Ramayana 2 — पृष्ठ 571–580
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580
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१३६६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अभेद्य कवचपर गिरे थे; इसलिये उस समय उसे व्यथित न कर सके ॥ ३८ ॥
पुनरेवाथ तं रामो रथस्थं राक्षसाधिपम् ।
ललाटे परमास्त्रेण सर्वास्त्रकुशलोऽभिनत् ॥ ३ ९ ॥
सम्पूर्ण अस्त्रोंके संचालनमें कुशल भगवान् श्रीरामने पुनः रथपर बैठे हुए राक्षसराज रावणके ललाटमें उत्तम अस्त्रोंका प्रहार करके उसे घायल कर दिया ॥ ३ ९ ॥
ते भित्त्वा वाणरूपाणि पञ्चशीर्षा इवोरगाः ।
श्वसन्तो विविशुर्भूमिं रावणप्रतिकूलिताः ॥ ४० ॥
श्रीरामके वे उत्तम बाण रावणको घायल करके उसके निवारण करनेपर फुफकारते हुए पाँच सिरवाले सर्पोंके समान धरती में समा गये ॥ ४० ॥
निहत्य राघवस्यास्त्रं रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।
आसुरं सुमहाघोरमस्त्रं प्रादुश्चकार सः ॥ ४१ ॥
श्रीरघुनाथजीके अस्त्रका निवारण करके क्रोधसे मूर्छित हुए रावणने आसुर नामक दूसरा महाभयंकर अस्त्र प्रकट किया ॥
सिंहव्याघ्रमुखांश्चापि कङ्ककोकमुखानपि ।
शृगालवदनांस्तथा ॥ ४२ ॥
ईहामृगमुखांश्चापि व्यादितास्यान् भयावहान् ।
पञ्चास्याँल्लेलिहानांश्च ससर्ज निशिताञ्शरान् ॥ ४३ ॥
शरान् खरमुखांश्चान्यान् वराहमुखसंश्रितान् ।
श्वानकुक्कुटवक्त्रांश्च मकराशीविषाननान् ॥ ४४ ॥
एतांश्चान्यांश्च मायाभिः ससर्ज निशिताञ्छरान् ।
रामं प्रति महातेजाः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ॥ ४५ ॥
उससे सिंह, बाघ, कङ्क, चक्रवाक, गीध, बाज, सियार, भेड़िये, गदहे, सूअर, कुत्ते, मुर्गे, मगर और जहरीले साँपोंके समान मुखवाले बाणोंकी वृष्टि होने लगी । वे बाण मुँह फैलाये, जबड़े चाटते हुए पाँच मुखवाले भयंकर सर्पोंके समान जान पड़ते थे । फुफकारते हुए सर्पकी भाँति कुपित हुए महातेजस्वी रावणने इनका तथा अन्य प्रकारके तीखे बाणोंका भी श्रीरामके ऊपर प्रयोग किया ॥ ४२–४५ ॥
आसुरेण समाविष्टः सोऽस्त्रेण रघुपुङ्गवः ।
ससर्जास्त्रं महोत्साहं पावकं पावकोपमः ॥ ४६ ॥
उस आसुरास्त्रसे आवृत हुए अग्नि - तुल्य तेजस्वी महान् उत्साही रघुकुलतिलक श्रीरामने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया ॥ अग्निदीप्तमुखान् बाणांस्तत्र सूर्यमुखानपि ।
चन्द्रार्धचन्द्रवक्त्रांश्च धूमकेतुमुखानपि ।
ग्रहनक्षत्रवर्णाश्च महोल्कामुखसंस्थितान् ॥ ४७ ॥
विद्युजिह्वोपमांश्चापि ससर्ज विविधाञ्छरान् । उसके द्वारा उन्होंने अग्नि, सूर्य, चन्द्र, अर्धचन्द्र, धूम-केतु, ग्रह, नक्षत्र, उल्का तथा बिजलीकी प्रभाके समान प्रज्वलित मुखवाले नाना प्रकार के बाण प्रकट किये ॥ ४७३ ॥
ते रावणशरा घोरा राघवास्त्रसमाहताः ॥ ४८ ॥
विलयं जग्मुराकाशे जघ्नुश्चैव सहस्रशः । श्रीरघुनाथजी के आग्नेयास्त्र से आहत हो रावणके वे भयंकर बाण आकाशमें ही विलीन हो गये, तथापि उनके द्वारा सहस्रों वानर मारे गये थे ॥ ४८३ ॥
तदत्रं निहतं दृष्ट्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ४ ९ ॥
हृष्टा नेदुस्ततः सर्वे कपयः कामरूपिणः ।
सुग्रीवाभिमुखा वीराः सम्परिक्षिप्य राघवम् ॥ ५० ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने उस आसुरास्त्र को नष्ट कर दिया, यह देख इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुग्रीव आदि सभी वीर वानर श्रीरामको चारों ओर-से घेरकर हर्षनाद करने लगे ॥ ४ ९ -५० ॥ ततस्तदस्त्रं विनिहत्य राघवः प्रसह्य तद् रावणबाहुनिःसृतम् । मुदान्वितो दाशरथिर्महात्मा विनेदुरुच्चैर्मुदिताः कपीश्वराः ॥ ५१ ॥
दशरथनन्दन महात्मा श्रीराम रावण के हाथोंसे छूटे हुए उस आसुरास्त्रका बलपूर्वक विनाश करके बड़े प्रसन्न हुए और
वानर - यूथपति आनन्दमग्न हो उच्च स्वरसे सिंहनाद करने लगे ।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनशततमः सर्गः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में निन्यानबे वाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९९ ॥
शततमः सर्गः राम और रावणका युद्ध, रावणकी शक्तिसे लक्ष्मणका मूर्छित होना तथा रावणका युद्ध से भागना तस्मिन् प्रतिहतेऽस्त्रे तु रावणो राक्षसाधिपः । अपने उस अस्त्र नष्ट हो जानेपर महातेजस्वी राक्षसराज क्रोधं च द्विगुणं चक्रे क्रोधाच्चास्त्रमनन्तरम् ॥ १ ॥ रावणने दूना क्रोध प्रकट किया । उसने क्रोधवश श्रीरामके
मयेन विहितं रौद्रमन्यदत्रं महाद्युतिः । ऊपर एक दूसरे भयंकर अस्त्रको छोड़नेका आयोजन किया, उत्स्रष्टुं रावणो भीमं राघवाय प्रचक्रमे ॥ २ ॥ जिसे मयासुर ने बनाया था ॥ १-२ ॥
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युद्धकाण्डे शततमः सर्गः १३६७
ततः शूलानि निश्चेरुर्गदाश्च मुसलानि च ।
कार्मुका दीप्यमानानि वज्रसाराणि सर्वशः ॥ ३ ॥
मुद्गराः कूटपाशाश्च दीप्ताश्वाशनयस्तथा ।
निष्पेतुर्विविधास्तीक्ष्णा वाता इव युगक्षये ॥ ४ ॥
उस समय रावणके धनुषसे वज्रके समान दृढ़ और दमकते हुए शूल, गदा, मूसल, मुद्गर, कूटपाश तथा चम-चमाती अशनि आदि भाँति - भाँति के तीखे अस्त्र छूटने लगे, मानो प्रलयकाल वायुके विविध रूप प्रकट हो रहे हों ॥ ३-४ ॥
तदत्रं राघवः श्रीमानुत्तमास्त्रविदां वरः ।
जघान परमास्त्रेण गान्धर्वेण महाद्युतिः ॥ ५ ॥
तब उत्तम अस्त्र के ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी श्रीमान् रघुनाथजीने गान्धर्वनामक श्रेष्ठ अस्त्र के द्वारा रावणके उस अस्त्रको शान्त कर दिया ॥ ५ ॥
तस्मिन् प्रतिहतेऽस्त्रे राघवेण महात्मना ।
रावणः क्रोधताम्राक्षः सौरमस्त्रमुदीरयत् ॥ ६ ॥
महात्मा रघुनाथजीके द्वारा उस अस्त्र के प्रतिहत हो जानेपर रावण के नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और उसने सूर्यास्त्रका प्रयोग किया ॥ ६ ॥
ततश्चक्राणि निष्पेतुर्भास्वराणि महान्ति च ।
कार्मुकाद् भीमवेगस्य दशग्रीवस्य धीमतः ॥ ७ ॥
फिर तो भयानक वेगशाली बुद्धिमान् राक्षस दशग्रीवके धनुषसे बड़े - बड़े तेजस्वी चक्र प्रकट होने लगे ॥ ७ ॥
तैरासीद् गगनं दीप्तं सम्पतद्भिः समन्ततः ।
पतद्भिश्च दिशो दीप्ताश्चन्द्रसूर्यग्रहैरिव ॥ ८ ॥
चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंके समान आकारवाले वे दीप्तिमान् अस्त्र - शस्त्र सब ओर प्रकट होते और गिरते थे । उनसे आकाशमें प्रकाश छा गया और सम्पूर्ण दिशाएँ उद्भासित हो उठीं ॥ ८ ॥
तानि चिच्छेद वाणौघैश्वक्राणि तु स राघवः ।
आयुधानि च चित्राणि रावणस्य चमूमुखे ॥ ९ ॥
परंतु श्रीरामचन्द्रजीने अपने बाणसमूहद्वारा सेनाके मुहाने पर रावणके उन चक्रों और विचित्र आयुधोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ९ ॥
तदत्रं तु हतं दृष्ट्वा रावणो राक्षसाधिपः ।
विव्याध दशभिर्बाणै रामं सर्वेषु मर्मसु ॥ १० ॥
उस अस्त्रको नष्ट हुआ देख राक्षसराज रावणने दस बाणोंद्वारा श्रीरामके सारे मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ॥
स विद्धो दशभिर्बाणैर्महाकार्मुकनिःसृतैः ।
रावणेन महातेजा न प्राकम्पत राघवः ॥ ११ ॥
रावणके विशाल धनुषसे छूटे हुए उन दस बाणोंसे घायल होनेपर भी महातेजस्वी श्रीरघुनाथजी विचलित नहीं हुए ॥
ततो विव्याध गात्रेषु सर्वेषु समितिंजयः ।
राघवस्तु सुसंक्रुद्धो रावणं बहुभिः शरैः ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् समरविजयी श्रीरघुवीरने अत्यन्त कुपित हो बहुत - से बाण मारकर रावणके सारे अङ्गों में घाव कर दिया ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो राघवस्यानुजो बली ।
लक्ष्मणः सायकान् सप्त जग्राह परवीरहा ॥ १३ ॥
इसी बीच में शत्रुवीरों का संहार करनेवाले महाबली रामानुज लक्ष्मणने कुपित हो सात सायक हाथमें लिये ॥ १३ ॥
तैः सायकैर्महावेगै रावणस्य महाद्युतिः ।
ध्वजं मनुष्यशीर्षे तु तस्य चिच्छेद नैकधा ॥ १४ ॥
उन महान् वेगशाली सायकोंद्वारा उन महातेजस्वी सुमित्राकुमारने रावणकी ध्वजाके, जिसमें मनुष्यकी खोपड़ीका चिह्न था, कई टुकड़े कर डाले ॥ १४ ॥
सारथेश्चापि बाणेन शिरो ज्वलितकुण्डलम् ।
जहार लक्ष्मणः श्रीमान् नैर्ऋतस्य महाबलः ॥ १५ ॥
इसके बाद महाबली श्रीमान् लक्ष्मणने एक बाणसे उस राक्षसके सारथिका जगमगाते हुए कुण्डलोंसे मण्डित मस्तक भी काट लिया ॥ १५ ॥
तस्य वाणैश्च चिच्छेद धनुर्गजकरोपमम् ।
लक्ष्मणो राक्षसेन्द्रस्य पञ्चभिर्निशितैस्तदा ॥ १६ ॥
इतना ही नहीं, लक्ष्मणने पाँच पैने बाण मारकर उस राक्षसराज के हाथीकी सूँड़के समान मोटे धनुषको भी काट डाला ॥
नीलमेघनिभांश्चास्य सदश्वान् पर्वतोपमान् ।
जघानाप्लुत्य गदया रावणस्य विभीषणः ॥ १७ ॥
तदनन्तर विभीषण ने उछलकर अपनी गदासे रावणके नीलमेघ के समान कान्तिवाले सुन्दर पर्वताकार घोड़ों को भी मार गिराया ॥ १७ ॥
हताश्वात् तु तदा वेगादवप्लुत्य महारथात् ।
कोपमाहारयत् तीव्रं भ्रातरं प्रति रावणः ॥ १८ ॥
घोड़ोंके मारे जानेपर रावण अपने विशाल रथसे वेग-पूर्वक कूद पड़ा और अपने भाईपर उसे बड़ा क्रोध आया ॥
ततः शक्तिं महाशक्तिः प्रदीप्तामशनीमिव ।
विभीषणाय चिक्षेप राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥ १ ९ ॥
तब उस महान् शक्तिशाली प्रतापी राक्षसराजने विभीषण-को मारने के लिये एक वज्र के समान प्रज्वलित शक्ति चलायी ॥
अप्राप्तामेव तां बाणैस्त्रिभिश्चिच्छेद लक्ष्मणः ।
अथोदतिष्ठत् संनादो वानराणां महारणे ॥ २० ॥
वह शक्ति अभी विभीषण तक पहुँचने भी नहीं पायी थी कि लक्ष्मणने तीन बाण मारकर उसे बीच में ही काट दिया । यह देख उस महासमर में वानरोंका महान् हर्षनाद गूँज उठा ॥ २० ॥
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१३६८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
सम्पपात त्रिधा छिन्ना शक्तिः काञ्चनमालिनी ।
सविस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केव दिवश्च्युता ॥ २१ ॥
सोनेकी मालासे अलंकृत वह शक्ति तीन भागों में विभक्त होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी, मानो आकाशसे चिनगारियोंसहित बड़ी भारी उल्का टूटकर गिरी हो ॥ २१ ॥
ततः सम्भाविततरां कालेनापि दुरासदाम् ।
जग्राह विपुलां शक्तिं दीप्यमानां स्वतेजसा ॥ २२ ॥
तदनन्तर रावण ने विभीषण को मारने के लिये एक ऐसी विशाल शक्ति हाथमें ली, जो अपनी अमोघताके लिये विशेष
विख्यात थी । काल भी उसके वेगको नहीं सह सकता था ।
वह शक्ति अपने तेजसे उद्दीप्त हो रही थी ॥ २२ ॥
सा वेगिता बलवता रावणेन दुरात्मना ।
जज्वाल सुमहातेजा दीप्ताशनिसमप्रभा ॥ २३ ॥
दुरात्मा बलवान् रावणके द्वारा हाथमें ली हुई वह वेग-शालिनी, महातेजस्विनी और वज्रके समान दीप्तिमती शक्ति अपने दिव्य तेजसे प्रज्वलित हो उठी ॥ २३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मणस्तं विभ षणम् ।
प्राणसंशयमापन्नं तूर्णमभ्यवपद्यत ॥ २४ ॥
इसी बीचमें विभीषणको प्राण संशयकी अवस्था में पड़ा देख वीर लक्ष्मणने तुरंत उनकी रक्षा की । उन्हें पीछे करके वे स्वयं शक्ति के सामने खड़े हो गये ॥ २४ ॥
तं विमोक्षयितुं वीरश्चापमायम्य लक्ष्मणः ।
रावणं शक्तिहस्तं वै शरवर्षैरवाकिरत् ॥ २५ ॥
विभीषण को बचानेके लिये वीर लक्ष्मण अपने धनुषको खींचकर हाथमें शक्ति लिये खड़े हुए रावणपर बाणोंकी वर्षा करने लगे || २५ ||
कीर्यमाणः शरौघेण विसृष्टेन महात्मना ।
न प्रहर्तु मनश्चक्रे विमुखीकृतविक्रमः ॥ २६ ॥
महात्मा लक्ष्मणके छोड़े हुए बाण - समूहों का निशाना बनकर रावण अपने भाईको मारनेके पराक्रमसे विमुख हो गया । अब उसके मन में प्रहार करनेकी इच्छा नहीं रह गयी ॥ २६ ॥
मोक्षितं भ्रातरं दृष्ट्रा लक्ष्मणेन स रावणः ।
लक्ष्मणाभिमुखस्तिष्ठन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ २७ ॥
लक्ष्मणने मेरे भाई को बचा लिया, यह देख रावण उनकी ओर मुँह करके खड़ा हो गया और इस प्रकार बोला- ॥२७ ॥
मोक्षितस्ते बलश्लाघिन् यस्मादेवं विभीषणः ।
विमुच्य राक्षसं शक्तिस्त्वयीयं विनिपात्यते ॥ २८ ॥
‘ अपने बलपर घमंड रखनेवाले लक्ष्मण! तुमने ऐसा प्रयास करके विभीषणको बचा लिया है, इसलिये अब उस राक्षसको छोड़कर मैं तुम्हारे ऊपर ही इस शक्तिका प्रहार करता हूँ ॥ २८ ॥
एषा ते हृदयं भित्त्वा शक्तिर्लोहितलक्षणा ।
मद्वाहुपरिघोत्सृष्टा प्राणानादाय यास्यति ॥ २ ९ ॥
" यह शक्ति स्वभावसे ही शत्रुओंके खूनसे नहाने वाली है, यह मेरे हाथसे छूटते ही तुम्हारे हृदयको विदीर्ण करके प्राणोंको अपने साथ ले जायगी ' ॥ २ ९ ॥
इत्येवमुक्त्वा तां शक्तिमप्रघण्टां महाखनाम् ।
मयेन मायाविहिताममोघां शत्रुघातिनीम् ॥ ३० ॥
लक्ष्मणाय समुद्दिश्य ज्वलन्तीमित्र तेजसा ।
रावणः परमक्रुद्धश्चिक्षेप च ननाद च ॥ ३१ ॥
ऐसा कहकर अत्यन्त कुपित हुए रावणने मयासुर की मायासे निर्मित, आठ घण्टोंसे विभूषित तथा महाभयंकर शब्द करनेवाली, उस अमोघ एवं शत्रुघातिनी शक्तिको, जो अपने तेजसे प्रज्वलित हो रही थी, लक्ष्मणको लक्ष्य करके चला दिया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ३०-३१ ॥
सा क्षिप्ता भीमवेगेन वज्राशनिसमस्वना ।
शक्तिरभ्यपतद् वेगालक्ष्मणं रणमूर्धनि ॥ ३२ ॥
वज्र और अशनि के समान गड़गड़ाहट पैदा करनेवाली वह शक्ति युद्ध के मुहानेपर भयानक वेगसे चलायी गयी और लक्ष्मणको वेगपूर्वक लगी ॥ ३२ ॥
तामनुव्याह रच्छक्तिमापतन्तीं स राघवः ।
स्वस्त्यस्तु लक्ष्मणायेति मोघा भव हतोद्यमा ॥ ३३ ॥
लक्ष्मण की ओर आती हुई उस शक्तिको लक्ष्य करके भगवान् श्रीरामने कहा- ' लक्ष्मणका कल्याण हो, तेरा प्राण-नाशविषयक उद्योग नष्ट हो; अतएव तू व्यर्थं हो जा ' ॥३३ ॥
रावणेन रणे शक्तिः क्रुद्धेनाशीविषोपमा ।
मुक्काऽऽशूरस्यभीतस्य लक्ष्मणस्य ममज सा ॥ ३४ ॥
वह शक्ति विषधर सर्पके ममान भयंकर थी । रणभूमि में कुपित हुए रावणने जब उसे छोड़ा, तब वह तुरंत ही निर्भय वीर लक्ष्मणकी छातीमें डूब गयी ॥ ३४ ॥
न्यपतत् सा महावेगा लक्ष्मणस्य महोरसि ।
जिह्वेवोरगराजस्य दीप्यमाना महाद्युतिः ॥ ३५ ॥
ततो रावण वेगेन सुदूरमवगाढया ।
शक्त्या विभिन्नहृदयः पपात भुवि लक्ष्मणः ॥ ३६ ॥
नागराज वासुकिकी जिह्वाके समान देदीप्यमान वह महातेजस्विनी और महावेगवती शक्ति जब लक्ष्मणके विशाल वक्षःस्थलपर गिरी, तब रावण के वेगसे बहुत गहराई तक धँस गयी । उस शक्तिसे हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण लक्ष्मण पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३५-३६ ॥
तदवस्थं समीपस्थो लक्ष्मणं प्रेक्ष्य राघवः ।
भ्रातृस्नेहान्महातेजा विषण्णहृदयोऽभवत् ॥ ३७ ॥
महातेजस्वी रघुनाथजी पास ही खड़े थे । वे लक्ष्मणको
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युद्धकाण्डे शततमः सर्गः १३६ ९ इस अवस्थामें देखकर भ्रातृस्नेहके कारण मन - ही - मन विषाद में डूब गये || ३७ ॥
स मुहूर्तमित्र ध्यात्वा बाष्पपर्याकुलेक्षणः ।
बभूव संरब्धतरो युगान्त इव पावकः ॥ ३८ ॥
वे दो घड़ी तक चिन्तामें डूबे रहे । फिर नेत्रोंमें आँसू भरकर प्रलयकाल में प्रज्वलित हुई अग्निके समान अत्यन्त रोषसे उद्दीप्त हो उठे ॥ ३८ ॥
न विषादस्य कालोऽयमिति संचिन्त्य राघवः ।
चक्रे सुतुमुलं युद्धं रावणस्य वधे धृतः ।
सर्वयत्नेन महता लक्ष्मणं परिवीक्ष्य च ॥ ३ ९ ॥
‘ यह विषादका समय नहीं है ' ऐसा सोचकर श्रीरघुनाथजी रावण के वधका निश्चय करके महान् प्रयत्नके द्वारा सारी शक्ति लगाकर और लक्ष्मणकी ओर देखकर अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे ॥ ३ ९ ॥
स ददर्श ततो रामः शतया भिन्नं महाहवे ।
लक्ष्मणं रुधिरादिग्धं सपन्नगमिवाचलम् ॥ ४० ॥
तत्पश्चात् श्रीरामने उस महासमर में शक्तिसे विदीर्ण हुए लक्ष्मणकी ओर देखा । वे खूनसे लथपथ होकर पड़े थे और सर्पयुक्त पर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ ४० ॥
तामपि प्रहितां शक्तिं रावणेन बलीयसा ।
यत्नतस्ते हरिश्रेष्ठा न शेकुरवमर्दितुम् ॥ ४१ ॥
अत्यन्त बलवान् रावणकी चलायी हुई उस शक्तिको लक्ष्मणकी छातीसे निकालनेके लिये बहुत प्रयत्न करनेपर भी वे श्रेष्ठ वानरगण सफल न हो सके ॥ ४१ ॥
अर्दिताश्चैव बाणौघैस्ते प्रवेकेण रक्षसाम् ।
सौमित्रेः सा विनिर्भिद्य प्रविष्टा धरणीतलम् ॥ ४२ ॥
क्योंकि वे वानर भी राक्षसशिरोमणि रावणके बाण - समूहों से बहुत पीड़ित थे । वह शक्ति सुमित्राकुमारके शरीरको विदीर्ण करके धरतीतक पहुँच गयी थी । ४२ ॥
तां कराभ्यां परामृश्य रामः शक्तिं भयावहाम् ।
बभञ्ज समरे क्रुद्धो बलवान् विचकर्ष च ॥ ४३ ॥
तब महाबली रघुनाथजीने उस भयंकर शक्तिको अपने अब्रवीच्च हनूमन्तं सुग्रीवं च महाकपिम् ॥ ४५ ॥
परंतु उन बाणोंकी परवा न करके लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर भगवान् श्रीराम हनुमान् और महाकपि सुग्रीवसे बोले – ॥ ४५ ॥
लक्ष्मणं परिवार्यैवं तिष्ठध्वं वानरोत्तमाः ।
पराक्रमस्य कालोऽयं सम्प्राप्तो मे चिरेप्सितः ॥ ४६ ॥
' कपिवरो! तुमलोग लक्ष्मणको इसी तरह सब ओरसे घेरकर खड़े रहो । अब मेरे लिये उस पराक्रमका अवसर आया है, जो मुझे चिरकालसे अभीष्ट था ॥ ४६ ॥
पापात्मायं दशग्रीवो वध्यतां पापनिश्चयः ।
काङ्क्षितं चातकस्येव धर्मान्ते मेघदर्शनम् ॥ ४७ ॥
" इस पापात्मा एवं पापपूर्ण विचार रखनेवाले दशमुख रावणको अब मार डाला जाय, यही उचित है । जैसे पपीहेको ग्रीष्म ऋतु अन्तमें मेघके दर्शनकी इच्छा रहती है, उसी प्रकार मैं भी इसका वध करनेके लिये चिरकालसे इसे देखना चाहता हूँ || ४७ ॥
अस्मिन् मुहूर्त नचिरात् सत्यं प्रतिशृणोमि वः ।
अरावणमरामं वा जगद् द्रक्ष्यथ वानराः ॥ ४८ ॥
" वानरो! मैं इस मुहूर्तमें तुम्हारे सामने यह सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि कुछ ही देर में यह संसार रावणसे रहित दिखायी देगा या रामसे ॥ ४८ ॥
राज्यनाशं वने वासं दण्डके परिधावनम् ।
वैदेह्याश्च परामर्शी रक्षोभिश्च समागमम् ॥ ४ ९ ॥
प्राप्तं दुःखं महाघोरं क्लेशश्च निरयोपमः ।
अद्य सर्वमहं त्यक्ष्ये निहत्वा रावणं रणे ॥ ५० ॥
" मेरे राज्यका नाश, वनका निवास, दण्डकारण्यकी दौड़-धूप, विदेहकुमारी सीताका राक्षसद्वारा अपहरण तथा राक्षसोंके साथ संग्राम- इन सबके कारण मुझे महाघोर दुःख सहना पड़ा है और नरकके समान कष्ट उठाना पड़ा है; किंतु रण-भूमिमें रावण का वध करके आज मैं सारे दुःखोंसे छुटकारा पा जाऊँगा ॥ ४ ९ -५० ॥ यदर्थं वानरं सैन्यं समानीतमिदं मया । सुग्रीवश्च कृतो राज्ये निहत्वा वालिनं रणे । दोनों हाथोंसे पकड़कर लक्ष्मणके शरीरसे निकाला और यदर्थं सागरः क्रान्तः सेतुर्बद्धश्च सागरे ॥ ५१ ॥
asa रणे पापश्चक्षुर्विषयमागतः ।
समराङ्गणमें कुपित हो उसे तोड़ डाला ॥ ४३ ॥
चक्षुर्विषयमागत्य नायं जीवितुमर्हति ॥ ५२ ॥
तस्य निष्कर्षतः शक्तिं रावणेन बलीयसा । मर्मभेदिनः ॥ ४४ ॥ " जिसके लिये मैं वानरोंकी यह विशाल सेना साथ लाया
शराः सर्वेषु गात्रेषु पातिता हूँ, जिसके कारण मैंने युद्धमें वालीका वध करके सुग्रीवको श्रीरामचन्द्रजी जब लक्ष्मणके शरीरसे शक्ति निकाल रहे राज्यपर बिठाया है तथा जिसके उद्देश्यसे समुद्रपर पुल बाँधा थे, उस समय महाबली रावण उनके सम्पूर्ण अङ्गौपर मर्मभेदी और उसे पार किया, वह पापी रावण आज युद्धमें मेरी बाणोंकी वर्षा करता रहा || ४४ ॥ आँखोंके सामने उपस्थित है । मेरे दृष्टिपथमें आकर अब यह अचिन्तयित्वा तान् बाणान् समाश्लिष्य च लक्ष्मणम् । जीवित रहने योग्य नहीं है ॥ ५१-५२ ॥ बा ० रा ० ५.१०.१०-
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१३७० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
दृष्टिं दृष्टिविषस्येव सर्पस्य मम रावणः ।
यथा वा वैनतेयस्य दृष्टि प्राप्तो भुजंगमः ॥ ५३ ॥
' दृष्टिमात्र से संहारकारी विषका प्रसार करनेवाले सर्पकी आँखोंके सामने आकर जैसे कोई मनुष्य जीवित नहीं बच सकता अथवा जैसे विनतानन्दन गरुड़की दृष्टिमें पड़कर कोई महान् सर्वं जीवित नहीं बच सकता, उसी प्रकार आज रावण मेरे सामने आकर जीवित या सकुशल नहीं लौट सकता ॥ ५३ ॥
सुखं पश्यत दुर्धषां युद्धं वानरपुङ्गवाः ।
आसीनाः पर्वताग्रेषु ममेदं रावणस्य च ॥ ५४ ॥
' दुर्धर्षं वानरशिरोमणियो! अब तुमलोग पर्वतके शिखरोंपर बैठकर मेरे और रावणके इस युद्धको सुखपूर्वक देखो || ५४ ॥
अद्य पश्यन्तु रामस्य रामत्वं मम संयुगे ।
यो लोकाः सगन्धर्वाः सदेवाः सर्षिचारणाः ॥ ५५ ॥
‘ आज संग्राममें देवता, गन्धर्वं, सिद्ध, ऋषि और चारणों-सहित तीनों लोकोंके प्राणी रामका रामत्व देखें ॥ ५५ ॥
अद्य कर्म करिष्यामि यल्लोकाः सचराचराः ।
सदेवाः कथयिष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति ।
समागम्य सदा लोके यथा युद्धं प्रवर्तितम् ॥ ५६ ॥
' आज मैं वह पराक्रम प्रकट करूँगा, जिसकी जबतक यह पृथ्वी कायम रहेगी, तबतक चराचर जगत् के जीव और देवता भी सदा लोक में एकत्र होकर चर्चा करेंगे और जिस प्रकार युद्ध हुआ है, उसे एक दूसरेसे कहेंगे ' ॥ ५६ ॥
एवमुक्त्वा शितैर्बाणैस्तप्तकाञ्चनभूषणैः ।
आजघान रणे रामो दशग्रीवं समाहितः ॥ ५७ ॥
ऐसा कहकर भगवान् श्रीराम सावधान हो अपने सुवर्ण-भूषित तीखे बाणोंसे रणभूमिमें दशानन रावणको घायल करने लगे ॥ ५७ ॥
तथा प्रदीप्तैर्नाराचैर्मुसलैश्चापि रावणः ।
अभ्यवर्षत् तदा रामं धाराभिरिव तोयदः ॥ ५८ ॥
इसी प्रकार जैसे मेघ जलकी धारा गिराता है, उसी तरह रावण भी श्रीरामपर चमकीले नाराचों और मूसलोंकी वर्षा करने लगा ॥ ५८ ॥
रामरावणमुक्तानामन्योन्यमभिनिघ्नताम् वराणां च शराणां च बभूव तुमुलः स्वनः ॥ ५ ९ ॥ एक दूसरे पर चोट करते हुए राम और रावण के छोड़े हुए श्रेष्ठ बाणके परस्पर टकरानेसे बड़ा भयंकर शब्द प्रकट होता था ॥ ५ ९ ॥
विच्छिन्नाश्च विकीर्णाश्च रामरावणयोः शराः ।
अन्तरिक्षात् प्रदीप्ताग्रा निपेतुर्धरणीतले ॥ ६० ॥
श्रीराम और रावण के बाण परस्पर छिन्न - भिन्न होकर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़ते थे । उस समय उनके अग्रभाग बड़े उद्दीप्त दिखायी देते थे ॥ ६० ॥
तयोर्ज्यातलनिर्घोषो रामरावणयोर्महान् ।
त्रासनः सर्वभूतानां बभूवाद्भुतोपमः ॥ ६१ ॥
राम और रावणके धनुषकी प्रत्यञ्चासे प्रकट हुई महान् टंकारध्वनि समस्त प्राणियों के मनमें त्रास उत्पन्न कर देती थी और बड़ी अद्भुत प्रतीत होती थी ॥ ६१ ॥
स कीर्यमाणः शरजालवृष्टिभि -महात्मना दीप्तधनुष्मतार्दितः । भयात् प्रदुद्राव समेत्य रावणो यथानिलेनाभिहतो बलाहकः ॥ ६२ ॥
जैसे वायुके थपेड़े खाकर मेघ छिन्न - भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार दीप्तिमान् धनुष धारण करनेवाले महात्मा श्रीराम बाण - समूहोंकी वर्षासे आहत एवं पीड़ित हुआ रावण भयके मारे वहाँसे भाग गया ॥ ६२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे शततमः सर्गः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यकं युद्धकाण्ड में सौवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०० ॥
एकाधिकशततमः सर्गः श्रीरामका विलाप तथा हनुमान्जीकी लायी हुई ओषधिके सुषेणद्वारा किये गये प्रयोगसे लक्ष्मणका सचेत हो उठना शक्त्या निपातितं दृष्ट्वा रावणेन बलीयसा । थे । यह देख भगवान् श्रीरामने दुरात्मा रावणके साथ घोर लक्ष्मणं समरे शूरं शोणितौघपरिप्लुतम् ॥ १ ॥ युद्ध करके बाण - समूहोंकी वर्षा करते हुए ही सुषेणसे इस
स दत्त्वा तुमुलं युद्धं रावणस्य दुरात्मनः । प्रकार कहा- ॥ १-२ ॥
विसृजन्नेव बाणौघान् सुषेणमिदमब्रवीत् ॥ २ ॥ एष रावणवीर्येण लक्ष्मणः पतितो भुवि ।
महाबली रावणने शूरवीर लक्ष्मणको अपनी शक्तिसे सर्पवच्चेष्टते वीरो मम शोकमुदीरयन् ॥ ३ ॥
युद्धमें धराशायी कर दिया था । वे रक्तके प्रवाहसे नहा उठे " ये वीर लक्ष्मण रावणके पराक्रमसे घायल होकर पृथ्वीपर
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युद्धकाण्डे एकाधिकशततमः सर्गः १३७१ बिखेर दें तो भी वे उसके मनमें कौन - सा आह्लाद पैदा कर
पड़े हैं और चोट खाये हुए सर्पकी भाँति छटपटा रहे हैं ।
इस अवस्थामें इन्हें देखकर मेरा शोक बढ़ता जा रहा है ॥ ३ ॥
शोणितार्द्रमिमं वीरं प्राणैः प्रियतरं मम ।
पश्यतो मम का शक्तिर्योद्धुं पर्याकुलात्मनः ॥ ४ ॥
" ये वीर सुमित्राकुमार मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं, देखकर मेरा मन व्याकुल हो रहा है, ऐसी इन्हें लहूलुहान दशामें मुझमें युद्ध करनेकी शक्ति क्या होगी १ ॥ ४ ॥
अयं स समरश्लाघी भ्राता मे शुभलक्षणः ।
यदि पञ्चत्वमापन्नः प्राणैर्मे किं सुखेन वा ॥ ५ ॥
' ये मेरे शुभलक्षण भाई, जो सदा युद्धका हौसला रखते थे, यदि मर गये तो मुझे इन प्राणोंके रखने और सुख भोगने से क्या प्रयोजन है १ ॥ ५ ॥
लज्जतीव हि मे वीर्यं भ्रश्यतीव कराद् धनुः ।
सायका व्यवसीदन्ति दृष्टिर्वाष्पवशं गता ॥ ६ ॥
" इस समय मेरा पराक्रम लजित - सा हो रहा है, हाथसे धनुष खसकता - सा जा रहा है, मेरे सायक शिथिल हो रहे हैं और नेत्रोंमें आँसू भर आये हैं ॥ ६ ॥
अवसीदन्ति गात्राणि स्वप्नयाने नृणामिव ।
चिन्ता मे वर्धते तीव्रा मुमूर्षापि च जायते ॥ ७ ॥
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा रावणेन दुरात्मना ।
विष्टनन्तं तु दुःखार्त मर्मण्यभिहतं भृशम् ॥ ८ ॥
‘ जैसे स्वप्नमें मनुष्योंके शरीर शिथिल हो जाते हैं, वही दशा मेरे इन अङ्गोंकी है । मेरी तीव्र चिन्ता बढ़ती जा रही है और दुरात्मा रावणके द्वारा घायल होकर मार्मिक आघातसे सकेंगे? ॥ ११ ॥
किं मे युद्धेन किं प्राणैर्युद्धकार्य न विद्यते ।
यत्रायं निहतः शेते रणमूर्धनि लक्ष्मणः ॥ १२ ॥
' अब इस युद्ध से अथवा प्राणोंकी रक्षासे मुझे क्या प्रयोजन ? अब लड़ने - भिड़नेकी कोई आवश्यकता नहीं है । जब है संग्रामके मुहाने पर मारे जाकर लक्ष्मण ही सदाके लिये सो गये, तब युद्ध जीतने से क्या लाभ है? ॥ १२ ॥
यथैव मां वनं यान्तमनुयाति महाद्युतिः ।
अहमप्यनुयास्यामि तथैवैनं यमक्षयम् ॥ १३ ॥
' वनमें आते समय जैसे महातेजस्वी लक्ष्मण मेरे पीछे-पीछे चले आये थे, उसी तरह यमलोकमें जाते समय मैं भी इनके पीछे - पीछे जाऊँगा ॥ १३ ॥
बन्धुजनो नित्यं मां स नित्यमनुव्रतः ।
इमामवस्थां गमितो राक्षसैः कूटयोधिभिः ॥ १४ ॥
' हाय! जो सदा मुझमें अनुराग रखनेवाले मेरे प्रिय बन्धुजन थे, छलसे युद्ध करनेवाले निशाचरोंने आज उनकी यह दशा कर दी ॥ १४ ॥
देशे देशे कलत्राणि देशे देशे च बान्धवाः ।
तं तु देशं न पश्यामि यत्र भ्राता सहोदरः ॥ १५ ॥
' प्रत्येक देशमें स्त्रियाँ मिल सकती हैं, देश - देशमें जाति-भाई उपलब्ध हो सकते हैं; परंतु ऐसा कोई देश ' मुझे नहीं दिखायी देता, जहाँ सहोदर भाई मिल सके ॥ १५ ॥
किं नु राज्येन दुर्धर्षलक्ष्मणेन विना मम ।
कथं वक्ष्याम्यहं त्वम्बां सुमित्रां पुत्रवत्सलाम् ॥ १६ ॥
अत्यन्त पीड़ित एवं दुःखातुर हुए भाई लक्ष्मणको कराहते ' दुर्धर्ष वीर लक्ष्मणके बिना मैं राज्य लेकर क्या करूँगा? देख मुझे मर जाने की इच्छा हो रही है ' ॥ ७-८ ॥ पुत्रबत्सला माता सुमित्रासे किस तरह बात कर सकूँगा १ ॥ १६ ॥
राघवो भ्रातरं दृष्ट्रा प्रियं प्राणं बहिश्चरम् । उपालम्भं न शक्ष्यामि सोढुं दत्तं सुमित्रया । दुःखेन महताविष्टो ध्यानशोकपरायणः ॥ ९ ॥ किं नु वक्ष्यामि कौसल्यां मातरं किं नु कैकयीम् ॥ १७ ॥
श्रीरघुनाथजी बाहर विचरनेवाले प्राणोंके समान प्रिय भाई ' माता सुमित्राके दिये हुए उलाहनेको कैसे सह सकूँगा? लक्ष्मणको इस अवस्थामें देख महान् दुःखसे व्याकुल हो गये, माता कौसल्या और कैकेयीको क्या जवाब दूँगा? ॥ १७ ॥
चिन्ता और शोक में डूब गये ॥ ९ ॥ भरतं किं नु वक्ष्यामि शत्रुघ्नं च महाबलम् ।
परं विषादमापन्नो विललापाकुलेन्द्रियः । सह तेन वनं यातो विना तेनागतः कथम् ॥ १८ ॥
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा लक्ष्मणं रणपांसुषु ॥ १० ॥ ' भरत और महाबली शत्रुघ्न जब पूछेंगे कि आप लक्ष्मण-उनके मनमें बड़ा विषाद हुआ । इन्द्रियोंमें व्याकुलता के साथ वनमें गये थे, फिर उनके बिना ही कैसे लौट आये
छा गयी और वे रणभूमिकी धूलमें घायल होकर पड़े हुए तो उन्हें मैं क्या उत्तर दूँगा १ ॥ १८ ॥
भाई लक्ष्मणकी ओर देखकर विलाप करने लगे- ॥ १० ॥ इहैव मरणं श्रेयो न तु बन्धुविगर्हणम् ॥ किं मया दुष्कृतं कर्म कृतमन्यत्र जन्मनि ॥ १ ९ ॥
विजयो s पि हि मे शूर न प्रियायोपकल्पते भ्राता निहतश्चाग्रतः स्थितः । कां प्रीतिं जनयिष्यति ॥ ११ ॥ येन मे धार्मिको
अचक्षुर्विषयश्चन्द्रः मुझे ' अतः मेरे लिये यहीं मर जाना अच्छा है । भाई-' शूरवीर! अब संग्राम में विजय भी मिल जाय जाकर उनकी कही हुई खोटी - खरी बातें सुनना प्रसन्नता नहीं होगी । अन्धेके सामने चन्द्रमा अपनी चाँदनी बन्धुओंमें
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१३७२ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे अच्छा नहीं । मैंने पूर्वजन्म में कौन - सा अपराध किया था, जिसके कारण मेरे सामने खड़ा हुआ मेरा धर्मात्मा भाई मारा गया ॥ १ ९ ३ ॥ हा भ्रातर्मनुजश्रेष्ठ शूराणां प्रवर प्रभो ॥ २० ॥
एकाकी किं नु मां त्यक्त्वा परलोकाय गच्छसि । ' हा भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! हा प्रभावशाली शूरप्रवर! तुम मुझे छोड़कर अकेले क्यों परलोकमें जा रहे हो? ॥२०३ ॥
विलपन्तं च मां भ्रातः किमर्थ नावभावसे ॥ २१ ॥
उत्तिष्ठ पश्य किं शेषे दीनं मां पश्य चक्षुषा । ' भैया! मैं तुम्हारे बिना रो रहा हूँ । तुम मुझसे बोलते
क्यों नहीं हो? प्रिय बन्धु! उठो । आँख खोलकर देखो ।
क्यों सो रहे हो? मैं बहुत दुखी हूँ । मुझपर दृष्टिपात करो ॥
शोकार्तस्य प्रमत्तस्य पर्वतेषु वनेषु च ॥ २२ ॥
विषण्णस्य महाबाहो समाश्वासयिता मम । ' महाबाहो! पर्वतों और वनोंमें जब मैं शोकसे पीड़ित हो प्रमत्त एवं विषादग्रस्त हो जाता था, तब तुम्हीं मुझे धैर्य बँधाते थे ( फिर इस समय मुझे क्यों नहीं सान्त्वना देते हो? ) ' ॥ २२३ ॥
राममेवं ब्रुवाणं तु शोकव्याकुलितेन्द्रियम् ॥ २३ ॥
आश्वासयन्नुवाचेदं सुषेणः परमं वचः । इस तरह विलाप करते हुए भगवान् श्रीरामकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी थीं । उस समय सुषेणने उन्हें आश्वासन देते हुए यह उत्तम बात कही ॥ २३३ ॥
त्यजेमां नरशार्दूल बुद्धि वैक्लव्यकारिणीम् ॥ २४ ॥
शोकसंजननीं चिन्तां तुल्यां वाणैश्चमूमुखे । ' पुरुषसिंह! व्याकुलता उत्पन्न करनेवाली इस चिन्तायुक्त बुद्धिका परित्याग कीजिये; क्योंकि युद्धके मुहानेपर की हुई चिन्ता बाणोंके समान होती है और केवल शोकको जन्म देती है ॥ २४३ ॥
नैव पञ्चत्वमापन्नो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः ॥ २५ ॥
नहास्य विकृतं वक्त्रं न च श्यामत्वमागतम् ।
सुप्रभं च प्रसन्नं च मुखमस्य निरीक्ष्यताम् ॥ २६ ॥
' आपके भाई शोभावर्द्धक लक्ष्मण मरे नहीं हैं । देखिये, इनके मुखकी आकृति अभी बिगड़ी नहीं है और न इनके चेहरेपर कालापन ही आया है । इनका मुख प्रसन्न एवं कान्तिमान् दिखायी दे रहा है ॥ २५-२६ ॥
पद्मपत्रतलौ हस्तौ सुप्रसन्ने च लोचने ।
नेदृशं दृश्यते रूपं गतासूनां विशां पते ॥ २७ ॥
" इनके हाथों की हथेलियाँ कमल - जैसी कोमल हैं, आँखें भी बहुत साफ हैं । प्रजानाथ! मरे हुए प्राणियोंका ऐसा रूप नहीं देखा जाता है ॥ २७ ॥
विषादं मा कृथा वीर सप्राणोऽयमरिंदम ।
आख्याति तु प्रसुप्तस्य स्रस्तगात्रस्य भूतले ॥ २८ ॥
सोच्छ्वासं हृदयं वीर कम्पमानं मुहुर्मुहुः । ' शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर! आप विषाद न करें । इनके शरीरमें प्राण हैं 1 । वीर! ये सो गये हैं । इनका शरीर शिथिल होकर भूतलपर पड़ा है । साँस चल रही है और हृदय
बारंबार कम्पित हो रहा है — उसकी गति बंद नहीं हुई है ।
यह लक्षण इनके जीवित होने की सूचना दे रहा है ' ॥ २८३ ॥
एवमुक्त्वा महाप्राज्ञः सुषेणो राघवं वचः ॥ २ ९ ॥
समीपस्थमुवाचेदं हनूमन्तं महाकपिम् । श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् सुषेणने पास ही खड़े हुए महाकपि हनुमान् जीसे कहा- ॥ २ ९ ३ ॥ सौम्य शीघ्रमितो गत्वा पर्वतं हि महोदयम् ॥ ३० ॥
पूर्व तु कथितो योऽसौ वीर जाम्बवता तव ।
दक्षिणे शिखरे जातां महौषधिमिहानय ॥ ३१ ॥
विशल्यकरणीं नाम्ना सावर्ण्यकरणीं तथा ।
संजीवकरणीं वीर संधानीं च महौषधीम् ॥ ३२ ॥
संजीवनार्थे वीरस्य लक्ष्मणस्य त्वमानय । ' सौम्य! तुम शीघ्र ही यहाँसे महोदय पर्वतपर, जिसका पता जाम्बवान् तुम्हें पहले बता चुके हैं, जाओ और उसके दक्षिण शिखरपर उगी हुई विशल्यकरणी, सावर्ण्यकरणी, संजीवकरणी तथा संधानी नामसे प्रसिद्ध महौषधियोंको यहाँ ले आओ । वीर! उन्हींसे वीरवर लक्ष्मण के जीवनकी रक्षा होगी ' ॥
इत्येवमुक्तो हनुमान् गत्वा चौषधिपर्वतम् ।
चिन्तामभ्यगमच्छ्रीमानजानंस्ता महौषधीः ॥ ३३ ॥
उनके ऐसा कहनेपर हनुमानजी ओषधिपर्वत ( महोदय-गिरि ) पर गये; परंतु उन महौषधियोंको न पहचाननेके कारण वे चिन्तामें पड़ गये ॥ ३३ ॥
तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना मारुतेरमितौजसः ।
इदमेव गमिष्यामि गृहीत्वा शिखरं गिरेः ॥ ३४ ॥
इसी समय अमित तेजस्वी हनुमान्जीके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ' मैं पर्वतके इस शिखरको ही ले चलूँ ॥ ३४ ॥
अस्मिंस्तु शिखरे जातामोषधीं तां सुखावहाम् ।
प्रतर्केणावगच्छामि सुषेणो ह्येवमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
' इसी शिखरपर वह सुखदायिनी ओषधि उत्पन्न होती होगी, ऐसा मुझे अनुमानतः ज्ञात होता है; क्योंकि सुषेणने ऐसा ही कहा था ॥ ३५ ॥
१. शरीर में धँसे हुए बाण आदिको निकालकर घाव भरने और पीड़ा दूर करनेवाली । २. शरीर में पहले की सी रंगत लानेवाली । ३. मूर्छा दूर कर चेतना प्रदान करनेवाली । ४. टूटी हुई हड्डियों को जोड़नेवाली ।
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सर्गः १३७३ युद्धकाण्डे एकाधिकशततमः संहार करनेवाले लक्ष्मण के सारे शरीर में बाण धँसे अगृह्य यदि गच्छामि विशल्यकरणीमहम् । शत्रुका उस ओषधिको सूँघते ही उनके शरीर-कालात्ययेन दोषःस्याद् वैक्लव्यं च महद्भवेत् ॥ ३६ ॥ हुए थे । उस अवस्थामें हो शीघ्र ही भूतलसे उठकर
बिना ही लौट जाऊँ तो अधिक से बाण निकल गये और वे नीरोग ‘ यदि विशल्यकरणीको लिये समय बीतनेसे दोषकी सम्भावना है और उससे बड़ी भारी घबराहट हो सकती है ' ॥ ३६ ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् गत्वा क्षिप्रं महाबलः ।
आसाद्य पर्वतश्रेष्ठं त्रिः प्रकम्प्य गिरेः शिरः ॥ ३७ ॥
फुल्लनानातरुगणं समुत्पाट्य महाबलः ।
हरिशार्दूलो हस्ताभ्यां समतोलयत् ॥ ३८ ॥
गृहीत्वा ऐसा सोचकर महाबली हनुमान् तुरंत उस श्रेष्ठ पर्वतके पास जा पहुँचे और उसके शिखरको तीन बार हिलाकर उसे उखाड़ लिया । उसके ऊपर नाना प्रकारके वृक्ष खिले हुए थे । वानरश्रेष्ठ महाबली हनुमान् ने उसे दोनों हाथोंपर उठाकर तौला ॥ ३७-३८ ॥
स नीलमिव जीमूतं तोयपूर्ण नभस्तलात् ।
गृहीत्वा तु हनूमाशिखरं गिरेः ॥ ३ ९ ॥
उत्पपात जलसे भरे हुए नीले मेघके समान उस पर्वतशिखरको लेकर हनुमानजी ऊपरको उछले ॥ ३ ९ ॥
समागम्य महावेगः संन्यस्य शिखरं गिरेः ।
विश्रम्य किंचिद्धनुमान् सुषेणमिदमब्रवीत् ॥ ४० ॥
उनका वेग महान् था । उस शिखरको सुषेणके पास पहुँचाकर उन्होंने पृथ्वीपर रख दिया और थोड़ी देर विश्राम करके हनुमान् जीने सुषेणसे इस प्रकार कहा— ॥ ४० ॥
औषधीर्नाव गच्छामि ता अहं हरिपुङ्गव ।
तदिदं शिखरं कृत्स्नं गिरेस्तस्याहृतं मया ॥ ४१ ॥
‘ कपिश्रेष्ठ! मैं उन ओषधियोंको पहचानता नहीं हूँ इसलिये उस पर्वतका सारा शिखर ही लेता आया हूँ ' ॥ ४१ ॥
एवं कथयमानं तु प्रशस्य पवनात्मजम् ।
सुषेणो वानरश्रेष्ठो जग्राहोत्पाट्य चौषधीः ॥ ४२
खड़े हो गये । ४५ ॥
तमुत्थितं तु हरयो भूतलात् प्रेक्ष्य लक्ष्मणम् ।
सुप्रीता लक्ष्मणं प्रत्यपूजयन् ॥ ४६ ॥
साधुसाध्विति लक्ष्मणको भूतलसे उठकर खड़ा हुआ देख वे वानर प्रसन्न हो ' साधु - साधु ' कहकर उनकी भूरि - भूरि अत्यन्त प्रशंसा करने लगे ॥ ४६ ॥
एह्येहीत्यब्रवीद् रामो लक्ष्मणं परवीरहा ।
बाष्पपर्याकुलेक्षणः ॥ ४७ ॥
सखजे गाढमालिङ्गन्य तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा- ' आओ - आओ ' ऐसा कहकर उन्होंने उन्हें दोनों भुजाओंमें भर लिया और गाढ़ आलिंगन करके हृदयसे लगा लिया । उस समय उनके नेत्रों में आँसू छलक रहे थे ॥ ४७ ॥
अब्रवीच्च परिष्वज्य सौमित्र राघवस्तदा ।
दिष्टया त्वां वीर पश्यामि मरणात् पुनरागतम् ॥ ४८ ॥
सुमित्राकुमारको हृदयसे लगाकर श्रीरघुनाथजीने कहा-' वीर! बड़े सौभाग्यकी बात है कि मैं तुम्हें मृत्युके मुखसे पुनः लौटा हुआ देखता हूँ ॥ ४८ ॥
नहि मे जीवितेनार्थः सीतया च जयेन वा ।
को हि मे जीवितेनार्थस्त्वयि पञ्चत्वमागते ॥ ४ ९ ॥
' तुम्हारे बिना मुझे जीवनकी रक्षासे, सीतासे अथवा विजयसे भी कोई मतलब नहीं है । जब तुम्हीं नहीं रहोगे, तब । मैं इस जीवनको रखकर क्या करूँगा? ' ॥ ४ ९ ॥
इत्येवं ब्रुवतस्तस्य राघवस्य महात्मनः ।
खिन्नः शिथिलया वाचा लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् ॥५० ॥
॥ महात्मा रघुनाथजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण खिन्न हो ऐसा कहते हुए हनुमान्जीकी भूरि - भूरि प्रशंसा करके शिथिल वाणीमें धीरे - धीरे बोले - ॥ ५० ॥
वानरश्रेष्ठ सुषेणने उन ओषधियोंको उखाड़ लिया ॥ ४२ ॥ तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय पुरा सत्यपराक्रम ।
विस्मितास्तु बभूवुस्ते सर्वे वानरपुङ्गवाः । लघुः कश्चिदिवासत्त्वो नैवं त्वं वक्कमर्हसि ॥ ५१ ॥
दृष्ट्वा तु हनुमत्कर्म सुरैरपि सुदुष्करम् ॥ ४३ ॥ " आर्य! आप सत्यपराक्रमी हैं । आपने पहले रावणका
हनुमान जीका वह कर्म देवताओंके लिये भी अत्यन्त वध करके विभीषणको लङ्काका राज्य देनेकी प्रतिज्ञा की थी । दुष्कर था । उसे देखकर समस्त वानरयूथपति बड़े विस्मित वैसी प्रतिज्ञा करके अब किसी ओछे और निर्बल मनुष्य की हुए ॥ ४३ ॥ भाँति आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ५१ ॥
ततः संक्षोदयित्वा तामोषधीं वानरोत्तमः । नहि प्रतिज्ञां कुर्वन्ति वितथां सत्यवादिनः । लक्ष्मणस्य ददौ स्तः सुषेणः सुमहाद्युतिः ॥ ४४ ॥ हि महत्त्वस्य प्रतिज्ञापरिपालनम् ॥ ५२ ॥
महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ सुषेणने उस ओषधिको कूट - पीसकर लक्षणं च नालं ते मत्कृतेऽनघ । लक्ष्मणजीकी नाक में दे दिया ॥ ४४ ॥ नैराश्यमुपगन्तुं प्रतिज्ञामनुपालय ॥ ५३ ॥
सशल्यः स समाघ्राय लक्ष्मणः परवीरहा । वधे रावणस्याद्य झूठी प्रतिज्ञा नहीं करते हैं । प्रतिज्ञाका विशल्यो विरुजः शीघ्रमुदतिष्ठन्महीतलात् ॥ ४५ ॥ ' सत्यवादी पुरुष
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१३७४ श्रीमवाल्मीकीय रामाय पालन ही बड़प्पनका लक्षण है । निष्पाप रघुवीर! मेरे लिये आपको इतना निराश नहीं होना चाहिये । आज रावणका वध करके आप अपनी प्रतिज्ञा पूरी कीजिये ॥ ५२-५३ ॥
न जीवन यास्यते शत्रुस्तव वाणपथं गतः ।
नर्दतस्तीक्ष्णदंष्ट्रस्य सिंहस्येव महागजः ॥ ५४ ॥
' आपके बाणोंका लक्ष्य बनकर शत्रु जीवित नहीं लौट सकता । ठीक उसी तरह, जैसे गरजते हुए तीखी दाढ़वाले सिंह के सामने आकर महान् गजराज जीवित सकता ॥ ५४ ॥
अहं तु वधमिच्छामि शीघ्रमस्य दुरात्मनः यावदस्तं न यात्येष कृतकर्मा दिवाकरः " ये सूर्यदेव अपने दिनभरका भ्रमणकार्य इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये इस प्रकार श्रीबाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण नहीं रह
।
॥ ५५ ॥
पूरा करके आदिकाव्ये आदिकाव्यके अस्ताचलको नहीं चले जाते, तबतक ही जितना शीघ्र सम्भव हो सके, मैं उस दुरात्मा रावणका वध देखना चाहता हूँ । ५५ ॥ यदि वधमिच्छसि रावणस्य संख्ये यदि च कृतां हि तवेच्छसि प्रतिज्ञाम् । यदि तव राजसुताभिलाष आर्य कुरु च वचो मम शीघ्रमद्य वीर ॥५६ ॥
' आर्य! वीरवर! यदि आप युद्धमें रावणका वध करना चाहते हैं, यदि आपके मनमें अपनी प्रतिज्ञाको पूरी करने की इच्छा है तथा आप राजकुमारी सीताको पानेकी अभिलाषा रखते हैं तो आज शीघ्र ही रावणको मारकर मेरी प्रार्थना सफल करें ' ॥ ५६ ॥
युद्धकाण्डे एकाधिकशततमः सर्गः ॥ १०१ ॥
युद्धकाण्ड में एक सौ एकवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०१ ॥
द्वयधिकशततमः सर्गः इन्द्रके भेजे हुए रथपर बैठकर
लक्ष्मणेन तु तद् वाक्यमुक्तं श्रुत्वा स राघवः ।
संदधे परवीरघ्नो धनुरादाय वीर्यवान् ॥ १ ॥
लक्ष्मणकी कही हुई उस बातको सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पराक्रमी श्रीरामने धनुष लेकर उसपर बाणोंका संधान किया ॥ १ ॥
रावणाय शरान् घोरान् विससर्ज चमूमुखे ।
अथान्यं रथमास्थाय रावणो राक्षसाधिपः ॥ २ ॥
अभ्यधावत काकुत्स्थं स्वर्भानुरिव भास्करम् । उन्होंने सेना के मुहानेपर रावणको लक्ष्य करके उन भयंकर बाणोंको छोड़ना आरम्भ किया । इतनेमें राक्षसराज रावण भी दूसरे रथपर सवार हो श्रीरामपर उसी तरह चढ़ आया, जैसे राहु सूर्य पर आक्रमण करता है ॥ २३ ॥
दशग्रीवो रथस्थस्तु रामं वज्रोपमैः शरैः ।
आजघान महाशैलं धाराभिरिव तोयदः ॥ ३ ॥
दशमुख रावण रथपर बैठा हुआ था । वह अपने वज्रोपम बाणोंद्वारा श्रीरामको उसी तरह बींधने लगा, जैसे मेघ किसी महान् पर्वतपर जलकी धारावाहिक वृष्टि करता है ॥
दीप्तपावकसंकाशैः शरैः काञ्चनभूषणैः ।
अभ्यवर्षद् रणे रामो दशग्रीवं समाहितः ॥ ४ ॥
श्रीरामचन्द्रजी भी एकाग्रचित्त हो रणभूमिमें दशमुख रावणपर प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी सुवर्णभूषित बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ४ ॥
भूमौ स्थितस्य रामस्य रथस्थस्य स रक्षसः ।
न समं युद्धमित्याहुर्देवगन्धर्वकिंनराः ॥ ५ ॥
श्रीरामका रावणके साथ युद्ध करना ' श्रीरघुनाथजी भूमिपर खड़े हैं और वह राक्षस रथपर बैठा हुआ है, ऐसी दशामें इन दोनोंका युद्ध बराबर नहीं है ' वहाँ आकाशमें खड़े हुए देवता, गन्धर्व और किन्नर इस तरहकी बातें करने लगे ॥ ५ ॥
ततो देववरः श्रीमान्श्रुत्वा तेषां वचोऽमृतम् ।
आहूय मातलिं शक्रो वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ६ ॥
उनकी ये अमृत के समान मधुर बातें सुनकर तेजस्वी देवराज इन्द्रने मातलिको बुलाकर कहा ॥ ६ ॥।
रथेन मम भूमिष्ठं शीघ्रं याहि रघूत्तमम् ।
आहूय भूतलं यातः कुरु देवहितं महत् ॥ ७ ॥
' सारथे! रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी भूमिपर खड़े हैं । मेरा रथ लेकर तुम शीघ्र उनके पास जाओ । भूतलपर पहुँच कर श्रीरामको पुकारकर कहो — ' यह रथ देवराजने आपकी सेवामें भेजा है । " इस तरह उन्हें रथपर बिठाकर तुम देवताओंके महान् हितका कार्यं सिद्ध करो ' ॥ ७ ॥
इत्युक्तो देवराजेन मातलिर्देवसारथिः ।
प्रणम्य शिरसा देवं ततो वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥
देवराजके इस प्रकार कहनेपर देव सारथि मातलिने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और यह बात कही ॥ ८ ॥
शीघ्रं यास्यामि देवेन्द्र सारथ्यं च करोम्यहम् ।
ततो हयैश्च संयोज्य हरितैः स्यन्दनोत्तमम् ॥ ९ ॥
" देवेन्द्र! मैं शीघ्र ही आपके उत्तम रथमें हरे रंगके घोड़े जोतकर उसे साथ लिये जाऊँगा और श्रीरघुनाथजी के सारथिका कार्य भी करूँगा ' ॥ ९ ॥
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सर्गः १३७५ युद्धकाण्डे द्वत्यधिकशततमः ततः काञ्चनचित्राङ्गः किङ्किणीशतभूषितः ।
तरुणादित्यसंकाशो वैदूर्यमय बरः ।
सदश्वैः काञ्चनापीडैर्युक्तः श्वेतप्रकीर्णकैः ॥ १० ॥
हरिभिः सूर्यसंकाशैर्हेमजालविभूषितैः ।
रुक्मवेणुध्वजः श्रीमान् देवराजरथो वरः ॥ ११ ॥
देवराजेन संदिष्टो रथमारुह्य मातलिः ।
अभ्यवर्तत काकुत्स्थमवतीर्य त्रिविष्टपात् ॥ १२ ॥
तदनन्तर देवराज इन्द्रका जो शोभाशाली श्रेष्ठ रथ है, जिसके सभी अवयव सुवर्णमय होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करते हैं, जिसे सैकड़ों घुंघुरुओंसे विभूषित किया गया है, जिसकी कान्ति प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण है, जिसके कूबरमें वैदूर्यमणि ( नीलम ) जड़ी गयी है, जिसमें सूर्य तुल्य तेजस्वी, हरे रंगवाले, सुवर्णजालसे विभूषित तथा सोनेके साज - बाजसे सजे हुए अच्छे घोड़े जुते हैं और उन घोड़ोंको श्वेत चँवर आदिसे अलंकृत किया गया है तथा जिसके ध्वजका दण्ड सोनेका बना हुआ है, उस रथपर आरूढ़ उस समय अपनी शोभासे वे समस्त लोकोंको प्रकाशित करने लगे ॥ १७ ॥
तद् बभौ चाद्भुतं युद्धं द्वैरथं रोमहर्षणम् ।
रामस्य च महाबाहो रावणस्य च रक्षसः ॥ १८ ॥
महाबाहु श्रीराम और राक्षस रावण में द्वैरथ प्रारम्भ तत्पश्चात् हुआ, जो बड़ा ही अद्भुत और रोंगटे खड़े कर युद्ध देनेवाला था ॥ १८ ॥
स गान्धर्वेण गान्धर्व दैवं दैवेन राघवः ।
अस्त्रं राक्षसराजस्य जघान परमास्त्रवित् ॥ १ ९ ॥
श्रीरामचन्द्रजी उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता थे । उन्होंने राक्षस-राजके चलाये हुए गान्धर्व - अस्त्रको गान्धर्व - अस्त्रसे और दैव-अस्त्रको दैव - अस्त्रसे नष्ट कर दिया ॥ १ ९ ॥
अस्त्रं तु परमं घोरं राक्षसं राक्षसाधिपः ।
ससर्ज पुनरेव निशाचरः ॥ २० ॥
परमक्रुद्धः तब राक्षसोंके राजा निशाचर रावणने अत्यन्त कुपित हो परम भयानक राक्षसास्त्रका प्रयोग किया ॥ २० ॥
पुनः हो मातलि देवराजका संदेश ले स्वर्गसे भूतलपर उतरकर ते रावणधनुर्मुक्ताः शराः काञ्चनभूषणाः । श्रीरामचन्द्रजीके सामने खड़ा हुआ || १०-१२ ॥ अभ्यवर्तन्त काकुत्स्थं सर्पा भूत्वा महाविषाः ॥ २१ ॥
अब्रवीच्च तदा रामं सप्रतोदो रथे स्थितः । फिर तो रावणके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण महा-प्राञ्जलिर्मातलिर्वाक्यं सहस्राक्षस्य सारथिः ॥ १३ ॥ विषैले सर्प हो - होकर श्रीरामचन्द्रजीके निकट पहुँचने लगे ॥
सहस्रलोचन इन्द्रका सारथि मातलि चाबुक लिये रथपर ते दीप्तवदना दीप्तं वमन्तो ज्वलनं मुखैः । बैठा हुआ हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे बोला- ॥ १३ ॥ राममेवाभ्यवर्तन्त व्यादितास्या भयानकाः ॥ २२ ॥
सहस्राक्षेण काकुत्स्थ रथोऽयं विजयाय ते । उन सर्पोंके मुख आगके समान प्रज्वलित होते थे । वे महासत्त्व श्रीम शत्रुनिबर्हण ॥ १४ ॥ मुखोंसे जलती आग उगल रहे थे और मुँह फैलाये
दत्तस्तव नेत्रधारी अपने दिखायी देते थे । वे सब - के - सब ' महाबली शत्रुसूदन श्रीमान् रघुवीर! सहस्र समर्पित होनेके कारण बड़े भयंकर इन्द्रने विजयके लिये आपको यह रथ श्रीरामके ही सामने आने लगे ॥ २२ ॥
देवराज 1 किया है ॥ १४ ॥ तैर्वासुकिसमस्पशैर्दीप्तभोगैर्महाविषैः
इदमैन्द्रं महच्चापं कवचं चाग्निसंनिभम् । दिशश्च संतताः सर्वा विदिशश्च समावृताः ॥ २३ ॥
शराश्चादित्यसंकाशाः शक्तिश्च विमला शिवा ॥ १५ ॥ उनका स्पर्श वासुकि नाग के समान असह्य था । उनके
विशाल धनुष है । यह अग्निके समान फन प्रज्वलित हो रहे थे और वे महान् विषसे भरे थे । उन " यह कवच इन्द्रका है । ये सूर्यसदृश प्रकाशमान बाण हैं तथा सर्पाकार बाणोंसे व्याप्त होकर सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ तेजस्वी यह कल्याणमयी निर्मल शक्ति है ॥ १५ ॥ आच्छादित हो गयीं ॥ २३ ॥
आरुह्येमं रथं वीर राक्षसं जहि रावणम् । तान् दृष्ट्रा पन्नगान् रामः समापतत आहवे ।
महेन्द्र इव दानवान् ॥ १६ ॥ अस्त्रं गारुत्मतं घोरं प्रादुश्चक्रे भयावहम् ॥ २४ ॥
मया सारथिना देव उन सर्पोंको आते देख भगवान् श्रीरामने ' वीरवर महाराज! आप इस रथपर आरूढ़ हो युद्धस्थलमें प्रकट किया । २४ ॥ मुझ सारथिकी सहायता से राक्षसराज रावणका उसी तरह वध अत्यन्त भयंकर गारुडास्त्रको कीजिये, जैसे महेन्द्र दानवोंका संहार करते हैं ' ॥ १६ ॥ ते राघवधनुर्मुक्ता रुक्मपुङ्खाः शिखिप्रभाः ॥ । २५ ॥
च । सुपर्णाः काञ्चना भूत्वा विचेरुः सर्पशत्रवः इत्युक्तः सम्परिक्रम्य रथं तमभिवाद्य ॥ १७ ॥ फिर तो श्रीरघुनाथजी के धनुषसे छूटे हुए सुनहरे पंख-आरुरोह तदा रामो लोकाँल्लक्ष्म्या विराजयन् तेजस्वी बाण सपके शत्रुभूत सुवर्णमय गरुड़
मातलिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उस रथकी वाले अग्नितुल्य लगे ॥ २५ ॥
परिक्रमा की और उसे प्रणाम करके वे उसपर सवार हुए । बनकर सब ओर विचरने