श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 851–860

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860

पृष्ठ 851

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१६२६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे तत्पश्चात् देवता बहुसंख्यक विमानोंपर आरूढ़ हो वहाँसे प्रस्थित हुए । फिर श्रीराम भी उन्हीं के साथ शीघ्रतापूर्वक कुम्भज ऋषिके तपोवनको चल दिये ॥ २० ॥

ष्ट्वा तु देवान् सम्प्राप्तानगस्त्यस्तपसां निधिः ।

अर्चयामास धर्मात्मा सर्वास्तानविशेषतः ॥ २१ ॥

देवताओंको आया देख तपस्याकी निधि धर्मात्मा अगस्त्यने उन सबकी समानरूपसे पूजा की ॥ २१ ॥

प्रतिगृह्य ततः पूजां सम्पूज्य च महामुनिम् ।

जग्मुस्ते त्रिदशा हृष्टा नाकपृष्टं सहानुगाः ॥ २२ ॥

उनकी पूजा ग्रहण करके उन महामुनिका अभिनन्दन कर वे सब देवता अनुचरोंसहित बड़े हर्ष के साथ स्वर्गको चले गये ॥ २२ ॥

गतेषु तेषु काकुत्स्थः पुष्पकादवरुह्य च ।

ततोऽभिवादयामास अगस्त्यमृषिसत्तमम् ॥ २३ ॥

उनके चले जानेपर श्रीरघुनाथ जीने पुष्पकविमानसे उतर-कर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको प्रणाम किया || २३ ||

सोऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा ।

आतिथ्यं परमं प्राप्य निषसाद नराधिपः ॥ २४ ॥

अपने तेजसे प्रज्वलित - से होनेवाले महात्मा अगस्त्य का अभिवादन करके उनसे उत्तम आतिथ्य पाकर नरेश्वर श्रीराम आसनपर बैठे ॥ २४ ॥

तमुवाच महातेजाः कुम्भयोनिर्महातपाः ।

स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ॥ २५ ॥

उस समय महातेजस्वी महातपस्वी कुम्भज मुनिने कहा--' नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आपका स्वागत है । आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्य की बात है ॥ २५ ॥

त्वं मे बहुमतो राम गुणैर्बहुभिरुत्तमैः ।

अतिथिः पूजनीयश्च मम राजन् हृदि स्थितः ॥ २६ ॥

' महाराज श्रीराम! बहुत से उत्तम गुणों के कारण आपके लिये मेरे हृदयमें बड़ा सम्मान है । आप मेरे आदरणीय अतिथि हैं और सदा मेरे मनमें बसे रहते हैं ॥ २६ ॥

सुरा हि कथयन्ति त्वामागतं शूद्रघातिनम् ।

ब्राह्मणस्य तु धर्मेण त्वया जीवापितः सुतः ॥ २७ ॥

' देवतालोग कहते थे कि ' आप अधर्मपरायण शूद्रका वध करके आ रहे हैं तथा धर्मके बलसे आपने ब्राह्मणके उस मरे हुए पुत्रको जीवित कर दिया है ' ॥ २७ ॥

उष्यतां चेह रजनीं सकाशे मम राघव ।

प्रभाते पुष्पकेण त्वं गन्तासि पुरमेव हि ॥ २८ ॥

त्वं हि नारायणः श्रीमांस्त्वयि सर्व प्रतिष्ठितम् ।

त्वं प्रभुः सर्वदेवानां पुरुषस्त्वं सनातनः ॥ २ ९ ॥

" रघुनन्दन! आज रातको आप मेरे ही पास इस आश्रम -में निवास कीजिये । कल सवेरे पुष्पकविमानद्वारा अपने नगर-को जाइयेगा । आप साक्षात् श्रीमान् नारायण हैं । सारा जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है और आप ही समस्त देवताओंके स्वामी तथा सनातन पुरुष हैं ॥ २८-२९ ॥

इदं चाभरणं सौम्य निर्मितं विश्वकर्मणा ।

दिव्यं दिव्येन वपुषा दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ ३० ॥

' सौम्य! यह विश्वकर्माका बनाया हुआ दिव्य आभूषण है, जो अपने दिव्य रूप और तेजसे प्रकाशित हो रहा है ।

प्रतिगृह्णीष्व काकुत्स्थ मत्प्रियं कुरु राघव ।

दत्तस्य हि पुनर्दाने सुमहत् फलमुच्यते ॥ ३१ ॥

' ककुत्स्थ कुलभूषण रघुनन्दन! आप इसे लीजिये और मेरा प्रिय कीजिये; क्योंकि किसीकी दी हुई वस्तुका पुनः दान कर देनेसे महान् फलकी प्राप्ति बतायी जाती है ॥ ३१ ॥

भरणे हि भवाञ्शक्तः फलानां महतामपि ।

त्वं हि शक्तस्तारयितुं सेन्द्रानपि दिवौकसः ॥ ३२ ॥

तस्मात् प्रदास्ये विधिवत् तत् प्रतीच्छ नराधिप । " इस आभूषणको धारण करनेमें केवल आप ही समर्थ हैं तथा बड़े - से - बड़े फलोंकी प्राप्ति करानेकी शक्ति भी आपमें ही | आप इन्द्र आदि देवताओंको भी तारनेमें समर्थ हैं, इसलिये नरेश्वर! यह भूषण भी मैं आपको ही दूँगा । आप इसे विधिपूर्वक ग्रहण करें ' ॥ ३२३ ॥

अथोवाच महात्मानमिक्ष्वाकूणां महारथः ॥ ३३ ॥

रामो मतिमतां श्रेष्ठः क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ।

प्रतिग्रहोऽयं भगवन् ब्राह्मणस्याविगर्हितः ॥ ३४ ॥

तब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ और इक्ष्वाकुकुलके महारथी वीर श्रीरामने क्षत्रियधर्मका विचार करते हुए वहाँ महात्मा अगस्त्यजी से कहा- ' भगवन्! दान लेनेका काम तो केवल ब्राह्मण के लिये ही निन्दित नहीं है ॥ ३३-३४ ॥

क्षत्रियेण कथं विप्र प्रतिग्राह्यं भवेत् ततः ।

प्रतिग्रहो हि विप्रेन्द्र क्षत्रियाणां सुगर्हितः ॥ ३५ ॥

ब्राह्मणेन विशेषेण दत्तं तद् वक्तुमर्हसि । ' विप्रवर! क्षत्रियोंके लिये तो प्रतिग्रह स्वीकार करना अत्यन्त निन्दित बताया गया है । फिर क्षत्रिय प्रतिग्रह - विशेषतः ब्राह्मणका दिया हुआ दान कैसे ले सकता है? यह बताने की कृपा करें ' ॥ ३५३ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण प्रत्युवाच महानृषिः ॥ ३६ ॥

आसन् कृतयुगे राम ब्रह्मभूते पुरायुगे ।

अपार्थिवाः प्रजाः सर्वाः सुराणां तु शतक्रतुः ॥ ३७ ॥

श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर महर्षि अगस्त्यने उत्तर दिया - " रघुनन्दन! पहले ब्रह्मस्वरूप सत्ययुग में सारी प्रजा बिना राजाके ही थी, आगे चलकर इन्द्र देवताओंके राजा बनाये गये ॥ ३६-३७ ॥

ताः प्रजा देवदेवेशं राजार्थे समुपाद्रवन् ।

सुराणां स्थापितो राजा त्वया देव शतक्रतुः ॥ ३८ ॥

प्रयच्छास्मासु लोकेश पार्थिवं नरपुङ्गवम् ।

पृष्ठ 852

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उत्तरकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः १६२७ यस्मै पूजां प्रयुञ्जना धूतपापाश्चरेमहि ॥ ३ ९ ॥ ' तब सारी प्रजाएँ देवदेवेश्वर ब्रह्माजीके पास राजा के लिये गयीं और बोलीं- ' देव! आपने इन्द्रको देवताओंके राजाके पदपर स्थापित किया है । इसी तरह हमारे लिये भी किसी श्रेष्ठ पुरुषको राजा बना दीजिये, जिसकी पूजा करके हम पापरहित दो इस भूतलपर विचरें ॥ ३८-३९ ॥

नवसामो विना राज्ञा एष नो निश्चयः परः ।

ततो ब्रह्मा सुरश्रेष्ठो लोकपालान् सवासवान् ॥ ४० ॥

समाहूयाब्रवीत् सर्वास्तेजोभागान् प्रयच्छत ।

ततो ददुर्लोकपालाः सर्वे भागान् स्वतेजसः ॥ ४१ ॥

“ द्दम बिना राजाके नहीं रहेंगी । यह हमारा उत्तम निश्चय है । ' तब सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने इन्द्रसहित समस्त लोकपालको बुला-कर कहा - ' तुम सब लोग अपने तेजका एक - एक भाग दो । " तब समस्त लोकपालोंने अपने - अपने तेजका भाग अर्पित किया ॥ ४०-४१ ॥

अक्षुपच्च ततो ब्रह्मा यतो जातः क्षुपो नृपः ।

तं ब्रह्मा लोकपालानां समांशैः समयोजयत् ॥ ४२ ॥

' उसी समय ब्रह्माजी को छींक आयी, जिससे क्षुप नामक राजा उत्पन्न हुआ | ब्रह्माजीने उस राजाको लोकपालों के दिये हुए तेजके उन सभी भागों से संयुक्त कर दिया ॥ ४२ ॥

ततो ददौ नृपं तासां प्रजानामीश्वरं क्षुपम् ।

तत्रैन्द्रेण च भागेन महीमाज्ञापयन्नृपः ॥ ४३ ॥

‘ तत्पश्चात् उन्होंने क्षुपको द्दी उन प्रजाजनोंके लिये उनके शासक नरेशके रूपमें समर्पित किया । क्षुपने वहाँ राजा होकर इन्द्रके दिये हुए तेजोभागसे पृथ्वीका शासन किया ॥ ४३ ॥

वारुणेन तु भागेन वपुः पुष्यति पार्थिवः ।

कौबेरेण तु भागेन वित्तपाभां ददौ तदा ॥ ४४ ॥

यस्तु याम्योऽभवद्भागस्तेन शास्तिस्म स प्रजाः । ‘ वरुणके तेजोभागसे वे भूपाल प्रजाके शरीरका पोषण इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये करने लगे । कुबेरके तेजोभागसे उन्होंने उन्हें धनपतिकी आभा प्रदान की तथा उनमें जो यमराजका तेजोभाग था, उससे वे प्रजाजनोंको अपराध करनेपर दण्ड देते थे ॥ ४४३ ॥

तत्रैन्द्रेण नरश्रेष्ठ भागेन रघुनन्दन ॥ ४५ ॥॥

प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते तारणार्थ मम प्रभो । ' नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आप भी राजा होनेके कारण सभी लोकपालोंके तेजसे सम्पन्न हैं । अतः प्रभो! इन्द्र - सम्बन्धी तेजोभागके द्वारा आप मेरे उद्धारके लिये यह आभूषण ग्रहण कीजिये । आपका भला हो ' । ४५३ ॥ तद् रामः प्रतिजग्राह मुनेस्तस्य महात्मनः ॥ ४६ ॥

दिव्यमाभरणं चित्रं प्रदीप्तमिव भास्करम् ।

प्रतिगृह्य ततो रामस्तदाभरणमुत्तमम् ॥ ४७ ॥

आगमं तस्य दीप्तस्य प्रष्टुमेवोपचक्रमे । तब भगवान् श्रीराम उन महात्मा मुनि के दिये हुए उस सूर्यके समान दीप्तिमान्, दिव्य, विचित्र एवं उत्तम आभूषणको ग्रहण करके उसकी उपलब्धिके विषयमें पूछने लगे - ४६-४७३ अत्यद्भुतमिदं दिव्यं वपुषा युक्तमद्भुतम् ॥ ४८ ॥

कथं वा भवता प्राप्तं कुतो वा केन वाऽऽहृतम् ।

कौतूहलतया ब्रह्मन् पृच्छामि त्वां महायशः ॥ ४ ९ ॥

आश्चर्याणां बहूनां हि निधिः परमको भवान् । ' महायशस्वी मुने! यह अत्यन्त अद्भुत तथा दिव्य आकारसे युक्त आभूषण आपको कैसे प्राप्त हुआ, अथवा इसे कौन कहाँसे ले आया? ब्रह्मन्! मैं कौतूहलवश ये बातें आपसे पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप बहुत - से आश्चर्योंकी उत्तम निधि हैं ' ॥ ४८-४९ ३ ॥ एवं ब्रुवति काकुत्स्थे मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ५० ॥

शृणु राम यथावृत्तं पुरा त्रेतायुगे युगे ॥ ५१ ॥

' ककुत्स्थ कुलभूषण श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर मुनिवर अगस्त्यने कहा— ‘ श्रीराम! पूर्व चतुर्युगीके त्रेतायुगमें जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसे बताता हूँ सुनिये ' ॥ ५०-५१ ॥ उत्तरकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः ॥ ७६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७६ ॥

सप्तसप्ततितमः सर्गः महर्षि अगस्त्यका एक स्वर्गीय पुरुषके शवभक्षणका प्रसंग सुनाना

पुरा त्रेतायुगे राम बभूव बहुविस्तरम् ।

समन्ताद् योजनशतं विमृगं पक्षिवर्जितम् ॥ १ ॥

अगस्त्यजी कहते हैं-- ) श्रीराम! प्राचीनकालके त्रेतायुगकी बात है, एक बहुत ही विस्तृत वन था, जो चारों ओर सौ योजनतक फैला हुआ था; परंतु उस वनमें न तो कोई पशु था और न पक्षी ही ॥ १ ॥

तस्मिन् निर्मानुषेऽरण्ये कुर्वाणस्तप उत्तमम् ।

अहमाक्रमितुं सौम्य तदरण्यमुपागमम् ॥ २ ॥

सौम्य! उस निर्जन वनमें उत्तम तपस्या करने के लिये घूम - घूमकर उपयुक्त स्थानका पता लगाने के निमित्त मैं वहाँ गया ॥ २ ॥

तस्य रूपमरण्यस्य निर्देष्टुं न शशाक ।

फलमूलैः सुखाखादैर्बहुरूपैश्च पादपैः ह ॥ ३ ॥

उस वनका स्वरूप कितना सुखदायी था, यह बताने में मैं असमर्थ हूँ । सुखद स्वादिष्ट फल - मूल तथा अनेक रूप - रंगके वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ३ ॥

पृष्ठ 853

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१६२८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

तस्यारण्यस्य मध्ये तु सरो योजनमायतम् ।

हंसकारण्डवाकीर्ण चक्रवाकोपशोभितम् ॥ ४ ॥

उस वनके मध्यभागमें एक सरोवर था, जिसकी लंबाई-चौड़ाई एक - एक योजनकी थी । उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी फैले हुए थे और चक्रवाकोंके जोड़े उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ४ ॥

पद्मोत्पलसमाकीर्ण समतिक्रान्तशैवलम् ।

तदाश्चर्यमिवात्यर्थ सुखास्वादमनुत्तमम् ॥ ५ ॥

उसमें कमल और उत्पल छा रहे थे । सेवारका कहीं नाम भी नहीं था । वह परम उत्तम सरोवर अत्यन्त आश्चर्य-मय - सा जान पड़ता था । उसका जल पीनेमें अत्यन्त सुखद एवं स्वादिष्ट था ॥ ५ ॥

अरजस्कं तदक्षोभ्यं श्रीमत्पक्षिगणायुतम् ।

तस्मिन् सरः समीपे तु महदद्भुतमाश्रमम् ॥ ६ ॥

पुराणं पुण्यमत्यर्थे तपस्विजन वर्जितम् । उसमें कीचड़ नहीं था, वह सर्वथा निर्मल था । उसे कोई पार नहीं कर सकता था । उसके भीतर सुन्दर पक्षी कलरव कर रहे थे । उस सरोवर के पास ही एक विशाल, अद्भुत एवं अत्यन्त पवित्र पुराना आश्रम था; जिसमें एक भी तपस्वी नहीं था ॥ ६३ ॥

तत्राहमवसं रात्रि नैदा पुरुषर्षभ ॥ ७ ॥

प्रभाते कल्यमुत्थाय सरस्तदुपचक्रमे । पुरुषप्रवर! जेठकी रातमें मैं उस आश्रमके भीतर एक रात रहा और प्रातः काल सबेरे उठकर स्नान आदि के लिये उस सरोवर के तटपर जाने लगा ॥ ७३ ॥

अथापश्यं शवं तत्र सुपुष्टपरजः क्वचित् ॥ ८ ॥

तिष्ठन्तं परया लक्ष्म्या तस्मिंस्तोयाशये नृप । उसी समय मुझे वहाँ एक शव दिखायी दिया जो हृष्ट-पुष्ट होने के साथ ही अत्यन्त निर्मल था । उसमें कहीं कोई मलिनता नहीं थी । नरेश्वर! वह शव उस जलाशय के तटपर बड़ी शोभासे सम्पन्न होकर पड़ा था ॥ ८३ ॥

तमर्थ चिन्तयानोऽहं मुहूर्ते तत्र राघव ॥ ९ ॥

विष्ठितोऽस्मि सरस्तीरे किं न्विदं स्यादिति प्रभो । प्रभो! रघुनन्दन! मैं उस शवके विषयमें यह सोचता हुआ कि ' यह क्या है? ' वहाँ दो घड़ी तक उस तालाबके किनारे बैठा रहा ॥ ९ ३ ॥ अथापश्यं मुहूर्तात् तु दिव्यमद्भुतदर्शनम् ॥ १० ॥

विमानं परमोदारं हंसयुक्तं मनोजवम् ।

अत्यर्थ स्वर्गिणं तत्र विमाने रघुनन्दन ॥ ११ ॥

उपास्तेऽप्सरसां वीर सहस्रं दिव्यभूषणम् । दो घड़ी बीतते ही मैंने वहाँ एक दिव्य, अद्भुत, अत्यन्त उत्तम, हंसयुक्त और मनके समान वेगशाली विमान उतरता देखा । रघुनन्दन! उस विमानपर एक स्वर्गवासी देवता बैठे थे, जो अत्यन्त रूपवान् थे । वीर! वहाँ उनकी सेवा में सहस्रों अप्सराएँ बैठी थीं, जो दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थीं ॥ गायन्ति काश्चिद् रम्याणि वादयन्ति तथापराः ॥ १२ ॥

मृदङ्गवीणापणवान् नृत्यन्ति च तथापराः ।

अपराञ्चन्द्ररश्म्याभैर्हेमदण्डैर्महाधनैः ॥ १३ ॥

दोधूयुर्वदनं तस्य पुण्डरीकनिभेक्षणाः । उनमें से कुछ मनोहर गीत गा रही थीं, दूसरी मृदङ्ग, वीणा और पणव आदि बाजे बजा रही थीं । अन्य बहुत - सी अप्सराएँ नृत्य करती थीं तथा प्रफुल्ल कमल जैसे नेत्रोंवाली अन्य कितनी ही अप्सराएँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एवं चन्द्रमाकी किरणों के समान स्वर्गवासी देवता के मुखपर ततः सिंहासनं हित्वा पश्यतो मे तदा राम तं शवं भक्षयामास रघुकुलनन्दन श्रीराम पर्वत के शिखर को छोड़कर उज्ज्वल बहुमूल्य चवर लेकर उन हवा कर रही थीं ॥ १२-१३३ ॥ मेरुकूटमिवांशुमान् ॥ १४ ॥

विमानादवरुह्य च ।

स स्वर्गी रघुनन्दन ॥ १५ ॥

! तदनन्तर जैसे अंशुमाली सूर्य मेरु-नीचे उतरते हैं, उसी प्रकार उन स्वर्गवासी पुरुषने विमानसे उतरकर मेरे देखते देखते उस

शवका भक्षण किया ॥। १४-१५ ॥

ततो भुक्त्वा यथाकामं मांसं बहु सुपीवरम् ।

अवतीर्य सरः स्वर्गी संस्प्रष्टुमुपचक्रमे ॥ १६ ॥

इच्छानुसार उस सुपुष्ट एवं प्रचुर मांसको खाकर वे स्वर्गीय देवता सरोवर में उतरे और हाथ - मुँह धोने लगे ॥१६ ॥

उपस्पृश्य यथान्यायं स खर्गी रघुनन्दन ।

आरोढुमुपचक्राम विमानवरमुत्तमम् ॥ १७ ॥

रघुनन्दन । यथोचित रीति से कुल्ला आचमन करके वे स्वर्गवासी पुरुष उस उत्तम एवं श्रेष्ठ विमानपर चढ़नेको उद्यत हुए || १७ ||

तमहं देवसंकाशमा रोहन्तमुदीक्ष्य वै ।

अथाहमब्रुवं वाक्यं तमेव पुरुषर्षभ ॥ १८ ॥

पुरुषोत्तम! उन देवतुल्य पुरुषको विमानपर चढ़ते देख मैंने उनसे यह बात पूछी - ॥ १८ ॥

को भवान् देवसंकाश आहारश्च विगर्हितः ।

त्वयेदं भुज्यते सौम्य किमर्थं वक्तुमर्हसि ॥ १ ९ ॥

' सौम्य! देवोपम पुरुष! आप कौन हैं और किसलिये ऐसा घृणित आहार ग्रहण करते हैं? यह बतानेका कष्ट करें ॥ कस्य स्यादीदृशो भाव आहारो देवसम्मतः ।

आश्चर्य वर्तते सौम्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।

नाहमौपयिकं मन्ये तव भक्ष्यमिमं शवम् ॥ २० ॥

' देवतुल्य तेजस्वी पुरुष! ऐसा दिव्य स्वरूप और ऐसा घृणित आहार किसका हो सकता है? सौम्य! आपमें ये दोनों

पृष्ठ 854

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उत्तरकाण्डे अष्टसप्ततितमः सर्गः १६२ ९ आश्चर्यजनक बातें हैं, अतः इसका यथार्थं रहस्य सुनना श्रुत्वा च वाक्यं मम सर्वमेतत् चाहता हूँ; क्योंकि मैं इस शवको आपके योग्य आहार नहीं सर्व तथा चाकथयन्ममेति ॥ २१ ॥

मानता हूँ ' ॥ २० ॥ नरेश्वर! जब कौतूहलवश मैंने मधुर वाणीमें उन स्वर्गीय

इत्येवमुक्तः स नरेन्द्र नाकी पुरुषसे इस प्रकार पूछा, तब मेरी बातें सुनकर उन्होंने यह

कौतूहलात् सूनृतया गिरा च । सब कुछ मेरे सामने बताया ॥ २१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः ॥ ७७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७७ ॥

अष्टसप्ततितमः सर्गः राजा श्वेतका अगस्त्यजीको अपने लिये घृणित आहारकी प्राप्तिका कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ताको उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषणका दान दे भूख - प्यासके कष्टसे मुक्त होना

श्रुत्वा तु भाषितं वाक्यं मम राम शुभाक्षरम् ।

प्राञ्जलिः प्रत्युवाचेदं स स्वर्गी रघुनन्दन ॥ १ ॥

( अगस्त्यजी कहते हैं - ) रघुकुलनन्दन राम! मेरी कही हुई शुभ अक्षरोंसे युक्त बात सुनकर उन स्वर्गीय पुरुषने हाथ जोड़कर इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १ ॥

शृणु ब्रह्मन् पुरावृत्तं ममैतत् सुखदुःखयोः ।

अनतिक्रमणीयं च यथा पृच्छसि मां द्विज ॥ २ ॥

' ब्रह्मन्! आप जो कुछ पूछ रहे हैं, वह मेरे सुख-दुःखका अलङ्घनीय कारण, जो पूर्वकालमें घटित हो चुका हैं, यहाँ बताया जाता है, सुनिये ॥ २ ॥

पुरा वैदर्भको राजा पिता मम महायशाः ।

सुदेव इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ॥ ३ ॥

" पूर्वकालमें मेरे महायशस्वी पिता विदर्भ देशके राजा थे । उनका नाम सुदेव था । वे तीनों लोकोंमें विख्यात पराक्रमी थे ॥ ३ ॥

तस्य पुत्रद्वयं ब्रह्मन् द्वाभ्यां स्त्रीभ्यामजायत ।

अहं श्वेत इति ख्यातो यवीयान् सुरथोऽभवत् ॥ ४ ॥

' ब्रह्मन्! उनके दो पत्नियाँ थीं, जिनके गर्भसे उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए । उनमें ज्येष्ठ मैं था । मेरी श्वेतके नामसे प्रसिद्धि हुई और मेरे छोटे भाई का नाम सुरथ था ॥ ४ ॥

ततः पितरि स्वर्याते पौरा मामभ्यषेचयन् ।

तत्राहं कृतवान् राज्यं धर्म्य च सुसमाहितः ॥ ५ ॥

‘ पिताके स्वर्गलोक में चले जानेपर पुरवासियोंने राजाके पदपर मेरा अभिषेक कर दिया । वहाँ परम सावधान रहकर मैंने धर्मके अनुकूल राज्यका पालन किया ॥ ५ ॥

एवं वर्षसहस्राणि समतीतानि सुव्रत ।

राज्यं कारयतो ब्रह्मन् प्रजा धर्मेण रक्षतः ॥ ६ ॥

' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षे! इस तरह धर्म-पूर्वक प्रजाकी रक्षा तथा राज्यका शासन करते हुए मेरे एक सहस्र वर्ष बीत गये ॥ ६ ॥

सोऽहं निमित्ते कस्मिंश्चिद् विज्ञातायुर्द्विजोत्तम ।

कालधर्मे हृदि न्यस्य ततो वनमुपागमम् ॥ ७ ॥

' द्विजश्रेष्ठ! एक समय मुझे किसी निमित्तसे अपनी आयु-का पता लग गया और मैंने मृत्यु - तिथिको हृदयमें रखकर वहाँसे वनको प्रस्थान किया ॥ ७ ॥

सोऽहं वनमिदं दुर्ग मृगपक्षिविवर्जितम् ।

तपश्चर्तु प्रविष्टोऽस्मि समीपे सरसः शुभे ॥ ८ ॥

' उस समय मैं इसी दुर्गम वनमें आया, जिसमें न पशु हैं न पक्षी । वनमें प्रवेश करके मैं इसी सरोवरके सुन्दर तटके निकट तपस्या करने के लिये बैठा ॥ ८ ॥

भ्रातरं सुरथं राज्ये अभिषिच्य महीपतिम् ।

इदं सरः समासाद्य तपस्तप्तं मया चिरम् ॥ ९ ॥

' राज्यपर अपने भाई राजा सुरथका अभिषेक करके इस सरोवरके समीप आकर मैंने दीर्घकालतक तपस्या की ॥ ९ ॥

सोऽहं वर्षसहस्राणि तपस्त्रीणि महावने ।

तप्त्वा सुदुष्करं प्राप्तो ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ॥ १० ॥

' इस विशाल वनमें तीन हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके मैं परम उत्तम ब्रह्मलोकको प्राप्त हुआ ॥ १० ॥

तस्येमे स्वर्गभूतस्य क्षुत्पिपासे द्विजोत्तम ।

बाधेते परमोदार ततोऽहं व्यथितेन्द्रियः ॥ ११ ॥

' द्विजश्रेष्ठ! परम उदार महर्षे! ब्रह्मलोकमें पहुँच जाने-पर भी मुझे भूख और प्यास बड़ा कष्ट देते हैं । उससे मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठती हैं ॥ ११ ॥

गत्वा त्रिभुवनश्रेष्ठं पितामहमुवाच ह ।

भगवन् ब्रह्मलोकोऽयं क्षुत्पिपासाविवर्जितः ॥ १२ ॥

कस्यायं कर्मणः पाकः क्षुत्पिपासानुगो ह्यहम् ।

आहारः कश्च मे देव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १३ ॥

' एक दिन मैंने त्रिलोकीके श्रेष्ठ देवता भगवान् ब्रह्माजी से कहा — ‘ भगवन्! यह ब्रह्मलोक तो भूख - प्यासके कष्टसे रहित है, किंतु यहाँ भी क्षुधा पिपासाका क्लेश मेरा पीछा नहीं

पृष्ठ 855

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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १६३० छोड़ता है । यह मेरे किस कर्मका परिणाम है? देव! पितामह! मेरा आहार क्या है? यह मुझे बताइये ' ॥ १२-१३ ॥

पितामहस्तु मामाह तवाहारः सुदेवज ।

स्वादूनि स्वानि मांसानि तानि भक्षय नित्यशः ॥ १४ ॥

" यह सुनकर ब्रह्माजी मुझसे बोले -- ' सुदेवनन्दन! तुम मर्त्यलोकमें स्थित अपने ही शरीरका सुस्वादु मांस प्रतिदिन खाया करो; यही तुम्हारा आहार है है । || १४ ||

स्वशरीरं त्वया पुष्टं कुर्वता तप उत्तमम् ।

अनुप्तं रोहते श्वेत न कदाचिन्महामते ॥ १५ ॥

“ श्वेत! तुमने उत्तम तप करते हुए केवल अपने शरीर-का ही पोषण किया है । महामते! दानरूपी बीज बोये बिना कहीं कुछ भी नहीं जमता – कोई भी भोज्य पदार्थ उपलब्ध नहीं होता है ॥ १५ ॥

दत्तं न तेऽस्ति सूक्ष्मोऽपि तप एव निषेवसे ।

तेन स्वर्गगतो वत्स बाध्यसे क्षुत्पिपासया ॥ १६ ॥

“ तुमने देवताओं, पितरों एवं अतिथियोंके लिये कभी कुछ थोड़ा - सा भी दान किया हो, ऐसा नहीं दिखायी देता । तुम केवल तपस्या करते थे । वत्स! इसीलिये ब्रह्मलोकमें आकर भी भूख - प्यास से पीड़ित हो रहे हो ॥ १६ ॥

सत्वं सुपुष्टमाहारैः स्वशरीरमनुत्तमम् ।

भक्षयित्वामृतरसं तेन वृत्तिर्भविष्यति ॥ १७ ॥

" नाना प्रकार के आदारोंसे भलीभाँति पोषित हुआ तुम्हारा परम उत्तम शरीर अमृतरससे युक्त होगा और उसीका भक्षण करनेसे तुम्हारी क्षुधा - पिपासाका निवारण हो जायगा ॥ १७ ॥

यदा तु तद्वनं श्वेत अगस्त्यः स महानृषिः ।

आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा कृच्छ्राद् विमोक्ष्यसे ॥ १८ ॥

“ श्वेत! जब उस वनमें दुर्धर्षं महर्षि अगस्त्य पधारेंगे, तब तुम इस कष्टसे छुटकारा पा जाओगे ॥ १८ ॥

स हि तारयितुं सौम्य शक्तः सुरगणानपि ।

किं पुनस्त्वां महाबाहो क्षुत्पिपासावशं गतम् ॥ १ ९ ॥

जानेपर भी यह शरीर नष्ट नहीं होता है और मुझे पूर्णतः तृप्ति प्राप्त होती है ॥ २१ ॥

तस्य मे कृच्छ्रभूतस्य कृच्छ्रादस्माद् विमोक्षय ।

अन्येषां न गतिर्ह्यत्र कुम्भयोनिमृते द्विजम् ॥ २२ ॥

' मुने! इस प्रकार मैं संकटमें पड़ा हूँ । आप मेरे दृष्टि-पथमें आ गये हैं, इसलिये इस कष्टसे मेरा उद्धार कीजिये । आप ब्रह्मर्षि कुम्भजके सिवा दूसरोंकी इस निर्जन वनमें पहुँच नहीं हो सकती ( इसलिये आप अवश्य कुम्भयोनि अगस्त्य ही हैं ) ॥ २२ ॥

इदमाभरणं सौम्य तारणार्थे द्विजोत्तम ।

प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २३ ॥

' सौम्य! विप्रवर! आपका कल्याण हो । आप मेरा उद्धार करने के लिये मेरे इस आभूषणका दान ग्रहण करें और आपका कृपाप्रसाद मुझे प्राप्त हो ॥ २३ ॥

इदं तावत् सुवर्ण च धनं वस्त्राणि च द्विज ।

भक्ष्यं भोज्यं च ब्रह्मर्षे ददात्याभरणानि च ॥ २४ ॥

' ब्रह्मन्! ब्रह्मर्षे! यह दिव्य आभूषण सुवर्ण, धन, वस्त्र, भक्ष्य, भोज्य तथा अन्य नाना प्रकारके आभरण भी देता है ॥ २४ ॥

सर्वान् कामान् प्रयच्छामि भोगांश्च मुनिपुङ्गव ।

तारणे भगवन् मह्यं प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २५ ॥

' मुनिश्रेष्ठ! इस आभूषण के द्वारा मैं समस्त कामनाओं

( मनोवाञ्छित पदार्थों ) और भोगोंको भी दे रहा हूँ ।

भगवन्! आप मेरे उद्धारके लिये मुझपर कृपा करें ' ॥ २५ ॥

तस्याहं स्वर्गिणो वाक्यं श्रुत्वा दुःखसमन्वितम् ।

तारणायोपजग्राह तदाभरणमुत्तमम् ॥ २६ ॥

स्वर्गीय राजा श्वेतकी यह दुःखभरी बात सुनकर मैंने उनका उद्धार करने के लिये वह उत्तम आभूषण ले लिया ॥

मया प्रतिगृहीते तु तस्मिन्नाभरणे शुभे ।

मानुषः पूर्वको देहो राजषैर्विननाश ह ॥ २७ ॥

ज्यों ही मैंने उस शुभ आभूषणका दान ग्रहण किया, “ सौम्य! महाबाहो! वे देवताओंका भी उद्धार करने में त्यों ही राजर्षि श्वेतका वह पूर्व - शरीर ( शव ) अदृश्य हो गया ॥ समर्थ हैं, फिर भूख - प्यासके वशमें पड़े हुए तुम जैसे पुरुषको प्रणष्टे तु शरीरेऽसौ राजर्षिः परया मुदा । संकटसे छुड़ाना उनके लिये कौन बड़ी बात है? ' ॥ १ ९ ॥ तृप्तः प्रमुदितो राजा जगाम त्रिदिवं सुखम् ॥ २८ ॥

सोऽहं भगवतः श्रुत्वा देवदेवस्य निश्चयम् । उस शरीर के अदृश्य हो जानेपर राजर्षि श्वेत परमानन्द से आहारं गर्हितं कुर्मि स्वशरीरं द्विजोत्तम ॥ २० ॥ तृप्त हो प्रसन्नतापूर्वक सुखमय ब्रह्मलोकको चले गये || २८ ॥

' द्विजश्रेष्ठ! देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माका यह निश्चय तेनेदं शक्रतुल्येन दिव्यमाभरणं मम । सुनकर मैं अपने शरीरका ही घृणित आहार ग्रहण करने लगा । तस्मिन्निमित्ते काकुत्स्थ दत्तमद्भुतदर्शनम् ॥ २ ९ ॥ बहून् वर्षगणान् ब्रह्मन् भुज्यमानमिदं मया । काकुत्स्थ! उन इन्द्रतुल्य तेजस्वी राजा श्वेतने उस भूख-क्षयं नाभ्येति ब्रह्मर्षे तृप्तिश्चापि ममोत्तमा ॥ २१ ॥ प्यासके निवारणरूप पूर्वोक्त निमित्तसे यह अद्भुत दिखायी

‘ ब्रह्मन्! ब्रह्मर्षे! बहुत वर्षोंसे मेरे द्वारा उपभोगमें लाये देनेवाला दिव्य आभूषण मुझे दिया था ॥ २ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टसप्ततितमः सर्गः ॥ ७८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७८ ॥

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उत्तरकाण्डे एकोनाशीतितमः सर्गः १६३१ एकोनाशीतितमः सर्गः = 46 = ॥ था ॥॥ == ॥ दसे ८ ॥ ९ ॥ भूख-वायी इक्ष्वाकुपुत्र राजा

तदद्भुततमं वाक्यं श्रुत्वागस्त्यस्य राघवः ।

गौरवाद विस्मयाच्चैव भूयः प्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ १ ॥

अगस्त्यजी का यह अत्यन्त अद्भुत वचन सुनकर श्री-रघुनाथजी के मनमें उनके प्रति विशेष गौरवका उदय हुआ और उन्होंने विस्मित होकर पुनः उनसे पूछना आरम्भ किया -- ॥ १ ॥

भगवंस्तद् वनं घोरं तपस्तप्यति यत्र सः ।

श्वेतो वैदर्भको राजा कथं तदमृगद्विजम् ॥ २ ॥

' भगवन् | वह भयंकर वन, जिसमें विदर्भदेशके राजा श्वेत घोर तपस्या करते थे, पशु - पक्षियों से रहित क्यों हो गया था १ ॥ २ ॥

तद्वनं स कथं राजा शून्यं मनुजवर्जितम् ।

तपश्च प्रविष्टः स श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥

' वे विदर्भराज उस सूने निर्जन वनमें तपस्या करने के लिये क्यों गये १ यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ' ॥ ३ ॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम् ।

वाक्यं परमतेजस्वी वक्तुमेवोपचक्रमे ॥ ४ ॥

श्रीरामका कौतूहलयुक्त वचन सुनकर वे परम तेजस्वी महर्षि पुनः इस प्रकार कहने लगे— ॥ ४ ॥

पुरा कृतयुगे राम मनुर्दण्डधरः प्रभुः ।

तस्य पुत्रो महानासीदिक्ष्वाकुः कुलनन्दनः ॥ ५ ॥

' श्रीराम! पूर्व कालके सत्ययुगकी बात है, दण्डधारी राजा मनु इस भूतलपर शासन करते थे । उनके एक श्रेष्ठ पुत्र हुआ, जिसका नाम इक्ष्वाकु था । राजकुमार इक्ष्वाकु अपने कुलको आनन्दित करनेवाले थे ॥ ५ ॥

तं पुत्रं पूर्वकं राज्ये निक्षिप्य भुवि दुर्जयम् ।

पृथिव्यां राजवंशानां भव कर्तेत्युवाच तम् ॥ ६ ॥

' अपने उन ज्येष्ठ एवं दुर्जय पुत्रको भूमण्डलके राज्य-पर स्थापित करके मनुने उनसे कहा- ' बेटा! तुम भूनलपर राजवंशोंकी सृष्टि करो ' ॥ ६ ॥

तथैव च प्रतिज्ञातं पितुः पुत्रेण राघव ।

ततः परमसंतुष्टो मनुः पुत्रमुवाच ह ॥ ७ ॥

रघुनन्दन! पुत्र इक्ष्वाकुने पिताके सामने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की । इससे मनु बहुत संतुष्ट हुए और अपने पुत्रसे बोले – ॥ ७ ॥

प्रीतोऽस्मि परमोदार कर्ता चासि न संशयः ।

दण्डेन च प्रजा रक्ष मा च दण्डमकारणे ॥ ८ ॥

" परम उदार पुत्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । तुम राजवंशकी सृष्टि करोगे, इसमें संशय नहीं है । तुम दण्डके द्वारा दुष्टों का दमन करते हुए प्रजाकी रक्षा करो, परंतु दण्डका राज्य बिना अपराध के ही किसीको दण्ड न देना ॥ ८ ॥

अपराधिषु यो दण्डः पात्यते मानवेषु वै ।

स दण्डो विधिवन्मुक्तः स्वर्गे नयति पार्थिवम् ॥ ९ ॥

" अपराधी मनुष्योंपर जो दण्डका प्रयोग किया जाता है, वह विधिपूर्वक दिया हुआ दण्ड राजाको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है ॥ ९ ॥

तस्माद् दण्डे महाबाहो यत्नवान् भव पुत्रक ।

धर्मो हि परमो लोके कुर्वतस्ते भविष्यति ॥ १० ॥

“ इसलिये महाबाहु पुत्र! तुम दण्डका समुचित प्रयोग करने के लिये प्रयत्नशील रहना । ऐसा करनेसे तुम्हें संसारमें परम धर्मकी प्राप्ति होगी ' ॥ १० ॥

इति तं बहु संदिश्य मनुः पुत्रं समाधिना ।

जगाम त्रिदिवं हृष्टो ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ ११ ॥

" इस प्रकार पुत्रको बहुत - सा संदेश दे मनु समाधि लगा-कर बड़े हर्ष के साथ स्वर्गको - सनातन ब्रह्मलोकको चले गये ।

प्रयाते त्रिदिवं तस्मिन्निक्ष्वाकुरमितप्रभः ।

जनयिष्ये कथं पुत्रानिति चिन्तापरोऽभवत् ॥ १२ ॥

' उनके ब्रह्मलोकवासी हो जानेपर अमित तेजस्वी राजा इक्ष्वाकु इस चिन्तामें पड़े कि मैं किस प्रकार पुत्रोंको उत्पन्न करूँ? ॥ १२ ॥

कर्मभिर्बहुरूपैश्च तैस्तैर्मनुसुतस्तदा ।

जनयामास धर्मात्मा शतं देवसुतोपमान् ॥ १३ ॥

' तब यज्ञ, दान और तपस्यारूप विविध कर्मोंद्वारा धर्मात्मा मनुपुत्रने सौ पुत्र उत्पन्न किये, जो देवकुमारोंके समान तेजस्वी थे ॥ १३ ॥

तेषामवरजस्तात सर्वेषां रघुनन्दन ।

मूढश्चाकृतविद्यश्च न शुश्रूषति पूर्वजान् ॥ १४ ॥

" तात रघुनन्दन! उनमें जो सबसे छोटा पुत्र था, वह मूढ़ और विद्याविहीन था, इसलिये अपने बड़े भाइयोंकी सेवा नहीं करता था ॥ १४ ॥

नाम तस्य च दण्डेति पिता चक्रेऽल्पमेधसः ।

अवश्यं दण्डपतनं शरीरेऽस्य भविष्यति ॥ १५ ॥

" इसके शरीर पर अवश्य दण्डपात होगा, ऐसा सोचकर पिताने उस मन्दबुद्धि पुत्रका नाम दण्ड रख दिया ॥ १५ ॥

अपश्यमानस्तं देशं घोरं पुत्रस्य राघव ।

विन्ध्यशैवलयोर्मध्ये राज्यं प्रादादरिंदम ॥ १६ ॥

' श्रीराम! शत्रुदमन नरेश! उस पुत्रके योग्य दूसरा कोई भयंकर देश न देखकर राजाने उसे विन्ध्य और शैवल पर्वत के बीचका राज्य दे दिया ॥ १६ ॥

स दण्डस्तत्र राजाभूद् रम्ये पर्वतरोधसि ।

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१६३२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पुरं चाप्रतिमं राम न्यवेशयदनुत्तमम् ॥ १७ ॥

' श्रीराम! पर्वतके उस रमणीय तटप्रान्तमें दण्ड राजा हुआ । उसने अपने रहने के लिये एक बहुत ही अनुपम और उत्तम नगर बसाया ॥ १७ ॥

पुरस्य चाकरोन्नाम मधुमन्तमिति प्रभो ।

पुरोहितं तूशनसं वरयामास सुव्रतम् ॥ १८ ॥

" प्रभो! उसने उस नगरका नाम रखा मधुमन्त और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बनाया ॥ १८ ॥

एवं स राजा तद् राज्यमकरोत् सपुरोहितः ।

प्रहृष्टमनुजाकीर्णे देवराजो यथा दिवि ॥ १ ९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये ' इस प्रकार स्वर्ग में देवराजकी भाँति भूतलपर राजा दण्डने पुरोहितके साथ रहकर हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस राज्यका पालन आरम्भ किया ॥ १ ९ ॥ ततः स राजा मनुजेन्द्र पुत्रः सार्धं च तेनोशनसा तदानीम् । चकार राज्यं सुमहान्महात्मा शक्रो दिवीवोशनसा समेतः ॥ २० ॥

' उस समय वह महामनस्वी महाराजकुमार तथा महान् राजा दण्ड शुक्राचार्य के साथ रहकर अपने राज्यका उसी तरह पालन करने लगा जैसे स्वर्ग में देवराज इन्द्र देवगुरु बृहस्पति के साथ रहकर अपने राज्यका पालन करते हैं ' ॥ २० ॥

उत्तरकाण्डे एकोनाशीतितमः सर्गः ॥ ७ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ९ ॥ अशीतितमः सर्गः राजा दण्डका भार्गव कन्या के साथ बलात्कार

एतदाख्याय रामाय महर्षिः कुम्भसम्भवः ।

अस्यामेवापरं वाक्यं कथायामुपचक्रमे ॥ १ ॥

महर्षि कुम्भज श्रीरामसे इतनी कथा कहकर फिर इसीका अवशिष्ट अंश इस तरह कहने लगे - ॥ १ ॥

ततः स दण्डः काकुत्स्थ बहुवर्षगणायुतम् ।

अकरोत् तत्र दान्तात्मा राज्यं निहतकण्टकम् ॥ २ ॥

‘ काकुत्स्थ! तदनन्तर राजा दण्डने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर बहुत वर्षोंतक वहाँ अकण्टक राज्य किया ॥ २ ॥

अथ काले तु कस्मिंश्चिद् राजा भार्गवमाश्रमम् ।

रमणीयमुपाक्रामच्चैत्रे मासि मनोरमे ॥ ३ ॥

' तत्पश्चात् किसी समय राजा मनोरम चैत्रमासमें शुक्रा-चार्यके रमणीय आश्रमपर आया ॥ ३ ॥

तत्र भार्गवकन्यां स रूपेणाप्रतिमां भुवि ।

विचरन्तीं वनोद्देशे दण्डोऽपश्यदनुत्तमाम् ॥ ४ ॥

' वहाँ शुक्राचार्यकी सर्वोत्तम सुन्दरी कन्या, जिसके रूपकी

इस भूतलपर कहीं तुलना नहीं थी, वनप्रान्तमें विचर रही थी ।

दण्डने उसे देखा ॥ ४ ॥

स दृष्ट्वा तां सुदुर्मेधा अनङ्गशरपीडितः ।

अभिगम्य सुसंविग्नां कन्यां वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥

' उसे देखते ही वह अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला राजा काम-देवके बाणोंसे पीड़ित हो पास जाकर उस डरी हुई कन्यासे बोला ॥ ५ ॥

कुतस्त्वमसि सुश्रोणि कस्य वासि सुता शुभे ।

पीडितोऽहमनङ्गेन पृच्छामि त्वां शुभानने ॥ ६ ॥

“ सुश्रोणि! तुम कहाँसे आयी हो अथवा शुभे! तुम किसकी पुत्री हो? शुभानने! मैं कामदेवसे पीड़ित हूँ; इसलिये तुम्हारा परिचय पूछता हूँ ' ॥ ६ ॥

तस्य त्वेवं ब्रुवाणस्य मोहोन्मत्तस्य कामिनः ।

भार्गवी प्रत्युवाचेदं वचः सानुनयं त्विदम् ॥ ७ ॥

' मोहसे उन्मत्त होकर वह कामी राजा जब इस प्रकार पूछने लगा, तब भृगुकन्याने विनयपूर्वक उसे इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ७ ॥

भार्गवस्य सुतां विद्धि देवस्याक्लिष्टकर्मणः ।

अरजां नाम राजेन्द्र ज्येष्ठामाश्रमवासिनीम् ॥ ८ ॥

" राजेन्द्र! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं पुण्यकर्मा शुक्रदेवताकी ज्येष्ठ पुत्री हूँ । मेरा नाम अरजा है । मैं इसी आश्रम में निवास करती हूँ ॥ ८ ॥

मा मां स्पृश बलाद् राजन् कन्या पितृवशा ह्यहम् ।

गुरुः पिता मे राजेन्द्र त्वं च शिष्यो महात्मनः ॥ ९ ॥

“ राजन्! बलपूर्वक मेरा स्पर्श न करो । मैं पिताके अधीन रहनेवाली कुमारी कन्या हूँ । राजेन्द्र! मेरे पिता तुम्हारे गुरु हैं और तुम उन महात्माके शिष्य हो ॥ ९ ॥

व्यसनं सुमहत् क्रुद्धः स ते दद्यान्महातपाः ।

यदि वान्यन्मया कार्य धर्मदृष्टेन सत्पथा ॥ १० ॥

वरयस्व नरश्रेष्ठ पितरं मे महाद्युतिम् ।

अन्यथा तु फलं तुभ्यं भवेद् घोराभिसंहितम् ॥ ११ ॥

" नरश्रेष्ठ! वे महातपस्वी हैं । यदि कुपित हो जायँ तो तुम्हें बड़ी भारी विपत्तिमें डाल सकते हैं । यदि मुझसे तुम्हें दूसरा ही काम लेना हो ( अर्थात् यदि तुम मुझे अपनी भार्या बनाना चाहते हो ) तो धर्मशास्त्रोक्त सन्मार्गसे चलकर मेरे महातेजस्वी पितासे मुझको माँग लो । अन्यथा तुम्हें अपने स्वेच्छाचारका बड़ा भयानक फल भोगना पड़ेगा ॥ १०-११ ॥

क्रोधेन हि पिता मेऽसौ त्रैलोक्यमपि निर्दहेत् ।

दास्यते चानवद्याङ्ग तव मा याचितः पिता ॥ १२ ॥

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उत्तरकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः १६३३ " मेरे पिता अपनी क्रोधाग्निसे सारी त्रिलोकीको भी दग्ध कर सकते हैं; अतः सुन्दर अङ्गवाले नरेश! तुम बलात्कार न करो । तुम्हारे याचना करनेपर पिताजी मुझे अवश्य तुम्हारे हाथमें सौंप देंगे ' ॥ १२ ॥

एवं ब्रुवाणामरजां दण्डः कामवशं गतः ।

प्रत्युवाच मदोन्मत्तः शिरस्याधाय चाञ्जलिम् ॥ १३ ॥

' जब अरजा ऐसी बातें कह रही थी, उस समय कामके अधीन हुए दण्डने मदोन्मत्त होकर दोनों हाथ सिरपर जोड़ लिये और इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १३ ॥

प्रसादं कुरु सुश्रोणि न कालं क्षेप्तुमर्हसि ।

त्वत्कृते हि मम प्राणा विदीर्यन्ते वरानने ॥ १४ ॥

“ सुन्दरी! कृपा करो । समय न बिताओ । वरानने! तुम्हारे लिये मेरे प्राण निकले जा रहे हैं ॥ १४ ॥

त्वां प्राप्य तु वधो वापि पापं वापि सुदारुणम् ।

भक्तं भजस्व मां भीरु भजमानं सुविह्वलम् ॥ १५ ॥

" तुम्हें प्राप्त कर लेने पर मेरा वध हो जाय अथवा मुझे अत्यन्त दारुण दुःख प्राप्त हो तो भी कोई चिन्ता नहीं है । भीरु! मैं तुम्हारा भक्त हूँ । अत्यन्त व्याकुल हुए मुझ अपने सेवकको स्वीकार करो ' ॥ १५ ॥

एवमुक्त्वा तु तां कन्यां दोर्भ्यां प्राप्य बलाद् बली ।

विस्फुरन्तीं यथाकामं मैथुनायोपचक्रमे ॥ १६ ॥

' ऐसा कहकर उस बलवान् नरेशने उस भार्गव - कन्याको बलपूर्वक दोनों भुजाओं में भर लिया । वह उसकी पकड़ से छूटने के लिये छटपटाने लगी तो भी उसने अपनी इच्छा के अनुसार उसके साथ समागम किया ॥ १६ ॥

तमनर्थ महाघोरं दण्डः कृत्वा सुदारुणम् ।

नगरं प्रययावाशु मधुमन्तमनुत्तमम् ॥ १७ ॥

" वह अत्यन्त दारुण एवं महाभयंकर अनर्थ करके दण्ड तुरंत ही अपने उत्तम नगर मधुमन्तको चला गया ॥ १७ ॥

अरजापि रुदन्ती सा आश्रमस्याविदूरतः ।

प्रतीक्षते सुसंत्रस्ता पितरं देवसंनिभम् ॥ १८ ॥

" अरजा भी भयभीत हो रोती हुई आश्रमके पास ही अपने देवतुल्य पिताके आनेकी राह देखने लगी ॥ १८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽशीतितमः सर्गः ॥ ८० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८० ॥

एकाशीतितमः सर्गः ने II शुक्रके शापसे सपरिवार राजा

स मुहूर्तादुपश्रुत्य देवर्षिरमितप्रभः ।

स्वमाश्रमं शिष्यवृतः क्षुधार्तः संन्यवर्तत ॥ १ ॥

दो घड़ी बाद किसी शिष्य के मुँहसे अरजाके ऊपर किये गये बलात्कारकी बात सुनकर अमित तेजखी देवर्षि शुक्र भूख-से पीड़ित हो शिष्योंसे घिरे हुए अपने आश्रमको लौट आये ॥

सोऽपश्यदरजां दीनां रजसा समभिप्लुताम् ।

ज्योत्स्नामिव ग्रहग्रस्तां प्रत्यूषे न विराजतीम् ॥ २ ॥

उन्होंने देखा, अरजा दुखी होकर रो रही है । उसके शरीरमें धूल लिपटी हुई है तथा वह प्रातःकाल राहुग्रस्त चन्द्रमा की शोभाहीन चाँदनी के समान सुशोभित नहीं हो रही है ।

तस्य रोषः समभवत् क्षुधार्तस्य विशेषतः ।

निर्दहन्निव लोकांस्त्रीशिष्यांश्चैतदुवाच ह ॥ ३ ॥

यह देख विशेषतः भूख से पीड़ित होने के कारण देवर्षि शुक्रका रोष बढ़ गया और वे तीनों लोकोंको दग्ध - से करते हुए अपने शिष्यों से इस प्रकार बोले— ॥ ३ ॥

पश्यध्वं विपरीतस्य दण्डस्याविदितात्मनः ।

विपत्ति घोरसंकाशां क्रुद्धादग्निशिखामिव ॥ ४ ॥

' देखो, शास्त्रविपरीत आचरण करनेवाले अज्ञानी राजा दण्डको कुपित हुए मेरी ओर से अग्नि - शिखाके समान कैसी घोर विपत्ति प्राप्त होती है ॥ ४ ॥

वा ० रा ० ५. १२.७-दण्ड और उनके राज्यका नाश

क्षयोऽस्य दुर्मतेः प्राप्तः सानुगस्य दुरात्मनः ।

यः प्रदीप्तां हुताशस्य शिखां वै स्प्रष्टुमर्हति ॥ ५ ॥

" सेवकों सहित इस दुर्बुद्धि एवं दुरात्मा राजाके विनाशका समय आ गया है, जो प्रज्वलित आगकी दहकती हुई ज्वाला-को गले लगाना चाहता है ॥ ५ ॥

यस्मात् स कृतवान् पापमीदृशं घोरसंहितम् ।

तस्मात् प्राप्स्यति दुर्मेधाः फलं पापस्य कर्मणः ॥ ६ ॥

' उस दुर्बुद्धिने जब ऐसा घोर पाप किया है, तब इसे उस पापकर्मका फल अवश्य प्राप्त होगा ॥ ६ ॥

सप्तरात्रेण राजासौ सपुत्र बलवाहनः ।

पापकर्मसमाचारो वधं प्राप्स्यति दुर्मतिः ॥ ७ ॥

' पापकर्मका आचरण करनेवाला वह दुर्बुद्धि नरेश सात रातके भीतर ही पुत्र, जायगा ॥ ७ ॥

समन्ताद् योजनशतं धक्ष्यते पांसुवर्षेण ' खोटे विचारवाले सौ योजन लंबा - चौड़ा है करके नष्ट कर देंगे ॥ ८ सेना और सवारियोंसहित नष्ट हो

विषयं चास्य दुर्मतेः ।

महता पाकशासनः ॥ ८ ॥

इस राजाके राज्यको जो सब ओरसे , देवराज इन्द्र भारी धूलकी वर्षा ॥

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१६३४ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे

सर्वसत्वानि यानीह स्थावराणि चराणि च ।

महता पांसुवर्षेण विलयं सर्वतोऽगमन् ॥ ९ ॥

' यहाँ जो सब प्रकार के स्थावर जङ्गम जीव निवास करते हैं, इस धूलकी भारी वर्षासे सब ओर विलीन हो जायँगे ॥ ९ ॥

दण्डस्य विषयो यावत् तावत् सर्व समुच्छ्रयम् ।

पांसुवर्षमिवशलक्ष्यं सप्तरात्रं भविष्यति ॥ १० ॥

' जहाँतक दण्डका राज्य है, वहाँतक के समस्त चराचर प्राणी सात तक केवल धूलिकी वर्षा पाकर अदृश्य हो जायँगे ' ॥ १० ॥

इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षस्तमाश्रमनिवासिनम् ।

जनं जनपदान्तेषु स्थीयतामिति चाब्रवीत् ॥ ११ ॥

ऐसा कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये शुकने उस आश्रम-में निवास करनेवाले लोगों से कहा - ' दण्डके राज्यकी सीमाके अन्तमें जो देश हैं, उनमें जाकर निवास करो ' ॥ ११ ॥

श्रुत्वा तूशन सो वाक्यं सोऽऽश्रमावसथो जनः । निष्क्रान्तो विषयात् तस्मात् स्थानं चक्रेऽथ बाह्यतः । १२ । शुक्राचार्यकी यह बात सुनकर आश्रमवासी मनुष्य उस राज्यसे निकल गये और सीमासे बाहर जाकर निवास करने लगे ॥ १२ ॥

स तथोक्त्वा मुनिजनमरजामिदमब्रवीत् ।

इहैव वस दुर्मेधे आश्रमे सुसमाहिता ॥ १३ ॥

आश्रमवासी मुनियोंसे ऐसी बात कहकर शुक्रने अरजासे कहा — ‘ खोटी बुद्धिवाली लड़की! तू यहीं इस आश्रम में मन-को परमात्मा के ध्यानमें एकाग्र करके रह ॥ १३ ॥

इदं योजनपर्यन्तं सरः सुरुचिरप्रभम् ।

अरजे विज्वरा भुङ्क्ष्व कालश्चात्र प्रतीक्ष्यताम् ॥ १४ ॥

' अरजे! यह जो एक योजन फैला हुआ सुन्दर तालाब है, इसका तू निश्चिन्त होकर उपभोग कर और अपने अपराध-की निवृत्ति के लिये यहाँ समयकी प्रतीक्षा करती रह ॥ १४ ॥

त्वत्समीपे च ये सत्वा वासमेष्यन्ति तां निशाम् ।

अवध्याः पांसुवर्षेण ते भविष्यन्ति नित्यदा ॥ १५ ॥

' जो जीव उन रात्रियों में तुम्हारे समीप रहेंगे, वे कभी भी धूलकी वर्षासे मारे नहीं जायँगे - सदा बने रहेंगे ' ॥ १५ ॥

श्रुत्वा नियोगं ब्रह्मर्षेः सारजा भार्गवी तदा ।

तथेति पितरं प्राह भार्गवं भृशदुःखिता ॥ १६ ॥

ब्रह्मर्षिका यह आदेश सुनकर वह भृगुकन्या अरजा अत्यन्त दुःखित होनेपर भी अपने पिता भार्गवसे बोली-' बहुत अच्छा ' ॥ १६ ॥

इत्युक्त्वा भार्गवो वासमन्यत्र समकारयत् ।

तच्च राज्यं नरेन्द्रस्य सभृत्यबलवाहनम् ॥ १७ ॥

सप्ताहाद् भस्मसाद् भूतं यथोक्तं ब्रह्मवादिना । ऐसा कहकर शुक्रने दूसरे राज्य में जाकर निवास किया तथा उन ब्रह्मवादीके कथनानुसार राजा दण्डका वह राज्य सेवक, सेना और सवारियों सहित सात दिनमें भस्म हो गया ॥ १७३ ॥

तस्यासौ दण्डविषयो विन्ध्यशैवलयोर्नृप ॥ १८ ॥

शप्तो ब्रह्मर्षिणा तेन वैधम्यै सहिते कृते ।

ततः प्रभृति काकुत्स्थ दण्डकारण्यमुच्यते ॥ १ ९ ॥

नरेश्वर! विन्ध्य और शैवलगिरिके मध्यभागमें दण्डका राज्य था । काकुत्स्थ! धर्मयुग कृतयुगमें धर्मविरुद्ध आचरण

करनेपर उन ब्रह्मर्षिने राजा और उनके देशको शाप दे दिया ।

तभी से वह भूभाग दण्डकारण्य कहलाता है ॥ १८-१९ ॥

तपस्विनः स्थिता ह्यत्र जनस्थानमतोऽभवत् ।

एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि राघव ॥ २० ॥

इस स्थान पर तपस्वी लोग आकर बस गये; इसलिये इसका नाम जनस्थान हो गया । रघुनन्दन! आपने जिसके विषय में मुझसे पूछा था, यह सब मैंने कह सुनाया ॥ २० ॥

संध्यामुपासितुं वीर समयो ह्यतिवर्तते ।

एते महर्षयः सर्वे पूर्णकुम्भाः समन्ततः ॥ २१ ॥

कृतोदका नरव्याघ्र आदित्यं पर्युपासते । वीर! अब संध्योपासनाका समय बीता जा रहा है । पुरुषसिंह! सब ओर ये सब महर्षि स्नान कर चुकने के बाद भरे हुए घड़े लेकर सूर्यदेवकी उपासना कर रहे हैं । २१३ ॥

स तैर्ब्राह्मणमभ्यस्तं सहितैर्ब्रह्मवित्तमैः ।

रविरस्तंगतो राम गच्छोदकमुपस्पृश ॥ २२ ॥

श्रीराम! वे सूर्यं वहाँ एकत्र हुए उन उत्तम ब्रह्मवेत्ताओं-द्वारा पढ़े गये ब्राह्मणमन्त्रोंको सुनकर और उसी रूपमें पूजा पाकर अस्ताचलको चले गये । अब आप भी जायँ और आचमन एवं स्नान आदि करें ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः ॥ ८१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८१ ॥

द्वयशीतितमः सर्गः श्रीरामका अगस्त्य आश्रम से अयोध्यापुरीको लौटना रामः संध्यामुपासितुम् । करने के लिये अप्सराओंसे सेवित उस पवित्र सरोवर के तट-ऋषेर्वचनमाज्ञाय अपाक्रामत् सरः पुण्यमप्सरोगणसेवितम् ॥ १ ॥ पर गये ॥ १ ॥

ऋषिका यह आदेश पाकर श्रीरामचन्द्रजी संध्योपासना तत्रोदकमुपस्पृश्य संध्यामन्वास्य पश्चिमाम् ।

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उत्तरकाण्डे द्वयशीतितमः सर्गः १६३५ T र आश्रमं प्राविशद् रामः कुम्भयोनेर्महात्मनः ॥ २ ॥

वहाँ आचमन और सायंकालकी संध्योपासना करके श्रीरामने पुनः महात्मा कुम्भजके आश्रम में प्रवेश किया ॥

तत्यागस्त्यो बहुगुणं कन्दमूलं तथैौषधम् ।

शाल्यादीनि पवित्राणि भोजनार्थमकल्पयत् ॥ ३ ॥

अगस्त्यजी ने उनके भोजन के लिये अनेक गुणोंसे युक्त कन्द, मूल, जरावस्थाको निवारण करनेवाली दिव्य ओषधि, पवित्र भात आदि वस्तुएँ अर्पित कीं ॥ ३ ॥

स भुक्तवान् नरश्रेष्ठस्तदन्नममृतोपमम् ।

प्रीतश्च परितुष्टश्च तां रात्रिं समुपाविशत् ॥ ४ ॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम वह अमृततुल्य स्वादिष्ट भोजन करके पर तृप्त और प्रसन्न हुए और वह रात्रि उन्होंने बड़े संतोषसे बितायी ॥ ४ ॥

प्रभाते काल्यमुत्थाय कृत्वाऽऽह्निकमरिंदमः ।

ऋषिं समुपचक्राम गमनाय रघूत्तमः ॥ ५ ॥

सबेरे उठकर शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलभूषण श्रीराम नित्यकर्म करके वहाँसे जाने की इच्छासे महर्षिके पास गये ॥ ५ ॥

अभिवाद्याब्रवीद् रामो महर्षि कुम्भसम्भवम् ।

आपृच्छे स्वां पुरीं गन्तुं मामनुज्ञातुमर्हसि ॥ ६ ॥

वहाँ महर्षि कुम्भजको प्रणाम करके श्रीरामने कहा— ' महर्षे! अब मैं अपनी पुरीको जानेके लिये आपकी आज्ञा चाहता हूँ । कृपया मुझे आशा प्रदान करें ॥ ६ ॥

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि दर्शनेन महात्मनः ।

द्रष्टुं चैवागमिष्यामि पावनार्थमिहात्मनः ॥ ७ ॥

' आप महात्मा के दर्शनसे मैं धन्य और अनुग्रहीत हुआ । अब अपने आपको पवित्र करनेके लिये फिर कभी आपके दर्शनकी इच्छासे यहाँ आऊँगा ' ॥ ७ ॥

तथा वदति काकुत्स्थे वाक्यमद्भुतदर्शनम् ।

उवाच परमप्रीतो धर्मनेत्रस्तपोधनः ॥ ८ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार अद्भुत वचन कहने पर धर्मचक्षु तपोधन अगस्त्यजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे बोले ।

अत्यद्भुतमिदं वाक्यं तव राम शुभाक्षरम् ।

पावनः सर्वभूतानां त्वमेव रघुनन्दन ॥ ९ ॥

' श्रीराम! आपके ये सुन्दर वचन बड़े अद्भुत हैं । रघुनन्दन! समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाले तो आप ही हैं ॥ ९ ॥

मुहूर्तमपि राम त्वां येऽनुपश्यन्ति केचन ।

पाविताः स्वर्गभूताश्च पूज्यास्ते त्रिदिवेश्वरैः ॥ १० ॥

' श्रीराम! जो कोई एक मुहूर्त के लिये भी आपका दर्शन पा जाते हैं, वे पवित्र, स्वर्गके अधिकारी तथा देवताओंके लिये भी पूजनीय हो जाते हैं ॥ १० ॥

ये च त्वां घोरचक्षुर्भिः पश्यन्ति प्राणिनो भुवि ।

हतास्ते यमदण्डेन सद्यो निरयगामिनः ॥ ११ ॥

' इस भूतलपर जो प्राणी आपको क्रूर दृष्टिसे देखते हैं, वे यमराजके दण्डसे पीटे जाकर तत्काल नरकंमें गिरते हैं ।

ईदृशस्त्वं रघुश्रेष्ठ पावनः सर्वदेहिनाम् ।

भुवि त्वां कथयन्तो हि सिद्धिमेष्यन्ति राघव ॥ १२ ॥

' रघुश्रेष्ठ! ऐसे माहात्म्यशाली आप समस्त देहधारियोंको पवित्र करनेवाले हैं । रघुनन्दन! पृथ्वीपर जो लोग आपकी कथाएँ कहते हैं, वे सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं ॥ १२ ॥

त्वं गच्छारिष्टमव्यग्रः पन्थानमकुतोभयम् ।

प्रशाधि राज्यं धर्मेण गतिर्हि जगतो भवान् ॥ १३ ॥

' आप निश्चिन्त होकर कुशलपूर्वक पधारिये । आपके मार्गमें कहीं से कोई भय न रहे । आप धर्मपूर्वक राज्यका शासन करें; क्योंकि आप ही संसारके परम आश्रय हैं ' ॥

एवमुक्तस्तु मुनिना प्राञ्जलिः प्रग्रहो नृपः ।

अभ्यवादयत प्राज्ञस्तमृर्षि सत्यशीलिनम् ॥ १४ ॥

मुनिके ऐसा कहने पर बुद्धिमान् राजा श्रीरामने भुजाएँ ऊपर उठा हाथ जोड़कर उन सत्यशील महर्षिको प्रणाम किया ॥

अभिवाद्य ऋषिश्रेष्ठं तांश्च सर्वास्तपोधनान् ।

अध्यारोहत् तदव्यग्रः पुष्पकं हेमभूषितम् ॥ १५ ॥

इस प्रकार मुनिवर अगस्त्य तथा अन्य सब तपोधन ऋषियोंका भी यथोचित अभिवादन कर वे बिना किसी व्यग्रता के उस सुवर्णभूषित पुष्पक विमानपर चढ़ गये ॥ १५ ॥

तं प्रयान्तं मुनिगणा आशीर्वादैः समन्ततः ।

अपूजयन् महेन्द्राभं सहस्राक्षमिवामराः ॥ १६ ॥

जैसे देवता सहस्रनेत्रधारी इन्द्रवी पूजा करते हैं, उसी प्रकार जाते समय उन महेन्द्रतुल्य तेजस्वी श्रीरामको ऋषि-समूहोंने सब ओरसे आशीर्वाद दिया ॥ १६ ॥

खस्थः स ददृशे रामः पुष्पके हेमभूषिते ।

शशी मेघसमीपस्थो यथा जलधरागमे ॥ १७ ॥

उस सुवर्णभूषित पुष्पक विमानपर आकाश में स्थित हुए श्रीराम वर्षाकाल में मेत्रोंके समीपवर्ती चन्द्रमाके समान दिखायी देते थे ॥ १७ ॥

ततोऽर्धदिवसे प्राप्ते पूज्यमानस्ततस्ततः ।

अयोध्यां प्राप्य काकुत्स्थो मध्यकक्षामवातरत् ॥ १८ ॥

तदनन्तर जगह - जगह सम्मान पाते हुए वे श्रीरघुनाथजी मध्याह्न के समय अयोध्या में पहुँचकर मध्यम कक्षा ( बीचकी ड्योढ़ी ) में उतरे ॥ १८ ॥

ततो विसृज्य रुचिरं पुष्पकं कामगामिनम् ।

विसर्जयित्वा गच्छेति स्वस्ति तेऽस्त्विति च प्रभुः ॥ १ ९ ॥

तत्पश्चात् इच्छानुसार चलनेवाले उस सुन्दर पुष्पक-विमानको वहीं छोड़कर भगवान ने उससे कहा - ' अब तुम जाओ । तुम्हारा कल्याण हो ' ॥ १ ९ ॥ कक्षान्तरस्थितं क्षिप्रं द्वाःस्थं रामोऽब्रवीद् वचः ।