Ramayana 2 — पृष्ठ 901–910
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910
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१६७२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे दूतान् सम्प्रेषयामास शत्रुघ्नाय महात्मने ॥ २१ ॥ अपने नगरमें भेजकर श्रीरघुनाथजीने महात्मा शत्रुघ्न के पास
इस प्रकार उन दोनों वीरोंको अभिषिक्त करके अपने दूत भेजे ॥ २१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०७ ॥
अष्टाधिकशततमः सर्गः श्रीरामचन्द्रजीका भाइयों, सुग्रीव आदि वानरों तथा रीछोंके साथ परमधाम जानेका निश्चय और विभीषण, हनुमान्, जाम्बवान्, मैन्द एवं द्विविदको इस भूतलपर ही रहनेका आदेश देना
ते दूता रामवाक्येन चोदिता लघुविक्रमाः ।
प्रजग्मुर्मधुरां शीघ्रं चक्रुर्वासं न चाध्वनि ॥ १ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर शीघ्रगामी दूत शीघ्र ही मधुरापुरीको चल दिये । उन्होंने मार्गमें कहीं भी पड़ाव नहीं डाला ॥ १ ॥
ततस्त्रिभिरहोरात्रैः सम्प्राप्य मधुरामथ ।
शत्रुघ्नाय यथातत्त्वमावख्युः सर्वमेव तत् ॥ २ ॥
लगातार तीन दिन और तीन रात चलकर वे मधुरा पहुँचे और अयोध्या की सारी बातें उन्होंने शत्रुघ्नसे यथार्थतः कह सुनायीं ॥ २ ॥
लक्ष्मणस्य परित्यागं प्रतिशां राघवस्य च ।
पुत्रयोरभिषेकं च पौरानुगमनं तथा ॥ ३ ॥
कुशस्य नगरी रम्या विन्ध्यपर्वतरोधसि ।
कुशावतीति नाम्ना सा कृता रामेण धीमता ॥ ४ ॥
श्रीरामको प्रतिज्ञा, लक्ष्मणका परित्याग, श्रीराम के दोनों पुत्रों का राज्याभिषेक और पुरवासियों का श्रीरामके साथ जानेका निश्चय आदि सब बातें बताकर दूतोंने यह भी कहा कि ' परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने कुशके लिये विन्ध्यपर्वतके किनारे कुशावती नामक रमणीय नगरीका निर्माण कराया है ॥ ३-४ ॥
श्रावस्तीति पुरी रम्या श्राविता च लवस्य ह ।
अयोध्यां विजनां कृत्वा राघवो भरतस्तथा ॥ ५ ॥
स्वर्गस्य गमनोद्योगं कृतवन्तौ महारथौ ।
एवं सर्व निवेद्याशु शत्रुघ्नाय महात्मने ॥ ६ ॥
बिरेमुस्ते ततो दूतास्त्वर राजेति चाब्रुवन् । " इसी तरह लवके लिये श्रावस्ती नामसे प्रसिद्ध सुन्दर पुरी बसायी है । श्रीरघुनाथजी और भरतजी दोनों महारथी वीर अयोध्याको सूनी करके साकेतधामको जानेके लिये उद्योग कर रहे हैं । ' इस प्रकार महात्मा शत्रुघ्नको शीघ्रतापूर्वक सब बातें बताकर दूतोंने कहा – ' राजन्! शीघ्रता कीजिये ' इतना कहकर वे चुप हो गये ॥ ५-६३ ॥ तच्छ्रुत्वा घोरसंकाशं कुलक्षयमुपस्थितम् ॥ ७ ॥
प्रकृतीस्तु समानीय काञ्चनं च पुरोधसम् ।
तेषां सर्व यथावृत्तमब्रवीद् रघुनन्दनः ॥ ८ ॥
अपने कुलका भयंकर संहार उपस्थित हुआ सुनकर रघुनन्दन शत्रुघ्नने समस्त प्रजा तथा काञ्चन नामक पुरोहित-को बुलाया और उनसे सब बातें यथावत् कह सुनायीं ॥ ७-८ ॥
आत्मनश्च विपर्यासं भविष्यं भ्रातृभिः सह ।
ततः पुत्रद्वयं वीरः सोऽभ्यषिञ्चन्नराधिपः ॥ ९ ॥
उन्होंने यह भी बताया कि भाइयोंके साथ मेरे शरीरका भी वियोग होनेवाला है । इसके बाद वीर राजा शत्रुघ्नने अपने दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक किया ॥ ९ ॥
सुबाहुर्मधुरां लेभे शत्रुघाती च वैदिशम् ।
द्विधा कृत्वा तु तां सेनां माधुरीं पुत्रयोर्द्वयोः ।
धनं च युक्तं कृत्वा वै स्थापयामास पार्थिवः ॥ १० ॥
सुबाहुने मधुराका राज्य पाया और शत्रुघातीने विदिशाका । मधुराकी सेनाके दो भाग करके राजा शत्रुघ्नने दोनों पुत्रोंको बाँट दिये तथा बाँटनेके योग्य घनका भी विभाजन करके उन दोनोंको दे दिया और उन्हें अपनी - अपनी राजधानीमें स्थापित कर दिया ॥ १० ॥
सुबाहुं मधुरायां च वैदिशे शत्रुघातिनम् ।
ययौ स्थाप्य तदायोध्यां रथेनैकेन राघवः ॥ ११ ॥
इस प्रकार सुबाहुको मधुरामें तथा शत्रुघातीको विदिशामें स्थापित करके रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न एकमात्र रथके द्वारा अयोध्या के लिये प्रस्थित हुए ॥ ११ ॥
स ददर्श महात्मानं ज्वलन्तमिव पावकम् ।
सूक्ष्मक्षौमाम्बरधरं मुनिभिः सार्धमक्षयैः ॥ १२ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा महात्मा श्रीराम अपने तेज-से प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हो रहे हैं । उनके शरीर-पर महीन रेशमी वस्त्र शोभा पा रहा है तथा वे अविनाशी महर्षियोंके साथ विराजमान हैं ॥ १२ ॥
सोऽभिवाद्य ततो रामं प्राञ्जलिः प्रयतेन्द्रियः ।
उवाच वाक्यं धर्मज्ञं धर्ममेवानुचिन्तयन् ॥ १३ ॥
निकट जा हाथ जोड़कर उन्होंने श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया और धर्मका चिन्तन करते हुए इन्द्रियोंको काबू में करके वे धर्मके ज्ञाता श्रीरामसे बोले – ॥ १३ ॥
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उत्तरकाण्डेऽष्टाधिकशततमः सर्गः १६७३ कृत्वाभिषेकं सुतयोर्द्वयो तवानुगमने राजन् विद्धि मां ' रघुकुलनन्दन! मैं अपने दोनों आया हूँ । राजन्! आप मुझे भी निश्चयसे युक्त समझें ॥ १४ ॥
न चान्यदद्य वक्तव्यमतो वीर विहन्यमानमिच्छामि मद्विधेन
राघवनन्दन ।
कृतनिश्चयम् ॥ १४ ॥
पुत्रों का राज्याभिषेक करके अपने साथ चलनेके दृढ़
न शासनम् ।
विशेषतः ॥ १५ ॥
" वीर! आज इसके विपरीत आप मुझसे और कुछ न कहियेगा; क्योंकि उससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई दण्ड न होगा । मैं नहीं चाहता कि किसी के विशेषतः मुझ जैसे सेवक-के द्वारा आपकी आशाका उल्लङ्घन हो ' ॥ १५ ॥
तस्य तां बुद्धिमक्लीबां विशाय रघुनन्दनः ।
बाढमित्येव शत्रुघ्नं रामो वाक्यमुवाच ह ॥ १६ ॥
• शत्रुघ्नका यह दृढ़ विचार जानकर श्रीरघुनाथजीने उनसे कहा -- ' बहुत अच्छा ' ॥ १६ ॥
तस्य वाक्यस्य वाक्यान्ते वानराः कामरूपिणः ।
ऋक्षराक्षससङ्घाश्च समापेतुरनेकशः ॥ १७ ॥
उनकी यह बात समाप्त होते ही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर, रीछ और राक्षसोंके समुदाय बहुत बड़ी संख्या में वहाँ आ पहुँचे ॥ १७ ॥
सुग्रीवं ते पुरस्कृत्य सर्व एव समागताः ।
तं रामं द्रष्टुमनसः खर्गायाभिमुखं स्थितम् ॥ १८ ॥
साकेत - धामको जानेके लिये उच्चत हुए श्रीरामके दर्शन-की इच्छा मनमें लिये वे सभी वानर सुग्रीवको आगे करके वहाँ पधारे थे ॥ १८ ॥
देवपुत्रा ऋषिसुता गन्धर्वाणां सुतास्तथा ।
रामक्षयं विदित्वा ते सर्व एव समागताः ॥ १ ९ ॥
ते राममभिवाद्योचुः सर्वे वानरराक्षसाः । उनमें से कितने ही देवताओंके पुत्र थे, कितने ही ऋषियोंके बालक थे और कितने ही गन्धर्वोंसे उत्पन्न हुए थे । श्रीरघुनाथजीके लीलासंवरणका समय जानकर वे सब - के-सब वहाँ आये थे । उक्त सभी वानर और राक्षस श्रीरामको प्रणाम करके बोले – ॥ १ ९ ३ ॥ तवानुगमने राजन् सम्प्राप्ताः स्म समागताः ॥ २० ॥
यदि राम विनास्माभिर्गच्छेस्त्वं पुरुषोत्तम ।
यमदण्डमिवोद्यम्य त्वया स्म विनिपातिताः ॥ २१ ॥
' राजन्! हम भी आपके साथ चलनेका निश्चय लेकर यहाँ आये हैं । पुरुषोत्तम श्रीराम! यदि आप हमें साथ लिये वा ० रा ० ५.१२.१२-बिना ही चले जायँगे तो हम यह समझेंगे कि आपने यमदण्ड उठाकर हमें मार गिराया है ' ॥ २०-२१ ॥
एतस्मिन्नन्तरे समं सुग्रीवोऽपि महाबलः ।
प्रणम्य विधिवद् वीरं विज्ञापयितुमुद्यतः ॥ २२ ॥
इसी बीच में महाबली सुग्रीव भी वीर श्रीरामको विधि-पूर्वक प्रणाम करके अपना अभिप्राय निवेदन करने के लिये उद्यत हो बोले- ॥ २२ ॥
अभिषिच्याङ्गदं वीरमागतोऽस्मि नरेश्वर ।
तवानुगमने राजन् विद्धि मां कृतनिश्चयम् ॥ २३ ॥
' नरेश्वर! मैं वीर अङ्गद का राज्याभिषेक करके आया हूँ । आप समझ लें कि मेरा निश्चय है ' ॥ २३ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वानरेन्द्रमथोवाच मैत्रं उनकी यह बात सुनकर श्रीरामने वानरराज सुग्रीवकी कहा- ॥ २४ ॥
सखे शृणुष्व सुग्रीव न भी आपके साथ चलनेका दृढ़
रामो रमयतां वरः ।
तस्यानुचिन्तयन् ॥ २४ ॥
मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ मित्रताका विचार करके उनसे
त्वयाहं विनाकृतः ।
गच्छेयं देवलोकं वा परमं वा पदं महत् ॥ २५ ॥
' सखे सुग्रीव! मेरी बात सुनो । मैं तुम्हारे बिना देव-लोकमें और महान् परमपद या परमधाममें भी नहीं जा सकता ' ॥ २५ ॥
तैरेवमुक्तः काकुत्स्थो वाढमित्यब्रवीत् स्मयन् ।
विभीषणमथोवाच राक्षसेन्द्रं महायशाः ॥ २६ ॥
पूर्वोक्त वानरों और राक्षसोंकी भी बात सुनकर महा-यशस्वी श्रीरघुनाथजी ' बहुत अच्छा ' कहकर मुस्कराये और राक्षसराज विभीषण से बोले - ॥ २६ ॥
यावत् प्रजा धरिष्यन्ति तावत् त्वं वै विभीषण ।
राक्षसेन्द्र महावीर्य लङ्कास्थः स्वं धरिष्यसि ॥ २७ ॥
' महापराक्रमी राक्षसराज विभीषण! जबतक संसारकी प्रजा जीवन धारण करेगी, तबतक तुम भी लङ्कामें रहकर अपने शरीरको धारण करोगे ॥ २७ ॥
यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत् तिष्ठति मेदिनी ।
यावच्च मत्कथा लोके तावद् राज्यं तवास्त्विह ॥ २८ ॥
' जबतक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, जबतक पृथ्वी रहेगी और जबतक संसार में मेरी कथा प्रचलित रहेगी, तबतक इस भूतलपर तुम्हारा राज्य बना रहेगा ' ॥ २८ ॥
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१६७४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
शासितश्च सखित्वेन कार्य ते मम शासनम् ।
प्रजाः संरक्ष धर्मेण नोत्तरं वक्तुमर्हसि ॥ २ ९ ॥
“ मैंने मित्रभावसे ये बातें तुमसे कही हैं । तुम्हें मेरी आशाका पालन करना चाहिये । तुम धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो । इस समय मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हें उसका प्रति-वाद नहीं करना चाहिये ॥ २ ९ ॥
किंचान्यद् वकुमिच्छामि राक्षसेन्द्र महाबल ।
आराधय जगन्नाथ मिक्ष्वाकु कुलदैवतम् ॥ ३० ॥
आराधनीयमनिशं देवैरपि सवासवैः । ' महाबली राक्षसराज! इसके सिवा मैं तुमसे एक बात और कहना चाहता हूँ । हमारे इक्ष्वाकुकुलके देवता हैं भगवान् जगन्नाथ ( श्रीशेषशायी भगवान् विष्णु ) । इन्द्र
आदि देवता भी उनकी निरन्तर आराधना करते रहते हैं ।
तुम भी सदा उनकी पूजा करते रहना ' ॥ ३०३ ॥
तथेति प्रतिजग्राह रामवाक्यं विभीषणः ॥ ३१ ॥
राजा राक्षसमुख्यानां राघवाज्ञामनुस्मरन् । राक्षसराज विभीषणने श्रीरघुनाथजीकी इस आज्ञाको अपने हृदय में धारण किया और ' बहुत अच्छा ' कहकर उसका पालन स्वीकार किया ॥ ३१३ ॥
तमेवमुक्त्वा काकुत्स्थो हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ ३२ ॥
जीविते कृतबुद्धिस्त्वं मा प्रतिज्ञां वृथा कृथाः । विभीषणसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्र जी हनुमानूजीसे बोले- ' तुमने दीर्घकालतक जीवित रहनेका निश्चय किया है । अपनी इस प्रतिज्ञाको व्यर्थं न करो ॥ ३२३ ॥
मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर ॥ ३३ ॥
तावद् रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन् । ' हरीश्वर! जबतक संसारमें मेरी कथाओंका प्रचार रहे, तबतक तुम भी मेरी आज्ञाका पालन करते हुए प्रसन्नता-पूर्वक विचरते रहो ' ॥ ३३३ ॥
एवमुक्तस्तु हनुमान् राघवेण महात्मना ॥ ३४ ॥
वाक्यं विज्ञापयामास परं हर्षमवाप च । महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमानजी को बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले - ॥ ३४३ ॥
यावत् तव कथा लोके विचरिष्यति पावनी ॥ ३५ ॥
तावत् स्थास्यामि मेदिन्यां तवाशामनुपालयन् । ' भगवन्! संसार में जबतक आपकी पावन कथाका प्रचार रहेगा, तबतक आपके आदेशका पालन करता हुआ मैं इस पृथ्वीपर ही रहूँगा ' ॥ ३५३ ॥
जाम्बवन्तं तथोक्त्वा तु वृद्धं ब्रह्मसुतं तदा ॥ ३६ ॥
मैन्दं च द्विविदं चैव पञ्च जाम्बवता सह ।
यावत् कलिश्च सम्प्राप्तस्तावज्जीवत सर्वदा ॥ ३७ ॥
इसके बाद भगवान्ने ब्रह्माजी के पुत्र बूढ़े जाम्बवान् तथा मैन्द और द्विविदसे भी कहा – ' जाम्बवान् सहित तुम पाँचों व्यक्ति ( जाम्बवान्, विभीषण, हनुमान्, मैन्द और द्विविद ) तबतक जीवित रहो, जबतक कि प्रलय एवं कलियुग न आ जाय ' ( इनमेंसे हनुमान् और विभीषण तो प्रलयकाल-तक रहनेवाले हैं और शेष तीन व्यक्ति कलि और द्वापरकी संधिमें श्रीकृष्णावतारके समय मारे गये या मर गये ) ॥ ३६-३७ ॥
तानेवमुक्त्वा काकुत्स्थः सर्वास्तानृक्षवानरान् ।
उवाच बाढं गच्छध्वं मया सार्धं यथोदितम् ॥ ३८ ॥
उन सबसे ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने शेष सभी रीछों और वानरोंसे कहा - " बहुत अच्छा, तुमलोगोंकी बातें मुझे स्वीकार हैं । तुम सब अपने कथनानुसार मेरे साथ चलो ' ॥ ३८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टाधिकशततमः सर्गः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०८ ॥
नवाधिकशततमः सर्गः परमधाम जानेके लिये निकले हुए श्रीराम के साथ समस्त अयोध्यावासियोंका प्रस्थान प्रभातायां तु शर्वर्या पृथुवक्षा महायशाः । वक्षःस्थलवाले महायशस्वी कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी पुरोहित-रामः कमलपत्राक्षः पुरोधसमथाब्रवीत् ॥ १ ॥ से बोले - ॥ १ ॥
तदनन्तर रात बीतने पर जब सबेरा हुआ, तब विशाल अग्निहोत्रं व्रजत्वग्रे दीप्यमानं सह द्विजैः ।
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वाज आगे पेय य ततो चकार उ प्रस्थानक पूर्वकप ततः स कुशान् फिर हाथ में करते हुए अव्याहर निर्जगाम महायात्रा उस स बात नहीं चेष्टा नहीं दि श्रीरामकी करके देदीप निकले थे अ भगवान रामस्य दक्षि सव्येऽपिच भगवान् श्रीदेवी उपस्थि आगे - आगे उन शरा नाना तथायुधाश्च नाना प्रक दूसरे- दूसरे अ भगवान् के साथ वेदा ब्राह्मण ओङ्कारोऽथ व चारों वेद सबकी रक्षा करनेव सभी भक्तिभावसे
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उत्तरकाण्डे नवाधिकशततमः सर्गः १६७५ महायात्रा श्रीरामकी भगवान् वाजपेयातपत्रं च शोभमानं महापथे ॥ २ ॥
" मेरे अग्निहोत्रकी प्रज्वलित आग ब्राह्मणोंके साथ आगे-आगे चले । महाप्रयाण के पथपर इस यात्राके समय मेरे वाज-पेय यज्ञका सुन्दर छत्र भी चलना चाहिये ' ॥ २ ॥
ततो वसिष्ठस्तेजखी सर्व निरवशेषतः ।
चकार विधिवद् धर्मे माहाप्रस्थानिकं विधिम् ॥ ३ ॥
उनके इस प्रकार कहनेपर तेजस्वी वसिष्ठ मुनिने महा-प्रस्थानकाल के लिये उचित समस्त धार्मिक क्रियाओंका विधि-पूर्वक पूर्णतः अनुष्ठान किया ॥ ३ ॥
ततः सूक्ष्माम्बरधरो ब्रह्ममावर्तयन् परम् ।
कुशान् गृहीत्वा पाणिभ्यां सरयूं प्रययावथ ॥ ४ ॥
फिर भगवान् श्रीराम सूक्ष्म वस्त्र धारण किये दोनों हाथोंमें कुश लेकर परब्रह्मके प्रतिपादक वेद - मन्त्रों का उच्चारण करते हुए सरयूनदी के तटपर चले ॥ ४ ॥
अव्याहरन् क्वचित् किंचिन्निश्चेष्टो निःसुखः पथि ।
निर्जगाम गृहात् तस्माद् दीप्यमानो यथांशुमान् ॥ ५ ॥
उस समय वे वेदपाठकै सिवा कहीं किसीसे और कोई बात नहीं करते थे । चलनेके अतिरिक्त उनमें कोई दूसरी चेष्टा नहीं दिखायी देती थी तथा वे लौकिक सुखका परित्याग करके देदीप्यमान सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते हुए घर से निकले थे और गन्तव्य पथपर बढ़ रहे थे ॥ ५ ॥
रामस्य दक्षिणे पार्श्वे सपद्मा श्रीरुपाश्रिता ।
सव्येऽपि च मही देवी व्यवसायस्तथाग्रतः ॥ ६ ॥
भगवान् श्रीरामके दाहिने पार्श्वमें कमल हाथमें लिये श्रीदेवी उपस्थित थीं । वामभागमें भूदेवी विराजमान थीं तथा आगे - आगे उनकी व्यवसाय ( संहार ) - शक्ति चल रही थी ॥
शरा नानाविधाश्चापि धनुरायत्तमुत्तमम् ।
तथायुधाश्च ते सर्वे ययुः पुरुषविग्रहाः ॥ ७ ॥
नाना प्रकारके बाण, विशाल एवं उत्तम धनुष तथा दूसरे- दूसरे अस्त्र - शस्त्र -- सभी पुरुष शरीर धारण करके भगवान् के साथ चले ॥ ७ ॥
वेदा ब्राह्मणरूपेण गायत्री सर्वरक्षिणी ।
ओङ्कारोऽथ वषट्कारः सर्वे राममनुव्रताः ॥ ८ ॥
चारों वेद ब्राह्मणका रूप धारण करके चल रहे थे । सबकी रक्षा करनेवाली गायत्री देवी, ओंकार और वषट्कार सभी भक्तिभावसे श्रीरामका अनुसरण करते थे ॥ ८ ॥
ऋषयश्च महात्मानः सर्व एव महीसुराः ।
अन्वगच्छन् महात्मानं स्वर्गद्वारमपावृतम् ॥ ९ ॥
महात्मा ऋषि तथा समस्त ब्राह्मण भी ब्रह्मलोकके खुले हुए द्वारस्वरूप परमात्मा श्रीरामके पीछे - पीछे गये ॥ ९ ॥
तं यान्तमनुगच्छन्ति ह्यन्तःपुरचराः स्त्रियः ।
सवृद्धबालदासीकाः सवर्षवरकिंकराः ॥ १० ॥
अन्तःपुरकी स्त्रियाँ भी बालकों, वृद्धों, दासियों, खोजों और सेवकों के साथ निकलकर सरयूतट की ओर जाते हुए श्रीराम के पीछे - पीछे जा रही थीं ॥ १० ॥
सान्तःपुरश्च भरतः शत्रुघ्नसहितो ययौ ।
रामं गतिमुपागम्य साग्निहोत्रमनुव्रताः ॥ ११ ॥
भरत और शत्रुघ्न अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ अपने आश्रयस्वरूप भगवान् श्रीरामके, जो अग्निहोत्र के साथ जा रहे थे, पीछे - पीछे गये ॥ ११ ॥
ते च सर्वे महात्मानः साग्निहोत्राः समागताः ।
सपुत्रदाराः काकुत्स्थमनुजग्मुर्महामतिम् ॥ १२ ॥
वे सब महामनस्वी श्रेष्ठ पुरुष एवं ब्राह्मण अग्निहोत्रकी अग्नि तथा स्त्री - पुत्रोंके साथ इस महायात्रामें सम्मिलित हो परम बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीका अनुगमन कर रहे थे ॥ १२ ॥
मन्त्रिणो भृत्यवर्गाश्च सपुत्रपशुबान्धवाः
।
सर्वे सहानुगा राममन्वगच्छन् प्रहृष्टवत् ॥ १३ ॥
समस्त मन्त्री और भृत्यवर्ग भी अपने पुत्रों, पशुओं, बन्धुओं तथा अनुचरोंसहित हर्षपूर्वक श्रीराम के पीछे - पीछे जा रहे थे ॥ १३ ॥
ततः सर्वाः प्रकृतयो हृष्टपुष्टजनावृताः ।
गच्छन्तमनुगच्छन्ति राघवं गुणरञ्जिताः ॥ १४ ॥
ततः सस्त्रीपुमांसस्ते सपक्षिपशुबान्धवाः ।
राघवस्यानुगाः सर्वे हृष्टा विगतकल्मषाः ॥ १५ ॥
हृष्ट - पुष्ट मनुष्यों से भरे हुए समस्त प्रजाजन श्रीरघुनाथजी-के गुणोंपर मुग्ध थे; इसलिये वे स्त्री, पुरुष, पशु - पक्षी तथा बन्धु बान्धवसहित उस महायात्रा में श्रीरामके अनुगामी हुए । उन सबके हृदय में प्रसन्नता थी और वे सभी पापसे रहित थे ॥ १४-१५ ॥
स्नाताः प्रमुदिताः सर्वे हृष्टपुष्टशश्च वानराः ।
दृढं किलकिलाशब्दैः सर्वे राममनुव्रतम् ॥ १६ ॥
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१६७६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे सम्पूर्ण हृष्ट - पुष्ट वानरगण भी स्नान करके बड़ी प्रसन्नता-के साथ किलकारियाँ मारते हुए भगवान् श्रीरामके साथ जा रहे थे, वह सारा समुदाय ही श्रीरामका भक्त था ॥ १६ ॥
न तत्र कश्चिद् दीनो वा व्रीडितो वापि दुःखितः ।
हृष्टं समुदितं सर्व बभूव परमाद्भुतम् ॥ १७ ॥
उनमें कोई भी ऐसा नहीं था, जो दीन - दुखी अथवा लज्जित हो । वहाँ एकत्र हुए सब लोगोंके हृदयमें महान् हर्ष छा रहा था और इस प्रकार वह जनसमुदाय अत्यन्त आश्चर्य-जनक जान पड़ता था ॥ १७ ॥
द्रष्टुकामोऽथ निर्यान्तं रामं जानपदो जनः ।
यः प्राप्तः सोऽपि दृष्ट्टैव खर्गायानुगतो जनः ॥ १८ ॥
जनपदके लोगोंमेंसे जो श्रीरामकी यात्रा देखनेके लिये आये थे, वे भी यह सब समारोह देखते ही भगवान् के साथ परमधाम जानेको तैयार हो गये ॥ १८ ॥
ऋक्षवानररक्षांसि जनाश्च पुरवासिनः ।
आगच्छन् परया भक्त्या पृष्ठतः सुसमाहिताः ॥ १ ९ ॥
रीछ, वानर, राक्षस और पुरवासी मनुष्य बड़ी भक्तिके इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये साथ श्रीरामचन्द्रजीके पीछे - पीछे एकाग्रचित्त होकर चले आ रहे थे ॥ १ ९ ॥
यानि भूतानि नगरेऽप्यन्तर्धानगतानि च ।
राघवं तान्यनुययुः स्वर्गाय समुपस्थितम् ॥ २० ॥
अयोध्यानगर में जो अदृश्य प्राणी रहते थे, वे भी साकेत-धाम जानेके लिये उद्यत हुए श्रीरघुनाथजीके पीछे - पीछे चल दिये ॥ २० ॥
यानि पश्यन्ति काकुत्स्थं स्थावराणि चराणि च ।
सर्वाणि रामगमने अनुजग्मुर्हि तान्यपि ॥ २१ ॥
चराचर प्राणियोंमेंसे जो - जो श्रीरघुनाथजीको जाते देखते थे, वे सभी उस यात्रामें उनके पीछे - पीछे चल देते थे ॥ २१ ॥
नोच्छ्वसत् तदयोध्यायां सुसूक्ष्ममपि दृश्यते ।
तिर्यग्योनिगताश्चैव सर्वे राममनुव्रताः ॥ २२ ॥
उस समय उस अयोध्यामें साँस लेनेवाला कोई छोटे - से-छोटा प्राणी भी रह गया हो, ऐसा नहीं देखा जाता था । तिर्यग्योनि के समस्त जीव भी श्रीराममें भक्तिभाव रखकर उनके पीछे - पीछे चले जा रहे थे ॥ २२ ॥
उत्तरकाण्डे नवाधिकशततमः सर्गः ॥ १० ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ नवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १० ९ ॥ दशाधिकशततमः सर्गः भाइयों सहित श्रीरामका विष्णुखरूपमें प्रवेश तथा साथ आये हुए सब लोगों को संतानक - लोककी प्राप्ति
अध्यर्धयोजनं गत्वा नदीं पश्चान्मुखाश्रिताम् ।
सरयूं पुण्यसलिलां ददर्श रघुनन्दनः ॥ १ ॥
अयोध्यासे डेढ़ योजन दूर जाकर रघुकुलनन्दन भगवान् श्रीरामने पश्चिमाभिमुख हो निकट प्राप्त हुई पुण्यसलिला सरयूका दर्शन किया ॥ १ ॥
तां नदीमाकुलावत सर्वत्रानुसरन् नृपः ।
आगतः सप्रजो रामस्तं देशं रघुनन्दनः ॥ २ ॥
सरयूनदीमें सब ओर भँवरेँ उठ रही थीं । वहाँ सब ओर घूम - फिरकर रघुनन्दन राजा श्रीराम प्रजाजनोंके साथ एक उत्तम स्थानपर आये ॥ २ ॥
अथ तस्मिन् मुहूर्ते तु ब्रह्मा लोकपितामहः ।
सर्वैः परिवृतो देवैर्ऋषिभिश्च महात्मभिः ॥ ३ ॥
आययौ यत्र काकुत्स्थः स्वर्गाय समुपस्थितः ।
विमानशत कोटीभिर्दिव्याभिरभिसंवृतः ॥ ४ ॥
उसी समय लोकपितामह ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओं तथा महात्मा ऋषि - मुनियोंसे घिरे हुए उस स्थानपर आ पहुँचे,
जहाँ श्रीरघुनाथजी परमधाम पधारनेके लिये उपस्थित थे ।
उनके साथ करोड़ों दिव्य विमान शोभा पा रहे थे ॥ ३-४ ॥
दिव्यतेजोवृतं व्योम ज्योतिर्भूतमनुत्तमम् ।
स्वयंप्रभैः स्वतेजोभिः स्वर्गिभिः पुण्यकर्मभिः ॥ ५ ॥
सारा आकाशमण्डल दिव्य तेजसे व्याप्त हो अत्यन्त उत्तम ज्योतिर्मय हो रहा था । पुण्यकर्म करनेवाले स्वर्गवासी स्वयं
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उत्तरकाण्डे दशाधिकशततमः सर्गः १६७७ प्रकाशित होनेवाले अपने तेजसे उस स्थानको उद्भासित कर रहे थे ॥ ५ ॥
पुण्या वाता ववुश्चैव गन्धवन्तः सुखप्रदाः ।
पपात पुष्पवृष्टिश्च देवैर्मुक्ता महौघवत् ॥ ६ ॥
परम पवित्र, सुगन्धित एवं सुखदायिनी हवा चलने लगी । देवताओं द्वारा गिराये गये राशि राशि दिव्य पुष्पोंकी भारी वर्षा होने लगी ॥ ६ ॥
तस्मिंस्तूर्यशतैः कीर्णे गन्धर्वाप्सरसंकुले ।
सरयू सलिलं रामः पद्भ्यां समुपचक्रमे ॥ ७ ॥
उस समय सैकड़ों प्रकारके बाजे बजने लगे और गन्धर्वो तथा अप्सराओंसे वहाँका स्थान भर गया । इतने में ही श्री-रामचन्द्रजी सरयूके जल में प्रवेश करनेके लिये दोनों पैरों से आगे बढ़ने लगे ॥ ७ ॥
ततः पितामहो वाणीं त्वन्तरिक्षादभाषत ।
आगच्छ विष्णो भद्रं ते दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ॥ ८ ॥
तब ब्रह्माजी आकाशसे ही बोले — ' श्रीविष्णुस्वरूप रघु-नन्दन! आइये, आपका कल्याण हो । हमारा बड़ा सौभाग्य है, जो आप अपने परमधामको पधार रहे हैं ॥ ८ ॥
भ्रातृभिः सह देवाभैः प्रविशस्त्र स्विकां तनुम् ।
यामिच्छसि महाबाहो तां तनुं प्रविश स्विकाम् ॥ ९ ॥
' महाबाहो! आप देवतुल्य तेजस्वी भाइयोंके साथ अपने स्वरूपभूत लोकमें प्रवेश करें । आप जिस स्वरूपमें प्रवेश करना चाहें, अपने उसी स्वरूपमें प्रवेश करें ॥ ९ ॥
वैष्णवीं तां महातेजो यद्वाऽऽकाशं सनातनम् ।
त्वं हि लोकगतिर्देव न त्वां केचित् प्रजानते ॥ १० ॥
ऋते मायां विशालाक्षीं तव पूर्वपरिग्रहाम् ।
त्वामचिन्त्यं महद् भूतमक्षयं चाजरं तथा ।
यामिच्छसि महातेजस्तां तनुं प्रविश स्वयम् ॥ ११ ॥
' महातेजस्वी परमेश्वर! आपकी इच्छा हो तो चतुर्भुज विष्णुरूपमें ही प्रवेश करें अथवा अपने सनातन आकाशमय अव्यक्त ब्रह्मरूपमें ही विराजमान हों । देव! आप ही सम्पूर्ण लोकोंके आश्रय हैं । आपकी पुरातन पत्नी योगमाया ( हादिनी शक्ति ) - स्वरूपा जो विशाललोचना सीतादेवी हैं, उनको छोड़कर दूसरे कोई आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं; क्योंकि आप अचिन्त्य, अविनाशी तथा जरा आदि अवस्थाओंसे रहित परब्रह्म हैं, अतः महातेजस्वी राघवेन्द्र! आप जिसमें चाहें, अपने उसी स्वरूपमें प्रवेश करें ( प्रतिष्ठित हो ) ' ॥ १०-११ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्चित्य महामतिः ।
विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः ॥ १२ ॥
पितामह ब्रह्माजी की यह बात सुनकर परम बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीने कुछ निश्चय करके भाइयोंके साथ शरीरसहित अपने वैष्णव तेजमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥
ततो विष्णुमयं देवं पूजयन्ति स्म देवताः ।
साध्या मरुद्गणाश्चैव सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ॥ १३ ॥
फिर तो इन्द्र और अग्नि आदि सब देवता, साध्य तथा मरुद्गण भी विष्णुस्वरूपमें स्थित हुए भगवान् श्रीरामकी पूजा ( स्तुति प्रशंसा ) करने लगे ॥ १३ ॥
ये च दिव्या ऋषिंगणा गन्धर्वाप्सरसश्च याः ।
सुपर्णनागयक्षाश्च दैत्यदानवराक्षसाः ॥ १४ ॥
तदनन्तर जो दिव्य ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव और राक्षस थे, वे भी भगवान्का गुणगान करने लगे ॥ १४ ॥
सर्व पुष्टं प्रमुदितं सुसम्पूर्ण मनोरथम् ।
साधुसाध्विति तैर्देवैस्त्रिदिवं गतकल्मषम् ॥ १५ ॥
( वे बोले – ) ' प्रभो! यहाँ आपके पदार्पण करनेसे देवलोकवासियों का यह सारा समुदाय सफलमनोरथ होने के कारण हृष्ट - पुष्ट एवं आनन्दमग्न हो गया है । सबके पाप - ताप नष्ट हो गये हैं । प्रभो! आपको हमारा शतशः साधुवाद है । ' ऐसा उन देवताओंने कहा ॥ १५ ॥
अथ विष्णुर्महातेजाः पितामहमुवाच ह ।
एषां लोकं जनौघानां दातुमर्हसि सुव्रत ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् विष्णुरूपमें विराजमान महातेजस्वी श्रीराम ब्रह्माजी से बोले – ' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पितामह! इस सम्पूर्ण जनसमुदायको भी आप उत्तम लोक प्रदान करें ।
इमे हि सर्वे स्नेहान्मामनुयाता यशखिनः ।
भक्ता हि भजितव्याश्च त्यक्तात्मानश्च मत्कृते ॥ १७ ॥
" ये सब लोग स्नेहवश मेरे पीछे आये हैं । ये सब - के - सब यशस्वी और मेरे भक्त हैं । इन्होंने मेरे लिये अपने लौकिक सुखोंका परित्याग कर दिया है, अतः ये सर्वथा मेरे अनुग्रहके पात्र हैं ' ॥ १७ ॥
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१६७८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
तच्छ्रुत्वा विष्णुवचनं ब्रह्मा लोकगुरुः प्रभुः ।
लोकान् संतानकान् नाम यास्यन्तीमे समागताः ॥ १८ ॥
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर लोकगुरु भगवान् ब्रह्माजी बोले – ' भगवन्! यहाँ आये हुए ये सब लोग ' संतानक ' नामक लोकों में जायेंगे ॥ १८ ॥
यच्च तिर्यग्गतं किंचित् त्वामेवमनुचिन्तयत् ।
प्राणांस्त्यक्ष्यति भक्त्या तत् संतानेषु निवत्स्यति ॥ १ ९ ॥
सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्युके ब्रह्मलोकादनन्तरे । ‘ पशु - पक्षियोंकी योनिर्मे पड़े हुए जीवोंमेंसे भी जो कोई आपका ही भक्तिभाव से चिन्तन करता हुआ प्राणों का परित्याग करेगा, वह भी संतानक - लोकों में ही निवास करेगा । यह संतानक - लोक ब्रह्मलोकके ही निकट है ( साकेत धामका ही अङ्ग है ) । वह ब्रह्मा के सत्य संकल्पत्व आदि सभी उत्तम गुणोंसे युक्त है । उसी में ये आपके भक्तजन निवास करेंगे ' १ ९ ३ वानराश्च स्विकां योनिमृक्षाश्चैव तथा ययुः ॥ २० ॥
येभ्यो विनिःसृताः सर्वे सुरेभ्यः सुरसम्भवाः ।
तेषु प्रविविशे चैव सुग्रीवः सूर्यमण्डलम् ॥ २१ ॥
पश्यतां सर्वदेवानां खान पितृन् प्रतिपेदिरे । जिन वानरों और रीछोंकी देवताओंसे उत्पत्ति हुई थी, वे अपनी - अपनी योनि में ही मिल गये – जिन - जिन देवताओंसे प्रकट हुए थे, उन्हींमें प्रविष्ट हो गये । सुग्रीवने सूर्यमण्डलमें प्रवेश किया । इसी प्रकार अन्य वानर भी सब देवताओंके देखते - देखते अपने - अपने पिता के स्वरूपको प्राप्त हो गये ॥ २०-२१३ ॥ तथा बुवति देवेशे गोप्रतारमुपागताः ॥ २२ ॥
भेजिरे सरयूं सर्वे हर्षपूर्णाश्रुविक्लवाः । देवेश्वर ब्रह्माजीने जब संतानक लोकोंकी प्राप्तिकी लोगोंने आनन्दके आँसू बहाते हुए सरयूके जलमें डुबकी लगायी ॥ २२३ ॥
अवगाह्याप्सु यो यो वै प्राणांस्त्यक्त्वा प्रहृष्टवत् ॥ २३ ॥
मानुषं देहमुत्सृज्य विमानं सोऽभ्यरोहत । जिसने जिसने जलमें गोता लगाया, वही वही बड़े हर्ष के साथ प्राणों और मनुष्य- शरीरको त्यागकर विमानपर जा बैठा ॥ २३३ ॥
तिर्यग्योनिगतानां च शतानि सरयूजलम् ॥ २४ ॥
सम्प्राप्य त्रिदिवं जग्मुः प्रभासुरवधूंषि तु ।
दिव्या दिव्येन वपुषा देवा दीप्ता इवाभवन् ॥ २५ ॥
पशु - पक्षीकी योनि में पड़े हुए सैकड़ों प्राणी सरयूके जलमें गोता लगाकर तेजस्वी शरीर धारण करके दिव्यलोकमें जा पहुँचे । वे दिव्य शरीर धारण करके दिव्य अवस्थामें स्थित हो देवताओंके समान दीप्तिमान् हो गये ॥ २४-२५ ॥
गत्वा तु सरयूतोयं स्थावराणि चराणि च ।
प्राप्य तत्तोयविक्लेदं देवलोकमुपागमन् ॥ २६ ॥
स्थावर और जङ्गम सभी तरह के प्राणी सरयूके जलमें प्रवेश करके उस जलसे अपने शरीरको भिगोकर दिव्य लोकमें जा पहुँचे ॥ २६ ॥
तस्मिन् येऽपि समापन्ना ऋक्षवानरराक्षसाः ।
तेऽपि स्वर्गे प्रविविशुर्देहान् निक्षिप्य चाम्भसि ॥२७ ॥
उस समय जो कोई भी रीछ, वानर या राक्षस वहाँ आ गये, वे सभी अपने शरीरको सरयूके जलमें डालकर भगवान् के परमधाम में जा पहुँचे ॥ २७ ॥
ततः समागतान् सर्वान् स्थाप्य लोकगुरुर्दिवि ।
हृष्टैः प्रमुदितैर्देवैर्जगाम त्रिदिवं महत् ॥ २८ ॥
इस प्रकार वहाँ आये हुए सब प्राणियोंको संतानक - लोकों-में स्थान देकर लोकगुरु ब्रह्माजी हर्ष और आनन्दसे भरे घोषणा की, तब सरयूके गोप्रतारघाटपर आये हुए उन सब हुए देवताओंके साथ अपने महान् धाममें चले गये || २८ || इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे दशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ दसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११० ॥
एकादशाधिकशततमः सर्गः रामायण - काव्यका उपसंहार और इसकी महिमा एतावदेतदाख्यानं सोत्तरं ब्रह्मपूजितम् । निर्मित यह रामायण नामक श्रेष्ठ आख्यान उत्तरकाण्डसहित रामायणमिति ख्यातं मुख्यं वाल्मीकिना कृतम् ॥ १ ॥ इतना ही है । ब्रह्माजीने भी इसका आदर किया है ॥ १ ॥
( कुश और लव कहते हैं - ) महर्षि वाल्मीकिद्वारा ततः प्रतिष्ठितो विष्णुः स्वर्गलोके यथा पुरा ।
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उत्तरकाण्डे एकादशाधिकशततमः सर्गः १६७ ९ येन व्याप्तमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २ ॥
इस प्रकार भगवान् श्रीराम पहले की ही भाँति अपने विष्णुस्वरूप से परमधाममें प्रतिष्ठित हुए । उनके द्वारा चराचर प्राणियों सहित यह समस्त त्रिलोकी व्याप्त है ॥ २ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
नित्यं शृण्वन्ति संहृष्टाः काव्यं रामायणं दिवि ॥ ३ ॥
उन भगवान् के पावन चरित्रसे युक्त होनेके कारण देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि सदा प्रसन्नतापूर्वक देवलोक में इस रामायण काव्यका श्रवण करते हैं ॥ ३ ॥
इदमाख्यानमायुष्यं सौभाग्यं पापनाशनम् ।
रामायणं वेदसमं श्राद्धेषु श्रावयेद् बुधः ॥ ४ ॥
यह प्रबन्धकाव्य आयु तथा सौभाग्यको बढ़ाता और पापका नाश करता है । रामायण वेदके समान है । विद्वान् पुरुषको श्राद्धों में इसे पढ़कर सुनाना चाहिये ॥ ४ ॥
अपुत्रो लभते पुत्रमधनो लभते धनम् ।
सर्वपापैः: प्रमुच्येत पादमप्यस्य यः पठेत् ॥ ५ ॥
इसके पाठसे पुत्रहीनको पुत्र और धनहीन को धन मिलता है । जो प्रतिदिन इसके श्लोकके एक चरणका भी पाठ करता है, वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ५ ॥
पापान्यपि च यः कुर्यादहन्यहनि मानवः ।
पठत्येकमपि श्लोकं पापात् स परिमुच्यते ॥ ६ ॥
जो मनुष्य प्रतिदिन पाप करता है, वह भी यदि इसके एक श्लोकका भी नित्य पाठ करे तो वह सारी पापराशिसे मुक्त हो जाता है ॥ ६ ॥
वाचकाय च दातव्यं वस्त्रं धेनुहिरण्यकम् ।
वाचके परितुष्टे तु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ ७ ॥
इसकी कथा सुनानेवाले वाचकको वस्त्र, गौ और सुवर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये । वाचकके संतुष्ट होनेपर सभी देवता संतुष्ट हो जाते हैं ॥ ७ ॥
एतदाख्यानमायुष्यं पठन् रामायणं नरः ।
सपुत्रपौत्रो लोकेऽस्मिन् प्रेत्य चेह महीयते ॥ ८ ॥
यह रामायण नामक प्रबन्धकाव्य आयुकी वृद्धि करने-वाला है । जो मनुष्य प्रतिदिन इसका पाठ करता है, उसे इस लोकमें पुत्र - पौत्रकी प्राप्ति होती है और मृत्युके पश्चात् परलोकमें भी उसका बड़ा सम्मान होता है ॥ ८ ॥
रामायणं गोविसर्गे मध्याह्ने वा समाहितः ।
सायाह्ने वापराद्धे च वाचयन् नावसीदति ॥ ९ ॥
जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो प्रातःकाल, मध्याह्न, अपराह्न अथवा सायंकालमें रामायणका पाठ करता है, उसे कभी कोई दुःख नहीं होता है ॥ ९ ॥
अयोध्यापि पुरी रम्या शून्या वर्षगणान् बहून् ।
ऋषभं प्राप्य राजानं निवासमुपयास्यति ॥ १० ॥
( श्रीरघुनाथजीके परमधाम पधारने के पश्चात् ) रमणीय अयोध्यापुरी भी बहुत वर्षोंतक सूनी पड़ी रहेगी । फिर राजा ऋषभके समय यह आबाद होगी ॥ १० ॥
एतदाख्यानमायुष्यं सभविष्यं सहोत्तरम् ।
कृतवान् प्रचेतसः पुत्रस्तद् ब्रह्माप्यन्वमन्यत ॥ ११ ॥
प्रचेताके पुत्र महर्षि वाल्मीकिजीने अश्वमेध यज्ञकी समाप्ति के बादकी कथा एवं उत्तरकाण्डसहित रामायण नामक इस ऐतिहासिक काव्यका निर्माण किया है । ब्रह्माजीने भी इसका अनुमोदन किया था ॥ ११ ॥
अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयातस्य च ।
लभते श्रवणादेव सर्गस्यैकस्य मानवः ॥ १२ ॥
इस काव्यके एक सर्गका श्रवण करनेमात्र से ही मनुष्य एक हजार अश्वमेघ और दस हजार वाजपेय यज्ञोंका फल पा लेता है ॥ १२ ॥
प्रयागादीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा ।
नैमिषादीन्यरण्यानि कुरुक्षेत्रादिकान्यपि ॥ १३ ॥
गतानि तेन लोकेऽस्मिन् येन रामायणं श्रुतम् । जिसने इस लोक में रामायणकी कथा सुन ली, उसने मानो प्रयाग आदि तीर्थों, गङ्गा आदि पवित्र नदियों, नैमिषा-रण्य आदि वनों और कुरुक्षेत्र आदि पुण्यक्षेत्रोंकी यात्रा पूरी कर ली ॥ १३३ ॥
हेमभारं कुरुक्षेत्रे ग्रस्ते भानौ प्रयच्छति ॥ १४ ॥
यश्च रामायणं लोके शृणोति सदृशावुभौ । जो सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्रमें एक भार सुवर्णका दान करता है और जो लोकमें प्रतिदिन रामायण सुनता है, बे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं ॥ १४३ ॥
सम्यक् श्रद्धासमायुक्तः शृणुते राघवीं कथाम् ॥ १५ ॥
सर्वपापात् प्रमुच्येत विष्णुलोकं स गच्छति ।