श्रीगणेशाय नमः।
श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas · Gita Press, Gorakhpur · 1058 पृष्ठ · 106 खण्ड
In English
Shri Ramcharitmanas
This is a Hindi devotional poem written by Goswami Tulsidas that narrates the life and deeds of Lord Rama. This edition from Gita Press includes illustrations and commentary by Hanumanprasad Poddar.
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विषय सूची
- । श्रीराम । श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासविरचित श्रीरामचरितमानस [सचित्र, सटीक-मोटा टाइप ] गीताप्रेस गोरखपुर टीकाकार— हनुमानप्रसाद पोद्दारGITA PRESS, GORAKHPUR… 1–10
- [ ९ ] - - विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या सुन्दरकाण्ड १५९ - विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और -.१४४ मंगलाचरण ७१३ १४५- हनुमान्जीका… 11–20
- * बालकाण्ड * १९ नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन । करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन । ३ । जो नील कमलके समान श्यामवर्ण हैं, पूर्ण खिले हुए लाल कमलके… 21–30
- * बालकाण्ड * २९ रसीली हो या अत्यन्त फीकी, अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती? किन्तु जो दूसरेकी रचनाको सुनकर हर्षित होते हैं, ऐसे उत्तम पुरुष जगत्में बहुत… 31–40
- * बालकाण्ड * ३ ९ सो० – बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद । बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ । १६… 41–50
- * बालकाण्ड * ४९ ऐसे कराल ( कलियुगके ) कालमें तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसारके सब जंजालोंको नाश कर देनेवाला है… 51–60
- * बालकाण्ड * ५९ सगुण लीलाका जो विस्तारसे वर्णन करते हैं, वही राम- सुयशरूपी जलकी निर्मलता है, जो मलका नाश करती है; और जिस प्रेमाभक्तिका वर्णन नहीं किया जा… 61–70
- * बालकाण्ड * ६९ जैसें मिटै मोर भ्रम भारी । कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी । जागबलिक बोले मुसुकाई । तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई… 71–80
- * बालकाण्ड * ७९ वृषकेतु शिवजीने सतीको चिन्तायुक्त जानकर उन्हें सुख देनेके लिये सुन्दर कथाएँ कहीं… 81–90
- * बालकाण्ड * ८९ अस कहि परी चरन धरि सीसा । बोले सहित सनेह गिरीसा । बरु पावक प्रगटै ससि माहीं । नारद बचनु अन्यथा नाहीं… 91–100
- * बालकाण्ड * ९९ ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना । धीरज धरम ग्यान बिग्याना । सदाचार जप जोग बिरागा । सभय बिबेक कटकु सबु भागा… 101–110
- * बालकाण्ड * १० ९ नगर निकट बरात सुनि आई । पुर खरभरु सोभा अधिकाई । करि बनाव सजि बाहन नाना । चले लेन सादर अगवाना… 111–120
- * बालकाण्ड * ११ ९ शिवजीके चरणकमलोंमें जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्रीरामचन्द्रजीको स्वप्नमें भी अच्छे नहीं लगते… 121–130
- * बालकाण्ड * १२ ९ हरषराम ब्रह्मबिषादब्यापकग्यानजगअग्यानाजाना । परमानंदजीव धर्म अहमितिपरेस अभिमानापुराना… 131–140
- * बालकाण्ड * १३ ९ यद्यपि शिवजीने यह हितकी शिक्षा दी, पर नारदजीको वह अच्छी न लगी । हे भरद्वाज! अब कौतुक ( तमाशा ) सुनो । हरिकी इच्छा बड़ी बलवान् है । १२७… 141–150
- * बालकाण्ड * १४९ श्रीहरि अनन्त हैं ( उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनन्त है; सब संतलोग उसे बहुत प्रकारसे कहते - सुनते हैं… 151–160
- * बालकाण्ड * १५ ९ दो० – यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु । भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु । १५२… 161–170
- * बालकाण्ड * १६ ९ मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुःखसे रहित हो जाय; मुझे युद्धमें कोई जीत न सके और पृथ्वीपर मेरा सौ कल्पतक एकच्छत्र अकण्टक राज्य हो… 171–180
- * बालकाण्ड * १७९ फिर ब्रह्माजी विभीषणके पास गये और बोले–हे पुत्र! वर माँगो । उसने भगवान्के चरणकमलोंमें निर्मल ( निष्काम और अनन्य ) प्रेम माँगा । १७७… 181–190
- * बालकाण्ड * १८ ९ दो० – निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ । बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ । १८७… 191–200
- * बालकाण्ड * १ ९९ कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई । आनन अमित मदन छबि छाई । दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे । नासा तिलक को बरनै पारे… 201–210
- * बालकाण्ड * २० ९ आश्रम एक दीख मग माहीं । खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं । पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी । सकल कथा मुनि कहा बिसेषी… 211–220
- * बालकाण्ड * २१ ९ देखि राम छबि कोउ एक कहई । जोगु जानकिहि यह बरु अहई । जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू । पन परिहरि हठि करइ बिबाहू… 221–230
- * बालकाण्ड * २२ ९ सकुचि सीयँ तब नयन उघारे । सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे । नख सिख देखि राम कै सोभा । सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा… 231–240
- * बालकाण्ड * २३ ९ एक बार कालउ किन होऊ । सिय हित समर जितब हम सोऊ । यह सुनि अवर महिप मुसुकाने । धरमसील हरिभगत सयाने… 241–250
- * बालकाण्ड * २४९ दो० – मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब । महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब । २५६… 251–260
- * बालकाण्ड * २५ ९ परशुरामजीका भयानक वेष देखकर सब राजा भयसे व्याकुल हो उठ खड़े हुए और पितासहित अपना नाम कह - कहकर सब दण्डवत् प्रणाम करने लगे । १… 261–270
- * बालकाण्ड * २६ ९ राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा । कर कुठारू आगें यह सीसा । जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी । मोहि जानिअ आपन अनुगामी… 271–280
- * बालकाण्ड * २७९ तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ । धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ । तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी । तसि पुनीत कौसल्या देबी… 281–290
- * बालकाण्ड * २८ ९ जानी सियँ बरात पुर आई । कछु निज महिमा प्रगटि जनाई । हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई । भूप पहुनईपहुनई करन पठाई… 291–300
- * बालकाण्ड * २९९ सभी स्त्रियाँ चन्द्रमुखी ( चन्द्रमाके समान मुखवाली ) और सभी मृगलोचनी ( हरिणकी -सी आँखोंवाली ) हैं और सभी अपने शरीरकी शोभासे रतिके गर्वको… 301–310
- * बालकाण्ड * ३० ९ जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै । सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै… 311–320
- * बालकाण्ड * ३१ ९ सास, ससुर और गुरुकी सेवा करना । पतिका रुख देखकर उनकी आज्ञाका पालन करना । सयानी सखियाँ अत्यन्त स्नेहके वश कोमल वाणीसे स्त्रियोंके धर्म… 321–330
- * बालकाण्ड * ३२ ९ सावन घन घमंडु जनु ठयऊ । धूप धूम नभु मेचक भयऊ । सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं । मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं… 331–340
- * बालकाण्ड * ३३ ९ कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा । सुनहिं महीसु सहित रनिवासा । मुनि मन अगम गाधिसुत करनी । मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी… 341–350
- * ** अयोध्याकाण्ड ३४९ ध्वजा, पताका, तोरण, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सबको सजाओ । मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीके वचनोंको शिरोधार्य करके सब लोग अपने -अपने काममें लग गये… 351–360
- * ** अयोध्याकाण्ड ३५ ९ दो० – रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु । कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु । १८… 361–370
- * * अयोध्याकाण्ड ३६ ९ जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये — हाँ कीजिये, नहीं तो नाहीं कर दीजिये… 371–380
- * ** अयोध्याकाण्ड ३७९ हे माता! मुझे एक ही दुःख विशेषरूपसे हो रहा है, वह महाराजको अत्यन्त व्याकुल देखकर… 381–390
- * * अयोध्याकाण्ड ३८ ९ धरि धीरजु सुत बदनु निहारी । गदगद बचन कहति महतारी । तात पितहि तुम्ह प्रान पिआरे । देखि मुदित नित चरित तुम्हारे… 391–400
- * ** अयोध्याकाण्ड ३ ९९ मोहि मग चलत न होइहि हारी । छिनु छिनु चरन सरोज निहारी । सहि भाँति पय सेवा करिहौं । मारग जनित सकल श्रम हरिहौं… 401–410
- * ** अयोध्याकाण्ड ४० ९ सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं । इन बातोंको सुनकर कैकेयी तमककर उठी । उसने मुनियोंके वस्त्र, आभूषण ( माला, मेखला आदि) और बर्तन (… 411–420
- * ** अयोध्याकाण्ड ४१ ९ वही श्रीसीता और श्रीरामजी आज घास- फूसकी साथरीपर थके हुए बिना वस्त्रके ही सोये हैं । ऐसी दशामें वे देखे नहीं जाते… 421–430
- * ** अयोध्याकाण्ड ४२९ तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा । पूजि पारथिव नायउ माथा । सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी । मातु मनोरथ पुरउबि मोरी… 431–440
- * * अयोध्याकाण्ड ४३ ९ एक कलस भरि आनहिं पानी । अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी । सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी । राम कृपाल सुसील बिसेषी… 441–450
- * अयोध्याकाण्ड * ४४९ छं०- श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी । जो सृजतिजगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की… 451–460
- * ** अयोध्याकाण्ड ४५९ और हिमालय आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूटका यश गाते हैं । विन्ध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मनमें सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना… 461–470
- * * अयोध्याकाण्ड ४६ ९ केवट कीन्हि बहुत सेवकाई । सो जामिनि सिंगरौर गवाँई । होत प्रात बट छीरु मगावा । जटा मुकुट निज सीस बनावा… 471–480
- * ** अयोध्याकाण्ड ४७९ माताकी कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजीके सब अङ्ग क्रोधसे जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता… 481–490
- * ** अयोध्याकाण्ड ४८९ जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ सम्बन्धको जान लेगा, वह सभी प्रकारसे तुमसे भला मानेगा… 491–500
- * ** अयोध्याकाण्ड ४९९ राम दरस बस सब नर नारी । जनु करि करिनि चले तकि बारी । बन सिय रामु समुझि मन माहीं । सानुज भरत पयादेहिं जाहीं… 501–510
- * अयोध्याकाण्ड * ५० ९ सूर्यकुलके सूर्य राजा दशरथजी जिनके ससुर हैं, जिनको अमरावतीके स्वामी इन्द्र भी सिहाते थे ( ईर्ष्यापूर्वक उनके जैसा ऐश्वर्य और प्रताप… 511–520
- * ** अयोध्याकाण्ड ५१ ९ नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू । पितहु मरन कर मोहि न सोकू । सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए । लछिमन राम सरिस सुत पाए… 521–530
- * ** अयोध्याकाण्ड ५२ ९ भायप भगति भरत आचरनू । कहत सुनत दुख दूषन हरनू । जो किछु कहब थोर सखि सोई । राम बंधु अस काहे न होई… 531–540
- * ** अयोध्याकाण्ड ५३ ९ उस समय भरतकी दशा कैसी है? जैसी जल प्रवाहमें जलके भौरेकी गति होती है । भरतजीका सोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद विदेह हो गया ( देहकी… 541–550
- * अयोध्याकाण्ड * ५४९ जनकसुता तब उर धरि धीरा । नील नलिन लोयन भरि नीरा । मिली सकल सासुन्ह सिय जाई । तेहि अवसर करुना महि छाई… 551–560
- * '* अयोध्याकाण्ड ५५ ९ आरत कहहिं बिचारि न काऊ । सूझ जुआरिहि आपन दाऊ । सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ । नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ… 561–570
- * * अयोध्याकाण्ड ५६ ९ किन्तु संकोची श्रीरघुनाथजी चुप ही रह गये । प्रभुकी यह स्थिति (मौन ) देख सारी सभा सोचमें पड़ गयी… 571–580
- * * अयोध्याकाण्ड ५७९ दो० - सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल । जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल । २८१… 581–590
- * ** अयोध्याकाण्ड ५८ ९ इस समाज और [ पुण्य] स्थलमें आप [जैसे ज्ञानी और पूज्य] का पूछना! इसपर यदि मैं मौन रहता हूँ तो मलिन समझा जाऊँगा; और बोलना पागलपन होगा… 591–600
- * ** अयोध्याकाण्ड ५ ९९ धर्मधुरन्धर, धीर, नीतिमें चतुर; सत्य, स्नेह, शील और सुखके समुद्र; नीति और प्रीतिके पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल, अवसर और… 601–610
- * * अयोध्याकाण्ड ६० ९ दो० –- मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ । लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ । ३१६… 611–620
- । श्रीगणेशाय नमः । श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस तृतीय सोपान अरण्यकाण्ड श्लोक मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं… 621–630
- * अरण्यकाण्ड * ६२ ९ तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा । देखि दुखी निज धाम पठावा । पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा । सुंदर अनुज जानकी संगा… 631–640
- * अरण्यकाण्ड * ६३ ९ पक्षी और पशुओंके समूह आनन्दित रहते हैं और भौरे मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं… 641–650
- * अरण्यकाण्ड * ६४९ सब [' यही राम है, इसे मारो ' इस प्रकार ] राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण ( मोक्ष ) पद पाते हैं… 651–660
- * अरण्यकाण्ड * ६५ ९ गृध्रराज जटायुने सीताजीकी दुःखभरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नी हैं… 661–670
- * अरण्यकाण्ड * ६६ ९ सब कथा कहकर भगवान्के मुखके दर्शन कर, हृदयमें उनके चरणकमलोंको धारण कर लिया और योगाग्निसे देहको त्यागकर ( जलाकर ) वह उस दुर्लभ हरिपदमें… 671–680
- * अरण्यकाण्ड * ६७९ मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते । कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते । सदा मेरी लीलाओंको गाते- सुनते हैं और बिना ही कारण दूसरोंके हितमें लगे… 681–690
- ** * किष्किन्धाकाण्ड ६८ ९ उपजा ग्यान बचन तब बोला । नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला । सुख संपति परिवार बड़ाई । सब परिहरि करिहउँ सेवकाई… 691–700
- * * किष्किन्धाकाण्ड ६ ९९ भौरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, तथा पक्षियोंके नाना प्रकारके सुन्दर शब्द हो रहे हैं… 701–710
- ** किष्किन्धाकाण्ड * ७०९ [ उन्होंने कहा— ] त्रेतायुगमें साक्षात् परब्रह्म मनुष्यशरीर धारण करेंगे । उनकी स्त्रीको राक्षसोंका राजा हर ले जायगा… 711–720
- * * सुन्दरकाण्ड ७१ ९ हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [ दूसरे पलड़ेपर रखे हुए ] उस सुखके बराबर नहीं हो… 721–730
- * * सुन्दरकाण्ड ७२९ राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण अग्निके समान हैं । हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और राक्षसोंको जला ही समझो । १५… 731–740
- * * सुन्दरकाण्ड ७३९ तात सक्रसुत कथा सुनाएहु । बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु । मास दिवस महुँ नाथु न आवा । तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा… 741–750
- * * सुन्दरकाण्ड ७४९ रावणके लिये भी वही सहायता ( संयोग ) आ बनी है । मन्त्री उसे सुना - सुनाकर ( मुँहपर ) स्तुति करते हैं… 751–760
- * * सुन्दरकाण्ड ७५९ [ और कहा— ] हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगत्में मेरा दर्शन अमोघ है ( वह निष्फल नहीं जाता )… 761–770
- * * सुन्दरकाण्ड ७६९ समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत ( उसकी सलाह ) अच्छा लगा । यह चरित्र कलियुगके पापोंको हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी… 771–780
- * * लङ्काकाण्ड ७७९ दो०- अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात । नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात । ७… 781–790
- * * लङ्काकाण्ड ७८९ उसने अंगदपर लात उठायी । अंगदने [ वही ] पैर पकड़कर उसे घुमाकर जमीनपर दे पटका ( मार गिराया )… 791–800
- * * लङ्काकाण्ड ७९९ दिगपालन्ह मैं नीर भरावा । भूप सुजस खल मोहि सुनावा । जौं पै समर सुभट तव नाथा । पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा… 801–810
- * * लङ्काकाण्ड ८०९ काल दण्ड ( लाठी ) लेकर किसीको नहीं मारता । वह धर्म, बल, बुद्धि और विचारको हर लेता है… 811–820
- * * लङ्काकाण्ड ८१ ९ माल्यवंत अति जरठ निसाचर । रावन मातु पिता मंत्री बर । बोला बचन नीति अति पावन । सुनहु तात कछु मोर सिखावन… 821–830
- * * लङ्काकाण्ड ८२९ तात कुसल कहु सुखनिधान की । सहित अनुज अरु मातु जानकी । कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महुँ पछिताने… 831–840
- * * लङ्काकाण्ड ८३९ [ वे कहने लगे— ] यह राक्षस दुर्भिक्षके समान है, जो अब वानरकुलरूपी देशमें पड़ना चाहता है… 841–850
- * * लङ्काकाण्ड ८४९ अत्यन्त गर्वके कारण वह शकुन -अशकुनका विचार नहीं करता । हथियार हाथोंसे गिर रहे हैं । योद्धा रथसे गिर पड़ते हैं… 851–860
- * * लङ्काकाण्ड ८५९ दो० –- सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार । जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार । ८६… 861–870
- * * लङ्काकाण्ड ८६ ९ ठाढ़ रहा अति कंपित गाता । गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता । पुनि रावन कपि हतेउ पचारी । चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी… 871–880
- * * लङ्काकाण्ड ८७९ नाभिकुंड पियूष बस याकें । नाथ जिअत रावनु बल ताकें । सुनत बिभीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान कराला । इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है… 881–890
- * * लङ्काकाण्ड ८८९ तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी । सदा एकरस सहज उदासी । अकल अगुन अज अनघ अनामय । अजित अमोघसक्ति करुनामय… 891–900
- * * लङ्काकाण्ड ८ ९९ प्रभो! आप जो कुछ भी कहें, आपको सब सोहता है । पर आपके वचन सुनकर हमको मोह होता है । हे रघुनाथजी! आप तीनों लोकोंके ईश्वर हैं… 901–910
- * उत्तरकाण्ड * ९० ९ तब हनुमान्जीने भरतजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजीकी सारी गुणगाथा कही… 911–920
- * * उत्तरकाण्ड ९ १ ९ [ इधर] सासुओंने जानकीजीको आदरके साथ तुरंत ही स्नान कराके उनके अङ्ग - अङ्गमें दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भलीभाँति सजा दिये ( पहना… 921–930
- * * उत्तरकाण्ड ९२९ और बार- बार दण्डवत् - प्रणाम करते हैं । मनमें ऐसा आता है कि श्रीरामजी मुझे रहनेको कह दें… 931–940
- * उत्तरकाण्ड * ९३ ९ दो० – रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ । अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ । २ ९… 941–950
- * * उत्तरकाण्ड ९४९ कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता । सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता । अस बिचारि जे परम सयाने । भजहिं मोहि संसृत दुख जाने… 951–960
- * उत्तरकाण्ड * ९५ ९ हे नाथ! आपका मुखरूपी चन्द्रमा श्रीरघुवीरकी कथारूपी अमृत बरसाता है । हे मतिधीर! मेरा मन कर्णपुटोंसे उसे पीकर तृप्त नहीं होता… 961–970
- * उत्तरकाण्ड * ९६ ९ मनमें परम उत्साह भरकर अनेकों प्रकारकी बाललीलाएँ कहकर, फिर ऋषि विश्वामित्रजीका अयोध्या आना और श्रीरघुवीरजीका विवाह वर्णन किया । ६४… 971–980
- * उत्तरकाण्ड * ९७९ एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर । सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर । ७५ ( ख ) । एक बार श्रीरघुवीरने सब चरित्र बहुत अधिकतासे किये… 981–990
- * उत्तरकाण्ड * ९८९ भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवोंके समान ही प्रिय है । परन्तु भक्तिमान् अत्यन्त नीच भी प्राणी मुझे प्राणोंके समान प्रिय… 991–1000
- * उत्तरकाण्ड * ९९९ हे पक्षिराज! सुनिये, अब मैं अपने प्रथम जन्मके चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभुके चरणोंमें प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश… 1001–1010
- * उत्तरकाण्ड * १०० ९ अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति मैं दिन- रात गुरुजीसे द्रोह करता । गुरुजी अत्यन्त दयालु थे, उनको थोड़ा- सा भी क्रोध नहीं आता… 1011–1020
- * उत्तरकाण्ड * १०१ ९ पावन जस कि पुन्य बिनु होई । बिनु अघ अजस कि पावइ कोई । लाभु कि किछु हरि भगति समाना । जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना… 1021–1030
- * उत्तरकाण्ड * १०२९ जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई । तबहिं दीप बिग्यान बुझाई । ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा । बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा… 1031–1040
- * उत्तरकाण्ड * १०३ ९ यद्यपि मैं सब प्रकारसे हीन ( नीच ) हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य हूँ, जो श्रीरामजीने मुझे अपना ' निज जन ' जानकर संत-समागम… 1041–1050
- । श्रीहरिः । गोस्वामी तुलसीदासजीकी संक्षिप्त जीवनी प्रयागके पास चित्रकूट जिलेमें राजापुर नामक एक ग्राम है, वहाँ आत्माराम दूबे नाम एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण… 1051–1058