Ramayana 2 — पृष्ठ 861–870

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 861–870

पृष्ठ 861

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१६३६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे । शीघ्रतापूर्वक कहा - ' तुम अभी जाकर शीघ्रपराक्रमी भरत लक्ष्मणं भरतं चैव गत्वा तौ लघुविक्रमौ और लक्ष्मण को मेरे आने की सूचना दो और उन्हें जल्दी ममागमनमाख्याय शब्दापयत मा चिरम् ॥ २० ॥

फिर श्रीरामने ड्योढ़ीके भीतर खड़े हुए द्वारपालसे बुला लाओ ' ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वयशीतितमः सर्गः ॥ ८२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बयासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८२ ॥

त्र्यशीतितमः सर्गः भरत के कहने से श्रीरामका राजसूय यज्ञ

तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।

कुमारावाहूय राघवाय न्यवेदयत् ॥ १ ॥

द्वाःस्थः क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामका यह कथन सुनकर द्वारपालने कुमार भरत और लक्ष्मणको बुलाकर श्रीरघुनाथजी-की सेवामें उपस्थित कर दिया ॥ १ ॥

तु राघवः प्राप्तावुभौ भरतलक्ष्मणौ ।

परिष्वज्य ततो रामो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २ ॥

भरत और लक्ष्मणको आया देख रघुकुलतिलक श्रीरामने उन्हें हृदय से लगा लिया और यह बात कही ॥ २ ॥

कृतं मया यथा तथ्यं द्विजकार्यमनुत्तमम् ।

धर्मसेतुमथो भूयः कर्तुमिच्छामि राघवौ ॥ ३ ॥

" घुवंशी राजकुमारो! मैंने ब्राह्मणका वह परम उत्तम कार्यं यथावत् रूपसे सिद्ध कर दिया । अब मैं पुनः राजधर्मकी चरम सीमारूप राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करना चाहता हूँ ॥

अक्षयश्चाव्ययश्चैव धर्मसेतुर्मतो मम ।

धर्मप्रवचनं चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ४ ॥

' मेरी राय में धर्मसेतु ( राजसूय ) अक्षय एवं अविनाशी फल देनेवाला है तथा वह धर्मका पोषक एवं समस्त पापका नाश करने वाला है ॥ ४ ॥

युवाभ्यामात्मभूताभ्यां राजसूयमनुत्तमम् ।

सहितो यष्टुमिच्छामि तत्र धर्मस्तु शाश्वतः ॥ ५ ॥

' तुम दोनों मेरे आत्मा ही हो, अतः मेरी इच्छा तुम्हारे साथ इस उत्तम राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करने की है; क्योंकि उसमें राजाका शाश्वत धर्म प्रतिष्ठित है ॥ ५ ॥

इष्ट्वा तु राजसूयेन मित्रः शत्रुनिबर्हणः ।

सुहुतेन सुयज्ञेन वरुणत्वमुपागमत् ॥ ६ ॥

' शत्रुओं का संहार करनेवाले मित्रदेवताने उत्तम आहुति से युक्त राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञद्वारा परमात्माका यजन करके वरुणका पद प्राप्त किया था ॥ ६ ॥

सोमश्च राजसूयेन इष्ट्वा धर्मेण धर्मवित् ।

प्राप्तश्च सर्वलोकेषु कीर्ति स्थानं च शाश्वतम् ॥ ७ ॥

' धर्मज्ञ सोम देवताने धर्मपूर्वक राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करके सम्पूर्ण लोकों में कीर्ति तथा शाश्वत स्थानको प्राप्त कर लिया ॥ ७ ॥

अस्मिन्नहनि यच्छ्रेयश्चिन्त्यतां तन्मया सह । करने के विचारसे निवृत्त होना हितं चायतियुक्तं च प्रयतौ वक्तुमर्हथः ॥ ८ ॥

“ इसलिये आजके दिन मेरे साथ बैठकर तुमलोग यह विचार करो कि हमारे लिये कौन - सा कर्म लोक और परलोक में कल्याणकारी होगा तथा संयत - चित्त होकर तुम दोनों इस विषय में मुझे सलाह दो ' ॥ ८ ॥

श्रुत्वा तु राघवस्यैतद् वाक्यं वाक्यविशारदः ।

भरतः प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ९ ॥

श्रीरघुनाथजी के ये वचन सुनकर वाक्यविशारद भरतजीने हाथ जोड़कर यह बात कही ॥ ९ ॥

त्वयि धर्मः परः साधो त्वयि सर्वा वसुंधरा ।

प्रतिष्ठिता महाबाहो यशश्चामितविक्रम ॥ १० ॥

' साधो! अमित पराक्रमी महाबाहो! आपमें उत्तम धर्म प्रतिष्ठित है । यह सारी पृथ्वी भी आपपर ही आधारित है तथा आपमें ही यशकी प्रतिष्ठा है ॥ १० ॥

महीपालाश्च सर्वे त्वां प्रजापतिमिवामराः ।

निरीक्षन्ते महात्मानं लोकनाथं यथा वयम् ॥ ११ ॥

' देवतालोग जैसे प्रजापति ब्रह्माको ही महात्मा एवं लोकनाथ समझते हैं, उसी प्रकार हमलोग और समस्त भूपाल आपको ही महापुरुष तथा समस्त लोकोंका स्वामी मानते हैं --उसी दृष्टिसे आपको देखते हैं ॥ ११ ॥

पुत्राश्च पितृवद् राजन् पश्यन्ति त्वां महाबल ।

पृथिव्या गतिभूतोऽसि प्राणिनामपि राघव ॥ १२ ॥

' राजन्! महाबली रघुनन्दन! पुत्र जैसे पिताको देखते हैं, उसी प्रकार आपके प्रति सब राजाओंका भाव है । आप ही समस्त पृथ्वी और सम्पूर्ण प्राणियोंके भी आश्रय हैं ॥१२ ॥

स त्वमेवंविधं यज्ञमाहर्तासि कथं नृप ।

पृथिव्यां राजवंशानां विनाशो यत्र दृश्यते ॥ १३ ॥

' नरेश्वर! फिर आप ऐसा यज्ञ कैसे कर सकते हैं, जिसमें भूमण्डलके समस्त राजवंशों का विनाश दिखायी देता है ॥ १३ ॥

पृथिव्यां ये च पुरुषा राजन् पौरुषमागताः ।

सर्वेषां भविता तत्र संक्षयः सर्वकोपजः ॥ १४ ॥

' राजन्! पृथ्वीपर जो पुरुषार्थी पुरुष हैं, उन सबका सभीके कोपसे उस यज्ञमें संहार हो जायगा ॥ १४ ॥

पुरुषशार्दूल गुणैरतुलविक्रम ।

पृष्ठ 862

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उत्तरकाण्डे चतुरशीतितमः सर्गः १६३७ पृथिवीं नार्हसे हन्तुं वशे हि तत्र वर्तते ॥ १५ ॥

' पुरुषसिंह! अतुल पराक्रमी वीर! आपके सद्गुणोंके कारण सारा जगत् आपके वशमें है । आपके लिये इस भूतल के निवासियोंका विनाश करना उचित न होगा ' ॥ १५ ॥

भरतस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वामृतमयं यथा ।

प्रहर्षमतुलं लेभे रामः सत्यपराक्रमः ॥ १६ ॥

भरतका यह अमृतमय वचन सुनकर सत्य पराक्रमी श्रीराम-को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ १६ ॥

उवाच च शुभं वाक्यं कैकेय्यानन्दवर्धनम् ।

प्रीतोऽस्मि परितुष्टोऽस्मि तवाद्य वचनेऽनघ ॥ १७ ॥

उन्होंने कैकेयीनन्दन भरतसे यह शुभ बात कही-' निष्पाप भरत! आज तुम्हारी बात सुनकर मैं बहुत प्रसन्न एवं संतुष्ट हुआ हूँ ॥ १७ ॥

इदं वचनमक्लीवं त्वया धर्मसमागतम् ।

व्याहृतं पुरुषव्याघ्र पृथिव्याः परिपालनम् ॥ १८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये ' पुरुषसिंह! तुम्हारे मुखसे निकला हुआ यह उदार एवं धर्मसंगत वचन सारी पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला है ॥ १८ ॥

एण्यदस्मदभिप्रायाद् राजसूयात् क्रतूत्तमात् ।

निवर्तयामि धर्मज्ञ तव सुव्याहृतेन च ॥ १ ९ ॥

' धर्मज्ञ! मेरे हृदय में राजसूय यज्ञका संकल्प उठ रहा था; किंतु आज तुम्हारे इस सुन्दर भाषण को सुनकर मैं उस उत्तम यज्ञकी ओर से अपने मनको हटाये लेता हूँ ॥ १ ९ ॥ लोकपीडाकरं कर्म न कर्तव्यं विचक्षणैः ।

बालानां तु शुभं वाक्यं ग्राह्यं लक्ष्मणपूर्वज ।

तस्माच्छृणोमि ते वाक्यं साधु युक्तं महाबल ॥ २० ॥

' लक्ष्मण के बड़े भाई! बुद्धिमान् पुरुषोंको ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये, जो सम्पूर्ण जगत् को पीड़ा देने वाला हो । बालकोंकी कही हुई बात भी यदि अच्छी हो तो उसे ग्रहण करना ही उचित है; अतः महाबली वीर! मैंने तुम्हारी उत्तम एवं युक्तिसंगत बातको बड़े ध्यान से सुना है ' ॥ २० ॥

उत्तरकाण्डे व्यशीतितमः सर्गः ॥ ८३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८३ ॥

चतुरशीतितमः सर्गः लक्ष्मणका अश्वमेध यज्ञका प्रस्ताव करते हुए इन्द्र और वृत्रासुरकी कथा सुनाना, वृत्रासुरकी तपस्या और इन्द्रका भगवान् विष्णुसे उसके वध के लिये अनुरोध

तथोक्तवति रामे तु भरते च महात्मनि ।

लक्ष्मणोऽथ शुभं वाक्यमुवाच रघुनन्दनम् ॥ १ ॥

श्रीराम और महात्मा भरतके इस प्रकार बातचीत करने-पर लक्ष्मणने रघुकुलनन्दन श्रीरामसे यह शुभ बात कही -- ॥

अश्वमेधो महायज्ञः पावनः सर्वपाप्मनाम् ।

पावनस्तव दुर्धर्षो रोचतां रघुनन्दन ॥ २ ॥

रघुनन्दन! अश्वमेध नामक महान् यज्ञ समस्त पापोंको दूर करनेवाला, परमपावन और दुष्कर है । अतः इसका अनुष्ठान आप पसंद करें ॥ २ ॥

श्रूयते हि पुरावृत्तं वासवे सुमहात्मनि ।

ब्रह्महत्यावृतः शक्रो हयमेधेन पावितः ॥ ३ ॥

' महात्मा इन्द्रके विषय में यह प्राचीन वृत्तान्त सुनने में आता है कि इन्द्रको जब ब्रह्महत्या लगी थी, तब वे अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करके ही पवित्र हुए थे ॥ ३ ॥

पुरा किल महाबाहो देवासुरसमागमे ।

वृत्रो नाम महानासीद् दैतेयो लोकसम्मतः ॥ ४ ॥

' महाबाहो! पहले की बात है, जब देवता और असुर परस्पर मिलकर रहते थे, उन दिनों वृत्रनामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़ा असुर रहता था । लोकमें उसका बड़ा आदर था ॥ ४ ॥

विस्तीर्णो योजनशतमुच्छ्रितस्त्रिगुणं ततः ।

अनुरागेण लोकांस्त्रीन् स्नेहात् पश्यति सर्वतः ॥ ५

" वह सौ योजन चौड़ा और तीन सौ योजन ऊँचा था । वह तीनों लोकोंको आत्मीय समझकर प्यार करता था और सबको स्नेहभरी दृष्टिसे देखता था ॥ ५ ॥

धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च बुद्ध्या च परिनिष्ठितः ।

शशास पृथिवीं स्फीतां धर्मेण सुसमाहितः ॥ ६ ॥

' उसे धर्मका यथार्थ ज्ञान था । वह कृतज्ञ और स्थिरप्रज्ञ था तथा पूर्णतः सावधान रहकर धन - धान्यसे भरी - पूरी पृथ्वीका धर्मपूर्वक शासन करता था ॥ ६ ॥

तस्मिन् प्रशासति तदा सर्वकामदुघा मही ।

रसवन्ति प्रसूनानि मूलानि च फलानि च ॥ ७ ॥

‘ उसके शासनकालमें पृथ्वी सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवाली थी । यहाँ फल, फूल और मूल सभी सरस होते थे ॥ ७ ॥

अकृष्टपच्या पृथिवी सुसम्पन्ना महात्मनः ।

स राज्यं तादृशं भुङ्के स्फीतमद्भुतदर्शनम् ॥ ८ ॥

' महात्मा वृत्रासुर के राज्यमें यह भूमि बिना जोते बोये ही अन्न उत्पन्न करती तथा धन - धान्यसे भलीभाँति सम्पन्न रहती थी । इस प्रकार वह असुर समृद्धिशाली एवं अद्भुत राज्य-का उपभोग करता था ॥ ८ ॥

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना तपः कुर्यामनुत्तमम् ।

तपो हि परमं श्रेयः सम्मोहमितरत् सुखम् ॥ ९

पृष्ठ 863

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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १६३८ ‘ एक समय वृत्रासुरके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं परम उत्तम तप करूँ; क्योंकि तप ही परम कल्याणका साधन है । दूसरा सारा सुख तो मोहमात्र ही है ॥ ९ ॥

स निक्षिप्य सुतं ज्येष्ठं पौरेषु मधुरेश्वरम् ।

तप उग्रं समातिष्ठत् तापयन् सर्वदेवताः ॥ १० ॥

‘ उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र मंधुरेश्वरको राजा बना पुरवासियों-को सौंप दिया और सम्पूर्णं देवताओंको ताप देता हुआ वह कठोर तपस्या करने लगा ॥ १० ॥

तपस्तप्यति वृत्रे तु वासवः परमार्तवत् ।

विष्णुं समुपसंक्रम्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ११ ॥

‘ वृत्रासुरके तपस्यामें लग जानेपर इन्द्र बड़े दुखी - से होकर भगवान् विष्णुके पास गये और इस प्रकार बोले – ॥ ११ ॥

तपस्यता महाबाहो लोकाः सर्वे विनिर्जिताः ।

बलवान् स हि धर्मात्मा नैनं शक्ष्यामि शासितुम् ॥ १२ ॥

“ महाबाहो! तपस्या करते हुए वृत्रासुरने समस्त लोक जीत लिये । वह धर्मात्मा असुर बलवान् हो गया है; अतः अब उसपर मैं शासन नहीं कर सकता ॥ १२ ॥

यद्यसौ तप आतिष्ठेद् भूय एव सुरेश्वर ।

यावल्लोका धरिष्यन्ति तावदस्य वशानुगाः ॥ १३ ॥

“ सुरेश्वर! यदि वह फिर इसी प्रकार तपस्या करता रहा क्षणं हि न भवेद् वृत्रः क्रुद्धे त्वयि सुरेश्वर ॥ १४ ॥

" महाबली देवेश्वर! उस परम उदार असुरकी आप उपेक्षा कर रहे हैं ( इसीलिये वह शक्तिशाली होता जा रहा है ) । यदि आप कुपित हो जायें तो वह क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता ॥ १४ ॥

यदा हि प्रीतिसंयोगं त्वया विष्णो समागतः ।

तदाप्रभृति लोकानां नाथत्वमुपलब्धवान् ॥ १५ ॥

“ विष्णो! जबसे आपके साथ उसका प्रेम हो गया है, तभीसे उसने सम्पूर्ण लोकोंका आधिपत्य प्राप्त कर लिया है ।

स त्वं प्रसादं लोकानां कुरुष्व सुसमाहितः ।

त्वत्कृतेन हि सर्वे स्यात् प्रशान्तमरुजं जगत् ॥ १६ ॥

“ अतः आप अच्छी तरह ध्यान देकर सम्पूर्ण लोकोंपर कृपा कीजिये । आपके रक्षा करनेसे ही सारा जगत् शान्त एवं नीरोग हो सकता है ॥ १६ ॥

इमे हि सर्वे विष्णो त्वां निरीक्षन्ते दिवौकसः ।

वृत्रघातेन महता तेषां साह्यं कुरुष्व ह ॥ १७ ॥

" विष्णो! ये सब देवता आपकी ओर देख रहे हैं । वृत्रा-सुरका वध एक महान् कार्य है । उसे करके आप उन देवताओंका उपकार कीजिये ॥ १७ ॥

त्वया हि नित्यशः साह्यं कृतमेषां महात्मनाम् ।

असह्यमिदमन्येषामगतीनां गतिर्भवान् ॥ १८ ॥

जबतक ये तीनों लोक रहेंगे, तबतक हम सब देवताओंको " प्रभो! आपने सदा ही इन महात्मा देवताओंकी सहायता की तो है । यह असुर दूसरोंके लिये अजेय है; अतः आप हम उसके अधीन रहना पड़ेगा ॥ १३ ॥ निराश्रित देवताओं के आश्रयदाता हों " ॥ १८ ॥

तं चैनं परमोदारमुपेक्षसि महाबल । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुरशीतितमः सर्गः ॥ ८४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में चौरासी वाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८४ ॥

पञ्चाशीतितमः सर्गः विष्णु के तेजका इन्द्र और वज्र आदिमें प्रवेश, इन्द्र के वसे वृत्रासुर का वध भगवान् तथा ब्रह्महत्याग्रस्त इन्द्रका अन्धकारमय प्रदेशमें जाना

। सहस्राक्षवचः श्रुत्वा सर्वेषां च दिवौकसाम् ।

लक्ष्मणस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा शत्रुनिबर्हणः सर्वानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ३ ॥

वृत्रघातमशेषेण सुव्रत ॥ १ ॥ विष्णुर्देवानुवाचेदं ' इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवताओंकी

यह कथन सुनकर शत्रुओंका संहार करनेवाले ‘ “ प्रभो! सहस्रनेत्रधारी लक्ष्मणका पालन करनेवाले वह प्रार्थना सुनकर भगवान् विष्णुने इन्द्र आदि सब देवताओं-श्रीरामचन्द्रजीने कहा – ' उत्तम व्रतका ' || से इस प्रकार कहा- ॥ ३ ॥

सुमित्राकुमार! वृत्रासुर के वधकी पूरी कथा कह सुनाओ सुमित्रानन्दवर्धनः । पूर्व सौहृदबद्धोऽस्मि वृत्रस्येह महात्मनः । राघवेणैवमुक्तस्तु सुव्रतः ॥ २ ॥ तेन युष्मत्प्रियार्थं हि नाहं हन्मि महासुरम् ॥ ४ ॥

भूय एव कथां दिव्यां कथयामास उत्तम व्रतके “ देवताओ! तुम्हारी इस प्रार्थना के पहले से ही मैं महामना श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर वृत्रासुर के स्नेह बन्धन में बँधा हुआ हूँ । इसलिये तुम्हारा प्रिय पालक सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने पुनः उस दिव्य कथाको सुनाना मैं उस महान् असुरका वध नहीं करूँगा ॥ आरम्भ किया ॥ २ ॥ करनेके उद्देश्यसे

अर्थ तिलककारने मधुर नामक राजा किया है । रामायणशिरोमणिकारने मधुर वक्ताओंका ईश्वर किया है तथा रामायण-१. मधुरेश्वरका भूषणकारने ' मधुर - सौम्य स्वभावका राजा अथवा मधुरा नगरीका स्वामी किया है ।

पृष्ठ 864

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उत्तरकाण्डे पञ्चाशीतितमः सर्गः

अवश्यं करणीयं च भवतां सुखमुत्तमम् ।

तस्मादुपायमाख्यास्ये सहस्राक्षो वधिष्यति ॥ ५ ॥

परंतु तुम सबके उत्तम सुखकी व्यवस्था करना मेरा आवश्यक कर्तव्य है; इसलिये मैं ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे देवराज इन्द्र उसका वध कर सकेंगे ॥ ५ ॥

त्रेधाभूतं करिष्यामि आत्मानं सुरसत्तमाः ।

तेन वृत्रं सहस्राक्षो वधिष्यति न संशयः ॥ ६ ॥

" सुरश्रेष्ठगण! मैं अपने स्वरूपभूत तेजको तीन भागों में विभक्त करूँगा, जिससे इन्द्र निस्संदेह वृत्रासुरका वध कर डालेंगे ॥ ६ ॥

एकांशो वासवं यातु द्वितीयो वज्रमेव तु ।

तृतीयो भूतलं यातु तदा वृत्रं हनिष्यति ॥ ७ ॥

“ मेरे तेजका एक अंश इन्द्रमें प्रवेश करें दूसरा वज्रमें व्याप्त हो जाय और तीसरा भूतलको चला जाय, * तब इन्द्र वृत्रासुरका वध कर सकेंगे ' ॥ ७ ॥

तथा ब्रुवति देवेशे देवा वाक्यमथाब्रुवन् ।

एवमेतन्न संदेहो यथा वदसि दैत्यहन् ॥ ८ ॥

भद्रं तेऽस्तु गमिष्यामो वृत्रासुरवधैषिणः ।

भजस्व परमोदार वासवं स्वेन तेजसा ॥ ९ ॥

' देवेश्वर भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर देवता बोले— ‘ दैत्यविनाशन! आप जो कहते हैं, ठीक ऐसी ही बात है, इसमें संदेह नहीं । आपका कल्याण हो । हमलोग वृत्रासुरके वधकी इच्छा मनमें लिये यहाँसे लौट जायँगे । परम उदार प्रभो! आप अपने तेजके द्वारा देवराज इन्द्रको अनुगृहीत करें ॥

ततः सर्वे महात्मानः सहस्राक्षपुरोगमाः ।

तदरण्यमुपाक्रामन् यत्र वृत्रो महासुरः ॥ १० ॥

' तत्पश्चात् इन्द्र आदि सभी महामनस्वी देवता उस वनमें गये, जहाँ महान् असुर वृत्र तपस्या करता था ॥ १० ॥

तेऽपश्यंस्तेजसा भूतं तप्यन्तमसुरोत्तमम् ।

पिबन्तमिव लोकांस्त्रीन् निर्दहन्तमिवाम्बरम् ॥ ११ ॥

‘ उन्होंने देखा, असुरश्रेष्ठ वृत्रासुर अपने तेजसे सब ओर व्याप्त हो रहा है और ऐसी तपस्या कर रहा है, मानो उसके द्वारा तीनों लोकोंको पी जायगा और आकाशको भी दग्ध कर डालेगा ॥ ११ ॥

दृष्ट्वैव चासुरश्रेष्ठं देवास्त्रासमुपागमन् ।

कथमेनं वधिष्यामः कथं न स्यात् पराजयः ॥ १२ ॥

' उस असुरश्रेष्ठ वृत्रको देखते ही देवतालोग घबरा गये और सोचने लगे- ' हम कैसे इसका वध करेंगे? और किस उपाय से हमारी पराजय नहीं होने पायेगी? ' ॥ १२ ॥

* वृत्र - वधके पश्चात् इन्द्रको लगी हुई ब्रह्महत्याकी निवृत्तिके समय तक इस भूतलकी रक्षा करनेके लिये तथा वृत्रके धराशायी होनेपर उसके भारी शरीरको धारण करनेकी शक्ति देनेके लिये भगवान् के तेजके तीसरे अंशका भूतलपर आना आवश्यक था; इसलिये ऐसा हुआ । १६३ ९

तेषां चिन्तयतां तत्र सहस्राक्षः पुरंदरः ।

वज्रं प्रगृह्य पाणिभ्यां प्राहिणोद् वृत्रमूर्धनि ॥ १३ ॥

' वे लोग वहाँ इस प्रकार सोच ही रहे थे कि सहस्रनेत्र-धारी इन्द्रने दोनों हाथोंसे वज्र उठाकर उसे वृत्रासुर के मस्तकपर दे मारा ॥ १३ ॥

कालाग्निनेव घोरेण दीप्तेनेव महार्चिषा ।

पतता वृत्रशिरसा जगत् त्रासमुपागमत् ॥ १४ ॥

' इन्द्रका वह वज्र प्रलयकालकी अग्निके समान भयंकर और दीप्तिमान् था । उससे बड़ी भारी लपटें उठ रही थीं । उसकी चोट से कटकर जब वृत्रासुरका मस्तक गिरा, तब सारा संसार भयभीत हो उठा ॥ १४ ॥

असम्भाव्यं वधं तस्य वृत्रस्य विबुधाधिपः ।

चिन्तयानो जगामाशु लोकस्यान्तं महायशाः ॥ १५ ॥

' निरपराध वृत्रासुरका वध करना उचित नहीं था, अतः उसके कारण महायशस्वी देवराज इन्द्र बहुत चिन्तित हुए और तुरंत ही सब लोकोंके अन्तमें लोकालोक पर्वतसे परवर्ती अन्धकारमय प्रदेशमें चले गये ॥ १५ ॥

तमिन्द्रं ब्रह्महत्याऽऽशु गच्छन्तमनुगच्छति ।

अपतच्चास्य गात्रेषु तमिन्द्रं दुःखमाविशत् ॥ १६ ॥

" जाने के समय ब्रह्महत्या तत्काल उनके पीछे लग गयी । और उनके अङ्गपर टूट पड़ी । इससे इन्द्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ ॥ १६ ॥

हतारयः प्रणष्टेन्द्रा देवाः साग्निपुरोगमाः ।

विष्णुं त्रिभुवनेशानं मुहुर्मुहुरपूजयन् ॥ १७ ॥

' देवताओंका शत्रु मारा गया । इसलिये अग्नि आदि सब देवता त्रिभुवनके स्वामी भगवान् विष्णुकी बारंबार स्तुति-पूजा करने लगे । परंतु उनके इन्द्र अदृश्य हो गये थे ( इसके कारण उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था ) ॥ १७ ॥

त्वं गतिः परमेशान पूर्वजो जगतः पिता ।

रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् ॥ १८ ॥

' ( देवता बोले – ) ' परमेश्वर! आप ही जगत्के आश्रय और आदि पिता हैं । आपने सम्पूर्ण प्राणियोंकी रक्षाके लिये विष्णुरूप धारण किया है ॥ १८ ॥

हतश्चायं त्वया वृत्रो ब्रह्महत्या च वासवम् ।

बाधते सुरशार्दूल मोक्षं तस्य विनिर्दिश ॥ १ ९ ॥

" आपने ही इस वृत्रासुरका वध किया है । परंतु ब्रह्म-हत्या इन्द्रको कष्ट दे रही है; अतः सुरश्रेष्ठ! आप उनके उद्धारका कोई उपाय बताइये ' ॥ १ ९ ॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां विष्णुरब्रवीत् ।

मामेव यजतां शक्रः पावयिष्यामि वज्रिणम् ॥ २० ॥

' देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु बोले-" इन्द्र मेरा ही यजन करें । मैं उन वज्रधारी देवराज इन्द्रको पवित्र कर दूँगा ॥ २० ॥

पृष्ठ 865

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श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे १६४० एवं संदिश्य तां वाणीं देवानां चामृतोपमाम् । पुण्येन हयमेधेन मामिष्ट्रा पाकशासनः । विष्णुर्देवेशः स्तूयमानस्त्रिविष्टपम् ॥ २२ ॥

पुनरेष्य देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयः ॥ २१ ॥ जगाम समक्ष अमृतमयी वाणीद्वारा उक्त संदेश

“ पवित्र अश्वमेध यज्ञके द्वारा मुझ यज्ञ - पुरुषकी आराधना ' देवताओंके अपनी स्तुति सुनते हुए परम इन्द्र पुनः देवेन्द्र पदको प्राप्त कर लेंगे और देकर देवेश्वर भगवान् विष्णु करके पाकशासन भय नहीं रहेगा ' ॥ २१ ॥ धामको चले गये ॥ २२ ॥

फिर उन्हें किसीसे उत्तरकाण्डे पञ्चाशीतितमः सर्गः ॥ ८५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्ड में पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके षडशीतितमः सर्गः तथा अश्वमेधके अनुष्ठानसे इन्द्रका ब्रह्महत्या से मुक्त होना इन्द्र के बिना जगत् में अशान्ति ब्रह्महत्यया । तदा वृत्रवधं सर्वमखिलेन स लक्ष्मणः । ते तु दृष्ट्वा सहस्राक्षमावृतं प्रचक्रिरे ॥ ८ ॥

कथयित्वा नरश्रेष्ठः कथाशेषं प्रचक्रमे ॥ १ ॥

उस समय वृत्रासुरके वधकी पूरी कथा सुनाकर नरश्रेष्ठ लक्ष्मणने शेष कथाको इस प्रकार कहना आरम्भ किया - ॥१ ॥

ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभयंकरे ।

शक्रः संज्ञां लेभे न वृत्रहा ॥ २ ॥

ब्रह्महत्यावृतः " देवताओंको भय देनेवाले महापराक्रमी वृत्रासुरके मारे जानेपर ब्रह्महत्यासे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्रको बहुत देरतक होश नहीं हुआ ॥ २ ॥

सोऽन्तमाश्रित्य लोकानां नष्टसंज्ञो विचेतनः ।

तत्रावसत् कंचिद् वेष्टमान इवोरगः ॥ ३ ॥

कालं " लोकोंकी अन्तिम सीमाका आश्रय ले वे सर्पके समान लोटते हुए कुछ कालतक वहाँ अचेत और संज्ञाशून्य होकर पड़े रहे ॥ ३ ॥

अथ नष्टे सहस्राक्षे उद्विग्नमभवज्जगत् ।

ध्वस्तसंकाशा निःस्नेहा शुष्ककानना ॥ ४ ॥

भूमिश्च

निःस्रोतसस्ते सर्वे तु हृदाश्च सरितस्तथा ।

संक्षोभश्चैव सत्त्वानामनावृष्टिकृतोऽभवत् ॥ ५ ॥

“ इन्द्रके अदृश्य हो जानेसे सारा संसार व्याकुल हो उठा । धरती उजाड़ - सी हो गयी । इसकी आर्द्रता नष्ट हो गयी और वन सूख गये । समस्त सरों और सरिताओं में जल-स्रोतका अभाव हो गया और वर्षा न होने से सब जीवोंमें बड़ी घबराहट फैल गयी ॥ ४-५ ॥

क्षीयमाणे तु लोकेऽस्मिन् सम्भ्रान्तमनसः सुराः ।

यदुक्तं विष्णुना पूर्व तं यज्ञं समुपानयन् ॥ ६ ॥

तं पुरस्कृत्य देवेशमश्वमेधं ' वे इन्द्रको ब्रह्महत्या से आवेष्टित देख उन्हीं देवेश्वरको आगे करके अश्वमेघ यज्ञ करने लगे ॥ ८ ॥

ततोऽश्वमेधः सुमहान् महेन्द्रस्य महात्मनः ।

ब्रह्महत्यायाः पावनार्थं नरेश्वर ॥ ९ ॥

ववृते' नरेश्वर! फिर तो महामनस्वी महेन्द्रका वह मद्दान् अश्व-मेघ यज्ञ आरम्भ हो गया । उसका उद्देश्य था ब्रह्महत्या की निवृत्ति करके इन्द्रको पवित्र बनाना ॥ ९ ॥

ततो यज्ञे समाप्ते तु ब्रह्महत्या महात्मनः ।

अभिगम्याब्रवीद् वाक्यं क्व मे स्थानं विधास्यथ ॥ १० ॥

' तत्पश्चात् जब वह यज्ञ समाप्त हुआ, तब ब्रह्महत्याने देवताओंके निकट आकर पूछा – “ मेरे लिये कहाँ महामनस्वी स्थान बनाओगे ' ॥ १० ॥

ते तामूचुस्ततो देवास्तुष्टाः प्रीतिसमन्विताः ।

दुरासदे ॥ ११ ॥

चतुर्धा विभजात्मानमात्मनैव " यह सुनकर संतुष्ट एवं प्रसन्न हुए देवताओंने उससे कहा- - ' दुर्जय शक्तिवाली ब्रह्महत्ये! तू अपने आपको स्वयं ही चार भागों में विभक्त कर दे ' ॥ ११ ॥

देवानां भाषितं श्रुत्वा ब्रह्महत्या महात्मनाम् ।

स्थानमन्यत्र वरयामास दुर्वसा ॥ १२ ॥

संदधौ ' महामनस्वी देवताओंका यह कथन सुनकर महेन्द्र के शरीर में दुःखपूर्वक निवास करनेवाली ब्रह्महत्याने अपना चार भाग कर दिया और इन्द्रके शरीर से अन्यत्र रहनेके लिये स्थान माँगा ॥ १२ ॥।

वत्स्यामि पूर्णोदासु नदीषु वै । ‘ समस्त लोक क्षीण होने लगे । इससे देवताओंके हृदयमें एकेनांशेन मासान् दर्पघ्नी कामचारिणी ॥१३ ॥

व्याकुलता छा गयी और उन्होंने उसी यज्ञका स्मरण किया, चतुरो “ ( वार्षिकान् वह बोली – ) मैं अपने एक अंशसे वर्षाके चार जिसे पहले भगवान् विष्णुने बताया था ॥ ६ ॥ महीनोंतक जलसे भरी हुई नदियोंमें निवास करुँगी । उस

ततः सर्वे सुरगणाः सोपाध्यायाः सहर्षिभिः । समय मैं इच्छानुसार विचरनेवाली और दूसरोंके दर्पका दलन तं देशं समुपाजग्मुर्यत्रेन्द्रो भयमोहितः ॥ ७ ॥ करनेवाली होऊँगी ॥ १३ ॥

' तदनन्तर बृहस्पतिजीको साथ ले ऋषियोंसहित सब सर्वकालमेकेनांशेन सर्वदा । देवता उस स्थानपर गये, जहाँ इन्द्र भयसे मोहित होकर छिपे भूम्यामहं न संदेहः सत्येनैतद् ब्रवीमि वः ॥ १४ ॥

वसिष्यामि हुए थे ॥ ७ ॥

पृष्ठ 866

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उत्तरकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः “ दूसरे भागसे मैं सदा सब समय भूमिपर निवास करूँगी, इसमें संदेह नहीं है, यह मैं आपलोगोंसे सच्ची बात कहती हूँ ॥

योऽयमंशस्तृतीयो मे स्त्रीषु यौवनशालिषु ।

त्रिरात्रं दर्पपूर्णासु वसिष्ये दर्पघातिनी ॥ १५ ॥

“ और मेरा जो यह तीसरा अंश है, इसके साथ मैं युवा वस्थासे सुशोभित होनेवाली गवली स्त्रियोंमें प्रतिमास तीन राततक निवास करूँगी और उनके दर्पको नष्ट करती रहूँगी ॥

हतारो ब्राह्मणान् ये तु मृषापूर्वमदूषकान् ।

तांश्चतुर्थेन भागेन संश्रयिष्ये सुरर्षभाः ॥ १६ ॥

“ सुरश्रेष्ठगण! जो झूठ बोलकर किसीको कलंकित नहीं करते, ऐसे ब्राह्मणोंका जो लोग वध करते हैं, उनपर मैं अपने चौथे भागसे आक्रमण करूँगी ' ॥ १६ ॥

प्रत्यूचुस्तां ततो देवा यथा वदसि दुर्वसे ।

तथा भवतु तत् सर्व साधयस्व यदीप्सितम् ॥ १७ ॥

' तब देवताओंने उससे कहा - - ' " दुर्वसे! तू जैसा कहती है, वह सब वैसा ही हो । जाओ अपना अभीष्ट साधन करो ' ।

ततः प्रीत्यान्विता देवाः सहस्राक्षं ववन्दिरे ।

विज्वरः पूतपाप्मा च वासवः समपद्यत ॥ १८ ॥

' तब देवताओंने बड़ी प्रसन्नता के साथ सहस्रलोचन इन्द्र-इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके १६४१ की वन्दना की । इन्द्र निश्चिन्त, निष्पाप एवं विशुद्ध हो गये ।

प्रशान्तं च जगत् सर्व सहस्राक्षे प्रतिष्ठिते ।

यज्ञं चाद्भुतसंकाशं तदा शक्रोऽभ्यपूजयत् ॥ १ ९ ॥

' इन्द्रके अपने पदपर प्रतिष्ठित होते ही सम्पूर्ण जगत् में शान्ति छा गयी । उस समय इन्द्रने उस अद्भुत शक्तिशाली यज्ञकी भूरि - भूरि प्रशंसा की ॥ १ ९ ॥

ईदृशो ह्यश्वमेधस्य प्रभावो रघुनन्दन ।

यजस्व सुमहाभाग हयमेधेन पार्थिव ॥ २० ॥

" रघुनन्दन! अश्वमेध यज्ञका ऐसा ही प्रभाव है । अतः महाभाग! पृथ्वीनाथ! आप अश्वमेध यज्ञके द्वारा यजन कीजिये ' ॥ २० ॥

इति लक्ष्मणवाक्यमुत्तमं नृपतिरतीव मनोहरं महात्मा । परितोषमवाप हृष्टचेताः स निशम्येन्द्र समानविक्रमौजाः ॥ २१ ॥

लक्ष्मणके उस उत्तम और अत्यन्त मनोहर वचनको सुनकर महात्मा राजा श्रीरामचन्द्रजी, जो इन्द्रके समान पराक्रमी और बलशाली थे, मन - ही - मन बड़े प्रसन्न एवं संतुष्ट हुए ॥ २१ ॥

उत्तरकाण्डे षडशीतितमः सर्गः ॥ ८६ ॥

उत्तरकाण्डमें छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

सप्ताशीतितमः सर्गः श्रीरामका लक्ष्मणको राजा इलकी कथा सुनाना- इलको एक - एक मास-तक स्त्रीत्व और पुरुषत्वकी प्राप्ति

तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणेनोक्तं वाक्यं वाक्यविशारदः ।

प्रत्युवाच महातेजाः प्रहसन् राघवो वचः ॥ १ ॥

लक्ष्मणकी कही हुई यह बात सुनकर बातचीत की कलामें निपुण महातेजस्वी श्री रघुनाथजी हँसते हुए बोले- ॥ १ ॥

एवमेव नरश्रेष्ठ यथा वदसि लक्ष्मण ।

वृत्रघातमशेषेण वाजिमेधफलं च यत् ॥ २ ॥

' नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! वृत्रासुरका सारा प्रसंग और अश्वमेध यज्ञका जो फल तुमने जैसा बताया है, वह सब उसी रूपमें ठीक है ॥ २ ॥

श्रूयते हि पुरा सौम्य कर्दमस्य प्रजापतेः ।

पुत्रो बाह्लीश्वरः श्रीमानिलो नाम सुधार्मिकः ॥ ३ ॥

' सौम्य! सुना जाता है कि पूर्वकालमें प्रजापति कर्दमके पुत्र श्रीमान् इल बाह्लिक देश के राजा थे । वे बड़े धर्मात्मा नरेश थे ॥ ३ ॥

स राजा पृथिवीं सर्वा वशे कृत्वा महायशाः ।

राज्यं चैव नरव्याघ्र पुत्रवत् पर्यपालयत् ॥ ४ ॥

' पुरुषसिंह! वे महायशस्वी भूपाल सारी पृथ्वीको वशमें वा ० रा ० ५. १२.८-करके अपने राज्यकी प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते थे ।

सुरैश्च परमोदार दें तेयैश्च महाधनैः ।

नागराक्षसगन्धर्वैर्यक्षैश्च सुमहात्मभिः ॥ ५ ॥

पूज्यते नित्यशः सौम्य भयार्ते रघुनन्दन ।

अबिभ्यंश्च त्रयो लोकाः सरोषस्य महात्मनः ॥ ६ ॥

' सौम्य! रघुनन्दन! परम उदार देवता, महाधनी दैत्य तथा नाग, राक्षस, गन्धर्व और महामनस्वी यक्ष – ये सब भयभीत होकर सदा राजा इलकी स्तुति - पूजा करते थे तथा उन महामना नरेशके रुष्ट हो जानेपर तीनों लोकोंके प्राणी भय-से थर्रा उठते थे ॥। ५-६ ॥

स राजा तादृशोऽप्यासीद् धर्मे वीर्ये च निष्ठितः ।

बुद्ध्या च परमोदारो बाह्रीकेशो महायशाः ॥ ७ ॥

' ऐसे प्रभावशाली होनेपर भी बाह्रीक देशके स्वामी महा-यशस्वी परम उदार राजा इल धर्म और पराक्रममें दृढ़तापूर्वक स्थित रहते थे और उनकी बुद्धि भी स्थिर थी ॥ ७ ॥

स प्रचक्रे महाबाहुर्मृगयां रुचिरे वने ।

चैत्रे मनोरमे म सभृत्यबलवाहनः ॥ ८ ॥

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१६४२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' एक समयकी बात है सेवक, सेना और सवारियोंसहित उन महाबाहु नरेशने मनोरम चैत्रमासमें एक सुन्दर बनके भीतर शिकार खेलना आरम्भ किया ॥ ८ ॥

प्रजघ्ने स नृपोऽरण्ये मृगाञ्शतसहस्रशः ।

हत्वैव तृप्तिर्नाभूच्च राज्ञस्तस्य महात्मनः ॥ ९ ॥

' राजाने उस वन में सैकड़ों - हजारों हिंसक जन्तुओंका वध किया, किंतु इतने ही जन्तुओंका वध करके उन महामनस्वी नरेशको तृप्ति नहीं हुई ॥ ९ ॥

नानामृगाणामयुतं वध्यमानं महात्मना ।

यत्र जातो महासेनस्तं देशमुपचक्रमे ॥ १० ॥

" फिर उन महामना इलके हाथसे नाना प्रकार के दस हजार हिंसक पशु मारे गये । तत्पश्चात् वे उस प्रदेशमें गये, जहाँ महासेन ( स्वामी कार्तिकेय ) का जन्म हुआ था ॥ १० ॥

तस्मिन् प्रदेशे देवेशः शैलराजसुतां हरः ।

रमयामास दुर्धर्षः सर्वैरनुचरैः सह ॥ ११ ॥

" उस स्थान में देवताओंके स्वामी दुर्जय देवता भगवान् शिव अपने समस्त सेवकके साथ रहकर गिरिराजकुमारी उमा-का मनोरञ्जन करते थे ॥ ११ ॥

कृत्वा स्त्रीरूपमात्मानमुमेशो गोपतिध्वजः ।

देव्याः प्रियचिकीर्षुः संस्तस्मिन् पर्वतनिर्झरे ॥ १२ ॥

' जिनकी ध्वजापर वृषभका चिह्न सुशोभित होता है, वे भगवान् उमावल्लभ अपने - आपको भी स्त्रीरूपमें प्रकट करके देवी पार्वतीका प्रिय करने की इच्छासे वहाँके पर्वतीय झरने के पास उनके साथ विहार करते थे ॥ १२ ॥

यत्र यत्र वनोद्देशे सत्त्वाः पुरुषवादिनः ।

वृक्षाः पुरुषनामानस्ते सर्वे स्त्रीजना भवन् ॥ १३ ॥

' उस बनके विभिन्न भागों में जहाँ - जहाँ पुल्लिंग नामधारी जन्तु अथवा वृक्ष थे, वे सब के सब स्त्रीलिंगमें परिणत हो गये थे ॥ १३ ॥

यच्च किंचन तत् सर्वं नारीसंशं बभूव ह ।

एतस्मिन्नन्तरे राजा स इलः कर्दमात्मजः ॥ १४ ॥

निघ्नन् मृगसहस्राणि तं देशमुपचक्रमे । " वहाँ जो कुछ भी चराचर प्राणियोंका समूह था, वह सब स्त्रीनामधारी हो गया था । इसी समय कर्दमके पुत्र राजा इल सहस्रों हिंसक पशुओंका वध करते हुए उस देशमें आ गये ॥ १४३ ॥

स दृष्ट्ा स्त्रीकृतं सर्वे सव्यालमृगपक्षिणम् ॥ १५ ॥

आत्मानं स्त्रीकृतं चैव सानुगं रघुनन्दन । ‘ वहाँ आकर उन्होंने देखा, सर्प, पशु और पक्षियों सहित उस वनका सारा प्राणिसमुदाय स्त्रीरूप हो गया है । रघुनन्दन! सेवकसहित अपने आपको भी उन्होंने स्त्रीरूपमें परिणत हुआ देखा ॥ १५३ ॥

तस्य दुःखं महच्चासीद् दृष्ट्वाऽऽत्मानं तथागतम् ॥१६ ॥

उमापतेश्च तत् कर्म ज्ञात्वा श्रासमुपागमत् । ' अपनेको उस अवस्था में देखकर राजाको बड़ा दुःख हुआ । यह सारा कार्य उमावल्लभ महादेवजी की इच्छासे हुआ है, ऐसा जानकर वे भयभीत हो उठे ॥ १६३ ॥

ततो देवं महात्मानं शितिकण्ठं कपर्दिनम् ॥ १७ ॥

जगाम शरणं राजा सभृत्य बलवाहनः । ' तदनन्तर सेवक, सेना और सवारियोंसहित राजा इल जटाजूटधारी महात्मा भगवान् नीलकण्ठकी शरण में गये ॥ १७३ ॥

ततः प्रहस्य वरदः सह देव्या महेश्वरः ॥ १८ ॥

प्रजापतिसुतं वाक्यमुवाच वरदः स्वयम् । ' तब पार्वतीदेवी के साथ विराजमान वरदायक देवता महेश्वर हँसकर प्रजापतिपुत्र इलसे स्वयं बोले - ॥ १८३ ॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे कार्दमेय महाबल ॥ १ ९ ॥ पुरुषत्वमृते सौम्य वरं वरय सुव्रत । " कर्दमकुमार महाबली राजर्षे! उठो उठो । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सौम्य नरेश! पुरुषत्व छोड़कर जो चाहो, वह वर माँग लो ' ॥ ९९ ३ ॥ ततः स राजा शोकार्तः प्रत्याख्यातो महात्मना ॥ २० ॥

स्त्रीभूतोऽसौ न जग्राह वरमन्यं सुरोत्तमात् । ' महात्मा भगवान् शङ्करके इस प्रकार पुरुषत्व देने से इन्कार कर देने पर स्त्रीरूप हुए राजा इल शोकसे व्याकुल गये । उन्होंने उन सुरश्रेष्ठ महादेवजीसे दूसरा कोई वर नहीं ग्रहण किया ॥ २०३ ॥

ततः शोकेन महता शैलराजसुतां नृपः ॥ २१ ॥

प्रणिपत्य उमां देवीं सर्वेणैवान्तरात्मना ।

ईशे वराणां वरदे लोकानामसि भामिनी ॥ २२ ॥

अमोघदर्शने देवि भज सौम्येन चक्षुषा । ' तदनन्तर महान् शोकसे पीड़ित हो राजाने गिरिराजकुमारी - उमादेवीके चरणों में सम्पूर्ण हृदयसे प्रणाम करके यह प्रार्थना की— सम्पूर्ण वरोंकी अधीश्वरी देवि! आप मानिनी हैं । समस्त लोकों को वर देनेवाली हैं । देवि! आपका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता । अतः आप अपनी सौम्य दृष्टिसे मुझपर अनुग्रह कीजिये ॥ २१-२२३ ॥ हृद्गतं तस्य राजर्षेर्विज्ञाय हरसंनिधौ ॥ २३ ॥

प्रत्युवाच शुभं वाक्यं देवी रुद्रस्य सम्मता । ' राज इलके हार्दिक अभिप्रायको जानकर रुद्रप्रिया देवी पार्वतीने महादेवजी के समीप यह शुभ बात कही - ॥ २३३ ॥

अर्धस्य देवो वरदो वरार्धस्य तव ह्यहम् ॥ २४ ॥

तस्मादर्ध गृहाण त्वं स्त्रीपुंसोर्यावदिच्छसि । “ राजन्! तुम पुरुषत्व प्राप्तिरूप जो वर चाहते हो, उसके आधे भागके दाता तो महादेवजी हैं और आधा वर तुम्हें मैं दे सकती हूँ ( अर्थात् तुम्हें सम्पूर्ण जीवन के लिये जो स्त्रीत्व मिल गया है, उसे मैं आधे जीवनके लिये पुरुषत्वमें परिवर्तित

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उत्तरकाण्डे अष्टाशीतितमः सर्गः १६४३ कर सकती हूँ ) । इसलिये तुम मेरा दिया हुआ आधा वर स्वीकार करो । तुम जितने - जितने कालतक स्त्री और पुरुष रहना चाहो, उसे मेरे सामने कहो ' ॥ २४३ ॥

तदद्भुततरं श्रुत्वा देव्या वरमनुत्तमम् ॥ २५ ॥

सम्प्रहृष्टमना भूत्वा राजा वाक्यमथाब्रवीत् ।

यदि देवि प्रसन्ना मे रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ २६ ॥

मासं स्त्रीत्वमुपासित्वा मासं स्यां पुरुषः पुनः । ' देवी पार्वतीका वह परम उत्तम और अत्यन्त अद्भुत वर सुनकर राजाके मनमें बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले — ' देवि! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं एक मास-तक भूतलपर अनुपम रूपवती स्त्रीके रूपमें रहकर फिर एक मासतक पुरुष होकर रहूँ ' ॥ २५-२६३ ॥ ईप्सितं तस्य विज्ञाय देवी सुरुचिरानना ॥ २७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये

प्रत्युवाच शुभं वाक्यमेवमेव भविष्यति ।

राजन् पुरुषभूतस्त्वं स्त्रीभावं न स्मरिष्यसि ॥ २८ ॥

स्त्रीभूतश्च परं मासं न स्मरिष्यसि पौरुषम् । " राजा मनोभावको जानकर सुन्दर मुखवाली पार्वती-देवीने यह शुभ वचन कहा- ऐसा ही होगा । राजन्! जब तुम पुरुषरूपमें रहोगे, उस समय तुम्हें अपने स्त्रीजीवनकी याद नहीं रहेगी और जब तुम स्त्रीरूपमें रहोगे, उस समय तुम्हें एक मासतक अपने पुरुषभावका स्मरण नहीं होगा ' २७-२८३

एवं स राजा पुरुषो मासं भूत्वाथ कार्दमिः ।

त्रैलोक्यसुन्दरी नारी मासमेकमिलाभवत् ॥ २ ९ ॥

' इस प्रकार कर्दमकुमार राजा इल एक मासतक पुरुष रहकर फिर एक मास त्रिलोकसुन्दरी नारी इलाके रूपमें रहने लगे ' ॥ २ ९ ॥ उत्तरकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः ॥ ८७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सतासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८७ ॥

अष्टाशीतितमः सर्गः इला और बुधका एक दूसरेको देखना तथा बुधका उन सब स्त्रियोंको किंपुरुषी ो के मैं -व त नाम देकर पर्वतपर

तां कथामैलसम्बद्धां रामेण समुदीरिताम् ।

लक्ष्मणो भरतश्चैव श्रुत्वा परमविस्मितौ ॥ १ ॥

श्रीरामकी कही हुई इलके चरित्र से सम्बन्ध रखनेवाली उस कथाको सुनकर लक्ष्मण और भरत दोनों ही बड़े विस्मित हुए ॥ १ ॥

तौ रामं प्राञ्जली भूत्वा तस्य राज्ञो महात्मनः ।

विस्तरं तस्य भावस्य तदा पप्रच्छतुः पुनः ॥ २ ॥

उन दोनों भाइयोंने हाथ जोड़कर श्रीरामसे महामना राजा इलके स्त्री - पुरुषभाव के विस्तृत वृत्तान्तके विषय में पुनः पूछा- ॥ २ ॥

कथं स राजा स्त्रीभूतो वर्तयामास दुर्गतिः ।

पुरुषः स यदा भूतः कां वृत्तिं वर्तयत्यसौ ॥ ३ ॥

' प्रभो! राजा इल स्त्री होकर तो बड़ी दुर्गतिमें पड़ गये होंगे । उन्होंने वह समय कैसे बिताया? और जब वे पुरुषरूप-में रहते थे, तब किस वृत्तिका आश्रय लेते थे? ' ॥ ३ ॥

तयोस्तद् भाषितं श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम् ।

कथयामास काकुत्स्थस्तस्य राज्ञो यथागमम् ॥ ४ ॥

लक्ष्मण और भरतका वह कौतूहलपूर्ण वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने राजा इलके वृत्तान्तको, जैसा वह उपलब्ध था, उसी रूप में पुनः सुनाना आरम्भ किया -- ॥ ४ ॥

तमेव प्रथमं मासं स्त्री भूत्वा लोकसुन्दरी ।

ताभिः परिवृता स्त्रीभिर्येऽस्य पूर्व पदानुगाः ॥ ५ ॥

तत्काननं विगाह्याशु विजहे लोकसुन्दरी । रहने के लिये आदेश देना द्रुमगुल्मलताकीर्ण पद्भ्यां पद्मदलेक्षणा ॥ ६ ॥

' तदनन्तर उस प्रथम मासमें ही इला त्रिभुवनसुन्दरी नारी होकर वन में विचरने लगी । जो पहले उसके चरणसेवक थे, वे भी स्त्रीरूपमें परिणत हो गये थे; उन्हीं स्त्रियोंसे घिरी हुई लोकसुन्दरी कमललोचना इला वृक्षों, झाड़ियों और लताओंसे भरे हुए एक वनमें शीघ्र प्रवेश करके पैदल ही सब ओर घूमने लगी ॥ ५-६ ॥

वाहनानि च सर्वाणि संत्यक्त्वा वै समन्ततः ।

पर्वताभोगविवरे तस्मिन् रेमे इला तदा ॥ ७ ॥

' उस समय सारे वाहनों को सब ओर छोड़कर इला विस्तृत पर्वतमालाओं के मध्यभागमें भ्रमण करने लगी ॥ ७ ॥

अथ तस्मिन् वनोद्देशे पर्वतस्याविदूरतः ।

सरः सुरुचिरप्रख्यं नानापक्षिगणायुतम् ॥ ८ ॥

' उस वनप्रान्त में पर्वतके पास ही एक सुन्दर सरोवर था, जिसमें नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ८ ॥

ददर्श साइला तस्मिन् बुधं सोमसुतं तदा ।

ज्वलन्तं स्वेन वपुषा पूर्ण सोममिवोदितम् ॥ ९ ॥

' उस सरोवरमें सोमपुत्र बुध तपस्या करते थे, जो अपने तेजस्वी शरीरसे उदित हुए पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाशित हो रहे थे । इलाने उन्हें देखा ॥ ९ ॥

* यह सरोवर उस सीमासे बाहर था, जहाँतक के प्राणी भगवान् शित्रके आदेशसे स्त्रीरूप हो गये थे । इसीलिये बुधको स्त्रीत्वको प्राप्ति नहीं हुई थी ।

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IIIIII श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

तपन्तं च तपस्तीव्रमम्भोमध्ये दुरासदम् ।

यशस्करं कामकरं तारुण्ये पर्यवस्थितम् ॥ १० ॥

" वे जलके भीतर तीव्र तपस्या में संलग्न थे । उन्हें पराभूत करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था । वे यशस्वी, पूर्णकाम और तरुण अवस्था में स्थित थे ॥ १० ॥

सतं जलाशयं सर्व क्षोभयामास विस्मिता ।

सह तैः पूर्वपुरुषैः स्त्रीभूतै रघुनन्दन ॥ ११ ॥

‘ रघुनन्दन! उन्हें देखकर इला चकित हो उठी और जो पहले पुरुष थीं, उन स्त्रियोंके साथ जलमें उतरकर उसने सारे जलाशयको क्षुब्ध कर दिया ॥ ११ ॥

बुधस्तु तां समीक्ष्यैव कामवाणवशं गतः ।

नोपलेभे तदात्मानं स चचाल तदाम्भसि ॥ १२ ॥

' इलापर दृष्टि पड़ते ही बुध कामदेव के बाणोंका निशाना बन गये । उन्हें अपने तन - मनकी सुध न रही और वे उस समय जलमें विचलित हो उठे ॥ १२ ॥

इलां निरीक्षमाणस्तु त्रैलोक्यादधिकां शुभाम् ।

चित्तं समभ्यतिक्रामत् का न्वियं देवताधिका ॥ १३ ॥

' इला त्रिलोकीमें सबसे अधिक सुन्दरी थी । उसे देखते हुए बुधका मन उसीमें आसक्त हो गया और वे सोचने लगे, " यह कौन - सी स्त्री है, जो देवाङ्गनाओंसे भी बढ़कर रूपवती है ॥ १३ ॥

न देवीषु न नागीषु नासुरीष्वप्सरःसु च ।

दृष्टपूर्वा मया काचिद् रूपेणानेन शोभिता ॥ १४ ॥

" न देववनिताओंमें, न नागवधुओंमें, न असुरोंकी स्त्रियोंमें और न अप्सराओंमें ही मैंने पहले कभी कोई ऐसे मनोहर रूपसे सुशोभित होनेवाली स्त्री देखी है ॥ १४ ॥

सदृशीयं मम भवेद् यदि नान्यपरिग्रहः ।

इति बुद्धिं समास्थाय जलात् कूलमुपागमत् ॥ १५ ॥

“ यदि यह दूसरेको व्याही न गयी हो तो सर्वथा मेरी पत्नी बनने योग्य है । ' ऐसा विचार वे जलसे निकलकर किनारे आये ॥ १५ ॥

आश्रमं समुपागम्य ततस्ताः प्रमदोत्तमाः ।

शब्दापयत धर्मात्मा नाश्चैनं च ववन्दिरे ॥ १६ ॥

" फिर आश्रम में पहुँचकर उन धर्मात्माने पूर्वोक्त सभी सुन्दरियोंको आवाज देकर बुलाया और उन सबने आकर उन्हें प्रणाम किया ॥ १६ ॥

सताः पप्रच्छ धर्मात्मा कस्यैषा लोकसुन्दरी ।

किमर्थमागता चैव सर्वमाख्यात मा चिरम् ॥ १७ ॥

' तब धर्मात्मा बुधने उन सब स्त्रियोंसे पूछा- ' यह लोक-सुन्दरी नारी किसकी पत्नी है और किसलिये यहाँ आयी है? ये सब बातें तुम शीघ्र मुझे बताओ ' ॥ १७ ॥

शुभं तु तस्य तद् वाक्यं मधुरं मधुराक्षरम् ।

श्रुत्वा स्त्रियश्च ताः सर्वा ऊचुर्मधुरया गिरा ॥ १८ ॥

' बुधके मुख से निकला हुआ वह शुभ वचन मधुर पदावली-से युक्त तथा मीठा था । उसे सुनकर उन सब स्त्रियोंने मधुर वाणीमें कहा -- ॥ १८ ॥

अस्माकमेषा सुश्रोणी प्रभुत्वे वर्तते सदा ।

अपतिः काननान्तेषु सहास्माभिश्वरत्यसौ ॥ १ ९ ॥

“ ब्रहान्! यह सुन्दरी हमारी सदाकी स्वामिनी है । इसका कोई पति नहीं है । यह हम लोगोंके साथ अपनी इच्छा के अनुसार वनप्रान्तमें विचरती रहती है ' ॥ १ ९ ॥

तद् वाक्यमाव्यक्तपदं तासां स्त्रीणां निशम्य च ।

विद्यामावर्तनीं पुण्यामावर्तयत स द्विजः ॥ २० ॥

' उन स्त्रियोंका वचन सब प्रकारसे सुस्पष्ट था । उसे सुन-कर ब्राह्मण बुधने पुण्यमयी आवर्तनी विद्याका आवर्तन ( स्मरण ) किया ॥ २० ॥

सोऽर्थं विदित्वा सकलं तस्य राज्ञो यथा तथा ।

सर्वा एव स्त्रियस्ताश्च बभाषे मुनिपुङ्गवः ॥ २१ ॥

" उस राजा के विषय की सारी बातें यथार्थरूपसे जानकर मुनिवर बुधने उन सभी स्त्रियोंसे कहा -- ॥ २१ ॥

अत्र किंपुरुषीर्भूत्वा शैलरोधसि वत्स्यथ ।

आवासस्तु गिरावस्मिन्शीघ्रमेव विधीयताम् ॥ २२ ॥

" तुम सब लोग किंपुरुषी ( किन्नरी ) होकर पर्वतके किनारे रहोगी । इस पर्वतपर शीघ्र ही अपने लिये निवासस्थान बना लो ॥ २२ ॥

मूल पत्रफलैः सर्वा वर्तयिष्यथ नित्यदा ।

स्त्रियः किंपुरुषान्नाम भर्तृन् समुपलप्स्यथ ॥ २३ ॥

“ पत्र और फल - मूलसे ही तुम सबको सदा जीवन निर्वाह करना होगा । आगे चलकर तुम सभी स्त्रियाँ किंपुरुष नामक पतियों को प्राप्त कर लोगी ' ॥ २३ ॥

ताः श्रुत्वा सोमपुत्रस्य स्त्रियः किंपुरुषीकृताः ।

उपासांचक्रिरे शैलं वध्वस्ता बहुलास्तदा ॥ २४ ॥

' किंपुरुषी नामसे प्रसिद्ध हुई वे स्त्रियाँ सोमपुत्र बुधकी उपर्युक्त बात सुनकर उस पर्वतपर रहने लगीं । उन स्त्रियोंकी संख्या बहुत अधिक थी ' ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टाशीतितमः सर्गः ॥ ८८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८८ ॥

पृष्ठ 870

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