Ramayana 2 — पृष्ठ 911–912
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 911–912
पृष्ठ 911
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १६८० जो उत्तम श्रद्धासे सम्पन्न हो श्रीरघुनाथजीकी कथा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और विष्णुलोक में जाता है १५३ आदिकाव्यमिदं त्वा पुस वाल्मीकिना कृतम् ॥ १६ ॥
यः शृणोति सदा भवया स गच्छेद् वैष्णवीं तनुम् । जो पूर्वकाल में वाल्मीकिद्वारा निर्मित इस आर्षरामायण आदिकाव्यका सदा भक्तिभावसे श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त कर लेता है ॥ १६३ ॥
वर्धन्ते सम्पदः संततिस्तथा ॥ १७ ॥
पुत्रदाराश्च
सत्यमेतद् विदित्वा तु श्रोतव्यं नियतात्मभिः ।
गायश्याश्च स्वरूपं तद् रामायणमनुत्तमम् ॥ १८ ॥
इसके श्रवणसे स्त्री - पुत्रोंकी प्राप्ति होती है, धन और संतति बढ़ती है । इसे पूर्णतः सत्य समझकर मनको वशमें रखते हुए इसका श्रवण करना चाहिये । यह परम उत्तम रामायणकाव्य गायत्रीका स्वरूप है ॥ १७-१८ ॥
यः पठेच्छृणुयान्नित्यं चरितं राघवस्य ह ।
भक्त्या निष्कल्मषो भूत्वा दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ १ ९ ॥
जो पुरुष प्रतिदिन भक्तिभावसे श्रीरघुनाथजीके इस चरित्रको सुनता या पढ़ता है, वह निष्पाप होकर दीर्घ आयु प्राप्त कर लेता है ॥ १ ९ ॥
चिन्तयेद् राघवं नित्यं श्रेयः प्राप्तुं य इच्छति ।
श्रावयेदिदमाख्यानं ब्राह्मणेभ्यो दिने दिने ॥ २० ॥
सोऽसुक्षये विष्णुलोकं गच्छत्येव न संशयः ॥ २१ ॥
जो इस श्रीरघुनाथ चरित्रका पाठ पूर्ण कर लेता है, वह प्राणान्त होनेपर भगवान् विष्णुके ही घाममें जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
पिता पितामहस्तस्य तथैव प्रपितामहः ।
तत्पिता तत्पिता चैव विष्णुं यान्ति न संशयः ॥ २२ ॥
इतना ही नहीं, उसके पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध प्रपितामह तथा उनके भी पिता भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २२ ॥
चतुर्वर्गप्रदं नित्यं चरितं राघवस्य तु ।
तस्माद् यत्नवता नित्यं श्रोतव्यं परमं सदा ॥ २३ ॥
श्रीराघवेन्द्रका यह चरित्र सदा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है । इसलिये प्रतिदिन यत्नपूर्वक निरन्तर इस उत्तम काव्यका श्रवण करना चाहिये ॥ २३ ॥
शृण्वन् रामायणं भक्त्या यः पादं पदमेव वा ।
स याति ब्रह्मणः स्थानं ब्रह्मणा पूज्यते सदा ॥ २४ ॥
जो रामायण काव्यके श्लोकके एक चरण या एक पदका भक्तिभावसे श्रवण करता है, वह ब्रह्माजीके धाममें जाता है और सदा उनके द्वारा पूजित होता है ॥ २४ ॥
पवमेतत् पुरावृत्तमाख्यानं भद्रमस्तु वः ।
प्रव्याहरत विस्रब्धं बलं विष्णोः प्रवर्धताम् ॥ २५ ॥
जो कल्याण प्राप्ति की इच्छा रखता है, उसे नित्य निरन्तर चिन्तन करना चाहिये । ब्राह्मणोंको प्रतिदिन इस प्रकार इस पुरातन आख्यानका आपलोग विश्वास-श्रीरघुनाथजीका सुनाना चाहिये ॥ २० ॥ पूर्वक पाठ करें । आपका कल्याण हो और भगवान् विष्णुके
यह प्रबन्धकाव्य
सकलं पठेत् । बलकी जय हो ॥ २५ ॥
यस्त्विदं रघुनाथस्य चरितं श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकादशाधिकशततमः सर्गः ॥ १११४ इत्यार्षे आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित उत्तरकाण्डं सम्पूर्णम् 76014 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणं सम्पूर्णम्
पृष्ठ 912
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मिलनेका पता ----गीताप्रेस, पो ० गीताप्रेस ( गोरखपुर )