Ramayana 2 — पृष्ठ 71–80
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
पृष्ठ 71
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८ ९ ८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे " यदि सम्पाति के कहने से भी मैं श्रीरामको यहाँ बुला ले आऊँ तो अपनी पत्नीको यहाँ न देखनेपर श्रीरघुनाथजी समस्त वानरोंको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ ५३ ॥
इहैव नियताहारो वत्स्यामि नियतेन्द्रियः ।
न मत्कृते विनश्येयुः सर्वे ते नरवानराः ॥ ५४ ॥
" अतः यहीं नियमित आहार और इन्द्रियोंके संयमपूर्वक निवास करूँगा । मेरे कारण वे समस्त नर और वानर नष्ट न हों ॥ ५४ ॥
अशोकवनिका चापि महतीयं महाद्रुमा ।
इमामधिगमिष्यामि नहीयं विचिता मया ॥ ५५ ॥
' इधर यह बहुत बड़ी अशोकवाटिका है, इसके भीतर बड़े - बड़े वृक्ष हैं । इसमें मैंने अभीतक अनुसंधान नहीं किया है, अतः अब इसीमें चलकर ढूँढूँगा ॥ ५५ ॥
वसून रुद्रांस्तथाऽऽदित्यानश्विनौ मरुतोऽपि च ।
नमस्कृत्वा गमिष्यामि रक्षसां शोकवर्धनः ॥ ५६ ॥
' राक्षसों के शोकको बढ़ानेवाला मैं यहाँसे वसु, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार और मरुद्गणोंको नमस्कार करके अशोक वाटिका में चलूँगा ॥ ५६ ॥
जित्वा तु राक्षसान् देवीमिक्ष्वाकु कुलनन्दिनीम् ।
सम्प्रदास्यामि रामाय सिद्धीमिव तपखिने ॥ ५७ ॥
वहाँ समस्त राक्षसोंको जीतकर जैसे तपस्वीको सिद्धि प्रदान की जाती है, इसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके हाथमें इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाली देवी सीताको सौंप दूंगा ' ॥ ५७ ॥
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा चिन्ताविग्रथितेन्द्रियः ।
उदतिष्ठन् महाबाहुर्हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ५८ ॥
नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै । नमोऽस्तु रुद्रन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्राग्निमरुद्गणेभ्यः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार दो घड़ोतक सोच - विचारकर चिन्तासे शिथिल इन्द्रियवाले महाबाहु पवनकुमार हनुमान् सहसा उठकर खड़े हो गये ( और देवताओंको नमस्कार करते हुए बोले - ) ' लक्ष्मणसहित श्रीरामको नमस्कार है । जनकनन्दिनी सीता देवीको भी नमस्कार है । रुद्र, इन्द्र, यम और वायु देवताको नमस्कार है तथा चन्द्रमा, अग्नि एवं मरुद्गणोंको भी नमस्कार है ' ॥ ५८-५९ ॥
स तेभ्यस्तु नमस्कृत्वा सुग्रीवाय च मारुतिः ।
दिशः सर्वाः समालोक्य सोऽशोकवनिकां प्रति ॥ ६० ॥
इस प्रकार उन सबको तथा सुग्रीवको भी नमस्कार करके पवनकुमार हनुमानजी सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टिपात करके अशोकवाटिका में जानेको उद्यत हुए ॥ ६० ॥
स गत्वा मनसा पूर्वमशोकवनिकां शुभाम् ।
उत्तरं चिन्तयामास वानरो मारुतात्मजः ॥ ६१ ॥
उन वानरवीर पवनकुमारने पहले मनके द्वारा ही उस सुन्दर अशोकवाटिका में जाकर भावी कर्तव्यका इस प्रकार चिन्तन किया ॥ ६१ ॥
ध्रुवं तु रक्षोबहुला भविष्यति वनाकुला ।
अशोकवनिका पुण्या सर्वसंस्कार संस्कृता ॥ ६२ ॥
' वह पुण्यमयी अशोकवाटिका सींचने - कोड़ने आदि सब प्रकार के संस्कारोंसे सँवारी गयी है । वह दूसरे दूसरे वनोंसे भी घिरी हुई है; अतः उसकी रक्षा के लिये वहाँ निश्चय ही बहुत - से राक्षस तैनात किये गये होंगे ॥ ६२ ॥
रक्षिणश्चात्र विहिता नूनं रक्षन्ति पादपान् ।
भगवानपि विश्वात्मा नातिक्षोभं प्रवायति ॥ ६३ ॥
' राक्षसराज के नियुक्त किये हुए रक्षक अवश्य ही वहाँके वृक्षोंकी रक्षा करते होंगे; इसलिये जगत् के प्राणस्वरूप भगवान् वायुदेव भी वहाँ अधिक वेगसे नहीं बहते होंगे ॥
संक्षिप्तोऽयं मयाऽऽत्मा च रामार्थे रावणस्य च ।
सिद्धि दिशन्तु मे सर्वे देवाः सर्षिगणास्त्विह ॥ ६४ ॥
" मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्यकी सिद्धि तथा रावणसे अदृश्य रहने के लिये अपने शरीरको संकुचित करके छोटा बना लिया है । मुझे इस कार्य में ऋषियों सहित समस्त देवता सिद्धि- सफलता प्रदान करें ॥ ६४ ॥
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् देवाश्चैव तपखिनः ।
सिद्धिमग्निश्च वायुश्च पुरुहूतश्च वज्रभृत् ॥ ६५ ॥
" स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा, अन्य देवगण, तपोनिष्ठ महर्षि, अग्निदेव, वायु तथा वज्रधारी इन्द्र भी मुझे सफलता प्रदान करें ॥ ६५ ॥
वरुणः पाशहस्तश्च सोमादित्यौ तथैव च ।
अश्विनौ च महात्मानौ मरुतः सर्व एव च ॥ ६६ ॥
सिद्धिं सर्वाणि भूतानि भूतानां चैव यः प्रभुः ।
दास्यन्ति मम ये चान्येऽप्यदृष्टाः पथि गोचराः ॥ ६७ ॥
' पाशधारी वरुण, सोम, आदित्य, महात्मा अश्विनी-कुमार, समस्त मरुद्गण, सम्पूर्ण भूत और भूतोंके अधिपति तथा और भी जो मार्गमें दीखनेवाले एवं न दीखनेवाले देवता हैं, वे सब मुझे सिद्धि प्रदान करेंगे ॥ ६६-६७ ॥ तदुन्नसं पाण्डुरदन्तमवणं. शुचिस्मितं पद्मपलाशलोचनम् । द्रक्ष्ये तदार्यावदनं कदा न्वहं प्रसन्नताराधिपतुल्यवर्चसम् ॥ ६८ ॥
पृष्ठ 72
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुन्दरकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ८ ९९ " जिसकी नाक ऊँची और दाँत सफेद हैं, जिसमें चेचक आदिके दाग नहीं हैं, जहाँ पवित्र मुसकानकी छटा छायी रहती है, जिसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान सुशोभित होते हैं तथा जो निष्कलङ्क कलाधरके तुल्य कमनीय कान्तिसे युक्त है, वह आर्या सीताका मुख मुझे कम दिखायी देगा? ॥ क्षुद्रेण नृशंसमूर्तिना सुदारुणालंकृतवेषधारिणा बलाभिभूता ह्यबला तपखिनी कथं नु मे दृष्टिपथेऽद्य सा भवेत् ॥ ६ ९ ॥ ' इस क्षुद्र, नीच, नृशंसरूपधारी और अत्यन्त दारुण होनेपर भी अलंकारयुक्त विश्वसनीय वेष धारण करनेवाले रावणने उस तपस्विनी अवलाको बलात्कारसे अपने अधीन कर लिया है । अब किस प्रकार वह मेरे दृष्टिपथमें आ सकती हैं? ' ॥ ६ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्धरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १३ ॥
चतुर्दशः सर्गः हनुमान्जीका अशोकवाटिकामें प्रवेश करके उसकी शोभा देखना तथा एक अशोकवृक्षपर छिपे रहकर वहीं से सीताका अनुसंधान करना
मुहूर्तमिव ध्यात्वा मनसा वाधिगम्य ताम् ।
अवप्लुतो महातेजाः प्राकारं तस्य वेश्मनः ॥ १ ॥
महातेजस्वी हनुमानजी एक मुहूर्ततक इसी प्रकार विचार करते रहे । तत्पश्चात् मन - ही - मन सीताजीका ध्यान करके वे रावण के महल से कूद पड़े और अशोकवाटिका की चहारदीवारी पर चढ़ गये ॥ १ ॥
स तु संहृष्टसर्वाङ्गः प्राकारस्थो महाकपिः ।
पुष्पिताग्रान् वसन्तादौ ददर्श विविधान् द्रुमान् ॥ २ ॥
उस चहारदीवारीपर बैठे हुए महाकपि हनुमानजी के सारे अङ्गोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया । उन्होंने वसंत के आरम्भमें वहाँ नाना प्रकारके वृक्ष देखे, जिनकी डालियों के अग्रभाग फूलों के भारसे लदे थे ॥ २ ॥
सालानशोकान् भव्यांश्च चम्पकांश्च सुपुष्पितान् ।
उद्दालकान नागवृक्षांश्चूतान् कपिमुखानपि ॥ ३ ॥
तथाऽऽम्रवणसम्पन्नाल्लताशतसमन्वितान् ।
ज्यामुक्त इव नाराचः पुप्लुवे वृक्षवाटिकाम् ॥ ४ ॥
वहाँ साल, अशोक, निम्ब और चम्पाके वृक्ष खूब खिले हुए थे । बहुवार, नागकेसर और बन्दरके मुँहकी भाँति लाल फल देनेवाले आम भी पुष्प एवं मञ्जरियसे सुशोभित हो रहे थे । अमराइयोंसे युक्त वे सभी वृक्ष शत-शत लताओंसे आवेष्टित थे । हनुमानजी प्रत्यञ्चासे छूटे हुए बाणके समान उछले और उन वृक्षोंकी वाटिका में जा पहुँचे ॥ ३-४ ॥
स प्रविश्य विचित्रां तां विहगैरभिनादिताम् ।
राजतैः काञ्चनैश्चैव पादपैः सर्वतो वृताम् ॥ ५ ॥
विहगैर्मृगसङ्घैश्व विचित्रां चित्रकाननाम् ।
उदितादित्यसंकाशां ददर्श हनुमान् बली ॥ ६ ॥
वह विचित्र वाटिका सोने और चाँदीके समान वर्णवाले वृक्षों द्वारा सब ओरसे घिरी हुई थी । उसमें नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे, जिससे वह सारी वाटिका गूँज रही थी । उसके भीतर प्रवेश करके बलवान् हनुमानजीने उसका निरीक्षण किया । भाँति - भाँति के विहंगमों और मृगसमूह से उसकी विचित्र शोभा हो रही थी । वह विचित्र काननों से अलंकृत थी और नवोदित सूर्यके समान अरुण रंगकी दिखायी देती थी ॥ ५-६ ॥
वृतां नानाविधैर्वृक्षैः पुष्पोपगफलोपगैः ।
कोकिलैर्भृङ्गराजैश्च मत्तैर्नित्यनिषेविताम् ॥ ७ ॥
फूलों और फलोंसे लदे हुए नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त हुई उस अशोकवाटिकाका मतवाले कोकिल और भ्रमर सेवन करते थे ॥ ७ ॥
प्रहृष्टमनुजां काले मृगपक्षिमदाकुलाम् ।
मत्तवर्हिणसंघुष्टां नानाद्विजगणायुताम् ॥ ८ ॥
वह वाटिका ऐसी थी, जहाँ जानेसे हर समय लोगों के मनमें प्रसन्नता होती थी । मृग और पक्षी मदमत्त हो उठते थे । मतवाले मोरोंका कलनाद वहाँ निरन्तर गूँजता रहता था और नाना प्रकारके पक्षी वहाँ निवास करते थे ॥ ८ ॥
मार्गमाणो वरारोहां राजपुत्रीमनिन्दिताम् ।
सुखप्रसुप्तान् विहगान् बोधयामास वानरः ॥ ९ ॥
उस वाटिका में सती - साध्वी सुन्दरी राजकुमारी सीताकी खोज करते हुए वानरवीर हनुमान्ने घोंसलोंमें सुखपूर्वक सोये हुए पक्षियोंको जगा दिया ॥ ९ ॥
उत्पतद्भिर्द्विजगणैः पक्षैर्वातः समाहताः ।
अनेकवर्णा विविधा मुमुचुः पुष्पवृष्टयः ॥ १० ॥
उड़ते हुए विहंगमोंके पंखोंकी हवा लगनेसे वहाँके वृक्ष अनेक प्रकारके रंग - बिरंगे फूलों की वर्षा करने लगे ॥ १० ॥
पृष्ठ 73
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ ०० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
पुष्पाव कीर्णः शुशुभे हनूमान् मारुतात्मजः ।
अशोकवनिकामध्ये यथा पुष्पमयो गिरिः ॥ ११ ॥
उस समय पवनकुमार हनुमान् जी उन फूलोंसे आच्छादित होकर ऐसी शोभा पाने लगे, मानो उस अशोकवनमें कोई फूलों का बना हुआ पहाड़ शोभा पा रहा हो ॥ ११ ॥
दिशः सर्वाभिधावन्तं वृक्षखण्डगतं कपिम् ।
दृष्ट्वा सर्वाणि भूतानि वसन्त इति मेनिरे ॥ १२ ॥
सम्पूर्ण दिशाओं में दौड़ते और वृक्षसमूहों में घूमते हुए कविवर हनुमान् जीको देखकर समस्त प्राणी एवं राक्षस ऐसा मानने लगे कि साक्षात् ऋतुराज वसन्त ही यहाँ वानरवेश में विचर रहा है ॥ १२ ॥
वृक्षेभ्यः पतितैः पुष्पैरवकीर्णा पृथग्विधैः ।
रराज वसुधा तत्र प्रमदेव विभूषिता ॥ १३ ॥
वृक्षोंसे झड़कर गिरे हुए भाँति - भाँति के फूलोंसे आच्छादित हुई वहाँकी भूमि फूलोंके शृङ्गारसे विभूषित हुई युवती स्त्रीके समान शोभा पाने लगी ॥ १३ ॥
तरखिना ते तरवस्तरसा बहु कम्पिताः ।
कुसुमानि विचित्राणि ससृजुः कपिना तदा ॥ १४ ॥
उस समय उन वेगशाली वानरवीरके द्वारा वेगपूर्वक बारंबार हिलाये हुए वे वृक्ष विचित्र पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ १४ ॥
निर्धूतपत्रशिखराः शीर्णपुष्पफल द्रुमाः ।
निक्षिप्तवस्त्राभरणा धूर्ता इव पराजिताः ॥ १५ ॥
इस प्रकार डालियोंके पत्ते झड़ जाने तथा फल - फूल और पल्लवोंके टूटकर बिखर जानेसे नंग - धड़ंग दिखायी देनेवाले वे वृक्ष उन हारे हुए जुआरियोंके समान जान पड़ते थे, जिन्होंने अपने गहने और कपड़े भी दाँवपर रख दिये हों ॥ १५ ॥
हनूमता वेगवता कम्पितास्ते नगोत्तमाः ।
पुष्पपत्रफलान्याशु मुमुचुः फलशालिनः ॥ १६ ॥
वेगशाली हनुमानजी के दिलाये हुए वे फलशाली श्रेष्ठ वृक्ष तुरंत ही अपने फल - फूल और पत्तोंका परित्याग कर देते थे ॥ १६ ॥
विहङ्गहनास्ते स्कन्धमात्राश्रया द्रुमाः ।
बभूवुरगमाः सर्वे मारुतेन विनिर्धुताः ॥ १७ ॥
पवनपुत्र हनुमान्द्वारा कम्पित किये गये वे वृक्ष फल - फूल आदिके न होनेसे केवल डालियोंके आश्रय बने हुए थे; पक्षियोंके समुदाय भी उन्हें छोड़कर चल दिये थे । उस अवस्था में वे सब के सब प्राणिमात्रके लिये अगम्य ( असेवनीय ) हो गये थे ॥ १७ ॥
विधूतकेशी युवतिर्यथा मृदितवर्णका ।
निपीतशुभदन्तोष्ठी नखैर्दन्तैश्च विक्षता ॥ १८ ॥
तथा लाङ्गलहस्तैस्तु चरणाभ्यां च मर्दिता ।
तथैवाशोकवनिका प्रभग्नवनपादपा ॥ १ ९ ॥
जिसके केश खुल गये हैं, अङ्गराग मिट गये हैं, सुन्दर दन्तावलीसे युक्त अघर - सुधाका पान कर लिया गया है । तथा जिसके कतिपय अङ्ग नखक्षत एवं दन्तक्षतसे उपलक्षित हो रहे हैं, प्रियतमके उपभोगमें आयी हुई उस युवतीके समान ही उस अशोकवाटिका की भी दशा हो रही थी । हनुमान् जीके हाथ - पैर और पूँछसे रौंदी जा चुकी थी तथा उसके अच्छे - अच्छे वृक्ष टूटकर गिर गये थे; इसलिये वह श्रीहीन हो गयी थी ॥ १८-१९ ॥
महालतानां दामानि व्यधमत् तरसा कपिः ।
यथा प्रावृषि वेगेन मेघजालानि मारुतः ॥ २० ॥
जैसे वायु वर्षा ऋतु अपने वेगसे मेघसमूहको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार कपिवर हनुमान् ने वहाँ फैली हुई विशाल लता- वल्लरियोंके वितान वेगपूर्वक तोड़ डाले ॥ २० ॥
स तत्र मणिभूमीश्च राजतीश्व मनोरमाः ।
तथा काञ्चनभूमीश्च विचरन् ददृशे कपिः ॥ २१ ॥
वहाँ विचरते हुए उन वानरवीरने पृथक् - पृथक् ऐसी मनोरम भूमियोंका दर्शन किया, जिनमें मणि, चाँदी एवं सोने जड़े गये थे ॥ २१ ॥
वापीश्च विविधाकाराः पूर्णाः परमवारिणा ।
महाहैर्मणिसोपानैरुपपन्नास्ततस्ततः ॥ २२ ॥
मुक्ताप्रवालसिकताः स्फाटिकान्तर कुट्टिमाः ।
काञ्चनैस्तरुभिश्वित्रैस्तीरजैरुपशोभिताः ॥ २३ ॥
उस वाटिका में उन्होंने जहाँ - तहाँ विभिन्न आकारोंकी बावड़ियाँ देखीं, जो उत्तम जलसे भरी हुई और मणिमय सोपानोंसे युक्त थीं । उनके भीतर मोती और मूँगों की बालुकाएँ थीं । जलके नीचेकी फर्श स्फटिक मणिकी बनी हुई थी और उन बावड़ियोंके तोंपर तरह - तरह के विचित्र सुवर्णमय वृक्ष शोभा दे रहे थे ॥ २२-२३ ॥
बुद्धपद्मोत्पलवनाश्चक्रवाकोपशोभिताः ।
न्यूहरु संघुष्टा हंससारसनादिताः ॥ २४ ॥
उनमें खिले हुए कमलोके वन और चक्रवाकोंके जोड़े शोभा बढ़ा रहे थे तथा पीहा, इंस और सारसोंके कलनाद गूँज रहे थे ॥ २४ ॥
दीर्घाभिर्दुमयुक्ताभिः सरिद्भिश्च समन्ततः ।
अमृतोपमतोयाभिः शिवाभिरुपसंस्कृताः ॥ २५ ॥
अनेकानेक विशाल, तटवर्ती वृक्षोंसे सुशोभित, अमृतके समान मधुर जलसे पूर्ण तथा सुखदायिनी सरिताएँ चारों ओरसे उन बावड़ियों का सदा संस्कार करती थीं ( उन्हें स्वच्छ जलसे परिपूर्ण बनाये रखती थीं ) ॥ २५ ॥
पृष्ठ 74
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुन्दरकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ९ ०१
लताशतैरवतताः संतानकुसुमावृताः ।
नानागुल्मावृतवनाः करवीरकृतान्तराः ॥ २६ ॥
उनके तटोंपर सैकड़ों प्रकारकी लताएँ फैली हुई थीं । खिले हुए कल्पवृक्षोंने उन्हें चारों ओरसे घेर रखा था । उनके जल नाना प्रकारकी झाड़ियोंसे ढके हुए थे तथा बीच - बीचमें खिले हुए पाते थे ॥ २६ ॥
ततोऽम्बुधरसंकाशं विचित्रकूट कूटैश्च शिला गृहैवततं ददर्श कपिशार्दूलो फिर वहाँ कपिश्रेष्ठ और ऊँचे शिखरोंवाला विचित्र थीं । उसके कनेरके वृक्ष गवाक्षकी - सी शोभा
प्रवृद्धशिखरं गिरिम् ।
सर्वतः परिवारितम् ॥ २७ ॥
नानावृक्षसमावृतम् ।
रम्यं जगति पर्वतम् ॥ २८ ॥
हनुमान्ने एक मेघके समान काला पर्वत देखा, जिसकी चोटियाँ बड़ी चारों ओर दूसरे दूसरे भी बहुत - से पर्वत - शिखर शोभा पाते थे । उसमें बहुत - सी पत्थरकी गुफाएँ थीं और उस पर्वतपर अनेकानेक वृक्ष उगे हुए थे । वह पर्वत संसारभर में बड़ा रमणीय था ॥। २७-२८ ॥
ददर्श च नगात् तस्मान्नदीं निपतितां कपिः ।
अङ्कादिव समुत्पत्य प्रियस्य पतितां प्रियाम् ॥ २ ९ ॥
कपिवर हनुमान्ने उस पर्वतसे गिरी हुई एक नदी देखी, जो प्रियतमके अङ्कसे उछलकर गिरी हुई प्रियतमा के समान जान पड़ती थी ॥ २ ९ ॥
जले निपतितायैश्च पादपैरुपशोभिताम् ।
वार्यमाणामिव क्रुद्धां प्रमदां प्रियबन्धुभिः ॥ ३० ॥
जिनकी डालियाँ नीचे झुककर पानी से लग गयी थीं, ऐसे तटवर्ती वृक्षोंसे उस नदी की वैसी ही शोभा हो रही थी, मानो प्रियतमसे रूठकर अन्यत्र जाती हुई युवतीको उसकी प्यारी सखियाँ उसे आगे बढ़नेसे रोक रही हों ॥ ३० ॥
पुनरावृत्ततोयां च ददर्श स महाकपिः ।
प्रसन्नामिव कान्तस्य कान्तां पुनरुपस्थिताम् ॥ ३१ ॥
फिर उन महाकपिने देखा कि वृक्षोंकी उन डालियोंसे टकराकर उस नदी के जलका प्रवाह पीछे की ओर मुड़ गया है । मानो प्रसन्न हुई प्रेयसी पुनः प्रियतमकी सेवामें उपस्थित हो रही हो ॥ ३१ ॥
तस्यादूरात् स पद्मिन्यो नानाद्विजगणायुताः ।
ददर्श कपिशार्दूलो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ३२ ॥
उस पर्वतसे थोड़ी ही दूरपर कपिश्रेष्ठ पवनपुत्र हनुमान्ने बहुत - से कमलमण्डित सरोवर देखे, जिनमें नाना प्रकारके पक्षी चहचहा रहे थे ॥ ३२ ॥
कृत्रिम दीर्घिकां चापि पूर्णा शीतेन वारिणा ।
मणिप्रवर सोपानां मुक्तासिकतशोभिताम् ॥ ३३ ॥
उनके सिवा उन्होंने एक कृत्रिम तालाब भी देखा, जो शीतल जलसे भरा हुआ था । उसमें श्रेष्ठ मणियोंकी सीढ़ियाँ बनी थीं और वह मोतियोंकी बालुकाराशिसे सुशोभित था ॥ ३३ ॥
विविधैर्मृगसङ्घैश्व विचित्रां चित्रकाननाम् ।
प्रासादैः सुमहद्भिश्च निर्मितैर्विश्वकर्मणा ॥ ३४ ॥
काननैः कृत्रिमैश्चापि सर्वतः समलंकृताम् । उस अशोकवाटिका में विश्वकर्माके बनाये हुए बड़े - बड़े महल और कृत्रिम कानन सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । नाना प्रकारके मृगसमूहोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी । उस वाटिका में विचित्र वन - उपवन शोभा दे रहे थे || ३४३ ॥ ये केचित् पादपास्तत्र पुष्पोपगफलोपगाः ॥ ३५ ॥
सच्छत्राः सवितर्दीकाः सर्वे सौवर्णवेदिकाः । वहाँ जो कोई भी वृक्ष थे, वे सब फल - फूल देनेवाले थे, छत्रकी भाँति घनी छाया किये रहते थे । उन सबके नीचे चाँदीकी और उसके ऊपर सोनेकी वेदियाँ बनी हुई थीं ॥ ३५३ ॥
लताप्र प्रतानैर्बहुभिः पर्णैश्च बहुभिर्वृताम् ॥ ३६ ॥
काञ्चनीं शिशपामेकां ददर्श स महाकपिः ।
वृतां हेममयीभिस्तु वेदिकाभिः समन्ततः ॥ ३७ ॥
तदनन्तर महाकपि हनुमान्ने एक सुवर्णमयी शिशपा ( अशोक ) का वृक्ष देखा, जो बहुत - से लतावितानों और अगणित पत्तोंसे व्याप्त था । वह वृक्ष भी सब ओरसे सुवर्णमयी वेदिकाओंसे त्रिरा था ॥ ३६-३७ ॥
सोऽपश्यद् भूमिभागांश्च नगप्रस्रवणानि च ।
सुवर्णवृक्षानपरान् ददर्श शिखिसंनिभान् ॥ ३८ ॥
इसके सिवा उन्होंने और भी बहुत - से खुले मैदान, पझड़ी झरने और अग्निके समान दीप्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष देखे ॥ ३८ ॥
तेषां द्रुमाणां प्रभया मेरोरिव महाकपिः ।
अमन्यत तदा वीरः काञ्चनोऽस्मीति सर्वतः ॥ ३ ९ ॥
उस समय वीर महाकपि हनुमानजीने सुमेरुके समान उन वृक्षोंकी प्रभाके कारण अपनेको भी सब ओरसे सुवर्णमय ही समझा ॥ ३ ९ ॥
तान् काञ्चनान् वृक्षगणान् मारुतेन प्रकम्पितान् ।
किङ्किणीशतनिर्घोषान् दृष्ट्रा विस्मयमागमत् ॥ ४० ॥
सुपुष्पिताग्रान् रुचिरांस्तरुणाङ्कुरपल्लवान् । वे सुवर्णमय वृक्षसमूह जब वायुके झोंके खाकर हिलने लगते, तब उनसे सैकड़ों घुँघुरुओं के बजने की - सी मधुर ध्वनि
पृष्ठ 75
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ ०२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे होती थी । वह सब देखकर हनुमानजीको बड़ा विस्मय हुआ । उन वृक्षोंकी डालियोंमें सुन्दर फूल खिले हुए थे और नये - नये अङ्कुर तथा पल्लव निकले हुए थे, जिससे वे बड़े सुन्दर दिखायी देते थे ॥ ४०३ ॥
तामारुह्य महावेगः शिशपां पर्णसंवृताम् ॥ ४१ ॥
इतो द्रक्ष्यामि वैदेहीं रामदर्शनलालसाम् ।
इतश्चेतश्च दुःखार्ता सम्पतन्तीं यदृच्छया ॥ ४२ ॥
महान् वेगशाली हनुमान्जी पत्तोंसे हरी - भरी उस शिशपापर यह सोचकर चढ़ गये कि मैं यही से श्रीरामचन्द्र जी के दर्शन के लिये उत्सुक हुई उन विदेहनन्दिनी सीताको देखूँगा, जो दुःखसे आतुर हो इच्छानुसार इधर - उधर जाती-आती होंगी ॥ ४१-४२ ॥
अशोकवनिका चेयं दृढं रम्या दुरात्मनः ।
चन्दनैश्चम्पकैश्चापि बकुलैश्च विभूषिता ॥ ४३ ॥
इयं च नलिनी रम्या द्विजसङ्घनिषेविता ।
इमां सा राजमहिषी नूनमेष्यति जानकी ॥ ४४ ॥
' दुरात्मा रावणकी यह अशोकवाटिका बड़ी ही रमणीय है । चन्दन, चम्पा और मौलसिरीके वृक्ष इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं । इधर यह पक्षियोंसे सेवित कमलमण्डित सरोवर भी बड़ा सुन्दर है । राजरानी जानकी इसके तटपर निश्चय ही आती होंगी ॥ ४३-४४ ॥
सारामा राजमहिषी राघवस्य प्रिया सती ।
वनसंचारकुशला ध्रुवमेष्यति जानकी ॥ ४५ ॥
' रघुनाथ जी की प्रियतमा राजरानी रामा सती - साध्वी जानकी वनमें घूमने - फिरने में बहुत कुशल हैं । वे अवश्य इधर आयेंगी ॥ ४५ ॥
अथवा मृगशावाक्षी वनस्यास्य विचक्षणा ।
वनमेष्यति साह रामचिन्ता सुकर्शिता ॥ ४६ ॥
" अथवा इस वनकी विशेषताओंके ज्ञानमें निपुण मृग-शावकनयनी सोता आज यहाँ इस तालाब के तटवर्ती वनमें अवश्य पधारेंगी; क्योंकि वे रामचन्द्रजी के वियोग की चिन्तासे अत्यन्त दुबली हो गयी होंगी ( और इस सुन्दर स्थानमें आनेसे उनकी चिन्ता कुछ कम हो सकेगी ) ॥ ४६ ॥
रामशोकाभिसंतप्ता सा देवी वामलोचना ।
वनवासरता नित्यमेष्यते वनचारिणी ॥ ४७ ॥
' सुन्दर नेत्रवाली देवी सीता भगवान् श्रीरामके विरह-शोकसे बहुत ही संतप्त होंगी । वनवासमें उनका सदा ही प्रेम रहा है, अतः वे वनमें विचरती हुई इधर अवश्य आयेंगी ॥ ४७ ॥
वनेचराणां सततं नूनं स्पृहयते पुरा ।
रामस्य दयिता चार्या जनकस्य सुता सती ॥ ४८ ॥
' श्रीरामकी प्यारी पत्नी सती - साध्वी जनकनन्दिनी सीता पहले निश्चय ही वनवासी जन्तुओंसे सदा प्रेम करती रही होंगी । ( इसलिये उनके लिये वनमें भ्रमण करना
स्वाभाविक है, अतः यहाँ उनके दर्शनकी सम्भावना है ।
ही ) ॥ ४८ ॥
संध्याकालमनाः श्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी ।
नदीं मां शुभजलां संध्यार्थे वरवर्णिनी ॥ ४ ९ ॥
" यह प्रातःकालकी संध्या ( उपासना ) का समय है, इसमें मन लगानेवाली और सदा सोलह वर्षकी सी अवस्था में रहनेवाली अक्षययौवना जनककुमारी सुन्दरी सीता संध्याकालिक उपासना के लिये इस पुण्यसलिला नदीके तटपर अवश्य पधारेंगी ॥ ४ ९ ॥
तस्याश्चाप्यनुरूपेयम शोकवनिका शुभा ।
शुभायाः पार्थिवेन्द्रस्य पत्नी रामस्य सम्मता ॥ ५० ॥
' जो राजाधिराज श्रीगमचन्द्रजीकी समादरणीया पत्नी हैं, उन शुभलक्षणा सीताके लिये यह सुन्दर अशोकवाटिका भी सब प्रकार से अनुकूल ही है ॥ ५० ॥
यदि जीवति सा देवी ताराधिपनिभानना ।
आगमिष्यति सावश्यमिमां शीतजलां नदीम् ॥ ५१ ॥
' यदि चन्द्रमुखी सीता देवी जीवित हैं तो वे इस शीतल जलवाली सरिता के तटपर अवश्य पदार्पण करेंगी ' ॥ ५१ ॥
एवं तु मत्वा धनुमान् महात्मा प्रतीक्षमाणो मनुजेन्द्रपत्नीम् । अवेक्षमाणश्च ददर्श सर्व सुपुष्पिते पर्णघने निलीनः ॥ ५२ ॥
ऐसा सोचते हुए महात्मा हनुमानजी नरेन्द्रपत्नी सीता के शुभागमनकी प्रतीक्षा में तत्पर हो सुन्दर फूलोंसे सुशोभित तथा घने पत्तेवाले उस अशोकवृक्षपर छिपे रहकर उस सम्पूर्ण वनपर दृष्टिपात करते रहे ॥ ५२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि निर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १४ ॥
पृष्ठ 76
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुन्दरकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ९ ०३ पञ्चदशः सर्गः वनकी शोभा देखते हुए हनुमान्जीका एक चैत्यप्रासाद ( मन्दिर ) के पास सीताको दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना
स वीक्षमाणस्तत्रस्थो मार्गमाणश्च मैथिलीम् ।
अवेक्षमाणश्च महीं सर्वा तामन्ववैक्षत ॥ १ ॥
उस अशोकवृक्षपर बैठे - बैठे हनुमानजी सम्पूर्ण वनको देखते और सीता को ढूँढ़ते हुए वहाँकी सारी भूमिपर दृष्टिपात करने लगे ॥ १ ॥
संतानकलताभिश्च पादपैरुपशोभिताम् ।
दिव्यगन्धरसोपेतां सर्वतः समलंकृताम् ॥ २ ॥
वह भूमि कल्पवृक्ष की लताओं तथा वृक्षोंसे सुशोभित थी, दिव्य गन्ध तथा दिव्य रससे परिपूर्ण थी और सब ओरसे सजायी गयी थी ॥ २ ॥
तां स नन्दनसंकाशां मृगपक्षिभिरावृताम् ।
हर्म्य प्रासादसम्बाध कोकिलाकुल निःस्वनाम् ॥ ३ ॥
मृगों और पक्षियोंसे व्यास होकर वह भूमि नन्दनवन के समान शोभा पा रही थी, अट्टालिकाओं तथा राजभवनों से युक्त थी तथा कोकिल - समूहोंकी काकलीसे कोलाहलपूर्ण जान पड़ती थी ॥ ३ ॥
काञ्चनोत्पलपद्माभिर्वापीभिरुपशोभिताम् ।
बह्रासनकुथोपेतां बहुभूमिगृहायुताम् ॥ ४ ॥
सुवर्णमय उत्पल और कमलोंसे भरी हुई बावड़ियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं । बहुत - से आसन और कालीन वहाँ बिछे हुए थे । अनेकानेक भूमिगृह वहाँ शोभा पा रहे थे ॥ ४ ॥
सर्वर्तुकुसुमै रम्यैः फलवद्भिश्च पादपैः ।
पुष्पितानामशोकानां श्रिया सूर्योदयप्रभाम् ॥ ५ ॥
सभी ऋतुओंमें फूल देनेवाले और फलोंसे भरे हुए रमणीय वृक्ष उस भूमिको विभूषित कर रहे थे । खिले हुए अशोकोंकी शोभासे सूर्योदयकालकी छटा - सी छिटक रही थी ॥ ५ ॥
प्रदीप्तामिव तत्रस्थो मारुतिः समुदैक्षत ।
निष्पत्रशाखां विहगैः क्रियमाणामिवासकृत् ॥ ६ ॥
पवनकुमार हनुमान्ने उस अशोकपर बैठे - बैठे ही उस दमकती हुई - सी वाटिकाको देखा । वहाँके पक्षी उस वाटिका-को बारंबार पत्रों और शाखाओंसे हीन कर रहे थे ॥ ६ ॥
विनिष्पतद्भिः शतशश्चित्रैः पुष्पावतंसकैः ।
समूलपुष्परचितैरशोकैः शोकनाशनैः ॥ ७ ॥
पुष्पभारातिभारैश्च स्पृशद्भिरिव मेदिनीम् ।
कर्णिकारैः कुसुमितैः किंशुकेश्च सुपुष्पितैः ॥ ८ ॥
स देशः प्रभया तेषां प्रदीप्त इव सर्वतः । वृक्षोंसे झड़ते हुए सैकड़ों विचित्र पुष्प - गुच्छोंसे नीचेसे ऊपरतक मानो फूलसे बने हुए शोकनाशक अशोकोंसे, फूलों के भारी भारसे झुककर पृथ्वीका स्पर्श - सा करते हुए खिले हुए कनेरोंसे तथा सुन्दर फूलवाले पलाशोंसे उपलक्षित वह भूभाग उनकी प्रभाके कारण सब ओरसे उद्दीप्स. सा हो रहा था ॥ ७-८३ ॥ पुंनागाः सप्तपर्णाश्च चम्पकोद्दालकास्तथा ॥ ९ ॥
विवृद्धमूला बहवः शोभन्ते स्म सुपुष्पिताः । पुंनाग ( श्वेत कमल या नागकेसर ), चितवन, चम्पा तथा बहुवार आदि बहुत - से सुन्दर पुष्पवाले वृक्ष, जिनकी जड़ें बहुत मोटी थीं, वहाँ शोभा पा रहे थे ॥ ९ ३ ॥ शातकुम्भनिभाः केचित् केचिदग्निशिखप्रभाः ॥ १० ॥
नीलाञ्जननिभाः केचित् तत्राशोकाः सहस्रशः । वहाँ सहस्रों अशोक के वृक्ष थे, जिनमें से कुछ तो सुवर्णके समान कान्तिमान् थे, कुछ आगकी ज्वालाके समान प्रकाशित हो रहे थे और कोई - कोई काले काजलकी - सी कान्तिवाले थे ॥ १०३ ॥
नन्दनं विबुधोद्यानं चित्रं चैत्ररथं यथा ॥ ११ ॥
अतिवृत्तमिवाचिन्त्यं दिव्यं रम्यश्चियायुतम् । वह अशोकवन देवोद्यान नन्दनके समान आनन्ददायी, कुबेरके चैत्ररथ वनके समान विचित्र तथा उन दोनोंसे भी बढ़कर अचिन्त्य, दिव्य एवं रमणीय शोभासे सम्पन्न था ॥ ११३ ॥
द्वितीयमिव चाकाशं पुष्पज्योतिर्गणायुतम् ॥ १२ ॥
पुष्परत्नशतैश्चित्रं पञ्चमं सागरं यथा । वह पुष्परूपी नक्षत्रोंसे युक्त दूसरे आकाशके समान सुशोभित होता था तथा पुष्पमय सैकड़ों रत्नोंसे विचित्र शोभा पानेवाले पाँचवें समुद्र के समान जान पड़ता था ॥ १२३ ॥
सर्वर्तुपुष्पैर्निचितं पादपैर्मधुगन्धिभिः ॥ १३ ॥
नानानिनादैरुद्यानं रम्यं मृगगणद्विजैः ।
अनेकगन्धप्रवहं पुण्यगन्धं मनोहरम् ॥ १४ ॥
शैलेन्द्रमिव गन्धाढ्यं द्वितीयं गन्धमादनम् । सब ऋतुओं में फूल देनेवाले मनोरम गन्धयुक्त वृक्षोंसे भरा हुआ तथा भाँति - भाँति के कलरव करनेवाले मृगों और पक्षियोंसे सुशोभित वह उद्यान बड़ा रमणीय प्रतीत होता था । वह अनेक प्रकारकी सुगन्धका भार वहन करने के कारण पवित्र गन्धसे युक्त और मनोहर जान पड़ता था । दूसरे
पृष्ठ 77
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ ०४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे गिरिराज गन्धमादनके समान उत्तम सुगन्धसे व्याप्त था ॥ १३-१४३ ॥ अशोकवनिकायां तु तस्यां वानरपुङ्गवः ॥ १५ ॥
स ददर्शाविदूरस्थं चैत्यप्रासादमूर्जितम् ।
मध्ये स्तम्भसहस्रेण स्थितं कैलासपाण्डुरम् ॥ १६ ॥
प्रवालकृत सोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ।
मुष्णन्तमिव चक्षूंषि द्योतमानमिव श्रिया ॥ १७ ॥
निर्मलं प्रांशुभावत्वा दुल्लिखन्तमिवाम्बरम् । उस अशोकवाटिका में वानर - शिरोमणि हनुमान्ने थोड़ी ही दूरपर एक गोलाकार ऊँचा मन्दिर देखा, जिसके भीतर एक हजार खंभे लगे हुए थे । वह मन्दिर कैलास पर्वत के समान श्वेत वर्णका था । उसमें मूँगेकी सीढ़ियाँ बनी थीं तथा तपाये हुए सोनेकी वेदियाँ बनायी गयी थीं । वह निर्मल प्रासाद अपनी शोभासे देदीप्यमान - सा हो रहा था । दर्शकोंकी दृष्टिमें चकाचौंध - सा पैदा कर देता था और बहुत ऊँचा होने के कारण आकाशमें रेखा खींचता सा जान पड़ता था ॥ १५-१७३ ॥ ततो मलिनसंवीतां राक्षसीभिः समावृताम् ॥ १८ ॥
उपवासकृशां दीनां निःश्वसन्तीं पुनः पुनः ।
ददर्श शुक्लपक्षादौ चन्द्ररेखामिवामलाम् ॥ १ ९ ॥
वह चैत्यप्रासाद ( मन्दिर ) देखने के अनन्तर उनकी दृष्टि वहाँ एक सुन्दरी स्त्रीपर पड़ी, जो मलिन वस्त्र धारण किये राक्षसियोंसे घिरी हुई बैठी थी । वह उपवास करने के कारण अत्यन्त दुर्बल और दीन दिखायी देती थी तथा बारंबार सिसक रही थी । शुक्लपक्षके आरम्भमें चन्द्रमाकी ' कला जैसी निर्मल और कृश दिखायी देती है, वैसी ही वह भी दृष्टिगोचर होती थी ॥ १८-१९ ॥
मन्दप्रख्यायमानेन रूपेण रुचिरप्रभाम् ।
पिनद्धां धूमजालेन शिखामिव विभावसोः ॥ २० ॥
धुँधली - सी स्मृतिके आधारपर कुछ - कुछ पहचाने जानेवाले अपने रूपसे वह सुन्दर प्रभा बिखेर रही थी और धूसे ढकी हुई अग्निकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी ॥ २० ॥
पीतेनैकेन संवीतां क्लिष्टेनोत्तमवाससा ।
सपङ्कामनलंकारां विपद्मामिव पद्मिनीम् ॥ २१ ॥
एक ही पीले रंगके पुराने रेशमी वस्त्रसे उसका शरीर ढका हुआ था । वह मलिन, अलंकारशून्य होने के कारण कमलों से रहित पुष्करिणीके समान श्रीहीन दिखायी देती थी ॥ २१ ॥
पीडितां दुःखसंतप्तां परिक्षीणां तपस्विनीम् ।
ग्रहेणाङ्गारकेणेव पीडितामिव रोहिणीम् ॥ २२ ॥
वह तपस्विनी मंगलग्रहसे आक्रान्त रोहिणी के समान शोकसे पीड़ित, दुःख से संतप्त और सर्वथा क्षीणकाय हो रही थी ॥ २२ ॥
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां कृशामनशनेन च ।
शोकध्यानपरां दीनां नित्यं दुःखपरायणाम् ॥ २३ ॥
उपवाससे दुर्बल हुई उस दुखिया नारीके मुँहपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । वह शोक और चिन्तामें मग्न हो दीन दशामें पड़ी हुई थी एवं निरन्तर दुःखमें ही डूबी रहती थी ॥ २३ ॥।
प्रियं जनमपश्यन्तीं पश्यन्तीं राक्षसीगणम् ।
स्वगणेन मृगी हीनां श्वगणेनावृतामिव ॥ २४ ॥
वह अपने प्रियजनोंको तो देख नहीं पाती थी । उसकी दृष्टिके समक्ष सदा राक्षसियोंका समूह ही बैठा रहता था । जैसे कोई मृगी अपने यूथसे बिछुड़कर कुत्तोंके मुंडसे घिर गयी हो, वही दशा उसकी भी हो रही थी ॥ २४ ॥
नीलनागाभया वेण्या जघनं गतयैकया ।
नीलया नीरदापाये वनराज्या महीमिव ॥ २५ ॥
काली नागिन के समान कटिसे नीचेतक लटकी हुई एकमात्र काली वेणीके द्वारा उपलक्षित होनेवाली वह नारी बादलोंके हट जानेपर नीली वनश्रेणीसे घिरी हुई पृथ्वीके समान प्रतीत होती थी ॥ २५ ॥
सुखार्हो दुःखसंतप्तां व्यसनानामकोविदाम् ।
तां विलोक्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् ॥ २६ ॥
तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादिभिः । वह सुख भोगने के योग्य थी, किंतु दुःखसे संतप्त हो रही थी । इसके पहले उसे संकटोंका कोई अनुभव नहीं था । उस विशाल नेत्रोंवाली, अत्यन्त मलिन और क्षीणकाय अबलाका अवलोकन करके युक्तियुक्त कारणोंद्वारा हनुमान्जी-ने यह अनुमान किया कि हो न हो यही सीता है ॥ २६३ ॥
हियमाणा तदा तेन रक्षसा कामरूपिणा ॥ २७ ॥
यथारूपा हि दृष्टा सा तथारूपेयमङ्गना । इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला वह राक्षस जब सीताजीको हरकर ले जा रहा था, उस दिन जिस रूपमें उनका दर्शन हुआ था, कल्याणी नारी भी वैसे ही रूपसे युक्त दिखायी देती है ॥ २७३ ॥
पूर्णचन्द्राननां सुभ्रं चारुवृत्तपयोधराम् ॥ २८ ॥
कुर्वतीं प्रभया देवीं सर्वा वितिमिरा दिशः । देवी सीताका मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर था । उनकी भौंहें बड़ी सुन्दर थीं । दोनों स्तन मनोहर और गोलाकार थे । वे अपनी अङ्गकान्तिसे सम्पूर्ण दिशाओंका अन्धकार दूर किये देती थीं ॥ २८३ ॥
तां नीलकण्ठीं बिम्बोष्ठीं सुमध्यां सुप्रतिष्ठिताम् ॥ २ ९ ॥
पृष्ठ 78
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
हनुमानजीको जानकीजीका प्रथम दर्शन
पृष्ठ 79
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 80
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुन्दरकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ९ ०५ उनके केश काले - काले और ओष्ठ बिम्बफलके समान लाल थे । कटिभाग बहुत ही सुन्दर था । सारे अङ्ग सुडौल और सुगठित थे ॥ २ ९ ॥
सीतां पद्मपलाशाक्षी मन्मथस्य रतिं यथा ।
इष्टां सर्वस्य जगतः पूर्णचन्द्रप्रभामिव ॥ ३० ॥
भूमौ सुतनुमासीनां नियतामिव तापलीम् ।
निःश्वासबहुलां भीरुं भुजगेन्द्रवधूमिव ॥ ३१ ॥
कमलनयनी सीता कामदेवकी प्रेयसी रतिके समान सुन्दरी थीं, पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभाके समान समस्त जगत् के लिये प्रिय थीं । उनका शरीर बहुत ही सुन्दर था । वे नियमपरायणा तापसीके समान भूमिपर बैठी थीं । यद्यपि वे स्वभावसे ही भीरु और चिन्ताके कारण बारंबार लंबी साँस खींचती थीं तो भी दूसरों के लिये नागिनके समान भयंकर थीं ॥ ३०-३१ ॥
शोकजालेन महता विततेन न राजतीम् ।
संसक्तां धूमजालेन शिखामिव विभावसोः ॥ ३२ ॥
वे विस्तृत महान् शोकजाल से आच्छादित होनेके कारण विशेष शोभा नहीं पा रही थीं । धूएँके समूहसे मिली हुई अग्निशिखाके समान दिखायी देती थीं ॥ ३२ ॥।
तां स्मृतीमिव संदिग्धामृद्धिं निपतितामिव ।
विहतामिव च श्रद्धामाशां प्रतिहतामिव ॥ ३३ ॥
सोपसर्ग यथा सिद्धिं बुद्धिं सकलुषामिव ।
अभूतेनापवादेन कीर्ति निपतितामिव ॥ ३४ ॥
वे संदिग्ध अर्थवाली स्मृति, भूतलपर गिरी हुई ऋद्धि, टूटी हुई श्रद्धा, भग्न हुई आशा, विघ्नयुक्त सिद्धि, कलुषित बुद्धि और मिथ्या कलंकसे भ्रष्ट हुई कीर्तिके समान जान पड़ती थीं ॥ ३३-३४ ॥
रामोपरोधव्यथितां रक्षोगणनिपीडिताम् ।
अबलां मृगशावाक्षीं वीक्षमाणां ततस्ततः ॥ ३५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें रुकावट पड़ जानेसे उनके मनमें बड़ी व्यथा हो रही थी । राक्षसोंसे पीड़ित हुई मृग-शावकनयनी अबला सीता असहायकी भाँति इधर - उधर देख रही थीं ॥ ३५ ॥
बापाम्बुपरिपूर्णेन कृष्णवक्राक्षिपक्ष्मणा ।
वदनेनाप्रसन्नेन निःश्वसन्तीं पुनः पुनः ॥ ३६ ॥
उनका मुख प्रसन्न नहीं था । उसपर आँसुओंकी धारा बह रही थी और नेत्रोंकी पलकें काली एवं टेढ़ी दिखायी देती थीं । वे बारंबार लंबी साँस खींचती थीं ॥ ३६ ॥
मलपङ्कधरां दीनां मण्डनाहममण्डिताम् ।
प्रभां नक्षत्रराजस्य कालमेघैरिवावृताम् ॥ ३७ ॥
उनके शरीरपर मैल जम गयी थी । वे दीनताकी मूर्ति बनी बैठी थीं तथा शृङ्गार और भूषण धारण करनेके योग्य बा ० रा ० ५. ७. ६--होनेपर भी अलंकारशून्य थीं, अतः काले बादलोंसे ढकी हुई चन्द्रमाकी प्रभाके समान जान पड़ती थीं ॥ ३७ ॥
तस्य संदिदिहे बुद्धिस्तथा सीतां निरीक्ष्य च ।
आम्नायानामयोगेन विद्यां प्रशिथिलामिव ॥ ३८ ॥
अभ्यास न करनेसे शिथिल ( विस्मृत ) हुईं विद्याके समान क्षीण हुई सीताको देखकर हनुमान्जीकी बुद्धि संदेह में पड़ गयी ॥ ३८ ॥
दुःखेन बुबुधे सीतां हनुमान नलंकृताम् ।
संस्कारेण यथा हीनां वाचमर्थान्तरं गताम् ॥ ३ ९ ॥
अलंकार तथा स्नान - अनुलेपन आदि अङ्गसंस्कार से रहित हुई सीता व्याकरणादिजनित संस्कार से शून्य होनेके कारण अर्थान्तरको प्राप्त हुई वाणीके समान पहचानी नहीं जा रही थीं । हनुमान् जीने बड़े कष्टसे उन्हें पहचाना ॥ ३ ९ ॥
तां समीक्ष्य विशालाक्षी राजपुत्रीमनिन्दिताम् ।
तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादयन् ॥ ४० ॥
उन विशाललोचना सती - साध्वी राजकुमारी को देखकर उन्होंने कारणों ( युक्तियों ) द्वारा उपपादन करते हुए मनमें निश्चय किया कि यही सीता हैं ॥ ४० ॥
वैदेह्या यानि चाङ्गेषु तदा रामोऽन्वकीर्तयत् ।
तान्याभरणजालानि मात्रशोभीन्यलक्षयत् ॥ ४१ ॥
उन दिनों श्रीरामचन्द्रजीने विदेहकुमारीके अङ्गों में जिन-जिन आभूषणों के होने की चर्चा की थी, वे ही आभूषण - समूह इस समय उनके अङ्गकी शोभा बढ़ा रहे थे । हनुमानजीने इस बात की ओर लक्ष्य किया ॥ ४१ ॥
सुकृतौ कर्णवेष्टौ च श्वदंष्ट्रौ च सुसंस्थितौ ।
मणिविद्रुमचित्राणि हस्तेष्वाभरणानि च ॥ ४२ ॥
सुन्दर बने हुए कुण्डल और कुत्तेके दाँतों की - सी आकृतिवाले त्रिकर्ण नामधारी कर्णफूल कानोंमें सुन्दर ढंगसे सुप्रतिष्ठित एवं सुशोभित थे । हाथोंमें कंगन आदि आभूषण थे, जिनमें मणि और मूँगे जड़े हुए थे ॥ ४२ ॥
श्यामानि चिरयुक्तत्वात् तथा संस्थानवन्ति च ।
तान्येवैतानि मन्येऽहं यानि रामोऽन्वकीर्तयत् ॥ ४३ ॥
तत्र यान्यवहीनानि तान्यहं नोपलक्षये ।
यान्यस्या नावहीनानि तानीमानि न संशयः ॥ ४४ ॥
यद्यपि बहुत दिनोंसे पहने गये होने के कारण वे कुछ काले पड़ गये थे, तथापि उनके आकार - प्रकार वैसे ही थे । ( हनुमानजीने सोचा- ) ' श्रीरामचन्द्रजीने जिनकी चर्चा की थी, मेरी समझ में ये वे ही आभूषण हैं । सीताजीने जो आभूषण वहाँ गिरा दिये थे, उनको मैं इनके अङ्गोंमें नहीं देख रहा हूँ । इनके जो आभूषण मार्ग में गिराये नहीं गये थे, वे ही ये दिखायी देते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४३-४४ ॥