श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 11–20
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20
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[ ९ ] - - विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या सुन्दरकाण्ड १५९ - विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और -.१४४ मंगलाचरण ७१३ १४५- हनुमान्जीका लङ्काको प्रस्थान, शरणप्राप्ति ७५२ सुरसासे भेंट, छाया पकड़नेवाली १६० - समुद्र पार करनेके लिये विचार, रावणदूत शुकका आना और राक्षसीका वध ७१४ १४६ - लङ्कावर्णन,. लङ्किनीपर प्रहार, लौटनालक्ष्मणजीके पत्रको लेकर ७५९ लङ्कामें प्रवेश ७१६ १६१ - दूतका रावणको समझाना और - - -.१४७ हनुमान् विभीषण संवाद ७२० -१४८ हनुमान्जीका अशोकवाटिकामें लक्ष्मणजीका पत्र देना ७६२ सीताको देखकर दुःखी होना १६२ - समुद्रपर श्रीरामजीका क्रोध और और रावणका सीताजीको भय समुद्रकी विनती ७६६ | - दिखलाना ७२२ १६३ श्रीराम- गुणगानकी महिमा ७६९ लङ्काकाण्ड - - -.१४ ९ श्रीसीता त्रिजटा संवाद ७२४ - - - | -.१५० श्रीसीता हनुमान् संवाद ७२६ १६४ मंगलाचरण ७७१ - -,१५१ - हनुमान्जीद्वारा अशोकवाटिका- १६५ नल नीलद्वारा पुल बाँधना श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना ७७३ विध्वंस, अक्षयकुमार-वध और मेघनादका हनुमान्जीको नागपाशमें १६६- श्रीरामजीका सेनासहित समुद्र पार बाँधकर सभामें ले जाना............. ७३० उतरना, सुबेल पर्वतपर निवास, - -...१५२ हनुमान् रावण संवाद ७३३ रावणकी व्याकुलता ७७६ | १६७- रावणको मन्दोदरीका समझाना, - -.१५३ लङ्का दहन ७३७१५४- लङ्का जलानेके बाद हनुमान्जीका - - रावण प्रहस्त संवाद ७७७ सीताजीसे विदा माँगना और. १६८- सुबेलपर श्रीरामजीकी.. झाँकी चूड़ामणि पाना ७३८ और चन्द्रोदयवर्णन ७८२१५५ - समुद्रके इस पार आना, सबका - १६९- श्रीरामजीके बाणसे रावण लौटना, मधुवन-प्रवेश, सुग्रीव- -. मुकुट छत्रादिका गिरना ७८४ मिलन, श्रीराम-हनुमान्- संवाद...... ७३९ १७० - मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना .... ७८५१५६ - श्रीरामजीका वानरोंकी सेनाके और श्रीरामकी महिमा कहना १७१ - अंगदजीका लंका जाना और साथ चलकर समुद्रतटपर रावणकी सभामें अंगद रावण संवाद ७८८ पहुँचना ७४५ १७२ - रावणको पुनः मन्दोदरीका समझाना ८०७ - - -.१५७ मन्दोदरी-रावण संवाद ७४७१५८ - रावणको विभीषणका समझाना - - - १७३ अंगद राम संवाद ८०९.. और विभीषणका अपमान ७४९ १७४- युद्धारम्भ ८११
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- विषय पृष्ठ संख्या [ १० ] विषय पृष्ठ-संख्या १७५ - माल्यवान्का रावणको समझाना... ८१९ १८ ९- रावण-हनुमान्- युद्ध, रावणका माया १७६ - लक्ष्मण- मेघनाद - युद्ध, लक्ष्मणजीको रचना, रामजीद्वारा माया- नाश.... ८६८ . शक्ति लगना ८२४ | -,. १ ९० घोर युद्ध रावणकी मूर्च्छा ८७११७७ - हनुमान्जीका सुषेण वैद्यको लाना - - -. १ ९ १ त्रिजटा सीता संवाद ८७३ १९ २ - राम - रावण - युद्ध, रावण वध, सर्वत्र एवं संजीवनीके लिये जाना, कालनेमि--रावण संवाद, मकरी- जयध्वनि ८७६, -. उद्धार कालनेमि उद्धार ८२५ | - -, १ ९ ३ मन्दोदरी विलाप रावणक१७८- भरतजीके बाणसे हनुमान्का मूर्च्छित -. अन्त्येष्टि क्रिया ८८१ होना, भरत- हनुमान्- संवाद.......... ८२८ | - १९ ४ विभीषणका राज्याभिषेक ८८४ १ ९ ५ - हनुमान्जीका सीताजीको कुशल,१७९- श्रीरामजीकी प्रलापलीला . हनुमान्जीकाउठ बैठना लौटना, लक्ष्मणजीका ८२९ सुनानाअग्नि-,परीक्षासीताजीका आगमन और ८८५,१८०- रावणका कुम्भकर्णको जगाना, १९६--देवताओंकी स्तुति इन्द्रकी कुम्भकर्णका रावणको उपदेश -. अमृत वर्षा ८८८ और विभीषण- कुम्भकर्ण- संवाद... ८३२ १ ९ ७- विभीषणकी प्रार्थना, श्रीरामजीके . ८९ ६१८१ -- कुम्भकर्ण- युद्ध और,उसकी परमगति ८३४ द्वाराशीघ्र भरतजीकेअयोध्या पहुँचनेकाप्रेमदशाकाअनुरोधवर्णन,१८२ मेघनादका युद्ध रामजीका | १९८ - विभीषणका वस्त्राभूषण बरसाना. लीलासे नागपाशमें बँधना ८४२ और वानर- भालुओंका उन्हें पहनना ८९७ - - -,१८३ मेघनाद यज्ञ विध्वंस युद्ध | १ ९९ - पुष्पकविमानपर चढ़कर श्रीसीता- -. और मेघनाद उद्धार ८४५ रामजीका अवधके लिये प्रस्थान.. ८ ९९१८४- रावणका युद्धके लिये प्रस्थान और श्रीरामजीका विजय रथ तथा -. २०० श्रीरामचरितकी महिमा ९ ०३ उत्तरकाण्ड -.. वानर राक्षसोंका युद्ध ८४९ - - -१८५ लक्ष्मण रावण युद्ध ८५४ | २०१ - मंगलाचरण. ९०५ १८६ - रावण- यज्ञ- विध्वंस, भरत- विरह तथा भरत -हनुमान्- - -मूर्च्छा-, रावण. -,. राम रावण युद्ध ८५५ २०२ - मिलन अयोध्यामें आनन्द ९०६ श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, २०३ - श्रीरामजीका स्वागत, भरत मिलाप, १८७- इन्द्रका- -. राम रावण युद्ध ८६१ सबका मिलनानन्द ९१२१८८- रावणका विभीषणपर शक्ति - -,, २०४ राम राज्याभिषेक वेदस्तुति, छोड़ना रामजीका शक्तिको शिवस्तुति ९१ ९ २०५ - वानरोंकी और निषादकी विदाई.. ९ २६ अपने - ऊपर. लेना, विभीषण- - रावण युद्ध ८६७ | २०६ रामराज्यका वर्णन ९ ३०
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- - संख्या विषय पृष्ठ [ ११] संख्या विषय पृष्ठ २०७- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता,. शापकी बात सुनना १०० ९ -. सनकादिका आगमन और २१५ रुद्राष्टक १०११ | २१६ - गुरुजीका शिवजीसे अपराध क्षमापन,. संवाद ९ ३४ शापानुग्रह और काकभुशुण्डिकी२०८ - हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश...... ९४४ आगेकी कथा. १०१२ २१७- काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके२० ९- श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश पास जाना और शाप तथा ( ), श्रीरामगीता पुरवासियोंकी अनुग्रह पाना १०१६ कृतज्ञता ९ ५० २१० - श्रीराम- वसिष्ठ-संवाद, श्रीरामजीका २१८ - ज्ञान - भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् भाइयोंसहित अमराईमें महिमा १०२४ | २१ ९- गरुड़जीके सात प्रश्न तथा जाना ९ ५४ १०३२२११ - नारदजीका आना और स्तुति काकभुशुण्डिके उत्तर करके ब्रह्मलोकको लौट जाना.... ९ ५६ २२०- भजन-महिमा.... १०३६ - रामायण - माहात्म्य, तुलसी - विनय२१२ - शिव - पार्वती - संवाद, गरुड़ -मोह, २२१ गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और फलस्तुति... १०३८ -. और राम महिमा सुनना ९५८ | २२२- रामायणजीकी आरती १०४८२१३- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा २२३ - गोस्वामी तुलसीदासजीकी संक्षिप्त...... और कलिमहिमा कहना ९९८ जीवनी १०४९ २१४- गुरुजीका अपमान एवं शिवजीके -.. २२४ श्रीरामशलाका प्रश्नावली १०५३
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नवापारायणके विश्राम-स्थान पहला विश्राम पृष्ठ-संख्या१३२ दूसरा "1 २३४ तीसरा ३३८ चौथा ४४० पाँचवाँ ५४० छठा ६६० सातवाँ "" ७८३ आठवाँ ९१८ नवाँ १०४७ मासपारायणके विश्राम-स्थान पृष्ठ-संख्या पृष्ठ-संख्या पहला विश्राम. ४७ सोलहवाँ विश्राम ४४० दूसरा ७६ सत्रहवाँ "" ४५५ तीसरा "" १०४ अठारहवाँ ४९० चौथा १३२ उन्नीसवाँ ५२३ पाँचवाँ १५ ९ बीसवाँ 22 ५४० छठा १८४ इक्कीसवाँ "" ६१७ सातवाँ २१० बाईसवाँ ६७९ आठवाँ २३४ तेईसवाँ ७११ नवाँ २६० चौबीसवाँ ७६९ दसवाँ २८७ पचीसवाँ ८१९ ग्यारहवाँ"" ३१२ छब्बीसवाँ ८७३ । बारहवाँ "" ३४१ सत्ताईसवाँ ९ ०३ तेरहवाँ "" ३६७ अट्ठाईसवाँ ९६७ चौदहवाँ ३ ९४ उनतीसवाँ १०२३| पंद्रहवाँ 22 ४२१ तीसवाँ १०४७
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॥ श्रीहरिः ॥ पारायण-विधि श्रीरामचरितमानसका विधिपूर्वक पाठ करनेवाले महानुभावोंको पाठारम्भके पूर्व श्रीतुलसीदासजी, श्रीवाल्मीकिजी, श्रीशिवजी तथा श्रीहनुमान्जीका आवाहन, पूजन करनेके पश्चात् तीनों भाइयोंसहित श्रीसीतारामजीका आवाहन, षोडशोपचार पूजन और ध्यान करना चाहिये । तदनन्तर पाठका आरम्भ करना चाहिये । सबके आवाहन, पूजन और ध्यानके मन्त्र क्रमशः नीचे लिखे जाते हैं— अथ आवाहनमन्त्रः तुलसीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुचिव्रत । नैर्ऋत्य उपविश्येदं पूजनं प्रतिगृह्यताम्॥ १ ॥
ॐ तुलसीदासाय नमः । श्रीवाल्मीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुभप्रद । उत्तरपूर्वयोर्मध्ये तिष्ठ गृह्णीष्व मेऽर्चनम्॥२ ॥ ॐ वाल्मीकाय नमः ।
महेश्वर । गौरीपते नमस्तुभ्यमिहागच्छ पूर्वदक्षिणयोर्मध्ये तिष्ठ पूजां गृहाण मे ॥३ ॥
ॐ गौरीपतये नमः । सहप्रियः । श्रीलक्ष्मण नमस्तुभ्यमिहागच्छ याम्यभागे समातिष्ठ पूजनं संगृहाण मे ॥४ ॥
ॐ श्रीसपत्नीकाय लक्ष्मणाय नमः । सहप्रियः । श्रीशत्रुघ्न नमस्तुभ्यमिहागच्छ पीठस्य पश्चिमे भागे पूजनं स्वीकुरुष्व मे ॥५ ॥
ॐ श्रीसपत्नीकाय शत्रुघ्नाय नमः । सहप्रियः । श्रीभरत नमस्तुभ्यमिहागच्छ पीठकस्योत्तरे भागे तिष्ठ पूजां गृहाण मे ॥६ ॥
ॐ श्रीसपत्नीकाय भरताय नमः ।
पूर्वभागेश्रीहनुमन्नमस्तुभ्यमिहागच्छसमातिष्ठ पूजनं स्वीकुरु कृपानिधेप्रभो ॥७। ॥
ॐ हनुमते नमः ।
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[ १४ ]
अथ प्रधानपूजा च कर्तव्या विधिपूर्वकम् ।
पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तु ध्यानं कुर्यात्परस्य च ॥ ८ ॥
रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालङ्कृतं श्यामाङ्गंकारुण्यामृतसागरंद्विभुजं प्रसन्नवदनंप्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावितंश्रीसीतया शोभितम् । वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम्॥ ९ ॥
आगच्छ जानकीनाथ जानक्या सह राघव ।
गृहाण मम पूजा च वायुपुत्रादिभिर्युतः ॥ १० ॥
इत्यावाहनम्
सुवर्णरचितं राम दिव्यास्तरणशोभितम् । आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणिचित्रितम् ॥ ११ ॥
इति षोडशोपचारैः पूजयेत् ॐ अस्य श्रीमन्मानसरामायण श्रीरामचरितस्य श्रीशिवकाकभुशुण्डियाज्ञवल्क्यगोस्वामितुलसीदासा ऋषयः श्रीसीतारामो देवता श्रीरामनाम बीजं भवरोगहरी भक्तिः शक्तिः मम नियन्त्रिताशेषविघ्नतया श्रीसीतारामप्रीतिपूर्वकसकलमनोरथसिद्ध्यर्थं पाठे विनियोगः । अथ आचमनम्
श्रीसीतारामाभ्यां नमः । श्रीरामचन्द्राय नमः । श्रीरामभद्राय नमः ।
इति मन्त्रत्रितयेन आचमनं कुर्यात् । श्रीयुगलबीजमन्त्रेण प्राणायामं कुर्यात्॥
अथ करन्यासः
जग मंगल गुनग्राम राम के । दानि मुकुति धन धरम धाम के ॥
अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ॥
तर्जनीभ्यां नमः ।
राम सकल नामन्ह तें अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ॥
मध्यमाभ्यां नमः ।
उमा दारु जोषित की नाईं । सबहि नचावत रामु गोसाईं॥
अनामिकाभ्यां नमः ।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥
कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
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१५
मामभिरक्षय रघुकुल नायक[ । ] धृत बर चाप रुचिर कर सायक ॥
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । इति करन्यासः अथ हृदयादिन्यासः
जग मंगल गुनग्राम राम के । दानि मुकुति धन धरम धाम के ॥
हृदयाय नमः ।
राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ॥
शिरसे स्वाहा ।
राम सकल नामन्ह तें अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ॥
शिखायै वषट् ।
उमा दारु जोषित की नाईं । सबहि नचावत रामु गोसाईं ॥
कवचाय हुम् ।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥
नेत्राभ्यां वौषट् ।
मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृत बर चाप रुचिर कर सायक ॥
अस्त्राय फट्। इतिहृदयादिन्यासः मामवलोकय पंकज अथलोचनध्यानम्। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन ॥ नील तामरस स्याम काम अरि । हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥
जातुधान बरूथ बल भंजन । मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन ॥
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक । असरन सरन दीन जन गाहक ॥
भुजबल बिपुलसुखरूपभार महि खंडितभूपबर ॥ जयखर दसरथदूषन बिराधकुल कुमुदबधसुधाकरपंडित ॥॥ सुजस पुरान बिदित निगमागम । गावत सुर मुनि संत समागम ॥
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन । सब बिधि कुसल कोसला मंडन ॥
कलि मल मथन नाम ममताहन । तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन ॥
इति ध्यानम्
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मायामुक्त नारदजी
तब मुनि अति सभीत हरि चरना ।
गहे पाहि प्रनतारति हरना ॥
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस प्रथम सोपान बालकाण्ड
श्लोक
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि । मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥ १ ॥
अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥१ ॥
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरम् ॥ २ ॥
श्रद्धा और विश्वासके स्वरूप श्रीपार्वतीजी और श्रीशङ्करजीकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरणमें स्थित ईश्वरको नहीं देख सकते ॥ २ ॥
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम् ।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥ ३ ॥
ज्ञानमय, नित्य, शङ्कररूपी गुरुकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होनेसे ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है ॥३ ॥
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥४ ॥ श्रीसीतारामजीके गुणसमूहरूपी पवित्र वनमें विहार करनेवाले, विशुद्ध विज्ञानसम्पन्न कवीश्वर
श्रीवाल्मीकिजी और कपीश्वर श्रीहनुमान्जीकी मैं वन्दना करता हूँ॥४ ॥
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* * १८ उद्भवस्थितिसंहारकारिणींरामचरितमानस क्लेशहारिणीम् । सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम् ॥ ५ ॥
उत्पत्ति, स्थिति ( पालन ) और संहार करनेवाली, क्लेशोंकी हरनेवाली तथा सम्पूर्ण कल्याणोंकी करनेवाली श्रीरामचन्द्रजीकी प्रियतमा श्रीसीताजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥५ ॥
यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः । यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् ॥ ६ ॥
जिनकी मायाके वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्तासे रस्सीमें सर्पके भ्रमकी भाँति यह सारा दृश्य-जगत् सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागरसे तरनेकी इच्छावालोंके लिये एकमात्र नौका हैं, उन समस्त कारणोंसे पर ( सब कारणोंके कारण और सबसे श्रेष्ठ ) राम कहानेवाले भगवान् हरिकी मैं वन्दना करता हूँ॥६ ॥
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि । स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा- 11911 भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति अनेक पुराण, वेद और [ तन्त्र ] शास्त्रसे सम्मत तथा जो रामायणमें वर्णित है और कुछ अन्यत्रसे भी उपलब्ध श्रीरघुनाथजीकी कथाको तुलसीदास अपने अन्तःकरणके सुखके लिये अत्यन्त मनोहर भाषारचनामें विस्तृत करता है ॥७ ॥
सो० –जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन ।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन ॥ १ ॥
जिन्हें स्मरण करनेसे सब कार्य सिद्ध होते हैं, जो गणोंके स्वामी और सुन्दर हाथीके मुखवाले हैं, वे ही बुद्धिके राशि और शुभ गुणोंके धाम ( श्रीगणेशजी ) मुझपर कृपा करें ॥ १ ॥
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन ।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन ॥२ ॥
जिनकी कृपासे गूँगा बहुत सुन्दर बोलनेवाला हो जाता है और लँगड़ा-लूला दुर्गम पहाड़पर चढ़ जाता है, वे कलियुगके सब पापोंको जला डालनेवाले दयालु ( भगवान्) मुझपर द्रवित हों ( दया करें ), ॥ २ ॥