते - चिल्लाते हुए भागे, जैसे दावानलकी ज्वालाओंसे घिरकर जलते हुए हाथी चीत्कार करते हुए भागते हैं ॥ ३ ॥

लवंगानामनीकानि महाभ्राणीव मारुतः ।

संययौ समरे तस्मिन् विधमन् रावणः शरैः ॥ ४ ॥

जैसे हवा बड़े - बड़े बादलोंको छिन्न - भिन्न कर देती है, उसी प्रकार रावण अपने बाणोंसे वानरसेनाओं का संहार करता हुआ समराङ्गणमें विचरने लगा ॥ ४ ॥

कदनं तरसा कृत्वा राक्षसेन्द्रो वनौकसाम् ।

आससाद ततो युद्धे त्वरितं राघवं रणे ॥ ५ ॥

बड़े वेग से वानरोंका संहार करके वह राक्षसराज समराङ्गणमें जूझने के लिये तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजीके पास जा पहुँचा ॥ ५ ॥

सुग्रीवस्तान कपीन् दृष्ट्वा भग्नान् विद्रावितान् रणे ।

गुल्मे सुषेणं निक्षिप्य चक्रे युद्धे द्रुतं मनः ॥ ६ ॥

उधर सुग्रीवने देखा, वानरसैनिक रावणसे खदेड़े जाकर समरभूमिसे भाग रहे हैं, तब उन्होंने सेनाको स्थिर रखनेका संहार और विरूपाक्षका वध भार सुषेणको सौंपकर स्वयं शीघ्र ही युद्ध करनेका विचार किया ॥ ६ ॥

आत्मनः सदृशं वीरं स तं निक्षिप्य वानरम् ।

सुग्रीवोऽभिमुखं शत्रुं प्रतस्थे पादपायुधः ॥ ७ ॥

सुषेण को अपने ही समान पराक्रमी वीर समझकर उन्होंने सेनाकी रक्षाका कार्य सौंपा और स्वयं वृक्ष लेकर शत्रुके सामने प्रस्थान किया ॥ ७ ॥

पार्श्वतः पृष्ठतश्चास्य सर्वे वानरयूथपाः ।

अनुजग्मुर्महाशैलान् विविधांश्च वनस्पतीन् ॥ ८ ॥

उनके अगल - बगलमें और पीछे समस्त वानरयूथपति बड़े-बड़े पत्थर और नाना प्रकारके वृक्ष लेकर चले ॥ ८ ॥

ननर्द युधि सुग्रीवः स्वरेण महता महान् ।

पोथयन् विविधांश्चान्यान् ममन्थोत्तमराक्षसान् ॥ ९ ॥

ममर्द च महाकायो राक्षसान् वानरेश्वरः ।

युगान्तसमये वायुः प्रवृद्धानगमानिव ॥ १० ॥

उस समय सुग्रीवने युद्धमें उच्चस्वरसे गर्जना की और प्रलयकालमें बड़े - बड़े वृक्षोंको उखाड़ फेंकनेवाले वायुदेवकी भाँति उन विशालकाय वानरराजने विभिन्न प्रकारकी आकृति -वाले बड़े - बड़े राक्षसोंको गिरा - गिराकर मथ एवं कुचल डाला ॥ ९ -१० ॥

राक्षसानामनीकेषु शैलवर्ष ववर्ष ह ।

अश्मवर्षे यथा मेघः पक्षिसङ्गेषु कानने ॥ ११ ॥

जैसे बादल वनमें पक्षियोंके समुदायपर ओले बरसाता है, उसी प्रकार सुग्रीव राक्षसोंकी सेनाओंपर बड़े - बड़े पत्थरोंकी वर्षा करने लगे ॥ ११ ॥

कपिराजविमुक्तैस्तैः शैलवर्षैस्तु राक्षसाः ।

विकीर्णशिरसः पेतुर्विकीर्णा इव पर्वताः ॥ १२ ॥

वानरराजके चलाये हुए शैलखण्डोंकी वर्षासे राक्षसोंके मस्तक कुचल जाते और बे ढहे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हो जाते थे ॥ १२ ॥

पृष्ठ 563

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१३५८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

अथ संक्षीयमाणेषु राक्षसेषु समन्ततः ।

सुग्रीवेण प्रभग्नेषु नदत्सु च पतत्सु च ॥ १३ ॥

विरूपाक्षः स्वकं नाम धन्वी विश्राव्य राक्षसः ।

रथादाप्लुत्य दुर्धर्षो गजस्कन्धमुपारुहत् ॥ १४ ॥

इस प्रकार सुग्रीबकी मारसे जब सब ओर राक्षसों का विनाश होने लगा तथा वे भागने और आर्तनाद करते हुए पृथ्वीपर गिरने लगे, तब विरूपाक्ष नामक दुर्जय राक्षस हाथमें नुष ले अपना नाम घोषित करता हुआ रथसे कूद पड़ा और हाथीकी पीठपर जा चढ़ा ॥ १३-१४ ॥

सतं द्विपमथारुह्य विरूपाक्षो महाबलः ।

ननद भीमनिर्ह्रादं बानरानभ्यधावत ॥ १५ ॥

उस हाथीपर चढ़कर मद्दाबली विरूपाक्षने बड़ी भयानक आवाज में गर्जना की और वानरोंपर वेगपूर्वक धावा किया ॥

सुग्रीवे स शरान् घोरान् विससर्ज चमूमुखे ।

स्थापयामास चोद्विग्नान् राक्षसान् सम्प्रहर्षयन् ॥ १६ ॥

उसने सेनाके मुहाने पर सुग्रीवको लक्ष्य करके बड़े भयंकर बाण छोड़े और डटे हुए राक्षसोंका हर्ष बढ़ाकर उन्हें स्थिरता पूर्वक स्थापित किया ॥ १६ ॥

सोऽतिविद्धः शितैर्बाणैः कपीन्द्रस्तेन रक्षसा ।

चुक्रोश च महाक्रोधो बधे चास्य मनो दधे ॥ १७ ॥

उस राक्षसके पैने बाणोंसे अत्यन्त घायल हुए वानरराज सुग्रीवने महान् क्रोधसे भरकर भीषण गर्जना की और विरूपाक्ष को मार डालने का विचार किया ॥ १७ ॥

ततः पादपमुद्धृत्य शूरः सम्प्रधनो हरिः ।

अभिपत्य जघानास्य प्रमुखे तं महागजम् ॥ १८ ॥

शूरवीर तो वे थे ही, सुन्दर ढंगसे ' युद्ध करना भी जा थे; अतः एक वृक्ष उखाड़कर आगे बढ़े और अपने सामने खड़े हुए उसके विशाल हाथीपर उन्होंने उस वृक्षको दे मारा ॥ १८ ॥

स तु प्रहाराभिहतः सुग्रीवेण महागजः ।

अपासर्पद् धनुर्मात्रं निषसाद ननाद च ॥ १ ९ ॥

सुग्रीवके प्रहारसे घायल हो वह महान् गजराज एक धनुष पीछे हटकर बैठ गया और पीड़ासे आर्तनाद करने लगा ॥ १ ९ ॥

गजात् तु मथितात् तूर्णमपक्रम्य स वीर्यवान् ।

राक्षसोऽभिमुखः शत्रुं प्रत्युद्गम्य ततः कपिम् ॥ २० ॥

आर्षभं चर्म खङ्गं च प्रगृह्य लघुविक्रमः ।

भर्त्सयन्निव सुग्रीवमाससाद व्यवस्थितम् ॥ २१ ॥

पराक्रमी राक्षस विरूपाक्ष उस घायल हाथीकी पीठसे तुरंत कूद पड़ा और ढाल - तलवार ले शीघ्रतापूर्वक अपने शत्रु सुग्रीवकी ओर बढ़ा । सुग्रीव एक स्थानपर स्थिरतापूर्वक खड़े थे । वह उन्हें फटकारता हुआ - सा उनके पास जा पहुँचा ॥ २०-२१ ॥

सहि तस्याभिसंक्रुद्धः प्रगृह्य विपुलां शिलाम् ।

विरूपाक्षस्य चिक्षेप सुग्रीवो जलदोपमाम् ॥ २२ ॥

यह देख सुग्रीवने एक बहुत बड़ी शिला हाथमें ली, जो मेघ के समान काली थी । उसे उन्होंने विरूपाक्षके शरीरपर क्रोधपूर्वक दे मारा ॥ २२ ॥

सतां शिलामापतन्तीं दृष्टा राक्षसपुंगवः ।

अपक्रम्य सुविक्रान्तः खड्गेन प्राहरत् तदा ॥ २३ ॥

उस शिलाको अपने ऊपर आती देख उस परम पराक्रमी राक्षसशिरोमणि विरूपाक्षने पीछे हटकर आत्मरक्षा की और सुग्रीवपर तलवार चलायी ॥ २३ ॥

तेन खड्गप्रहारेण रक्षसा बलिना हतः ।

मुहूर्तमभवद् भूमौ विसंज्ञ इव वानरः ॥ २४ ॥

उस बलवान् निशाचरकी तलवारसे घायल होकर वानर-राज सुग्रीव मूच्छित होकर थोड़ी देर धरतीपर पड़े रहे || २४ ||

सहसा स तदोत्पत्य राक्षसस्य महाहवे ।

मुष्टिं संवर्त्य वेगेन पातयामास वक्षसि ॥ २५ ॥

फिर सहसा उछलकर उन्होंने उस महासमर में मुट्ठी बाँध-कर विरूपाक्षकी छातीपर बेगपूर्वक एक मुक्का मारा ॥ २५ ॥

मुष्टिप्रहाराभिहतो विरूपाक्षो निशाचरः ।

तेन खङ्गेन संक्रुद्धः सुग्रीवस्य चमूमुखे ॥ २६ ॥

कवचं पातयामास पद्भ्यामभिहतोऽपतत् । उनके मुक्के की चोट खाकर निशाचर विरूपाक्षका क्रोध और बढ़ गया और उसने सेनाके मुहानेपर उसी तलवारसे सुग्रीव कवचको काट गिराया; साथ ही उसके पैरोंका आघात पाकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २६३ ॥

स समुत्थाय पतितः कपिस्तस्य व्यसर्जयत् ॥ २७ ॥

तल प्रहार मशनेः समानं भीमनिःस्वनम् । गिरे हुए सुग्रीव पुनः उठकर खड़े हो गये और उन्होंने उस राक्षसको वज्र के समान भीषण शब्द करनेवाले थप्पड़ से मारा ॥ २७३ ॥

तलप्रहारं तद् रक्षः सुग्रीवेण समुद्यतम् ॥ २८ ॥

नैपुण्यान्मोचयित्वैनं मुष्टिनोरसि ताडयत् । सुग्रीवके चलाये हुए उस थप्पड़का वार वह राक्षस अपने युद्धकौशलसे बचा गया और उसने सुग्रीव की छातीपर एक घूसा मारा ॥ २८३ ॥

ततस्तु संक्रुद्धतरः सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ २ ९ ॥

मोक्षितं चात्मनो दृष्ट्वा प्रहारं तेन रक्षसा ।

स ददर्शान्तरं तस्य विरूपाक्षस्य वानरः ॥ ३० ॥

अब तो वानरराज सुग्रीव के क्रोधकी सीमा न रही । उन्होंने देखा कि राक्षसने मेरे प्रहारको व्यर्थ कर दिया और

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युद्धकाण्डे सप्तनवतितमः सर्गः १३५ ९ अपने ऊपर उसका स्पर्श नहीं होने दिया । तब वे विरूपाक्षपर प्रहार करनेका अवसर देखने लगे ॥ २ ९ -३० ॥

ततोऽन्यं पातयत् क्रोधाच्छङ्घदेशे महातलम् ।

महेन्द्राशनिकल्पेन तलेनाभिहतः क्षितौ ॥ ३१ ॥

पपात रुधिरक्लिन्नः शोणितं स्रोतोभ्यस्तु विरूपाक्षो जलं तदनन्तर सुग्रीवने विरूपाक्षके महान् थप्पड़ मारा, जिसका स्पर्श था । उससे आहत होकर विरूपाक्ष सारा शरीर खूनसे भीग गया और उसी प्रकार रक्त वमन करने लगा रहा हो ॥ ३१-३२ ॥

हि समुद्गिरन् ।

प्रस्रवणादिव ॥ ३२ ॥

ललाटपर क्रोधपूर्वक दूसरा इन्द्रके वज्रके समान दुःसह पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसका वह समस्त इन्द्रिय- गोलकोंसे , जैसे झरनेसे जल गिर

विवृत्तनयनं क्रोधात् सफेनं रुधिराप्लुतम् ।

ददृशुस्ते विरूपाक्षं विरूपाक्षतरं कृतम् ॥ ३३ ॥

स्फुरन्तं परिवर्तन्तं पार्श्वेन रुधिरोक्षितम् ।

करुणं च विनर्दन्तं ददृशुः कपयो रिपुम् ॥ ३४ ॥

उस राक्षसकी आँखें क्रोधसे घूम रही थीं । वह फेनयुक्त रुधिरमें डूबा हुआ था । वानरोंने देखा, विरूपाक्ष अत्यन्त विरूपाक्ष ( कुरूप नेत्रवाला और भयंकर ) हो गया है । खून-से लथपथ हो छटपटाता करवटें बदलता तथा करुणाजनक आर्तनाद करता है ॥ ३३-३४ ॥ तथा तु तौ संयति सम्प्रयुक्तौ तरखिनौ वानरराक्षसानाम् । बलार्णवौ सखनतुश्च भीमौ महार्णवौ द्वाविव भिन्नसेत् ॥ ३५ ॥

इस प्रकार वे दोनों वेगशाली वानरों और राक्षसोंके सैन्य-समुद्र मर्यादा तोड़कर बहनेवाले दो भयानक महासागरोंके समान परस्पर संयुक्त हो युद्धभूमिमें महान् कोलाहल करने लगे ॥ ३५ ॥

विनाशितं प्रेक्ष्य विरूपनेत्रं

महाबलं तं हरिपार्थिवेन ।

बलं समेतं कपिराक्षसाना-मुद्वृत्तगङ्गाप्रतिमं बभूव ॥ ३६ ॥

वानरराज सुग्रीवके द्वारा महाबली विरूपाक्षका वध हुआ देख वानरों और राक्षसोंकी सेनाएँ एकत्र हो बढ़ी हुई गङ्गा समान उद्वेलित हो गयीं ( एक ओर आनन्दजनित कोलाहल था तो दूसरी ओर शोकके कारण आर्तनाद हो रहा था ) ॥३६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकान्ये युद्धकाण्डे षण्णवतितमः सर्गः ॥ ९ ६ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकान्यके युद्धकाण्डमें छानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ६ ॥ सप्तनवतितमः सर्गः सुग्रीव के साथ महोदरका घोर युद्ध तथा वध

हन्यमाने बले तूर्णमन्योन्यं ते महामृधे ।

सरसीव महाघमै सूपक्षीणे बभूवतुः ॥ १ ॥

उस महासमरमें वे दोनों ओरकी सेनाएँ परस्परकी मार-काटसे प्रचण्ड ग्रीष्मऋतुमें सूखते हुए दो तालाबोंकी तरह शीघ्र ही क्षीण हो चलीं ॥ १ ॥

स्वबलस्य तु घातेन विरूपाक्षवधेन च ।

बभूव द्विगुणं क्रुद्धो रावणो राक्षसाधिपः ॥ २ ॥

अपनी सेनाके विनाश और विरूपाक्षके वधसे राक्षसराज रावणका क्रोध दूना बढ़ गया ॥ २ ॥

प्रक्षीणं स्वबलं दृष्ट्रा वध्यमानं वलीमुखैः ।

बभूवास्य व्यथा युद्धे दृष्ट्रा दैवविपर्ययम् ॥ ३ ॥

वानरोंकी मारसे अपनी सेनाको क्षीण हुई देख दैवके उलट - फेरपर दृष्टिपात करके युद्धस्थलमें उसे बड़ी व्यथा हुई ॥ ३ ॥

उवाच च समीपस्थं महोदरमनन्तरम् ।

अस्मिन् काले महाबाहो जयाशा त्वयि मे स्थिता ॥ ४ ॥

उसने पास ही खड़े हुए महोदरसे कहा - ' महाबाहो! इस समय मेरी विजयकी आशा तुम्हारे ऊपर ही अवलम्बित है ॥ ४ ॥

जहि शत्रुचमूं वीर दर्शयाद्य पराक्रमम् ।

भर्तृपिण्डस्य कालोऽयं निर्वेष्टुं साधुयुध्यताम् ॥ ५ ॥

' वीर! आज अपना पराक्रम दिखाओ और शत्रुसेनाका

वध करो । यही स्वामीके अन्नका बदला चुकानेका समय है ।

अतः अच्छी तरह बुद्ध करो ' ॥ ५ ॥

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा राक्षसेन्द्रो महोदरः ।

प्रविवेशारिसेनां स पतङ्ग इव पावकम् ॥ ६ ॥

रावणके ऐसा कहनेपर राक्षसराज महोदरने ' बहुत अच्छा ' कहकर उसकी आज्ञा शिरोधार्य की और जैसे पतङ्ग आगमें कूदता है, उसी प्रकार उसने शत्रुसेनामें प्रवेश किया ॥ ६ ॥

ततः स कदनं चक्रे वानराणां महाबलः ।

भर्तृवाक्येन तेजस्वी स्वेन वीर्येण चोदितः ॥ ७ ॥

सेनामें प्रवेश करके तेजस्वी और महाबली महोदरने स्वामी जी आज्ञासे प्रेरित हो अपने पराक्रमद्वारा वानरोंका संहार आरम्भ किया ॥ ७ ॥

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१३६० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

वानराश्च महासत्त्वाः प्रगृह्य विपुलाः शिलाः ।

प्रविश्यारिबलं भीमं जघ्नुस्ते सर्वराक्षसान् ॥ ८ ॥

वानर भी बड़े शक्तिशाली थे । वे बड़ी - बड़ी शिलाएँ लेकर शत्रुकी भयंकर सेनामें घुस गये और समस्त राक्षसोंका संहार करने लगे ॥ ८ ॥

महोदरः सुसंक्रुद्धः शरैः काञ्चनभूषणैः ।

चिच्छेद पाणिपादोरु वानराणां महाहवे ॥ ९ ॥

महोदरने अत्यन्त कुपित होकर अपने सुवर्णभूषित बाणों-द्वारा उस महायुद्ध में वानरोंके हाथ - पैर और जाँघें काट डालीं ॥ ९ ॥

ततस्ते वानराः सर्वे राक्षसैरर्दिता भृशम् ।

दिशो दश द्रुताः केचित् केचित् सुग्रीवमाश्रिताः ॥१० ॥

राक्षसोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए वे सब वानर दसों दिशाओंमें भागने लगे । कितने ही सुग्रीवकी शरणमें गये ।

प्रभग्नं समरे दृष्ट्वा वानराणां महाबलम् ।

अभिदुद्राव सुग्रीवो महोदर मनन्तरम् ॥ ११ ॥

वानरोंकी विशाल सेनाको समरभूमिसे भागती देख सुग्रीवने पास ही खड़े हुए महोदरपर आक्रमण किया ॥ ११ ॥

प्रगृह्य विपुलां घोरां महीधरसमां शिलाम् ।

चिक्षेप च महातेजास्तद्वधाय हरीश्वरः ॥ १२ ॥

वानरराज बड़े तेजस्वी थे । उन्होंने पर्वतके समान विशाल एवं भयंकर शिला उठाकर महोदरके वधके लिये उसपर चलायी ॥ १२ ॥

तामापतन्तीं सहसा शिलां दृष्ट्रा महोदरः ।

असम्भ्रान्तस्ततो बाणैर्निर्बिभेद दुरासदाम् ॥ १३ ॥

उस दुर्जय शिलाको सहसा अपने ऊपर आती देखकर भी महोदर के मनमें घबराहट नहीं हुई । उसने बाणोंद्वारा उसके टुकड़े - टुकड़े कर डाले ॥ १३ ॥

रक्षसा तेन बाणौघैर्निकृत्ता सा सहस्रधा ।

निपपात तदा भूमौ गृध्रचक्रमिवाकुलम् ॥ १४ ॥

उस राक्षसके बाणसमूहोंसे कटकर सहस्रों टुकड़ों में विभक्त हुई वह शिला उस समय आकुल हुए गृध्रसमुदायकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १४ ॥

तां तु भित्र शिलां दृष्ट्रा सुग्रीवः क्रोधमूच्छितः ।

सालमुत्पाट्य चिक्षेप तं स चिच्छेद नैकधा ॥ १५ ॥

उस शिलाको विदीर्ण हुई देख सुग्रीवका क्रोध बहुत बढ़ गया । उन्होंने एक शालका वृक्ष उखाड़कर उस राक्षसके ऊपर फेंका, किंतु राक्षसने उसके भी कई टुकड़े कर डाले ॥ १५ ॥

शरैश्च विददारैनं शूरः परबलार्दनः ।

स ददर्श ततः क्रुद्धः परिघं पतितं भुवि ॥ १६ ॥

साथ ही शत्रुसेनाका दमन करनेवाले उस शूरवीरने इन्हें अपने बाणोंसे घायल कर दिया । इसी समय क्रोधसे भरे हुए सुग्रीवको वहाँ पृथ्वीपर पड़ा हुआ एक परिघ दिखायी दिया ॥ १६ ॥

आविध्य तु स तं दीप्तं परिघं तस्य दर्शयन् ।

परिघेोग्रवेगेन जघानास्य हयोत्तमान् ॥ १७ ॥

उस तेजस्वी परिघको घुमाकर सुग्रीवने महोदरको अपनी फुर्ती दिखाते हुए उस भयानक वेगशाली परिघके द्वारा उस राक्षसके उत्तम घोड़ोंको मार डाला ॥ १७ ॥

तस्माद्धतहयाद् वीरः सोऽवप्लुत्य महारथात् ।

गदां जग्राह संक्रुद्धो राक्षसोऽथ महोदरः ॥ १८ ॥

घोड़ों के मारे जानेपर वीर राक्षस महोदर अपने विशाल रथसे कूद पड़ा और अत्यन्त रोषसे भरकर उसने गदा उठा ली ॥ १८ ॥

गदापरिघहस्तौ नौ युधि वीरौ समीयतुः ।

नर्दन्तौ गोवृषप्रख्यौ धनाविव सविद्युतौ ॥ १ ९ ॥

एकके हाथमें गदा थी और दूसरेके हाथमें परिघ । वे दोनों वीर युद्धस्थलमें दो साँड़ों और बिजलीसहित दो मेघोंके समान गर्जना करते हुए एक दूसरेसे भिड़ गये ॥ १ ९ ॥।

ततः क्रुद्धो गदां तस्मै चिक्षेप रजनीचरः ।

ज्वलन्तीं भास्कराभासां सुग्रीवाय महोदरः ॥ २० ॥

तदनन्तर कुपित हुए राक्षस महोदरने सुग्रीवपर सूर्य तुल्य तेजसे दमकती हुई एक गदा चलायी ॥ २० ॥

गदां तां सुमहाघोरामापतन्तीं महाबलः ।

सुग्रीवो रोषताम्राक्षः समुद्यम्य महाहवे ॥ २१ ॥

आजघान गदां तस्य परिघेण हरीश्वरः ।

पपात तरसा भिन्नः परिघस्तस्य भूतले ॥ २२ ॥

उस महाभयंकर गदाको अपनी ओर आती देख महा-समर में महाबली वानरराज सुग्रीवके नेत्र रोषसे लाल हो गये और उन्होंने परिघ उठाकर उसके द्वारा राक्षसकी गदापर आघात किया । वह गदा गिर पड़ी; किंतु उसके वेगसे टकरा-कर सुग्रीवका परिघ भी टूटकर पृथ्वीपर जा गिरा ॥ २१-२२ ॥

ततो जग्राह तेजखी सुग्रीवो वसुधातलात् ।

आयसं मुसलं घोरं सर्वतो हेमभूषितम् ॥ २३ ॥

तब तेजस्वी सुग्रीवने भूमिपरसे एक लोहेका भयंकर मूसल उठाया, जिसमें सब ओरसे सोना जड़ा हुआ था ॥ २३ ॥

समुद्यम्य चिक्षेप सोऽप्यस्य प्राक्षिपद् गदाम् ।

भिन्नावन्योन्यमासाद्य पेततुस्तौ महीतले ॥ २४ ॥

उसे उठाकर उन्होंने राक्षसपर दे मारा । साथ ही उस राक्षसने भी इनके ऊपर गदा फेंकी । गदा और मूसल दोनों आपस में टकराकर टूट गये और जमीनपर जा गिरे ॥ २४ ॥

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युद्धकाण्डे सप्तनवतितमः सर्गः १३६१

ततो भिन्नप्रहरणौ मुष्टिभ्यां तौ समीयतुः ।

तेजोबलसमाविष्टौ दीप्ताविव हुताशनौ ॥ २५ ॥

वे दोनों वीर तेज और बलसे सम्पन्न थे और जलती हुई अग्नियोंके समान उद्दीप्त हो रहे थे । अपने - अपने आयुधों के टूट जानेपर वे घूर्सोसे एक दूसरेको मारने लगे ॥ २५ ॥

जघ्नतुस्तौ तदान्योन्यं नदन्तौ च पुनः पुनः ।

तलैश्चान्योन्यमासाद्य पेततुश्च महीतले ॥ २६ ॥

उस समय बारंबार गर्जते हुए वे दोनों योद्धा परस्पर मुक्कोंसे प्रहार करने लगे । फिर थप्पड़ोंसे एक दूसरे को मारकर दोनों ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २६ ॥

उत्पेततुस्तदा तूर्ण जघ्नतुश्च परस्परम् ।

भुजैश्चिक्षिपतुर्वीरावन्योन्यमपराजितौ ॥ २७ ॥

फिर तत्काल ही दोनों उछले और शीघ्र ही एक दूसरे पर चोट करने लगे । वे दोनों वीर हार नहीं मानते थे । दोनों ही दोनोंपर भुजाओं द्वारा प्रहार करते रहे ॥ २७ ॥

जग्मतुस्तौ श्रमं वीरौ बाहुयुद्धे परंतपौ ।

आजहार तदा खड्गमदूरपरिवर्तिनम् ॥ २८ ॥

राक्षसश्चर्मणा सार्धं महावेगो महोदरः ।

तथैव च महाख चर्मणा पतितं सह ।

जग्राह वानरश्रेष्ठः सुग्रीवो वेगवत्तरः ॥ २ ९ ॥

शत्रुओंको तपानेवाले वे दोनों वीर बाहुयुद्ध करते - करते थक गये । तत्र महान् वेगशाली राक्षस महोदरने थोड़ी ही दूर पर पड़ी हुई ढालसहित तलवार उठा ली । उसी तरह अत्यन्त वेगशाली कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने भी वहाँ गिरे हुए विशाल खड्गको ढालसहित उठा लिया ॥ २८-२९ ॥

ततो रोषपरीताङ्गी नदन्तावभ्यधावताम् ।

उद्यतासी रणे हृष्टौ युधि शस्त्रविशारदौ ॥ ३० ॥

अपने बलपर घमंड करनेवाले महान् वेगशाली तथा शौर्य-सम्पन्न दुर्बुद्धि महोदरने अपनी वह तलवार सुग्रीवके विशाल कवचपर दे मारी ॥ ३२ ॥

लग्नमुत्कर्षतः खङ्गं खङ्गेन कपिकुञ्जरः ।

जहार सशिरस्त्राणं कुण्डलोपगतं शिरः ॥ ३३ ॥

सुग्रीवके कवचमें लगी हुई तलवारको जब वह राक्षस खींचने लगा, उसी समय कपिकुञ्जर सुग्रीवने महोदरके शिरस्त्राणसहित कुण्डलमण्डित मस्तकको अपने खड्गसे काट लिया ॥ ३३ ॥

निकृत्तशिरसस्तस्य पतितस्य महीतले ।

तद् बलं राक्षसेन्द्रस्य दृष्ट्वा तत्र न दृश्यते ॥ ३४ ॥

मस्तक कट जानेपर राक्षसराज महोदर पृथ्वीपर गिर पड़ा ।

यह देखकर उसकी सेना फिर वहाँ नहीं दिखायी दी ॥ ३४ ॥

हत्वा तं वानरैः सार्धं ननाद मुदितो हरिः ।

चुक्रोध च दशग्रीवो बभौ हृष्टश्च राघवः ॥ ३५ ॥

महोदरको मारकर प्रसन्न हुए वानरराज सुग्रीव अन्य वानरों के साथ गर्जना करने लगे । उस समय दशमुख रावणको बड़ा क्रोध हुआ और श्रीरघुनाथजी हर्षसे खिल उठे ॥ ३५ ॥

विषण्णवदनाः सर्वे राक्षसा दीनचेतसः ।

विद्रवन्ति ततः सर्वे भयवित्रस्तचेतसः ॥ ३६ ॥

उस समय समस्त राक्षसों का मन दुखी हो गया । उन सबके मुखपर विषाद छा गया और वे सभी भयभीतचित्त होकर वहाँसे भाग चले ॥ ३६ ॥

महोदरं तं विनिपात्य भूमौ महागिरेः कीर्णमिवैकदेशम् । सूर्यात्मजस्तत्र रराज लक्ष्म्या सूर्यः खतेजोभिरिवाप्रधृष्यः ॥ ३७ ॥

महोदरका शरीर किसी महान् पर्वतके एक टूटे हुए महोदर और सुग्रीव दोनों युद्ध के मैदानमें शस्त्र चलानेकी शिखर - सा जान पड़ता था । उसे पृथ्वीपर गिराकर सूर्यपुत्र कलामें चतुर थे तथा दोनोंके शरीर रोषसे प्रभावित थे; अतः सुग्रीव वहाँ विजय लक्ष्मीसे सुशामित हाने लगे, मानो अधर्षणीय रणभूमिमें हर्ष और उत्साह से युक्त हो वे तलवार उठाये गर्जने सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हों ॥ ३७ ॥

हुए एक दूसरेपर टूट पड़े ॥ ३० ॥ अथ विजयमवाप्य वानरेन्द्रः

दक्षिणं मण्डलं चोभौ सुतूर्ण सम्परीयतुः । समरमुखे सुरसिद्धयक्षसङ्घैः । अन्योन्यमभिसंक्रुद्धौ जये प्रणिहितावुभौ ॥ ३१ ॥ अवनितलगतैश्च भूतसङ्घ-वे दोनों बड़ी तेजीसे दायें - बायें पैतरे बदल रहे थे, दोनों- रुसमाकुलितै निरीक्ष्यमाणः ॥ ३८ ॥

का दोनोंपर क्रोध बढ़ा हुआ था तथा दोनों ही अपनी - अपनी इस प्रकार वानरराज सुग्रीव युद्धके मुहानेपर विजय पाकर बड़ी शोभा पाने लगे । उस समय देवता, सिद्ध और विजयकी आशा लगाये हुए थे ॥ ३१ ॥ प्राणियों के समूह भी बड़े

स तु शूरो महावेगो वीर्यश्लाघी महोदरः । यक्षोंके समुदाय तथा भूतलनिवासी महावर्मणि तं खङ्गं पातयामास दुर्मतिः ॥ ३२ ॥ हर्षसे उनकी ओर देखने लगे ॥ ३८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तनवतितमः सर्गः ॥ ९ ७ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में सत्तानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ७ ॥ वा ० रा ० ५. १०.९-

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१३६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अष्टनवतितमः सर्गः अंगदके द्वारा

महोदरे तु निहते महापार्श्वो महाबलः ।

सुग्रीवेण समीक्ष्याथ क्रोधात् संरक्तलोचनः ॥ १ ॥

सुग्रीवके द्वारा महोदरके मारे जानेपर उनकी ओर देख कर महाबली महापार्श्वके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये ॥ १ ॥

अङ्गदस्य चमूं भीमां क्षोभयामास मार्गणैः ।

स वानराणां मुख्यानामुत्तमाङ्गानि राक्षसः ॥ २ ॥

पातयामास कायेभ्यः फलं वृन्तादिवानिलः । उसने अपने बाणोंद्वारा अंगदकी भयंकर सेनामें हलचल मचा दी । वह राक्षस मुख्य - मुख्य वानरोंके मस्तक धड़से काट-काटकर गिराने लगा, मानो वायु वृन्त या डंठलसे फल गिरा रही हो ॥ २३ ॥

केषांचिदिषुभिर्बाहुश्चिच्छेदाथ स राक्षसः ॥ ३ ॥

वानराणां सुसंरब्धः पार्श्व केषांचिदाक्षिपत् । क्रोधसे भरे हुए महापार्श्वने अपने बाणोंसे कितनों की बाँहें काट दीं और कितने ही वानरोंकी पसलियाँ उड़ा दीं ॥ ३३ ॥

तेऽर्दिता वाणवर्षेण महापार्श्वेन वानराः ॥ ४ ॥

विषादविमुखाः बभूवुर्गतचेतसः । महापार्श्वकी बाणवर्षासे पीड़ित हो बहुत - से वानर

युद्ध से विमुख हो गये । सबकी चेतना जाती रही ॥ ४३ ॥

निशम्य बलमुद्विग्नमङ्गदो राक्षसार्दितम् ॥ ५ ॥

वेगं चक्रे महावेगः समुद्र इव पर्वसु । उस राक्षससे पीड़ित वानर सेनाको उद्विग्न हुई देख महान् वेगशाली अङ्गदने पूर्णिमा के दिन समुद्रकी भाँति अपना भारी वेग प्रकट किया ॥ ५३ ॥

आयसं परिघं गृह्य सूर्यरश्मिसमप्रभम् ॥ ६ ॥

समरे वानरश्रेष्ठो महापार्श्वे न्यपातयत् । उन वानरशिरोमणिने सूर्यकी किरणोंके समान दमकने-वाला एक लोहेका परिघ उठाकर महापार्श्वपर दे मारा || ६३ ॥ स तु तेन प्रहारेण महापार्श्वो विचेतनः ॥ ७ ॥

ससूतः स्यन्दनात् तस्माद् विसंज्ञश्चापतद् भुवि । उस प्रहारसे महापार्श्वकी सुध - बुध जाती रही और वह मूर्छित हो सारथिसहित रथसे नीचे जा पड़ा ॥ ७३ ॥

तस्यर्क्षराजस्तेजस्वी नीलाञ्जनचयोपमः ॥ ८ ॥

निष्पत्य सुमहावीर्यः स्वयूथान्मेघसंनिभात् ।

प्रगृह्य गिरिशृङ्गाभां क्रुद्धः स विपुलां शिलाम् ॥ ९ ॥

अभ्वाञ्जघान तरसा बभञ्ज स्यन्दनं च तम् । इसी समय काले कोयलेके ढेरके समान कृष्ण वर्णवाले, महान् पराक्रमी और तेजस्वी ऋक्षराज जाम्बवान्ने मेघोंकी महापार्श्वका वध घटा के सदृश अपने यूथसे बाहर निकलकर कुपित हो एक पर्वतशिखरके समान विशाल शिला हाथमें ले ली और उसके द्वारा उस राक्षसके घोड़ोंको मार डाला तथा उसके रथको भी चूर्ण कर दिया ॥ ८- ९ ३ ॥ मुहूर्ताल्लब्धसंज्ञस्तु महापार्श्वो महाबलः ॥ १० ॥

अङ्गदं बहुभिर्बाणैर्भूयस्तं प्रत्यविध्यत ।

जाम्बवन्तं त्रिभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥ ११ ॥

दो घड़ीके बाद होशमें आने पर महाबली महापार्श्वने बहुत - से बाणोंद्वारा पुनः अङ्गदको घायल कर दिया और जाम्बवान् की छातीमें भी तीन बाण मारे ॥ १०-११ ॥

ऋक्षराजं गवाक्षं च जघान बहुभिः शरैः ।

गवाक्षं जाम्बवन्तं च स दृष्ट्वा शरपीडितौ ॥ १२ ॥

जग्राह परिघं घोरमङ्गदः क्रोधमूर्चिछतः । इतना ही नहीं, उसने रीछोंके राजा गवाक्षको भी बहुत - से बाणोंद्वारा क्षत - विक्षत कर दिया । गवाक्ष और जाम्बवान्को बाणोंसे पीड़ित देख अङ्गदके क्रोधकी सीमा न रही । उन्होंने भयंकर परिघ हाथमें ले लिया ॥ १२३ ॥

तस्याङ्गदः सरोषाक्षो राक्षसस्य तमायसम् ॥ १३ ॥

दूरस्थितस्य परिघं रविरश्मिसमप्रभम् ।

द्वाभ्यां भुजाभ्यां संगृह्य भ्रामयित्वा च वेगवत् ॥ १४ ॥

महापार्श्वस्य चिक्षेप वधार्थं वालिनः सुतः । उनका वह परिघ सूर्यकी किरणोंके समान अपनी प्रभा बिखेर रहा था । वालिपुत्र अङ्गदके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे थे । उन्होंने उस लोहमय परिघको दोनों हाथोंसे पकड़कर घुमाया और दूर खड़े हुए महापार्श्व के वध के लिये वेगपूर्वक

चला दिया । १३ १४३ ॥

स तु क्षिप्तो बलवता परिघस्तस्य रक्षसः ॥ १५ ॥

धनुश्च सशरं हस्ताच्छिरस्त्राणं च पातयत् । बलवान् वीर अङ्गदके चलाये हुए उस परिघने राक्षस महापार्श्वके हाथसे बाणसहित धनुष और मस्तकसे टोप गिरा दिये ॥ १५३ ॥

तं समासाद्य वेगेन वालिपुत्रः प्रतापवान् ॥ १६ ॥

तलेनाभ्यहनत् क्रुद्धः कर्णमूले सकुण्डले । फिर प्रतापी वालिपुत्र अङ्गद बड़े वेगसे उसके पास जा पहुँचे और कुपित होकर उन्होंने उसके कुण्डलयुक्त कानके पास गालमें एक थप्पड़ मारा ॥ १६३ ॥

स तु क्रुद्धो महावेगो महापार्श्वो महाद्युतिः ॥ १७ ॥

करेणैकेन जग्राह सुमहान्तं परश्वधम् । तब महान् वेगशाली महातेजस्वी महापार्श्वने कुपित होकर एक हाथमें बहुत बड़ा फरसा ले लिया ॥ १७३ ॥

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युद्धकाण्डे एकोनशततमः सर्गः १३६३ तं तैलधौतं विमलं शैलसारमयं दृढम् ॥ १८ ॥

राक्षसः परमक्रुद्धो वालिपुत्रे न्यपातयत् । उस फरसेको तेलमें डुबोकर साफ किया गया था और वह अच्छे लोहेका बना हुआ एवं सुदृढ़ था । राक्षस महापार्श्वने अत्यन्त कुपित हो वह फरसा वालिपुत्र अङ्गदपर दे मारा ॥ १८३ ॥

तेन वामांसफलके भृशं प्रत्यवपातितम् ॥ १ ९ ॥ अङ्गदो मोक्षयामास सरोषः स परश्वधम् । उसने अङ्गदके बायें कंधेपर बड़े वेगसे उस फरसे का प्रहार किया था, परंतु रोषसे भरे हुए अङ्गदने कतराकर अपनेको बचा लिया और उस फरसेको व्यर्थं कर दिया ॥ १ ९ ३ ॥ स वीरो वज्रसंकाशमङ्गदो मुष्टिमात्मनः ॥ २० ॥

संवर्तयत् सुसंक्रुद्धः पितुस्तुल्यपराक्रमः । तत्पश्चात् अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए वीर अङ्गदने, जो अपने पिता के समान ही पराक्रमी थे, वज्रके समान मुट्ठी बाँधी ॥ २०३ ॥

राक्षसस्य स्तनाभ्याशे मर्मज्ञो हृदयं प्रति ॥ २१ ॥

इन्द्राशनिसमस्पर्श स मुष्टिं विन्यपातयत् । वे हृदय मर्मस्थानसे परिचित थे; अतः उन्होंने उस राक्षसके स्तनोंके निकट छातीमें बड़े वेगसे मुक्का मारा, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्र के समान असह्य था ॥ २१३ ॥

न तस्य निपातेन राक्षसस्य महामृधे ॥ २२ ॥

पफाल हृदयं चास्य स पपात हतो भुवि । उनका वह घूसा लगते ही उस महासमरमें राक्षस महा-पार्श्वका हृदय फट गया और वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २२३ ॥ ॥ २३ ॥

तस्मिन् विनिहते भूमौ तत् सैन्यं सम्प्रचुक्षुभे अभवच्च महान् क्रोधः समरे रावणस्य तु । उसके मरकर पृथ्वीपर गिर जानेके पश्चात् उसकी सेना विक्षुब्ध हो उठी तथा समरभूमिमें रावणको भी महान् क्रोध हुआ ॥ २३३ ॥

वानराणां प्रहृष्टानां सिंहनादः सुपुष्कलः ॥ २४ ॥

स्फोटयन्निव शब्देन लङ्कां साट्टालगोपुराम् ।

सहेन्द्रेणेव देवानां नादः समभवन्महान् ॥ २५ ॥

उस समय हर्ष से भरे हुए वानरोंका महान् सिंहनाद होने लगा । वह अट्टालिकाओं तथा गोपुरोंसहित लङ्कापुरीको फोड़ता हुआ - सा प्रतीत हुआ । अङ्गदसहित वानरोंका वह महानाद इन्द्रसहित देवताओंके गम्भीर घोष - सा जान पड़ता था ॥ २४-२५ ॥ अथेन्द्रशत्रुस्त्रिदशालयानां वनौकसां चैव महाप्रणादम् । श्रुत्वा सरोषं युधि राक्षसेन्द्रः पुनश्च युद्धाभिमुखोऽवतस्थे ॥ २६ ॥

युद्धस्थलमें देवताओं और वानरोंकी वह बड़ी भारी गर्जना सुनकर इन्द्रद्रोही राक्षसराज रावण पुनः रोषपूर्वक युद्धके लिये उत्सुक हो वहाँ खड़ा हो गया ॥ २६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टनवतितमः सर्गः ॥ ९ ८ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ८ ॥ एकोनशततमः सर्गः श्रीराम और

महोदरमहापार्श्वे हतौ दृष्ट्रा स रावणः ।

तस्मिंश्च निहते वीरे विरूपाक्षे महाबले ॥ १ ॥

आविवेश महान क्रोधो रावणं तु महामृधे ।

सूतं संचोदयामास वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ २ ॥

महाबली वीर विरूपाक्ष तो मारा ही गया था; महोदर और महापार्श्व भी कालके गालमें डाल दिये गये —यह देख उस महासमर के भीतर रावणके हृदय में महान् क्रोधका आवेश हुआ । उसने सारथिको रथ आगे बढ़ाने की आज्ञा दी और इस प्रकार कहा- ॥ १-२ ॥

निहतानाममात्यानां रुद्धस्य नगरस्य च ।

दुःखमेवापनेष्यामि हत्वा तौ रामलक्ष्मणौ ॥ ३ ॥

“ सूत! मेरे मन्त्री मारे गये और लङ्कापुरीपर चारों ओरसे घेरा डाला गया । इसके लिये मुझे बड़ा दुःख है । आज राम रावणका युद्ध और लक्ष्मणका वध करके ही मैं अपने इस दुःखको दूर करूँगा ॥ ३ ॥

रामवृक्षं रणे हन्मि सीतापुष्पफलप्रदम् ।

प्रशाखा यस्य सुग्रीवो जाम्बवान् कुमुदो नलः ॥ ४ ॥

द्विविदश्चैव मैन्दश्व अङ्गदो गन्धमादनः ।

हनूमांश्च सुषेणश्च सर्वे च हरियूथपाः ॥ ५ ॥

' रणभूमिमें उस रामरूपी वृक्षको उखाड़ फेंकूँगा, जो सीतारूपी फूलके द्वारा फल देनेवाला है तथा सुग्रीव, जाम्बवान्, कुमुद, नल, द्विविद, मैन्द, अङ्गद, गन्धमादन, हनुमान् और सुषेण आदि समस्त वानरयूथपति जिसकी शाखा-प्रशाखाएँ हैं ' ॥ ४-५ ॥

स दिशो दश घोषेण रथस्यातिरथो महान् ।

नादयन् प्रययौ तूर्ण राघवं चाभ्यधावत ॥ ६ ॥

पृष्ठ 569

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१३६४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ऐसा कहकर महान् अतिरथी वीर रावण अपने रथकी घराहट से दसों दिशाओंको गुँजाता हुआ बड़ी तेजी के साथ श्रीरघुनाथजीकी ओर बढा ॥ ६ ॥

पूरिता तेन शब्देन सनदीगिरिकानना ।

संचचाल मही सर्वा त्रस्तसिंहमृगद्विजा ॥ ७ ॥

रथकी आवाजसे नदी, पर्वत और जंगलोंसहित वहाँकी सारी भूमि गूँज उठी, धरती डोलने लगी और वहाँके सारे पशु - पक्षी भयसे थर्रा उठे ॥ ७ ॥

तामसं सुमहाघोरं चकारास्त्रं सुदारुणम् ।

निर्ददाह कपीन सर्वास्ते प्रपेतुः समन्ततः ॥ ८ ॥

उस समय रावणने तामंस नामवाले अत्यन्त भयंकर महाघोर अस्त्रको प्रकट करके समस्त वानरों को भस्म करना आरम्भ किया । सब ओर उनकी लाशें गिरने लगीं ॥ ८ ॥

उत्पपात रजो भूमौ तैर्भग्नैः सम्प्रधावितैः ।

नहि तत् सहितुं शेकुर्ब्रह्मणा निर्मितं स्वयम् ॥ ९ ॥

उनके पाँव उखड़ गये और वे इधर - उधर भागने लगे, इससे रणभूमिमें बहुत धूल उड़ने लगी । वह तामस अस्त्र साक्षात् ब्रह्माजीका बनाया हुआ था, इसलिये वानर - योद्धा उसके वेगको सह न सके ॥ ९ ॥

तान्यनीकान्यनेकानि रावणस्य शरोत्तमैः ।

दृष्ट्वा भग्नानि शतशो राघवः पर्यवस्थितः ॥ १० ॥

रावणके उत्तम बाणोंसे आहत हो वानरोंकी सेकड़ों सेनाएँ तितर - बितर हो गयी हैं — यह देख भगवान् श्रीराम युद्धके लिये उद्यत हो सुस्थिरभावसे खड़े हो गये ॥ १० ॥

ततो राक्षसशार्दूलो विद्राव्य हरिवाहिनीम् ।

स ददर्श ततो रामं तिष्ठन्तमपराजितम् ॥११ ॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विष्णुना वासवं यथा । उधर वानर सेनाको खदेड़कर राक्षससिंह रावणने देखा कि किसीसे पराजित न होनेवाले श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणके साथ उसी तरह खड़े हैं, जैसे इन्द्र अपने छोटे भाई भगवान् विष्णु ( उपेन्द्र ) के साथ खड़े होते हैं ॥ ११३ ॥

आलिखन्तमिवाकाशमवष्टभ्य महद् धनुः ॥१२ ॥

पद्मपत्रविशालाक्षं दीर्घबाहुमरिदमम् । वे अपने विशाल धनुषको उठाकर आकाश में रेखा खींचते - से प्रतीत होते थे । उनके नेत्र विकसित कमलदलके समान विशाल थे, भुजाएँ बड़ी - बड़ी थीं और वे शत्रुओंका दमन करनेमें पूर्णतः समर्थं थे ॥ १२३ ॥

ततो रामो महातेजाः सौमित्रिसहितो बली ॥ १३ ॥

वानरांश्च रणे भग्नानापतन्तं च रावणम् ।

समीक्ष्य राघवो हृष्टो मध्ये जग्राह कार्मुकम् ॥ १४ ॥

१. इस अलका देवता तनोग्रह राहु है, इसलिये इसको ' तानस ' कहते हैं । तदनन्तर लक्ष्मणसहित खड़े हुए महातेजस्वी महाबली श्रीरामने रणभूमिमें वानरों को भागते और रावणको आते देख मनमें बड़े हर्ष का अनुभव किया और धनुष के मध्यभागको दृढ़ता के साथ पकड़ा ॥ १३-१४ ॥

विस्फारयितुमारेभे ततः स धनुरुत्तमम् ।

महावेगं महानादं निर्भिन्दन्निव मेदिनीम् ॥ १५ ॥

उन्होंने अपने महान् वेगशाली और महानाद प्रकट करनेवाले उत्तम धनुषको इस तरह खींचना और उसकी टङ्कार करना आरम्भ किया, मानो वे पृथ्वीको विदीर्ण कर डालेंगे ॥ १५ ॥

रावणस्य च वाणौघै गमविस्फारितेन च ।

शब्देन राक्षसास्तेन पेतुश्च शतशस्तदा ॥ १६ ॥

रावण के बाण समूहोंसे तथा श्रीरामचन्द्रजीके धनुषकी टङ्कारसे जो भयंकर शब्द प्रकट हुआ, उससे आतङ्कित होकर सैकड़ों राक्षस तत्काल धराशायी हो गये ॥ १६ ॥

तयोः शरपथं प्राप्य रावणो राजपुत्रयोः ।

सबभौ च यथा राहुः समीपे शशिसूर्ययोः ॥ १७ ॥

उन दोनों राजकुमारोंके बाणोंके मार्गमें आकर रावण चन्द्रमा और सूर्यके समीप स्थित हुए राहुकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ १७ ॥

तमिच्छन् प्रथमं योद्धुं लक्ष्मणो निशितैः शरैः ।

मुमोच धनुरायम्य शरानग्निशिखोपमान् ॥ १८ ॥

लक्ष्मण अपने पैने बाणोंके द्वारा रावणके साथ पहले स्वयं ही युद्ध करना चाहते थे; इसलिये धनुष तानकर वे अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाण छोड़ने लगे ॥ १८ ॥

तान् मुक्तमात्रानाकाशे लक्ष्मणेन धनुष्मता ।

बाणान् वाणैर्महातेजा रावणः प्रत्यवारयत् ॥ १ ९ ॥

धनुर्धर लक्ष्मणके धनुषसे छूटते ही उन बाणोंको महा-तेजस्वी रावण ने अपने सायकोंद्वारा आकाशमें ही काट गिराया ॥

एकमेकेन वाणेन त्रिभिस्त्रीन् दशभिर्दश ।

लक्ष्मणस्य प्रचिच्छेद दर्शयन् पाणिलाघवम् ॥ २० ॥

वह अपने हाथों की फुर्ती दिखाता हुआ लक्ष्मणके एक बाणको एक बाणसे, तीन बाणोंको तीन बाणसे और दस बाणोंको उतने ही बाणोंसे काट देता था ॥ २० ॥

अभ्यतिक्रम्य सौमित्रिं रावणः समितिंजयः ।

आससाद रणे रामं स्थितं शैलमिवापरम् ॥ २१ ॥

समर विजयी रावण सुमित्रा कुमारको लाँघकर रणभूमि में दूसरे पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े हुए श्रीराम के पास जा पहुँचा ॥ २१ ॥

स राघवं समासाद्य क्रोधसंरक्तलोचनः ।

व्यसृजच्छरवर्षाणि रावणो राक्षसेश्वरः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 570

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युद्धकाण्डे एकोनशततमः सर्गः १३६५ श्रीरघुनाथजीके निकट जाकर क्रोधसे लाल आँखें किये राक्षस-राज रावण उनके ऊपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ २२ ॥

शरधारास्ततो रामो रावणस्य धनुश्च्युताः ।

दृष्ट्वा पतिताः शीघ्रं भल्लाञ्जग्राह सत्वरम् ॥ २३ ॥

रावणके धनुषसे गिरती हुई उन बाण धाराओंपर दृष्टिपात करके श्रीरामने बड़ी उतावलीके साथ शीघ्र ही कई भल्ल हाथमें लिये ॥ २३ ॥

ताञ्छरौघांस्ततो भल्लैस्तीक्ष्णैश्चिच्छेद राघवः ।

दीप्यमानान् महाघोराञ्छरानाशीविषोपमान् ॥ २४ ॥

रघुकुलभूषण श्रीरामने रावणके विषधर सर्पोंके समान महाभयंकर एवं दीप्तिमान् बाणसमूहको उन तीखे भल्लोंसे काट डाला ॥ २४ ॥

राघो रावणं तूर्णं रावणो राघवं तथा ।

अन्योन्यं विविधैस्तीक्ष्णैः शरवर्षैर्व वर्षतुः ॥ २५ ॥

फिर श्रीरामने रावणको और रावणने श्रीराम को अपना लक्ष्य बनाया और दोनों ही शीघ्रतापूर्वक एक दूसरेपर भाँति-भाँति के वैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २५ ॥

चेरतुश्च चिरं चित्रं मण्डलं सव्यदक्षिणम् ।

वाणवेगात् समुत्क्षिप्ता त्रन्योन्यमपराजितौ ॥ २६ ॥

वे दोनों चिरकालतक वहाँ विचित्र दायें - बायें पैतरेसे विचरते रहे । बाणके वेगसे एक - दूसरेको घायल करते हुए वे दोनों वीर पराजित नहीं होते थे ॥ २६ ॥

तयोर्भूतानि वित्रेसुर्युगपत् सम्प्रयुध्यतोः ।

रौद्रयोः सायकमुचोर्यमान्तकनिकाशयोः ॥ २७ ॥

एक साथ जूझते और सायकोंकी वर्षा करते हुए श्रीराम और रावण यमराज और अन्तकके समान भयंकर जान पड़ते थे । उनके युद्ध से सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे ॥ २७ ॥

सततं विविधैर्वाणैर्वभूव गगनं तदा ।

घनैरिवातपापाये विद्युन्मालासमाकुलैः ॥ २८ ॥

जैसे वर्षा ऋतु विद्युत् समूहोंसे व्याप्त मेघोंकी घटासे आकाश आच्छादित हो जाता है, उसी प्रकार उस समय नाना प्रकारके बाणों से वह ढक गया था ॥ २८ ॥

गवाक्षितमिवाकाशं बभूव शरवृष्टिभिः ।

महावेगैः सुतीक्ष्णायैर्गृध्रपत्रैः सुवाजितैः ॥ २ ९ ॥

गीधकी पाँखके सुन्दर परोंसे सुशोभित और तेज धारवाले महान् वेगशाली बाणोंकी अनवरत वर्षासे आकाश ऐसा जान पड़ता था, मानो उसमें बहुत - से झरोखे लग गये हों ॥ २ ९ ॥

शरान्धकारमाकाशं चक्रतुः परमं तदा ।

गतेऽस्तं तपने चापि महामेघाविवोत्थितौ ॥ ३० ॥

दो बड़े - बड़े मेघोंकी भाँति उठे हुए श्रीराम और रावणने सूर्यके अस्त और उदित होनेपर भी बाणोंके गहन अन्धकारसे आकाशको ढक रक्खा था ॥ ३० ॥

तयोरभून्महायुद्धमन्योन्यबधकाङ्क्षिणः 1 अनासाद्यमचिन्त्यं च वृत्रवासवयोरिव ॥ ३१ ॥

दोनों एक - दूसरेका वध करना चाहते थे; अतः वृत्रासुर और इन्द्रकी भाँति उन दोनोंमें ऐसा महान् युद्ध होने लगा, जो दुर्लभ तथा अचिन्त्य है ॥ ३१ ॥

उभौ हि परमेष्वासावुभौ युद्धविशारदौ ।

उभावस्त्रविदां मुख्यावुभौ युद्धे विचेरतुः ॥ ३२ ॥

दोनों ही महान् धनुर्धर और दोनों ही युद्ध की कला में निपुण थे । दोनों ही अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे; अतः दोनों बड़े ही उत्साहसे रणभूमिमें विचरने लगे ॥ ३२ ॥

उभौ हि येन व्रजतस्तेन तेन शरोर्मयः ।

ऊर्मयो वायुना विद्धा जग्मुः सागरयोरिव ॥ ३३ ॥

वे जिस - जिस मार्ग से जाते, उसी उसीसे बाणों की लहर सी उठने लगती थी । ठीक उसी तरह, जैसे वायुके थपेड़े खाकर दो समुद्रोंके जलमें उत्ताल तरङ्गे उठ रही हों ॥ ३३ ॥

ततः संसक्तहस्तस्तु रावणो लोकरावणः ।

नाराचमालां रामस्य ललाटे प्रत्यमुञ्चत ॥ ३४ ॥

तदनन्तर जिसके हाथ बाण छोड़ने में ही लगे हुए थे, समस्त लोकोंको रुलानेवाले उस रावणने श्रीरामचन्द्रजी के ललाट में नाराचों की माला - सी पहना दी ॥ ३४ ॥

रौद्रचापप्रयुक्तां तां नीलोत्पलदलप्रभाम् ।

शिरसाधारयद् रामो न व्यथामभ्यपद्यत ॥ ३५ ॥

भयंकर धनुवसे छूटी और नील कमलदलके समान श्याम कान्तिसे प्रकाशित होती हुई उस नाराच मालाको श्रीरामचन्द्र जीने अपने सिरपर धारण किया; किंतु वे व्यथित नहीं हुए ॥ ३५ ॥

अथ मन्त्रानपि जपन् रौद्रमस्त्रमुदीरयन् ।

शरान् भूयः समादाय रामः क्रोधसमन्वितः ॥ ३६ ॥

तत्पश्चात् क्रोधसे भरे हुए श्रीरामने पुनः बहुत - से बाण लेकर मन्त्रजपपूर्वक रौद्रास्त्रका प्रयोग किया ॥ ३६ ॥

मुमोच च महातेजाश्चापमायम्य वीर्यवान् ।

ताञ्शरान् राक्षसेन्द्राय चिक्षेपाच्छिन्न सायकः ॥ ३७ ॥

फिर उन महातेजस्वी, महापराक्रमी और अविच्छिन्नरूपसे बाणवर्षा करनेवाले श्रीरघुवीरने धनुषको कानतक खींचकर वे सभी बाण राक्षसराज रावणपर छोड़ दिये ॥ ३७ ॥

ते महामेघसंकाशे कवचे पतिताः शराः ।

अवध्ये राक्षसेन्द्रस्य न व्यथां जनयंस्तदा ॥ ३८ ॥

वे बाण राक्षसराज रावण के महामेघ के समान काले रंगके