Ramayana 2 — पृष्ठ 881–890

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890

पृष्ठ 881

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१६५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे है । इसमें आपके जीवनतककी सारी बातें आ गयी हैं ॥ २८ ॥

यदि बुद्धिः कृता राजञ्छ्रवणाय महारथ ।

कर्मान्तरे क्षणीभूतस्तच्छृणुष्व सहानुजः ॥ २ ९ ॥

' महारथी नरेश! यदि आपने इसे सुननेका विचार किया हो तो यज्ञ - कर्मसे अवकाश मिलने पर इसके लिये निश्चित समय निकालिये और अपने भाइयोंके साथ बैठकर इसे नियमित रूपसे सुनिये ॥ २ ९ ॥

वाढमित्यत्रवीद् रामस्तौ चानुज्ञाप्य राघवम् ।

प्रहृष्टौ जग्मतुः स्थानं यत्रास्ते मुनिपुङ्गवः ॥ ३० ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने कहा- ' बहुत अच्छा । हम इस काव्यको सुनेंगे । ' तत्पश्चात् श्रीरघुनाथजी की आज्ञा ले दोनों भाई कुश और लव प्रसन्नतापूर्वक उस स्थानपर गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकिजी ठहरे हुए थे ॥ ३० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये

रामोऽपि मुनिभिः सार्धं पार्थिवैश्च महात्मभिः ।

श्रुत्वा तद् गीतिमाधुर्य कर्मशालामुपागमत् ॥ ३१ ॥

श्रीरामचन्द्र जी भी महात्मा मुनियों और राजाओंके साथ उस मधुर संगीतको सुनकर कर्मशाला ( यज्ञमण्डप ) में चले गये ॥ ३१ ॥

शुश्राव तत्ताललयोपपन्नं सर्गान्वितं सुखरशब्दयुक्तम् । तन्त्रीलयव्यञ्जनयोगयुक्तं कुशीलवाभ्यां परिगीयमानम् ॥ ३२ ॥

इस प्रकार प्रथम दिन कतिपय सर्गोंसे युक्त सुन्दर स्वर एवं मधुर शब्दों से पूर्ण, ताल और लय से सम्पन्न तथा वीणा-के लयकी व्यञ्जना से युक्त वह काव्यगान, जिसे कुश और लवने गाया था, श्रीरामने सुना ॥ ३२ ॥

उत्तरकाण्डे चतुर्नवतितमः सर्गः ॥ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ४ ॥ पञ्चनवतितमः सर्गः श्रीरामका सीतासे उनकी शुद्धता प्रमाणित करने के लिये शपथ करानेका विचार

रामो बहून्यान्येव तद् गीतं परमं शुभम् ।

शुश्राव मुनिभिः सार्धं पार्थिवैः सह वानरैः ॥ १ ॥

इस प्रकार श्रीरघुनाथजी ऋषियों, राजाओं और वानरोंके साथ कई दिनों तक वह उत्तम रामायण - गान सुनते रहे ॥ १ ॥

तस्मिन् गीते तु विज्ञाय सीतापुत्रौ कुशीलवौ ।

तस्याः परिषदो मध्ये रामो वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥

दूताञ्शुद्धसमाचारानाहूयात्ममनीषया मद् वचो ब्रूत गच्छध्वमितो भगवतोऽन्तिके ॥ ३ ॥

उस कथा से ही उन्हें यह मालूम हुआ कि ' कुश और लब दोनों कुमार सीता के ही सुपुत्र हैं । यह जानकर सभा के बीचमें बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीने शुद्ध आचार - विचारवाले दूतोंको बुलाया और अपनी बुद्धिसे विचारकर कहा – “ तुम-लोग यहाँसे भगवान् वाल्मीकि मुनिके पास जाओ और उनसे मेरा यह संदेश कहो ॥ २-३ ॥

यदि शुद्धसमाचारा यदि वा वीतकल्मषा ।

करोत्विहात्मनः शुद्धिमनुमान्य महामुनिम् ॥ ४ ॥

' यदि सीताका चरित्र शुद्ध है और यदि उनमें किसी तरहका पाप नहीं है तो वे आप महामुनिकी अनुमति ले यहाँ आकर जनसमुदायमें अपनी शुद्धता प्रमाणित करें ॥ ४ ॥

छन्दं मुनेश्च विज्ञाय सीतायाश्च मनोगतम् ।

प्रत्ययं दातुकामायास्ततः शंसत में लघु ॥ ५ ॥

' तुम इस विषय में महर्षि वाल्मीकि तथा सीताके भी हार्दिक अभिप्रायको जानकर शीघ्र मुझे सूचित करो कि क्या वे यहाँ आकर अपनी शुद्धिका विश्वास दिलाना चाहती हैं ॥

श्वः प्रभाते तु शपथं मैथिली जनकात्मजा ।

करोतु परिषन्मध्ये शोधनार्थे ममैव च ॥ ६ ॥

' कल सबेरे मिथिलेशकुमारी जानकी भरी सभामें आवें और मेरा कलंक दूर करने के लिये शपथ करें ' ॥ ६ ॥

श्रुत्वा तु राघवस्यैतद् वचः परममद्भुतम् ।

दूताः सम्प्रययुर्वा यत्र वै मुनिपुङ्गवः ॥ ७ ॥

श्रीरघुनाथजीका यह अत्यन्त अद्भुत वचन सुनकर दूत उस बाड़े में गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकि विराजमान थे ॥ ७ ॥

ते प्रणम्य महात्मानं ज्वलन्तममितप्रभम् ।

ऊचुस्ते रामवाक्यानि मृदूनि मधुराणि च ॥ ८ ॥

महात्मा वाल्मीकि अमित तेजस्वी थे और अपने तेजसे अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहे थे । उन दूतोंने उन्हें प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी के वचन मधुर एवं कोमल शब्दों में कह सुनाये ॥ ८ ॥

तेषां तद् भाषितं श्रुत्वा रामस्य च मनोगतम् ।

विज्ञाय सुमहातेजा मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ९ ॥

उन दूतोंकी वह बात सुनकर और श्रीरामके हार्दिक अभिप्रायको समझकर वे महातेजस्वी मुनि इस प्रकार बोले- ॥

एवं भवतु भद्रं वो यथा वदति राघवः ।

तथा करिष्यते सीता दैवतं हि पतिः स्त्रियाः ॥ १० ॥

" ऐसा ही होगा, तुमलोगोंका भला हो । श्रीरघुनाथजी जो आज्ञा देते हैं, सीता वही करेगी; क्योंकि पति स्त्रीके लिये देवता है ' ॥ १० ॥

तथोक्ता मुनिना सर्वे राजदूता महौजसम् ।

पृष्ठ 882

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उत्तरकाण्डे षण्णवतितमः सर्गः १६५५ प्रत्येत्य राघवं सर्वे मुनिवाक्यं बभाषिरे ॥ ११ ॥

मुनिके ऐसा कहने पर वे सब राजदूत महातेजस्वी श्री-रघुनाथजीके पास लौट आये । उन्होंने मुनिकी कही हुई सारी बातें ज्यों - की - त्यों कह सुनायीं ॥ ११ ॥

ततः प्रहृष्टः काकुत्स्थः श्रुत्वा वाक्यं महात्मनः ।

ऋषींस्तत्र समेतांश्च राज्ञश्चैवाभ्यभाषत ॥ १२ ॥

महात्मा वाल्मीकिकी बातें सुनकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने वहाँ आये हुए ऋषियों तथा राजाओंसे कहा- ॥ १२ ॥

भगवन्तः सशिष्या वै सानुगाश्च नराधिपाः ।

पश्यन्तु सीताशपथं यश्चैवान्योऽपि काङ्क्षते ॥ १३ ॥

" आप सब पूज्यपाद मुनि शिष्यों सहित सभामें पधारें । सेवकों सहित राजा लोग भी उपस्थित हों तथा दूसरा भी जो कोई सीता की शपथ सुनना चाहता हो, वह आ जाय । इस प्रकार सब लोग एकत्र होकर सीताका शपथ ग्रहण देखें ' १३

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः ।

सर्वेषामृषिमुख्यानां साधुवादो महानभूत् ॥ १४ ॥

महात्मा राघवेन्द्रका यह वचन सुनकर समस्त महर्षियों-के मुखसे महान् साधुवादकी ध्वनि गूँज उठी ॥ १४ ॥

राजानश्च महात्मानं प्रशंसन्ति स्म राघवम् ।

उपपन्नं नरश्रेष्ठ त्वय्येव भुवि नान्यतः ॥ १५ ॥

राजा लोग भी महात्मा रघुनाथजी की प्रशंसा करते हुए बोले- ' नरश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर सभी उत्तम बातें केवल आपमें ही सम्भव हैं, दूसरे किसीमें नहीं ' ॥ १६ ॥

एवं विनिश्चयं कृत्वा श्वोभूत इति राघवः ।

विसर्जयामास तदा सर्वास्ताञ्छत्रुसूदनः ॥ १६ ॥

इस प्रकार दूसरे दिन सीतासे शपथ लेनेका निश्चय करके शत्रुसूदन श्रीरामने उस समय सबको बिदा कर दिया ॥ १६ ॥

इति सम्प्रविचार्य राजसिंहः श्वोभूते शपथस्य निश्चयम् । विससर्ज मुनीन् नृपांश्च सर्वान् स महात्मा महतो महानुभावः ॥ १७ ॥

इस प्रकार दूसरे दिन सबेरे सीतासे शपथ लेनेका निश्चय करके महानुभाव महात्मा राजसिंह श्रीरामने उन सब मुनियों और नरेशोंको अपने - अपने स्थानपर जाने की अनुमति दे दी ॥ १७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्गः ॥ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पंचानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ५ ॥ षण्णवतितमः सर्गः महर्षि वाल्मीकिद्वारा सीताकी शुद्धताका समर्थन

तस्यां रजन्यां व्युष्टायां यज्ञवाटं गतो नृपः ।

ऋषीन् सर्वान् महातेजाः शब्दापयति राघवः ॥ १ ॥

रात बीती, सबेरा हुआ और महातेजस्वी राजा श्रीराम

चन्द्रजी यज्ञशाला में पधारे । उस समय उन्होंने समस्त ऋषियों-को बुलवाया ॥ १ ॥

वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ काश्यपः ।

विश्वामित्रो दीर्घतमा दुर्वासाश्च महातपाः ॥ २ ॥

पुलस्त्योऽपि तथा शक्तिर्भार्गवश्चैव वामनः ।

मार्कण्डेयश्च दीर्घायुमौद्गल्यश्च महायशाः ॥ ३ ॥

गर्गश्च च्यवनश्चैव शतानन्दश्च धर्मवित् ।

भरद्राजश्च तेजस्वी अग्निपुत्रश्च सुप्रभः ॥ ४ ॥

नारदः पर्वतश्चैव गौतमश्च महायशाः ।

कात्यायनः सुयशश्च ह्यगस्त्यस्तपसां निधिः ॥ ५ ॥

एते चान्ये च बहवो मुनयः संशितव्रताः ।

कौतूहलसमाविष्टाः सर्व एव समागताः ॥ ६ ॥

वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, विश्वामित्र, दीर्घतमा, महातपस्वी दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, वामन, दीर्घजीवी मार्कण्डेय, महायशस्वी मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, धर्मज्ञ शतानन्द, तेजस्वी भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, महायशस्वी गौतम, कात्यायन, सुयज्ञ और तपोनिधि अगस्त्य —ये तथा दूसरे कठोर व्रतका पालन करनेवाले सभी बहुसंख्यक महर्षि कौतूहलवश वहाँ एकत्र हुए ॥ २६ ॥

राक्षसाश्च महावीर्या वानराश्च महाबलाः ।

सर्व एव समाजग्मुर्महात्मानः कुतूहलात् ॥ ७ ॥

महापराक्रमी राक्षस और महाबली वानर ये सभी महा-मना कौतूहलवश वहाँ आये ॥ ७ ॥

क्षत्रिया ये च शूद्राश्च वैश्याश्चैव सहस्रशः ।

नानादेशगताश्चैव ब्राह्मणाः संशितव्रताः ॥ ८ ॥

नाना देशोंसे पधारे हुए तीक्ष्ण व्रतधारी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सहस्रोंकी संख्या में वहाँ उपस्थित हुए ॥ ८ ॥

ज्ञाननिष्ठाः कर्मनिष्ठा योगनिष्ठास्तथापरे ।

सीतारापथवीक्षार्थी सर्व एव समागताः ॥ ९ ॥

सीताजीका शपथ ग्रहण देखने के लिये ज्ञाननिष्ठ, कर्मनिष्ठ और योगनिष्ठ सभी तरहके लोग पधारे थे ॥ ९ ॥

तदा समागतं सर्वमश्मभूतमिवाचलम् ।

श्रुत्वा मुनिवरस्तूर्ण ससीतः समुपागमत् ॥ १० ॥

राजसभामें एकत्र हुए सब लोग पत्थरकी भाँति निश्चल

पृष्ठ 883

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१६५६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे होकर बैठे हैं यह सुनकर मुनिवर वाल्मीकि सीताजीको साथ लेकर तुरंत वहाँ आये ॥ १० ॥

तमृषिं पृष्ठतः सीता अन्वगच्छदवाङ्मुखी ।

कृताञ्जलिर्बाष्पकला कृत्वा रामं मनोगतम् ॥ ११ ॥

महर्षिके पीछे सीता सिर झुकाये चली आ रही थीं । उनके • दोनों हाथ जुड़े थे और नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे । वे अपने हृदयमन्दिरमें बैठे हुए श्रीरामका चिन्तन कर रही थीं ॥११ ॥

तां दृष्ट्वा श्रुतिमायान्तीं ब्रह्माणमनुगामिनीम् ।

वाल्मीकेः पृष्ठतः सीतां साधुवादो महानभूत् ॥ १२ ॥

वाल्मीकिकै पीछे - पीछे आती हुई सीता ब्रह्माजीका अनु-सरण करनेवाली श्रुतिके समान जान पड़ती थीं । उन्हें देखकर वहाँ धन्य धन्यकी भारी आवाज गूँज उठी ॥ १२ ॥

ततो हलहलाशब्दः सर्वेषामेवमाबभौ ।

दुःखजन्मविशालेन शोकेनाकुलितात्मनाम् ॥ १३ ॥

उस समय समस्त दर्शकोंका हृदय दुःख देनेवाले महान् शोकसे व्याकुल था । उन सबका कोलाहल सब ओर व्याप्त हो गया ॥ १३ ॥

साधु रामेति केचित् तु साधु सीतेति चापरे ।

उभावेव च तत्रान्ये प्रेक्षकाः सम्प्रचुकुशुः ॥ १४ ॥

कोई कहते थे -- ' श्रीराम! तुम धन्य हो । ' दूसरे कहते थे- ' देवि सीते! तुम धन्य हो ' तथा वहाँ कुछ अन्य दर्शक भी ऐसे थे, जो सीता और राम दोनों को उच्चस्वर से साधुवाद दे रहे थे ॥ १४ ॥

ततो मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः ।

सीतासहायो वाल्मीकिरिति होवाच राघवम् ॥ १५ ॥

तब उस जनसमुदायके बीचमें सीतासहित प्रवेश करके मुनिवर वाल्मीकि श्रीरघुनाथजी से इस प्रकार बोले इयं दाशरथे सीता सुव्रता धर्मचारिणी अपवादात् परित्यक्ता ममाश्रमसमीपतः ' दशरथनन्दन! यह सीता उत्तम व्रतका पालन और धर्मपरायणा है । आपने लोकापवादसे डरकर आश्रमके समीप त्याग दिया था ॥ १६ ॥

लोकापवादभीतस्य तव राम महाव्रत प्रत्ययं दास्यते सीता तामनुज्ञातुमर्हसि – ॥१५ ॥

॥ १६ ॥

करनेवाली इसे मेरे

॥ १७ ॥

‘ महान् व्रतधारी श्रीराम! लोकापवादसे डरे हुए आपको सीता अपनी शुद्धताका विश्वास दिलायेगी । इसके लिये आप इसे आज्ञा दें ॥ १७ ॥

इमौ तु जानकीपुत्रावुभौ च यमजातकौ ।

सुतौ तवैव दुर्धर्षौ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये " ये दोनों कुमार कुश और लव जानकीके गर्भसे जुड़वे पैदा हुए हैं । ये आपके ही पुत्र हैं और आपके ही समान दुवीर हैं, यह मैं आपको सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ १८ ॥

प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन ।

न स्मराम्यनृतं वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ ॥ १ ९ ॥

' रघुकुलनन्दन! मैं प्रचेता ( वरुण ) का दसवाँ पुत्र हूँ । मेरे मुँहसे कभी झूठ बात निकली हो, इसकी याद मुझे नहीं है । मैं सत्य कहता हूँ ये दोनों आपके ही पुत्र हैं ॥ १ ९ ॥

बहुवर्षसहस्राणि तपश्चर्या मया कृता ।

नोपाश्नीयां फलं तस्या दुष्टेयं यदि मैथिली ॥ २० ॥

" मैंने कई हजार वर्षोंतक भारी तपस्या की है । यदि मिथिलेशकुमारी सीतामें कोई दोष हो तो मुझे उस तपस्याका फल न मिले ॥ २० ॥

मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्व न किल्बिषम् ।

तस्याहं फलमश्नामि अपापा मैथिली यदि ॥ २१ ॥

' मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा भी पहले कभी कोई पाप नहीं किया है 1 । यदि मिथिलेशकुमारी सीता निष्पाप हों, तभी मुझे अपने उस पापशून्य पुण्यकर्मका फल प्राप्त हो ॥ २१ ॥

अहं पञ्चसु भूतेषु मनःषष्ठेषु राघव ।

विचिन्त्य सीता शुद्धेति जग्राह वननिर्झरे ॥ २२ ॥

" घुनन्दन! मैंने अपनी पाँचों इन्द्रियों और मन - बुद्धि-के द्वारा सीताकी शुद्धताका भलीभाँति निश्चय करके ही इसे अपने संरक्षण में लिया था । यह मुझे जंगलमें एक झरने के पास मिली थी ॥ २२ ॥

इयं शुद्धसमाचारा अपापा पतिदेवता ।

लोकापवादभीतस्य प्रत्ययं तव दास्यति ॥ २३ ॥

" इसका आचरण सर्वथा शुद्ध है । पाप इसे छू भी नहीं सका है तथा यह पतिको ही देवता मानती है । अतः लोका-पवादसे डरे हुए आपको अपनी शुद्धताका विश्वास दिलायेगी । तस्मादियं नरवरात्मज शुद्धभावा दिव्येन दृष्टिविषयेण मया प्रविष्टा । लोकापवादकलुषीकृतचेतसा या त्यक्ता त्वया प्रियतमा विदितापि शुद्धा ॥ २४ ॥

' राजकुमार! मैंने दिव्य दृष्टिसे यह जान लिया था कि सीताका भाव और विचार परम पवित्र है; इसलिये यह मेरे आश्रममें प्रवेश पा सकी है । आपको भी यह प्राणोंसे अधिक प्यारी है और आप यह भी जानते हैं कि सीता सर्वथा शुद्ध है तथापि लोकापवाद से कलुषितचित्त होकर आपने इसका त्याग किया है ' ॥ २४ ॥

उत्तरकाण्डे षण्णवतितमः सर्गः ॥ ९ ६ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ६ ॥

पृष्ठ 884

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उत्तरकाण्डे सप्तनवतितमः सर्गः १६५७ सप्तनवतितमः सर्गः सीताका शपथ ग्रहण

वाल्मीकिनैवमुक्तस्तु राघवः प्रत्यभाषत ।

प्राञ्जलिर्जगतो मध्ये दृष्ट्रा तां वरवर्णिनीम् ॥ १ ॥

महर्षि वाल्मीकिके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजी सुन्दरी सीतादेवीकी ओर एक बार दृष्टि डालकर उस जनसमुदायके बीच हाथ जोड़कर बोले -- ॥ १ ॥

एवमेतन्महाभाग यथा वदसि धर्मवित् ।

प्रत्ययस्तु मम ब्रह्मंस्तव वाक्यैरकल्मषैः ॥ २ ॥

' महाभाग! आप धर्मके ज्ञाता हैं । सीता के सम्बन्धमें आप जैसा कह रहे हैं, वह सब ठीक है । ब्रह्मन्! आपके इन निर्दोष वचनोंसे मुझे जनकनन्दिनीकी शुद्धता पर पूरा विश्वास हो गया है ॥ २ ॥

प्रत्ययश्च पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसंनिधौ ।

शपथश्च कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता ॥ ३ ॥

“ एक बार पहले भी देवताओंके समीप विदेहकुमारीकी शुद्धताका विश्वास मुझे प्राप्त हो चुका है । उस समय सीताने अपनी शुद्धिके लिये शपथ की थी, जिसके कारण मैंने इन्हें अपने भवनमें स्थान दिया ॥ ३ ॥

लोकापवादो बलवान् येन त्यक्ता हि मैथिली ।

सेयं लोकभयाद् ब्रह्मन्नपापेत्यभिजानता ।

परित्यक्ता मया सीता तद् भवान् क्षन्तुमर्हति ॥ ४ ॥

' किंतु आगे चलकर फिर बड़े जोरका लोकापवाद उठा, जिससे विवश होकर मुझे मिथिलेशकुमारीका त्याग करना पड़ा । ब्रह्मन्! यह जानते हुए भी कि सीता सर्वथा निष्पाप हैं, मैंने केवल समाजके भयसे इन्हें छोड़ दिया था; अतः आप मेरे इस अपराधको क्षमा करें ॥ ४ ॥

जानामि चेमौ पुत्रौ मे यमजातौ कुशीलवौ ।

शुद्धायां जगतो मध्ये मैथिल्यां प्रीतिरस्तु मे ॥ ५ ॥

“ मैं यह भी जानता हूँ कि ये जुड़वे उत्पन्न हुए कुमार कुश और लव मेरे ही पुत्र हैं, तथापि जनसमुदायमें शुद्ध प्रमाणित होने पर ही मिथिलेश कुमारी में मेरा प्रेम हो सकता है ' ॥

अभिप्रायं तु विज्ञाय रामस्य सुरसत्तमाः ।

सीतायाः शपथे तस्मिन् महेन्द्राद्या महौजसः ॥ ६ ॥

पितामहं पुरस्कृत्य सर्व एव समागताः । श्रीरामचन्द्रजीके अभिप्रायको जानकर सीताके शपथके समय महेन्द्र आदि सभी मुख्य - मुख्य महातेजखी देवता पितामह ब्रह्माजीको आगे करके वहाँ आ गये ॥ ६३ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः ॥ ७ ॥

साध्याश्च देवाः सर्वे ते सर्वे च परमर्षयः ।

नागाः सुपर्णाः सिद्धाश्च ते सर्वे हृष्टमानसाः ॥ ८ ॥

सीताशपथसम्भ्रान्ताः सर्व एव समागताः । बा ० रा ० ५.१२.१०-और रसातल में प्रवेश आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, समस्त साध्य-देव, सभी महर्षि, नाग, गरुड़ और सम्पूर्ण सिद्धगण प्रसन्न-चित्त हो सीताजीके शपथ ग्रहणको देखने के लिये घबराये हुए-से वहाँ आ पहुँचे ॥ ७-८३ ॥ eg देवानृषींचैव राघवः पुनरब्रवीत् ॥ ९ ॥

प्रत्ययो मे सुरश्रेष्ठ ऋषिवाक्यै र कल्मषैः ।

शुद्धायां जगतो मध्ये वैदेह्यां प्रीतिरस्तु मे ॥ १० ॥

देवताओं तथा ऋषियोंको उपस्थित देख श्रीरघुनाथजी फिर बोले— ' सुरश्रेष्ठगण! यद्यपि मुझे महर्षि वाल्मीकिके निर्दोष वचनोंसे ही पूरा विश्वास हो गया है, तथापि जन-समाजके बीच विदेद्दकुमारीकी विशुद्धता प्रमाणित हो जानेपर मुझे अधिक प्रसन्नता होगी ' ॥ ९ -१० ॥

ततो वायुः शुभः पुण्यो दिव्यगन्धो मनोरमः ।

तं जनौघं सुरश्रेष्ठो ह्रादयामास सर्वतः ॥ ११ ॥

तदनन्तर दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण, मनको आनन्द देनेवाले परम पवित्र एवं शुभकारक सुरश्रेष्ठ वायुदेव मन्दगतिसे प्रवाहित हो सब ओरसे वहाँके जनसमुदायको आह्लाद प्रदान करने लगे ॥ ११ ॥

तदद्भुतमिवाचिन्त्यं निरैक्षन्त समाहिताः ।

मानवाः सर्वराष्ट्रेभ्यः पूर्व कृतयुगे यथा ॥ १२ ॥

समस्त राष्ट्रोंसे आये हुए मनुष्योंने एकाग्रचित्त हो प्राचीन कालके सत्ययुगकी भाँति यह अद्भुत और अचिन्त्य-सी घटना अपनी आँखों देखी ॥ १२ ॥

सर्वान् समागतान् दृष्ट्वा सीता काषायवासिनी ।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यमधोढष्टिरवाखी ॥ १३ ॥

उस समय सीताजी तपस्विनियोंके अनुरूप गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए थीं । सबको उपस्थित जानकर वे हाथ जोड़े, दृष्टि और मुखको नीचे किये बोलीं- ॥ १३ ॥

यथाहं राघवादन्यं मनसापि न चिन्तये ।

तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥ १४ ॥

“ मैं श्रीरघुनाथजी के सिवा दूसरे किसी पुरुषका ( स्पर्श तो दूर रहा ) मनसे चिन्तन भी नहीं करती; यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोद में स्थान दें ॥ १४ ॥

मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये ।

तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥ १५ ॥

' यदि मैं मन, वाणी और क्रियाके द्वारा केवल श्रीरामकी ही आराधना करती हूँ तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोद-में स्थान दें ॥ १५ ॥

यथैतत् सत्यमुक्तं मे वेद्मि रामात् परं न च ।

तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥ १६ ॥

पृष्ठ 885

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१६५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' भगवान् श्रीरामको छोड़कर मैं दूसरे किसी पुरुषको नहीं जानती, मेरी कही हुई यह बात यदि सत्य हो तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें ' ॥ १६ ॥

तथा शपन्त्यां वैदेह्यां प्रादुरासीत् तदद्भुतम् ।

भूतलादुत्थितं दिव्यं सिंहासनमनुत्तमम् ॥ १७ ॥

विदेहकुमारी सीताके इस प्रकार शपथ करते ही भूतलसे एक अद्भुत सिंहासन प्रकट हुआ, जो बड़ा ही सुन्दर और दिव्य था ॥ १७ ॥

धियमाणं शिरोभिस्तु नागैरमितविक्रमैः । दिव्यं दिव्येन वपुषा दिव्यरत्नविभूषितैः दिव्य रत्नोंसे विभूषित महापराक्रमी नागने धारण करके उस दिव्य सिंहासनको अपने सिरपर रक्खा था ॥ १८ ॥

तस्मिंस्तु धरणी देवी बाहुभ्यां गृह्य मैथिलीम् स्वागतेनाभिनन्द्यैनामासने चोपवेशयत् सिंहासन के साथ ही पृथ्वीकी अधिष्ठात्री देवी ॥ १८ ॥

दिव्य रूप धारण कर

॥ १ ९ ॥

भी दिव्य रूपसे प्रकट हुई । उन्होंने मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे गोदमें उठा लिया और स्वागतपूर्वक उनका अभिनन्दन करके उन्हें उस सिंहासनपर बिठा दिया ॥ १ ९ ॥

तामासनगतां दृष्ट्वा प्रविशन्तीं रसातलम् ।

पुष्पवृष्टिरविच्छिन्ना दिव्या सीतामवाकिरत् ॥ २० ॥

सिंहासनपर बैठकर जब सीतादेवी रसातलमें प्रवेश करने लगीं, उस समय देवताओंने उनकी ओर देखा । फिर तो आकाशसे उनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी लगातार वर्षा होने लगी ॥

साधुकारश्च सुमहान् देवानां सहसोत्थितः ।

साधुसाध्विति वै सीते यस्यास्ते शीलमीदृशम् ॥२१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके देवताओं के मुँहसे सहसा ' धन्य धन्य ' का महान् शब्द प्रकट हुआ । वे कहने लगे- ' सीते! तुम धन्य हो, धन्य हो । तुम्हारा शील - स्वभाव इतना सुन्दर और ऐसा पवित्र है ' ॥

एवं बहुविधा वाचो ह्यन्तरिक्षगताः सुराः ।

व्याजहहृष्टमनसो दृष्ट्रा सीताप्रवेशनम् ॥ २२ ॥

सीताका रसातलमें प्रवेश देखकर आकाशमें खड़े हुए देवता प्रसन्नचित्त हो इस तरहकी बहुत - सी बातें कहने लगे ॥

यज्ञवाटगताश्चापि मुनयः सर्व एव ते ।

राजानश्च नरव्याघ्रा विस्मयान्नोपरे मिरे ॥ २३ ॥

यज्ञमण्डपमें पधारे हुए सभी मुनि और नरश्रेष्ठ नरेश भी आश्चर्य से भर गये ॥ २३ ॥

अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वे स्थावरजङ्गमाः ।

दानवाश्च महाकायाः पाताले पन्नगाधिपाः ॥ २४ ॥

अन्तरिक्ष में और भूतलपर सभी चराचर प्राणी तथा पातालमें विशालकाय दानव और नागराज भी आश्चर्यचकित हो उठे ॥ २४ ॥

केचिद् विनेदुः संहृष्टाः केचिद् ध्यानपरायणाः ।

केचिद् रामं निरीक्षन्ते केचित् सीतामचेतसः ॥ २५ ॥

कोई हर्षनाद करने लगे, कोई ध्यानमग्न हो गये, कोई श्रीरामकी ओर देखने लगे और कोई हक्के - बक्के से होकर सीताजीकी ओर निहारने लगे ॥ २५ ॥

सीताप्रवेशनं दृष्ट्रा तेषामासीत् समागमः ।

तन्मुहूर्तमिवात्यर्थ समं सम्मोहितं जगत् ॥ २६ ॥

सीताका भूतलमें प्रवेश देखकर वहाँ आये हुए सब लोग हर्ष, शोक आदिमें डूब गये । दो घड़ी तक वहाँका सारा जनसमुदाय अत्यन्त मोहाच्छन्न - सा हो गया ॥ २६ ॥

उत्तरकाण्डे सप्तनवतितमः सर्गः ॥ ९ ७ ॥ उत्तरकाण्ड में सत्तानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ७ ॥ अष्टनवतितमः सर्गः सीता के लिये श्रीरामका खेद, ब्रह्माजीका उन्हें समझाना और उत्तरकाण्डका शेष अंश सुननेके

रसातलं प्रविष्टायां वैदेह्यां सर्ववानराः ।

चुक्रुशुः साधुसाध्वीति मुनयो रामसंनिधौ ॥ १ ॥

विदेहकुमारी सीता के रसातलमें प्रवेश कर जानेपर श्रीराम-के समीप बैठे हुए सम्पूर्ण वानर तथा ऋषि - मुनि कहने लगे ' साध्वी सीते! तुम धन्य हो ' ॥ १ ॥

दण्डकाष्ठमवष्टभ्य बाष्पव्याकुलितेक्षणः ।

अवाक्शिरा दीनमना रामो ह्यासीत् सुदुःखितः ॥ २ ॥

किंतु स्वयं भगवान् श्रीराम बहुत दुखी हुए । उनका मन उदास हो गया और वे गूलरके दण्डे का सहारा लिये खड़े हो सिर झुकाये नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ २ ॥

लिये प्रेरित करना

स रुदित्वा चिरं कालं बहुशो बाष्पमुत्सृजन् ।

क्रोधशोकसमाविष्टो रामो वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥

बहुत देरतक रोकर बारंबार आँसू बहाते हुए क्रोध और शोकसे युक्त हो श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार बोले —॥३ ॥

अभूतपूर्व शोकं मे मनः स्प्रष्टुमिवेच्छति ।

पश्यतो मे यथा नष्टा सीता श्रीरिव रूपिणी ॥ ४ ॥

' आज मेरा मन अभूतपूर्व शोक में डूबना चाहता है; क्योंकि इस समय मेरी आँखोंके सामनेसे मूर्तिमती लक्ष्मीके समान सीता अदृश्य हो गयीं ॥ ४ ॥

सादर्शनं पुरा सीता लङ्कां पारे महोदधेः ।

पृष्ठ 886

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तैयारी लिये के प्रवेश भूतल श्रीजानकीजीक निर्वासिता

पृष्ठ 887

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पृष्ठ 888

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उत्तरकाण्डे अष्टनवतितमः सर्गः १६५ ९ ततश्चापि मयाऽऽनीता किं पुनर्वसुधातलात् ॥ ५ ॥

‘ पहली बार सीता समुद्रके उस पार लङ्का में जाकर मेरी आँखोंसे ओझल हुई थीं । किंतु जब मैं वहाँसे भी उन्हें लौटा लाया, तब पृथ्वी के भीतर से ले आना कौन बड़ी बात है ११ ॥५ ॥

वसुधे देवि भवति सीता निर्यात्यतां मम ।

दर्शयिष्यामि वा रोषं यथा मामवगच्छसि ॥ ६ ॥

( यों कहकर वे पृथ्वीसे बोले -- ) ' पूजनीये भगवति वसुन्धरे! मुझे सीताको लौटा दो; अन्यथा मैं अपना क्रोध दिखाऊँगा । मेरा प्रभाव कैसा है? यह तुम जानती हो ॥६ ॥

कामं श्वश्रूर्ममैव त्वं त्वत्सकाशात् तु मैथिली ।

कर्षता फालहस्तेन जनकेनोद्धता पुरा ॥ ७ ॥

‘ देवि! वास्तवमें तुम्हीं मेरी सास हो । राजा जनक हाथ-में फाल लिये तुम्हींको जोत रहे थे, जिससे तुम्हारे भीतरसे सीताका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ७ ॥

तस्मान्निर्यात्यतां सीता विवरं वा प्रयच्छ मे ।

पाताले नाकपृष्ठे वा वसेयं सहितस्तया ॥ ८ ॥

' अतः या तो तुम सीताको लौटा दो अथवा मेरे लिये भी अपनी गोदमें जगह दो; क्योंकि पाताल हो या स्वर्ग, मैं सीताके साथ ही रहूँगा ॥ ८ ॥

आनय त्वं हि तां सीतां मत्तोऽहं मैथिलीकृते ।

न मे दास्यसि चेत् सीतां यथारूपां महीतले ॥ ९ ॥

सपर्वतवनां कृत्स्नां विधमिष्यामि ते स्थितिम् ।

नाशयिष्याम्यहं भूमिं सर्वमापो भवन्त्विह ॥ १० ॥

" तुम मेरी सीताको लाओ! मैं मिथिलेशकुमारीके लिये मतवाला ( बेसुध ) हो गया हूँ । यदि इस पृथ्वीपर तुम उसी रूपमें सीताको मुझे लौटा नहीं दोगी तो मैं पर्वत और वन-सहित तुम्हारी स्थितिको नष्ट कर दूँगा । सारी भूमिका विनाश कर डालूँगा । फिर भले ही सब कुछ जलमय ही हो जाय ' ॥९ -१० ॥

एवं ब्रुवाणे काकुत्स्थे क्रोधशोकसमन्विते ।

ब्रह्मा सुरगणैः सार्धमुवाच रघुनन्दनम् ॥ ११ ॥

श्रीरघुनाथजी जब क्रोध और शोकसे युक्त हो इस प्रकार-की बातें कहने लगे, तब देवताओंसहित ब्रह्माजीने उन रघुकुल-नन्दन श्रीरामसे कहा – ॥ ११ ॥

राम राम न संतापं कर्तुमर्हसि सुव्रत ।

स्मरत्वं पूर्वकं भावं मन्त्रं चामित्रकर्शन ॥ १२ ॥

' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीराम! आप मनमें संताप न करें । शत्रुसूदन! अपने पूर्व स्वरूपका स्मरण करें ।

न खलु त्वां महाबाहो स्मारयेयमनुत्तमम् ।

इमं मुहूर्त दुर्धर्ष स्मर त्वं जन्म वैष्णवम् ॥ १३ ॥

' महाबाहो! मैं आपको आपके परम उत्तम स्वरूपका स्मरण नहीं दिला रहा हूँ । दुर्धर्ष वीर! केवल यह अनुरोध कर रहा हूँ कि इस समय आप ध्यानके द्वारा अपने वैष्णव स्वरूपका स्मरण करें ॥ १३ ॥

सीता हि विमला साध्वी तव पूर्वपरायणा ।

नागलोकं सुखं प्रायात् त्वदाश्रयतपोबलात् ॥ १४ ॥

G ' साध्वी सीता सर्वथा शुद्ध हैं । वे पहले से ही आपके ही परायण रहती हैं । आपका आश्रय लेना ही उनका तपोबल । उसके द्वारा वे सुखपूर्वक नागलोकके बहाने आपके परम-घाममें चली गयी हैं ॥ १४ ॥

स्वर्गे ते संगमो भूयो भविष्यति न संशयः ।

अस्यास्तु परिषन्मध्ये यद् ब्रवीमि निबोध तत् ॥ १५ ॥

' अब पुनः साकेतधाममें आपकी उनसे भेंट होगी; इसमें संशय नहीं है । अब इस सभा में मैं आपसे जो कुछ कहता हूँ, उसपर ध्यान दीजिये ॥ १५ ॥

एतदेव हि काव्यं ते काव्यानामुत्तमं श्रुतम् ।

सर्वे विस्तरतो राम व्याख्यास्यति न संशयः ॥ १६ ॥

' आपके चरित्र से सम्बन्ध रखनेवाला यह काव्य, जिसे आपने सुना है, सब काव्योंमें उत्तम है । श्रीराम! यह आपके सारे जीवन - वृत्तका विस्तारसे ज्ञान करायेगा, इसमें संदेह नहीं है ॥ १६ ॥

जन्मप्रभृति ते वीर सुखदुःखोपसेवनम् ।

भविष्यदुत्तरं चेह सर्वे वाल्मीकिना कृतम् ॥ १७ ॥

' वीर! आविर्भावकालसे ही जो आपके द्वारा सुख - दुःखों-का ( स्वेच्छासे ) सेवन हुआ है, उसका तथा सीताके अन्तर्धान होने के बाद जो भविष्य में होनेवाली बातें हैं, उनका भी महर्षि वाल्मीकिने इसमें पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया है ॥ १७ ॥

आदिकाव्यमिदं राम त्वयि सर्व प्रतिष्ठितम् ।

नह्यन्योऽर्हति काव्यानां यशोभाग राघवाहते ॥ १८ ॥

‘ श्रीराम! यह आदिकाव्य है । इस सम्पूर्ण काव्यकी आधारशिला आप ही हैं- आपके ही जीवनवृत्तान्तको लेकर इस काव्य की रचना हुई है । रघुकुलकी शोभा बढ़ानेवाले आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा यशस्वी पुरुष नहीं है, जो काव्योंका नायक होनेका अधिकारी हो ॥ १८ ॥

श्रुतं ते पूर्वमेतद्धि मया सर्व सुरैः सह ।

दिव्यमद्भुतरूपं च सत्यवाक्यमनावृतम् ॥ १ ९ ॥

‘ देवताओंके साथ मैंने पहले आपसे सम्बन्धित इस सम्पूर्ण काव्यका श्रवण किया है । यह दिव्य और अद्भुत है । इसमें कोई भी बात छिपायी नहीं गयी है । इसमें कही गयी सारी बातें सत्य हैं ॥ १ ९ ॥

स त्वं पुरुषशार्दूल धर्मेण सुसमाहितः ।

शेषं भविष्यं काकुत्स्थ काव्यं रामायणं शृणु ॥ २० ॥

‘ पुरुषसिंह रघुनन्दन! आप धर्मपूर्वक एकाग्रचित्त हो भविष्यकी घटनाओंसे युक्त शेष रामायण काव्यको भी सुन लीजिये ॥ २० ॥

उत्तरं नाम काव्यस्य शेषमत्र महायशः ।

तच्छृणुष्व महातेज ऋषिभिः सार्धमुत्तमम् ॥ २१ ॥

पृष्ठ 889

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१६६० श्रीमद्वाल्मीकी रामायणे ' महायशस्वी एवं महातेजस्वी श्रीराम! इस काव्यके अन्तिम भागका नाम उत्तरकाण्ड है । उस उत्तम भागको आप ऋषियोंके साथ सुनिये ॥ २१ ॥

न खल्वन्येन काकुत्स्थ श्रोतव्यमिदमुत्तमम् ।

परमऋषिणा वीर त्वयैव रघुनन्दन ॥ २२ ॥

' काकुत्स्थवीर रघुनन्दन! आप सर्वोत्कृष्ट राजर्षि हैं । अतः पहले आपको ही यह उत्तम काव्य सुनना चाहिये, दूसरे को नहीं ' ॥ २२ ॥

एतावदुक्त्वा वचनं ब्रह्मा त्रिभुवनेश्वरः ।

जगाम त्रिदिवं देवो देवैः सह सबान्धवैः ॥ २३ ॥

इतना कहकर तीनों लोकोंके स्वामी ब्रह्माजी देवताओं एवं उनके बन्धु बान्धवोंके साथ अपने लोकको चले गये ।

ये च तत्र महात्मान ऋषयो ब्राह्मलौकिकाः ।

ब्रह्मणा समनुज्ञाता न्यवर्तन्त महौजसः ॥ २४ ॥

उत्तरं श्रोतुमनसो भविष्यं यच्च राघवे । वहाँ जो ब्रह्मलोक में रहनेवाले महातेजस्वी महात्मा ऋषि विद्यमान थे, वे ब्रह्माजीकी आशा पाकर भावी वृत्तान्तोंसे युक्त उत्तरकाण्डको सुनने की इच्छा से लौट आये ( उनके साथ ब्रह्मलोक में नहीं गये ) ॥ २४३ ॥

ततो रामः शुभां वाणीं देवदेवस्य भाषिताम् ॥ २५ ॥

श्रुत्वा परमतेजस्वी वाल्मीकिमिदमब्रवीत् । तत्पश्चात् देवाधिदेव ब्रह्माजी की कही हुई उस शुभ वाणीको याद करके परम तेजस्वी श्रीरामजीने महर्षि वाल्मीकिसे इस प्रकार कहा -- ॥ २५३ ॥

भगवञ्श्रोतुमनस ऋषयो ब्राह्मलौकिकाः ॥ २६ ॥

भविष्यदुत्तरं यन्मे श्वोभूते सम्प्रवर्तताम् । भगवन् '! ये ब्रह्मलोक के निवासी महर्षि मेरे भावी चरित्रोंसे युक्त उत्तरकाण्डका शेष अंश सुनना चाहते हैं । अतः कल सबेरेसे ही उसका गान आरम्भ हो जाना चाहिये ॥ २६३ ॥

एवं विनिश्चयं कृत्वा सम्प्रगृह्य कुशीलवौ ॥ २७ ॥

तं जनौघं विसृज्याथ पर्णशालामुपागमत् ।

तामेव शोचतः सीता सा व्यतीता च शर्वरी ॥ २८ ॥

ऐसा निश्चय करके श्रीरघुनाथजीने जनसमुदायको बिदा कर दिया और कुश तथा लवको साथ लेकर वे अपनी पर्ण-शाला में आये । वहाँ सीताका ही चिन्तन करते - करते उन्होंने रात व्यतीत की ॥ २७-२८ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टनवतितमः सर्गः ॥ ९ ८ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ८ ॥ एकोनशततमः सर्गः सीता के रसातल प्रवेश के पश्चात् श्रीरामकी जीवनचर्या, रामराज्य की स्थिति तथा माताओंके परलोक - गमन आदिका वर्णन

रजन्यां तु प्रभातायां समानीय महामुनीन् ।

गीयतामविशङ्काभ्यां रामः पुत्रावुवाच ह ॥ १ ॥

रात बीतने पर जब सबेरा हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजीने बड़े - बड़े मुनियों को बुलाकर अपने दोनों पुत्रोंसे कहा- ' अब तुम निःशङ्क होकर शेष रामायणका गान आरम्भ करो ' ॥१ ॥

ततः समुपविष्टेषु महर्षिषु महात्मसु ।

भविष्यदुत्तरं काव्यं जगतुस्तौ कुशीलवौ ॥ २ ॥

महात्मा महर्षियों के यथास्थान बैठ जानेपर कुश और लवने भगवान् के भविष्य जीवनसे सम्बन्ध रखनेवाले उत्तर-काण्डका, जो उस महाकाव्यका एक अंश था, गान आरम्भ किया ॥ २ ॥

प्रविष्टायां तु सीतायां भूतलं सत्यसम्पदा ।

तस्यावसाने यज्ञस्य रामः परमदुर्मनाः ॥ ३ ॥

इधर अपनी सत्यरूप सम्पत्तिके बलसे सीताजी के रसातल-में प्रवेश कर जानेपर उस यज्ञके अन्तमें भगवान् श्रीरामका मन बहुत दुखी हुआ ॥ ३ ॥

अपश्यमानो वैदेहीं मेने शून्यमिदं जगत् ।

शोकेन परमायस्तो न शान्ति मनसागमत् ॥ ४ ॥

विदेहकुमारीको न देखनेसे उन्हें यह सारा संसार सूना जान पड़ने लगा । शोकसे व्यथित होने के कारण उनके मनको शान्ति नहीं मिली ॥ ४ ॥

विसृज्य पार्थिवान् सर्वानृक्षवानरराक्षसान् ।

जनौघं विप्रमुख्यानां वित्तपूर्व विसृज्य च ॥ ५ ॥

एवं समाप्य यज्ञं तु विधिवत् स तु राघवः ।

ततो विसृज्य तान् सर्वान् रामो राजीवलोचनः ॥ ६ ॥

हृदि कृत्वा तदा सीतामयोध्यां प्रविवेश ह । तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने सब राजाओंको, रीछों, वानरों और राक्षसोंको, जनसमुदायको तथा मुख्य - मुख्य ब्राह्मणों-को भी धन देकर बिदा किया । इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञको समाप्त करके कमलनयन श्रीरामने सबको बिदा करनेके पश्चात् उस समय सीताका मन - ही - मन स्मरण करते हुए अयोध्यामें प्रवेश किया ॥ ५-६३ ॥ इष्टयज्ञो नरपतिः पुत्रद्वयसमन्वितः ॥ ७ ॥

न सीतायाः परां भार्या वत्रे स रघुनन्दनः ।

यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थ जानकी काञ्चनीभवत् ॥ ८ ॥

यज्ञ पूरा करके रघुकुलनन्दन राजा श्रीराम अपने दोनों

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उत्तरकाण्डे शततमः सर्गः १६६१ पुत्रोंके साथ रहने लगे । उन्होंने सीता के सिवा दूसरी किसी स्त्रीसे विवाह नहीं किया । प्रत्येक यज्ञमें जब - जब धर्मपत्नीकी आवश्यकता होती, श्रीरघुनाथजी सीताकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवा लिया करते थे ॥ ७-८ ॥

दशवर्षसहस्राणि वाजिमेधानथाकरोत् ।

वाजपेयान् दशगुणांस्तथा बहुसुवर्णकान् ॥ ९ ॥

उन्होंने दस हजार वर्षोंतक यज्ञ किये । कितने ही अश्व-मे यज्ञों और उनसे दसगुने वाजपेय यज्ञ का अनुष्ठान किया, जिसमें असंख्य स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणाएँ दी गयी थीं ॥ ९ ॥

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां गोसवैश्च महाधनैः ।

ईजे क्रतुभिरन्यैश्च स श्रीमानाप्तदक्षिणैः ॥ १० ॥

श्रीमान् रामने पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम अतिरात्र, गोसव तथा अन्य बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया, जिनमें अपार धनराशि खर्च की गयी ॥ १० ॥

एवं स कालः सुमहान् राज्यस्थस्य महात्मनः ।

धर्मे प्रयतमानस्य व्यतीयाद् राघवस्य च ॥ ११ ॥

इस प्रकार राज्य करते हुए महात्मा भगवान् श्रीरघुनाथ जीका बहुत बड़ा समय धर्मपालनके प्रयत्न में ही बीता ॥ ११ ॥

ऋक्षवानररक्षांसि स्थिता रामस्य शासने ।

अनुरञ्जन्ति राजानो ह्यहन्यहनि राघवम् ॥ १२ ॥

रीछ, वानर और राक्षस भी श्रीरामकी आज्ञाके अधीन रहते थे । भूमण्डल के सभी राजा प्रतिदिन श्रीरघुनाथजीको प्रसन्न रखते थे ॥ १२ ॥

काले वर्षति पर्जन्यः सुभिक्षं विमला दिशः ।

पुरं जनपदास्तथा ॥ १३ ॥

श्रीरामके राज्यमें मेघ समयपर वर्षा करते थे । सदा सुकाल ही रहता था कभी अकाल नहीं पड़ता था । सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न दिखायी देती थीं तथा नगर और जनपद हृष्ट पुष्ट मनुष्योंसे भरे रहते थे ॥ १३ ॥

नाकाले म्रियते कश्चिन्न व्याधिः प्राणिनां तथा ।

नानर्थो विद्यते कश्चिद रामे राज्यं प्रशासति ॥ १४ ॥

श्रीरामके राज्यशासन करते समय किसीकी अकाल मृत्यु इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के नहीं होती थी । प्राणियों को कोई रोग नहीं सताता था और संसारमें कोई उपद्रव खड़ा नहीं होता था ॥ १४ ॥

अथ दीर्घस्य कालस्य राममाता यशस्विनी ।

पुत्रपौत्रैः परिवृता कालधर्ममुपागमत् ॥ १५ ॥

इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होनेपर पुत्र - पौत्रोंसे घिरी हुई परम यशखिनी श्रीराममाता कौसल्या कालधर्म ( मृत्यु ) को प्राप्त हुई ॥ १५ ॥

अन्वियाय सुमित्रा च कैकेयी च यशस्विनी ।

धर्म कृत्वा बहुविधं त्रिदेवे पर्यवस्थिता ॥ १६ ॥

सर्वाः प्रमुदिताः स्वर्गे राज्ञा दशरथेन च ।

समागता महाभागाः सर्वधर्मे च लेभिरे ॥ १७ ॥

सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयीने भी उन्हींके पथका अनुसरण किया । ये सभी रानियाँ जीवनकालमें नाना प्रकार के धर्मका अनुष्ठान करके अन्तमें साकेतधामको प्राप्त हुई और बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ राजा दशरथसे मिलीं । उन महा-भागा रानियों को सब धर्मोंका पूरा - पूरा फल प्राप्त हुआ१६-१७

तासां रामो महादानं काले काले प्रयच्छति ।

मातृणामविशेषेण ब्राह्मणेषु तपखिषु ॥ १८ ॥

श्रीरघुनाथजी समय- समयपर अपनी सभी माताओंके निमित्त बिना किसी भेदभावके तपस्वी ब्राह्मणोंको बड़े - बड़े दान दिया करते थे ॥ १८ ॥

पित्र्याणि ब्रह्मरत्नानि यज्ञान् परमदुस्तरान् ।

चकार रामो धर्मात्मा पितॄन् देवान् विवर्धयन् ॥ १ ९ ॥

धर्मात्मा श्रीराम श्राद्ध में उपयोगी उत्तमोत्तम वस्तुएँ ब्राह्मणों को देते तथा पितरों और देवताओंको संतुष्ट करने के लिये बड़े - बड़े दुस्तर यज्ञ ( पिण्डात्मक पितृयज्ञों ) का अनुष्ठान करते थे ॥ १ ९ ॥

एवं वर्षसहस्राणि बहून्यथ ययुः सुखम् ।

विधं धर्म वर्धानस्य सर्वदा ॥ २० ॥

इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा सर्वदा विविध धर्मोका पालन करते हुए श्रीरघुनाथजीके कई हजार वर्ष सुखपूर्वक बीत गये ॥ २० ॥

उत्तरकाण्डे एकोनशततमः सर्गः ॥ ९९ ॥

उत्तरकाण्डमें निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९९ ॥

शततमः सर्गः केकयदेश से ब्रह्मर्षि गार्ग्यका भेंट लेकर आना और उनके संदेशके अनुसार श्रीरामकी आज्ञा से कुमारोंसहित भरतका गन्धर्वदेशपर आक्रमण करने के लिये प्रस्थान कस्यचित् त्वथ कालस्य युधाजित् केकयो नृपः । पुरोहित अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि गार्ग्यको, जो अङ्गिराके पुत्र स्वगुरुं प्रेषयामास राघवाय महात्मने ॥ १ ॥ थे, महात्मा श्रीरघुनाथजीके पास भेजा ॥ १३ ॥

गार्ग्यमङ्गिरसः पुत्रं ब्रह्मर्षिममितप्रभम् । दश चाभ्वसहस्राणि प्रीतिदानमनुत्तमम् ॥ २ ॥

कुछ कालके पश्चात् केकयदेशके राजा युधाजित्ने अपने कम्बलानि च रत्नानि चित्रवस्त्रमथोत्तमम् ।