श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 1–10
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10
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॥ श्रीराम ॥ श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासविरचित श्रीरामचरितमानस [सचित्र, सटीक-मोटा टाइप ] गीताप्रेस गोरखपुर टीकाकार— हनुमानप्रसाद पोद्दारGITA PRESS, GORAKHPUR [SINCE 1923]
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81 सत्यं॥शिवंश्रीरामसुन्दरम्॥ श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीविरचित श्रीरामचरितमानस [सचित्र, सटीक, मोटा टाइप ]
श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई ।
नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई ॥
मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे ।
अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे ॥
टीकाकार - हनुमानप्रसाद पोद्दार
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॥ श्रीहरिः ॥ निवेदन श्रीरामचरितमानसका स्थान हिंदी-साहित्यमें ही नहीं, जगत्के साहित्यमें निराला है । इसके जोड़का ऐसा ही सर्वाङ्गसुन्दर, उत्तम काव्यके लक्षणोंसे युक्त, साहित्यके सभी रसोंका आस्वादन करानेवाला, काव्यकलाकी दृष्टिसे भी सर्वोच्च कोटिका तथा आदर्श गार्हस्थ्य-जीवन, आदर्श राजधर्म, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पातिव्रतधर्म, आदर्श भ्रातृधर्मके साथ -साथ सर्वोच्च भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य तथा सदाचारकी शिक्षा देनेवाला, स्त्री-1-पुरुष, बालक - वृद्ध और युवा - सबके लिये समान उपयोगी एवं सर्वोपरि सगुण-साकार भगवान्की आदर्श मानवलीला तथा उनके गुण, प्रभाव, रहस्य तथा प्रेमके गहन तत्त्वको अत्यन्त सरल, रोचक एवं ओजस्वी शब्दोंमें व्यक्त करनेवाला कोई दूसरा ग्रन्थ हिंदी - भाषामें ही नहीं, कदाचित् संसारकी किसी भाषामें आजतक नहीं लिखा गया । यही कारण है कि जितने चावसे गरीब-अमीर, शिक्षित-अशिक्षित, गृहस्थ-संन्यासी, स्त्री-पुरुष, बालक -वृद्ध - सभी श्रेणीके लोग इस ग्रन्थरत्नको पढ़ते हैं, उतने चावसे और किसी ग्रन्थको नहीं पढ़ते तथा भक्ति, ज्ञान, नीति, सदाचारका जितना प्रचार जनतामें इस ग्रन्थसे हुआ है, उतना कदाचित् और किसी ग्रन्थसे नहीं हुआ । जिस ग्रन्थका जगत्में इतना मान हो, उसके अनेकों संस्करणोंका छपना तथा उसपर अनेकों टीकाओंका लिखा जाना स्वाभाविक ही है । इस नियमके अनुसार श्रीरामचरितमानसके भी आजतक सैकड़ों संस्करण छप चुके हैं । इसपर सैकड़ों ही टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं । हमारे गीता- पुस्तकालयमें रामायण- सम्बन्धी सैकड़ों ग्रन्थ भिन्न -भिन्न भाषाओंके आ चुके हैं । अबतक अनुमानतः इसकी लाखों प्रतियाँ छप चुकी होंगी । आये दिन इसका एक-न-एक नया संस्करण देखनेको मिलता है और उसमें अन्य संस्करणोंकी अपेक्षा कोई-न- कोई विशेषता अवश्य रहती है । इसके पाठके सम्बन्धमें भी रामायणी विद्वानोंमें बहुत मतभेद है, यहाँतक कि कई स्थलोंमें तो प्रत्येक चौपाईमें एक-न-एक पाठभेद भिन्न-भिन्न संस्करणोंमें मिलता है । जितने पाठभेद इस ग्रन्थके मिलते हैं, उतने कदाचित् और किसी प्राचीन ग्रन्थके नहीं मिलते । इससे भी इसकी सर्वोपरि लोकप्रियता सिद्ध होती है । इसके अतिरिक्त रामचरितमानस एक आशीर्वादात्मक ग्रन्थ है । इसके प्रत्येक पद्यको श्रद्धालु लोग मन्त्रवत् आदर देते हैं और इसके पाठसे लौकिक एवं पारमार्थिक अनेक कार्य सिद्ध करते हैं । यही नहीं, इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने तथा इसमें आये हुए उपदेशोंका विचारपूर्वक मनन करने एवं उनके अनुसार आचरण करनेसे तथा इसमें वर्णित भगवान्की मधुर लीलाओंका चिन्तन एवं कीर्तन करनेसे मोक्षरूप परम पुरुषार्थ एवं उससे भी बढ़कर भगवत्प्रेमकी प्राप्ति आसानीसे की जा सकती है । क्यों न हो, जिस ग्रन्थकी रचना गोस्वामी
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[ ४ ] तुलसीदासजी -जैसे अनन्य भगवद्भक्तके द्वारा, जिन्होंने भगवान् श्रीसीतारामजीकी कृपासे उनकी दिव्य लीलाओंका प्रत्यक्ष अनुभव करके यथार्थ रूपमें वर्णन किया है, साक्षात् भगवान् श्रीगौरीशंकरजीकी आज्ञासे हुई तथा जिसपर उन्हीं भगवान्ने ‘ सत्यं शिवं सुन्दरम्’ लिखकर अपने हाथसे सही की, उसका इस प्रकारका अलौकिक प्रभाव कोई आश्चर्यक बात नहीं है । ऐसी दशामें इस अलौकिक ग्रन्थका जितना भी प्रचार किया जायगा, जितना अधिक पठन -पाठन एवं मनन--अनुशीलन होगा, उतना ही जगत्का मङ्गल होगा- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है । वर्तमान समयमें तो, जब सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है, सारा संसार दुःख एवं अशान्तिकी भीषण ज्वालासे जल रहा है, जगत्के कोने-कोनेमें मार-काट मची हुई है और प्रतिदिन हजारों मनुष्योंका संहार हो रहा है, करोड़ों- अरबोंकी सम्पत्ति एक- दूसरेके विनाशके लिये खर्च की जा रही है, विज्ञानकी सारी शक्ति पृथ्वीको श्मशानके रूपमें परिणत करनेमें लगी हुई है, संसारके बड़े -से- बड़े मस्तिष्क संहारके नये -नये साधनोंको ढूँढ़ निकालनेमें व्यस्त हैं, जगत्में सुख -शान्ति एवं प्रेमका प्रसार करने तथा भगवत्कृपाका जीवनमें अनुभव करनेके लिये रामचरितमानसका पाठ एवं अनुशीलन परम आवश्यक है । इसी दृष्टिसे गीताकी भाँति मानसके भी कई छोटे - बड़े यथासाध्य शुद्ध, प्रामाणिक, सस्ते, सचित्र एवं सटीक संस्करण निकालनेका आयोजन गीताप्रेसके द्वारा किया जा रहा है । इस संस्करणमें दोहे - चौपाइयोंका अर्थ वही है, जो ' मानसाङ्क' में था । पाठ एवं अर्थकी भूलोंके लिये हम अपने विज्ञ पाठक महानुभावोंसे क्षमा-प्रार्थना करते हैं और भगवान्की वस्तु विनम्रभावसे भगवान्की सेवामें अर्पण करते हैं । विनीत- प्रकाशक
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॥ श्रीहरिः ॥ श्रीरामचरितमानसकी विषय - सूची विषय पृष्ठ-संख्या - विषय पृष्ठ संख्या १- नवाह्नपारायणके विश्राम -स्थान. १२ २२ - पतिके अपमानसे दुःखी होकर सतीका २- मासपारायणके विश्राम -स्थान १२ योगाग्निसे जल जाना, दक्ष - यज्ञ-विध्वंस ८३ ३- पारायण-विधि १३ २३ - पार्वतीका जन्म और. तपस्या ८४ बालकाण्ड २४- श्रीरामजीका शिवजीसे विवाहके ४- मंगलाचरण. १७2 लिये अनुरोध. ९३ ५- गुरु- वन्दना. १2९ २५- सप्तर्षियोंकी परीक्षामें पार्वतीजीका ६- ब्राह्मण - संत -वन्दना. २०2 महत्त्व ९४ ७- खल-वन्दना २३m २६- कामदेवका देवकार्यके लिये जाना ८- संत - असंत- वन्दना. २४ और भस्म होना... ९८ ९- रामरूपसे जीवमात्रकी वन्दना २७ २७ - रतिको वरदान. १०२ १०- तुलसीदासजीकी दीनता और २८- देवताओंका शिवजीसे ब्याहके लिये प्रार्थना करना, सप्तर्षियोंका पार्वतीके. रामभक्तिमयी कविताकी महिमा २८ पास जाना... १०३ - -.११ कवि वन्दना ३५१२- वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, २९ - शिवजीकी विचित्र बारात और विवाहकी तैयारी १०७, शिव पार्वती आदिकी वन्दना ३६१३- श्रीसीताराम - धाम-परिकर- वन्दना.... ३८ ३०-- शिवजीका विवाह ११५ १४- श्रीनाम- वन्दना और नाम-महिमा.... ४१ ३१ - शिव - पार्वती -संवाद १२१ . १३२१५ - श्रीरामगुण और श्रीरामचरितकी ३२- अवतारके हेतु. ३३- नारदका अभिमान और मायाका प्रभाव १३८ महिमा ४९ ३४ - विश्वमोहिनीका स्वयंवर, शिवगणोंको.१६- मानसनिर्माणकी तिथि ५५ तथा भगवान्को शाप और नारदका१७- मानसका रूप और माहात्म्य ५६ १८- याज्ञवल्क्य- भरद्वाज - संवाद - मोह भंग १४० -. तथा प्रयाग माहात्म्य ६६ - - - ३५ मनु शतरूपा तप एवं वरदान १५०१९- सतीका भ्रम, श्रीरामजीका ऐश्वर्य - ३६ प्रतापभानुकी ३७- रावणादिका जन्म कथा, तपस्या और उनका १५ ९. और सतीका खेद ७१२०- शिवजीद्वारा सतीका त्याग, शिवजीकी.. ऐश्वर्य तथा अत्याचार १७७ ३८ - पृथ्वी और देवतादिकी करुण पुकार १८५. समाधि ७७ - -.२१- सतीका दक्ष यज्ञमें जाना ८२ ३ ९ भगवान्का वरदान १८८
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[ ६ ] विषय पृष्ठ-संख्या - विषय पृष्ठ संख्या ४०- राजा दशरथका पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियोंका ५ ९- बारातका जनकपुरमें आना गर्भवती होना.. १९० और स्वागतादि २८८ ४१- श्रीभगवान्का प्राकट्य और ६० - श्रीसीता - राम -विवाह.. ३०६ बाललीलाका आनन्द १९ २ ६१- बारातका अयोध्या लौटना और ४२- विश्वामित्रका राजा दशरथसे राम- अयोध्यामें आनन्द.. ३२६ लक्ष्मणको माँगना २०५ ६२ - श्रीरामचरित सुनने -गानेकी महिमा... ३४१ ४३- विश्वामित्र- यज्ञकी रक्षा २०८ अयोध्याकाण्ड ४४- अहल्या-उद्धार. २०९ ६३ - मंगलाचरण.. ३४३ ४५- श्रीराम- लक्ष्मणसहित विश्वामित्रका ६४- रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे. जनकपुरमें प्रवेश २११४६ - श्रीराम- लक्ष्मणको देखकर जनकजीकी उनकी प्रार्थना ३४८ ६५- सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, - प्रेम मुग्धता २१३ ४७– श्रीराम- लक्ष्मणका जनकपुर -निरीक्षण... २१६ - -. कैकेयी मन्थरा संवाद ३५३४८- पुष्पवाटिका - निरीक्षण, सीताजीका - ६६ कैकेयीका कोपभवनमें जाना ३६२ ६७- दशरथ- कैकेयी- संवाद और दशरथ- प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीका शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और. परस्पर दर्शन २२३ ४९- श्रीसीताजीका पार्वती- पूजन एवं वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें वरदानप्राप्ति तथा राम-लक्ष्मण-संवाद २२९. भेजना ३६४ ५० - श्रीराम-लक्ष्मणसहित विश्वामित्रका - -. ६८- श्रीराम कैकेयी संवाद ३७७. यज्ञशालामें प्रवेश २३५ ६ ९- श्रीराम -दशरथ - संवाद, अवध-५१ - श्रीसीताजीका यज्ञशालामें . समझानावासियोंका विषाद, कैकेयीको ३८१ प्रवेश २४२५२- बन्दीजनोंद्वारा जनकप्रतिज्ञाकी - -. ७० श्रीराम- कौसल्या संवाद ३८७. -.. घोषणा २४३ ७१- श्रीसीता--राम संवाद ३९४ ५३ - राजाओंसे धनुष न उठना, - - - -. ७२ श्रीराम कौसल्या सीता संवाद ४०० - - -. जनककी निराशाजनक वाणी २४४ ७३ श्रीराम लक्ष्मण संवाद ४०२ - - -.५४ श्रीलक्ष्मणजीका क्रोध २४५ ७४- श्रीलक्ष्मण सुमित्रा संवाद ४०४ ७५- श्रीरामजी, लक्ष्मणजी, सीताजीका -.५५ धनुषभंग २५२ महाराज दशरथके पास विदा माँगने -५६ जयमाल पहनाना २५५ ५७- श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद २६० जाना, दशरथजीका सीताजीको समझाना. ४०६ ७६- श्रीराम - सीता - लक्ष्मणका वनगमन५८- दशरथजीके पास जनकजीका दूत भेजना, अयोध्यासे बारातका और नगर-निवासियोंको सोये प्रस्थान २७३ छोड़कर आगे बढ़ना ४०९
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- - विषय पृष्ठ संख्या [७ ] विषय पृष्ठ संख्या ७७– श्रीरामका शृङ्गवेरपुर पहुँचना, - ९ ५. - भरद्वाजद्वारा- भरतका-..सत्कार ५२० निषादके द्वारा सेवा ४ ९ ५ ९ ६ इन्द्र बृहस्पति संवाद ५२४७८- लक्ष्मण- निषाद-संवाद, श्रीराम- -. ९७ भरतजी चित्रकूटके मार्गमें ५२७ सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका ९८ - श्रीसीताजीका स्वप्न, श्रीरामजीको - लौटना ४१८ कोल किरातोंद्वारा भरतजी ७९- केवटका प्रेम और गङ्गा- पार जाना. ४२६ आगमनकी सूचना, रामजीका शोक, ८०- प्रयाग पहुँचना, श्रीराम- भरद्वाज - संवाद,............ लक्ष्मणजीका क्रोध ५३१ ९९- श्रीरामजीका लक्ष्मणजीको समझाना. यमुनातीरनिवासियोंका प्रेम ४३० एवं भरतजीकी महिमा कहना..... ५३६ -८१- तापस प्रकरण ४३५ ८२- यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम. ४३६ - -, १०० भरतजीका मन्दाकिनी स्नान चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका - - -.८३ श्रीराम वाल्मीकि संवाद ४४७८४- चित्रकूटमें निवास, कोल- भीलोंके परस्पर मिलाप, पिताका शोक. द्वारा सेवा ४५४ और श्राद्ध ५३७ ८५- सुमन्त्रका अयोध्याको लौटना और १०१ - वनवासियोंद्वारा भरतजीकी मण्डलीका..,. सर्वत्र शोक देखना ४६२ सत्कार कैकेयीका पश्चात्ताप ५५१ ८६- दशरथ- सुमन्त्र- संवाद, दशरथ- मरण. ४६७ १०२ - श्रीवसिष्ठजीका भाषण. ५५५ ५६०८७– मुनि वसिष्ठका भरतजीको बुलानेके १०३ - श्रीराम- भरतादिका संवाद कोल- १०४- जनकजीका पहुँचना,... लिये दूत भेजना ४७३८८- श्रीभरत - शत्रुघ्रका आगमन किरातादिकी भेंट, सबका परस्पर मिलाप. ५७१..., और शोक ४७४ ८ ९- भरत- कौसल्या - संवाद और १०५- कौसल्या-सुनयना- संवाद, श्रीसीताजीका शील. ५७८. दशरथजीकी अन्त्येष्टि क्रिया ४७९ १०६ - जनक - सुनयना- संवाद,९० - वसिष्ठ - भरत - संवाद, श्रीरामजीको भरतजीकी महिमा... ५८४ लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी. ४८४ १०७- जनक- वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी ९ १ - अयोध्यावासियोंसहित श्रीभरत- चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको शत्रुघ्न आदिका वनगमन ४९६ समझाना ५८७९२- निषादकी शङ्का और सावधानी. ४९९ - - -. १०८ श्रीराम भरत संवाद ५ ९२ ९३- भरत- निषाद- मिलन और संवाद एवं १० ९ - भरतजीका तीर्थ -जल -स्थापन तथा भरतजीका तथा नगरवासियोंका प्रेम ५०३. चित्रकूटभ्रमण ६०३९४- भरतजीका प्रयाग जाना और ११० - श्रीराम- भरत - संवाद, पादुका - प्रदान, भरत - भरद्वाज - संवाद. ५१२ भरतजीकी विदाई ६०६
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- [ ८] - विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या १२७- शबरीपर कृपा, नवधा भक्ति-१११ - भरतजीका अयोध्या लौटना, उपदेश और पम्पासरकी ओर भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके प्रस्थान ६६६ -. | - - -. चरित्र श्रवणकी महिमा ६० ९ १२८ नारद राम संवाद ६७४ अरण्यकाण्ड -.. १२ ९ - संतोंके लक्षण और. सत्संग-११२ मंगलाचरण ६१९ भजनके लिये प्रेरणा ६७८ ११३ - जयन्तकी कुटिलता और फलप्राप्ति ६२० किष्किन्धाकाण्ड -.. - -. | १३० मंगलाचरण ६८१११४ अत्रि मिलन एवं स्तुति ६२२ १३१ - श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना - -११५- श्रीसीता अनसूया मिलन और और श्रीराम- सुग्रीवकी मित्रता...... ६८२ श्रीसीताजीको अनसूयाजीका १३२ - सुग्रीवका दुःख सुनाना, बालिवधकी. | पातिव्रतधर्म कहना ६२५११६ - श्रीरामजीका आगे प्रस्थान, विराध-, प्रतिज्ञा- श्रीरामजीका. मित्र- - वर्णन ६८६ वध और शरभङ्ग प्रसङ्ग ६२८ लक्षण - - |११७ राक्षस-वधकी प्रतिज्ञा करना ६३० -. १३३ सुग्रीवका वैराग्य ६८९११८ - सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य- मिलन, १३४ - बालि- सुग्रीव - युद्ध, बालि- उद्धार... ६९० अगस्त्य- संवाद, रामका दण्डक- १३५ - ताराका विलाप, ताराको श्रीरामजी- द्वारा उपदेश और सुग्रीवका राज्याभिषेक - वन- प्रवेश और जटायु मिलन ६३१ तथा अंगदको युवराजपद......... ६९३११ ९ - पञ्चवटी -निवास और श्रीराम- १३६ - वर्षा ऋतु -वर्णन. ६९५ -. | लक्ष्मण संवाद ६३८ १३७ - शरद् ऋतु - वर्णन. ६९७१२० - शूर्पणखाकी कथा, शूर्पणखाका नाराजी, खर -दूषणके पास जाना और १३८ - श्रीरामकी सुग्रीवपर लक्ष्मणजीका कोप. ६९९ - खर दूषणादिका वध ६४११२१ - शूर्पणखाका रावणके निकट जाना, १३ ९ - सुग्रीव - राम- संवाद और श्रीसीताजीका अग्नि -प्रवेश और सीताजीकी खोजके लिये बंदरोंका प्रस्थान ७०१ माया-सीता ६४९ ७०५१२२ - मारीचप्रसंग और स्वर्ण-मृगरूपमें १४० - गुफामें तपस्विनीके दर्शन. १४१ - वानरोंका समुद्रतटपर आना, सम्पातीसे. | मारीचका मारा जाना ६५२ १२३ - श्रीसीताहरण और श्रीसीता-विलाप ६५७ भेंट और बातचीत ७०५ १४२- समुद्र लाँघनेका परामर्श, जाम्बवन्तका - -.. |१२४- जटायु रावण युद्ध ६५८१२५- श्रीरामजीका विलाप, जटायुका हनुमान्जीको बल याद दिलाकर प्रसंग ६६० उत्साहित करना ७०९ - -१२६ कबन्ध उद्धार ६६५ -.. १४३ श्रीरामगुणका माहात्म्य ७११