Ramayana 2 — पृष्ठ 891–900
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900
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१६६२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे रामाय प्रददौ राजा शुभान्याभरणानि च ॥ ३ ॥
उनके साथ श्रीरामचन्द्रजीको परम उत्तम प्रेमोपहार के रूपमें अर्पण करने के लिये उन्होंने दस हजार घोड़े, बहुत - से कम्बल ( कालीन और शाल आदि ), नाना प्रकार के रत्न, विचित्र-विचित्र सुन्दर वस्त्र तथा मनोहर आभूषण भी दिये थे ॥ २-३ ॥
श्रुत्वा तु राघवो धीमान् महर्षि गार्ग्यमागतम् ।
मातुलस्याश्वपतिनः प्रहितं तन्महाधनम् ॥ ४ ॥
प्रत्युद्गम्य च काकुत्स्थः क्रोशमात्रं सहानुजः ।
सम्पूजयामास यथा शक्रो बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥
परम बुद्धिमान् श्रीमान् राघवेन्द्रने जब सुना कि मामा अश्वपति - पुत्र युधाजित् के भेजे हुए महर्षि गार्ग्य बहुमूल्य भेंट - सामग्री लिये अयोध्यामें पधार रहे हैं, तब उन्होंने भाइयोंके साथ एक कोस आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और जैसे इन्द्र बृहस्पतिकी पूजा करते हैं, उसी प्रकार महर्षि गार्ग्य का पूजन ( स्वागत - सत्कार ) किया ॥ ४-५ ॥
तथा सम्पूज्य तमृषिं तद् धनं प्रतिगृह्य च ।
पृष्ट्वा प्रतिपदं सर्व कुशलं मातुलस्य च ॥ ६ ॥
उपविष्टं महाभागं रामः प्रष्टुं प्रचक्रमे । इस प्रकार महर्षिका आदर सत्कार करके उस धनको ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने उनका तथा मामाके घरका सारा कुशल- समाचार पूछा । फिर जब वे महाभाग ब्रह्मर्षि सुन्दर आसनपर विराजमान हो गये, तब श्रीरामने उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ॥ ६३ ॥
किमाह मातुलो वाक्यं यदर्थे भगवानिह ॥ ७ ॥
प्राप्तो वाक्यविदां श्रेष्ठः साक्षादिव बृहस्पतिः । " ब्रह्मर्षे | मेरे मामाने क्या संदेश दिया है, जिसके लिये साक्षात् बृहस्पतिके समान वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आप पूज्यपाद महर्षिने यहाँ पधारने का कष्ट किया है ' ॥ ७३ ॥
रामस्य भाषितं श्रुत्वा महर्षिः कार्यविस्तरम् ॥ ८ ॥
वक्कुमद्भुतसंकाशं राघवायोपचक्रमे । श्रीरामका यह प्रश्न सुनकर महर्षिने उनसे अद्भुत कार्य विस्तारका वर्णन आरम्भ किया ॥ ८३ ॥
मातुलस्ते महाबाहो वाक्यमाह नरर्षभः ॥ ९ ॥
युधाजित् प्रीतिसंयुक्तं श्रूयतां यदि रोचते । ' महाबाहो! आपके मामा नरश्रेष्ठ युधाजित्ने जो प्रेम-पूर्वक संदेश दिया है, उसे यदि रुचिकर जान पड़े तो सुनिये ॥ ९ १ ॥ अयं गन्धर्वविषयः फलमूलोपशोभितः ॥ १० ॥
सिन्धोरुभयतः पार्श्वे देशः परमशोभनः । ‘ उन्होंने कहा है कि यह जो फल - मूलोसे सुशोभित गन्धर्वदेश सिन्धु नदीके दोनों तटोंपर बसा हुआ है, बड़ा सुन्दर प्रदेश है ॥ १०३ ॥
तं च रक्षन्ति गन्धर्वाः सायुधा युद्धकोविदाः ॥ ११ ॥
शैलूषस्य सुता वीर तिस्रः कोट्यो महाबलाः । ' वीर रघुनन्दन! गन्धर्वराज शैलूषकी संतानें तीन करोड़ महाबली गन्धर्व, जो युद्ध की कला में कुशल और अस्त्र - शस्त्रों से सम्पन्न हैं, उस देशकी रक्षा करते हैं ॥ ११३ ॥
तान् विनिर्जित्य काकुत्स्थ गन्धर्वनगरं शुभम् ॥ १२ ॥
निवेशय महाबाहो स्वे पुरे सुसमाहिते ।
अन्यस्य न गतिस्तत्र देशः परमशोभनः ।
रोचतां ते महाबाहो नाहं त्वामहितं वदे ॥ १३ ॥
' काकुत्स्थ! महाबाहो! आप उन गन्धर्वोको जीतकर वहाँ सुन्दर गन्धर्वनगर बसाइये । अपने लिये उत्तम साधनोंसे सम्पन्न दो नगरोंका निर्माण कीजिये । वह देश बहुत सुन्दर है । वहाँ दूसरे किसीकी गति नहीं है । आप उसे अपने अधिकार में लेना स्वीकार करें । मैं आपको ऐसी सलाह नहीं देता, जो अहितकारक हो ' ॥ १२-१३ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवः प्रीतो महर्षेर्मातुलस्य च ।
उवाच बाढमित्येव भरतं चान्ववैक्षत ॥ १४ ॥
महर्षि और मामाका वह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजी को बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने ' बहुत अच्छा ' कहकर भरतकी ओर देखा ॥ १४ ॥
सोऽब्रवीद राघवः प्रीतः साञ्जलिप्रग्रहो द्विजम् ।
इमौ कुमारी तं देशं ब्रह्मर्षे विचरिष्यतः ॥ १५ ॥
भरतस्यात्मजौ वीरौ तक्षः पुष्कल एव च ।
मातुलेन सुगुप्तौ तु धर्मेण सुसमाहितौ ॥ १६ ॥
तदनन्तर श्रीराघवेन्द्रने उन ब्रह्मर्षिसे प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा - ' ब्रह्मर्षे! ये दोनों कुमार तक्ष और पुष्कल, जो भरतके वीर पुत्र हैं, उस देशमें विचरेंगे और मामासे सुरक्षित रहकर धर्मपूर्वक एकाग्रचित्त हो उस देशका शासन करेंगे ॥ १५-१६ ॥
भरतं चाग्रतः कृत्वा कुमारौ सबलानुगौ ।
निहत्य गन्धर्वसुतान् द्वे पुरे विभजिष्यतः ॥ १७ ॥
" ये दोनों कुमार भरतको आगे करके सेना और सेवकों के साथ वहाँ जायँगे तथा उन गन्धर्वपुत्रोंका संहार करके अलग-अलग दो नगर बसायेंगे ॥ १७ ॥
निवेश्य ते पुरवरे आत्मजौ संनिवेश्य च ।
आगमिष्यति मे भूयः सकाशमतिधार्मिकः ॥ १८ ॥
' उन दोनों श्रेष्ठ नगरोंको बसाकर उनमें अपने दोनों पुत्रको स्थापित करके अत्यन्त धर्मात्मा भरत फिर मेरे पास लौट आयेंगे ' ॥ १८ ॥
ब्रह्मर्षिमेवमुक्त्वा तु भरतं सबलानुगम् ।
आज्ञापयामास तदा कुमारौ चाभ्यषेचयत् ॥ १ ९ ॥
ब्रह्मर्षिसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने भरतको वहाँ सेनाके साथ जाने की आज्ञा दी और दोनों कुमारोंका पहले ही राज्याभिषेक कर दिया ॥ १ ९ ॥
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उत्तरकाण्डे एकाधिकशततमः सर्गः १६६३ नक्षत्रेण च सौम्येन पुरस्कृत्याङ्गिरः सुतम् । पानकी इच्छासे भरतके पीछे - पीछे गये ॥ २२ ॥
भरतः सह सैन्येन कुमाराभ्यां विनिर्ययौ ॥ २० ॥ भूतग्रामाश्च बहवो मांसभक्षाः सुदारुणाः ।
तत्पश्चात् सौम्य नक्षत्र ( मृगशिरा ) में अङ्गिराके पुत्र गन्धर्वपुत्रमांसानि भोक्तुकामाः सहस्रशः ॥ २३ ॥
महर्षि गार्ग्यको आगे करके सेना और कुमारोंके साथ भरतने अत्यन्त भयंकर कई हजार मांसभक्षी भूतसमूह गन्धर्व-यात्रा की ॥ २० ॥ पुत्रका मांस खाने के लिये उस सेनाके साथ - साथ गये || २३ ||
सा सेना शक्रयुक्तेव नगरान्निर्ययावथ । सिंहव्याघ्रवराहाणां खेचराणां च पक्षिणाम् । राघवानुगता दूरं दुराधर्षा सुरैरपि ॥ २१ ॥ बहूनि वै सहस्राणि सेनाया ययुरग्रतः ॥ २४ ॥
इन्द्रद्वारा प्रेरित हुई देवसेना के समान वह सेना नगरसे सिंह, बाघ, सूअर और आकाशचारी पक्षी कई हजार-बाहर निकली । भगवान् श्रीराम भी । दूर तक उसके साथ - साथ की संख्या में सेना के आगे - आगे चले || २४ ॥ गये । वह देवताओंके लिये भी दुर्जय थी ॥ २१ ॥ अध्यर्धमासमुषिता पथि सेना निरामया ।
मांसाशिनश्च ये सत्त्वा रक्षांसि सुमहान्ति च । हृष्टपुष्टजनाकीर्णा केकयं समुपागमत् ॥ २५ ॥
अनुजग्मुर्हि भरतं रुधिरस्य पिपासया ॥ २२ ॥ मार्ग में डेढ़ महीने बिताकर हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई
मांसाहारी जन्तु और बड़े - बड़े राक्षस युद्ध में रक्त- वह सेना कुशलपूर्वक केकयदेशमें जा पहुँची ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे शततमः सर्गः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सौवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०० ॥
एकाधिकशततमः सर्गः भरतका गन्धर्वोपर आक्रमण और उनका संहार करके वहाँ दो सुन्दर नगर बसाकर अपने दोनों पुत्रोंको सौंपना और फिर अयोध्याको लौट आना
श्रुत्वा सेनापतिं प्राप्तं भरतं केकयाधिपः ।
युधाजिद् गार्ग्यसहितं परां प्रीतिमुपागमत् ॥ १ ॥
केकयराज युधाजित्ने जब सुना कि महर्षि गार्ग्य के साथ स्वयं भरत सेनापति होकर आ रहे हैं, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १ ॥
स निर्ययौ जनौघेन महता केकयाधिपः ।
त्वरमाणोऽभिचक्राम गन्धर्वान् कामरूपिणः ॥ २ ॥
वे केकयनरेश भारी जनसमुदायके साथ निकले और भरतसे मिलकर बड़ी उतावली के साथ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले गन्धके देशकी ओर चले ॥ २ ॥
भरतश्च युधाजिच्च समेतौ लघुविक्रमैः ।
गन्धर्वनगरं प्राप्तौ सबलौ सपदानुगौ ॥ ३ ॥
भरत और युधाजित् दोनोंने मिलकर बड़ी तीव्रगतिसे सेना और सवारियोंके साथ गन्धर्वोंकी राजधानीपर धावा किया ॥ ३ ॥
श्रुत्वा तु भरतं प्राप्तं गन्धर्वास्ते समागताः ।
योद्धुकामा महावीर्या व्यनदस्ते समन्ततः ॥ ४ ॥
भरतका आगमन सुनकर वे महापराक्रमी गन्धर्व युद्धकी इच्छासे एकत्र हो सब ओर जोर - जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४ ॥
ततः समभवद्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
सप्तरात्रं महाभीमं न चान्यतरयोर्जयः ॥ ५ ॥
फिर तो दोनों ओरकी सेनाओंमें बड़ा भयंकर और रोंगटे खड़े कर देनेवाला युद्ध छिड़ गया । वह महाभयंकर संग्राम लगातार सात राततक चलता रहा, परंतु दोनों में से किसी भी एक पक्षकी विजय नहीं हुई ॥ ५ ॥
खङ्गशक्तिधनुग्रहा नद्यः शोणितसंस्रवाः ।
नृकलेवरवाहिन्यः प्रवृत्ताः सर्वतोदिशम् ॥ ६ ॥
चारों ओर खून की नदियाँ बह चलीं । तलवार, शक्ति और धनुष उस नदीमें विचरनेवाले ग्राहोंके समान जान पड़ते थे, उनकी धारामें मनुष्योंकी लाशें बह जाती थीं ॥ ६ ॥
ततो रामानुजः क्रुद्धः कालस्यास्त्रं सुदारुणम् ।
संवर्ते नाम भरतो गन्धर्वेष्वभ्यचोदयत् ॥ ७ ॥
तब रामानुज भरतने कुपित होकर गन्धवों पर कालदेवताके अत्यन्त भयंकर अस्त्रका, जो संवर्त नामसे प्रसिद्ध है, प्रयोग किया ॥ ७ ॥
ते बद्धाः कालपाशेन संवर्तेन विदारिताः ।
क्षणेनाभिहतास्तेन तिस्रः कोट्यो महात्मना ॥ ८ ॥
इस प्रकार महात्मा भरतने क्षणभर में तीन करोड़ गन्धर्वो-का संहार कर डाला । वे गन्धर्व कालपाशसे बद्ध हो संवर्तास्त्र-से विदीर्ण कर डाले गये ॥ ८ ॥
तद् युद्धं तादृशं घोरं न स्मरन्ति दिवौकसः ।
निमेषान्तरमात्रेण तादृशानां महात्मनाम् ॥ ९ ॥
हतेषु तेषु सर्वेषु भरतः केकयीसुतः ।
निवेशयामास तदा समृद्धे द्वे पुरोत्तमे ॥ १० ॥
ऐसा भयंकर युद्ध देवताओंने भी कभी देखा हो, यह उन्हें याद नहीं आता था । पलक मारते - मारते वैसे पराक्रमी
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१६६४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे महामनस्वी समस्त गन्धर्वोंका संहार हो जानेपर कैकेयी कुमार भरतने उस समय वहाँ दो समृद्धिशाली सुन्दर नगर बसाये ॥ ९ -१० ॥
तक्षं तक्षशिलायां तु पुष्कलं पुष्कलावते ।
गन्धर्वदेशे रुचिरे गान्धारविषये च सः ॥ ११ ॥
मनोहर गन्धर्वदेश में तक्षशिला नामकी नगरी बसाकर उसमें उन्होंने तक्षको राजा बनाया और गान्धारदेशमें पुष्कलावत नगर बसाकर उसका राज्य पुष्कलको सौंप दिया ॥११ ॥
काननैरुपशोभिते ।
अन्योन्यसंघर्ष कृते स्पर्धया गुणविस्तरैः ॥ १२ ॥
वे दोनों नगर धन - धान्य एवं रत्नसमूहों से भरे थे । अनेकानेक कानन उनकी शोभा बढ़ाते थे । गुणविस्तार की दृष्टिसे वे मानो परस्पर होड़ लगाकर संघर्षपूर्वक आगे बढ़ रहे थे ॥ १२ ॥
उभे सुरुचिरप्रख्ये व्यवहारैरकिल्बिषैः । दोनों नगरोंकी व्यवहार ( व्यापार ) नगर उधनों ( बाग -भरे - पूरे थे । उनके उभे पुरवरे गृहमुख्यैः दोनों श्रेष्ठ सुविभक्तान्तरापणे ॥ १३ ॥
शोभा परम मनोहर थी । दोनों स्थानोंका निष्कपट, शुद्ध एवं सरल था । दोनों ही बगीचों ) तथा नाना प्रकार की सवारियोंसे भीतर अलग - अलग कई बाजार थे ॥ १३ ॥
रम्ये विस्तरै रुपशोभिते ।
सुरुचिरैर्विमानैर्बहुभिर्वृते ॥ १४ ॥
पुरोंकी रमणीयता देखते ही बनती थी । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्बरामायण आदिकाव्यके अनेक ऐसे विस्तृत पदार्थं उनकी शोभा बढ़ाते थे, जिनका नाम अभीतक नहीं लिया गया है । सुन्दर श्रेष्ठ गृह तथा बहुत - से सतमहले मकान वहाँकी श्रीवृद्धि कर रहे थे ॥ १४ ॥
शोभिते शोभनीयैश्च देवायतनविस्तरैः ।
तालैस्तमालैस्तिलकै र्बकुलैरुपशोभिते ॥ १५ ॥
अनेकानेक शोभासम्पन्न देवमन्दिरों तथा ताल, तमाल, तिलक और मौलसिरी आदिके वृक्षोंसे भी उन दोनों नगरोंकी शोभा एवं रमणीयता बढ़ गयी थी ॥ १५ ॥
निवेश्य पञ्चभिर्वर्षैर्भरतो राघवानुजः ।
पुनरायान्महाबाहुर योध्यां केकीसुतः ॥ १६ ॥
पाँच वर्षोंमें उन राजधानियोंको अच्छी तरह आबाद करके श्रीरामके छोटे भाई कैकेयीकुमार महाबाहु भरत फिर अयोध्या में लौट आये ॥ १६ ॥
सोऽभिवाद्य महात्मानं साक्षाद्धर्ममिवापरम् ।
राघवं भरतः श्रीमान् ब्रह्माणमिव वासवः ॥ १७ ॥
वहाँ पहुँचकर श्रीमान् भरतने द्वितीय धर्मराजके समान महात्मा श्रीरघुनाथजीको उसी तरह प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्माजीको प्रणाम करते हैं ॥ १७ ॥
शशंस च यथावृत्तं गन्धर्ववधमुत्तमम् ।
निवेशनं च देशस्य श्रुत्वा प्रीतोऽस्य राघवः ॥ १८ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने गन्धर्वोके वध और उस देशको अच्छी तरह आबाद करनेका यथावत् समाचार कह सुनाया । सुनकर श्रीरघुनाथजी उनपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १८ ॥
उत्तरकाण्डे एकाधिकशततमः सर्गः ॥ १०१ ॥
उत्तरकाण्डमें एक सौ एकवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०१ ॥
द्वयधिकशततमः सर्गः श्रीरामकी आज्ञा से भरत और लक्ष्मणद्वारा कुमार अङ्गद और चन्द्रकेतुकी कारुपथ देश के विभिन्न राज्योंपर नियुक्ति तच्छ्रुत्वा हर्षमापेदे राघवो भ्रातृभिः सह । लिये किसी अच्छे देशका चुनाव करो, जो रमणीय होने के वाक्यं चाद्भुतसंकाशं भ्रातृन् प्रोवाच राघवः ॥ १ ॥ साथ ही विघ्न बाधाओंसे रहित हो और जहाँ ये दोनों
भरत के मुँह से गन्धर्वदेशका समाचार सुनकर भाइयोंसहित धनुर्धर वीर आनन्दपूर्वक रह सकें ॥ ३ ॥
श्रीरामचन्द्रजी को बड़ी प्रसन्नता हुई । तत्पश्चात् श्रीराघवेन्द्र न राज्ञां यत्र पीडा स्यान्नाश्रमाणां विनाशनम् । अपने भाइयोंसे यह अद्भुत वचन बोले – ॥ १ ॥
इमौ कुमारी सौमित्रे तव धर्मविशारदौ ।
अङ्गदञ्चन्द्रकेतुश्च राज्यार्थे दृढविक्रमौ ॥
‘ सुमित्रानन्दन! तुम्हारे ये दोनों कुमार अङ्गद चन्द्रकेतु धर्मके ज्ञाता हैं । इनमें राज्यकी रक्षा के उपयुक्त दृढ़ता और पराक्रम है ॥ २ ॥
इमौ राज्येऽभिषेक्ष्यामि देशः साधु विधीयताम् ।
रमणीयो ह्यसम्बाधो रमेतां यत्र धन्विनौ ॥
' अतः मैं इनका भी राज्याभिषेक करूँगा । तुम स देशो दृश्यतां सौम्य नापराध्यामहे यथा ॥ ४ ॥
" सौम्य! ऐसा देश देखो, जहाँ निवास करने से दूसरे २ ॥ राजाओंको पीड़ा या उद्वेग न हो, आश्रमोंका भी नाश न और करना पड़े और हमलोगों को किसीकी दृष्टिमें अपराधी भी न लिये बनना पड़े ' ॥ ४ ॥
तथोक्तवति रामे तु भरतः प्रत्युवाच ह ।
३ ॥ अयं कारुपयो देशो रमणीयो निरामयः ॥ ५ ॥
इनके श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भरतने उत्तर दिया--
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उत्तरकाण्डे श्यधिकशततमः सर्गः १६६५ आर्य! यह कारुपथ नामक देश बड़ा सुन्दर है 1 । वहाँ किसी प्रकारकी रोग - व्याधिका भय नहीं है ॥ ५ ॥
निवेश्यतां तत्र पुरमङ्गदस्य महात्मनः ।
चन्द्रकेतोः सुरुचिरं चन्द्रकान्तं निरामयम् ॥ ६ ॥
" वहाँ महात्मा अङ्गदके लिये नयी राजधानी बसायी जाय तथा चन्द्रकेतु ( या चन्द्रकान्त ) के रहनेके लिये ' चन्द्र-कान्त ' नामक नगरका निर्माण कराया जाय, जो सुन्दर और आरोग्यवर्धक हो ' ॥ ६ ॥
तद् वाक्यं भरतेनोक्तं प्रतिजग्राह राघवः ।
तं च कृत्वा वशे देशमङ्गदस्य न्यवेशयत् ॥ ७ ॥
भरतकी कही हुई इस बात को श्रीरघुनाथजीने स्वीकार किया और कारूपथ देशको अपने अधिकारमें करके अङ्गद-को वहाँका राजा बना दिया ॥ ७ ॥
अङ्गदीया पुरी रम्याप्यङ्गदस्य निवेशिता ।
रमणीया सुगुप्ता च रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ८ ॥
क्लेशरहित कर्म करनेवाले भगवान् श्रीरामने अङ्गदके लिये ' अङ्गदीया ' नामक रमणीय पुरी बसायी, जो परम सुन्दर होने के साथ ही सब ओरसे सुरक्षित भी थी ॥ ८ ॥
चन्द्रकेतोश्च मल्लस्य मल्लभूम्यां निवेशिता ।
चन्द्रकान्तेति विख्याता दिव्या स्वर्गपुरी यथा ॥ ९ ॥
चन्द्रकेतु अपने शरीरसे मल्लके समान हृष्ट - पुष्ट थे; उनके लिये मल्ल देशमें ‘ चन्द्रकान्ता ' नामसे विख्यात दिव्य पुरी बसायी गयी, जो स्वर्गकी अमरावती नगरीके समान सुन्दर थी ॥ ९ ॥
ततो रामः परां प्रीतिं लक्ष्मणो भरतस्तथा ।
ययुर्युद्धे दुराधर्षा अभिषेकं च चक्रिरे ॥ १० ॥
इससे श्रीराम, लक्ष्मण और भरत तीनोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन सभी रणदुर्जय वीरोंने स्वयं उन कुमारोंका अभिषेक किया ॥ १० ॥
अभिषिच्य कुमारौ द्वौ प्रस्थाप्य सुसमाहितौ ।
अङ्गदं पश्चिमां भूमिं चन्द्रकेतुमुदङ्मुखम् ॥ ११ ॥
एकाग्रचित्त तथा सावधान रहनेवाले उन दोनों कुमारों-का अभिषेक करके अङ्गदको पश्चिम तथा चन्द्रकेतुको उत्तर दिशामें भेजा गया ॥ ११ ॥
अङ्गदं चापि सौमित्रिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये चन्द्रकेतोस्तु भरतः पाणिग्राहो बभूव ह ॥ १२ ॥
अङ्गदके साथ तो स्वयं सुमित्रा कुमार लक्ष्मण गये और चन्द्रकेतुके सहायक या पार्श्वक भरतजी हुए ॥ १२ ॥
लक्ष्मणस्त्वङ्गदीयायां संवत्सरमथोषितः ।
पुत्रे स्थिते दुराधर्षे अयोध्यां पुनरागमत् ॥ १३ ॥
लक्ष्मण अङ्गदीया पुरीमें एक वर्षतक रहे और उनका दुर्धर्ष पुत्र अङ्गद जब दृढ़तापूर्वक राज्य सँभालने लगा, तब वे पुनः अयोध्याको लौट आये ॥ १३ ॥
भरतोऽपि तथैवोप्य संवत्सरमतोऽधिकम् ।
अयोध्यां पुनरागम्य रामपादावुपास्त सः ॥ १४ ॥
इसी प्रकार भरत भी चन्द्रकान्ता नगरी में एक वर्षसे कुछ अधिक कालतक ठहरे रहे और चन्द्रकेतुका राज्य जब दृढ़ हो गया, तब वे पुनः अयोध्या में आकर श्रीरामचन्द्रजी के चरणों की सेवा करने लगे ॥ १४ ॥
उभौ सौमित्रिभरतौ रामपादावनुव्रतौ ।
कालं गतमपि स्नेहान्न जशातेऽतिधार्मिकौ ॥ १५ ॥
लक्ष्मण और भरत दोनोंका श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनन्य अनुराग था । दोनों ही अत्यन्त धर्मात्मा थे । श्रीराम-की सेवामें रहते उन्हें बहुत समय बीत गया, परंतु स्नेहाधिक्य के कारण उनको कुछ भी ज्ञात न हुआ ॥ १५ ॥
एवं वर्षसहस्राणि दश तेषां ययुस्तदा ।
धर्मे प्रयतमानानां पौरकार्येषु नित्यदा ॥ १६ ॥
वे तीनों भाई पुरवासियोंके कार्य में सदा संलग्न रहते और धर्मपालन के लिये प्रयत्नशील रहा करते थे । इस प्रकार उनके दस हजार वर्ष बीत गये ॥ १६ ॥
विहृत्य कालं परिपूर्ण मानसाः श्रिया वृता धर्मपुरे च संस्थिताः । त्रयः समिद्धाहुतिदीप्ततेजसो हुताग्नयः साधुमहाध्वरे त्रयः ॥ १७ ॥
धर्म - साधनके स्थानभूत अयोध्यापुरीमें वैभवसम्पन्न होकर रहते हुए वे तीनों भाई यथासमय घूम - फिरकर प्रजाकी देख-भाल करते थे । उनके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये थे तथा वे महायज्ञ में आहुति पाकर प्रज्वलित हुए दीप्त तेजस्वी गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण नामक त्रिविध अग्नियोंके समान प्रकाशित होते थे ॥ १७ ॥
उत्तरकाण्डे द्वयधिकशततमः सर्गः ॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ दोवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०२ ॥
त्र्यधिकशततमः सर्गः श्रीरामके यहाँ कालका आगमन और एक कठोर शर्त के साथ उनका वार्ताके लिये उद्यत होना कस्यचित् त्वथ कालस्य रामे धर्मपरे स्थिते । श्रीराम धर्मपूर्वक अयोध्या के राज्यका पालन कर रहे थे, कालस्तापसरूपेण राजद्वारमुपागमत् ॥ १ ॥ साक्षात् काल तपस्वी के रूपमें राजभवन के द्वारपर आया ॥ १ ॥
तदनन्तर कुछ समय और बीत जानेपर जब कि भगवान् सोऽब्रवील्लक्ष्मणं वाक्यं धृतिमन्तं यशखिनम् । वा ० रा ० ५. १२. ११–
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१६६६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मां निवेदय रामाय सम्प्राप्तं कार्यगौरवात् ॥ २ ॥
उसने द्वारपर खड़े हुए धैर्यवान् एवं यशस्वी लक्ष्मण से कहा- " मैं एक भारी कार्य से आया हूँ । तुम श्रीरामचन्द्रजीसे मेरे आगमन की सूचना दे दो ॥ २ ॥
दूतो ह्यतिवलस्याहं महर्षेर मितौजसः ।
रामं दिदृक्षुरायातः कार्येण हि महाबल ॥ ३ ॥
' महावली लक्ष्मण! मैं अमित तेजखी महर्षि अतिबलका दूत हूँ और एक आवश्यक कार्यवश श्रीरामचन्द्रजीसे मिलने आया हूँ ' ॥ ३ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सौमित्रिस्त्वरयान्वितः ।
न्यवेदयत रामाय तापसं तं समागतम् ॥ ४ ॥
उसकी वह बात सुनकर सुमित्रा कुमार लक्ष्मणने बड़ी उता-वलीके साथ भीतर जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे उस तापसके आग-मनकी सूचना दी -- ॥ ४ ॥
जयस्व राजधर्मेण उभौ लोकौ महाद्युते ।
दूतस्त्वां द्रष्टुमायातस्तपसा भास्करप्रभः ॥ ५ ॥
' महातेजस्वी महाराज! आप अपने राजधर्मके प्रभावसे इहलोक और परलोकपर भी विजयी हों । एक महर्षि दूतके रूपमें आपसे मिलने आये हैं । वे तपस्याजनित तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे हैं ' ॥ ५ ॥
तद् वाक्यं लक्ष्मणोक्तं वै श्रुत्वा राम उवाच ह ।
प्रवेश्यतां मुनिस्तात महौजास्तस्य वाक्यधृक् ॥ ६ ॥
लक्ष्मण की कही हुई वह बात सुनकर श्रीरामने कहा--' तात! उन महातेजस्त्री मुनिको भीतर ले आओ, जो कि अपने स्वामीके संदेश लेकर आये हैं ' ॥ ६ ॥
सौमित्रिस्तु तथेत्युक्त्वा प्रावेशयत तं मुनिम् ।
ज्वलन्तमेव तेजोभिः प्रदहन्तमिवांशुभिः ॥ ७ ॥
तब ' जो आज्ञा ' कहकर सुमित्राकुमार उन मुनिको भीतर ले आये । वे तेजसे प्रज्वलित होते और अपनी प्रखर किरणों से दग्ध करते हुए - से जान पड़ते थे ॥ ७ ॥
सोऽभिगम्य रघुश्रेष्ठं दीप्यमानं खतेजसा ।
ऋषिर्मधुरया वाचा वर्धस्वेत्याह राघवम् ॥ ८ ॥
अपने तेजसे दीप्तिमान् रघुकुलतिलक श्रीराम के पास पहुँचकर ऋषिने उनसे मधुर वाणीमें कहा -- रघुनन्दन! आपका अभ्युदय हो ' ॥ ८ ॥
तस्मै रामो महातेजाः पूजामर्घ्य पुरोगमाम् ।
ददौ कुशलमव्ययं प्रष्टुं चैवोपचक्रमे ॥ ९ ॥
महातेजस्वी श्रीरामने उन्हें पाद्य- अर्घ्य आदि पूजनोप-चार समर्पित किया और शान्तभावसे उनका कुशल- समाचार पूछना आरम्भ किया ॥ ९ ॥
पृष्टश्च कुशलं तेन रामेण वदतां वरः ।
आसने काञ्चने दिव्ये निषसाद महायशाः ॥ १० ॥
श्रीरामके पूछने पर वक्ताओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी मुनि कुशल-समाचार बताकर दिव्य सुवर्णमय आसनपर विराजमान हुए |
तमुवाच ततो रामः स्वागतं ते महामते ।
प्रापयास्य च वाक्यानि यतो दूतस्त्वमागतः ॥ ११ ॥
तदनन्तर श्रीरामने उनसे कहा- ' महामते! आपका स्वागत है । आप जिनके दूत होकर यहाँ पधारे हैं, उनका संदेश सुनाइये ॥ ११ ॥
चोदितो राजसिंहेन निर्वाक्यमभाषत ।
द्वन्द्वे ह्येतत् प्रवक्तव्यं हितं वै यद्यवेक्षसे ॥ १२ ॥
राजसिंह श्रीराम के द्वारा इस प्रकार प्रेरित होनेपर मुनि बोले -- " यदि आप हमारे हितपर दृष्टि रक्खें तो जहाँ हम और आप दो ही आदमी रहें, वहीं इस बातको कहना उचित है ॥
यः शृणोति निरीक्षेद्वा स वध्यो भविता तव ।
भवेद् वै मुनिमुख्यस्य वचनं यद्यवेक्षसे ॥ १३ ॥
" यदि आप मुनिश्रेष्ठ अतिबलके वचनपर ध्यान दें तो आपको यह भी घोषित करना होगा कि जो कोई मनुष्य हम दोनोंकी बातचीत सुन ले अथवा हमें वार्तालाप करते देख ले, वह आप ( श्रीराम ) का वध्य होगा ॥ १३ ॥
तथेति च प्रतिज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
द्वारि तिष्ठ महाबाहो प्रतिहारं विसर्जय ॥ १४ ॥
श्रीरामने ' तथास्तु ' कहकर इस बात के लिये प्रतिज्ञा की और लक्ष्मणसे कहा -- " महाबाहो! द्वारपालको बिदा कर दो और स्वयं ड्योढ़ीपर खड़े होकर पहरा दो ॥ १४ ॥
स मे वध्यः खलु भवेद् वाचं द्वन्द्वसमीरितम् ।
ऋषेर्मम च सौमित्रे पश्येद् वा शृणुयाच्च यः ॥ १५ ॥
' सुमित्रानन्दन! जो ऋषि और मेरी — दोनोंकी कही हुई बात सुन लेगा या बात करते हमें देख लेगा, वह मेरेद्वारा मारा जायगा ' ॥ १५ ॥
ततो निक्षिप्य काकुत्स्थो लक्ष्मणं द्वारि संग्रहम् ।
तमुवाच मुने वाक्यं कथयस्वेति राघवः ॥ १६ ॥
तत् ते मनीषितं वाक्यं येन वासि समाहितः ।
कथयस्वाविशङ्कस्त्वं ममापि हृदि वर्तते ॥ १७ ॥
इस प्रकार अपनी बात ग्रहण करनेवाले लक्ष्मणको दरवाजे-पर तैनात करके श्रीरघुनाथजीने समागत महर्षिसे कहा--" मुने! अब आप निःशङ्क होकर वह बात कहिये, जिसे कहना आपको अभीष्ट है अथवा जिसे कहने के लिये ही आप यहाँ भेजे गये हैं । मेरे हृदयमें भी उसे सुनने के लिये उत्कण्ठा है ' ॥ १६-१७ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे व्यधिकशततमः सर्गः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०३ ॥
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उत्तरकाण्डे चतुरधिकशततमः सर्गः १६६७ चतुरधिकशततमः सर्गः कालका श्रीरामचन्द्रजीको ब्रह्माजीका संदेश
शृणु राजन् महासत्त्व यदर्थमहमागतः ।
पितामहेन देवेन प्रेषितोऽस्मि महावल ॥ १ ॥
महाबली महान् सत्त्वशाली महाराज! पितामह भगवान् ब्रह्माने जिस उद्देश्यसे मुझे यहाँ भेजा है और जिसके लिये मैं यहाँ आया हूँ; वह सब बताता हूँ; सुनिये ॥ १ ॥
तवाहं पूर्वके भावे पुत्रः परपुरंजय ।
मायासम्भावितो वीर कालः सर्वसमाहरः ॥ २ ॥
शत्रु - नगरीपर विजय पानेवाले वीर! पूर्वावस्थामें अर्थात् हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति के समय मैं मायाद्वारा आपसे उत्पन्न हुआ था, इसलिये आपका पुत्र हूँ । मुझे सर्व संहारकारी काल कहते हैं ॥ २ ॥
पितामहश्च भगवानाह लोकपतिः प्रभुः ।
समयस्ते कृतः सौम्य लोकान् सम्परिरक्षितुम् ॥ ३ ॥
लोकनाथ प्रभु भगवान् पितामहने कहा है कि ' सौम्य! आपने लोकोंकी रक्षाके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, वह पूरी हो गयी ॥ ३ ॥
संक्षिप्य हि पुरा लोकान् मायया स्वयमेव हि ।
महार्णवे शयानोऽप्सु मां त्वं पूर्वमजीजनः ॥ ४ ॥
" पूर्वकालमें समस्त लोकोंको मायाके द्वारा स्वयं ही अपने-में लीन करके आपने महासमुद्र के जलमें शयन किया था । फिर इस सृष्टिके प्रारम्भमें सबसे पहले मुझे उत्पन्न किया ॥ ४ ॥
भोगवन्तं ततो नागमनन्तमुदकेशयम् ।
मायया जनयित्वा त्वं द्वौ च सत्त्वौ महाबलौ ॥ ५ ॥
मधुं च कैटभं चैव ययोरस्थिचयैर्वृता ।
इयं पर्वतसम्बाधा मेदिनी चाभवत् तदा ॥ ६ ॥
' इसके बाद विशाल फण और शरीरसे युक्त एवं जलमें शयन करनेवाले ' अनन्त ' संज्ञक नागको मायाद्वारा प्रकट करके आपने दो महाबली जीवोंको जन्म दिया, जिनका नाम था मधु और कैटभ इन्हींके अस्थि - समूहोंसे भरी हुई यह पर्वतोंसहित पृथिवी तत्काल प्रकट हुई, जो ' मेदिनी ' कहलायी ॥ ५-६ ॥
पद्मे दिव्येऽर्कसंकाशे नाभ्यामुत्पाद्य मामपि ।
प्राजापत्यं त्वया कर्म मयि सर्व निवेशितम् ॥ ७ ॥
' आपकी नाभिसे सूर्य - तुल्य तेजस्वी दिव्य कमल प्रकट हुआ, जिसमें आपने मुझको भी उत्पन्न किया और प्रजाकी सृष्टि रचनेका सारा कार्यभार मुझपर ही रख दिया ॥ ७ ॥
सोऽहं संन्यस्तभारो हि त्वामुपास्य जगत्पतिम् ।
रक्षां विधत्स्व भूतेषु मम तेजस्करो भवान् ॥ ८ ॥
' जब मुझपर यह भार रख दिया गया, तब मैंने आप जगदीश्वरकी उपासना करके प्रार्थना की- " प्रभो! आप सुनाना और श्रीरामका उसे स्वीकार करना सम्पूर्ण भूतों में रहकर उनकी रक्षा कीजिये; क्योंकि आप ही मुझे तेज ( ज्ञान और क्रिया - शक्ति ) प्रदान करनेवाले हैं ' ॥ ८ ॥
ततस्त्वमसि दुर्धर्षात् तस्माद् भावात् सनातनात् ।
रक्षां विधास्यन् भूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् ॥ ९ ॥
' तब आप मेरा अनुरोध स्वीकार करके प्राणियोंकी रक्षा के लिये अपरिमेय सनातन पुरुषरूपसे जगत्पालक विष्णु के रूपमें प्रकट हुए ॥ ९ ॥
अदित्यां वीर्यवान् पुत्रो भ्रातॄणां वीर्यवर्धनः ।
समुत्पन्नेषु कृत्येषु तेषां साह्याय कल्पसे ॥ १० ॥
" फिर आपने ही अदिति के गर्भसे परम पराक्रमी वामन-रूपमें अवतार लिया । तबसे आप अपने भाई इन्द्रादि देवताओं-की शक्ति बढ़ाते और आवश्यकता पड़ने पर उनकी रक्षाके लिये उद्यत रहते हैं ॥ १० ॥
स त्वमुज्जास्यमानासु प्रजासु जगतां वर ।
रावणस्य वधाकाङ्क्षी मानुषेषु मनोऽदधाः ॥ ११ ॥
' जगदीश्वर! जब रावणके द्वारा प्रजाका विनाश होने लगा, उस समय आपने उस निशाचरका वध करने की इच्छा से मनुष्य शरीर में अवतार लेनेका निश्चय किया ॥ ११ ॥
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
कृत्वा वासस्य नियमं स्वयमेवात्मना पुरा ॥ १२ ॥
' और स्वयं ही ग्यारह हजार वर्षोंतक मर्त्यलोक में निवास करनेकी अवधि निश्चित की थी ॥ १२ ॥
स त्वं मनोमयः पुत्रः पूर्णायुर्मानुषेष्विह ।
कालोऽयं ते नरश्रेष्ठ समीपमुपवर्तितुम् ॥ १३ ॥
' नरश्रेष्ठ! आप मनुष्य - लोकमें अपने संकल्पसे ही किसीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए हैं । इस अवतारमें आपने अपनी जितने समय तककी आयु निश्चित की थी, वह पूरी हो गयी; अतः अब आपके लिये यह हमलोगोंके समीप आने का समय है ॥
यदि भूयो महाराज प्रजा इच्छस्युपासितुम् ।
वस वा वीर भद्रं ते एवमाह पितामहः ॥ १४ ॥
अथ वा विजिगीषा ते सुरलोकाय राघव ।
सनाथा विष्णुना देवा भवन्तु विगतज्वराः ॥ १५ ॥
' वीर महाराज! यदि और अधिक कालतक यहाँ रहकर प्रजाजनोंका पालन करनेकी इच्छा हो तो आप रह सकते हैं । आपका कल्याण हो । रघुनन्दन! अथवा यदि परमधाम-में पधारनेका विचार हो तो अवश्य आवें । आप विष्णुदेव के स्वधाममें प्रतिष्ठित होनेपर सम्पूर्ण देवता सनाथ एवं निश्चिन्त हो जायँ — ऐसा पितामहने कहा है ' ॥ १४-१५ ॥
श्रुत्वा पितामहेनोकं वाक्यं कालसमीरितम् ।
राघवः प्रहसन् वाक्यं सर्वसंहारमब्रवीत् ॥ १६ ॥
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१६६८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे कालके मुखसे कहे गये पितामह ब्रह्माके संदेशको सुनकर श्रीरघुनाथजी हँसते हुए उस सर्वसंहारी कालसे बोले –॥१६ ॥
श्रुत्वा मे देवदेवस्य वाक्यं परममद्भुतम् ।
प्रीतिर्हि महती जाता तवागमनसम्भवा ॥ १७ ॥
" काल! देवाधिदेव ब्रह्माजीका यह परम अद्भुत वचन सुनने को मिला; इसलिये तुम्हारे आनेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ १७ ॥.
त्रयाणामपि लोकानां कार्यार्थ मम सम्भवः ।
भद्रं तेऽस्तु गमिष्यामि यत एवाहमागतः ॥ १८ ॥
" तीनों लोकोंके प्रयोजनकी सिद्धि के लिये ही मेरा यह इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके अवतार हुआ था, वह उद्देश्य अब पूरा हो गया; इसलिये तुम्हारा कल्याण हो; अब मैं जहाँसे आया था वहीं चलूँगा ॥ हृद्रतो ह्यसि सम्प्राप्तो न मे तत्र विचारणा ।
मया हि सर्वकृत्येषु देवानां वशवर्तिना ।
स्थातव्यं सर्वसंहार यथा ह्याह पितामहः ॥ १ ९ ॥
' काल! मैंने मनसे तुम्हारा चिन्तन किया था । उसीके अनुसार तुम यहाँ आये हो; अतः इस विषय को लेकर मेरे मन में कोई विचार नहीं है । सर्वसंहारकारी काल! मुझे सभी कार्यों में सदा देवताओंका वशवर्ती होकर ही रहना चाहिये, जैसा कि पितामहका कथन है ' ॥ १ ९ ॥ उत्तरकाण्डे चतुरधिकशततमः सर्गः ॥ १०४ ॥
उत्तरकाण्डमें एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०४ ॥
पञ्चाधिकशततमः सर्गः दुर्वासा के शाप के भय से लक्ष्मणका नियम भङ्ग करके श्रीराम के पास इनके आगमनका समाचार देने के लिये जाना, श्रीरामका दुर्वासा मुनिको भोजन कराना और उनके चले जाने पर लक्ष्मणके लिये चिन्तित होना
तथा तयोः संवदतो दुर्वासा भगवानृषिः ।
रामस्य दर्शनाकाङ्क्षी राजद्वारमुपागमत् ॥ १ ॥
इन दोनों में इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि महर्षि दुर्वासा राजद्वारपर आ पहुँचे । वे श्रीरामचन्द्रजीसे मिलना चाहते थे ॥ १ ॥
सोऽभिगम्य तु सौमित्रिमुवाच ऋषिसत्तमः ।
रामं दर्शय मे शीघ्रं पुरा मेऽर्थोऽतिवर्तते ॥ २ ॥
उन मुनिश्रेष्ठ सुमित्राकुमार लक्ष्मणके पास जाकर कहा — ' तुम शीघ्र ही मुझे श्रीरामचन्द्रजीसे मिला दो । उनसे मिले बिना मेरा एक काम बिगड़ रहा है ' ॥ २ ॥
मुनेस्तु भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा ।
अभिवाद्य महात्मानं वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ३ ॥
मुनकी यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने उन महात्माको प्रणाम करके यह बात कही -- ॥३ ॥
किं कार्य ब्रूहि भगवन् को ह्यर्थः किं करोम्यहम् ।
व्यो हि राघवो ब्रह्मन् मुहूर्ते परिपाल्यताम् ॥ ४ ॥
' भगवन्! बताइये, आपका कौन - सा काम है? क्या प्रयोजन है? और मैं आपकी कौन - सी सेवा करूँ? ब्रह्मन्! इस समय श्रीरघुनाथजी दूसरे कार्य में संलग्न हैं; अतः दो घड़ीतक उनकी प्रतीक्षा कीजिये ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा ऋषिशार्दूलः क्रोधेन कलुषीकृतः ।
उवाच लक्ष्मणं वाक्यं निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ ५ ॥
यह सुनकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा रोषसे तमतमा उठे और लक्ष्मणकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो अपनी नेत्राग्निसे
उन्हें भस्म कर डालेंगे । साथ ही उनसे इस प्रकार बोले - ॥५ ॥
अस्मिन् क्षणे मां सौमित्रे रामाय प्रतिवेदय ।
अस्मिन् क्षणे मां सौमित्रे न निवेदयसे यदि ।
विषयं त्वां पुरं चैव शपिष्ये राघवं तथा ॥ ६ ॥
भरतं चैव सौमित्रे युष्माकं या च संततिः ।
न हि शक्ष्याम्यहं भूयो मन्युं धारयितुं हृदि ॥ ७ ॥
' सुमित्रा कुमार! इसी क्षण श्रीरामको मेरे आगमन की सूचना । यदि अभी - अभी उनसे मेरे आगमनका समाचार नहीं निवेदन करोगे तो मैं इस राज्यको, नगरको, तुमको, श्रीरामको, भरतको और तुमलोगोंकी जो संतति है, उसको भी शाप दे दूँगा । मैं पुनः इस क्रोधको अपने हृदयमें धारण नहीं कर सकूँगा ' ॥ ६-७ ॥
तच्छ्रुत्वा घोरसंकाशं वाक्यं तस्य महात्मनः ।
चिन्तयामास मनसा तस्य वाक्यस्य निश्चयम् ॥ ८ ॥
उन महात्मा का यह घोर वचन सुनकर लक्ष्मणने उनकी वाणीसे जो निश्चय प्रकट हो रहा था, उसपर मन - ही - मन विचार किया ॥ ८ ॥
एकस्य मरणं मेऽस्तु मा भूत् सर्वविनाशनम् ।
इति बुद्धया विनिश्चित्य राघवाय न्यवेदयत् ॥ ९ ॥
' अकेले मेरी ही मृत्यु हो, यह अच्छा है; किंतु सबका विनाश नहीं होना चाहिये ' अपनी बुद्धिद्वारा ऐसा निश्चय करके लक्ष्मणने श्रीरघुनाथजीसे दुर्वासा के आगमन का समाचार निवेदन किया ॥ ९ ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा रामः कालं विसृज्य च ।
निःसृत्य त्वरितो राजा अत्रेः पुत्रं ददर्श ह ॥ १० ॥
लक्ष्मण की बात सुनकर राजा श्रीराम कालको बिदा करके
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उत्तरकाण्डे षडधिकशततमः सर्गः तुरंत ही निकले और अत्रिपुत्र दुर्वासासे मिले ॥ १० ॥
सोऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा ।
किं कार्यमिति काकुत्स्थः कृताञ्जलिरभाषत ॥ ११ ॥
अपने तेजसे प्रज्वलित - से होते हुए महात्मा दुर्वासाको प्रणाम करके श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर पूछा - ' महर्षे! मेरे लिये क्या आज्ञा है? ' ॥ ११ ॥
तद् वाक्यं राघवेणोक्तं श्रुत्वा मुनिवरः प्रभुः ।
प्रत्याह रामं दुर्वासाः श्रूयतां धर्मवत्सल ॥ १२ ॥
श्रीरघुनाथजीकी कही हुई उस बातको सुनकर प्रभाव शाली मुनिवर दुर्वासा उनसे बोले – “ धर्मंवत्सल! सुनिये ॥१२ ॥
अद्य वर्षसहस्रस्य समाप्तिर्मम राघव ।
सोऽहं भोजनमिच्छामि यथासिद्धं तवानघ ॥ १३ ॥
' निष्पाप रघुनन्दन! मैंने एक हजार वर्षोंतक उपवास किया । आज मेरे उस व्रतकी समाप्तिका दिन है, इसलिये इस समय आपके यहाँ जो भी भोजन तैयार हो, उसे मैं ग्रहण करना चाहता हूँ ' ॥ १३ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राजा राघवः प्रीतमानसः ।
भोजनं मुनिमुख्याय यथासिद्धमुपाहरत् ॥ १४ ॥
यह सुनकर राजा श्रीरघुनाथजी मन - ही - मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उन मुनिश्रेष्ठको तैयार भोजन परोसा ॥१४ ॥
स तु भुक्त्वा मुनिश्रेष्ठस्तदन्नममृतोपमम् । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये १६६ ९ साधु रामेति सम्भाष्य स्वमाश्रममुपागमत् ॥ १५ ॥
वह अमृत के समान अन्न ग्रहण करके दुर्वासा मुनि तृप्त हुए और श्रीरघुनाथजीको साधुवाद दे अपने आश्रमपर चले आये ॥ १५ ॥
तस्मिन् गते मुनिवरे स्वाश्रमं लक्ष्मणाग्रजः ।
संस्मृत्य कालवाक्यानि ततो दुःखमुपागमत् ॥ १६ ॥
मुनिवर दुर्वासाके अपने आश्रमको चले जानेपर लक्ष्मण-के बड़े भाई श्रीराम कालके वचनोंका स्मरण करके दुखी हो गये ॥ १६ ॥
दुःखेन च सुसंतप्तः स्मृत्वा तद्घोरदर्शनम् ।
अवाङ्मुखो दीनमना व्याहर्तुं न शशाक ह ॥ १७ ॥
भयंकर भावी भ्रातृवियोगके दृश्यको दृष्टिपथमें लानेवाले कालके उस वचनपर विचार करके श्रीरामके मनमें बड़ा दुःख हुआ । उनका मुँह नीचेको झुक गया और वे कुछ बोल न सके ॥ १७ ॥
ततो बुद्धया विनिश्चित्य कालवाक्यानि राघवः ।
नैतदस्तीति निश्चित्य तूष्णीमासीन्महायशाः ॥ १८ ॥
तत्पश्चात् कालके वचनोंपर बुद्धिपूर्वक सोच - विचार करके महायशस्वी श्रीरघुनाथजी इस निर्णयपर पहुँचे कि ' अब यह सब कुछ भी न रहेगा । ' ऐसा सोचकर वे चुप हो रहे ॥ १८ ॥
उत्तरकाण्डे पञ्चाधिकशततमः सर्गः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
षडधिकशततमः सर्गः श्रीरामके त्याग देने पर लक्ष्मणका सशरीर स्वर्गगमन
अवाङ्मुखमथो दीनं दृष्ट्वा सोममिवाप्लुतम् ।
राघवं लक्ष्मणो वाक्यं हृष्टो मधुरमब्रवीत् ॥ १ ॥
श्रीरामचन्द्रजी राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान दीन हो गये थे, उन्हें सिर झुकाये खेद करते देख लक्ष्मणने बड़े हर्षके साथ मधुर वाणीमें कहा – ॥ १ ॥
न संतापं महाबाहो मदर्थं कर्तुमर्हसि ।
पूर्वनिर्माणबद्धा हि कालस्य गतिरीदृशी ॥ २ ॥
‘ महाबाहो! आपको मेरे लिये संताप नहीं करना चाहिये; क्योंकि पूर्वजन्मके कर्मोंसे बँधी हुई कालकी गति ऐसी ही है ॥
जहि मां सौम्य विस्रब्धं प्रतिज्ञां परिपालय ।
हीनप्रतिज्ञाः काकुत्स्थ प्रयान्ति नरकं नराः ॥ ३ ॥
‘ सौम्य! आप निश्चिन्त होकर मेरा वध कर डालें और ऐसा करके अपनी प्रतिज्ञाका पालन करें । काकुत्स्थ! प्रतिज्ञा भङ्ग करनेवाले मनुष्य नरकमें पड़ते हैं ॥ ३ ॥
यदि प्रीतिर्महाराज यद्यनुग्राह्यता मयि ।
जहि मां निर्विशङ्कस्त्वं धर्मे वर्धय राघव ॥ ४ ॥
' महाराज! यदि आपका मुझपर प्रेम है और यदि आप
मुझे कृपापात्र समझते हैं तो निःशङ्क होकर मुझे प्राणदण्ड दें ।
रघुनन्दन! आप अपने धर्मकी वृद्धि करें ' ॥ ४ ॥
लक्ष्मणेन तथोक्तस्तु रामः प्रचलितेन्द्रियः ।
मन्त्रिणः समुपानीय तथैव च पुरोधसम् ॥ ५ ॥
अब्रवीच्च तदा वृत्तं तेषां मध्ये स राघवः ।
दुर्वासोऽभिगमं चैव प्रतिज्ञां तापसस्य च ॥ ६ ॥
लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर श्रीरामकी इन्द्रियाँ चञ्चल हो उठीं — वे धैर्थसे विचलित - से हो गये और मन्त्रियों तथा पुरोहितजी को बुलाकर उन सबके बीचमें वह सारा वृत्तान्त बताने लगे । श्रीरघुनाथजीने दुर्वासाके आगमन और तापस-रूपधारी कालके समक्ष की हुई प्रतिज्ञाकी बात भी बतायी ॥
तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणः सर्वे सोपाध्यायाः समासत ।
वसिष्ठस्तु महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ७ ॥
यह सुनकर सब मन्त्री और उपाध्याय चुपचाप बैठे रह
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१६७० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे गये ( कोई कुछ बोल न सका ) । तब महातेजस्वी वसिष्ठजीने यह बात कही || ७ ||
टमेतन्महाबाहो क्षयं ते रोमहर्षणम् ।
लक्ष्मणेन वियोगश्च तव राम महायशः ॥ ८ ॥
' महाबाहो! महायशस्वी श्रीराम! इस समय जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला विकट विनाश आनेवाला है ( तुम्हारे साथ ही बहुत - से प्राणियोंका जो साकेत - गमन होनेवाला है ) और लक्ष्मणके साथ जो वियोग हो रहा है, यह सब मैंने तपोबल-द्वारा पहलेसे ही देख लिया है ॥ ८ ॥
त्यजैनं बलवान् कालो मा प्रतिज्ञां वृथा कृथाः ।
प्रतिज्ञायां हि नायां धर्मो हि विलयं व्रजेत् ॥ ९ ॥
' काल बड़ा प्रबल है । तुम लक्ष्मणका परित्याग कर दो । प्रतिशा झूठी न करो; क्योंकि प्रतिज्ञाके नष्ट होनेपर धर्मका लोप हो जायगा ॥ ९ ॥
ततो धर्मे विनष्टे तु त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
सदेवर्षिगणं सर्व विनश्येत् तु न संशयः ॥ १० ॥
' धर्मका लोप होनेपर चराचर प्राणियों, देवताओं तथा ऋषियोंसहित सारी त्रिलोकी नष्ट हो जायगी । इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥
सत्वं पुरुषशार्दूल त्रैलोक्यस्याभिपालनात् ।
लक्ष्मणेन विना चाद्य जगत् स्वस्थं कुरुष्व ह ॥ ११ ॥
' अतः पुरुषसिंह! तुम त्रिभुवनकी रक्षापर दृष्टि रखते हुए लक्ष्मणको त्याग दो और उनके बिना अब धर्मपूर्वक स्थित रहकर सम्पूर्ण जगत् को स्वस्थ एवं सुखी बनाओ ' ॥
तेषां तत् समवेतानां वाक्यं धर्मार्थसंहितम् ।
श्रुत्वा परिषदो मध्ये रामो लक्ष्मणमत्रवीत् ॥ १२ ॥
वहाँ एकत्र हुए मन्त्री, पुरोहित आदि सब सभासदोंकी उस सभाके बीच वसिष्ठ मुनिकी कही हुई वह बात सुनकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा – ॥ १२ ॥
विसर्जये त्वां सौमित्रे मा भूद् धर्मविपर्ययः ।
त्यागो वधो वा विहितः साधूनां ह्यभयं समम् ॥ १३ ॥
' सुमित्रानन्दन! मैं तुम्हारा परित्याग करता हूँ, जिससे धर्मका लोप न हो । साधु पुरुषों का त्याग किया जाय अथवा वध — दोनों समान ही हैं ' ॥ १३ ॥
रामेण भाषिते वाक्ये वाष्पव्याकुलितेन्द्रियः ।
लक्ष्मणस्त्वरितं प्रायात् स्वगृहं न विवेश ह ॥ १४ ॥
श्रीरामके इतना कहते ही लक्ष्मण के नेत्रों में आँसू भर आये । वे तुरंत वहाँसे चल दिये । अपने घर तक नहीं गये ॥ १४ ॥
स गत्वा सरयूतीरमुपस्पृश्य कृताञ्जलिः ।
निगृह्य सर्वस्रोतांसि निःश्वासं न मुमोच ह ॥ १५ ॥
सरयूके किनारे जाकर उन्होंने आचमन किया और हाथ जोड़ सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके प्राणवायुको रोक लिया ॥ १५ ॥
अनिःश्वसन्तं युक्तं तं सशक्राः साप्सरोगणाः ।
देवाः सर्षिगणाः सर्वे पुष्पैरभ्यकिरंस्तदा ॥ १६ ॥
लक्ष्मणने योगयुक्त होकर श्वास लेना बंद कर दिया है-यह देख इन्द्र आदि सब देवता, ऋषि और अप्सराएँ उस समय उनपर फूलोंकी वर्षा करने लगीं ॥ १६ ॥
अदृश्यं सर्वमनुजैः सशरीरं महाबलम् ।
प्रगृह्य लक्ष्मणं शक्रस्त्रिदिवं संविवेश ह ॥ १७ ॥
महाबली लक्ष्मण अपने शरीर के साथ ही सब मनुष्यों की दृष्टिसे ओझल हो गये । उस समय देवराज इन्द्र उन्हें साथ लेकर स्वर्ग में चले गये ॥ १७ ॥
ततो विष्णोश्चतुर्भागमागतं सुरसत्तमाः ।
हृष्टाः प्रमुदिताः सर्वे पूजयन्ति स्म राघवम् ॥ १८ ॥
भगवान् विष्णुके चतुर्थं अंश लक्ष्मणको आया देख सभी देवता हर्षसे भर गये और उन सबने प्रसन्नतापूर्वक लक्ष्मण की पूजा की ॥ १८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षडधिकशततमः सर्गः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ छवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०६ ॥
सप्ताधिकशततमः सर्गः वसिष्ठजी के कहने से श्रीरामका पुरवासियोंको अपने साथ ले जानेका विचार तथा कुश और लवका राज्याभिषेक करना
विसृज्य लक्ष्मणं रामो दुःखशोकसमन्वितः ।
पुरोधसं मन्त्रिणश्च नैगमांश्चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
लक्ष्मणका त्याग करके श्रीराम दुःख शोक में मग्न हो गये तथा पुरोहित, मन्त्री और महाजनोंसे इस प्रकार बोले- ॥१ ॥
अद्य राज्येऽभिषेक्ष्यामि भरतं धर्मवत्सलम् ।
अयोध्यायाः पतिं वीरं ततो यास्याम्यहं वनम् ॥ २ ॥
भरतका राजाके पदपर अभिषेक करूँगा । उसके बाद वनको चला जाऊँगा ॥ २ ॥
प्रवेशयत सम्भारान् मा भूत् कालात्ययो यथा ।
अद्यैवाहं गमिष्यामि लक्ष्मणेन गतां गतिम् ॥ ३ ॥
' शीघ्र ही सब सामग्री जुटाकर ले आओ । अब अधिक समय नहीं बीतना चाहिये । मैं आज ही लक्ष्मणके पथका ' आज मैं अयोध्या के राज्यपर धर्मवत्सल वीर भाई अनुसरण करूँगा ' ॥ ३ ॥
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उत्तरकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः १६७१
तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं सर्वाः प्रकृतयो भृशम् ।
मूर्धभिः प्रणता भूमौ गतसत्त्वा इवाभवन् ॥ ४ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर प्रजावर्ग के सभी लोग धरती पर माथा टेककर पड़ गये और प्राणहीन - से हो गये ॥ ४ ॥
भरतश्च विसंज्ञोऽभूच्छ्रुत्वा राघवभाषितम् ।
राज्यं विगर्हयामास वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ५ ॥
श्रीरघुनाथजीकी वह बात सुनकर भरतका तो होश ही उड़ गया । वे राज्यकी निन्दा करने लगे और इस प्रकार बोले -- ॥ ५ ॥
सत्येनाहं शपे राजन् स्वर्गभोगेन चैव हि ।
न कामये यथा राज्यं त्वां विना रघुनन्दन ॥ ६ ॥
' राजन्! रघुनन्दन! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके बिना मुझे राज्य नहीं चाहिये, स्वर्गका भोग भी नहीं चाहिये || ६ ||
इमौ कुशीलवौ राजन्नभिषिच्य नराधिप ।
कोशलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् ॥ ७ ॥
' राजन्! नरेश्वर! आप इन कुश और लवका राज्याभिषेक कीजिये । दक्षिण कोशलमें कुशको और उत्तर कोशलमें लव-को राजा बनाइये ॥ ७ ॥
शत्रुघ्नस्य च गच्छन्तु दूतास्त्वरितविक्रमाः ।
इदं गमनमस्माकं शीघ्रमाख्यातु मा चिरम् ॥ ८ ॥
' तेज चलनेवाले दूत शीघ्र ही शत्रुघ्नके पास भी जायें और उन्हें हमलोगोंकी इस महायात्राका वृत्तान्त सुनायें । इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये ' ॥ ८ ॥
तच्छ्रुत्वा भरतेनोक दृष्ट्वा चापि धोमुखान् ।
पौरान दुःखेन संतप्तान् वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥
भरतकी बात सुनकर तथा पुरवासियों को नींचे मुख किये दुःखसे संतप्त होते देख महर्षि वसिष्ठने कहा ॥ ९ ॥
वत्स राम इमाः पश्य धरणि प्रकृतीर्गताः ।
ज्ञात्वैषामप्सितं कार्य मा चैषां विप्रियं कृथाः ॥ १० ॥
' वत्स श्रीराम! पृथ्वीपर पड़े हुए इन प्रजाजनोंकी ओर देखो । इनका अभिप्राय जानकर इसीके अनुसार कार्य करो । इनकी इच्छा के विपरीत करके इन बेचारोंका दिल न दुखाओ ' ॥ १० ॥
वसिष्ठस्य तु वाक्येन उत्थाप्य प्रकृतीजनम् ।
किं करोमीति काकुत्स्थः सर्वान् वचनमब्रवीत् ॥ ११ ॥
वसिष्ठजीके कहनेसे श्रीरघुनाथजीने प्रजाजनों को उठाया और सबसे पूछा - " मैं आपलोगोंका कौन - सा कार्य सिद्ध करूँ ११ ॥ ११ ॥
ततः सर्वाः प्रकृतयो रामं वचनमब्रुवन् ।
गच्छन्तमनुगच्छामो यत्र राम गमिष्यसि ॥ १२ ॥
तब प्रजावर्ग के सभी लोग श्रीराम से बोले- ' रघुनन्दन! आप जहाँ भी जायेंगे, आपके पीछे - पीछे हम भी वहीं चलेंगे ॥ १२ ॥
पौरेषु यदि ते प्रीतिर्यदि स्नेहो धनुत्तमः ।
सपुत्रदाराः काकुत्स्थ समं गच्छाम सत्पथम् ॥ १३ ॥
' काकुत्स्थ! यदि पुरवासियोंपर आपका प्रेम है, यदि हमपर आपका परम उत्तम स्नेह है तो हमें साथ चलने की आज्ञा दीजिये । हम अपने स्त्री - पुत्रोंस हत आपके साथ ही सन्मार्ग-पर चलनेको उद्यत हैं ॥ १३ ॥
तपोवनं वा दुर्गे वा नदीमम्भोनिधि तथा ।
वयं ते यदि न त्याज्याः सर्वान्नो नय ईश्वर ॥ १४ ॥
' स्वामिन्! आप तपोवन में या किसी दुर्गम स्थान में अथवा नदी या समुद्र में जहाँ कहीं भी जायँ, हम सबको साथ ले चलें । यदि आप हमें त्याग देने योग्य नहीं मानते हैं तो ऐसा ही करें ॥ १४ ॥
एष नः परमा प्रीतिरेष नः परमो वरः ।
हृद्रता नः सदा प्रीतिस्तवानुगमने नृप ॥ १५ ॥
' यही हमारे ऊपर आपकी सबसे बड़ी कृपा होगी और यही हमारे लिये आपका परम उत्तम वर होगा । आपके पीछे चलने में ही हमें सदा हार्दिक प्रसन्नता होगी ' ॥ १५ ॥
पौराणां दृढभक्तिच वाढमित्येव सोऽब्रवीत् ।
स्वकृतान्तं चान्ववेक्ष्य तस्मिन्नहनि राघवः ॥ १६ ॥
कोशलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् ।
अभिषिच्य महात्मानावुभौ रामः कुशीलवौ ॥ १७ ॥
अभिषिकौ सुतावङ्के प्रतिष्ठाप्य पुरे ततः ।
परिष्वज्य महाबाहुर्मूयुपाघ्राय चासकृत् ॥ १८ ॥
पुरवासियों की दृढ़ भक्ति देख श्रीरामने ' तथास्तु ' कहकर उनकी इच्छाका अनुमोदन किया और अपने कर्तव्यका निश्चय करके श्रीरघुनाथजीने उसी दिन दक्षिण कोशलके राज्यपर वीर कुशको और उत्तर कोशलके राजसिंहासनपर लवको अभिषिक्त कर दिया । अभिषिक्त हुए अपने उन दोनों महामनस्वी पुत्र कुश और लवको गोद में बिठाकर उनका गाढ आलिङ्गन करके महाबाहु श्रीरामने बारंबार उन दोनों के मस्तक सूँ; फिर उन्हें अपनी - अपनी राजधानी में भेज दिया १६-१८
रथानां तु सहस्राणि नागानामयुतानि च ।
दशायुतानि चाश्वानामेकैकस्य धनं ददौ ॥ १ ९ ॥
उन्होंने अपने एक - एक पुत्रको कई हजार रथ, दस हजार हाथी और एक लाख घोड़े दिये ॥ १ ९ ॥
बहुरती बहुधनौ हृष्टपुष्टजनावृत ।
स्वे पुरे प्रेषयामास भ्रातरौ तौ कुशीलवौ ॥ २० ॥
दोनों भाई कुश और लव प्रचुर रत्न और धनसे सम्पन्न हो गये । वे हृष्ट - पुष्ट मनुष्यों से घिरे रहने लगे । उन दोनों को श्रीरामने उनकी राजधानियों में भेज दिया ॥ २० ॥
अभिषिच्य ततो वीरौ प्रस्थाप्य खपुरे तदा ।