Ramayana 2 — पृष्ठ 591–600

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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१३८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बड़ी भयंकर थी | वह आकाशमें प्रकाशित होनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी विमान के समान दृष्टिगोचर होता था ॥ ५३ ॥

तडित्पताकागहनं दर्शितेन्द्रायुधप्रभम् ॥ ६ ॥

शरधारा विमुञ्चन्तं धाराधरमिवाम्बुदम् । उसपर फहराती हुई पताकाएँ विद्युत् के समान जान पड़ती थीं । वहाँ जो रावणका धनुष था, उसके द्वारा वह रथ इन्द्र-धनुषकी छटा छटकाता था और बाणोंकी धारावाहिक वृष्टि करता था । इससे वह जलधारावर्षी मेघके समान प्रतीत होता था ॥ ६३ ॥

स दृष्ट्रा मेघसंकाशमापतन्तं रथं रिपोः ॥ ७ ॥

गिरेर्वज्राभिमृष्टस्य दीर्यतः सदृशखनम् ।

विस्फारयन् वै वेगेन बालचन्द्रानतं धनुः ॥ ८ ॥

उवाच मातलिं रामः सहस्राक्षस्य सारथिम् । उसकी आवाज ऐसी मालूम होती थी, मानो वज्रके आघात से किसी पर्वतके फटनेका शब्द हो रहा हो । मेघके समान प्रतीत होनेवाले शत्रुके उस रथको आता देख श्रीराम-चन्द्रजीने बड़े वेग से अपने धनुषपर टंकार दी । उस समय

उनका वह धनुष द्वितीया के चन्द्रमा जैसा दिखायी देता था ।

श्रीरामने इन्द्रसारथि मातलिसे कहा – ॥ ७-८३ ॥

मातले पश्य संरब्धमापतन्तं रथं रिपोः ॥ ९ ॥

यथापसव्यं पतता वेगेन महता पुनः ।

समरे हन्तुमात्मानं तथानेन कृता मतिः ॥ १० ॥

‘ मातले! देखो, मेरे शत्रु रावणका रथ बड़े वेगसे आ रहा है 1 । रावण जिस प्रकार प्रदक्षिणभावसे महान् वेगके साथ पुनः आ रहा है, उससे जान पड़ता है, इसने समरभूमिमें अपने वधका निश्चय कर लिया है ॥ ९ -१० ॥

तदप्रमादमातिष्ठ प्रत्युद्गच्छ रथं रिपोः ।

विध्वंसयितुमिच्छामि वायुर्मेघमिवोत्थितम् ॥ ११ ॥

‘ अतः अब तुम सावधान हो जाओ और शत्रुके रथकी ओर आगे बढ़ो | जैसे हवा उमड़े हुए बादलोंको छिन्न - भिन्न कर डालती है, उसी प्रकार आज मैं शत्रुके रथका विध्वंस करना चाहता हूँ ॥ ११ ॥

अविक्लवमसम्भ्रान्तमव्यग्र हृदयेक्षणम् रश्मिसंचारनियतं प्रचोदय रथं द्रुतम् ॥ १२ ॥

' भय तथा घबराहट छोड़कर मन और नेत्रोंको स्थिर रखते हुए घोड़ोंकी बागडोर काबूमें रक्खो और रथको ज चलाओ ॥ १२ ॥

कामं न त्वं समाधेयः पुरंदररथोचितः ।

युयुत्सुरहमेकाग्रः स्मारये त्वां न शिक्षये ॥ १३ ॥

' तुम्हें देवराज इन्द्रका रथ हाँकनेका अभ्यास है; अतः तुमको कुछ सिखाने की आवश्यकता नहीं है । मैं एकाग्रचित्त होकर युद्ध करना चाहता हूँ । इसलिये तुम्हारे कर्तव्यका

स्मरणमात्र करा रहा हूँ । तुम्हें शिक्षा नहीं देता हूँ ' ॥ १३ ॥

परितुष्टः स रामस्य तेन वाक्येन मातलिः ।

प्रचोदयामास रथं सुरसारथिरुत्तमः ॥ १४ ॥

अपसव्यं ततः कुर्वन् रावणस्य महारथम् ।

चक्रसम्भूतरजसा रावणं व्यवधूनयत् ॥ १५ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस वचनसे देवताओंके श्रेष्ठ सारथि मातलिको बड़ा संतोष हुआ और उन्होंने रावण के विशाल रथको दाहिने रखते हुए अपने रथको आगे बढ़ाया । उसके पहियेसे इतनी धूल उड़ी कि रावण उसे देखकर काँप उठा ॥ १४-१५ ॥

ततः क्रुद्धो दशग्रीवस्ताम्रविस्फारितेक्षणः ।

रथप्रतिमुखं रामं सायकैरवधूनयत् ॥ १६ ॥

इससे दशमुख रावणको बड़ा क्रोध हुआ । वह अपनी लाल - लाल आँखें फाड़कर देखता हुआ रथके सामने हुए श्रीरामपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ १६ ॥

धर्षणामर्षितो रामो धैर्ये रोषेण लम्भयन् ।

जग्राह सुमहावेगमैन्द्रं युधि शरासनम् ॥ १७ ॥

उसके इस आक्रमणसे श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा क्रोध हुआ । फिर रोषके साथ ही धैर्य धारण करके युद्धस्थलमें उन्होंने इन्द्रका धनुष हाथमें लिया, जो बड़ा ही वेगशाली था ॥ १७ ॥

शरांश्च सुमहावेगान् सूर्यरश्मिसमप्रभान् ।

तदुपोढं महद् युद्धमन्योन्यवधकाङ्क्षिणोः ।

परस्पराभिमुखयोर्दृप्तयोरिव सिंहयोः ॥ १८ ॥

साथ ही सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित होनेवाले महान् वेगशाली बाण भी ग्रहण किये । तत्पश्चात् एक दूसरे के वकी इच्छा रखकर श्रीराम और रावण दोनोंमें बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हुआ । दोनों दर्पसे भरे हुए दो सिंहोंके समान आमने-सामने डटे हुए थे ॥ १८ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।

समीयुद्वैरथं द्रष्टुं रावणक्षयकाङ्क्षिणः ॥ १ ९ ॥

उस समय रावणके विनाशकी इच्छा रखनेवाले देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि उन दोनोंके द्वैरथ युद्धको देखने के लिये वहाँ एकत्र हो गये ॥ १ ९ ॥

समुत्पेतुरथोत्पाता दारुणा रोमहर्षणाः ।

रावणस्य विनाशाय राघवस्योदयाय च ॥ २० ॥

उस युद्ध के समय ऐसे भयंकर उत्पात होने लगे, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाले थे । उनसे रावणके विनाश और श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदयकी सूचना मिलती थी ॥ २० ॥

ववर्ष रुधिरं देवो रावणस्य रथोपरि ।

वाता मण्डलिनस्तीचा व्यपसव्यं प्रचक्रमुः ॥ २१ ॥

पृष्ठ 592

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युद्धकाण्डे षडधिकशततमः सर्गः १३८७ मेघ रावणके रथपर रक्तकी वर्षा करने लगे । बड़े वेगसे निपेतुरिन्द्राशनयः सैन्ये चास्य समन्ततः । उठे हुए बवंडर उसकी वामावर्त परिक्रमा करने लगे ॥२१ ॥ दुर्विषावरा घोरा विना जलधरोदयम् ॥ २ ९ ॥

चास्य भ्रममाणं नभस्थले । उसकी सेनापर सब ओरसे बिना बादलके ही दुःसह महद्गृध्रकुलं येन येन रथो याति तेन तेन प्रधावति ॥ २२ ॥ एवं कठोर आवाजके साथ भयानक बिजलियाँ गिरीं ॥ २ ९ ॥

जिस - जिस मार्गसे रावणका रथ जाता था, उसी उसी दिशश्च प्रदिशः सर्वा बभूवुस्तिमिरावृताः । ओर आकाशमें मँडराता हुआ गीधका महान् समुदाय दौड़ा जाता था ॥ २२ ॥

संध्यया चावृता लङ्का जपापुष्पनिकाशया दृश्यते सम्प्रदीप्तेव दिवसेऽपि वसुंधरा असमयमें ही जपा ( अड्डुल ) के फूलकी - सी वाली संध्यासे आवृत हुई लङ्कापुरीकी भूमि दिनमें हुई - सी दिखायी देती थी ॥ २३ ॥

सनिर्घाता महोल्काश्च सम्प्रपेतुर्महाखनाः विषादयंस्ते रक्षांसि रावणस्य तदाहिताः रावण के सामने वज्रपातकी - सी गड़गड़ाहट भारी आवाजके साथ बड़ी - बड़ी उल्काएँ गिरने

॥ २३ ॥

लाल रंग-भी जलती

॥ २४ ॥

और बड़ी लगीं, जो उसके अहित की सूचना दे रही थीं । उन उत्पातोंने राक्षसोंको विषाद में डाल दिया ॥ २४ ॥

रावणश्च यतस्तत्र प्रचचाल वसुंधरा ।

रक्षसां च प्रहरतां गृहीता इव बाहवः ॥ २५ ॥

रावण जहाँ - जहाँ जाता, वहाँ - वहाँ की भूमि डोलने लगती थी । प्रहार करते हुए राक्षसोंकी भुजाएँ ऐसी निकम्मी हो गयी थीं, मानो उन्हें किन्होंने पकड़ लिया हो ॥ २५ ॥

ताम्राः पीताः सिताः श्वेताः पतिताः सूर्यरश्मयः ।

श्यन्ते रावणस्याग्रे पर्वतस्येव धातवः ॥ २६ ॥

रावण के आगे पड़ी हुई सूर्यदेवकी किरणें पर्वतीय धातुओंके समान लाल, पीले, सफेद और काले रंगकी दिखायी देती थीं ॥ २६ ॥

गृधैरनुगताश्चास्य वमन्त्यो ज्वलनं मुखैः ।

प्रणेदुर्मुखमीक्षन्त्यः संरब्धमशिवं शिवाः ॥ २७ ॥

रावणके रोषावेशसे पूर्ण मुखकी ओर देखती और अपने-अपने मुखोंसे आग उगलती हुई गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलती थीं और उनके पीछे झुंड के झुंड गीध मड़राते चलते थे ॥ २७ ॥

प्रतिकूलं ववौ वायू रणे पांसून् समुत्किरन् ।

तस्य राक्षसराजस्य कुर्वन् दृष्टिविलोपनम् ॥ २८ ॥

पांसुवर्षेण महता दुर्दर्श च नभोऽभवत् ॥ ३० ॥

समस्त दिशाएँ और विदिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो गयीं । धूलकी बड़ी भारी वर्षाके कारण आकाशका दिखायी देना कठिन हो गया ॥ ३० ॥

कुर्वत्यः कलहं घोरं सारिकास्तद्रथं प्रति ।

निपेतुः शतशस्तत्र दारुणा दारुणारुताः ॥ ३१ ॥

भयानक आवाज करनेवाली सैकड़ों दारुण सारिकाएँ आपसमें घोर कलह करती हुई रावण के रथपर गिर पड़ती थीं ॥

जघनेभ्यः स्फुलिङ्गाश्च नेत्रेभ्योऽश्रूणि संततम् ।

मुमुचुस्तस्य तुरगास्तुल्यमग्निं च वारि च ॥ ३२ ॥

उसके घोड़े अपने जघनस्थलसे आगिकी चिनगारियाँ और नेत्रोंसे आँसू बरसा रहे थे । इस प्रकार वे एक ही साथ आग और पानी दोनों प्रकट करते थे ॥ ३२ ॥

एवंप्रकारा बहवः समुत्पाता भयावहाः ।

रावणस्य विनाशाय दारुणाः सम्प्रजज्ञिरे ॥ ३३ ॥

इस तरह बहुत - से दारुण एवं भयंकर उत्पात प्रकट हुए, जो रावणके विनाशकी सूचना दे रहे थे ॥ ३३ ॥

रामस्यापि निमित्तानि सौम्यानि च शिवानि च ।

बभूवुर्जयशंसीनि प्रादुर्भूतानि सर्वशः ॥ ३४ ॥

श्रीराम के सामने भी अनेक शकुन प्रकट हुए, जो सब प्रकारसे शुभ, मङ्गलमय तथा विजयके सूचक थे ॥ ३४ ॥

निमित्तानीह सौम्यानि राघवः स्वजयाय वै ।

परमसंहृशे हतं मेने च रावणम् ॥ ३५ ॥

श्रीरघुनाथजी अपनी विजयकी सूचना देनेवाले इन शुभ शकुनों को देखकर बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने रावणको मरा हुआ ही समझा || ३५ ॥ ततो निरीक्ष्यात्मगतानि राघवो रणे निमित्तानि निमित्तकोविदः । जगाम हर्षे च परां च निर्वृतिं चकार युद्धे ह्यधिकं च विक्रमम् ॥ ३६ ॥

शकुनोंके ज्ञाता भगवान् श्रीराम रणभूमिमें अपनेको प्राप्त होनेवाले शुभ शकुनोंका अवलोकन करके बड़े हर्ष और रणभूमिमें धूल उड़ाती वायु राक्षसराज रावणकी आँखें परम संतोषका अनुभव करने लगे तथा उन्होंने युद्धमें अधिक बंद करती हुई प्रतिकूल दिशाकी ओर बह रही थी ॥ २८ ॥ पराक्रम प्रकट किया ॥ ३६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षडधिकशततमः सर्गः ॥ १०६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ छःवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०६ ॥

पृष्ठ 593

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१३८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सप्ताधिकशततमः सर्गः श्रीराम और रावणका घोर युद्ध

ततः प्रवृत्तं सुक्रूरं रामरावणयोस्तदा ।

सुमहद् द्वैरथं युद्धं सर्वलोकभयावहम् ॥ १ ॥

तदनन्तर श्रीराम और रावणमें अत्यन्त क्रूरतापूर्वक महान् द्वैरथ युद्ध आरम्भ हुआ, जो समस्त लोकोंके • लिये भयंकर था ॥ १ ॥

ततो राक्षससैन्यं च हरीणां च महद्बलम् ।

प्रगृहीतप्रहरणं निश्चेष्टं समवर्तत ॥ २ ॥

उस समय राक्षसों और वानरोंकी विशाल सेनाएँ हाथमें हथियार लिये रहनेपर भी निश्चेष्ट खड़ी रहीं— कोई किसीपर प्रहार नहीं करता था ॥ २ ॥

सम्प्रयुद्ध तौ बलवन्नरराक्षसौ ।

व्याक्षिप्तहृदयाः सर्वे परं विस्मयमागताः ॥ ३ ॥

मनुष्य और निशाचर दोनों वीरोंको बलपूर्वक युद्ध करते देख सबके हृदय उन्होंकी ओर खिंच गये; अतः सभी बड़े आश्चर्य में पड़ गये ॥ ३ ॥

नानाप्रहरणैर्व्यप्रैर्भुजैर्विस्मितबुद्धयः तस्थुः प्रेक्ष्य च संग्रामं नाभिजग्मुः परस्परम् ॥ ४ ॥

दोनों ओरके सैनिकोंके हाथमें नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र विद्यमान थे और उनके हाथ युद्धके लिये व्यग्र थे, तथापि उस अद्भुत संग्रामको देखकर उनकी बुद्धि आश्चर्यचकित हो उठी थी; इसलिये वे चुपचाप खड़े थे । एक - दूसरेपर प्रहार नहीं करते थे ॥ ४ ॥

रक्षसां रावणं चापि वानराणां च राघवम् ।

पश्यतां विस्मिताक्षाणां सैन्यं चित्रमिवाबभौ ॥ ५ ॥

राक्षस रावणकी ओर देख रहे थे और वानर श्रीरघुनाथ-जीकी ओर । उन सबके नेत्र विस्मित थे; अतः निस्तब्ध खड़ी रहनेके कारण उभय पक्षकी सेनाएँ चित्रलिखित - सी जान पड़ती थीं ॥ ५ ॥

तौ तु तत्र निमित्तानि दृष्ट्वा राघवरावणौ ।

कृतबुद्धी स्थिराम युयुधाते ह्यभीतवत् ॥ ६ ॥

श्रीराम और रावण दोनोंने वहाँ प्रकट होनेवाले निमित्तों-को देखकर उनके भावी फलका विचार करके युद्धविषयक विचारको स्थिर कर लिया था । उन दोनोंमेंसे एक - दूसरे के प्रति अमर्षका भाव दृढ़ हो गया था; इसलिये वे निर्भय से होकर युद्ध करने लगे ॥ ६ ॥

जेतव्यमिति काकुत्स्थो मर्तव्यमिति रावणः ।

धृतौ स्ववीर्यसर्वस्वं युद्धेऽदर्शयतां तदा ॥ ७ ॥

श्रीरामचन्द्रजीको यह विश्वास था कि मेरी ही जीत होगी और रावणको भी यह निश्चय हो गया था कि मुझे अवश्य ही मरना होगा; अतः वे दोनों युद्धमें अपना सारा पराक्रम प्रकट करके दिखाने लगे || ७ ||

ततः क्रोधाद् दशग्रीवः शरान् संधाय वीर्यवान् ।

मुमोच ध्वजमुद्दिश्य राघवस्य रथे स्थितम् ॥ ८ ॥

उस समय पराक्रमी दशाननने क्रोधपूर्वक बाणका संधान करके श्रीरघुनाथजीके रथपर फहराती हुई ध्वजाको निशाना बनाया और उन बाणोंको छोड़ दिया ॥ ८ ॥

ते शरास्तमनासाद्य पुरंदररथध्वजम् ।

रथशक्ति परामृश्य निपेतुर्धरणीतले ॥ ९ ॥

परंतु उसके चलाये हुए वे बाण इन्द्रके रथकी ध्वजातक न पहुँच सके, केवल रथंशक्तिको छूते हुए धरतीपर गिर पड़े ॥

ततो रामोऽपि संक्रुद्धश्चापमाकृष्य वीर्यवान् ।

कृतप्रतिकृतं कर्तुं मनसा सम्प्रचक्रमे ॥ १० ॥

तब महाबली श्रीरामचन्द्रजीने भी कुपित होकर अपने धनुषको खींचा और मन - ही - मन रावणके कृत्यका बदला चुकाने -- उसके ध्वजको काट गिरानेका विचार किया ॥ १० ॥

रावणध्वजमुद्दिश्य मुमोच निशितं शरम् ।

महासर्पमिवासह्यं ज्वलन्तं स्वेन तेजसा ॥ ११ ॥

रावणके ध्वजको लक्ष्य करके उन्होंने विशाल सर्पके समान असह्य और अपने तेजसे प्रज्वलित तीखा बाण छोड़ दिया ॥ ११ ॥

रामचिक्षेप तेजस्वी केतुमुद्दिश्य सायकम् ।

जगाम स महीं छित्त्वा दशग्रीवध्वजं शरः ॥ १२ ॥

तेजस्वी श्रीरामने उस ध्वजकी ओर निशाना साधकर अपना सायक चलाया और वह दशाननके उस ध्वजको काट-कर पृथ्वी में समा गया ॥ १२ ॥

स निकृत्तोऽपतद् भूमौ रावणस्यन्दनध्वजः ।

ध्वजस्योन्मथनं दृष्ट्रा रावणः स महाबलः ॥ १३ ॥

सम्प्रदीप्तोऽभवत् क्रोधादमर्षात् प्रदहन्निव ।

स रोषवशमापन्नः शरवर्षे ववर्ष ह ॥ १४ ॥

रावणके रथका वह ध्वज कटकर धरतीपर गिर पड़ा । अपने ध्वजका विध्वंस हुआ देख महाबली रावण क्रोधसे जल १. रथकी कलशीपरका वह बाँस जिसमें लड़ाईके रथोंकी ध्वजाएँ लगायी जाती थीं । कुछ विद्वानोंने रथशक्तिका अर्थ - रथ-की अद्भुत सामर्थ्य किया है । बैसा अर्थ माननेपर यह भाव निकलता है कि रथके अद्भुत प्रभावका अनुभव करके वे बाण ध्वज-तक न पहुँचकर पृथ्वीपर ही गिर पड़े ।

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युद्धकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः १३८ ९ उठा और अमर्षके कारण विपक्षीको जलाता हुआ - सा जान पड़ा । वह रोषके वशीभूत होकर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥

रामस्य तुरगान् दीप्तैः शरैर्विव्याध रावणः ।

ते दिव्या हरयस्तत्र नास्खलन्नापि बभ्रमुः ॥ १५ ॥

बभूवुः स्वस्थहृदयाः पद्मनालैरिवाहताः । रावणने अपने तेजस्वी बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीके घोड़ोंको घायल करना आरम्भ किया; परंतु वे घोड़े दिव्य थे, इसलिये न तो लड़खड़ाये और न अपने स्थानसे विचलित ही हुए । वे पूर्ववत् स्वस्थचित्त बने रहे, मानो उनपर कमलकी नालों-से प्रहार किया गया हो ॥ १५३ ॥

तेषामसम्भ्रमं दृष्ट्रा वाजिनां रावणस्तदा ॥ १६ ॥

भूय एव सुसंक्रुद्धः शरवर्षे मुमोच ह ।

गदाश्च परिघांश्चैव चक्राणि मुसलानि च ॥ १७ ॥

गिरिश्टङ्गाणि वृक्षांश्च तथा शूलपरश्वधान् ।

मायाविहितमेतत् तु शस्त्रवर्षमपातयत् ।

सहस्रशस्तदा बाणानश्रान्तहृदयोद्यमः ॥ १८ ॥

उन घोड़ोंका घबराहटमें न पड़ना देख रावणका क्रोध और भी बढ़ गया । वह पुनः बाणोंकी वर्षा करने लगा । गदा, चक्र, परिघ, मूसल, पर्वत - शिखर, वृक्ष, शूल, फरसे तथा मायानिर्मित अन्यान्य शस्त्रोंकी वृष्टि करने लगा । उसने हृदयमें थकावटका अनुभव न करके सहस्रों बाण छोड़े ॥ १६-१८ ॥

तुमुलं त्रासजननं भीमं भीमप्रतिस्वनम् ।

तद् वर्षमभवद् युद्धे नैकशस्त्रमयं महत् ॥! १ ९ ॥

युद्धस्थलमें अनेक शस्त्रोंकी वह विशाल वर्षा बड़ी भयानक, तुमुल, त्रासजनक और भयंकर कोलाहलसे पूर्ण थी ।

विमुच्य राघवरथं समन्ताद् वानरे बले ।

सायकैरन्तरिक्षं च चकार सुनिरन्तरम् ॥ २० ॥

मुमोच च दशग्रीवो निःसङ्गेनान्तरात्मना । वह शस्त्रवर्षा श्रीरामचन्द्रजीके रथको छोड़कर सब ओर-से वानर सेना के ऊपर पड़ने लगी । दशमुख रावणने प्राणोंका मोह छोड़कर बार्णोका प्रयोग किया और अपने सायकों से वहाँके आकाशको ठसाठस भर दिया ॥ २०३ ॥

व्यायच्छमानं तं दृष्ट्वा तत्परं रावणं रणे ॥ २१ ॥

प्रहसन्निव काकुत्स्थः संदधे निशिताञ्छरान् ।

स मुमोच ततो बाणाञ्छतशोऽथ सहस्रशः ॥ २२ ॥

तदनन्तर रणभूमिमें रावणको बाण चलाने में अधिक परिश्रम करते देख श्रीरामचन्द्रजीने हँसते हुए - से तीखे बाणों-का संधान किया और उन्हें सैकड़ों तथा हजारोंकी संख्या-में छोड़ा ॥ २१-२२ ॥

तान् दृष्ट्वा रावणश्चक्रे खशरैः खं निरन्तरम् ।

ताभ्यां नियुक्तेन तदा शरवर्षेण भास्वता ॥ २३ ॥

शरबद्धमिवाभाति द्वितीयं भाखदम्बरम् । उन बाणों को देखकर रावणने पुनः अपने बाण बरसाये और आकाशको इतना भर दिया कि उसमें तिल रखने की भी जगह नहीं रह गयी । उन दोनोंके द्वारा की गयी चमकीले बाणोंकी वर्षा वहाँका प्रकाशमान आकाश बाणोंसे बद्ध होकर किसी और ही आकाश - सा प्रतीत होता था ॥ २३३ ॥

नानिमित्तोऽभवद् बाणो नानिर्भेत्ता न निष्फलः ॥ २४ ॥

अन्योन्यमभिसंहत्य निपेतुर्धरणीतले ।

तथा विसृजतोर्बाणान् रामरावणयोर्मृधे ॥ २५ ॥

उनका चलाया हुआ कोई भी बाण लक्ष्यतक पहुँचे बिना नहीं रहता था, लक्ष्यको बेधे या विदीर्ण किये बिना नहीं रुकता था तथा निष्फल भी नहीं होता था । इस तरह युद्ध में शस्त्रवर्षा करते हुए श्रीराम और रावणके बाण जब आपस में टकराते थे, तब नष्ट होकर पृथ्वीपर गिर जाते थे । २४-२५ ॥

प्रायुध्येतामविच्छिन्नमस्यन्तौ सव्यदक्षिणम् ।

चक्रतुश्च शरैर्घोरैर्निरुच्छ्वासमिवाम्बरम् ॥ २६ ॥

वे दोनों योद्धा दायें - बायें प्रहार करते हुए निरन्तर युद्ध में लगे रहे । उन्होंने अपने भयंकर बाणोंसे आकाशको इस तरह भर दिया कि मानो उसमें साँस लेने की भी जगह नहीं रह गयी ॥ २६ ॥

रावणस्य हयान् रामो हयान् रामस्य रावणः ।

जन्नतुस्तौ तदान्योन्यं कृतानुकृतकारिणौ ॥ २७ ॥

श्रीरामने रावणके घोड़ोंको और रावणने श्रीरामके घोड़ों-को घायल कर दिया । वे दोनों एक दूसरेके प्रहारका बदला चुकाते हुए परस्पर आघात करते रहे ॥ २७ ॥

एवं तु तौ सुसंक्रुद्धौ चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ।

मुहूर्तमभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ २८ ॥

इस प्रकार वे दोनों अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए उत्तम रीति-से युद्ध करने लगे । दो घड़ीतक तो उन दोनों में ऐसा भयंकर संग्राम हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ २८ ॥

तौ तथा युध्यमानौ तु समरे रामरावणौ ।

ददृशुः सर्वभूतानि विस्मितेनान्तरात्मना ॥ २ ९ ॥

इस प्रकार युद्धमें लगे हुए श्रीराम तथा रावणको सम्पूर्ण प्राणी चकितचित्तसे निहारने लगे ॥ २ ९ ॥

अर्दयन्तौ तु समरे तयोस्तौ स्यन्दनोत्तमौ ।

परस्परमभिक्रुद्धौ परस्परमभिद्रुतौ ॥ ३० ॥

उन दोनोंके बे श्रेष्ठ रथ ( तथा उसमें बैठे हुए रथी ) समरभूमिमें अत्यन्त क्रोधपूर्वक एक दूसरेको पीड़ा देने और परस्पर धावा करने लगे ॥ ३० ॥

परस्परवधे युक्तौ घोररूपौ बभूवतुः ।

मण्डलानि च वीथीश्च गतप्रत्यागतानि च ॥ ३१ ॥

दर्शयन्तौ बहुविधां सूतौ सारथ्यजां गतिम् ।

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१३ ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे एक दूसरेके वधके प्रयत्न में लगे हुए वे दोनों वीर बड़े भयानक जान पड़ते थे । उन दोनों के सारथि कभी रथको चक्कर काटते हुए ले जाते, कभी सीधे मार्गंसे दौड़ाते और कभी आगेकी ओर बढ़ाकर पीछे की ओर लौटाते थे । इस तरह वे दोनों अपने रथ हाँकने में विविध प्रकार के ज्ञानका परिचय देने लगे ॥ ३ ९ ३ ॥ अर्दयन् रावणं रामो राघवं चापि रावणः ॥ ३२ ॥

गतिवेगं समापन प्रवर्तन निवर्तने । श्रीराम रावणको पीड़ित करने लगे और रावण श्रीरामको पीड़ा देने लगा । इस प्रकार युद्धविषयक प्रवृत्ति और निवृत्ति-में वे दोनों तदनुरूप गतिवेगका आश्रय लेते थे ॥ ३२३ ॥

क्षिपतोः शरजालानि तयोस्तौ स्यन्दनोत्तमौ ॥ ३३ ॥

चेरतुः संयुगमहीं सासारौ जलदाविव । समूहकी वर्षा करते हुए उन दोनों वीरोंके वे श्रेष्ठ रथ जलकी धारा गिराते हुए दो जलधरोंके समान युद्धभूमिमें विचर रहे थे || ३३३ ॥ दर्शयित्वा तदा तौ तु गतिं बहुविधां रणे ॥ ३४ ॥

परस्परस्याभिमुखो पुनरेव च तस्थतुः । वे दोनों रथ युद्धस्थलमें भाँति - भाँति की गतिका प्रदर्शन करने के बाद फिर आमने - सामने आकर खड़े हो गये ॥ ३४३ ॥

धुरं धुरेण रथयोर्वक्त्रं वक्त्रेण वाजिनाम् ॥ ३५ ॥

पताकाश्च पताकाभिः समीयुः स्थितयोस्तदा । उस समय वहाँ खड़े हुए उन दोनों रथोंके युगन्धर ( हरसोंकी संधि ) युगन्धरसे, घोड़ोंके मुख विपक्षी घोड़ोंके मुखसे तथा पताकाएँ पताकाओंसे मिल गयीं ॥ ३५३ ॥

रावणस्य ततो रामो धनुर्मुक्तैः शितैः शरैः ॥ ३६ ॥

चतुर्भिश्चतुरो दीप्तान् हयान् प्रत्यपसर्पयत् । तत्पश्चात् श्रीरामने अपने धनुषसे छूटे हुए चार पैने बाणोंद्वारा रावणके चारों तेजस्वी घोड़ोंको पीछे हटने के लिये विवश कर दिया ॥ ३६३ ॥

स क्रोधवशमापन्नो हयानामपसर्पणे ॥ ३७ ॥

मुमोच निशितान् बाणान् राघवाय दशाननः । घोड़ों के पीछे हटनेपर दशमुख रावण क्रोधके वशीभूत हो गया और श्रीरामपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ३७३ ॥

सोऽतिविद्धो बलवता दशग्रीवेण राघवः ॥ ३८ ॥

जगाम न विकारं च न चापि व्यथितोऽभवत् । बलवान् दशाननके द्वारा अत्यन्त घायल किये जानेपर भी श्रीरघुनाथजीके चेहरेपर शिकनतक न आयी और न उनके मनमें व्यथा ही हुई ॥ ३८३ ॥

चिक्षेप च पुनर्वाणान् वज्रसारसमखनान् ॥ ३ ९ ॥ सारथिं वज्रहस्तस्य समुद्दिश्य दशाननः । तत्पश्चात् रावणने इन्द्र के सारथि मातलिको लक्ष्य करके वज्र के समान शब्द करनेवाले बाण छोड़े ॥ ३ ९ ३ ॥ मातलेस्तु महावेगाः शरीरे पतिताः शराः ॥ ४० ॥

न सूक्ष्ममपि सम्मोहं व्यथां वा प्रददुर्युधि । वे महान् वेगशाली बाण युद्धस्थलमें मातलिके शरीरपर पड़कर उन्हें थोड़ा - सा भी मोह या व्यथा न दे सके ॥ ४०३ ॥

तया धर्षणया क्रुद्धो मातलेर्न तथाऽऽत्मनः ॥ ४१ ॥

चकार शरजालेन राघवो विमुखं रिपुम् । रावणद्वारा मातलिके प्रति आक्रमणसे श्रीरामचन्द्रजीको जैसा क्रोध हुआ, वैसा अपने पर किये गये आक्रमणसे नहीं हुआ था । अतः उन्होंने बार्णोका जाल - सा बिछाकर अपने शत्रुको युद्ध से विमुख कर दिया ॥ ४१३ ॥

विशति त्रिशति षष्टिं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४२ ॥

मुमोच राघवो वीरः सायकान् स्यन्दने रिपोः । वीर रघुनाथजीने शत्रुके रथपर बीस, तीस, साठ, सौ और हजार - हजार बाणोंकी वृष्टि की ॥ ४२३ ॥

रावणोऽपि ततः क्रुद्धो रथस्थो राक्षसेश्वरः ॥ ४३ ॥

गदा मुसलवर्षेण रामं प्रत्ययद् रणे । तब रथपर बैठा हुआ राक्षसराज रावण भी कुपित हो उठा और गदा तथा मूसलोंकी वर्षासे रणभूमिमें श्रीरामको पीड़ा देने लगा ॥ ४३३ ॥

तत् प्रवृत्तं पुनर्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ ४४ ॥

गदानां मुसलानां च परिघाणां च निःखनैः ।

शराणां पुङ्खवातैश्च क्षुभिताः सप्त सागराः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार उन दोनों में पुनः बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा । गदाओं, मुसलों और परिघोंकी आवाजसे तथा बाणके पंखोंकी सनसनाती हुई हवासे सातों समुद्र विक्षुब्ध हो उठे ॥ ४४-४५ ॥

क्षुब्धानां सागराणां च पातालतलवासिनः ।

व्यथिता दानवाः सर्वे पन्नगाश्च सहस्रशः ॥ ४६ ॥

उन विक्षुब्ध समुद्रोंके पातालतलमें निवास करनेवाले समस्त दानव और सहस्रों नाग व्यथित हो गये ॥ ४६ ॥

चकम्पे मेदिनी कृत्स्ना सशैलवनकानना ।

भास्करो निष्प्रभश्चासीन्न ववौ चापि मारुतः ॥ ४७ ॥

पर्वतों, वनों और काननोसहित सारी पृथ्वी काँप उठी, सूर्यकी प्रभा लुप्त हो गयी और वायुकी गति भी रुक गयी ॥ ४७ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।

चिन्तामापेदिरे सर्वे सकिंनर महोरगाः ॥ ४८ ॥

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युद्धकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः १३ ९ १ देवता, गन्धर्व, सिद्ध, महर्षि, किन्नर और बड़े - बड़े नाग छिन्नमात्रं च तच्छीर्ष पुनरेव प्रदृश्यते ॥ ५६ ॥

सभी चिन्ता में पड़ गये ॥ ४८ ॥ तदप्यशनिसंकाशैश्छिन्नं रामस्य सायकैः ।

स्वस्ति गोब्राह्मणेभ्यस्तु लोकास्तिष्ठन्तु शाश्वताः । उसके कटते ही पुनः नया सिर उत्पन्न दिखायी जयतां राघवः संख्ये रावणं राक्षसेश्वरम् ॥ ४ ९ ॥ देने लगा, किंतु उसे भी श्रीरामके वज्रतुल्य सायकोंने सबके मुँह से यही बात निकलने लगी- गौ और ब्राह्मणों-का कल्याण हो, प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले इन लोकोंकी रक्षा हो और श्रीरघुनाथजी युद्ध में राक्षसराज रावणपर विजय

पावें ॥। ४ ९ ॥

एवं जपन्तोऽपश्यंस्ते देवाः सर्षिगणास्तदा ।

रामरावणयोर्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् ॥ ५० ॥

इस प्रकार कहते हुए ऋषियोंसहित वे देवगण श्रीराम और रावणके अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी युद्ध को देखने लगे ।

गन्धर्वाप्सरसां सङ्घा दृष्ट्रा युद्धमनूपमम् ।

गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः ॥ ५१ ॥

रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।

एवं ब्रुवन्तो ददृशुस्तद् युद्धं रामरावणम् ॥ ५२ ॥

गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय उस अनुपम युद्धको देखकर कहने लगे — ‘ आकाश आकाशके ही तुल्य है, समुद्र समुद्रके ही समान है तथा राम और रावणका युद्ध राम और रावणके युद्धके ही सदृश है ' * ऐसा कहते हुए वे सब लोग राम रावणका - युद्ध देखने लगे ॥ ५१-५२ ॥

ततः क्रोधान्महाबाहू रघूणां कीर्तिवर्धनः ।

संधाय धनुषा रामः शरमाशीविषोपमम् ॥ ५३ ॥

रावणस्य शिरोऽच्छिन्दच्छ्रीमज्ज्वलितकुण्डलम् ।

तच्छिरः पतितं भूमौ दृष्टं लोकैस्त्रिभिस्तदा ॥ ५४ ॥

तदनन्तर रघुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीराम-चन्द्रजीने कुपित होकर अपने धनुषपर एक विषधर सर्पके समान बाणका संधान किया और उसके द्वारा जगमगाते हुए कुण्डलोंसे युक्त रावणका एक सुन्दर मस्तक काट डाला । उसका वह कटा हुआ सिर उस समय पृथ्वीपर गिर पड़ा, जिसे तीनों लोकोंके प्राणियोंने देखा ॥ ५३-५४ ॥

तस्यैव सदृशं चान्यद् रावणस्योत्थितं शिरः ।

तत् क्षिप्तं क्षिप्रहस्तेन रामेण क्षिप्रकारिणा ॥ ५५ ॥

द्वितीयं रावणशिरश्छिन्नं संयति सायकैः । उसकी जगह रावण के वैसा ही दूसरा नया सिर उत्पन्न हो गया । शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले शीघ्रकारी श्रीरामने युद्धस्थल में अपने सायकद्वारा रावणका वह दूसरा सिर भी शीघ्र ही काट डाला ॥ ५५३ ॥

* ' गगनं गगनाकारं ' से ' रामरावणयोरिव ' तकके श्लोकमें अनन्वया-लङ्कार है । जहाँ एक ही वस्तु उपमान और उपमेयरूपसे कही जाय

दूसरी कोई उपमा न मिल सके, वहाँ अनन्वयालङ्कार होता है ।

काट डाला ॥ ५६३ ॥

एवमेव शतं छिन्नं शिरसां तुल्यवर्चसाम् ॥ ५७ ॥

न चैव रावणस्यान्तो दृश्यते जीवितक्षये । इस प्रकार एक - से तेजवाले उसके सौ सिर काट डाले गये, तथापि उसके जीवनका नाश होनेके लिये उसके मस्तकोंका अन्त होता नहीं दिखायी देता था ॥ ५७३ ॥

ततः सर्वास्त्रविद् वीरः कौसल्यानन्दवर्धनः ॥ ५८ ॥

मार्गणैर्बहुभिर्युक्तश्चिन्तयामास राघवः । तदनन्तर कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले, सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता वीर श्रीरामचन्द्रजी अनेक प्रकारके बाणोंसे युक्त होने पर भी इस प्रकार चिन्ता करने लगे - ॥ ५८३ ॥

मारीचो निहतो यैस्तु खरो यैस्तु सदूषणः ॥ ५ ९ ॥

क्रौञ्चावटे विराधस्तु कबन्धो दण्डकावने ।

यैः साला गिरयो भग्ना वाली च क्षुभितोऽम्बुधिः ॥ ६० ॥

त इमे सायकाः सर्वे युद्धे प्रात्ययिका मम ।

किं नु तत् कारणं येन रावणे मन्दतेजसः ॥ ६१ ॥

' अहो! मैंने जिन बाणोंसे मारीच, खर और दूषणको मारा क्रौञ्चवनके गड्ढे में विराधका वध किया, दण्डकारण्यमें बन्धको मौत के घाट उतारा, सालवृक्ष और पर्वतोंको विदीर्ण किया, वालीके प्राण लिये और समुद्रको भी क्षुब्ध कर दिया, अनेक बारके संग्राम में परीक्षा करके जिनकी अमोघताका विश्वास कर लिया गया है, वे ही ये मेरे सब सायक आज रावणके ऊपर निस्तेज कुण्ठित हो गये हैं; इसका क्या कारण हो सकता है? ' ॥ ५ ९ -६१ ॥

इति चिन्तापरश्चासीदप्रमत्तश्च संयुगे ।

ववर्ष शरवर्षाणि राघवो रावणोरसि ॥ ६२ ॥

इस तरह चिन्तामें पड़े होनेपर भी श्रीरघुनाथजी युद्ध-स्थल में सतत सावधान रहे । उन्होंने रावणकी छातीपर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ६२ ॥

रावणोऽपि ततः क्रुद्धो रथस्थो राक्षसेश्वरः ।

गदामुसलवर्षेण रामं प्रत्यर्दयद् रणे ॥ ६३ ॥

तब रथपर बैठे हुए राक्षसराज रावणने भी कुपित होकर रणभूमि में श्रीरामको गदा और मूसलोंकी वर्षा से पीड़ित करना आरम्भ किया ॥ ६३ ॥

तत् प्रवृत्तं महद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ।

, अन्तरिक्षे च भूमौ च पुनश्च गिरिमूर्धनि ॥ ६४ ॥

उस महायुद्धने बड़ा भयंकर रूप धारण किया । उसे

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१३ ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे । वह युद्ध कभी आकाशमें, कभी भूतलपर और कभी - कभी पर्वतके शिखरपर होता था ॥ ६४ ॥

देवदानवयक्षाणां पिशाचोरगरक्षसाम् ।

पश्यतां तन्महद् युद्धं सर्वरात्रमवर्तत ॥ ६५ ॥

देवता, दानव, यक्ष, पिशाच, नाग और राक्षसोंके देखते - देखते वह महान् संग्राम सारी रात चलता रहा ॥ ६५ ॥

नैव रात्रिं न दिवस न मुहूर्त न च क्षणम् ।

रामरावणयोर्युद्धं विराममुपगच्छति ॥ ६६ ॥

श्रीराम और रावणका वह युद्ध न रातमें बंद होता था इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके और न दिनमें । दो घड़ी अथवा एक क्षणके लिये भी उसका विराम नहीं हुआ || ६६ || दशरथ सुतराक्षसेन्द्रयोस्तयो-जयमनवेक्ष्य रणे स राघवस्य । सुरवररथसारथिर्महात्मा रणरतराममुवाच वाक्यमाशु ॥ ६७ ॥

एक ओर दशरथकुमार श्रीराम थे और दूसरी ओर राक्षसराज रावण । उन दोनोंमेंसे श्रीरघुनाथजीकी युद्ध में विजय होती न देख देवराज के सारथि महात्मा मातलिने युद्धपरायण श्रीरामसे शीघ्रतापूर्वक कहा – ॥ ६७ ॥

युद्धकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः ॥ १०७ ॥

युद्धकाण्ड में एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०७ ॥

अष्टाधिकशततमः सर्गः श्रीरामके द्वारा

अथ संस्मारयामास मातली राघवं तदा ।

अजानन्निव किं वीर त्वमेनमनुवर्तसे ॥ १ ॥

मातलिने श्रीरघुनाथजीको कुछ याद दिलाते हुए कहा— ' वीरवर! आप अनजानकी तरह क्यों इस राक्षसका अनुसरण कर रहे हैं? ( यह जो अस्त्र चलाता है, उसके निवारण करने-बाले अस्त्रका प्रयोगमात्र करके रह जाते हैं ) ॥ १ ॥

विसृजास्मै वधाय त्वमस्त्रं पैतामहं प्रभो ।

विनाशकालः कथितो यः सुरैः सोऽद्य वर्तते ॥ २ ॥

' प्रभो! आप इसके वधके लिये ब्रह्माजीके अस्त्रका प्रयोग कीजिये । देवताओंने इसके विनाशका जो समय बताया है, वह अब आ पहुँचा है ' ॥ २ ॥

ततः संस्मारितो रामस्तेन वाक्येन मातलेः ।

जग्राह स शरं दीप्तं निःश्वसन्तमिवोरगम् ॥ ३ ॥

मातलिके इस वाक्यसे श्रीरामचन्द्रजीको उस अस्त्रका स्मरण हो आया । फिर तो उन्होंने फुफकारते हुए सर्पके समान एक तेजस्वी बाण हाथमें लिया ॥ ३ ॥

यं तस्मै प्रथमं प्रादादगस्त्यो भगवानृषिः ।

ब्रह्मदत्तं महद् बाणममोघं युधि वीर्यवान् ॥ ४ ॥

यह वही बाण था, जिसे पहले शक्तिशाली भगवान् अगस्त्य ऋषिने रघुनाथजीको दिया था । वह विशाल बाण ब्रह्माजीका दिया हुआ था और युद्धमें अमोघ था ॥ ४ ॥

ब्रह्मणा निर्मितं पूर्वमिन्द्रार्थममितौजसा ।

दत्तं सुरपतेः पूर्व त्रिलोकजयकाङ्क्षिणः ॥ ५ ॥

अमित तेजस्वी ब्रह्माजीने पहले इन्द्रके लिये उस बाणका निर्माण किया था और तीनों लोकोंपर विजय पाने की इच्छा रखनेवाले देवेन्द्रको ही पूर्वकालमें अर्पित किया था । रावणका वध

यस्य वाजेषु पवनः फले पावकभास्करौ ।

शरीरमाकाशमयं मेरुमन्दरौ ॥ ६ ॥

उस बाणके वेगमें वायुकी, धारमें अग्नि और सूर्यकी, शरीरमें आकाशकी तथा भारीपन में मेरु और मन्दराचलकी प्रतिष्ठा की गयी थी ॥ ६ ॥

जाज्वल्यमानं वपुषा सुपुङ्खं हेमभूषितम् ।

तेजसा सर्वभूतानां कृतं भास्करवर्चसम् ॥ ७ ॥

सधूममिव कालाग्निं दीप्तमाशीविषोपमम् ।

नरनागाश्ववृन्दानां भेदनं क्षिप्रकारिणम् ॥ ८ ॥

वह सम्पूर्ण भूतोंके तेजसे बनाया गया था । उससे सूर्य के समान ज्योति निकलती रहती थी । वह सुवर्णसे भूषित, सुन्दर पंखसे युक्त, स्वरूपसे जाज्वल्यमान, प्रलयकालकी धूमयुक्त अग्निके समान भयंकर, दीप्तिमान्, विषधर सर्पके समान विषैला, मनुष्य, हाथी और घोड़ोंको विदीर्ण कर डालनेवाला तथा शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यका भेदन करनेवाला था ॥ ७-८ ॥

द्वाराणां परिघाणां च गिरीणां चापि भेदनम् ।

नानारुधिरदिग्धाङ्गं मेदोदिग्धं सुदारुणम् ॥ ९ ॥

वज्रसारं महानादं नानासमितिदारुणम् ।

सर्ववित्रासनं भीमं श्वसन्तमिव पन्नगम् ॥ १० ॥

कङ्कगृध्रवकानां च गोमायुगणरक्षसाम् ।

नित्यभक्षप्रदं युद्धे यमरूपं भयावहम् ॥ ११ ॥

बड़े - बड़े दरवाजों, परिघों तथा पर्वतोंको भी तोड़ - फोड़ देनेकी उसमें शक्ति थी । उसका सारा शरीर नाना प्रकारके रक्त में नहाया और चर्बीसे परिपुष्ट हुआ था । देखने में भी वह बड़ा भयंकर था । वज्रके समान कठोर, महान् शब्दसे युक्तः अनेकानेक युद्धोंमें शत्रुसेनाको विदीर्ण करनेवाला, सबको

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घोष जय वानरोंका वधपर रावण

पृष्ठ 600

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सर्गः १३ ९ ३ युद्धकाण्डे अष्टाधिकशततमः त्रास देनेवाला तथा फुफकारते हुए सर्पके समान भयंकर था । युद्ध में वह यमराजका भयावह रूप धारण कर लेता था । समरभूमिमें कौए, गीध, बगले, गीदड़ तथा पिशाचोंको वह सदा भक्ष्य प्रदान करता था ॥ ९ -११ ॥

नन्दनं वानरेन्द्राणां रक्षसामवसादनम् ।

वाजितं विविधैर्वाजैश्चारुचित्रैर्गरुत्मतः ॥ १२ ॥

वह सायक वानरयूथपतियोंको आनन्द देनेवाला तथा राक्षसोंको दुःखमें डालनेवाला था । गरुड़के सुन्दर विचित्र और नाना प्रकारके पंख लगाकर वह पंखयुक्त बना हुआ था ।

तमुत्तमेषु लोकानामिक्ष्वाकुभयनाशनम् ।

द्विषतां कीर्तिहरणं प्रहर्षकरमात्मनः ॥ १३ ॥

अभिमन्त्र्य ततो रामस्तं महेषु महाबलः ।

वेदप्रोकेन विधिना संदधे कार्मुके वली ॥ १४ ॥

वह उत्तम बाण समस्त लोकों तथा इक्ष्वाकुवंशियोंके भय-का नाशक था, शत्रुओंकी कीर्तिका अपहरण तथा अपने हर्षकी वृद्धि करनेवाला था । उस महान् सायकको वेदोक्त विधिसे अभिमन्त्रित करके महाबली श्रीरामने अपने धनुषपर रक्खा ॥ १३-१४ ॥

तस्मिन् संधीयमाने तु राघवेण शरोत्तमे ।

सर्वभूतानि संत्रेषुश्चचाल च वसुंधरा ॥ १५ ॥

श्रीरघुनाथजी जब उस उत्तम बाणका संधान करने लगे, तब सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे और धरती डोलने लगी ॥ १५ ॥

स रावणाय संक्रुद्धो भृशमायम्य कार्मुकम् ।

चिक्षेप परमायत्तः शरं मर्मविदारणम् ॥ १६ ॥

श्रीरामने अत्यन्त कुपित हो बड़े यत्नके साथ धनुषको इस प्रकार रावणका वध करके खूनसे रँगा हुआ वह शोभाशाली बाण अपना काम पूरा करनेके पश्चात् पुनः विनीत सेवककी भाँति श्रीरामचन्द्रजीके तरकसमें लौट आया ॥ २० ॥

तस्य हस्ताद्धतस्याशु कार्मुकं तत् ससायकम् ।

निपपात सह प्राणैर्भ्रश्यमानस्य जीवितात् ॥ २१ ॥

श्रीरामके बाणोंकी चोट खाकर रावण जीवनसे हाथ धो बैठा । उसके प्राण निकलने के साथ ही हाथसे सायकसहित धनुष भी छूटकर गिर पड़ा ॥ २१ ॥

गतासुर्भीमवेगस्तु नैर्ऋतेन्द्रो महाद्युतिः ।

स्यन्दनाद् भूमौ वृत्रो वज्रहतो यथा ॥ २२ ॥

पपात वह भयानक वेगशाली महातेजस्वी राक्षसराज प्राणहीन हो वज्रके मारे हुए वृत्रासुरकी भाँति रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥

तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ हतशेषा निशाचराः ।

हतनाथा भयत्रस्ताः सर्वतः सम्प्रदुद्रुवुः ॥ २३ ॥

रावणको पृथ्वीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए सम्पूर्ण निशाचर स्वामीके मारे जानेसे भयभीत हो सब ओर भाग गये ॥ २३ ॥

नर्दन्तश्चाभिपेतुस्तान् वानरा द्रुमयोधिनः ।

दशग्रीववधं दृष्ट्वा वानरा जितकाशिनः ॥ २४ ॥

दशमुख रावणका वध हुआ देख विजयसे सुशोभित होनेवाले वानर, जो वृक्षोंद्वारा युद्ध करनेवाले थे, गर्जना करते हुए उन राक्षसों पर टूट पड़े ॥ २४ ॥

अर्दिता वानरैर्हृप्टैर्लङ्कामभ्यपतन् भयात् ।

करुणैर्वाष्पप्रस्रवणैर्मुखैः ॥ २५ ॥

हताश्रयत्वात् उन हर्षोल्लासित वानरोंद्वारा पीड़ित किये जानेपर वे भाग गये; क्योंकि उनका पूर्णरूप से खींचकर उस मर्मभेदी बाणको रावणपर चला राक्षस भयके मारे लङ्कापुरीकी ओर आँसुओं-आश्रय नष्ट हो गया था । उनके मुखपर करुणायुक्त दिया ॥ १६ ॥ की धारा बह रही थी ॥ २५ ॥

स वज्र इव दुर्धर्षो वज्रिबाहुविसर्जितः । ततो विनेदुः संहृष्टा वानरा जितकाशिनः ।

कृतान्त इव चावाय न्यपतद् रावणोरसि ॥ १७ ॥ च तद्वधम् ॥ २६ ॥

वज्रधारी इन्द्रके हाथोंसे छूटे हुए वज्रके समान दुर्धर्ष वदन्तो राघवजयं रावणस्य सुशोभित हो अत्यन्त समान अनिवार्य वह बाण रावणकी छातीपर उस समय वानर विजय - लक्ष्मीसे और कालके हर्ष और उत्साह से भर गये तथा श्रीरघुनाथजीकी विजय और जा लगा ॥ १७ ॥ रावणके वधकी घोषणा करते हुए जोर - जोरसे गर्जना करने

स विसृष्टो महावेगः शरीरान्तकरः परः ।

बिभेद हृदयं तस्य रावणस्य दुरात्मनः ॥ १८ ॥ लगे ॥ २६ ॥ ।

शरीरका अन्त कर देनेवाले उस महान् वेगशाली श्रेष्ठ अथान्तरिक्षे व्यनदत् सौम्यस्त्रिदशदुन्दुभिः सुसुखो ववौ ॥ २७ ॥

बाणने छूटते ही दुरात्मा रावणके हृदयको विदीर्ण कर दिव्यगन्धवहस्तत्र मारुतः मधुर स्वरसे देवताओंकी दुन्दुभियाँ इसी समय आकाशमें डाला ॥ १८ ॥ बजने लगीं । वायु दिव्य सुगन्ध बिखेरती हुई मन्द मन्द गति से

रुधिराक्तः स वेगेन शरीरान्तकरः शरः । होने लगी ॥ २७ ॥

रावणस्य हरन् प्राणान् विवेश धरणीतलम् ॥ १ ९ ॥ प्रवाहित भुवि । शरीरका अन्त करके रावणके प्राण हर लेनेवाला वह निपपातान्तरिक्षाच्च पुष्पवृष्टिस्तदा मनोहरा ॥ २८ ॥

बाण उसके खूनसे रँगकर वेगपूर्वक धरतीमें समा गया ॥१ ९ ॥ किरन्ती राघवरथं दुरावापा रथके ऊपर फूलों की स शरो रावणं हत्वा रुधिरार्द्रकृतच्छविः । अन्तरिक्षसे भूतलपर श्रीरघुनाथजीके तथा मनोहर थी ॥ २८ ॥

कृतकर्मा निभृतवत् स तूणीं पुनराविशत् ॥ २० ॥ वर्षा होने लगी, जो दुर्लभ

बा ० रा ० ५. १०. १३-