Ramayana 2 — पृष्ठ 61–70
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70
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८८८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण
विपञ्ची परिगृह्यान्या नियता नृत्यशालिनी ।
निद्रावशमनुप्राप्ता सहकान्तेव भामिनी ॥ ४१ ॥
नियमपूर्वक नृत्यकलासे सुशोभित होनेवाली एक अन्य युवती विपञ्ची ( विशेष प्रकारकी वीणा ) को अङ्कमें भरकर प्रियतमके साथ सोयी हुई प्रेयसीकी भाँति निद्राके अधीन हो गयी थी ॥ ४१ ॥
अन्या कनकसंकाशैर्मृदुपीनैर्मनोरमैः ।
मृदङ्गं परिविद्ध्याङ्गः प्रसुप्ता मत्तलोचना ॥ ४२ ॥
कोई मतवाले नयनोंवाली दूसरी सुन्दरी अपने सुवर्ण-सदृश गौर, कोमल, पुष्ट और मनोरम अङ्गोंसे मृदङ्गको दबाकर गाढ़ निद्रामें सो गयी थी ॥ ४२ ॥
भुजपाशान्तरस्थेन कक्षगेन कृशोदरी ।
पणवेन सहानिन्द्या सुप्ता मदकृतश्रमा ॥ ४३ ॥
नशेसे थकी हुई कोई कृशोदरी अनिन्द्य सुन्दरी रमणी अपने भुजपाशोंके बीच स्थित और काँखमें दबे हुए पणवके साथ ही सो गयी थी ॥ ४३ ॥
डिण्डिमं परिगृह्यान्या तथैवासक्तडिण्डिमा ।
प्रसुप्ता तरुणं वत्समुपगुह्येव भामिनी ॥ ४४ ॥
दूसरी स्त्री डिंडिमको लेकर उसी तरह उससे सटी हुई सो गयी थी, मानो कोई भामिनी अपने बालक पुत्रको हृदयसे लगाये हुए नींद ले रही हो ॥ ४४ ॥
काचिदाडम्बरं नारी भुजसम्भोगपीडितम् ।
कृत्वा कमलपत्राक्षी प्रसुप्ता मदमोहिता ॥ ४५ ॥
मदिरा के मदसे मोहित हुई कोई कमलनयनी नारी आडम्बर नामक वाद्यको अपनी भुजाओंके आलिङ्गनसे दबाकर प्रगाढ़ निद्रामें निमग्न हो गयी ॥ ४५ ॥
कलशीमपविद्धान्या प्रसुप्ता भाति भामिनी ।
वसन्ते पुष्पशबला मालेव परिमार्जिता ॥ ४६ ॥
कोई दूसरी युवती निद्रावश जलसे भरी हुई सुराहीको लुढ़काकर भीगी अवस्था में ही बेसुध सो रही थी । उस अवस्थामें वह वसन्त ऋतु में विभिन्न वर्णके पुष्पों की बनी और जलके छींटेसे सींची हुई मालाके समान प्रतीत होती थी ॥ ४६ ॥
पाणिभ्यां च कुचौ काचित् सुवर्णकलशोपमौ ।
उपगुह्याबला सुप्ता निद्राबलपराजिता ॥ ४७ ॥
निद्राके बलसे पराजित हुई कोई अबला सुवर्णमय कलशके समान प्रतीत होनेवाले अपने कुचको दोनों हाथसे दबाकर सो रही थी ॥ ४७ ॥
अन्या कमलपत्राक्षी पूर्णेन्दुसदृशानना ।
अन्यामालिङ्गन्य सुश्रोणीं प्रसुप्ता मदविह्वला ॥ ४८ ॥
पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली दूसरी कमल-लोचना कामिनी सुन्दर नितम्बवाली किसी अन्य सुन्दरीका आलिङ्गन करके मद से विह्वल होकर सो गयी थी ॥ ४८ ॥
आतोद्यानि विचित्राणि परिष्वज्य वरस्त्रियः ।
निपीड्य च कुचैः सुप्ताः कामिन्यः कामुकानिव ॥ ४ ९ ॥
जैसे कामिनियाँ अपने चाहनेवाले कामुकोंको छाती से लगाकर सोती हैं, उसी प्रकार कितनी ही सुन्दरियाँ विचित्र-विचित्र वाद्योंका आलिङ्गन करके उन्हें कुचोंसे दबाये सो गयी थीं ॥ ४ ९ ॥
तासामेकान्तविन्यस्ते शयानां शयने शुभे ।
ददर्श रूपसम्पन्नामथ तां स कपिः स्त्रियम् ॥ ५० ॥
उन सबकी शय्याओंसे पृथक् एकान्तमें बिछी हुई सुन्दर शय्यापर सोयी हुई एक रूपवती युवतीको वहाँ हनुमानजीने देखा ॥ ५० ॥
मुक्तामणिसमायुक्तैर्भूषणैः सुविभूषिताम् ।
विभूषयन्तीमिव च स्वश्रिया भवनोत्तमम् ॥ ५१ ॥
वह मोती और मणियोंसे जड़े हुए आभूषणोंसे भली-भाँति विभूषित थी और अपनी शोभासे उस उत्तम भवनको विभूषित - सा कर रही थी ॥ ५१ ॥
गौरीं कनकवर्णाभामिष्टामन्तःपुरेश्वरीम् ।
कपिर्मन्दोदरीं तत्र शयानां चारुरूपिणीम् ॥ ५२ ॥
सतां दृष्ट्रा महाबाहुर्भूषितां मारुतात्मजः ।
तर्कयामास सीतेति रूपयौवनसम्पदा ।
हर्षेण महता युक्तो ननन्द हरियूथपः ॥ ५३ ॥
वह गोरे रंगकी थी । उसकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान दमक रही थी । वह रावणकी प्रियतमा और उसके अन्तः-पुरकी स्वामिनी थी । उसका नाम मन्दोदरी था । वह अपने मनोहर रूपसे सुशोभित हो रही थी । वही वहाँ सो रही थी । हनुमानजीने उसीको देखा । रूप और यौवनकी सम्पत्ति से युक्त और वस्त्राभूषणोंसे विभूषित मन्दोदरीको देखकर महाबाहु पवनकुमारने अनुमान किया कि ये ही सीताजी हैं । फिर तो ये वानरयूथपति हनुमान् महान् हर्षसे युक्त हो आनन्दमग्न हो गये ॥ ५२-५३ ॥ आस्फोटयामास चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम । स्तम्भान रोहन्निपपात भूमौ निदर्शयन स्वां प्रकृति कपीनाम् ॥ ५४ ॥
वे अपनी पूँछको पटकने और चूमने लगे । अपनी वानरों - जैसी प्रकृतिका प्रदर्शन करते हुए आनन्दित होने, खेलने और गाने लगे, इधर - उधर आने - जाने लगे । वे कभी खंभोंपर चढ़ जाते और कभी पृथ्वीपर कूद पड़ते थे ॥ ५४ ॥
इस्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्परामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १० ॥
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सुन्दरकाण्डे एकादशः सर्गः ८८ ९ एकादशः सर्गः वह सीता नहीं है - ऐसा निश्रय होनेपर हनुमान्जीका पुनः अन्तःपुरमें और उसकी पानभूमिमें सीताका पता लगाना, उनके मनमें धर्मलोपकी आशङ्का और स्वतः उसका निवारण होना
अवधूय च तां बुद्धि बभूवावस्थितस्तदा ।
जगाम चापरां चिन्तां सीतां प्रति महाकपिः ॥ १ ॥
फिर उस समय इस विचारको छोड़कर महाकपि हनुमान जी अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हुए और वे सीताजी के विषय में दूसरे प्रकारकी चिन्ता करने लगे ॥ १ ॥
न रामेण वियुक्ता सा स्वप्तुमर्हति भामिनी ।
न भोकु नाप्यलंकर्ते न पानमुपसेवितुम् ॥ २ ॥
( उन्होंने सोचा— ) ‘ भामिनी सीता श्रीरामचन्द्रजीसे बिछुड़ गयी हैं । इस दशा में वे न तो सो सकती हैं, न भोजन कर सकती हैं, न शृङ्गार एवं अलंकार धारण कर सकती हैं, फिर मदिरापानका सेवन तो किसी प्रकार भी नहीं कर सकतीं ॥ २ ॥
नान्यं नरमुपस्थातुं सुराणामपि चेश्वरम् ।
न हि रामसमः कश्चिद् विद्यते त्रिदशेष्वपि ॥ ३ ॥
वे ' किसी दूसरे पुरुषके पास, वह देवताओंका भी ईश्वर क्यों न हो, नहीं जा सकतीं । देवताओंमें भी कोई ऐसा नहीं है जो श्रीरामचन्द्रजीकी समानता कर सके ॥ ३ ॥
अन्येयमिति निश्चित्य भूयस्तत्र चचार सः ।
पानभूमौ हरिश्रेष्ठः सीतासंदर्शनोत्सुकः ॥ ४ ॥
' अतः अवश्य ही यह सीता नहीं, कोई दूसरी स्त्री है । ' ऐसा निश्चय करके वे कपिश्रेष्ठ सीताजीके दर्शनके लिये उत्सुक हो पुनः वहाँकी मधुशाला में विचरने लगे ॥ ४ ॥
क्रीडितेनापराः क्लान्ता गीतेन च तथापराः ।
नृत्येन चापराः क्लान्ताः पानविप्रहतास्तथा ॥ ५ ॥
वहाँ कोई स्त्रियाँ कीड़ा करनेसे थकी हुई थीं तो कोई गीत गानेसे । दूसरी नृत्य करके थक गयी थीं और कितनी ही स्त्रियाँ अधिक मद्यपान करके अचेत हो रही थीं ॥ ५ ॥
मुरजेषु मृदङ्गेषु चेलिकासु च संस्थिताः ।
तथा ss स्तरण मुख्येषु संविष्टाश्वापराः स्त्रियः ॥ ६ ॥
बहुत - सी स्त्रियाँ ढोल, मृदङ्ग और चेलिका नामक वाद्योंपर अपने अङ्गोंको टेककर सो गयी थीं तथा दूसरी महिलाएँ अच्छे - अच्छे बिछौनोंपर सोयी हुई थीं ॥ ६ ॥
अङ्गनानां सहस्रेण भूषितेन विभूषणैः ।
रूपसंलापशीलेन युक्तगीतार्थभाषिणा ॥ ७ ॥
देशकालाभियुक्तेन युक्तवाक्याभिधायिना ।
रताधिकेन संयुक्तां ददर्श हरियूथपः ॥ ८ ॥
वा ० रा ० ५. ७. ४-वानरयूथपति हनुमानजीने उस पानभूमिको ऐसी सहस्रों रमणियोंसे संयुक्त देखा, जो भाँति - भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित, रूप लावण्यकी चर्चा करनेवाली, गीतके समुचित अभिप्रायको अपनी वाणीद्वारा प्रकट करनेवाली, देश और कालको समझनेवाली, उचित बात बोलनेवाली और रति-क्रीड़ा अधिक भाग लेनेवाली थीं ॥ ७-८ ॥
अन्यत्रापि वरस्त्रीणां रूपसंलापशायिनाम् ।
सहस्रं युवतीनां तु प्रसुप्तं स ददर्श ह ॥ ९ ॥
दूसरे स्थान पर भी उन्होंने ऐसी सहस्रों सुन्दरी युवतियों-को सोते देखा, जो आपस में रूप - सौन्दर्य की चर्चा करती हुई लेट रही थीं ॥ ९ ॥
देशकालाभियुक्तं तु युक्तवाक्याभिधायि तत् ।
रताविरत सु ददर्श हरियूथपः ॥ १० ॥
वानरयूथपति पवनकुमारने ऐसी बहुत - सी स्त्रियोंको देखा, जो देश - कालको जाननेवाली, उचित बात कहनेवाली तथा रतिक्रीड़ाके पश्चात् गाढ़ निद्रामें सोयी हुई थीं ॥ १० ॥
तासां मध्ये महाबाहुः शुशुभे राक्षसेश्वरः ।
गोष्ठे महति मुख्यानां गवां मध्ये यथा वृषः ॥ ११ ॥
उन सबके बीच में महाबाहु राक्षसराज रावण विशाल गोशाला में श्रेष्ठ गौओंके बीच सोये हुए साँड़की भाँति शोभा पा रहा था ॥ ११ ॥
स राक्षसेन्द्रः शुशुभे ताभिः परिवृतः स्वयम् ।
करेणुभिर्यथारण्ये परिकीर्णो महाद्विपः ॥ १२ ॥
जैसे वनमें हाथियोंसे घिरा हुआ कोई महान् गजराज सो रहा हो, उसी प्रकार उस भवनमें उन सुन्दरियोंसे घिरा हुआ स्वयं राक्षसराज रावण सुशोभित हो रहा था ॥ १२ ॥
सर्वकामैरुपेतां च पानभूमिं महात्मनः ।
ददर्श कपिशार्दूलस्तस्य रक्षः पतेर्गृहे ॥ १३ ॥
मृगाणां महिषाणां च वराहाणां च भागशः ।
तत्र न्यस्तानि मांसानि पानभूमौ ददर्श सः ॥ १४ ॥
उस महाकाय राक्षसराजके भवन में कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने वह पानभूमि देखी, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न थी । उस मधुशाला में अलग - अलग मृगों, भैंसों और सूअरोंके मांस रखे गये थे, जिन्हें हनुमान् जीने देखा ॥
रौक्मेषु च विशालेषु भाजनेष्वप्यभक्षितान् ।
ददर्श कपिशार्दूलो मयूरान् कुक्कुटांस्तथा ॥ १५ ॥
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८ ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
वराहवाघीणसकान् दधिसौवर्चला युतान् ।
शल्यान् मृगमयूरांश्च हनुमानन्ववैक्षत ॥ १६ ॥
वानरसिंह हनुमान्ने वहाँ सोनेके बड़े - बड़े पात्रों में मोर, मुर्गे, सूअर, गैंडा, साही, हरिण तथा मयूरोंके मांस देखे, जो दही और नमक मिलाकर रखे गये थे । वे अभी खाये नहीं गये थे ॥ १५-१६ ॥
कृकलान् विविधांश्छागाञ्छशका नर्धभक्षितान् ।
महिषानेकशल्यांश्च मेषांश्च कृतनिष्ठितान् ॥ १७ ॥
लेह्यानुच्चावचान् पेयान् भोज्यान्युच्चावचानि च ।
तथाम्ललवणोत्तं सैर्विविधै रागखाण्डवैः ॥ १८ ॥
कृकल नामक पक्षी, भाँति - भाँति के बकरे, खरगोश, आधे खाये हुए भैंसे, एकशल्य नामक मत्स्य और भेड़े-ये सब - के - सब राँध पकाकर रक्खे हुए थे । इनके साथ अनेक प्रकारकी चटनियाँ भी थीं । भाँति - भाँति के पेय तथा भक्ष्य पदार्थ भी विद्यमान थे । जीभकी शिथिलता दूर करनेके लिये खटाई और नमक के साथ भाँति - भाँति के रागे और खाण्डव भी रक्खे गये थे ॥ १७-१८ ॥ महानूपुरकेयूरैरपविद्धैर्महाधनैः 1 पानभाजन विक्षिप्तैः फलैश्च विविधैरपि ॥ १ ९ ॥ कृतपुष्पोपहारा भूरधिकां पुष्यति श्रियम् । बहुमूल्य बड़े - बड़े नूपुर और बाजूबंद जहाँ - तहाँ पड़े हुए थे । मद्यपान के पात्र इधर - उधर लुढ़काये हुए थे । भाँति - भाँति के फल भी बिखरे पड़े थे । इन सबसे उपलक्षित होनेवाली वह पानभूमि, जिसे फूलोंसे सजाया गया था, अधिक शोभाका पोषण एवं संवर्धन कर रही थी ॥ १ ९ ३ ॥ तत्र तत्र च विन्यस्तैः सुश्लिष्टशयनासनैः ॥ २० ॥
पानभूमिर्विना वह्नि प्रदीप्ते वोपलक्ष्यते । यत्र - तत्र रक्खी हुई सुदृढ़ शय्याओं और सुन्दर स्वर्णमय सिंहासनोंसे सुशोभित होनेवाली वह मधुशाला ऐसी जगमगा रही थी कि बिना आगके ही जलती हुई - सी दिखायी देती थी ॥ २०३ ॥
बहुप्रकारैर्विविधैर्वर संस्कार संस्कृतैः ॥ २१ ॥
मांसैः कुशलसंयुक्तैः पानभूमिगतैः पृथक् ।
दिव्याः प्रसन्ना विविधाः सुराः कृतसुरा अपि ॥ २२ ॥
१. अंगूर और अनारके रसमें मिश्री और मधु आदि मिलानेसे जो मधुर रस तैयार होता हैं, वह पतला हो तो ' राग ' कहलाता है और गाढ़ा हो जाय तो ' खाण्डव ' नाम धारण • करता है ।
जैसा कि कहा है-सितामध्वादिमधुरो द्राक्षादाडिमयो रसः ।
विरलश्चेत् कृतो रागः सान्द्रश्चेत् खाण्डवः स्मृतः ॥
शर्करासवमाध्वीकाः पुष्पासवफलासवाः ।
वासचूर्णैश्च विविधैर्मृष्टशस्तैस्तैः पृथक् पृथक् ॥ २३ ॥
अच्छी छौंक बघारसे तैयार किये गये नाना प्रकार के विविध मांस चतुर रसोइयोंद्वारा बनाये गये थे और उस पानभूमि में पृथक् - पृथक् सजाकर रखे गये थे । उनके साथ ही स्वच्छ दिव्य सुराएँ ( जो कदम्ब आदि वृक्षोंसे स्वतः उत्पन्न हुई थीं ) और कृत्रिम सुराएँ ( जिन्हें शराब बनानेवाले लोग तैयार करते हैं ) भी वहाँ रक्खी गयी थीं । उनमें शर्करासक, माध्वीक, पुष्पासव और फलासवें भी थे । इन सबको नाना प्रकारके सुगन्धित चूर्णोंसे पृथक् - पृथक् वासित किया गया था ॥ २१-२३ ॥
संतता शुशुभे भूमिर्माल्यैश्च बहुसंस्थितैः ।
हिरण्मयैश्च कलशैर्भाजनैः स्फाटिकैरपि ॥ २४ ॥
जाम्बूनदमयैश्चान्यैः करकैरभिसंवृता । वहाँ अनेक स्थानोंपर रखे हुए नाना प्रकार के फूलों, सुवर्णमय कलशों, स्फटिकमणिके पात्रों तथा जाम्बूनदके बने हुए अन्यान्य कमण्डलुओंसे व्याप्त हुई वह पानभूमि बड़ी शोभा पा रही थी ॥ २४३ ॥
राजतेषु च कुम्भेषु जाम्बूनदमयेषु च ॥ २५ ॥
पानश्रेष्ठां तथा भूमिं कपिस्तत्र ददर्श सः । चाँदी और सोनेके घड़ोंमें, जहाँ श्रेष्ठ पेय पदार्थ रखे थे, उस पानभूमिको कपिवर इनुमान्जीने वहाँ अच्छी तरह घूम - घूमकर देखा ॥ २५३ ॥
सोऽपश्यच्छातकुम्भानि सीधोर्मणिमयानि च ॥ २६ ॥
तानि तानि च पूर्णानि भाजनानि महाकपिः । महाकपि पवनकुमारने देखा, वहाँ मदिरासे भरे हुए सोने और मणियों के भिन्न - भिन्न पात्र रखे गये हैं ॥ २६३ ॥
क्वचिदर्धावशेषाणि कचित् पीतान्यशेषतः ॥ २७ ॥
क्वचिन्नैव प्रपीतानि पानानि स ददर्श ह । किसी घड़े में आधी मदिरा शेष थी तो किसी घड़ेकी सारी की सारी पी ली गयी थी तथा किन्हीं - किन्हीं घड़ों में रक्खे हुए मद्य सर्वथा पीये नहीं गये थे । हनुमान् जीने उन सबको देखा || २७३ ॥ क्वचिद् भक्ष्यांश्च विविधान् क्वचित् पानानि भागशः । २८ । क्वचिदर्घावशेषाणि पश्यन् वै विचचार ह । कहीं नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ और कहीं पीने की वस्तुएँ अलग - अलग रक्खी गयी थीं और कहीं उनमेंसे १. शर्करासे तैयार को हुई सुरा ' शर्करासव ' कहलाती है । २. मधुसे बनायी हुई ' मदिरा ' । ३. महुआके फूलसे तथा अन्यान्य पुष्पोंके मकरन्दसे बनायी हुई सुराको ' पुष्पासव ' कहते हैं । ४. द्राक्षा आदि फलों के रससे तैयार की हुई ' सुरा ' ।
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सुन्दरकाण्डे एकादशः सर्गः ८ ९ १ आधी - आधी सामग्री ही बची थी । उन सबको देखते हुए वे वहाँ सर्वत्र विचरने लगे ॥ २८३ ॥
शयनान्यत्र नारीणां शून्यानि बहुधा पुनः ।
परस्परं समाश्लिष्य काश्चित् सुप्तावराङ्गनाः ॥ २ ९ ॥
उस अन्तःपुरमें स्त्रियोंकी बहुत - सी शय्याएँ सूनी पड़ी थीं और कितनी ही सुन्दरियाँ एक ही जगह एक - दूसरीका आलिङ्गन किये सो रही थीं ॥ २ ९ ॥
काचिच्च वस्त्रमन्यस्या अपहृत्योपगुह्य च ।
उपगम्याबला सुप्ता निद्राबलपराजिता ॥ ३० ॥
निद्रा के बलसे पराजित हुई कोई अबला दूसरी स्त्रीका वस्त्र उतारकर उसे धारण किये उसके पास जा उसीका आलिङ्गन करके सो गयी थी ॥ ३० ॥
तासामु च्छ्वासवातेन वस्त्रं माल्यं च गात्रजम् ।
नात्यर्थ स्पन्दते चित्रं प्राप्य मन्दमिवानिलम् ॥ ३१ ॥
उनकी साँसकी हवासे उनके शरीर के विविध प्रकार के वस्त्र और पुष्पमाला आदि वस्तुएँ उसी तरह धीरे - धीरे हिल रही थीं, जैसे धीमी - धीमी वायुके चलनेसे हिला करती हैं ॥ ३१ ॥
चन्दनस्य च शीतस्य सीधोर्मधुरसस्य च ।
विविधस्य च माल्यस्य पुष्पस्य विविधस्य च ॥ ३२ ॥
बहुधा मारुतस्तस्य गन्धं विविधमुद्वहन् ।
स्नानानां चन्दनानां च धूपानां चैव मूच्छितः ॥ ३३ ॥
प्रववौ सुरभिर्गन्धो विमाने पुष्पके तदा । उस समय पुष्पकविमानमें शीतल चन्दन, मद्य, मधुरस, विविध प्रकारकी माला, भाँति - भाँति के पुष्प, स्नान-सामग्री, चन्दन और धूपकी अनेक प्रकारकी गन्धका भार वहन करती हुई सुगन्धित वायु सब ओर प्रवाहित हो रही थी । श्यामावदातास्तत्रान्याः काश्चित् कृष्णा वराङ्गनाः । ३४ । काश्चित् काञ्चनवर्णाङ्गयः प्रमदा राक्षसालये । उस राक्षसराजके भवनमें कोई साँवली, कोई गोरी, कोई काली और कोई सुवर्णके समान कान्तिवाली सुन्दरी युवतियाँ सो रही थीं ॥ ३४३ ॥
तासां निद्रावशत्वाच्च मदनेन विमूच्छितम् ॥ ३५ ॥
पद्मिनीनां प्रसुप्तानां रूपमासीद् यथैव हि । निद्रा के वशमें होने के कारण उनका काममोहित रूप मुँदे हुए मुखवाले कमलपुष्पोंके समान जान पड़ता था ॥
एवं सर्वमशेषेण रावणान्तःपुरं कपिः ।
ददर्श स महातेजा न ददर्श च जानकीम् ॥ ३६ ॥
इस प्रकार महातेजस्वी कपिवर हनुमान्ने रावणका सारा अन्तःपुर छान डाला तो भी वहाँ उन्हें जनकनन्दिनी सीताका दर्शन नहीं हुआ ॥ ३६ ॥
निरीक्षमाणश्च ततस्ताः स्त्रियः स महाकपिः ।
जगाम महतीं शङ्कां धर्मसाध्वसशङ्कितः ॥ ३७ ॥
उन सोती हुई स्त्रियों को देखते - देखते महाकपि हनुमान् धर्मके भयसे शङ्कित हो उठे । उनके हृदयमें बड़ा भारी संदेह उपस्थित हो गया ॥ ३७ ॥
परदारावरोधस्य प्रसुप्तस्य निरीक्षणम् ।
इदं खलु ममात्यर्थे धर्मलोपं करिष्यति ॥ ३८ ॥
वे सोचने लगे कि इस तरह गाढ़ निद्रामें सोयी हुई परायी स्त्रियोंको देखना अच्छा नहीं है । यह तो मेरे धर्मका अत्यन्त विनाश कर डालेगा ॥ ३८ ॥
न हि मे परदाराणां दृष्टिर्विषयवर्तिनी ।
अयं चात्र मया दृष्टः परदारपरिग्रहः ॥ ३ ९ ॥
" मेरी दृष्टि अबतक कभी परायी स्त्रियोंपर नहीं पड़ी थी । यहीं आनेपर मुझे परायी स्त्रियोंका अपहरण करनेवाले इस पापी रावणका भी दर्शन हुआ है ( ऐसे पापीको देखना भी धर्मका लोप करनेवाला होता है ) ' ॥ ३ ९ ॥
तस्य प्रादुरभूञ्चिन्ता पुनरन्या मनस्विनः ।
निश्चितैकान्तचित्तस्य कार्य निश्चयदर्शिनी ॥ ४० ॥
तदनन्तर मनस्वी हनुमानजी के मनमें एक - दूसरी विचार - धारा उत्पन्न हुई । उनका चित्त अपने लक्ष्य में सुस्थिर था अतः यह नयी विचारधारा उन्हें अपने कर्तव्यका ही निश्चय करानेवाली थी ॥ ४० ॥
कामं दृष्टा मया सर्वा विश्वस्ता रावणस्त्रियः ।
न तु मे मनसा किंचिद् वैकृत्यमुपपद्यते ॥ ४१ ॥
( वे सोचने लगे ) ' इसमें संदेह नहीं कि रावणकी स्त्रियाँ निःशङ्क सो रही थीं और उसी अवस्थामें मैंने उन सबको अच्छी तरह देखा है, तथापि मेरे मनमें कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ है ॥ ४१ ॥
मनो हि हेतुः सर्वेषामिन्द्रियाणां प्रवर्तने ।
शुभाशुभास्ववस्थासु तच्च मे सुव्यवस्थितम् ॥ ४२ ॥
' सम्पूर्ण इन्द्रियोंको शुभ और अशुभ अवस्थाओं में लगने की प्रेरणा देनेमें मन ही कारण है; किंतु मेरा वह मन पूर्णतः स्थिर है ( उसका कहीं राग या द्वेष नहीं है; इसलिये मेरा यह परस्त्री - दर्शन धर्मका लोप करनेवाला नहीं हो सकता ) ॥ ४२ ॥
नान्यत्र हि मया शक्या वैदेही परिमार्गितम् ।
स्त्रियो हि स्त्रीषु दृश्यन्ते सदा सम्परिमार्गणे ॥ ४३ ॥
' विदेहनन्दिनी सीताको दूसरी जगह मैं ढूँढ़ भी तो नहीं सकता था; क्योंकि स्त्रियोंको ढूँढ़ते समय उन्हें स्त्रियोंके ही बीचमें देखा जाता है ॥ ४३ ॥
यस्य सत्त्वस्य या योनिस्तस्यां तत् परिमार्गते ।
न शक्यं प्रमदा नष्टा मृगीषु परिमार्गितुम् ॥ ४४ ॥
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८ ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे " जिस जीवकी जो जाति होती है, उसीमें उसे खोजा जाता है । खोयी हुई युवती स्त्रीको हरिनियोंके बीचमें नहीं ढूँढ़ा जा सकता है ॥ ४४ ॥
तदिदं मार्गितं तावच्छुद्धेन मनसा मया ।
रावणान्तःपुरं सर्व दृश्यते न च जानकी ॥ ४५ ॥
‘ अतः मैंने रावण के इस सारे अन्तः पुरमें शुद्ध हृदयसे ही अन्वेषण किया है; किंतु यहाँ जानकीजी नहीं दिखायी देती हैं ' ॥ ४५ ॥
देवगन्धर्व कन्याश्च नागकन्याश्च वीर्यवान् ।
अवेक्षमाणो हनुमान् नैवापश्यत जानकीम् ॥ ४६ ॥
अन्तःपुरका निरीक्षण करते हुए पराक्रमी हनुमान्ने देवताओं, गन्धर्वों और नागोंकी कन्याओंको वहाँ देखा, किंतु जनकनन्दिनी सीताको नहीं देखा ॥ ४६ ॥
तामपश्यन् कपिस्तत्र पश्यंश्चान्या वरस्त्रियः ।
अपक्रम्य तदा वीरः प्रस्थातुमुपचक्रमे ॥ ४७ ॥
दूसरी सुन्दरियोंको देखते हुए वीर वानर हनुमान्ने जब वहाँ सीताको नहीं देखा, तब वे वहाँसे हटकर अन्यत्र जानेको उद्यत हुए ॥ ४७ ॥
स भूयः सर्वतः श्रीमान् मारुतिर्यत्नमाश्रितः ।
आपानभूमिमुत्सृज्य तां विचेतुं प्रचक्रमे ॥ ४८ ॥
फिर तो श्रीमान् पवनकुमारने उस पानभूमिको छोड़कर अन्य सब स्थानोंमें उन्हें बड़े यत्नका आश्रय लेकर खोजना आरम्भ किया || ४८ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें ग्यारहवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशः सीता के मरणकी आशङ्का से हनुमानजी का शिथिल उनकी खोज करना और कहीं भी पता स तस्य मध्ये भवनस्य संस्थितो लतागृहांश्चित्रगृहान् निशागृहान् । जगाम सीतां प्रतिदर्शनोत्सुको न चैव तां पश्यति चारुदर्शनाम् ॥ १ ॥
उस राजभवन के भीतर स्थित हुए हनुमानजी सीताजी के दर्शनके लिये उत्सुक हो क्रमशः लता - मण्डपोंमें, चित्र-शालाओं में तथा रात्रिकालिक विश्राम गृहों में गये; परंतु वहाँ भी उन्हें परम सुन्दरी सीताका दर्शन नहीं हुआ ॥ १ ॥
स चिन्तयामास ततो महाकपिः प्रियामपश्यन् रघुनन्दनस्य ताम् । ध्रुवं न सीता धियते यथा न मे विचिन्वतो दर्शनमेति मैथिली ॥ २ ॥
रघुनन्दन श्रीरामकी प्रियतमा सीता जब वहाँ भी दिखायी न दीं, तब वे महाकपि हनुमान् इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- ' निश्चय ही अब मिथिलेशकुमारी सीता जीवित नहीं हैं; इसीलिये बहुत खोजनेपर भी वे मेरे दृष्टिपथमें नहीं आ रही हैं ॥ २ ॥
सा राक्षसानां प्रवरेण जानकी स्वशील संरक्षणतत्परा सती । अनेन नूनं प्रति दुष्कर्मणा हता भवेदार्यपथे परे स्थिता ॥ ३ ॥
' सती - साध्वी सीता उत्तम आर्यमार्गपर स्थित रहने वाली थीं । वे अपने शोल और सदाचारको रक्षामें तत्पर रही हैं; सर्गः होना, फिर उत्साहका आश्रय लेकर अन्य स्थानोंमें न लगनेसे पुनः उनका चिन्तित होना इसलिये निश्चय ही इस दुराचारी राक्षसराजने उन्हें मार डाला होगा ॥ ३ ॥
विरूपरूपा विकृता विवर्चसो महानना दीर्घ विरूपदर्शनाः । समीक्ष्य ता राक्षसराजयोषितो भयाद् विनष्टा जनकेश्वरात्मजा ॥ ४ ॥
' राक्षसराज रावणके यहाँ जो दास्यकर्म करनेवाली राक्षसियाँ हैं, उनके रूप बड़े बेडौल हैं । वे बड़ी विकट और विकराल हैं । उनकी कान्ति भी भयंकर है । उनके मुँह विशाल और आँखें भी बड़ी - बड़ी एवं भयानक हैं । उन सबको देखकर जनकराजनन्दिनीने भयके मारे प्राण त्याग दिये होंगे ॥ ४ ॥
सीतामदृष्ट्रा ानवाप्य पौरुषं विहृत्य कालं सह वानरैश्चिरम् । न मेऽस्ति सुग्रीवसमीपगा गतिः सुतीक्ष्णदण्डो बलवांश्च वानरः ॥ ५ ॥
' सीताका दर्शन न होनेसे मुझे अपने पुरुषार्थका फल नहीं प्राप्त हो सका । इधर वानरोंके साथ सुदीर्घकालतक इधर उधर भ्रमण करके मैंने लौटने की अवधि भी चिंता दी है; अतः अब मेरा सुग्रीवके पास जानेका भी मार्ग बंद हो गया क्योंकि वह वानर बड़ा बलवान् और अत्यन्त कठोर दण्ड देनेवाला है ॥ ५ ॥
दृष्टमन्तःपुरं सर्व दृष्टा रावणयोषितः ।
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सुन्दरकाण्डे द्वादशः सर्गः ८ ९ ३ न सीता दृश्यते साध्वी वृथा जातो मम श्रमः ॥ ६ ॥
" मैंने रावणका सारा अन्तःपुर छान डाला, एक - एक करके रावणकी समस्त स्त्रियों को भी देख लिया; किंतु अभी-तक साध्वी सीताका दर्शन नहीं हुआ; अतः मेरा समुद्रलङ्घन-का सारा परिश्रम व्यर्थ हो गया ॥ ६ ॥
किं नु मां वानराः सर्वे गतं वक्ष्यन्ति संगताः ।
गत्वा तत्र त्वया वीर किं कृतं तद् वदस्व नः ॥ ७ ॥
' जब मैं लौटकर जाऊँगा, तब सारे वानर मिलकर मुझसे क्या कहेंगे; वे पूछेंगे, वीर! वहाँ जाकर तुमने क्या किया है — यह मुझे बताओ ॥ ७ ॥
अदृष्ट्वा किं प्रवक्ष्यामि तामहं जनकात्मजाम् ।
ध्रुवं प्रायमुपासिष्ये कालस्य व्यतिवर्तने ॥ ८ ॥
" किंतु जनकनन्दिनी सीताको न देखकर मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा । सुग्रीवके निश्चित किये हुए समयका उल्लङ्घन कर देनेपर अब मैं निश्चय ही आमरण उपवास करूँगा ॥ ८ ॥
किं वा वक्ष्यति वृद्धश्च जाम्बवानङ्गदश्च सः ।
गतं पारं समुद्रस्य वानराश्च समागताः ॥ ९ ॥
' बड़े - बूढ़े जाम्बवान् और युवराज अङ्गद मुझसे क्या कहेंगे? समुद्रके पार जानेपर अन्य वानर भी जब मुझसे मिलेंगे, तब वे क्या कहेंगे? ' ॥ ९ ॥
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम् ।
भूयस्तत्र विचेष्यामि न यत्र विचयः कृतः ॥ १० ॥
( इस प्रकार थोड़ी देरतक हताश से होकर वे फिर सोचने लगे - ) ' हताश न होकर उत्साहको बनाये रखना सम्पत्तिका मूल कारण है । उत्साह ही परम सुखका हेतु है; अतः मैं पुनः उन स्थानों में सीता की खोज करूँगा, जहाँ अबतक अनुसंधान नहीं किया गया था ॥ १० ॥
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः ।
करोति सफलं जन्तोः कर्म यश्च करोति सः ॥ ११ ॥
" उत्साह ही प्राणियोंको सर्वदा सब प्रकारके कमोंमें प्रवृत्त करता है और वही उन्हें वे जो कुछ करते हैं उस कार्यमें सफलता प्रदान करता है ॥ ११ ॥
तस्मादनिर्वेदकरं यत्नं चेष्टेऽहमुत्तमम् ।
अदृष्टश्च विचेष्यामि देशान् रावण पालितान् ॥ १२ ॥
' इसलिये अब मैं और भी उत्तम एवं उत्साहपूर्वक प्रयत्नके लिये चेष्टा करूँगा । रावण के द्वारा सुरक्षित जिन स्थानों-को अबतक नहीं देखा था, उनमें भी पता लगाऊँगा ॥ १२ ॥
आपानशाला विचितास्तथा पुष्पगृहाणि च ।
चित्रशालाश्च विचिता भूयः क्रीडागृहाणि च ॥ १३ ॥
निष्कुटान्तररथ्याश्च विमानानि च सर्वशः ।
इति संचिन्त्य भूयोऽपि विचेतुमुपचक्रमे ॥ १४ ॥
' आपानशाला, पुष्पगृह, चित्रशाला, क्रीड़ागृह, गृहोद्यानकी गलियाँ और पुष्पक आदि विमान — इन सबका तो मैंने चप्पा-चप्पा देख डाला ( अब अन्यत्र खोज करूँगा ) । ' यह सोचकर उन्होंने पुनः खोजना आरम्भ किया । १३-१४ ॥
भूमीगृहांश्चैत्यगृहान गृहातिगृह कानपि ।
उत्पतन् निपतंश्चापि तिष्ठन् गच्छन् पुनः क्वचित् ॥१५ ॥
वे भूमिके भीतर बने हुए घरों ( तहखानों ) में, चौराहोंपर बने हुए मण्डपोंमें तथा घरोंको लाँघकर उनसे थोड़ी ही दूरपर बने हुए विलास भवनोंमें सीताकी खोज करने लगे । वे किसी घरके ऊपर चढ़ जाते, किसीसे नीचे कूद पड़ते, कहीं ठहर जाते देख लेते थे ॥ १५ ॥
अपवृण्वंश्च द्वाराणि प्रविशन् निष्पतंश्चापि घरों के दरवाजको खोल किसीके भीतर घुसकर देखते गिरते - पड़ते और उछलते लगे ॥ १६ ॥
और किसीको चलते - चलते ही
कपाटान्यवघट्टयन् ।
प्रपतन्नुत्पतन्निव ॥ १६ ॥
देते, कहीं किंवाड़े भिड़का देते, और फिर निकल आते थे । वे हुए - से सर्वत्र खोज करने सर्वमप्यवकाशं स विचचार महाकपिः ।
चतुरङ्गुलमात्रोऽपि नावकाशः स विद्यते ।
रावणान्तः पुरे तस्मिन् यं कपिर्न जगाम सः ॥ १७ ॥
उन महाकपिने वहाँके सभी स्थानोंमें विचरण किया । रावण के अन्तःपुरमै कोई चार अङ्गुलका भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जहाँ कपिवर हनुमानजी न पहुँचे हों ॥ १७ ॥
प्राकारान्तरवीथ्यश्व वेदिकाश्चैत्यसंश्रयाः ।
श्वभ्राश्च पुष्करिण्यच सर्व तेनावलोकितम् ॥ १८ ॥
उन्होंने परकोटे के भीतर की गलियाँ, चौराहे के वृक्षोंके नीचे बनी हुई वेदियाँ, गड्ढे और पोखरियाँ - सबको छान डाला ॥ १८ ॥
राक्षस्यो विविधाकारा विरूपा विकृतास्तथा ।
दृष्टा हनुमता तत्र न तु सा जनकात्मजा ॥ १ ९ ॥
हनुमानजीने जगह - जगह नाना प्रकारके आकारवाली, कुरूप और विकट राक्षसियाँ देखीं; किंतु वहाँ उन्हें जानकी-जीका दर्शन नहीं हुआ ॥ १ ९ ॥
रूपेणाप्रतिमा लोके परा विद्याधरस्त्रियः ।
दृष्टा हनुमता तत्र न तु राघवनन्दिनी ॥ २० ॥
संसार में जिनके रूप - सौन्दर्यकी कहीं तुलना नहीं थी ऐसी बहुत - सी विद्यावरियाँ भी हनुमान् जी की दृष्टिमें आयीं; परंतु वहाँ उन्हें श्रीरघुनाथजीको आनन्द प्रदान करनेवाली सीता नहीं दिखायी दीं ॥ २० ॥
नागकन्या वरारोहाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः ।
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८ ९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दृष्टा हनुमता तत्र न तु सा जनकात्मजा ॥ २१ ॥
हनुमानजीने सुन्दर नितम्ब और पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली बहुत - सी नागकन्याएँ भी वहाँ देखीं; किंतु जनक किशोरीका उन्हें दर्शन नहीं हुआ ॥ २१ ॥
प्रमथ्य राक्षसेन्द्रेण नागकन्या बलाद्धताः ।
दृष्टा हनुमता तत्र न सा जनकनन्दिनी ॥ २२ ॥
राक्षसराज के द्वारा नागसेनाको मथकर बलात्कार से हरकर लायी हुई नागकन्याओंको तो पवनकुमारने वहाँ देखा; किंतु जानकीजी उन्हें दृष्टिगोचर नहीं हुई ॥ २२ ॥
सोऽपश्यंस्तां महाबाहुः पश्यंश्चान्या वरस्त्रियः ।
विषसाद महाबाहुर्हनूमान् मारुतात्मजः ॥ २३ ॥
महाबाहु पवनकुमार हनुमान को दूसरी बहुत - सी सुन्दरियाँ
दिखायी दीं; परंतु सीताजी उनके देखने में नहीं आयीं ।
इसलिये वे बहुत दुखी हो गये ॥ २३ ॥
उद्योगं वानरेन्द्राणां प्लवनं सागरस्य च ।
व्यर्थ वीक्ष्यानिलसुतश्चिन्तां पुनरुपागतः ॥ २४ ॥
उन वानरशिरोमणि वीरोंके उद्योग और अपनेद्वारा किये गये समुद्रलङ्घनको व्यर्थ हुआ देखकर पवनपुत्र हनुमान् वहाँ पुनः बड़ी भारी चिन्तामें पड़ गये ॥ २४ ॥
अवतीर्य विमानाच्च हनूमान् मारुतात्मजः ।
चिन्तामुपजगामाथ शोकोपहतचेतनः ॥ २५ ॥
उस समय वायुनन्दन हनुमान् विमानसे नीचे उतर आये और बड़ी चिन्ता करने लगे । शोकसे उनकी चेतनाशक्ति शिथिल हो गयी ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें बारहवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशः सर्गः सीताजी के नाशकी आशङ्कासे हनुमानजी की चिन्ता, श्रीरामको सीताके न मिलने की सूचना देनेसे अनर्थ-की सम्भावना देख हनुमान्जीका न लौटने का निश्चय करके पुनः खोजने का विचार करना और अशोकवाटिका में ढूँढ़नेके विषय में तरह - तरह की बातें सोचना
विमानात् तु स संक्रम्य प्राकारं हरियूथपः ।
हनूमान् वेगवानासीद् यथा विद्युद् घनान्तरे ॥ १ ॥
वानरयूथपति हनुमान् विमानसे उतरकर महलके पर-कोटेपर चढ़ आये T । वहाँ आकर वे मेघमाला के अङ्कमें चमकती हुई बिजली के समान बड़े वेगसे इधर - उधर घूमने लगे ॥ १ ॥
सम्परिक्रम्य हनुमान् रावणस्य निवेशनान् ।
अदृष्ट्वा जानकी सीतामब्रवीद् वचनं कपिः ॥ २ ॥
रावण के सभी घरोंमें एक बार पुनः चक्कर लगाकर जब कपिवर हनुमान् जीने जनकनन्दिनी सीताको नहीं देखा, तब वे मन - ही - मन इस प्रकार कहने लगे ॥ २ ॥
भूयिष्ठं लोलिता लङ्का रामस्य चरता प्रियम् ।
न हि पश्यामि वैदेहीं सीतां सर्वाङ्गशोभनाम् ॥ ३ ॥
' मैंने श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करने के लिये कई बार लङ्काको छान डाला; किंतु सर्वाङ्गसुन्दरी विदेद्दनन्दिनी सीता मुझे कहीं नहीं दिखायी देती हैं ॥ ३ ॥
पल्वलानि तटाकानि सरांसि सरितस्तथा । * घनमाला में विद्युत्की उपमासे यह ध्वनित होता है कि रावणका वह परकोटा इन्द्रनीलमणिका बना हुआ था और उसपर सुवर्णके समान गौर कान्तिवाले हनुमान्जी विद्युत् के समान
प्रतीत होते थे ।
नद्योऽनूपवनान्ताश्च दुर्गाश्च धरणीधराः ॥ ४ ॥
लोलिता वसुधा सर्वा न च पश्यामि जानकीम् । ' मैंने यहाँके छोटे तालाब, पोखरे, सरोवर, सरिताएँ, नदियाँ, पानीके आस - पास के जंगल तथा दुर्गम पहाड़ - सब देख डाले । इस नगर के आसपास की सारी भूमि खोज डाली; किंतु कहीं भी मुझे जानकीजीका दर्शन नहीं हुआ ॥ ४३ ॥
इह सम्पातिना सीता रावणस्य निवेशने ।
आख्याता गृध्रराजेन न च सा दृश्यते न किम् ॥ ५ ॥
" गृध्रराज सम्पातिने तो सीताजीको यहाँ रावणके महलमें ही बताया था । फिर भी न जाने क्यों वे यहाँ दिखायी नहीं देती हैं ॥ ५ ॥
किं नु सीताथ वैदेही मैथिली जनकात्मजा ।
उपतिष्ठेत विवशा रावणेन हृता बलात् ॥ ६ ॥
' क्या रावण के द्वारा बलपूर्वक हरकर लायी हुई विदेह-कुलनन्दिनी मिथिलेशकुमारी जनकदुलारी सीता कभी विवश होकर रावणकी सेवा में उपस्थित हो सकती हैं ( यह असम्भव है ) ॥ ६ ॥
क्षिप्रमुत्पततो मन्ये सीतामादाय रक्षसः ।
बिभ्यतो रामबाणानामन्तरा पतिता भवेत् ॥ ७ ॥
" मैं तो समझता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे भयभीत हो वह राक्षस जब सीता को लेकर शीघ्रतापूर्वक आकाशमें
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सुन्दरकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ८ ९ ५ उछला है, उस समय कहीं बीचमें ही वे छूटकर गिर पड़ी हैं ॥ ७ ॥
अथवा हियमाणायाः पथि सिद्धनिषेविते ।
मन्ये पतितमार्याया हृदयं प्रेक्ष्य सागरम् ॥ ८ ॥
' अथवा यह भी सम्भव है कि जब आर्यों सीता सिद्ध-सेवित आकाशमार्ग से ले जायी जाती रही हों, उस समय समुद्रको देखकर भयके मारे उनका हृदय ही फटकर नीचे गिर पड़ा हो ॥ ८ ॥
रावणस्योरुवेगेन भुजाभ्यां पीडितेन च ।
तया मन्ये विशालाक्ष्या त्यक्तं जीवितमार्यया ॥ ९ ॥
' अथवा यह भी मालूम होता है कि रावणके प्रबल वेग और उसकी भुजाओंके दृढ़ बन्धन से पीड़ित होकर विशाल-लोचना आर्या सीताने अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया है ॥ ९ ॥
उपर्युपरि सा नूनं सागरं क्रमतस्तदा ।
विचेष्टमाना पतिता समुद्रे जनकात्मजा ॥ १० ॥
" ऐसा भी हो सकता है कि जिस समय रावण उन्हें समुद्रके ऊपर होकर ला रहा हो, उस समय जनककुमारी सीता छटपटाकर समुद्रमें गिर पड़ी हो । अवश्य ऐसा ही हुआ होगा ॥ १० ॥
आहो क्षुद्रेण चानेन रक्षन्ती शीलमात्मनः ।
अबन्धुर्भक्षिता सीता रावणेन तपखिनी ॥ ११ ॥
अथवा राक्षसेन्द्रस्य पत्नीभिरसितेक्षणा ।
अदुष्टा दुष्टभावाभिर्भक्षिता सा भविष्यति ॥ १२ ॥
" अथवा ऐसा तो नहीं हुआ कि अपने शीलकी रक्षामें तत्पर हुई किसी सहायक बन्धुकी सहायता से वञ्चित तपस्विनी सीता को इस नीच रावणने ही खा लिया हो अथवा मनमें दुष्ट भावना रखनेवाली राक्षसराज रावणकी पत्नियोंने ही कजरारे नेत्रोंवाली साध्वी सीताको अपना आहार बना लिया होगा ॥ ११-१२ ॥
सम्पूर्णचन्द्रप्रतिमं पद्मपत्रनिभेक्षणम् ।
रामस्य ध्यायती वक्त्रं पञ्चत्वं कृपणा गता ॥ १३ ॥
' हाय! श्रीरामचन्द्रजी के पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर तथा प्रफुल्ल कमलदलके सदृश नेत्रवाले मुखका चिन्तन करती हुई दयनीया सीता इस संसार से चल बसीं ॥ १३ ॥
हा राम लक्ष्मणेत्येवं हायोध्ये चेति मैथिली ।
विलप्य बहु वैदेही न्यस्तदेहा भविष्यति ॥ १४ ॥
' हा राम! हा लक्ष्मण! हा अयोध्यापुरी! इस प्रकार पुकार पुकारकर बहुत विलाप करके मिथिलेशकुमारी विदेहनन्दिनी सीताने अपने शरीरको त्याग दिया होगा ॥ १४ ॥
अथवा निहिता मन्ये रावणस्य निवेशने ।
भृशं लालप्यते बाला पञ्जरस्थेव सारिका ॥ १५ ॥
' अथवा मेरी समझ में यह आता है कि वे रावण के ही किसी गुप्त गृहमें छिपाकर रक्खी गयी हैं । हाय! वहाँ वह बाला पींजरे में बंद हुई मैनाकी तरह बारंबार आर्तनाद करती होगी ॥ १५ ॥
जनकस्य कुले जाता रामपत्नी सुमध्यमा ।
कथमुत्पलपत्राक्षी रावणस्य वशं व्रजेत् ॥ १६ ॥
' जो जनकके कुलमें उत्पन्न हुई हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नी हैं, वे नील कमलके से नेत्रोंवाली सुमध्यमा सीता रावणके अधीन कैसे हो सकती हैं? ॥ १६ ॥
विनष्टा वा प्रणष्टा वा मृता वा जनकात्मजा ।
रामस्य प्रियभार्यस्य न निवेदयितुं क्षमम् ॥ १७ ॥
' जनक किशोरी सीता चाहे गुप्त गृहमें अदृश्य करके रखी गयी हों, चाहे समुद्र में गिरकर प्राणोंसे हाथ धो बैठी हो अथवा श्रीरामचन्द्रजीके विरहका कष्ट न सह सकने के कारण उन्होंने मृत्युकी शरण ली हो, किसी भी दशा में श्रीरामचन्द्रजी-को इस बातकी सूचना देना उचित न होगा; क्योंकि वे अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते हैं ॥ १७ ॥
निवेद्यमाने दोषः स्याद् दोषः स्यादनिवेदने ।
कथं नु खलु कर्तव्यं विषमं प्रतिभाति मे ॥ १८ ॥
" इस समाचारके बताने में भी दोष है और न बताने में भी दोषकी सम्भावना है, ऐसी दशा में किस उपाय से काम लेना चाहिये? मुझे तो बताना और न बताना दोनों ही दुष्कर प्रतीत होते हैं ॥ १८ ॥
अस्मिन्नेवंगते कार्ये प्राप्तकालं क्षमं च किम् ।
भवेदिति मतिं भूयो हनुमान् प्रविचारयन् ॥ १ ९ ॥
' ऐसी दशामें जब कोई भी कार्य करना दुष्कर प्रतीत होता है, तब मेरे लिये इस समय के अनुसार क्या करना उचित होगा? ' इन्हीं बातोंपर हनुमानजी बारंबार विचार करने लगे ॥ १ ९ ॥
यदि सीतामदृष्ट्वाहं वानरेन्द्रपुरीमितः ।
गमिष्यामि ततः को मे पुरुषार्थो भविष्यति ॥ २० ॥
( उन्होंने फिर सोचा - ) ' यदि मैं सीताजीको देखे बिना ही यहाँसे वानरराजकी पुरी किष्किन्धाको लौट जाऊँगा तो मेरा पुरुषार्थ ही क्या रह जायगा? ॥ २० ॥
ममेदं लङ्घनं व्यर्थ सागरस्य भविष्यति ।
प्रवेशश्चैव लङ्कायां राक्षसानां च दर्शनम् ॥ २१ ॥
' फिर तो मेरा यह समुद्रलङ्घन, लङ्कामें प्रवेश और राक्षसों को देखना सब व्यर्थ हो जायगा ॥ २१ ॥
किंवा वक्ष्यति सुग्रीवो हरयो वापि संगताः ।
किष्किन्धामनुसम्प्राप्तं तौ वा दशरथात्मजौ ॥ २२ ॥
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८ ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ' किष्किन्धा में पहुँचने पर मुझसे मिलकर सुग्रीव, दूसरे दूसरे वानर तथा वे दोनों दशरथराजकुमार भी क्या कहेंगे? ॥ २२ ॥
गत्वा तु यदि काकुत्स्थं वक्ष्यामि परुषं वचः ।
न दृष्टेति मया सीता ततस्त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ २३ ॥
" यदि वहाँ जाकर मैं श्रीरामचन्द्रजी से यह कठोर बात कह दूँ कि मुझे सीताका दर्शन नहीं हुआ तो वे प्राणका परित्याग कर देंगे ॥ २३ ॥
परुषं दारुणं तीक्ष्णं क्रूरमिन्द्रियतापनम् ।
सीतानिमित्तं दुर्वाक्यं श्रुत्वा स न भविष्यति ॥ २४ ॥
' सीताजी के विषयमें ऐसे रूखे, कठोर, तीखे और इन्द्रियों को संताप देनेवाले दुर्वचनको सुनकर वे कदापि जीवित नहीं रहेंगे ॥ २४ ॥
तं तु कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा पञ्चत्व गतमानसम् ।
भृशानुरक्त मेधावी न भविष्यति लक्ष्मणः ॥ २५ ॥
‘ उन्हें संकटमें पड़कर प्राणोंके परित्यागका संकल्प करते देख उनके प्रति अत्यन्त अनुराग रखनेवाले बुद्धिमान् लक्ष्मण भी जीवित नहीं रहेंगे ॥ २५ ॥
विनष्टौ भ्रातरौ श्रुत्वा भरतोऽपि मरिष्यति ।
भरतं च मृतं दृष्ट्रा शत्रुघ्नो न भविष्यति ॥ २६ ॥
' अपने इन दो भाइयोंके विनाशका समाचार सुनकर भरत भी प्राण त्याग देंगे और भरतकी मृत्यु देखकर शत्रुघ्न भी जीवित नहीं रह सकेंगे ॥ २६ ॥
पुत्रान् मृतान् समीक्ष्याथ न भविष्यन्ति मातरः ।
कौसल्या च सुमित्रा च कैकेयी च न संशयः ॥ २७ ॥
" इस प्रकार चारों पुत्रोंकी मृत्यु हुई देख कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी ये तीनों माताएँ भी निस्संदेह प्राण दे देंगी ॥ २७ ॥
कृतशः सत्यसंधश्च सुग्रीवः प्लवगाधिपः ।
रामं तथागतं दृष्ट्वा ततस्त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ २८ ॥
' कृतज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीव भी जब श्रीरामचन्द्रजीको ऐसी अवस्था में देखेंगे तो स्वयं भी प्राणविसर्जन कर देंगे ॥ २८ ॥
दुर्मना व्यथिता दीना निरानन्दा तपखिनी ।
पीडिता भर्तृशोकेन रुमा त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ २ ९ ॥
' तत्पश्चात् पतिशोकसे पीड़ित हो दुखितचित्त, दीन, व्यथित और आनन्दशून्य हुई तपस्विनी रुमा भी जान दे देगी ॥ २ ९ ॥
वालिजेन तु दुःखेन पीडिता शोककर्शिता ।
पञ्चत्वमागता राशी तारापि न भविष्यति ॥ ३० ॥
" फिर तो रानी तारा भी जीवित नहीं रहेंगी । वे वालौके विरहजनित दुःखसे तो पीड़ित थीं ही, इस नूतन शोकसे कातर हो शीघ्र ही मृत्युको प्राप्त हो जायँगी ॥ ३० ॥
मातापित्रोर्विनाशेन सुग्रीवव्यसनेन च ।
कुमारोऽप्यङ्गदस्तस्माद् विजहिष्यति जीवितम् ॥ ३१ ॥
' माता - पिता के विनाश और सुग्रीवके मरणजनित संकट से पीड़ित हो कुमार अङ्गद भी अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ ३१ ॥
भर्तृजेन तु दुःखेन अभिभूता वनौकसः ।
शिरांस्यभिहनिष्यन्ति तलैर्मुष्टिभिरेव च ॥ ३२ ॥
सान्वेनानुप्रदानेन मानेन च यशखिना ।
लालिताः कपिनाथेन प्राणांस्त्यक्ष्यन्ति वानराः ॥ ३३ ॥
' तदनन्तर स्वामीके दुःखसे पीड़ित हुए सारे वानर अपने हाथों और मुक्कोंसे सिर पीटने लगेंगे । यशस्वी वानर-राजने सान्त्वनापूर्ण वचनों और दान - मानसे जिनका लालन-पालन किया था, वे वानर अपने प्राणका परित्याग कर देंगे ॥ ३२-३३ ॥
न वनेषु न शैलेषु न निरोधेषु वा पुनः ।
क्रीडामनुभविष्यन्ति समेत्य कपिकुञ्जराः ॥ ३४ ॥
" ऐसी अवस्था में शेष वानर वनों, पर्वतों और गुफाओं में एकत्र होकर फिर कभी क्रीड़ा - विहारका आनन्द नहीं लेंगे ॥ ३४ ॥
सपुत्रदाराः सामात्या भर्तृव्यसनपीडिताः ।
शैलाग्रेभ्यः पतिष्यन्ति समेषु विषमेषु च ॥ ३५ ॥
' अपने राजा के शोक से पीड़ित हो सब वानर अपने पुत्र, स्त्री और मन्त्रियों सहित पर्वतोंके शिखरोंसे नीचे सम अथवा विषम स्थानोंमें गिरकर प्राण दे देंगे ॥ ३५ ॥
विषमुद्बन्धनं वापि प्रवेशं ज्वलनस्य वा ।
उपवासमथो शस्त्रं प्रचरिष्यन्ति वानराः ॥ ३६ ॥
' अथवा सारे विष पी लेंगे या फाँसी लगा लेंगे या जलती आगमें प्रवेश कर जायेंगे । उपवास करने लगेंगे अथवा अपने ही शरीरमें छुरा भोंक लेंगे ॥ ३६ ।
घोरमारोदनं मन्ये गते मयि भविष्यति ।
इक्ष्वाकुकुलनाशश्च नाशश्चैव वनौकसाम् ॥ ३७ ॥
' मेरे वहाँ जानेपर मैं समझता हूँ बड़ा भयंकर आर्तनाद होने लगेगा । इक्ष्वाकुकुलका नाश और वानरोंका भी विनाश हो जायगा ॥ ३७ ॥
सोऽहं नैव गमिष्यामि किष्किन्धां नगरीमितः ।
नहि शक्ष्याम्यहं द्रष्टुं सुग्रीवं मैथिलीं विना ॥ ३८ ॥
' इसलिये मैं यहाँसे किष्किन्धापुरीको तो नहीं जाऊँगा । मिथिलेशकुमारी सीताको देखे बिना मैं सुग्रीवका भी दर्शन नहीं कर सकूँगा ॥ ३८ ॥
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सुन्दरकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ८ ९ ७
मय्यगच्छति चेहस्थे धर्मात्मानौ महारथौ ।
आशया तौ धरिष्येते वानराश्च तरखिनः ॥ ३ ९ ॥
' यदि मैं यहीं रहूँ और वहाँ न जाऊँ तो मेरी आशा लगाये वे दोनों धर्मात्मा महारथी बन्धु प्राण धारण किये रहेंगे और वे वेगशाली वानर भी जीवित रहेंगे ॥ ३ ९ ॥
हस्तादानो मुखादानो नियतो वृक्षमूलिकः ।
वानप्रस्थो भविष्यामि ह्यदृष्ट्वा जनकात्मजाम् ॥ ४० ॥
' जानकीजीका दर्शन न मिलने पर मैं यहाँ वानप्रस्थी हो जाऊँगा । मेरे हाथपर अपने - आप जो फल आदि खाद्य वस्तु प्राप्त हो जायगी, उसीको खाकर रहूँगा । या परेच्छासे मेरे मुँहमें जो फल आदि खाद्य वस्तु पड़ जायगी, उसी से निर्वाह करूँगा तथा शौच, संतोष आदि नियमोंके पालन-पूर्वक वृक्ष के नीचे निवास करूँगा ॥ ४० ॥
सागरानूपजे देशे बहुमूलफलोदके ।
चितिं कृत्वा प्रवेक्ष्यामि समिद्धमरणीसुतम् ॥ ४१ ॥
' अथवा सागरतटवर्ती स्थानमें, जहाँ फल - मूल और जलकी अधिकता होती है, मैं चिता बनाकर जलती हुई आगमें प्रवेश कर जाऊँगा ॥ ४१ ॥
उपविष्टस्य वा सम्यग् लिङ्गिनं साधयिष्यतः ।
शरीरं भक्षयिष्यन्ति वायसाः श्वापदानि च ॥ ४२ ॥
' अथवा आमरण उपवासके लिये बैठकर लिङ्गशरीरधारी जीवात्माका शरीरसे वियोग कराने के प्रयत्नमें लगे हुए मेरे शरीर को कौवे तथा हिंसक जन्तु अपना आहार बना लेंगे ॥ ४२ ॥
इदमप्यृषिभिर्दृष्टं निर्याणमिति मे मतिः ।
सम्यगापः प्रवेक्ष्यामि न चेत् पश्यामि जानकीम् ॥४३ ॥
" यदि मुझे जानकीजीका दर्शन नहीं हुआ तो मैं खुशी-खुशी जल समाधि ले लूँगा । मेरे विचारसे इस तरह जल-प्रवेश करके परलोकगमन करना ऋषियोंकी दृष्टिमें भी उत्तम ही है ॥ ४३ ॥
सुजातमूला सुभगा कीर्तिमाला यशस्विनी ।
प्रभग्ना चिररात्राय मम सीतामपश्यतः ॥ ४४ ॥
' जिसका प्रारम्भ शुभ है, ऐसी सुभगा, यशस्विनी और मेरी कीर्तिमालारूपा यह दीर्घरात्रि भी सीताजीको देखे बिना ही बीत चली ॥ ४४ ॥
तापसो वा भविष्यामि नियतो वृक्षमूलिकः ।
नेतः प्रतिगमिष्यामि तामदृष्ट्वासितेक्षणाम् ॥ ४५ ॥
' अथवा अब मैं नियमपूर्वक वृक्षके नीचे निवास करनेवाला तपस्वी हो जाऊँगा; किंतु उस असितलोचना सीताको देखे बिना यहाँसे कदापि नहीं लौहूँगा ॥ ४५ ॥
यदि तु प्रतिगच्छामि सीतामनधिगम्य ताम् ।
अङ्गदः सहितः सर्वैर्वानरैर्न भविष्यति ॥ ४६ ॥
' यदि सीताका पता लगाये बिना ही मैं लौट जाऊँ तो समस्त वानरोंसहित अङ्गद जीवित नहीं रहेंगे ॥ ४६ ॥
विनाशे बहवो दोषा जीवन प्राप्नोति भद्रकम् ।
तस्मात् प्राणान् धरिष्यामि ध्रुवो जीवति संगमः ॥४७ ॥
" इस जीवनका नाश कर देनेमें बहुत - से दोष हैं । जो पुरुष जीवित रहता है, वह कभी - न - कभी अवश्य कल्याण-का भागी होता है; अतः मैं इन प्राणोंको धारण किये रहूँगा । जीवित रहनेपर अभीष्ट वस्तु अथवा सुखकी प्राप्ति अवश्यम्भावी है ' ॥ ४७ ॥
एवं बहुविधं दुःखं मनसा धारयन् बहु ।
नाध्यगच्छत् तदा पारं शोकस्य कपिकुञ्जरः ॥ ४८ ॥
इस तरह मनमें अनेक प्रकारके दुःख धारण किये कपिकुञ्जर हनुमानजी शोकका पार न पा सके । ४८ ॥ ततो विक्रममासाद्य धैर्यवान् कपिकुञ्जरः ।
रावणं वा वधिष्यामि दशग्रीवं महाबलम् ।
काममस्तु हृता सीता प्रत्याचीर्णे भविष्यति ॥ ४ ९ ॥
तदनन्तर धैर्यवान् कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने पराक्रमका सहारा लेकर सोचा- ' अथवा महाबली दशमुख रावणका ही वध क्यों न कर डालूँ । भले ही सीताका अपहरण हो गया हो, इस रावणको मार डालनेसे उस वैरका भरपूर बदला
सघ जायगा ॥। ४ ९ ॥
अथवैनं समुत्क्षिप्य उपर्युपरि सागरम् ।
रामायोपहरिष्यामि पशुं पशुपतेरिव ॥ ५० ॥
' अथवा इसे उठाकर समुद्र के ऊपर - ऊपरसे ले जाऊँ और जैसे पशुपति ( रुद्र या अग्नि ) को पशु अर्पित किया जाय, उसी प्रकार श्रीरामके हाथमें इसको सौंप दूँ ' ॥ ५० ॥
इति चिन्तासमापन्नः सीतामनधिगम्य ताम् ।
ध्यानशोकपरीतात्मा चिन्तयामास वानरः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार सीताजीको न पाकर वे चिन्तामें निमग्न हो गये । उनका मन सीताके ध्यान और शोकमें डूब गया । फिर वे वानरवीर इस प्रकार विचार करने लगे – ॥ ५१ ॥
यावत् सीतां न पश्यामि रामपत्नीं यशस्विनीम् ।
तावदेतां पुरीं लङ्कां विचिनोमि पुनः पुनः ॥ ५२ ॥
" जबतक मैं यशस्विनी श्रीराम - पत्नी सीताका दर्शन न कर लूँगा, तबतक इस लङ्कापुरीमें बारंबार उनकी खोज करता रहूँगा ॥ ५२ ॥
सम्पातिवचनाच्चापि रामं यद्यानयाम्यहम् ।
अपश्यन् राघवो भार्यो निर्दहेत् सर्ववानरान् ॥ ५३ ॥
वा ० रा ० ५. ७.५-