Ramayana 2 — पृष्ठ 631–640

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640

पृष्ठ 631

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९ ४२२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे श्रेष्ठ आसनपर बैठे हुए उन महाबाहु नरेशने उन्हें गोद में बिठाकर दोनों बाँहों में भर लिया और इस प्रकार कहा – ॥ १२ ॥

न मे स्वर्गो बहुमतः सम्मानश्च सुरर्षभैः ।

त्वया राम विहीनस्य सत्यं प्रतिशृणोमि ते ॥ १३ ॥

" राम! मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुमसे बिलग होकर मुझे स्वर्गका सुख तथा देवताओं द्वारा प्राप्त हुआ सम्मान भी अच्छा नहीं लगता ॥ १३ ॥

अद्य त्वां निहतामित्रं दृष्ट्वा सम्पूर्णमानसम् ।

निस्तीर्ण वनवासं च प्रीतिरासीत् परा मम ॥ १४ ॥

' आज तुम शत्रुओंका वध करके पूर्णमनोरथ हो गये और तुमने वनवासकी अवधि भी पूरी कर ली, यह सब देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ १४ ॥

कैकेय्या यानि चोक्तानि वाक्यानि वदतां वर ।

तव प्रव्राजनार्थानि स्थितानि हृदये मम ॥ १५ ॥

‘ वक्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! तुम्हें वनमें भेजनेके लिये कैकेयीने जो - जो बातें कही थीं, वे सब आज भी मेरे हृदय में बैठी हुई हैं ॥ १५ ॥

त्वां तु दृष्ट्वा कुशलिनं परिष्वज्य सलक्ष्मणम् ।

अद्य दुःखाद् विमुक्तोऽस्मि नीहारादिव भास्करः ॥ १६ ॥

' आज लक्ष्मणसहित तुमको सकुशल देखकर और हृदयसे लगाकर मैं समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा गया हूँ । ठीक उसी तरह, जैसे चन्द्रमा कुहरेसे निकल आये हों ॥ १६ ॥

तारितोऽहं त्वया पुत्र सुपुत्रेण महात्मना ।

अष्टावक्रेण धर्मात्मा कहोलो ब्राह्मणो यथा ॥ १७ ॥

' बेटा! जैसे अष्टावक्रने अपने धर्मात्मा पिता कहोल नामक ब्राह्मणको तार दिया था, वैसे ही तुम जैसे महात्मा पुत्रने मेरा उद्धार कर दिया ॥ १७ ॥

इदानीं च विजानामि यथा सौम्य सुरेश्वरैः ।

वधार्थ रावणस्येह पिहितं पुरुषोत्तमम् ॥ १८ ॥

' सौम्य! आज इन देवताओंके द्वारा मुझे मालूम हुआ

अनुरक्तेन बलिना शुचिना धर्मचारिणा ।

इच्छेयं त्वामहं द्रष्टुं भरतेन समागतम् ॥ २१ ॥

' भरत बड़ा ही धर्मात्मा, पवित्र और बलवान् है । वह तुममें सच्चा अनुराग रखता है । मैं उसके साथ तुम्हारा शीघ्र ही मिलन देखना चाहता हूँ ॥ २१ ॥

चतुर्दश समाः सौम्य वने निर्यातितास्त्वया ।

वसता सीतया सार्धं मत्प्रीत्या लक्ष्मणेन च ॥ २२ ॥

' सौम्य! तुमने मेरी प्रसन्नता के लिये लक्ष्मण और सीता के साथ रहते हुए वनमें चौदह वर्ष व्यतीत किये ॥ २२ ॥

निवृत्त वनवासोऽसि प्रतिज्ञा पूरिता त्वया ।

रावणं च रणे हत्वा देवताः परितोषिताः ॥ २३ ॥

' अब तुम्हारे वनवासकी अवधि पूरी हो गयी । मेरी प्रतिज्ञा भी तुमने पूर्ण कर दी तथा संग्राममें रावणको मारकर देवताओं को भी संतुष्ट कर दिया ॥ २३ ॥

कृतं कर्म यशः श्लाघ्यं प्राप्तं ते शत्रुसूदन ।

भ्रातृभिः सह राज्यस्थो दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥ २४ ॥

' शत्रुसूदन! ये सभी काम तुम कर चुके । इससे तुम्हें स्पृहणीय यश प्राप्त हुआ है । अब तुम भाइयोंके साथ राज्यपर प्रतिष्ठित हो दीर्घं आयु प्राप्त करो ' ॥ २४ ॥

इति ब्रुवाणं राजानं रामः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।

कुरु प्रसादं धर्मज्ञ कैकेय्या भरतस्य च ॥ २५ ॥

जब राजा इस प्रकार कह चुके, तब श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर उनसे बोले – ' धर्मज्ञ महाराज! आप कैकेयी और भरतपर प्रसन्न हों— उन दोनोंपर कृपा करें ॥ २५ ॥

सपुत्रां त्वां त्यजामीति यदुक्ता केकयी त्वया ।

स शापः केकयीं घोरः सपुत्रां न स्पृशेत् प्रभो ॥ २६ ॥

" प्रभो! आपने जो कैकेयीसे कहा था कि मैं पुत्रसहित तेरा त्याग करता हूँ, आपका वह घोर शाप पुत्रसहित कैकेयी-का स्पर्श न करे ' ॥ २६ ॥

तथेति स महाराजो राममुक्त्वा कृताञ्जलिम् ।

लक्ष्मणं च परिष्वज्य पुनर्वाक्यमुवाच ह ॥ २७ ॥

कि रावणका वध करनेके लिये स्वयं पुरुषोत्तम भगवान् ही तब श्रीरामसे बहुत अच्छा ' कहकर महाराज दशरथने तुम्हारे रूपमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ १८ ॥ उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और हाथ जोड़े खड़े हुए

सिद्धार्थ खलु कौसल्याया त्वां राम गृहं गतम् । लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर फिर यह बात कही -- ॥ २७ ॥

वनान्निवृत्तं संहृष्टा द्रक्ष्यते शत्रुसूदनम् ॥ १ ९ ॥ रामं शुश्रूषता भक्त्या वैदेह्या सह सीतया । ' श्रीराम! कौसल्याका जीवन सार्थक है, जो वनसे लौटने- कृता मम महाप्रीतिः प्राप्तं धर्मफलं च ते ॥ २८ ॥

पर तुम जैसे शत्रुसूदन वीर पुत्रको अपने घरमें हर्ष और ' वत्स! तुमने विदेहनन्दिनी सीताके साथ श्रीरामकी उल्लास के साथ देखेंगी ॥ १ ९ ॥ भक्तिपूर्वक सेवा करके मुझे बहुत प्रसन्न किया है । तुम्हें

सिद्धार्थाः खलु ते राम नरा ये त्वां पुरीं गतम् । धर्मका फल प्राप्त हुआ है ॥ २८ ॥

राज्ये चैवाभिषिक्तं च द्रक्ष्यन्ते वसुधाधिपम् ॥ २० ॥ धर्म प्राप्स्यसि धर्मज्ञ यशश्च विपुलं भुवि ।

‘ रघुनन्दन! वे प्रजाजन भी कृतार्थ हैं, जो अयोध्या रामे प्रसन्ने स्वर्ग च महिमानं तथोत्तमम् ॥ २ ९ ॥ राज्यसिंहासनपर भूमिपालके रूपमें अभिषिक्त ' धर्मज्ञ! भविष्य में भी तुम्हें धर्मका फल प्राप्त होगा और पहुँचनेपर तुम्हें भूमण्डलमें महान् यशकी उपलब्धि होगी । श्रीरामकी प्रसन्नता-होते देखेंगे || २० ||

पृष्ठ 632

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युद्धकाण्डे विंशत्यधिकशततमः सर्गः से तुम्हें उत्तम स्वर्ग और महत्त्व प्राप्त होगा ॥ २ ९ ॥

रामं शुश्रूष भद्रं ते सुमित्रानन्दवर्धन ।

रामः सर्वस्य लोकस्य हितेष्वभिरतः सदा ॥ ३० ॥

' सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मण! तुम्हारा कल्याण हो । तुम श्रीरामकी निरन्तर सेवा करते रहो । ये श्रीराम सदा सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर रहते हैं ॥ ३० ॥

एते सेन्द्रास्त्रयो लोकाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।

अभिवाद्य महात्मानमर्चन्ति पुरुषोत्तमम् ॥ ३१ ॥

' देखो, इन्द्रसहित ये तीनों लोक, सिद्ध और महर्षि भी परमात्मस्वरूप पुरुषोत्तम रामको प्रणाम करके इनका पूजन कर रहे हैं ॥ ३१ ॥

एतत् तदुक्तमव्यक्तमक्षरं ब्रह्मसम्मितम् ।

देवानां हृदयं सौम्य गुह्यं रामः परंतपः ॥ ३२ ॥

' सौम्य! शत्रुओं को संताप देनेवाले ये श्रीराम देवताओंके हृदय और परम गुह्य तत्त्व हैं । ये ही वेदोंद्वारा प्रतिपादित अव्यक्त एवं अविनाशी ब्रह्म है ॥ ३२ ॥

अवाप्तधर्माचरणं यशश्च विपुलं त्वया ।

एवं शुश्रूषताव्यग्रं वैदेह्या सह सीतया ॥ ३३ ॥

' विदेहनन्दिनी सीता के साथ शान्तभावसे इनकी सेवा करते हुए तुमने सम्पूर्ण धर्माचरणका फल और महान् यश प्राप्त किया है ' ॥ ३३ ॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं राजा स्नुषां बद्धाञ्जलिं स्थिताम् ।

पुत्रीत्याभाष्य मधुरं शनैरेनामुवाच ह ॥ ३४ ॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर राजा दशरथने हाथ जोड़कर खड़ी हुई पुत्रवधू सीताको ' बेटी ' कहकर पुकारा और धीरे-धीरे मधुर वाणीमें कहा – ॥ ३४ ॥

कर्तव्यो न तु वैदेहि मन्युस्त्यागमिमं प्रति ।

रामेणेदं विशुद्ध्यर्थे कृतं वै त्वद्धितैषिणा ॥ ३५ ॥

९ ४२३ ' विदेहनन्दिनि! तुम्हें इस त्यागको लेकर श्रीरामपर कुपित नहीं होना चाहिये; क्योंकि ये तुम्हारे हितैषी हैं और संसारमें तुम्हारी पवित्रता प्रकट करनेके लिये ही इन्होंने ऐसा व्यवहार किया है ॥ ३५ ॥

सुदुष्करमिदं पुत्रि तव चारित्रलक्षणम् ।

कृतं यत् तेऽन्यनारीणां यशो ह्यभिभविष्यति ॥ ३६ ॥

' बेटी! तुमने अपने विशुद्ध चरित्रको परिलक्षित कराने के लिये जो अग्निप्रवेशरूप कार्य किया है, यह दूसरी स्त्रियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है । तुम्हारा यह कर्म अन्य नारियोंके यशको ढक लेगा ॥ ३६ ॥

न त्वं कामं समाधेया भर्तृशुश्रूषणं प्रति ।

अवश्यं तु मया वाच्यमेष ते दैवतं परम् ॥ ३७ ॥

' पति - सेवाके सम्बन्धमें भले ही तुम्हें कोई उपदेश देनेकी आवश्यकता न हो; किंतु इतना तो मुझे अवश्य बता देना चाहिये कि ये श्रीराम ही तुम्हारे सबसे बड़े देवता हैं ' ॥ ३७ ॥

इति प्रतिसमादिश्य पुत्रौ सीतां च राघवः ।

इन्द्रलोकं विमानेन ययौ दशरथो नृपः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार दोनों पुत्रों और सीताको आदेश एवं उपदेश देकर रघुवंशी राजा दशरथ विमानके द्वारा इन्द्रलोकको चले गये || ३८ ॥ विमानमा स्थाय महानुभावः श्रिया च संहृष्टतनुर्नृपोत्तमः । आमन्त्र्य पुत्रौ सह सीतया च जगाम देवप्रवरस्य लोकम् ॥ ३ ९ ॥ नृपश्रेष्ठ महानुभाव दशरथ अद्भुत शोभासे सम्पन्न थे । उनका शरीर हर्षसे पुलकित हो रहा था । वे विमानपर बैठकर सीतासहित दोनों पुत्रों से बिदा ले देवराज इन्द्रके लोकमें चले गये ॥ ३ ९ ॥ इस्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततमः इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण सर्गः ॥ ११ ९ ॥ आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११ ९ ॥ विंशत्यधिकशततमः सर्गः श्रीराम के अनुरोधसे इन्द्रका मरे देवताओंका प्रस्थान और

प्रतिप्रयाते काकुत्स्थे महेन्द्रः पाकशासनः ।

अब्रवीत् परमप्रीतो राघवं प्राञ्जलिं स्थितम् ॥ १ ॥

महाराज दशरथके लौट जानेपर पाकशासन इन्द्रने अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़े खड़े हुए श्रीरघुनाथजी से कहा— ॥ १ ॥

अमोघं दर्शनं राम तवास्माकं नरर्षभ । प्रीतियुक्ताः हुए वानरोंकी जीवित करना, वानरसेनाका विश्राम इसलिये तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह मुझसे कहो ' ॥ २ ॥

एवमुक्तो महेन्द्रेण प्रसन्नेन महात्मना ।

सुप्रसन्नमना हृष्टो वचनं प्राह राघवः ॥ ३ ॥

महात्मा इन्द्र ने जब प्रसन्न होकर ऐसी बात कही, तब श्रीरघुनाथजी के मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने हर्षसे स्म तेन त्वं ब्रूहि यन्मनसेप्सितम् ॥ २ ॥ भरकर कहा ॥ ३ ॥

‘ नरश्रेष्ठ श्रीराम! तुम्हें जो हमारा दर्शन हुआ, वह यदि प्रीतिः समुत्पन्ना व्यर्थ नहीं जाना चाहिये और हम तुमपर बहुत प्रसन्न हैं । वक्ष्यामि मयि ते विबुधेश्वर । कुरु मे सत्यं वचनं वदतां वर ॥ ४ ॥

पृष्ठ 633

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१४२४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे एक प्रार्थना करूँगा । आप मेरी उस प्रार्थनाको सफल करें ॥ ४ ॥

मम हेतोः पराक्रान्ता ये गता यमसादनम् ।

ते सर्वे जीवितं प्राप्य समुत्तिष्ठन्तु वानराः ॥ ५ ॥

" मेरे लिये युद्ध में पराक्रम करके जो यमलोकको चले गये हैं, वे सब वानर नया जीवन पाकर उठ खड़े हों ॥ ५ ॥

मत्कृते विप्रयुक्ता ये पुत्रैर्दारैश्च वानराः ।

तान् प्रीतमनसः सर्वान् द्रष्टुमिच्छामि मानद ॥ ६ ॥

" मानद! जो वानर मेरे लिये अपने स्त्री - पुत्रोंसे बिछुड़ गये हैं, उन सबको मैं प्रसन्नचित्त देखना चाहता हूँ ॥६ ॥

विक्रान्ताश्चापि शूराश्च न मृत्युं गणयन्ति च ।

जीवयैतान् पुरंदर ॥ ७ ॥

कृतयत्ना विपन्नाश्च " पुरंदर! वे पराक्रमी और शूरवीर थे तथा मृत्युको कुछ भी नहीं गिनते थे । उन्होंने मेरे लिये बड़ा प्रयत्न किया है और अन्तमें कालके गालमें चले गये हैं । आप उन सबको जीवित कर दें ॥ ७ ॥

न मृत्युं गणयन्ति ये ।

मत्प्रियेष्वभिरक्ताश्च वरमेतमहं वृणे ॥ ८ ॥

त्वत्प्रसादात् समेयुस्ते सदा मेरा प्रिय करने में लगे रहते थे और " जो वानर मौतको कुछ नहीं समझते थे, वे सब आपकी कृपासे फिर मुझसे मिलें. - यह वर मैं चाहता हूँ ॥ ८ ॥

नीरुजो निर्व्रणांश्चैव सम्पन्नबलपौरुषान् ।

द्रष्टुमिच्छामि मानद ॥ ९ ॥

गोलाङ्गलांस्तथर्क्षाश्च “ दूसरोंको मान देनेवाले देवराज! मैं उन वानर, लंगूर और भालुओं को नीरोग, व्रणहीन और बल - पौरुषसे सम्पन्न देखना चाहता हूँ ॥ ९ ॥

अकाले चापि पुष्पाणि मूलानि च फलानि च ।

तिष्ठेयुर्यत्र वानराः ॥ १० ॥

नद्यश्च विमलास्तत्र " ये वानर जिस स्थानपर रहें, वहाँ असमय में भी फल - मूल और पुष्पोंकी भरमार रहे तथा निर्मल जलवाली नदियाँ बहती रहें ' ॥ १० ॥

श्रुत्वा तु वचनं तस्य राघवस्य महात्मनः ।

प्रत्युवाचेदं वचनं प्रीतिसंयुतम् ॥ ११ ॥

महेन्द्रः यह बात सुनकर महेन्द्रने महात्मा श्रीरघुनाथजीकी • प्रसन्नतापूर्वक यों उत्तर दिया – ॥ ११ ॥

महानयं वरस्तात यस्त्वयोक्तो रघूत्तम ।

च तस्मादेतद् भविष्यति ॥ १२ ॥

' जो युद्ध में मारे गये हैं और राक्षसोंने जिनके मस्तक तथा भुजाएँ काट डाली हैं, वे सब वानर, भालू और लंगूर जी उठें ॥ १३ ॥

नीरुजो निर्वणाश्चैव सम्पन्नवलपौरुषाः ।

समुत्थास्यन्ति हरयः सुप्ता निद्राक्षये यथा ॥ १४ ॥

' नींद टूटने पर सोकर उठे हुए मनुष्योंकी भाँति वे सभी वानर नीरोग, व्रणहीन तथा बल - पौरुषसे सम्पन्न होकर उठ बैठेंगे ॥ १४ ॥

सुहृद्भिर्बान्धवैश्चैव शातिभिः स्वजनेन च ।

सर्व एव समेष्यन्ति संयुक्ताः परया मुदा ॥ १५ ॥

' सभी परमानन्दसे युक्त हो अपने सुहृदों, बान्धवों, जाति-भाइयों तथा स्वजनों से मिलेंगे ॥ १५ ॥

अकाले पुष्पशबलाः फलवन्तश्च पादपाः ।

भविष्यन्ति महेष्वास नद्यश्च सलिलायुताः ॥ १६ ॥

' महाधनुर्धर वीर! ये वानर जहाँ रहेंगे, वहाँ असमय में भी वृक्ष फल - फूलोंसे लद जायँगे और नदियाँ जलसे भरी रहेंगी ' ॥ १६ ॥

सव्रणैः प्रथमं गात्रैरिदानीं निर्वणैः समैः ।

ततः समुत्थिताः सर्वे सुप्त्वेव हरिसत्तमाः ॥ १७ ॥

इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर वे सब श्रेष्ठ वानर जिनके सब अङ्ग पहले घावोंसे भरे थे, उस समय घावरहित हो गये और सभी सोकर जगे हुएकी भाँति सहसा उठकर खड़े हो गये ॥

बभूवुर्वानराः सर्वे किं त्वेतदिति विस्मिताः ।

काकुत्स्थं परिपूर्णार्थं दृष्ट्वा सर्वे सुरोत्तमाः ॥ १८ ॥

अब्रुवन् परमप्रीताः स्तुत्वा रामं सलक्ष्मणम् ।

गच्छायोध्यामितो राजन् विसर्जय च वानरान् ॥१ ९ ॥

उन्हें इस प्रकार जीवित होते देख सब वानर आश्चर्य-चकित होकर कहने लगे कि यह क्या बात हो गयी? श्रीराम-चन्द्रजीको सफलमनोथ हुआ देख समस्त श्रेष्ठ देवता अत्यन्त प्रसन्न हो लक्ष्मणसहित श्रीरामकी स्तुति करके बोले - " राजन्! अब आप यहाँसे अयोध्याको पधारें और समस्त वानरोंको बिदा कर दें ॥ १८-१९ ॥

मैथिलीं सान्त्वयस्वैनामनुरकां यशस्विनीम् ।

भ्रातरं भरतं पश्य त्वच्छोकाद् व्रतचारिणम् ॥ २० ॥

“ ये मिथिलेशकुमारी यशस्विनी सीता सदा आपमें अनुराग रखती हैं । इन्हें सान्त्वना दीजिये और भाई भरत आपके शोकसे पीड़ित हो व्रत कर रहे हैं, अतः उनसे जाकर मिलिये ॥ २० ॥

द्विर्मया नोकपूर्व! आपने जो वर माँगा है, यह शत्रुघ्नं च महात्मानं मातृः सर्वाः परंतप । ' तात! रघुवंशविभूषण चात्मानं पौरान् गत्वा प्रहर्षय ॥ २१ ॥

बहुत बड़ा है, तथापि मैंने कभी दो तरह की बात नहीं की है; अभिषेचय शत्रुघ्नसे और समस्त माताओंसे वर अवश्य सफल होगा ॥ १२ ॥ ' परंतप! आप महात्मा

इसलिये यह राक्षसैः । भी जाकर मिलें, अपना अभिषेक करावें और पुरवासियोंको समुत्तिष्ठन्तु ते सर्वे हता ये युधि ॥ १३ ॥ हर्ष प्रदान करें ' ॥ २१ ॥

ऋक्षाश्च सह गोपुच्छैर्निकृत्ताननबाहवः

पृष्ठ 634

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युद्धकाण्डे एकविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४२५ एवमुक्त्वा सहस्राक्षो रामं सौमित्रिणा सह । सहित श्रीरामने सबको विश्राम करनेकी आज्ञा दी ॥ २३ ॥

विमानैः सूर्यसंकाशैर्ययौ हृष्टः सुरैः सह ॥ २२ ॥ ततस्तु सा लक्ष्मणरामपालिता.

श्रीराम और लक्ष्मणसे ऐसा कहकर देवराज इन्द्र सब महा यशखिनी । देवताओंके साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानोंद्वारा बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने लोकको चले गये ॥ २२ ॥

अभिवाद्य च काकुत्स्थः सर्वास्तस्त्रिदशोत्तमान् ।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वासमाज्ञापयत् तदा ॥ २३ ॥

उन समस्त श्रेष्ठ देवताओंको नमस्कार करके भाई लक्ष्मण-इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रिया ज्वलन्ती विरराज सर्वतो निशा प्रणीतेव हि शीतरश्मिना ॥ २४ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सुरक्षित तथा हृष्ट - पुष्ट सैनिकोंसे भरी हुई वह यशस्विनी विशाल सेना चन्द्रमाकी चाँदनीसे प्रकाशित होनेवाली रात्रिके समान अद्भुत शोभासे उद्भासित होती हुई विराज रही थी ॥ २४ ॥

युद्धकाण्डे विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ १२० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२० ॥

एकविंशत्यधिकशततमः सर्गः श्रीरामका अयोध्या जानेके लिये उद्यत होना और

तां रात्रिमुषितं रामं सुखोदितमरिंदमम् ।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं जयं पृष्ट्रा विभीषणः ॥ १ ॥

उस रात्रिको विश्राम करके जब शत्रुसूदन श्रीराम दूसरे दिन प्रातःकाल सुखपूर्वक उठे, तब कुशल प्रश्नके पश्चात् विभीषणने हाथ जोड़कर कहा— ॥ १ ॥

स्वानानि चाङ्गरागाणि वस्त्राण्याभरणानि च ।

चन्दनानि च माल्यानि दिव्यानि विविधानि च ॥ २ ॥

‘ रघुनन्दन! स्नानके लिये जल, अङ्गराग, वस्त्र, आभूषण, चन्दन और भाँति - भाँति की दिव्य मालाएँ आपकी सेवामें उपस्थित हैं ॥ २ ॥

अलंकारविदश्चैता नार्यः पद्मनिभेक्षणाः ।

उपस्थितास्त्वां विधिवत् स्नापयिष्यन्ति राघव ॥ ३ ॥

' रघुवीर! शृंगारकलाको जाननेवाली ये कमलनयनी नारियाँ भी सेवाके लिये प्रस्तुत हैं, जो आपको विधिपूर्वक स्नान करायेंगी ' ॥ ३ ॥

एवमुक्तस्तु काकुत्स्थः प्रत्युवाच विभीषणम् ।

हरीन् सुग्रीवमुख्यांस्त्वं स्त्रानेनोपनिमन्त्रय ॥ ४ ॥

विभीषण के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे कहा-' मित्र! तुम सुग्रीव आदि वानरवीरोंसे स्नान के लिये अनुरोध करो ॥ ४ ॥

स तु ताम्यति धर्मात्मा मम हेतोः सुखोचितः ।

सुकुमारो महाबाहुर्भरतः सत्यसंश्रयः ॥ ५ ॥

' मेरे लिये तो इस समय सत्यका आश्रय लेनेवाले धर्मात्मा महाबाहु भरत बहुत कष्ट सह रहे हैं । वे सुकुमार हैं और सुख पानेके योग्य हैं ॥ ५ ॥

तं विना कैकयीपुत्रं भरतं धर्मचारिणम् ।

न मे खानं बहु मतं वस्त्राण्याभरणानि च ॥ ६ ॥

' उन धर्मपरायण कैकेयीकुमार भरतसे मिले बिना न तो वा ० रा ० ५. १०. १७--उनकी आज्ञासे विभीषणका पुष्पक विमानको मँगाना मुझे स्नान अच्छा लगता है, न वस्त्र और आभूषणों को धारण करना ही ॥ ६ ॥

एतत् पश्य यथा क्षिप्रं प्रतिगच्छाम तां पुरीम् ।

अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ॥ ७ ॥

' अब तो तुम इस बात की ओर ध्यान दो कि हम किस तरह जल्दी से - - जल्दी अयोध्यापुरीको लौट सकेंगे; क्योंकि वहाँ तक पैदल यात्रा करनेवालेके लिये यह मार्ग बहुत ही दुर्गम है ' ॥ ७ ॥

एवमुक्तस्तु काकुत्स्थं प्रत्युवाच विभीषणः ।

अह्नात्वां प्रापयिष्यामि तां पुरीं पार्थिवात्मज ॥ ८ ॥

उनके ऐसा कहनेपर विभीषणने श्रीरामचन्द्रजीको इस प्रकार उत्तर दिया-- ' राजकुमार! आप इसके लिये चिन्तित न हों । मैं एक ही दिनमें आपको उस पुरीमें पहुँचा दूँगा ।

पुष्पकं नाम भद्रं ते विमानं सूर्यसनिभम् ।

मम भ्रातुः कुबेरस्य रावणेन बलीयसा ॥ ९ ॥

हृतं निर्जित्य संग्रामे कामगं दिव्यमुत्तमम् ।

त्वदर्थं पालितं चेदं तिष्ठत्यतुलविक्रम ॥ १० ॥

' आपका कल्याण हो । मेरे यहाँ मेरे बड़े भाई कुबेरका सूर्यतुल्य तेजस्वी पुष्पकविमान मौजूद है, जिसे महाबली रावणने संग्राममें कुबेरको हराकर छीन लिया था । अतुल पराक्रमी श्रीराम! वह इच्छानुसार चलनेवाला, दिव्य एवं उत्तम विमान मैंने यहाँ आपहीके लिये रख छोड़ा है ॥ ९ -१० ॥

तदिदं मेघसंकाशं विमानमिह तिष्ठति ।

येन यास्यसि यानेन त्वमयोध्यां गतज्वरः ॥ ११ ॥

' मेघ - जैसा दिखायी देनेवाला वह दिव्य विमान यहाँ विद्यमान है, जिसके द्वारा निश्चिन्त होकर आप अयोध्यापुरीको जा सकेंगे ॥ ११ ॥

पृष्ठ 635

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१४२६ श्रीमद्द्वाल्मीकीयरामायणे

अहं ते यद्यनुग्राह्यो यदि स्मरसि मे गुणान् ।

वस तावदिह प्राज्ञ यद्यस्ति मयि सौहृदम् ॥ १२ ॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या भार्यया सह ।

अर्चितः सर्वकामैस्त्वं ततो राम गमिष्यसि ॥ १३ ॥

' श्रीराम! यदि मुझे आप अपना कृपापात्र समझते हैं, मुझमें कुछ गुण देखते या मानते हैं और मेरे प्रति आपका सौहार्द है तो अभी भाई लक्ष्मण तथा पत्नी सीताजीके साथ कुछ दिन यहीं विराजिये 1 । मैं सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओं-द्वारा आपका सत्कार करूँगा । मेरे उस सत्कारको ग्रहण कर लेनेके पश्चात् अयोध्याको पधारियेगा ॥ १२-१३ ॥

प्रीतियुक्तस्य विहितां ससैन्यः ससुहृद्गुणः ।

सत्क्रियां राम मे तावद् गृहाण त्वं मयोद्यताम् ॥ १४ ॥

रघुनन्दन! मैं प्रसन्नतापूर्वक आपका सत्कार करना चाहता हूँ । मेरे द्वारा प्रस्तुत किये गये उस सत्कारको आप सुहृदों तथा सेनाओंके साथ ग्रहण करें ॥ १४ ॥

बहुमानाच्च सौहार्देन च राघव । प्रसादयामि प्रणयाद् प्रेष्योऽहं न खल्वाज्ञापयामि ते ॥ १५ ॥

' रघुवीर! मैं केवल प्रेम, सम्मान और सौहार्द के कारण ही आपसे यह प्रार्थना कर रहा हूँ । आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ । मैं आपका सेवक हूँ । इसलिये आपसे विनय करता हूँ, आपको आज्ञा नहीं देता हूँ ' ॥ १५ ॥

एवमुक्तस्ततो रामः प्रत्युवाच विभीषणम् ।

रक्षसां वानराणां च सर्वेषामेव शृण्वताम् ॥ १६ ॥

जब विभीषणने ऐसी बात कही, तब श्रीराम समस्त राक्षसों और वानरोंके सुनते हुए ही उनसे बोले – ॥ १६ ॥

पूजितोऽस्मि त्वया वीर साचिव्येन परेण च ।

सर्वात्मना च चेष्टाभिः सौहार्देन परेण च ॥ १७ ॥

' वीर! मेरे परम सुहृद् और उत्तम सचिव बनकर तुमने सब प्रकारकी चेष्टाओंद्वारा मेरा सम्मान और पूजन किया है ॥ १७ ॥

न खल्वेतन्न कुर्या ते वचनं राक्षसेश्वर ।

तं तु मे भ्रातरं द्रष्टुं भरतं त्वरते मनः ॥ १८ ॥

मां निवर्तयितुं योऽसौ चित्रकूटमुपागतः ।

शिरसा याचतो यस्य वचनं न कृतं मया ॥ १ ९ ॥

मित्रवर गुह और नगर एवं जनपदके लोगोंको देखनेके लिये भी मुझे बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ २० ॥

अनुजानीहि मां सौम्य पूजितोऽस्मि विभीषण ।

मन्युर्न खलु कर्तव्यः सखे त्वां चानुमानये ॥ २१ ॥

' सौम्य विभीषण! अब तो तुम मुझे जानेकी ही अनुमति दो । मैं तुम्हारेद्वारा बहुत सम्मानित हो चुका हूँ ॥ सखे! मेरे इस हठके कारण मुझपर क्रोध न करना । इसके लिये मैं तुमसे बार - बार प्रार्थना करता हूँ ॥ २१ ॥

उपस्थापय मे शीघ्रं विमानं राक्षसेश्वर ।

कृतकार्यस्य मे वासः कथं स्यादिह सम्मतः ॥ २२ ॥

' राक्षसराज! अब शीघ्र मेरे लिये पुष्पकविमानको यहाँ मँगाओ । जब मेरा यहाँ कार्य समाप्त हो गया, तब यहाँ ठहरना मेरे लिये कैसे ठीक हो सकता है? ' ॥ २२ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।

विमानं सूर्यसंकाशमाजुहाव त्वरान्वितः ॥ २३ ॥

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहनेपर राक्षसराज विभीषणने बड़ी उतावली के साथ उस सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानका आवाहन किया ॥ २३ ॥

ततः काञ्चनचित्राङ्गं वैदूर्यमणिवेदिकम् ।

कूटागारैः परिक्षिप्तं सर्वतो रजतप्रभम् ॥ २४ ॥

उस विमानका एक - एक अङ्ग सोनेसे जड़ा हुआ था, जिससे उसकी विचित्र शोभा होती थी । उसके भीतर वैदूर्य मणि ( नीलम ) की वेदियाँ थीं, जहाँ - तहाँ गुप्त गृह बने हुए थे और वह सब ओर चाँदीके समान चमकीला था ॥ २४ ॥

पाण्डुराभिः पताकाभिर्ध्वजैश्च समलंकृतम् ।

शोभितं काञ्चनैर्हयै है मपद्मविभूषितैः ॥ २५ ॥

वह श्वेत - पीत वर्णवाली पताकाओं तथा ध्वजसे अलंकृत था । उसमें सोनेके कमलोंसे सुसज्जित स्वर्णमयी अट्टालिकाएँ थीं, जो उस विमानकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ २५ ॥

प्रकीर्ण किङ्किणीजालैर्मुक्तामणिगवाक्षकम् ।

घण्टाजालैः परिक्षिप्तं सर्वतो मधुरखनम् ॥ २६ ॥

सारा विमान छोटी - छोटी घंटियोंसे युक्त झालरोंसे व्याप्त था । उसमें मोती और मणियोंकी खिड़कियाँ लगी थीं । सब बँधे थे, जिससे मधुर ध्वनि होती रहती थी ॥ २६ ॥

‘ राक्षसेश्वर! तुम्हारी इस बातको मैं निश्चय ही अस्वीकार ओर घंटे निर्मितं विश्वकर्मणा । नहीं कर सकता हूँ; परंतु इस समय मेरा मन अपने उन तं मेरुशिखराकारं हयैर्मुक्कारजतशोभितैः ॥ २७ ॥

भाई भरतको देखनेके लिये उतावला हो उठा है, जो मुझे बृहद्भिर्भूषितं हुआ विमान सुमेरु - शिखरके लौटा ले जानेके लिये चित्रकूटतक आये थे और मेरे चरणोंमें वह विश्वकर्माका बनाया चाँदीसे सुसज्जित बड़े - बड़े याचना करनेपर भी जिनकी बात मैंने नहीं समान ऊँचा तथा मोती और सिर झुकाकर कमरोंसे विभूषित था ॥ २७ ॥

मानी थी ॥ १८-१९ ॥ तलैः स्फटिकचित्राङ्गैर्वैदूर्यैश्च वरासनैः ।

कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेयीं च यशस्विनीम् । महाधनैः ॥ २८ ॥

गुहं च सुहृदं चैव पौराञ्जानपदैः सह ॥ २० ॥ महार्हास्तरणोपेतैरुपपन्नं

सिवा माता कौसल्या, सुमित्रा, यशस्विनी कैकेयी, उसकी फर्श विचित्र स्फटिकमणिसे जड़ी हुई थी । उसमें ' उनके

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3 हैं रहे कह करनेको सत्कार वानरोंक श्रीराम विभीषणस हुए उपस्थित लेकर विमान

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युद्धकाण्डे द्वाविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४२७ नीलमके बहुमूल्य सिंहासन थे, जिनपर महामूल्यवान् बिस्तर बिछे हुए थे ॥ २८ ॥

उपस्थितमनाधृष्यं तद् विमानं मनोजवम् ।

निवेदयित्वा रामाय तस्थौ तत्र विभीषणः ॥ २ ९ ॥

उसका मनके समान वेग था और उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी । वह विमान सेवामें उपस्थित हुआ । विभीषण श्रीरामको उसके आनेकी सूचना देकर वहाँ खड़े हो गये ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्य के तत् पुष्पकं कामगमं विमान-मुपस्थितं भूधरसंनिकाशम् । दृष्ट्वा तदा विस्मयमाजगाम रामः ससौमित्रिरुदारसत्त्वः ॥ ३० ॥

पर्वतके समान ऊँचे और इच्छानुसार चलनेवाले उस पुष्पकविमानको तत्काल उपस्थित देख लक्ष्मणसहित उदारचेता भगवान् श्रीरामको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ३० ॥

युद्धकाण्डे एकविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ १२१ ॥

युद्धकाण्ड में एक इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२१ ॥

द्वाविंशत्यधिकशततमः सर्गः श्रीरामकी आज्ञा से विभीषणद्वारा वानरोंका विशेष सत्कार तथा सुग्रीव और विभीषणसहित वानरोंको साथ लेकर श्रीरामका पुष्पकविमानद्वारा अयोध्याको प्रस्थान करना

उपस्थितं तु तं कृत्वा पुष्पकं पुष्पभूषितम् ।

अविदूरे स्थितो राममित्युवाच विभीषणः ॥ १ ॥

फूलोंसे सजे हुए पुष्पकविमानको वहाँ उपस्थित करके पास ही खड़े हुए विभीषणने श्रीरामसे कुछ कहनेका विचार किया ॥ १ ॥

स तु बद्धाञ्जलिपुटो विनीतो राक्षसेश्वरः ।

अब्रवीत् त्वरयोपेतः किं करोमीति राघवम् ॥ २ ॥

राक्षसराज विभीषणने दोनों हाथ जोड़कर बड़ी विनय और उतावलीके साथ श्रीरघुनाथजी से पूछा- ' प्रभो! अब मैं क्या सेवा करूँ? ' ॥ २ ॥

तमब्रवीन्महातेजा लक्ष्मणस्योपशृण्वतः ।

विमृश्य राघवो वाक्यमिदं स्नेहपुरस्कृतम् ॥ ३ ॥

तब महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीने कुछ सोचकर लक्ष्मण के सुनते हुए यह स्नेहयुक्त वचन कहा ॥ ३ ॥

कृतप्रयत्नकर्माणः सर्व एव वनौकसः ।

रत्नैरर्थैश्च विविधैः सम्पूज्यन्तां विभीषण ॥ ४ ॥

' विभीषण! इन सारे वानरोंने युद्धमें बड़ा यत्न एवं परिश्रम किया है; अतः तुम नाना प्रकारके रत्न और धन आदिके द्वारा इन सबका सत्कार करो ॥ ४ ॥

सहामीभिस्त्वया लङ्का निर्जिता राक्षसेश्वर ।

हृष्ठैः प्राणभयं त्यक्त्वा संग्रामेष्वनिवर्तिभिः ॥ ५ ॥

' राक्षसेश्वर! ये वीर वानर संग्रामसे कभी पीछे नहीं हटते हैं और सदा हर्ष एवं उत्साह से भरे रहते हैं । प्राणोंका भय छोड़कर लड़नेवाले इन वानरोंके सहयोगसे तुमने लङ्कापर विजय पायी है ॥ ५ ॥

त इमे कृतकर्माणः सर्व एव वनौकसः ।

धनरत्नप्रदानैश्च कर्मैषां सफलं कुरु ॥ ६ ॥

“ ये सभी वानर इस समय अपना काम पूरा कर चुके हैं, अतः इन्हें रत्न और धन आदि देकर तुम इनके इस कर्मको सफल करो ॥ ६ ॥

एवं सम्मानिताश्चैते नन्द्यमाना यथा त्वया ।

भविष्यन्ति कृतज्ञेन निर्वृता हरियूथपाः ॥ ७ ॥

' तुम कृतज्ञ होकर जब इनका इस प्रकार सम्मान और अभिनन्दन करोगे, तब ये वानरयूथपति बहुत संतुष्ट होंगे ॥ ७ ॥

त्यागिनं संग्रहीतारं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम् ।

सर्वे त्वामभिगच्छन्ति ततः सम्बोधयामि ते ॥ ८ ॥

' ऐसा करने से सब लोग यह जानेंगे कि विभीषण उचित अवसरपर धनका त्याग एवं दान करते हैं, यथासमय न्यायोचित रीतिसे धन और रत्न आदिका संग्रह करते रहते हैं, दयालु हैं और जितेन्द्रिय हैं; इसलिये तुम्हें ऐसा करने के लिये समझा रहा हूँ ॥ ८ ॥

हीनं रतिगुणैः सर्वैरभिहन्तारमाहवे ।

सेना त्यजति संविग्ना नृपतिं तं नरेश्वर ॥ ९ ॥

' नरेश्वर! जो राजा सेवकों में प्रेम उत्पन्न करनेवाले दान-मान आदि सब गुणोंसे रहित होता है, उसे युद्ध के अवसरपर उद्विग्न हुई सेना छोड़कर चल देती है, वह समझती है कि यह व्यर्थ ही हमारा वध करा रहा है- हमारे भरण - पोषणका या योग - क्षेमकी चिन्ता इसे बिल्कुल नहीं है ' ॥ ९ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण वानरांस्तान् विभीषणः ।

रत्नार्थसंविभागेन सर्वानेवाभ्यपूजयत् ॥ १० ॥

श्रीराम के ऐसा कहनेपर विभीषणने उन सब वानरोंको रत्न और धन देकर सभीका पूजन ( सत्कार ) किया ॥१० ॥

ततस्तान् पूजितान् दृष्ट्वा रत्नार्थैर्हरियूथपान् ।

आरुरोह तदा रामस्तद् विमानमनुत्तमम् ॥ ११ ॥

अङ्केनादाय वैदेहीं लज्जमानां मनस्विनीम् ।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विक्रान्तेन धनुष्मता ॥ १२ ॥

उन वानरयूथपतियोंको रत्न और धनसे पूजित हुआ देख उस समय भगवान् श्रीराम लजाती हुई मनस्विनी विदेहकुमारी-को अङ्कमें लेकर पराक्रमी धनुर्धर बन्धु लक्ष्मणके साथ उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हुए ॥ ११-१२ ॥

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श्रीमवाल्मीकीय रामायणे १४२८

अब्रवीत् स विमानस्थः पूजयन् सर्ववानरान् ।

सुग्रीवं च महावीर्य काकुत्स्थः सविभीषणम् ॥ १३ ॥

विमानपर बैठकर समस्त वानरोंका समादर करते हुए उन ककुत्स्थ कुलभूषण श्रीरामने विभीषणसहित महापराक्रमी सुग्रीवसे कहा -- ॥ १३ ॥

मित्रकार्य कृतमिदं भवद्भिर्वानरर्षभाः ।

अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं प्रतिगच्छत ॥ १४ ॥

" वानरश्रेष्ठ वीरो! आपलोगोंने अपने इस मित्रका कार्य मित्रोचित रीतिसे ही भलीभाँति सम्पन्न किया । अब आप सब अपने - अपने अभीष्ट स्थानोंको चले जायँ ॥ १४ ॥

यत् तु कार्य वयस्येन स्निग्धेन च हितेन च ।

कृतं सुग्रीव तत् सर्वे भवताधर्मभीरुणा ॥ १५ ॥

' सखे सुग्रीव! एक हितैषी एवं प्रेमी मित्रको जो काम करना चाहिये, वह सब तुमने पूरा - पूरा कर दिखाया; क्योंकि तुम अधर्मसे डरनेवाले हो ॥ १५ ॥

किष्किन्धां प्रति याह्याशु स्वसैन्येनाभिसंवृतः ।

स्वराज्ये वस लङ्कायां मया दत्ते विभीषण ।

न त्वां धर्षयितुं शक्ताः सेन्द्रा अपि दिवौकसः ॥ १६ ॥

' वानरराज! अब तुम अपनी सेनाके साथ शीघ्र ही किष्किन्धापुरीको चले जाओ । विभीषण! तुम भी लङ्कामें मेरे दिये हुए अपने राज्यपर स्थिर रहो; अब इन्द्र आदि देवता भी तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकते हैं ॥ १६ ॥

अयोध्यां प्रति यास्यामि राजधानीं पितुर्मम ।

सर्वानामन्त्रयामि वः ॥ १७ ॥

अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि अपने पिताकी राजधानी अयोध्याको ' अब इस समय आप सब लोगों से पूछता हूँ और सबकी जाऊँगा । इसके लिये अनुमति चाहता हूँ ' ॥ १७ ॥

रामेण हरीन्द्रा हरयस्तथा ।

एवमुक्तास्तु राक्षसश्च विभीषणः ॥ १८ ॥

प्राञ्जलयः सर्वे ' नृपश्रेष्ठ! राज्याभिषेकके समय मन्त्रपूत जलसे भीगे आपके श्रीविग्रहकी झाँकी करके माता कौसल्याके चरणों में हुए मस्तक झुकाकर हम शीघ्र अपने घर लौट आयेंगे ' ॥ २० ॥

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा वानरैः सविभीषणैः ।

अब्रवीद् वानरान् रामः ससुग्रीवविभीषणान् ॥ २१ ॥

विभीषणसहित वानरोंके इस प्रकार अनुरोध करनेपर श्रीरामने सुग्रीव तथा विभीषणसहित उन वानरोंसे कहा ॥२१ ॥

प्रियात् प्रियतरं लब्धं यदहं ससुहृज्जनः ।

सर्वैर्भवद्भिः सहितः प्रीतिं लप्स्ये पुरीं गतः ॥ २२ ॥

" मित्रो! यह तो मेरे लिये प्रियसे भी प्रिय बात होगी-परम प्रिय वस्तुका लाभ होगा, यदि मैं आप सभी सुहृदोंके साथ अयोध्यापुरीको चल सकूँ । इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होगी ॥ २२ ॥

क्षिप्रमारोह सुग्रीव विमानं सह वानरैः ।

त्वमप्यारोह सामात्यो राक्षसेन्द्र विभीषण ॥ २३ ॥

' सुग्रीव! तुम सब वानरोंके साथ शीघ्र ही इस विमान-पर चढ़ जाओ । राक्षसराज विभीषण! तुम भी मन्त्रियों के साथ विमानपर आरूढ़ हो जाओ ' ॥ २३ ॥

ततः स पुष्पकं दिव्यं सुग्रीवः सह वानरैः ।

आरुरोह मुदा युक्तः सामात्यश्च विभीषणः ॥ २४ ॥

तब वानरोंसहित सुग्रीव और मन्त्रियोंसहित विभीषण बड़ी प्रसन्नताके साथ उस दिव्य पुष्पकविमानपर चढ़ गये ॥ सर्वेषु कौबेरं परमासनम् । तेष्वारूढेषु विहायसम् ॥ २५ ॥

राघवेणाभ्यनुज्ञातमुत्पपात उन सबके चढ़ जानेपर कुबेरका वह उत्तम आसन पुष्पक विमान श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर आकाशको उड़-चला ॥ २५ ॥

खगतेन विमानेन हंसयुक्तेन भाखता ।

बभौ रामः कुबेरवत् ॥ २६ ॥

ऊचुः ऐसा कहनेपर सभी वानर सेनापति तथा प्रहृष्टश्च प्रतीतश्च विमानसे श्रीरामचन्द्रजीके लगे- ॥ १८ ॥ आकाशमें पहुँचे हुए उस हंसयुक्त तेजस्वी

राक्षसराज विभीषण हाथ जोड़कर कहने यात्रा करते हुए पुलकित एवं प्रसन्नचित्त श्रीराम साक्षात् अयोध्यां गन्तुमिच्छामः सर्वान् नयतु नो भवान् । कुबेरके समान शोभा पा रहे थे ॥ २६ ॥

मुक्ता विचरिष्यामो वनान्युपवनानि च ॥ १ ९ ॥ राक्षसाश्च महाबलाः । ' भगवन्! हम भी अयोध्यापुरीको चलना चाहते हैं, ते सर्वे वानरक्षश्च तस्मिन्नुपाविशन् ॥ २७ ॥

आप हमें भी अपने साथ ले चलिये । वहाँ हम प्रसन्नतापूर्वक यथासुखमसम्बाधं दिव्ये और महाबली राक्षस उस दिव्य वनों और उपवनों में विचरेंगे ॥ १ ९ ॥ वे सब वानर, भालू थे । किसीको किसीसे च । विमानमें बड़े सुखसे फैलकर बैठे हुए eg car भषेका कौसल्यामभिवाद्य ॥ २० ॥ धक्का नहीं खाना पड़ता था ॥ २७ ॥

अचिरादागमिष्यामः स्वगृहान् नृपसत्तम सर्गः ॥ १२२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वाविंशत्यधिकशततमः आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण

पृष्ठ 640

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युद्धकाण्डे त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४२ ९ त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः अयोध्याकी यात्रा करते समय श्रीरामका सीताजीको मार्गके स्थान दिखाना

अनुज्ञातं तु रामेण तद् विमानमनुत्तमम् ।

हंसयुक्तं महानादमुत्पपात विहायसम् ॥ १ ॥

श्रीरामकी आज्ञा पाकर वह हंसयुक्त उत्तम विमान महान् शब्द करता हुआ आकाशमें उड़ने लगा ॥ १ ॥

पातयित्वा ततश्चक्षुः सर्वतो रघुनन्दनः ।

अब्रवीन्मैथिलीं सीतां रामः शशिनिभाननाम् ॥ २ ॥

उस समय रघुकुलनन्दन श्रीरामने सब ओर दृष्टि डाल -कर चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली मिथिलेशकुमारी सीतासे कहा- ॥ २ ॥

कैलासशिखराकारे त्रिकूटशिखरे स्थिताम् ।

लङ्कामख वैदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥

' विदेहराजनन्दिनि! कैलास - शिखरके समान सुन्दर त्रिकूट पर्वतके विशाल शृङ्गपर बसी हुई विश्वकर्माकी बनायी लङ्कापुरी-को देखो, कैसी सुन्दर दिखायी देती है! ॥ ३ ॥

एतदायोधनं पश्य मांसशोणितकर्दमम् ।

हरीणां राक्षसानां च सीते विशसनं महत् ॥ ४ ॥

' इधर इस युद्धभूमिको देखो । यहाँ रक्त और मांसकी कीच जमी हुई है । सीते! इस युद्धक्षेत्रमें वानरों और राक्षसों-का महान् संहार हुआ है ॥ ४ ॥

एष दत्तवरः शेते प्रमाथी राक्षसेश्वरः ।

तव हेतोर्विशालाक्षि निहतो रावणो मया ॥ ५ ॥

' विशाललोचने! यह राक्षसराज रावण राखका ढेर बनकर सो रहा है । यह बड़ा भारी हिंसक था और इसे ब्रह्माजीने वरदान दे रक्खा था; किंतु तुम्हारे लिये मैंने इसका वध कर डाला है ॥ ५ ॥

कुम्भकर्णोऽत्र निहतः प्रहस्तश्च निशाचरः ।

धूम्राक्षश्चात्र निहतो वानरेण हनूमता ॥ ६ ॥

" यहीं पर मैंने कुम्भकर्णको मारा था, यहीं निशाचर प्रहस्त मारा गया है और इसी समराङ्गण में वानरवीर हनुमान्ने धूम्राक्षका वध किया है ॥ ६ ॥

विद्युन्माली हतश्चात्र सुषेणेन महात्मना ।

लक्ष्मणेनेन्द्र जिच्चात्र रावणिर्निहतो रणे ॥ ७ ॥

' यहीं महामना सुषेणने विद्युन्मालीको मारा था और इसी रणभूमिमें लक्ष्मणने रावणपुत्र इन्द्रजित् का संहार किया था ॥ ७ ॥

अङ्गदेनात्र निहतो विकटो नाम राक्षसः ।

विरूपाक्षश्च दुष्प्रेक्षो महापार्श्वमहोदरौ ॥ ८ ॥

" यहीं अङ्गदने विकटनामक राक्षसका वध किया था । जिसकी ओर देखना भी कठिन था, वह विरूपाक्ष तथा महापार्श्व और महोदर भी यहीं मारे गये हैं ॥ ८ ॥

अकम्पनश्च निहतो बलिनोऽन्ये च राक्षसाः ।

त्रिशिराश्चातिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ ॥ ९ ॥

' अकम्पन तथा दूसरे बलवान् राक्षस यहीं मौतके घाट उतारे गये थे । त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक और नरान्तक भी यहीं मार डाले गये थे ॥ ९ ॥

युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च राक्षसप्रवरावुभौ ।

निकुम्भश्चैव कुम्भश्च कुम्भकर्णात्मजौ बली ॥ १० ॥

' युद्धोन्मत्त और मत्त - ये दोनों श्रेष्ठ राक्षस तथा बलवान् कुम्भ और निकुम्भ - ये कुम्भकर्णके दोनों पुत्र भी यहीं मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १० ॥

वज्रदंष्ट्रश्च दंष्ट्रश बहवो राक्षसा हताः ।

मकराक्षश्च दुर्धर्षो मया युधि निपातितः ॥ ११ ॥

' वज्रदंष्ट्र और दंष्ट्र आदि बहुत - से राक्षस यहीं कालके ग्रास बन गये । दुर्धर्षं वीर मकराक्षको इसी युद्धस्थलमें मैंने मार गिराया था ॥ ११ ॥

अकम्पनश्च निहतः शोणिताक्षश्च वीर्यवान् ।

यूपाक्षश्च प्रजङ्घश्च निहतौ तु महाहवे ॥ १२ ॥

' अकम्पन और पराक्रमी शोणिताक्षका भी यहीं काम तमाम हुआ था । यूपाक्ष और प्रजङ्घ भी इसी महासमरमें मारे गये थे ॥ १२ ॥

विद्युजिह्वोऽत्र निहतो राक्षसो भीमदर्शनः ।

यशशत्रुश्च निहतः सुप्तप्रश्च महाबलः ॥ १३ ॥

" जिसकी ओर देखने से भी भय होता था, वह राक्षस विद्युजिह यहीं मौतका ग्रास बन गया । यज्ञशत्रु और महाबली सुनको भी यहीं मारा गया था ॥ १३ ॥

सूर्यशत्रुश्च निहतो ब्रह्मशत्रुस्तथापरः ।

अत्र मन्दोदरी नाम भार्या तं पर्यदेवयत् ॥ १४ ॥

सपत्नीनां सहस्रेण साग्रेण परिवारिता । ' सूर्यशत्रु और ब्रह्मशत्रु नामक निशाचरोंका भी यहीं वध किया गया था । यहीं रावणकी भार्या मन्दोदरीने उसके लिये विलाप किया था । उस समय वह अपनी हजारोंसे भी अधिक सौतों से घिरी हुई थी ॥ १४३ ॥

एतत् तु दृश्यते तीर्थ समुद्रस्य वरानने ॥ १५ ॥

यत्र सागरमुत्तीर्य तां रात्रिमुषिता वयम् । " सुमुखि! यह समुद्रका तीर्थ दिखायी देता है, जहाँ समुद्रको पार करके हमलोगोंने वह रात बितायी थी ॥ १५३ ॥

एष सेतुर्मया बद्धः सागरे लवणार्णवे ॥ १६ ॥

तब हेतोर्विशालाक्षि नलसेतुः सुदुष्करः । ' विशाललोचने! खारे पानी के समुद्र में यह मेरा बँधवाया हुआ पुल है, जो नलसेतुके नामसे विख्यात है । देवि! तुम्हारे