Ramayana 2 — पृष्ठ 621–630
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630
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श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे १४१२
सोऽभिगम्य महात्मानं ज्ञात्वापि ध्यानमास्थितम् ।
प्रणतश्च प्रहृष्टश्च प्राप्तां सीतां न्यवेदयत् ॥ १६ ॥
भगवान् श्रीराम ध्यानस्थ हैं, यह जानकर भी विभीषण उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक बोले-' प्रभो! सीतादेवी आ गयी हैं ' ॥ १६ ॥
रक्षोगृहचिरोषिताम् । तामागतामुपश्रुत्य रोषं हर्षे च दैन्यं च राघवः प्राप शत्रुहा ॥ १७ ॥
राक्षसके घरमें बहुत दिनोंतक निवास करनेके बाद आज सीताजी आयी हैं, यह सोच उनके आगमनका समाचार सुनकर शत्रुसूदन श्रीरघुनाथजीको एक ही समय रोष, हर्ष और दुःख प्राप्त हुआ ॥ १७ ॥
ततो यानगतां सीतां सविमर्श विचारयन् ।
विभीषणमिदं वाक्यमहृष्टो राघवोऽब्रवीत् ॥ १८ ॥
तदनन्तर ' सीता सवारीपर आयी हैं इस बातपर तर्क-वितर्कपूर्ण विचार करके श्रीरघुनाथजीको प्रसन्नता नहीं हुई । विभीषण से इस प्रकार बोले- ॥ १८ ॥
राक्षसाधिपते सौम्य नित्यं मद्विजये रत ।
वैदेही संनिकर्ष मे क्षिप्रं समभिगच्छतु ॥ १ ९ ॥
' सदा मेरी विजयके लिये तत्पर रहनेवाले सौम्य राक्षस-राज! तुम विदेहकुमारीसे कहो, वे शीघ्र मेरे पास आयें ॥ '
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य विभीषणः ।
तूर्णमुत्सारणं तत्र कारयामास धर्मवित् ॥ २० ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ विभीषणने तुरंत वहाँसे दूसरे लोगोंको हटाना प्रारम्भ किया ॥ २० ॥
वेत्रझर्झर पाणयः । कञ्चुकोष्णीषिणस्तत्र योधान् समन्तात् परिचक्रमुः ॥ २१ ॥
उत्सारयन्तस्तान्
संरम्भाच्चाब्रवीद् रामश्चक्षुषा प्रदहन्निव ।
विभीषणं महाप्राज्ञं सोपालम्भमिदं वचः ॥ २५ ॥
उस समय श्रीराम हटानेवाले सिपाहियोंकी ओर इस तरह रोषपूर्ण दृष्टिसे देख रहे थे, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर डालेंगे । उन्होंने परम बुद्धिमान् विभीषणको उलाहना देते हुए क्रोधपूर्वक कहा— ॥ २५ ॥
किमर्थं मामनादत्य क्लिश्यतेऽयं त्वया जनः ।
निवर्तयैनमुद्वेगं जनोऽयं स्वजनो मम ॥ २६ ॥
' तुम किसलिये मेरा अनादर करके इन सब लोगोंको कष्ट दे रहे हो । रोक इस उद्वेगजनक कार्यको । यहाँ जितने लोग हैं सब मेरे आत्मीय जन हैं ॥ २६ ॥
न गृहाणि न वस्त्राणि न प्राकारस्तिरस्क्रिया ।
नेदृशा राजसत्कारा वृत्तमावरणं स्त्रियाः ॥ २७ ॥
' घर, वस्त्र ( कनात आदि ) और चहारदीवारी आदि वस्तुएँ स्त्रीके लिये परदा नहीं हुआ करती हैं । इस तरह लोगोंको दूर हटानेके जो निष्ठुरतापूर्ण व्यवहार हैं, ये भी के लिये आवरण या पर्देका काम नहीं देते हैं । पतिसे प्राप्त होनेवाले सत्कार तथा नारीके अपने सदाचार ये ही उसके लिये आवरण हैं ॥ २७ ॥
व्यसनेषु न कृच्छ्रेषु न युद्धेषु स्वयंवरं ।
न क्रतौ नो विवाहे वा दर्शनं दूष्यते स्त्रियाः ॥ २८ ॥
' विपत्तिकालमें, शारीरिक या मानसिक पीड़ाके अवसरों-पर, युद्ध में, स्वयंवर में, यज्ञमें अथवा विवाह में स्त्रीका दीखना ( या दूसरोंकी दृष्टिमें आना ) दोष की बात नहीं है ॥ २८ ॥
सैषा विपद्गता चैव कृच्छ्रेण च समन्विता ।
दर्शने नास्ति दोषोऽस्या मत्समीपे विशेषतः ॥ २ ९ ॥
" यह सीता इस समय विपत्ति में है । मानसिक कष्टसे भी पगड़ी बांधे और अङ्गा पहिने हुए बहुत - से सिपाही विशेषतः मेरे पास है; इसलिये इसका परदेके हाथों में झाँझकी तरह बजती हुई छड़ी लिये उन वानर- युक्त है और सामने आना दोष की बात नहीं है ॥ २ ९ ॥
योद्धाओं को हटाते हुए चारों ओर घूमने लगे ॥ २१ ॥ बिना सबके पयामेवापसर्पतु ।
ऋक्षाणां वानराणां च राक्षसानां च सर्वशः । विसृज्य शिविकां तस्मात् वनौकसः ॥ ३० ॥
॥ २२ ॥ समीपे मम वैदेहीं पश्यन्त्वेते
वृन्दान्युत्सार्यमाणानि दूरमुत्तस्थुरन्ततः और राक्षसों के ' अतः जानकी शिविका ( पालकी ) छोड़कर पैदल ही उनके द्वारा हटाये जाते हुए रीछों, वानरों आयें और ये सभी वानर उनका दर्शन करें || ३० || समुदाय अन्ततोगत्वा दूर जाकर खड़े हो गये ॥ २२ ॥ मेरे पास ।
निःखनः सुमहानभूत् । एवमुक्तस्तु रामेण सविमर्शो विभीषणः तेषामुत्सार्यमाणानां ॥ २३ ॥ रामस्योपानयत् सीतां संनिकर्षे विनीतवत् ॥ ३१ ॥
वायुनोद्धूयमानस्य सागरस्येव निःस्वनः श्रीरामके ऐसा कहनेपर विभीषण बड़े विचारमें पड़ गये जैसे वायु के थपेड़े खाकर उद्वेलित हुए समुद्रकी गर्जना सीताको उनके समीप ले आये ॥ ३१ ॥
बढ़ जाती है, उसी प्रकार वहाँसे हटाये जाते हुए उन वानर और विनीतभावसे । आदिके हटनेसे वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया ॥ २३ ॥ ततो लक्ष्मणसुग्रीवौ हनूमांश्च प्लवङ्गमः
निशम्य वाक्यं रामस्य बभूवुर्व्यथिता भृशम् ॥ ३२ ॥
उत्सार्यमाणांस्तान् दृष्ट्वा समन्ताज्जातसम्भ्रमान् । उस समय श्रीरामचन्द्रजीका पूर्वोक्त वचन सुनकर दाक्षिण्यात्तदमर्षाच्च वारयामास राघवः ॥ २४ ॥ हनुमान् तीनों ही अत्यन्त व्यथित
हटाया जाता था, उनके मनमें बड़ा उद्वेग होता लक्ष्मण, सुग्रीव तथा कपिवर जिन्हें यह उद्वेग देखकर श्रीरघुनाथजीने अपनी सहज हो उठे ॥ ३२ ॥
था, सब ओर इङ्गितैरस्य दारुणैः । उदारताके कारण उन हटानेवालोंको रोषपूर्वक रोका || २४ || कलत्रनिरपेक्षैश्च
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युद्धकाण्डे पञ्चदशाधिकशततमः सर्गः १४१३ अप्रीतमिव सीतायां तर्कयन्ति स्म राघवम् ॥ श्रीरामचन्द्रजीकी भयंकर चेष्टाएँ, यह सूचित थीं कि वे पत्नीकी ओरसे निरपेक्ष हो गये हैं । उन तीनोंने यह अनुमान किया कि श्रीरघुनाथजी अप्रसन्न - से जान पड़ते हैं ॥ ३३ ॥
लज्जया ववलयन्ती स्वेषु गात्रेषु मैथिली विभीषणेनानुगता भर्तारं साभ्यवर्तत आगे - आगे सीता थीं और पीछे विभीषण । अपने में ही सिकुड़ी जा रही थीं । इस तरह पतिदेव के सामने उपस्थित हुई ॥ ३४ ॥
विस्मयाच्च प्रहर्षाश्च स्नेहाच्च पतिदेवता उदैक्षत मुखं भर्तुः सौम्यं सौम्यतरानना ३३ ॥ सीताजीका मुख अत्यन्त सौम्य भावसे युक्त था । वे कर रही पतिको ही देवता माननेवाली थीं । उन्होंने बड़े विस्मय, वर्ष इसीलिये और स्नेहके साथ अपने स्वामीके सौम्य ( मनोहर ) मुखका सीतापर दर्शन
।
॥ ३४ ॥
वे लज्जा से किया ॥ ३५ ॥
अथ समपनुदन्मनः क्कुमं सा सुचिरमदृष्टमुदीक्ष्य वै प्रियस्य । वदनमुदित पूर्णचन्द्रकान्तं विमलशशाङ्कनिभानना तदाऽऽसीत् ॥ ३६ ॥
उदयकालीन पूर्ण चन्द्रमा को भी लजित करनेवाले वे अपने प्रियतमके सुन्दर मुखको, जिसके दर्शनसे वे बहुत दिनों से वचित थीं, सीताने जी भरकर निहारा और अपने मनकी । पीड़ा दूर की । उस समय उनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा ॥ ३५ ॥ और निर्मल चन्द्रमाके समान शोभा पाने लगा ॥ ३६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्दशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११४ ॥
पञ्चदशाधिकशततमः सर्गः सीताके चरित्रपर संदेह करके श्रीरामका उन्हें ग्रहण करने से इन्कार करना और अन्यत्र
तां तु पास्थितां प्रह्रां रामः सम्प्रेक्ष्य मैथिलीम् ।
हृदयान्तर्गतं भावं व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १ ॥
मिथिलेश कुमारी सीताको विनयपूर्वक अपने समीप खड़ी देख श्रीरामचन्द्रजीने अपना हार्दिक अभिप्राय बताना आरम्भ किया ॥ १ ॥
एवासि निर्जिता भद्रे शत्रुं जित्वा रणाजिरे ।
पौरुषाद् यदनुष्ठेयं मयैतदुपपादितम् ॥ २ ॥
' भद्रे! समराङ्गणमें शत्रुको पराजित करके मैंने तुम्हें उसके चंगुल से छुड़ा लिया । पुरुषार्थंके द्वारा जो कुछ किया जा सकता था, वह सब मैंने किया ॥ २ ॥
गतोऽस्म्यन्तमसर्पस्य धर्षणा सम्प्रमार्जिता ।
अवमानश्च शत्रुश्च युगपन्निहतो मया ॥ ३ ॥
' अब मेरे असर्पका अन्त हो गया । मुझपर जो कलङ्क लगा था, उसका मैंने मार्जन कर दिया । शत्रुजनित अपमान और शत्रु दोनोंको एक साथ ही नष्ट कर डाला ॥ ३ ॥
अद्य मे पौरुषं दृष्टमद्य मे सफलः श्रमः ।
अद्य तीर्णप्रतिज्ञोऽहं प्रभवाम्यद्य चात्मनः ॥ ४ ॥
‘ आज सबने मेरा पराक्रम देख लिया । अब मेरा परिश्रम सफल हो गया और इस समय प्रतिज्ञा पूर्ण करके मैं उसके भारसे मुक्त एवं स्वतन्त्र हो गया ॥ ४ ॥
या त्वं विरहिता नीता चलचित्तेन रक्षसा ।
दैवसम्पादितो दोषो मानुषेण मया जितः ॥ ५ ॥
' जब तुम आश्रम में अकेली थीं, उस समय वह चञ्चल चित्तवाला राक्षस तुम्हें हर ले गया । यह दोष मेरे ऊपर जानेके लिये कहना देववश प्राप्त हुआ था, जिसका मैंने मानवसाभ्य पुरुषार्थके द्वारा मार्जन कर दिया ॥ ५ ॥
सम्प्राप्तमवमानं यस्तेजसा न प्रमार्जति ।
कस्तस्य पौरुषेणार्थी महताप्यल्पचेतसः ॥ ६ ॥
" जो पुरुष प्राप्त हुए अपमानका अपने तेज या बलसे मार्जन नहीं कर देता है, उस मन्दबुद्धि मानवके महान् पुरुषार्थसे भी क्या लाभ हुआ? ॥ ६ ॥
लङ्घनं च समुद्रस्य लङ्कायाञ्चापि मर्दनम् ।
सफलं तस्य च श्लाघ्यमद्य कर्म हनूमतः ॥ ७ ॥
' हनुमान् ने जो समुद्रको लाँघा और लङ्काका विध्वंस किया, उनका वह प्रशंसनीय कर्म आज सफल हो गया ॥ ७ ॥
युद्धे विक्रमतश्चैव हितं मन्त्रयतस्तथा ।
सुग्रीवस्य ससैन्यस्य सफलोऽद्य परिश्रमः ॥ ८ ॥
' सेनासहित सुग्रीव ने युद्ध में पराक्रम दिखाया तथा समय-समयपर ये मुझे हितकर सलाह देते रहे हैं, इनका परिश्रम भी अब सार्थक हो गया ॥ ८ ॥
विभीषणस्य च तथा सफलोऽद्य परिश्रमः ।
विगुणं भ्रातरं त्यक्त्वा यो मां स्वयमुपस्थितः ॥ ९ ॥
" ये विभीषण दुर्गुणोंसे भरे हुए अपने भाईका परित्याग करके स्वयं ही मेरे पास उपस्थित हुए थे । अबतकका किया हुआ इनका परिश्रम भी निष्फल नहीं हुआ ' ॥ ९ ॥
इत्येवं वदतः श्रुत्वा सीता रामस्य तद् वचः ।
मृगीवोत्फुल्लनयना बभूवापरिप्लुता ॥ १० ॥
इस तरह कहते हुए श्रीरामजीकी बातें सुनकर मृगीके
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१४१४. श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे समान विकसित नेत्रोंवाली सीताकी आँखों में आँसू भर आया ॥ १० ॥
पश्यतस्तां तु रामस्य समीपे हृदयप्रियाम् ।
जनवादभयाद् राज्ञो वभूव हृदयं द्विधा ॥ ११ ॥
वे अपने स्वामीकी हृदयवल्लभा थीं । उनके प्राणवल्लभ उन्हें अपने समीप देख रहे थे; परंतु लोकापवादके भयसे राजा श्रीरामका हृदय उस समय विदीर्णं हो रहा था ॥ ११ ॥
सीतामुत्पलपत्राक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजाम् ।
अवदद् वै वरारोहां मध्ये वानररक्षसाम् ॥ १२ ॥
वे काले - काले घुँघराले बालोंवाली कमललोचना सुन्दरी सीतासे वानर और राक्षसोंकी भरी सभा में पुनः इस प्रकार कहने लगे- ॥ १२ ॥
यत् कर्तव्यं मनुष्येण धर्षणां प्रतिमार्जता ।
तत् कृतं रावणं हत्वा मयेदं मानकाङ्क्षिणा ॥ १३ ॥
' अपने तिरस्कारका बदला चुकाने के लिये मनुष्यका जो कर्तव्य है, वह सब मैंने अपनी मानरक्षाकी अभिलाषा से रावणका वध करके पूर्ण किया ॥ १३ ॥
निर्जिता जीवलोकस्य तपसा भावितात्मना ।
अगस्त्येन दुराधर्षा मुनिना दक्षिणेव दिक् ॥ १४ ॥
' जैसे तपस्या से भावित अन्तःकरणवाले अथवा तपस्या-पूर्वक परमात्मस्वरूपका चिन्तन करनेवाले महर्षि अगस्त्यने वातापि और इल्वलके भयसे जीवजगत् के लिये दुर्गम हुई दक्षिण दिशाको जीता था, उसी प्रकार मैंने रावणके वशमें पड़ी हुई तुमको जीता है ॥ १४ ॥
विदितश्चास्तु भद्रं ते योऽयं रणपरिश्रमः ।
सुतीर्णः सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थे मया कृतः ॥ १५ ॥
' तुम्हारा कल्याण हो । तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैंने जो यह युद्धका परिश्रम उठाया है तथा इन मित्रोंके पराक्रमसे जो इसमें विजय पायी है, यह सब तुम्हें पानेके लिये नहीं किया गया है ॥ १५ ॥
रक्षता तु मया वृत्तमपवादं च सर्वतः ।
प्रख्यातस्यात्मवंशस्य न्यङ्गं च परिमार्जता ॥ १६ ॥
' सदाचार की रक्षा, सब ओर फैले हुए अपवादका निवारण तथा अपने सुविख्यात वंशपर लगे हुए कलंकका परिमार्जन करनेके लिये ही यह सब मैंने किया है ॥ १६ ॥
प्राप्तचारित्र संदेहा मम प्रतिमुखे स्थिता ।
दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि मे दृढा ॥ १७ ॥
' तुम्हारे चरित्रमें संदेहका अवसर उपस्थित है; फिर भी तुम मेरे सामने खड़ी हो । जैसे आँख के रोगीको दीपककी ज्योति नहीं सुहाती, उसी प्रकार आज तुम मुझे अत्यन्त अप्रिय जान पड़ती हो ॥ १७ ॥
तद् गच्छ त्वानुजानेऽद्य यथेष्टं जनकात्मजे ।
एता दश दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया ॥ १८ ॥
' अतः जनककुमारी! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ । मैं अपनी ओरसे तुम्हें अनुमति देता हूँ । भद्रे! ये दसों दिशाएँ तुम्हारे लिये खुली हैं । अब तुमसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ १८ ॥
कः पुमांस्तु कुले जातः स्त्रियं परगृहोषिताम् ।
तेजस्वी पुनरादद्यात् सुहल्लोभेन चेतसा ॥ १ ९ ॥
" कौन ऐसा कुलीन पुरुष होगा, जो तेजस्वी होकर भी दूसरेके घरमें रही हुई स्त्रीको, केवल इस लोभसे कि यह मेरे साथ बहुत दिनों तक रहकर सौहार्द स्थापित कर चुकी है, मनसे भी ग्रहण कर सकेगा ॥ १ ९ ॥
रावणाङ्कपरिक्लिष्टां दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा ।
कथं त्वां पुनरादद्यां कुलं व्यपदिशन्महत् ॥ २० ॥
' रावण तुम्हें अपनी गोद में उठाकर ले गया और तुमपर अपनी दूषित दृष्टि डाल चुका है, ऐसी दशामें अपने कुलको महान् बताता हुआ मैं फिर तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूँ ।
यदर्थ निर्जिता मे त्वं सोऽयमासादितो मया ।
नास्ति मे त्वय्यभिष्वङ्गो यथेष्टं गम्यतामिति ॥ २१ ॥
" अतः जिस उद्देश्यसे मैंने तुम्हें जीता था, वह सिद्ध हो गया मेरे कुलके कलंकका मार्जन हो गया । अब मेरी तुम्हारे प्रति ममता या आसक्ति नहीं है; अतः तुम जहाँ जाना चाहो, जा सकती हो ॥ २१ ॥
तदद्य व्याहृतं भद्रे मयैतत् कृतबुद्धिना ।
लक्ष्मणे वाथ भरते कुरु बुद्धिं यथासुखम् ॥ २२ ॥
' भद्रे! मेरा यह निश्चित विचार है । इसके अनुसार ही आज मैंने तुम्हारे सामने ये बातें कही हैं । तुम चाहो तो भरत या लक्ष्मणके संरक्षण में सुखपूर्वक रहनेका विचार कर सकती
हो ॥। २२ ॥
शत्रुघ्ने वाथ सुग्रीवे राक्षसे वा विभीषणे ।
निवेशय मनः सीते यथा वा सुखमात्मना ॥ २३ ॥
' सीते! तुम्हारी इच्छा हो तो तुम शत्रुघ्न, वानरराज
सुग्रीव अथवा राक्षसराज विभीषण के पास भी रह सकती हो ।
जहाँ तुम्हें सुख मिले, वहीं अपना मन लगाओ ॥ २३ ॥
नहि त्वां रावणो दृष्ट्वा दिव्यरूपां मनोरमाम् ।
मर्पयेत चिरं सीते स्वगृहे पर्यवस्थिताम् ॥ २४ ॥
' सीते! तुम - जैसी दिव्यरूप - सौन्दर्य से सुशोभित मनोरम नारीको अपने घर में स्थित देखकर रावण चिरकालतक तुमसे दूर रहनेका कष्ट नहीं सह सका होगा ' ॥ २४ ॥
ततः प्रियार्हश्रवणा तदप्रियं प्रियादुपश्रुत्य चिरस्य मानिनी । मुमोच बाष्पं रुदती तदा भृशं गजेन्द्रहस्ताभिहतेव वल्लरी ॥ २५ ॥
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युद्धकाण्डे षोडशाधिकशततमः सर्गः १४१५ जो सदा प्रिय वचन सुननेके ही योग्य थीं, वे मानिनी बात सुनकर उस समय हाथीकी सूँड़से आहत हुई लताके सीता चिरकालके बाद मिले हुए प्रियतमके मुखसे ऐसी अप्रिय समान आँसू बहाने और रोने लगीं ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चदशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीबाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११५ ॥
पोडशाधिकशततमः सर्गः सीताका श्रीरामको उपालम्भपूर्ण उत्तर देकर अपने सतीत्व की परीक्षा देने के लिये
एवमुक्ता तु वैदेही परुषं रोमहर्षणम् ।
राघवेण सरोषेण श्रुत्वा प्रव्यथिताभवत् ॥ १ ॥
श्रीरघुनाथजीने रोषपूर्वक जब इस तरह रोंगटे खड़े कर देनेवाली कठोर बात कही, तब उसे सुनकर विदेहराजकुमारी सीताके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ १ ॥
सा तदाश्रुतपूर्व हि जने महति मैथिली ।
श्रुत्वा भर्तुर्वचो घोरं लज्जयावनताभवत् ॥ २ ॥
इतने बड़े जनसमुदाय में अपने स्वामीके मुँहसे ऐसी भयंकर बात, जो पहले कभी कानों में नहीं पड़ी थी, सुनकर मिथिलेश-कुमारी लाजसे गड़ गयीं ॥ २ ॥
प्रविशन्तीव गात्राणि स्वानि सा जनकात्मजा ।
वाक्शरैस्तैः सशल्येव भृशमश्रूण्यवर्तयत् ॥ ३ ॥
उन वाग्बाणोंसे पीड़ित होकर वे जनककिशोरी अपने ही अङ्गमें बिलीन - सी होने लगीं । उनके नेत्रोंसे आँसुओंका अविरल प्रवाह जारी हो गया ॥ ३ ॥
ततो बाष्पपरिक्लिन्नं प्रमार्जन्ती स्वमाननम् ।
शनैर्गद्गदया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ ४ ॥
नेत्रोंके जलसे भीगे हुए अपने मुखको अंचलसे पोंछती हुई वे धीरे - धीरे गद्गद वाणीमें पतिदेवसे इस प्रकार बोलीं ॥ ४ ॥
किं मामसदृशं वाक्यमीदृशं श्रोत्रदारुणम् ।
रूक्षं श्रावयसे वीर प्राकृतः प्राकृतामिव ॥ ५ ॥
' वीर! आप ऐसी कठोर, अनुचित, कर्णकटु और रूखी बात मुझे क्यों सुना रहे हैं । जैसे कोई निम्न श्रेणीका पुरुष निम्नकोटिकी ही स्त्रीसे न कहने योग्य बातें भी कह डालता है, उसी तरह आप भी मुझसे कह रहे हैं ॥ ५ ॥
न तथास्मि महाबाहो यथा मामवगच्छसि ।
प्रत्ययं गच्छ मे स्वेन चारित्रेणैव ते शपे ॥ ६ ॥
' महाबाहो! आप मुझे अब जैसी समझते हैं, वैसी मैं नहीं हूँ । मुझपर विश्वास कीजिये । मैं अपने सदाचारकी ही शपथ खाकर कहती हूँ कि मैं संदेहके योग्य नहीं हूँ ॥ ६ ॥
पृथक्स्त्रीणां प्रचारेण जातिं त्वं परिशङ्कसे ।
परित्यजैनां शङ्कां तु यदि तेऽहं परीक्षिता ॥ ७ ॥
' नीच श्रेणीकी स्त्रियोंका आचरण देखकर यदि आप अग्निमें प्रवेश करना समूची स्त्री जातिपर ही संदेह करते हैं तो यह उचित नहीं है । यदि आपने मुझे अच्छी तरह परख लिया हो तो अपने इस संदेहको मनसे निकाल दीजिये ॥ ७ ॥
यदहं गात्रसंस्पर्श गतास्मि विवशा प्रभो ।
कामकारो न मे तत्र देवं तत्रापराध्यति ॥ ८ ॥
' प्रभो! रावणके शरीरसे जो मेरे इस शरीरका स्पर्श हो गया है, उसमें मेरी विवशता ही कारण है । मैंने स्वेच्छासे ऐसा नहीं किया था । इसमें मेरे दुर्भाग्यका ही दोष है ॥ ८ ॥
मदधीनं तु यत् तन्मे हृदयं त्वयि वर्तते ।
पराधीनेषु गात्रेषु किं करिष्याम्यनीश्वरी ॥ ९ ॥
' जो मेरे अधीन है, वह मेरा हृदय सदा आपमें ही लगा रहता है ( उसपर दूसरा कोई अधिकार नहीं कर सकता ); परंतु मेरे अङ्ग तो पराधीन थे । उनका यदि दूसरेसे स्पर्श हो गया तो मैं विवश अबला क्या कर सकती थी ॥ ९ ॥
सह संवृद्धभावेन संसर्गेण च मानद ।
यदि तेऽहं न विज्ञाता हता तेनास्मि शाश्वतम् ॥ १० ॥
" दूसरों को मान देनेवाले प्राणनाथ! हम दोनोंका परस्पर अनुराग सदा साथ - साथ बढ़ा है । हम सदा एक साथ रहते आये । इतनेपर भी यदि आपने मुझे अच्छी तरह नहीं समझा तो मैं सदाके लिये मारी गयी ॥ १० ॥
प्रेषितस्ते महावीरो हनुमानवलोककः ।
लङ्कास्थाहं त्वया राजन् किं तदा न विसर्जिता ॥ ११ ॥
' महाराज! लङ्कामें मुझे देखनेके लिये जब आपने महावीर हनुमान्को भेजा था, उसी समय मुझे क्यों नहीं त्याग दिया १ ॥ ११ ॥
प्रत्यक्षं वानरस्यास्य तद्वाक्यसमनन्तरम् ।
त्वया संत्यक्तया वीर त्यक्तं स्याज्जीवितं मया ॥ १२ ॥
" उस समय वानरवीर हनुमान के मुखसे आपके द्वारा अपने त्यागकी बात सुनकर तत्काल इनके सामने ही मैंने अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया होता ॥ १२ ॥
न वृथा ते श्रमोऽयं स्यात् संशये न्यस्य जीवितम् ।
सुहृज्जनपरिक्लेशो न चायं विफलस्तव ॥ १३ ॥
" फिर इस प्रकार अपने जीवनको संकटमें डालकर आपको
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१४१६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे यह युद्ध आदिका व्यर्थ परिश्रम नहीं करना पड़ता तथा आपके देखा ( उनसे सीताजीका वह अपमान सहा नहीं जाता ये मित्र लोग भी अकारण कष्ट नहीं उठाते ॥ १३ ॥
त्वया तु नृपशार्दूल रोषमेवानुवर्तता ।
लघुनेव मनुष्येण स्त्रीत्वमेव पुरस्कृतम् ॥ १४ ॥
' नृपश्रेष्ठ! आपने ओछे मनुष्यकी भाँति केवल रोधका ही अनुसरण करके मेरे शील - स्वभावका विचार छोड़कर केवल निम्न कोटिकी स्त्रियोंके स्वभावको ही अपने सामने रक्खा है ॥
अपदेशो मे जनकान्नोत्पत्तिर्वसुधातलात् ।
मम वृत्तं च घृतज्ञ बहु ते न पुरस्कृतम् ॥ १५ ॥
' सदाचार के मर्मको जाननेवाले देवता! राजा जनककी यज्ञभूमिसे आविर्भूत होनेके कारण ही मुझे जानकी कहकर पुकारा जाता है । वास्तवमें मेरी उत्पत्ति जनकसे नहीं हुई है । मैं भूतलसे प्रकट हुई हूँ । ( साधारण मानव - जातिसे विलक्षण हूँ - दिव्य हूँ । उसी तरह मेरा आचार - विचार भी अलौकिक एवं दिव्य है; मुझमें चारित्रिक बल विद्यमान है, परंतु आपने मेरी इन विशेषताओंको अधिक महत्त्व नहीं दिया- इन सबको अपने सामने नहीं रखा ॥ १५ ॥
न प्रमाणीकृतः पाणिर्बाल्ये मम निपीडितः ।
मम भक्तिश्च शीलं च सर्व ते पृष्टतः कृतम् ॥ १६ ॥
‘ बाल्यावस्थामें आपने मेरा पाणिग्रहण किया है, इसकी ओर भी ध्यान नहीं दिया । आपके प्रति मेरे हृदयमें जो भक्ति है और मुझमें जो शील है, वह सब आपने पीछे ढकेल दिया - एक साथ ही भुला दिया ' ॥ १६ ॥
इति ब्रुवन्ती रुदती बाष्पगदभाषिणी ।
उवाच लक्ष्मणं सीता दीनं ध्यानपरायणम् ॥ १७ ॥
इतना कहते - कहते सीताका गला भर आया । वे रोती और आँसू बहाती हुई दुखी एवं चिन्तामग्न होकर बैठे हुए लक्ष्मणसे गद वाणी में बोलीं- ॥ १७ ॥
चितां मे कुरु सौमित्रे व्यसनस्यास्य भेषजम् ।
मिथ्यापवादोपहता नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ १८ ॥
' सुमित्रानन्दन! मेरे लिये चिता तैयार कर दो । मेरे इस दुःखकी यही दवा है । मिथ्या कलङ्कसे कलङ्कित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती ॥ १८ ॥
अप्रीतेन गुणैर्भर्वा त्यक्ताया जनसंसदि ।
या क्षमा मे गतिर्गन्तुं प्रवेक्ष्ये हव्यवाहनम् ॥ १ ९ ॥
' मेरे स्वामी मेरे गुणोंसे प्रसन्न नहीं हैं । इन्होंने भरी सभामें मेरा परित्याग कर दिया है । ऐसी दशामें मेरे लिये जो उचित मार्ग है, उसपर जानेके लिये मैं अग्निमें प्रवेश करूँगी ' ॥ १ ९ ॥
एवमुक्तस्तु वैदेशा लक्ष्मणः परवीरहा ।
श्रमर्षवशमापन राघवं समुदैक्षत ॥ २० ॥
था ) ॥ २० ॥
स विज्ञाय मनश्छन्दं रामस्याकार सूचितम् ।
चितां चकार सौमित्रिर्मते रामस्य वीर्यवान् ॥ २१ ॥
परंतु श्रीरामके इशारेसे सूचित होनेवाले उनके हार्दिक अभिप्रायको जानकर पराक्रमी लक्ष्मणने उनकी सम्मति से ही चिता तैयार की ॥ २१ ॥
नहि रामं तदा कश्चित् कालान्तकयमोपमम् ।
अनुनेतुमथो वक्कु द्रष्टुं वाप्यशकत् सुहृत् ॥ २२ ॥
उस समय श्रीरघुनाथजी प्रलयकालीन संहारकारी यमराज-के समान लोगों के मन में भय उत्पन्न कर रहे । उनका कोई भी मित्र उन्हें समझाने, उनसे कुछ कहने अथवा उनकी ओर देखनेका साहस न कर सका ॥ २२ ॥
अधोमुखं स्थितं रामं ततः कृत्वा प्रदक्षिणम् ।
उपावर्तत वैदेही दीप्यमानं हुताशनम् ॥ २३ ॥
भगवान् श्रीराम सिर झुकाये खड़े थे । उसी अवस्था में सीताजीने उनकी परिक्रमा की । इसके बाद वे प्रज्वलित अग्निके पास गयीं ॥ २३ ॥
प्रणम्य दैवतेभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यश्च मैथिली ।
बद्धाञ्जलिपुटा वेदमुवाचाग्निसमीपतः ॥ २४ ॥
वहाँ देवताओं तथा ब्राह्मणोंको प्रणाम करके मिथिलेश-कुमारीने दोनों हाथ जोड़कर अग्निदेवके समीप इस प्रकार कहा- ॥ २४ ॥
यथा मे हृदयं नित्यं नापसर्पति राघवात् ।
तथा लोकस्य साक्षी मां सर्वतः पातु पावकः ॥ २५ ॥
' यदि मेरा हृदय कभी एक क्षणके लिये भी श्रीरघुनाथ-जीसे दूर न हुआ हो तो सम्पूर्ण जगत् के साक्षी भग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें ॥। २५ ॥
यथा मां शुद्धचारित्रां दुष्टां जानाति राघवः ।
तथा लोकस्य साक्षी मां सर्वतः पातु पावकः ॥ २६ ॥
' मेरा चरित्र शुद्ध है फिर भी श्रीरघुनाथजी मुझे दूषित समझ रहे हैं । यदि मैं सर्वथा निष्कलङ्क होऊँ तो सम्पूर्ण जगत् के साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें ॥ २६ ॥
कर्मणा मनसा वाचा यथा नातिचराम्यहम् ।
राघवं सर्वधर्मक्षं तथा मां पातु पावकः ॥ २७ ॥
' यदि मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता श्रीरघुनाथजीका अतिक्रमण न किया हो तो अग्निदेव मेरी रक्षा करें ॥ २७ ॥
आदित्यो भगवान् वायुर्दिशश्चन्द्रस्तथैव च ।
अहश्चापि तथा संध्ये रात्रिश्च पृथिवी तथा ।
यथान्येऽपि विजानन्ति तथा चारित्रसंयुताम् ॥ २८ ॥
ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करने- ' यदि भगवान् सूर्य, वायु, दिशाएँ, चन्द्रमा, दिन, बाले बिदेहनन्दिनीके लक्ष्मणने अमर्ष के वशीभूत होकर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर रात, दोनों संध्याएँ, पृथ्वी देवी तथा अन्य देवता भी मुझे
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युद्धकाण्डे सप्तदशाधिकशततमः सर्गः १४१७ शुद्ध चरित्रसे युक्त जानते हों तो अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें ॥ २८ ॥
एवमुक्त्वा तु वैदेही परिक्रम्य हुताशनम् ।
विवेश ज्वलनं दीप्तं निःशङ्केनान्तरात्मना ॥ २ ९ ॥
ऐसा कहकर विदेहराजकुमारीने अग्निदेवकी परिक्रमा की और निःशङ्क चित्तसे वे उस प्रज्वलित अग्निमें समा गयीं ॥
जनश्व सुमहांस्तत्र बालवृद्धसमाकुलः ।
ददर्श मैथिलीं दीप्तां प्रविशन्तीं हुताशनम् ॥ ३० ॥
बालकों और वृद्धोंसे भरे हुए वहाँके महान् जन-समुदायने उन दीप्तिमती मिथिलेश कुमारीको जलती आगमें प्रवेश करते देखा ॥ ३० ॥
सा तप्तवमाभा तप्तकाञ्चनभूषणा ।
पपात ज्वलनं दीप्तं सर्वलोकस्य संनिधौ ॥ ३१ ॥
तपाये हुए नूतन सुवर्णकी - सी कान्तिवाली सीता आगमें तपाकर शुद्ध किये गये सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित थीं । वे सब लोगोंके निकट उनके देखते - देखते उस जलती आगमें कूद पड़ीं ॥ ३१ ॥
ददृशुस्तां विशालाक्षीं पतन्तीं हव्यवाहनम् ।
सीतां सर्वाणि रूपाणि रुक्मवेदिनिभां तदा ॥ ३२ ॥
सोनेकी बनी हुई वेदीके समान कान्तिमती विशाल-लोचना सीतादेवीको उस समय सम्पूर्ण भूतोंने आगमें गिरते देखा ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये
ददृशुस्तां महाभागां प्रविशन्तीं हुताशनम् ।
ऋषयो देवगन्धर्वा यज्ञे पूर्णाहुतीमित्र ॥ ३३ ॥
ऋषियों, देवताओं और गन्धर्वोंने देखा, जैसे यज्ञमें पूर्णाहुतिका होम होता है, उसी प्रकार महाभागा सीता जलती आगमें प्रवेश कर रही हैं ॥ ३३ ॥
प्रचुकुशुः स्त्रियः सर्वास्तां दृष्ट्रा व्यवह 1 पतन्तीं संस्कृतां मन्त्रैर्वसोर्धारामिवाध्वरे ॥ ३४ ॥
जैसे यज्ञमें मन्त्रोंद्वारा संस्कार की हुई वसुधाराकी आहुति दी जाती है, उसी प्रकार दिव्य आभूषणोंसे विभूषित सीताको आगमें गिरते देख वहाँ आयी हुई सभी स्त्रियाँ चीख उठीं ॥ ३४ ॥
ददृशुस्तां त्रयो लोका देवगन्धर्वदानवाः ।
शतां पतन्तीं निरये त्रिदिवाद् देवतामिव ॥ ३५ ॥
तीनों लोकोंके दिव्य प्राणी, ऋषि, देवता, गन्धर्व तथा दानवोंने भी भगवती सीताको आगमें गिरते देखा, मानो स्वर्गसे कोई देवी शापग्रस्त होकर नरकमें गिरी हो ॥ ३५ ॥
तस्यामग्निं विशन्त्यां तु हाहेति विपुलः स्वनः ।
रक्षसां वानराणां च सम्बभूवाद्भुतोपमः ॥ ३६ ॥
उनके अग्निमें प्रवेश करते समय राक्षस और वानर
जोर - जोरसे हाहाकार करने लगे । उनका वह अद्भुत आर्त-नाद चारों ओर गूँज उठा ॥ ३६ ॥
युद्धकाण्डे षोडशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
सप्तदशाधिकशततमः सर्गः भगवान् श्रीराम के पास देवताओंका आगमन तथा
ततो हि दुर्मना रामः श्रुत्वैवं वदतां गिरः ।
दध्यौ मुहूर्त धर्मात्मा बाष्पव्याकुललोचनः ॥ १ ॥
तदनन्तर धर्मात्मा श्रीराम हाहाकार करनेवाले वानर और राक्षसों की बातें सुनकर मन - ही - मन बहुत दुखी हुए और आँखों में आँसू भरकर दो घड़ीतक कुछ सोचते रहे ।
ततो वैश्रवणो राजा यमश्च पितृभिः सह ।
सहस्राक्षश्च देवेशो वरुणश्च जलेश्वरः ॥ २ ॥
पडर्धनयनः श्रीमान् महादेवो वृषध्वजः ।
कर्ता सर्वस्य लोकस्य ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ॥ ३ ॥
एते सर्वे समागम्य विमानैः सूर्यसंनिभैः ।
आगम्य नगरीं लङ्कामभिजग्मुश्च राघवम् ॥ ४ ॥
इसी समय विश्रवाके पुत्र यक्षराज कुबेर, पितरोंसहित यमराज, देवताओंके स्वामी सहस्र नेत्रधारी इन्द्र, जलके अधिपति वरुण, त्रिनेत्रधारी श्रीमान् वृषभध्वज महादेव तथा सम्पूर्ण जगत् के स्रष्टा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी - ये सब १. घीकी अनवच्छिन्न धारा । ब्रह्माद्वारा उनकी भगवत्ताका प्रतिपादन एवं स्तवन देवता सूर्य तुल्य विमानद्वारा लङ्कापुरीमें आकर श्रीरघुनाथजीके पास गये ॥ २-४ ॥
ततः सहस्ताभरणान् प्रगृह्य विपुलान् भुजान् ।
अनुवंस्त्रिदशश्रेष्ठा राघवं प्राञ्जलिं स्थितम् ॥ ५ ॥
भगवान् श्रीराम उनके सामने हाथ जोड़े खड़े थे । वे श्रेष्ठ देवता आभूषणोंसे अलंकृत अपनी विशाल भुजाओंको उठाकर उनसे बोले - ॥ ५ ॥
कर्ता सर्वस्य लोकस्य श्रेष्ठो ज्ञानविदां विभुः ।
उपेक्षसे कथं सीतां पतन्तीं हव्यवाहने ।
कथं देवगणश्रेष्ठमात्मानं नावबुध्यसे ॥ ६ ॥
' श्रीराम! आप सम्पूर्ण विश्वके उत्पादक, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और सर्वव्यापक हैं । फिर इस समय आगमें गिरी हुई सीताकी उपेक्षा कैसे कर रहे हैं? आप समस्त देवताओंमें
श्रेष्ठ विष्णु ही हैं । इस बातको कैसे नहीं समझ रहे हैं ॥ ६ ॥
ऋतधामा वसुः पूर्व वसूनां च प्रजापतिः । वा ० रा ० ५. १०. १६-
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१४१८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामाय त्रयाणामपि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥ ७ ॥
" पूर्वकालमें वसुओं के प्रजापति जो ऋतधामा नामक वसु थे, वे आप ही हैं । आप तीनों लोकों के आदिकर्ता स्वयं-प्रभु हैं ॥ ७ ॥
रुद्राणामष्टमो रुद्रः साध्यानामपि पञ्चमः ।
अश्विनौ चापि कर्णौ ते सूर्याचन्द्रमसौ दृशौ ॥ ८ ॥
‘ रुद्रोंमें आठवें रुद्र और साध्यों में पाँचवें साध्य भी आप ही हैं । दो अश्विनी कुमार आपके कान हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा नेत्र हैं ॥ ८ ॥
अन्ते चादौ च मध्ये च दृश्यसे च परंतप ।
उपेक्षसे च वैदेहीं मानुषः प्राकृतो यथा ॥ ९ ॥
" शत्रुओं को संताप देनेवाले देव! सृष्टिके आदि, अन्त और मध्यमें भी आप ही दिखायी देते हैं । फिर एक साधारण मनुष्यकी भाँति आप सीताकी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? ' ॥ ९ ॥
इत्युक्तो लोकपालैस्तैः स्वामी लोकस्य राघवः ।
अब्रवीत् त्रिदशश्रेष्ठान् रामो धर्मभृतां वरः ॥ १० ॥
उन लोकपालोंके ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ लोकनाथ रघुनाथ श्रीरामने उन श्रेष्ठ देवताओंसे कहा —॥१० ॥
आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम् ।
सोऽहं यश्च यतश्चाहं भगवांस्तद् ब्रवीतु मे ॥ ११ ॥
" देवगण! मैं तो अपनेको मनुष्य दशरथपुत्र राम ही समझता हूँ । भगवन्! मैं जो हूँ और जहाँसे आया हूँ, वह सब आप ही मुझे बताइये ' ॥ ११ ॥
इति ब्रुवाणं काकुत्स्थं ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ।
अब्रवीच्छृणु मे वाक्यं सत्यं सत्यपराक्रम ॥ १२ ॥
श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मा-जीने उनसे इस प्रकार कहा - ' सत्यपराक्रमी श्रीरघुवीर! आप मेरी सच्ची बात सुनिये ॥ १२ ॥
भवान् नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ।
एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्य सपत्नजित् ॥ १३ ॥
' आप चक्र धारण करनेवाले सर्वसमर्थ श्रीमान् भगवान् नारायण देव हैं, एक दाढ़वाले पृथ्वीधारी वराह हैं तथा देवताओंके भूत एवं भावी शत्रुओंको जीतनेवाले हैं ॥ १३ ॥
अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव ।
लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वक्सेनश्चतुर्भुजः ॥ १४ ॥
" रघुनन्दन! आप अविनाशी परब्रह्म हैं । सृष्टिके आदि, मध्य और अन्त में सत्यरूपसे विद्यमान हैं । आप ही लोकोंके परम धर्म हैं । आप ही विष्वक्सेन तथा चार भुजाधारी श्रीहरि हैं || १४ ||
शार्ङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः ।
अजितः खधृग विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्वलः ॥ १५ ॥
‘ आप ही शार्ङ्गधन्वा, हृषीकेश, अन्तर्यामी पुरुष और पुरुषोत्तम हैं । आप किसीसे पराजित नहीं होते । आप नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले विष्णु एवं महाबली कृष्ण हैं ।
सेनानीर्ग्रामणीश्च त्वं बुद्धिः सत्त्वं क्षमा दमः ।
प्रभवश्चाप्ययश्च त्वमुपेन्द्रो मधुसूदनः ॥ १६ ॥
' आप ही देव -सेनापति तथा गाँवोंके मुखिया अथवा नेता हैं । आप बुद्धि, सत्त्व, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह तथा सृष्टि एवं प्रलयके कारण हैं । आप ही उपेन्द्र ( वामन ) और मधुसूदन हैं ॥ १६ ॥
इन्द्रकर्मा महेन्द्रस्त्वं पद्मनाभो रणान्तकृत् ।
शरण्यं शरणं च त्वामाहुर्दिव्या महर्षयः ॥ १७ ॥
‘ इन्द्रको भी उत्पन्न करनेवाले महेन्द्र और युद्धका अन्त करनेवाले शान्तस्वरूप पद्मनाभ भी आप ही हैं । दिव्य महर्षिगण आपको शरणदाता तथा शरणागतवत्सल बताये हैं ।
सहस्रशृङ्गो वेदात्मा शतशीर्षो महर्षभः ।
त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥ १८ ॥
' आप ही सहस्रों शाखारूप सींग तथा सैकड़ों विधिवाक्य-रूप मस्तकोंसे युक्त वेदरूप महावृषभ हैं । आप ही तीनों लोकोंके आदिकर्ता और स्वयंप्रभु ( परम स्वतन्त्र ) हैं ॥१८ ॥
सिद्धानामपि साध्यानामाश्रयश्चासि पूर्वजः ।
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्ारस्त्वमकारः परात्परः ॥ १ ९ ॥
‘ आप सिद्ध और साध्योंके आश्रय तथा पूर्वज हैं । यज्ञ, वषट्कार और ओंकार भी आप ही हैं । आप श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ परमात्मा हैं ॥ १ ९ ॥
प्रभवं निधनं चापि नो विदुः को भवानिति ।
दृश्यसे सर्वभूतेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ २० ॥
' आपके आविर्भाव और तिरोभाव को कोई नहीं जानता । आप कौन हैं— इसका भी किसीको प्राणियोंमें, गौओंमें तथा ब्राह्मणों में देते हैं ॥ २० ॥
दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु सहस्रचरणः श्रीमाञ्शतशीर्षः " समस्त दिशाओंमें, आकाशमें, भी आपकी ही सत्ता है । आपके मस्तक और सहस्रों नेत्र हैं ॥ २१ ॥
पता नहीं है । समस्त भी आप ही दिखायी
नदीषु च ।
सहस्रदृक् ॥ २१ ॥
पर्वतोंमें और नदियों में सहस्रों चरण, सैकड़ों
त्वं धारयसि भूतानि पृथिवीं सर्वपर्वतान् ।
अन्ते पृथिव्याः सलिले दृश्यसे त्वं महोरगः ॥ २२ ॥
' आप ही सम्पूर्ण प्राणियों को, पृथ्वीको और समस्त पर्वतों-को धारण करते हैं । पृथ्वीका अन्त हो जानेपर आप ही जल के ऊपर महान् सर्प = -- शेषनाग के रूपमें दिखायी देते हैं ।
त्रींल्लोकान् धारयन् राम देवगन्धर्वदानवान् ।
अहं ते हृदयं राम जिह्वा देवी सरस्वती ॥ २३ ॥
' श्रीराम! आप ही तीनों लोकोंको तथा देवता, गन्धर्व और दानवों को धारण करनेवाले विराट् पुरुष नारायण हैं ।
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युद्धकाण्डे अष्टादशाधिकशततमः सर्गः १४१ ९ सबके हृदय में रमण करनेवाले परमात्मन्! मैं ब्रह्मा आपका हृदय हूँ और देवी सरस्वती आपकी जिह्वा हैं ॥ २३ ॥
देवा रोमाणि गात्रेषु ब्रह्मणा निर्मिताः प्रभो ।
निमेषस्ते स्मृता रात्रिरुन्मेषो दिवसस्तथा ॥ २४ ॥
' प्रभो! मुझ ब्रह्माने जिनकी सृष्टि की है, वे सब देवता आपके विराट् शरीरमें रोम हैं । आपके नेत्रोंका बंद होना रात्रि और खुलना ही दिन है ॥ २४ ॥
संस्कारास्त्वभवन् वेदा नैतदस्ति त्वया विना ।
जगत् सर्वे शरीरं ते स्थैर्य ते वसुधातलम् ॥ २५ ॥
' वेद आपके संस्कार हैं । आपके बिना इस जगत्का अस्तित्व नहीं है । सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है । पृथ्वी आपकी स्थिरता है ॥ २५ ॥
अग्निः कोपः प्रसादस्ते सोमः श्रीवत्सलक्षणः ।
त्वया लोकास्त्रयः क्रान्ताः पुरा स्वैर्विक्रमैस्त्रिभिः ॥ २६ ॥
' अग्नि आपका कोप है और चन्द्रमा प्रसन्नता है, वक्षः-स्थलमें श्रीवत्सका चिह्न धारण करनेवाले भगवान् विष्णु आप ही हैं । पूर्वकालमें ( वामनावतार के समय ) आपने ही अपने तीन पगोंसे तीनों लोक नाप लिये थे ॥ २६ ॥
महेन्द्रश्च कृतो राजा बलिं बद्ध्वा सुदारुणम् ।
सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ॥ २७ ॥
' आपने अत्यन्त दारुण दैत्यराज बलिको बाँधकर इन्द्र-को तीनों लोकोंका राजा बनाया था । सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं । और आप भगवान् विष्णु हैं । आप ही सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं प्रजापति हैं ॥ २७ ॥
वधार्थ रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ।
तदिदं नस्त्वया कार्य कृतं धर्मभृतां वर ॥ २८ ॥
' धर्मात्माओं में श्रेष्ठ रघुवीर! आपने रावणका वध करने के लिये ही इस लोकमें मनुष्य के शरीरमें प्रवेश किया था । हमलोगों का कार्य आपने सम्पन्न कर दिया ॥ २८ ॥
निहतो रावणो राम प्रहृष्टो दिवमाक्रम ।
अमोघं देव वीर्य ते न तेऽमोघाः पराक्रमाः ॥ २ ९ ॥
श्रीराम! आपके द्वारा रावण मारा गया । अब आप प्रसन्नतापूर्वक अपने दिव्य धाममें पधारिये । देव! आपका बल अमोघ है । आपके पराक्रम भी व्यर्थ होनेवाले नहीं हैं ॥
अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः ।
अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ३० ॥
“ श्रीराम! आपका दर्शन अमोघ है । आपका स्तवन भी अमोघ है तथा आपमें भक्ति रखनेवाले मनुष्य भी इस भूमण्डलमें अमोघ ही होंगे ॥ ३० ॥
ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् ।
प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥ ३१ ॥
' आप पुराणपुरुषोत्तम हैं । दिव्यरूपधारी परमात्मा हैं । जो लोग आपमें भक्ति रक्खेंगे, वे इस लोक और परलोक में अपने सभी मनोरथ प्राप्त कर लेंगे ' ॥ ३१ ॥
इममा स्तवं दिव्यमितिहासं पुरातनम् ।
ये नराः कीर्तयिष्यन्ति नास्ति तेषां पराभवः ॥ ३२ ॥
यह परम ऋषि ब्रह्माका कहा हुआ दिव्य स्तोत्र तथा पुरातन इतिहास है । जो लोग इसका कीर्तन करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा ॥ ३२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तदशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११७ ॥
अष्टादशाधिकशततमः सर्गः मूर्तिमान् अग्निदेवका सीताको लेकर चितासे उनकी पवित्रताको प्रमाणित करना तथा
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं पितामहसमीरितम् ।
अङ्केनादाय वैदेहीमुत्पपात विभावसुः ॥ १ ॥
ब्रह्माजी के कहे हुए इन शुभ वचनको सुनकर मूर्तिमान् अग्निदेव विदेहनन्दिनी सीताको ( पिताकी भाँति ) गोदमें लिये चितासे ऊपरको उठे ॥ १ ॥
विधूयाथ चितां तां तु वैदेहीं हव्यवाहनः ।
उत्तस्थौ मूर्तिमानाशु गृहीत्वा जनकात्मजाम् ॥ २ ॥
उस चिताको हिलाकर इधर - उधर बिखराते हुए दिव्य रूपधारी हव्यवाहन अग्निदेव वैदेही सीताको साथ लिये तुरंत ही उठकर खड़े हो गये ॥ २ ॥
प्रकट होना और श्रीरामको समर्पित करके श्रीरामका सीताको सहर्ष स्वीकार करना
तरुणादित्यसंकाशां तप्तकाञ्चनभूषणाम् ।
रक्ताम्बरधरां बालां नीलकुञ्चितमूर्धजाम् ॥ ३ ॥
अक्लिष्टमाल्याभरणां तथारूपामनिन्दिताम् ।
ददौ रामाय वैदेहीमके कृत्वा विभावसुः ॥ ४ ॥
सीताजी प्रातःकाल सूर्यकी भाँति अरुण पीत कान्तिसे प्रकाशित हो रही थीं । तपाये हुए सोनेके आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे । उनके श्रीअङ्गोंपर लाल रंगकी रेशमी साड़ी लहरा रही थी । सिरपर काले - काले घुँघराले केश सुशोभित होते थे । उनकी अवस्था नयी थी और उनके द्वारा धारण किये गये फूलोंके हार कुम्हलाये तक नहीं थे । अनिन्द्य सुन्दरी
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१४२० श्रीमवाल्मीकीय रामायणे सती - साध्वी सीताका अग्निमें प्रवेश करते समय जैसा रूप और एवमुक्तो महातेजा धृतिमानुरुविक्रमः । वेष था, वैसे ही रूप - सौन्दर्यसे प्रकाशित होती हुई उन वैदेही- उवाच त्रिदशश्रेष्ठं रामो धर्मभृतां वरः ॥ १२ ॥
को गोद में लेकर अग्निदेवने श्रीरामको समर्पित कर दिया ॥
अब्रवीत् तु तदा रामं साक्षी लोकस्य पावकः ।
एवा ते राम वैदेही पापमस्यां न विद्यते ॥ ५ ॥
उस समय लोकसाक्षी अग्निने श्रीरामसे कहा- ' श्रीराम! यह आपकी धर्मपत्नी विदेहराजकुमारी सीता है । इसमें कोई पाप या दोष नहीं है । ५ ॥
नैव वाचा न मनसा नैव बुद्धया न चक्षुषा ।
सुवृत्ता वृत्तशौटीर्य न त्वामत्यचरच्छुभा ॥ ६ ॥
' उत्तम आचारवाली इस शुभलक्षणा सतीने मन, वाणी, बुद्धि अथवा नेत्रोंद्वारा भी आपके सिवा किसी दूसरे पुरुषका आश्रय नहीं लिया । इसने सदा सदाचारपरायण आपका ही आराधन किया है ॥ ६ ॥
रावणेनापनीतैषा वीर्योत्सिक्तेन रक्षसा ।
त्वया विरहिता दीना विवशा निर्जने सती ॥ ७ ॥
‘ अपने बल - पराक्रमका घमंड रखनेवाले राक्षस रावणने जब इसका अपहरण किया था, उस समय यह बेचारी सती सूने आश्रम में अकेली थी- आप इसके पास नहीं थे; अतः यह वेवश थी ( इसका कोई वश नहीं चला ) ॥ ७ ॥
क्रुद्धा चान्तःपुरे गुप्ता त्वच्चित्ता त्वत्परायणा ।
रक्षिता राक्षसीभिश्व घोराभिर्घोरबुद्धिभिः ॥ ८ ॥
' रावणने इसे लाकर अन्तःपुरमें कैद कर लिया । इसपर पहरा बिठा दिया । भयानक विचारोंवाली भीषण राक्षसियाँ इसकी रखवाली करने लगीं । तब भी इसका चित्त आपमें ही लगा रहा । यह आपहीको अपना परम आश्रय मानती रही ॥ ८ ॥
प्रलोभ्यमाना विविधं तर्ज्यमाना च मैथिली ।
नाचिन्तयत तद्रक्षस्त्वद्वतेनान्तरात्मना ॥ ९ ॥
‘ तत्पश्चात् तरह - तरहके लोभ दिये गये । इस मिथिलेश कुमारीपर डाँट फटकार भी पड़ी; परंतु इसकी अन्तरात्मा निरन्तर आपके ही चिन्तनमें लगी रही । इसने उस राक्षसके विषयमें कभी एक बार भी नहीं सोचा ॥ ९ ॥
विशुद्धभावां निष्पापां प्रतिगृह्णीष्व मैथिलीम् ।
न किंचिदभिधातव्या अहमाज्ञापयामि ते ॥ १० ॥
' अतः इसका भाव सर्वथा शुद्ध है । यह मिथिलेशनन्दिनी तदनन्तर महातेजस्वी, धैर्यवान् महान् पराक्रमी तथा धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीरामने देवशिरोमणि अग्निदेवसे उनकी पूर्वोक्त बातके उत्तरमें कहा- । १२ ॥
अवश्यं चापि लोकेषु सीता पावनमर्हति ।
दीर्घकालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा ॥ १३ ॥
' भगवन्! लोगों में सीताजीकी पवित्रताका विश्वास दिलाने के लिये इनकी यह शुद्धिविषयक परीक्षा आवश्यक थी; क्योंकि शुभलक्षणा सीताको विवश होकर दीर्घकालतक रावण के अन्तःपुरमें रहना पड़ा है ॥ १३ ॥
वालिशो वत कामात्मा रामो दशरथात्मजः ।
इति वक्ष्यति मां लोको जानकीमविशोध्य हि ॥ १४ ॥
' यदि मैं जनकनन्दिनीकी शुद्धिके विषय में परीक्षा न करता तो लोग यही कहते कि दशरथपुत्र राम बड़ा ही मूर्ख और कामी है ॥ १४ ॥
अनन्यहृदयां सीतां मच्चित्तपरिरक्षिणीम् ।
अहमप्यवगच्छामि मैथिलीं जनकात्मजाम् ॥ १५ ॥
" यह बात मैं भी जानता हूँ कि मिथिलेशनन्दिनी जनक-कुमारी सीताका हृदय सदा मुझमें ही लगा रहता है । मुझसे कभी अलग नहीं होता । ये सदा मेरा ही मन रखती -- मेरी इच्छाके अनुसार चलती हैं ॥ १५ ॥
इमामपि विशालाक्षीं रक्षितां स्वेन तेजसा ।
रावणो नातिवर्तेत वेलामिव महोदधिः ॥ १६ ॥
" मुझे यह भी विश्वास है कि जैसे महासागर अपनी तट-भूमिको नहीं लाँघ सकता, उसी प्रकार रावण अपने ही तेजसे सुरक्षित इन विशाललोचना सीतापर अत्याचार नहीं कर सकता था ॥ १६ ॥
प्रत्ययार्थ तु लोकानां त्रयाणां सत्यसंश्रयः ।
उपेक्षे चापि वैदेहीं प्रविशन्तीं हुताशनम् ॥ १७ ॥
‘ तथापि तीनों लोकोंके प्राणियों के मनमें विश्वास दिलाने के लिये एकमात्र सत्यका सहारा लेकर मैंने अग्निमें प्रवेश करती हुई विदेहकुमारी सीताको रोकनेकी चेष्टा नहीं की ॥ १७ ॥
न शक्तः सुदुष्टात्मा मनसापि हि मैथिलीम् ।
प्रधर्षयितुमप्राप्यां दीप्तामग्निशिखामिव ॥ १८ ॥
‘ मिथिलेशकुमारी सीता प्रज्वलित अग्निशिखाके समान तथा दूसरेके लिये अलभ्य है । दुष्टात्मा रावण मनके सर्वथा निष्पाप है । आप इसे सादर स्वीकार करें । मैं आपको दुर्धर्ष करने में समर्थ नहीं हो सकता था । आज्ञा देता हूँ, आप इससे कभी कोई कठोर बात न कहें ' || द्वारा भी इनपर अत्याचार
ततः प्रीतमना रामः श्रुत्वैवं वदतां वरः । नेयमर्हति वैक्लव्यं रावणान्तःपुरे सती ।
अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा ॥ १ ९ ॥
दध्यौ मुहूर्त धर्मात्मा हर्षव्याकुललोचनः ॥ ११ ॥ “ ये सती - साध्वी देवी रावणके अन्तःपुरमें रहकर भी
अग्निदेवकी यह बात सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा या घबराहट में नहीं पड़ सकती थीं; क्योंकि ये श्रीरामका मन प्रसन्न हो गया । उनके नेत्रों में आनन्द के आँसू व्याकुलता उनकी प्रभा ॥ छलक आये । वे थोड़ी देरतक विचारमें डूबे रहे ॥ ११ ॥ मुझसे उसी तरह अभिन्न हैं, जैसे सूर्यदेवसे
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युद्धकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः ९ ४२१
विशुद्धा त्रिषु लोकेषु मैथिली जनकात्मजा ।
न विहातुं मया शक्या कीर्तिरात्मवता यथा ॥ २० ॥
" मिथिलेशकुमारी जानकी तीनों लोकोंमें परम पवित्र हैं । जैसे मनस्वी पुरुष कीर्तिका त्याग नहीं कर सकता, उसी तरह मैं भी इन्हें नहीं छोड़ सकता ॥ २० ॥
अवश्यं च मया कार्य सर्वेषां वो वचो हितम् ।
स्निग्धानां लोकनाथानामेवं च वदतां हितम् ॥ २१ ॥
" आप सभी लोकपाल मेरे हितकी ही बात कह रहे हैं और आपलोगों का मुझपर बड़ा स्नेह है; अतः आप सभी इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये देवताओंके हितकर वचनका मुझे अवश्य पालन करना चाहिये ' ॥ २१ ॥
इत्येवमुक्त्वा विजयी महाबलः प्रशस्यमानः स्वकृतेन कर्मणा । समेत्य रामः प्रियया महायशाः सुखं सुखार्होऽनुबभूव राघवः ॥ २२ ॥
ऐसा कहकर अपने किये हुए पराक्रमसे प्रशंसित होनेवाले महाबली, महायशस्वी, विजयी वीर रघुकुलनन्दन श्रीराम अपनी प्रिया सीता से मिले और मिलकर बड़े सुखका अनुभव करने लगे; क्योंकि वे सुख भोगनेके ही योग्य हैं ॥ युद्धकाण्डेऽष्टादशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः महादेव जी की आज्ञा से श्रीराम और लक्ष्मणका विमानद्वारा आये हुए राजा दशरथको प्रणाम करना और दशरथका दोनों पुत्रों तथा सीताको आवश्यक संदेश दे इन्द्रलोकको जाना
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं राघवेणानुभाषितम् ।
ततः शुभतरं वाक्यं व्याजहार महेश्वरः ॥ १ ॥
श्रीरघुनाथजी के कहे हुए इन शुभ वचनोंको सुनकर श्रीमहादेवजी और भी शुभतर वचन बोले- ॥ १ ॥
पुष्कराक्ष महाबाहो महावक्षः परंतप ।
दिष्ट्या कृतमिदं कर्म त्वया धर्मभृतां वर ॥ २ ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले, विशाल वक्षःस्थलसे सुशोभित, महाबाहु कमलनयन! आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं । आपने रावण - वधरूप कार्यं सम्पन्न कर दिया — यह बड़े सौभाग्य की बात है ॥ २ ॥
दिष्ट्या सर्वस्य लोकस्य प्रवृद्धं दारुणं तमः ।
अपवृत्तं त्वया संख्ये राम रावणजं भयम् ॥ ३ ॥
‘ श्रीराम! रावणजनित भय और दुःख सारे लोकोंके लिये बढ़े हुए घोर अन्धकारके समान था, जिसे आपने युद्धमें मिटा दिया ॥ ३ ॥
आश्वास्य भरतं दीनं कौसल्यां च यशस्विनीम् ।
कैकेयीं च सुमित्रां च दृष्ट्वा लक्ष्मणमातरम् ॥ ४ ॥
प्राप्य राज्यमयोध्यायां नन्दयित्वा सुहृज्जनम् ।
इक्ष्वाकूणां कुले वंशं स्थापयित्वा महाबल ॥ ५ ॥
इष्ट्वा तुरगमेधेन प्राप्य चानुत्तमं यशः ।
ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा त्रिदिवं गन्तुमर्हसि ॥ ६ ॥
‘ महाबली वीर! अब दुखी भरतको धीरज बँधाकर, यशस्विनी कौसल्या, कैकेयी तथा लक्ष्मणजननी सुमित्रासे मिलकर, अयोध्याका राज्य पाकर, सुहृदोंको आनन्द देकर, इक्ष्वाकु - कुलमें अपना वंश स्थापित करके, अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान कर, सर्वोत्तम यशका उपार्जन करके तथा ब्राह्मणोंको धन देकर आपको अपने परम धाममें जाना चाहिये ॥ ४-६ ॥
एष राजा दशरथो विमानस्थः पिता तव ।
काकुत्स्थ मानुषे लोके गुरुस्तव महायशाः ॥ ७ ॥
' ककुत्स्थ कुलनन्दन! देखिये, ये आपके पिता राजा दशरथ विमानपर बैठे हुए हैं । मनुष्यलोकमें ये ही आपके महायशस्वी गुरु थे! ७ ॥
इन्द्रलोकं गतः श्रीमांस्त्वया पुत्रेण तारितः ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा त्वमेनमभिवादय ॥ ८ ॥
“ ये श्रीमान् नरेश इन्द्रलोकको प्राप्त हुए हैं । आप जैसे सुपुत्रने इन्हें तार दिया । आप भाई लक्ष्मणके साथ इन्हें नमस्कार करें ॥ ८ ॥
महादेववचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः ।
विमानशिखरस्थस्य प्रणाममकरोत् पितुः ॥ ९ ॥
महादेवजी की यह बात सुनकर लक्ष्मण सहित श्रीरघुनाथजीने विमानमें उच्चस्थानपर बैठे हुए अपने पिताजीको प्रणाम किया ॥ ९ ॥
दीप्यमानं स्वया लक्ष्म्या विरजोऽम्बरधारिणम् ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा ददर्श पितरं प्रभुः ॥ १० ॥
भाई लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामने पिताको अच्छी तरह देखा । वे निर्मल वस्त्र धारण करके अपनी दिव्य शोभासे देदीप्यमान थे ॥ १० ॥
हर्षेण महताऽऽविष्टो विमानस्थो महीपतिः ।
प्राणैः प्रियतरं दृष्ट्वा पुत्रं दशरथस्तदा ॥ ११ ॥
विमानपर बैठे हुए महाराज दशरथ अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्र श्रीरामको देखकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ११ ॥
आरोप्याङ्के महाबाहुर्वरासनगतः प्रभुः ।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य ततो वाक्यं समाददे ॥ १२ ॥