श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 1031–1040

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1031–1040

पृष्ठ 1031

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* उत्तरकाण्ड * १०२९

जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई । तबहिं दीप बिग्यान बुझाई ॥

ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा । बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा ॥

ज्यों ही वह तेज हवा हृदयरूपी घरमें जाती है, त्यों ही वह विज्ञानरूपी दीपक बुझ जाता है । गाँठ भी नहीं छूटी और वह ( आत्मानुभवरूप ) प्रकाश भी मिट गया । विषयरूपी हवासे बुद्धि व्याकुल हो गयी ( सारा किया-कराया चौपट हो गया) ॥७ ॥

इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई । बिषय भोग पर प्रीति सदाई ॥

बिषय समीर बुद्धिकृत भोरी । तेहि बिधि दीप को बार बहोरी ॥

इन्द्रियों और उनके देवताओंको ज्ञान [ स्वाभाविक ही ] नहीं सुहाता; क्योंकि उनकी विषय- भोगोंमें सदा ही प्रीति रहती है । और बुद्धिको भी विषयरूपी हवाने बावली बना दिया । तब फिर (दुबारा ) उस ज्ञानदीपकको उसी प्रकारसे कौन जलावे? ॥ ८ ॥

दो० –- तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावड़ संसृति क्लेस ।

हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ॥ ११८ ( क ) ॥

[ इस प्रकार ज्ञानदीपकके बुझ जानेपर ] तब फिर जीव अनेकों प्रकारसे संसृति (जन्म- मरणादि) के क्लेश पाता है । हे पक्षिराज! हरिकी माया अत्यन्त दुस्तर है, वह सहजहीमें तरी नहीं जा सकती ॥ ११८ ( क) ॥

कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक ।

होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥ ११८ ( ख ) ॥

ज्ञान कहने ( समझाने ) में कठिन, समझनेमें कठिन और साधनेमें भी कठिन है । यदि घुणाक्षरन्यायसे ( संयोगवश ) कदाचित् यह ज्ञान हो भी जाय, तो फिर [ उसे बचाये रखनेमें ] अनेकों विघ्न हैं ॥ ११८ ( ख) ॥

ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिं बारा ॥

जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ॥

ज्ञानका मार्ग कृपाण ( दुधारी तलवार ) की धारके समान है । हे पक्षिराज! इस मार्गसे गिरते देर नहीं लगती । जो इस मार्गको निर्विघ्न निबाह ले जाता है, वही कैवल्य ( मोक्ष ) रूप परमपदको प्राप्त करता है ॥ १ ॥

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद । संत पुरान निगम आगम बद ॥

राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं । अनइच्छित आवइ बरिआईं ॥

पृष्ठ 1032

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* *१०३० रामचरितमानस संत, पुराण, वेद और [ तन्त्र आदि] शास्त्र [ सब ] यह कहते हैं कि कैवल्यरूप परमपद अत्यन्त दुर्लभ है; किन्तु हे गोसाईं! वही [ अत्यन्त दुर्लभ ] मुक्ति श्रीरामजीको भजनेसे बिना इच्छा किये भी जबरदस्ती आ जाती है ॥ २ ॥

जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई । कोटि भाँति कोउ करै उपाई ॥

तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई । रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ॥

जैसे स्थलके बिना जल नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकारके उपाय क्यों न करे । वैसे ही, हे पक्षिराज! सुनिये, मोक्षसुख भी श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर नहीं रह सकता॥३ ॥

अस बिचारि हरि भगत सयाने । मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥

भगति करत बिनु जतन प्रयासा । संसृति मूल अबिद्या नासा ॥

ऐसा विचारकर बुद्धिमान् हरिभक्त भक्तिपर लुभाये रहकर मुक्तिका तिरस्कार कर देते हैं । भक्ति करनेसे संसृति ( जन्म- मृत्युरूप संसार ) की जड़ अविद्या बिना ही यत्न और परिश्रमके ( अपने-आप ) वैसे ही नष्ट हो जाती है, ॥४ ॥

भोजन करिअ तृपिति हित लागी । जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥

असि हरि भगति सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥

जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्तिके लिये और उस भोजनको जठराग्नि अपने - आप ( बिना हमारी चेष्टाके ) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा? ॥५ ॥

दो० – सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि ।

भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि ॥ ११ ९ ( क ) ॥

हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! मैं सेवक हूँ और भगवान् मेरे सेव्य ( स्वामी ) हैं, इस भावके बिना संसाररूपी समुद्रसे तरना नहीं हो सकता । ऐसा सिद्धान्त विचारकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंका भजन कीजिये ॥ ११ ९ ( क ) ॥

जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य ।

अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य ॥ ११ ९ ( ख ) ॥

जो चेतनको जड कर देता है और जडको चेतन कर देता है, ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं, वे धन्य हैं ॥ ११ ९ (ख) ॥

कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई । सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई ॥

राम भगति चिंतामनि सुंदर । बसइ गरुड़ जाके उर अंतर ॥

पृष्ठ 1033

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* उत्तरकाण्ड * १०३१ मैंने ज्ञानका सिद्धान्त समझाकर कहा । अब भक्तिरूपी मणिकी प्रभुता ( महिमा ) सुनिये । श्रीरामजीकी भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है । हे गरुड़जी! यह जिसके हृदयके अंदर बसती है, ॥ १ ॥

परम प्रकास रूप दिन राती । नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती ॥

मोह दरिद्र निकट नहिं आवा । लोभ बात नहिं ताहि बुझावा ॥

वह दिन- रात [ अपने - आप ही ] परम प्रकाशरूप रहता है । उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये । [ इस प्रकार मणिका एक तो स्वाभाविक प्रकाश रहता है ] फिर मोहरूपी दरिद्रता समीप नहीं आती [ क्योंकि मणि स्वयं धनरूप है ]; और [ तीसरे ] लोभरूपी हवा उस मणिमय दीपको बुझा नहीं सकती, [ क्योंकि मणि स्वयं प्रकाशरूप है, वह किसी दूसरेकी सहायतासे नहीं प्रकाश करती] ॥२ ॥

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई । हारहिं सकल सलभ समुदाई ॥

खल कामादि निकट नहिं जाहीं । बसइ भगति जाके उर माहीं ॥

[उसके प्रकाशसे ] अविद्याका प्रबल अन्धकार मिट जाता है । मदादि पतंगोंका सारा समूह हार जाता है । जिसके हृदयमें भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते ॥३ ॥

गरल सुधासम अरि हित होई । तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई ॥

ब्यापहिं मानस रोग न भारी । जिन्ह के बस सब जीव दुखारी ॥

उसके लिये विष अमृतके समान और शत्रु मित्र हो जाता है T। उस मणिके बिना कोई सुख नहीं पाता । बड़े - बड़े मानस- रोग, जिनके वश होकर सब जीव दुखी हो रहे हैं, उसको नहीं व्यापते ॥४ ॥

राम भगति मनि उर बस जाकें । दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें ॥

चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं । जे मनि लागि सुजतन कराहीं ॥

श्रीरामभक्तिरूपी मणि जिसके हृदयमें बसती है, उसे स्वप्नमें भी लेशमात्र दुःख नहीं होता । जगत्में वे ही मनुष्य चतुरोंके शिरोमणि हैं जो उस भक्तिरूपी मणिके लिये भलीभाँति यत्न करते हैं ॥५ ॥

सो मनि जदपि प्रगट जग अहई । राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई ।

सुगम उपाय पाइबे केरे । नर हतभाग्य देहिं भटभेरे ॥

यद्यपि वह मणि जगत्में प्रकट ( प्रत्यक्ष ) है, पर बिना श्रीरामजीकी कृपाके उसे कोई पा नहीं सकता । उसके पानेके उपाय भी सुगम ही हैं पर अभागे मनुष्य उन्हें ठुकरा देते हैं ॥६ ॥

पावन पर्बत बेद पुराना । राम कथा रुचिराकर नाना ॥

मर्मी सज्जन सुमति कुदारी । ग्यान बिराग नयन उरगारी ॥

पृष्ठ 1034

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* *१०३२ रामचरितमानस वेद- पुराण पवित्र पर्वत हैं । श्रीरामजीकी नाना प्रकारकी कथाएँ उन पर्वतोंमें सुन्दर खानें हैं । संत पुरुष [ उनकी इन खानोंके रहस्यको जाननेवाले ] मर्मी हैं और सुन्दर बुद्धि [खोदनेवाली ] कुदाल है । हे गरुड़जी! ज्ञान और वैराग्य - ये दो उनके नेत्र हैं ॥ ७ ॥

भाव सहित खोजइ जो प्रानी । पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥

मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा । राम ते अधिक राम कर दासा ॥

जो प्राणी उसे प्रेमके साथ खोजता है, वह सब सुखोंकी खान इस भक्तिरूपी मणिको पा जाता है । हे प्रभो! मेरे मनमें तो ऐसा विश्वास है कि श्रीरामजीके दास श्रीरामजीसे भी बढ़कर हैं ॥ ८ ॥

राम सिंधु घन सज्जन धीरा । चंदन तरु हरि संत समीरा ॥

सब कर फल हरि भगति सुहाई । सो बिनु संत न काहूँ पाई ॥

श्रीरामचन्द्रजी समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ हैं । श्रीहरि चन्दनके वृक्ष हैं तो संत पवन हैं ।

सब साधनोंका फल सुन्दर हरिभक्ति ही है । उसे संतके बिना किसीने नहीं पाया॥९॥

अस बिचारि जोड़ कर सतसंगा । राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा ॥

ऐसा विचारकर जो भी संतोंका संग करता है, हे गरुड़जी! उसके लिये श्रीरामजीकी भक्ति सुलभ हो जाती है ॥ १० ॥

दो० – ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं ।

कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं ॥ १२० ( क ) ॥

ब्रह्म ( वेद ) समुद्र है, ज्ञान मन्दराचल है और संत देवता हैं, जो उस समुद्रको मथकर कथारूपी अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्तिरूपी मधुरता बसी रहती है ॥ १२० ( क ) ॥

बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि ।

जय पाइअ सो हरि भगति देख खगेस बिचारि ॥ १२० ( ख ) ॥

वैराग्यरूपी ढालसे अपनेको बचाते हुए और ज्ञानरूपी तलवारसे मद, लोभ और मोहरूपी वैरियोंको मारकर जो विजय प्राप्त करती है, वह हरिभक्ति ही है; हे पक्षिराज! इसे विचारकर देखिये ॥ १२० ( ख ) ॥

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ । जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ ॥

नाथ मोहि निज सेवक जानी । सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी ॥

पक्षिराज गरुड़जी फिर प्रेमसहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझपर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नोंके उत्तर बखानकर कहिये ॥१ ॥

प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा । सब ते दुर्लभ कवन सरीरा ॥

बड़ दुख कवन कवन सुख भारी । सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी ॥

पृष्ठ 1035

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* उत्तरकाण्ड * १०३३ हे नाथ! हे धीरबुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ कौन -सा शरीर है? फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचारकर संक्षेपमें ही कहिये ॥२ ॥

संत असंत मरम तुम्ह जानहु । तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ॥

कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला । कहहु कवन अघ परम कराला ॥

संत और असंतका मर्म ( भेद ) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभावका वर्णन कीजिये । फिर कहिये कि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध सबसे महान् पुण्य कौन-सा है और सबसे महान् भयंकर पाप कौन है? ॥३ ॥

मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई ॥

तात सुनहु सादर अति प्रीती । मैं संछेप कहउँ यह नीती ॥

फिर मानस - रोगोंको समझाकर कहिये । आप सर्वज्ञ हैं और मुझपर आपकी कृपा भी बहुत है । [ काकभुशुण्डिजीने कहा- ] हे तात! अत्यन्त आदर और प्रेमके साथ सुनिये । मैं यह नीति संक्षेपसे कहता हूँ ॥४ ॥

नर तन सम नहिं कवनिउ देही । जीव चराचर जाचत तेही ॥

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी । ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥

मनुष्य- शरीरके समान कोई शरीर नहीं है । चर- अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं । यह मनुष्य- शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्षकी सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको देनेवाला है ॥५ ॥

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥

काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥

ऐसे मनुष्य-शरीरको धारण ( प्राप्त ) करके भी जो लोग श्रीहरिका भजन नहीं करते और नीचसे भी नीच विषयोंमें अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणिको हाथसे फेंक देते हैं और बदलेमें काँचके टुकड़े ले लेते हैं ॥६ ॥

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥

पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ॥

जगत्में दरिद्रताके समान दुःख नहीं है तथा संतोंके मिलनके समान जगत्में सुख नहीं है । और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना, यह संतोंका सहज स्वभाव है ॥ ७ ॥

संत सहहिं दुख पर हित लागी । पर दुख हेतु असंत अभागी ॥

भूर्ज तरू सम संत कृपाला । पर हित निति सह बिपति बिसाला ॥

पृष्ठ 1036

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* *१०३४ रामचरितमानस संत दूसरोंकी भलाईके लिये दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरोंको दुःख पहुँचानेके लिये । कृपालु संत भोजके वृक्षके समान दूसरोंके हितके लिये भारी विपत्ति सहते हैं ( अपनी खालतक उधड़वा लेते हैं ) ॥८ ॥

सन इव खल पर बंधन करई । खाल कढ़ाई बिपति सहि मरई ॥

खल बिनु स्वारथ पर अपकारी । अहि मूषक इव सुनु उरगारी ॥

किन्तु दुष्ट लोग सनकी भाँति दूसरोंको बाँधते हैं और [ उन्हें बाँधनेके लिये ] अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं । हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये; दुष्ट बिना किसी स्वार्थके साँप और चूहेके समान अकारण ही दूसरोंका अपकार करते हैं॥९॥

पर संपदा बिनासि नसाहीं । जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं ॥

दुष्ट उदय जग आरति हेतू । जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥

वे परायी सम्पत्तिका नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेतीका नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं । दुष्टका अभ्युदय ( उन्नति ) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतुके उदयकी भाँति जगत्के दुःखके लिये ही होता है ॥ १० ॥

संत उदय संतत सुखकारी । बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी ॥

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा । पर निंदा सम अघ न गरीसा ॥

और संतोंका अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्यका उदय विश्वभरके लिये सुखदायक है । वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म माना है और परनिन्दाके समान भारी पाप नहीं है ॥ ११ ॥

हर गुर निंदक दादुर होई । जन्म सहस्त्र पाव तन सोई ॥

द्विज निंदक बहु नरक भोग करि । जग जनमइ बायस सरीर धरि ॥

शंकरजी और गुरुकी निन्दा करनेवाला मनुष्य ( अगले जन्ममें ) मेढक होता है और वह हजार जन्मतक वही मेढकका शरीर पाता है । ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला व्यक्ति बहुत-से नरक भोगकर फिर जगत्में कौएका शरीर धारण करके जन्म लेता है ॥१२ ॥

सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी । रौरव नरक परहिं ते प्रानी ॥

होहिं उलूक संत निंदा रत । मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत ॥

जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदोंकी निन्दा करते हैं, वे रौरव नरकमें पड़ते हैं । संतोंकी निन्दामें लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये बीत गया ( अस्त हो गया ) रहता है ॥१३ ॥

सब कै निंदा जे जड़ करहीं । ते चमगादुर होइ अवतरहीं ॥

सुनहु तात अब मानस रोगा । जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा ॥

पृष्ठ 1037

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* उत्तरकाण्ड * १०३५ जो मूर्ख मनुष्य सबकी निन्दा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं । हे तात! अब मानस-रोग सुनिये, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं ॥१४ ॥

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥

काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥

सब रोगोंकी जड़ मोह ( अज्ञान) है । उन व्याधियोंसे फिर और बहुत -से शूल उत्पन्न होते हैं । काम वात है, लोभ अपार ( बढ़ा हुआ ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है ॥ १५ ॥

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई । उपजड़ सन्यपात दुखदाई ॥

बिषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ॥

यदि कहीं ये तीनों भाई ( वात, पित्त और कफ ) प्रीति कर लें ( मिल जायँ) तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है । कठिनतासे प्राप्त ( पूर्ण ) होनेवाले जो विषयोंके मनोरथ हैं, वे ही सब शूल ( कष्टदायक रोग ) हैं; उनके नाम कौन जानता है ( अर्थात् वे अपार हैं ) ॥१६ ॥

ममता दादुदादु कंडु इरषाई । हरष बिषाद गरह बहुताई ॥

पर सुख देखि जरनि सोइ छई । कुष्ट दुष्टता मनमन कुटिलई ॥

ममता दाद है, ईर्ष्या ( डाह ) खुजली है, हर्ष -विषाद गलेके रोगोंकी अधिकता है ( गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं ), पराये सुखको देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है । दुष्टता और मनकी कुटिलता ही कोढ़ है ॥१७ ॥

अहंकार अति दुखद डमरुआ । दंभ कपट मद मान नेहरुआ ॥

तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी । त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी ॥

अहंकार अत्यन्त दुःख देनेवाला डमरू ( गाँठका) रोग है । दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ ( नसोंका ) रोग है । तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि ( जलोदर ) रोग है । तीन प्रकार ( पुत्र, धन और मान ) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं ॥ १८ ॥

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका । कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका ॥

मत्सर और अविवेक दो प्रकारके ज्वर हैं । इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँतक कहूँ ॥ १ ९ ॥

दो० – एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि ।

पीड़हिं संतत जीव कहूँ सो किमि लहै समाधि ॥ १२१ ( क ) ॥

एक ही रोगके वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत-से असाध्य रोग हैं । ये जीवको निरन्तर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशामें वह समाधि ( शान्ति ) को कैसे प्राप्त करे? ॥ १२१ ( क) ॥

पृष्ठ 1038

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* * १०३६ रामचरितमानस

नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान ।

भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान ॥ १२१ ( ख ) ॥

नियम, धर्म, आचार ( उत्तम आचरण ), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों ओषधियाँ हैं, परन्तु हे गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते ॥ १२१ ( ख) ॥

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी । सोक हरष भय प्रीति बियोगी ॥

मानस रोग कछुक मैं गाए । हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए ॥

इस प्रकार जगत्में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोगके दुःखसे और भी दुखी हो रहे हैं । मैंने ये थोड़े -से मानस- रोग कहे हैं । ये हैं तो सबको, परन्तु इन्हें जान पाये हैं कोई विरले ही ॥१ ॥

जाने ते छीजहिं कछु पापी । नास न पावहिं जन परितापी ॥

बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे । मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे ॥

प्राणियोंको जलानेवाले ये पापी ( रोग) जान लिये जानेसे कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परन्तु नाशको नहीं प्राप्त होते । विषयरूप कुपथ्य पाकर ये मुनियोंके हृदयमें भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं ॥२ ॥

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा । जौं एहि भाँति बनै संजोगा ॥

सदगुर बैद बचन बिस्वासा । संजम यह न बिषय कै आसा ॥

यदि श्रीरामजीकी कृपासे इस प्रकारका संयोग बन जाय तो ये सब रोग नष्ट हो जायँ । सद्गुरुरूपी

वैद्यके वचनमें विश्वास हो । विषयोंकी आशा न करे, यही संयम ( परहेज ) हो ॥३ ॥

रघुपति भगति सजीवन मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ॥

एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं । नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं ॥

श्रीरघुनाथजीकी भक्ति संजीवनी जड़ी है । श्रद्धासे पूर्ण बुद्धि ही अनुपान ( दवाके साथ लिया जानेवाला मधु आदि ) है । इस प्रकारका संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं जाते ॥ ४ ॥

जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई । जब उर बल बिराग अधिकाई ॥

सुमति छुधा बाढ़इ नित नई । बिषय आस दुर्बलता गई ॥

हे गोसाईं! मनको नीरोग हुआ तब जानना चाहिये, जब हृदयमें वैराग्यका बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयोंकी आशारूपी दुर्बलता मिट जाय ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1039

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* उत्तरकाण्ड * १०३७

बिमल ग्यान जल जब सो नहाई । तब रह राम भगति उर छाई ॥

सिव अज सुक सनकादिक नारद । जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद ॥

[ इस प्रकार सब रोगोंसे छूटकर ] जब मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी जलमें स्नान कर लेता है, तब उसके हृदयमें रामभक्ति छा रहती है । शिवजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्मविचारमें परम निपुण जो मुनि हैं, ॥ ६ ॥

सब कर मत खगनायक एहा । करिअ राम पद पंकज नेहा ॥

श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं । रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥

हे पक्षिराज! उन सबका मत यही है कि श्रीरामजीके चरणकमलोंमें प्रेम करना चाहिये । श्रुति, पुराण और सभी ग्रन्थ कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी भक्तिके बिना सुख नहीं है ॥७ ॥

कमठ पीठ जामहिं बरु बारा । बंध्यासुत बरु काहुहि मारा ॥

फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला । जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ॥

कछुएकी पीठपर भले ही बाल उग आवें, बाँझका पुत्र भले ही किसीको मार डाले, आकाशमें भले ही अनेकों प्रकारके फूल खिल उठें; परन्तु श्रीहरिसे विमुख होकर जीव सुख नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ८ ॥

तृषा जाड़ बरु मृगजल पाना । बरु जामहिं सस सीस बिषाना ॥

अंधकारु बरु रबिहि नसावै । राम बिमुख न जीव सुख पावै ॥

मृगतृष्णाके जलको पीनेसे भले ही प्यास बुझ जाय, खरगोशके सिरपर भले ही सींग निकल आवें, अन्धकार भले ही सूर्यका नाश कर दे; परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता ॥ ९ ॥

हिम ते अनल प्रगट बरु होई । बिमुख राम सुख पाव न कोई ॥

बर्फसे भले ही अग्नि प्रकट हो जाय ( ये सब अनहोनी बातें चाहे हो जायँ ), परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता ॥ १० ॥

दो० – बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल ।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥ १२२ ( क ) ॥

जलको मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू [ को पेरने ] से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरिके भजन बिना संसाररूपी समुद्रसे नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है ॥ १२२ ( क) ॥

मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।

अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥ १२२ ( ख ) ॥

पृष्ठ 1040

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* *१०३८ रामचरितमानस प्रभु मच्छरको ब्रह्मा कर सकते हैं और ब्रह्माको मच्छरसे भी तुच्छ बना सकते हैं । ऐसा विचारकर चतुर पुरुष सब सन्देह त्यागकर श्रीरामजीको ही भजते हैं ॥ १२२ ( ख ) ॥

श्लोक- विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे ।

हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥ १२२ ( ग ) ॥

मैं आपसे भलीभाँति निश्चित किया हुआ सिद्धान्त कहता हूँ- मेरे वचन अन्यथा ( मिथ्या ) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्रीहरिका भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागरको [ सहज ही ] पार कर जाते हैं ॥ १२२ ( ग ) ॥

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा । ब्यास समास स्वमति अनुरूपा ॥

श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी । राम भजिअ सब काज बिसारी ॥

हे नाथ! मैंने श्रीहरिका अनुपम चरित्र अपनी बुद्धिके अनुसार कहीं विस्तारसे और कहीं संक्षेपसे कहा । हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! श्रुतियोंका यही सिद्धान्त है कि सब काम भुलाकर ( छोड़कर ) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये ॥ १ ॥

प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही । मोहि से सठ पर ममता जाही ॥

तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा । नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा ॥

प्रभु श्रीरघुनाथजीको छोड़कर और किसका सेवन ( भजन ) किया जाय, जिनका मुझ- जैसे मूर्खपर भी ममत्व ( स्नेह ) है । हे नाथ! आप विज्ञानरूप हैं, आपको मोह नहीं है । आपने तो मुझपर बड़ी कृपा की है ॥२ ॥

पूँछहु राम कथा अति पावनि । सुक सनकादि संभु मन भावनि ॥

सत संगति दुर्लभ संसारा । निमिष दंड भरि एकउ बारा ॥

जो आपने मुझसे शुकदेवजी, सनकादि और शिवजीके मनको प्रिय लगनेवाली अति पवित्र रामकथा पूछी । संसारमें घड़ीभरका अथवा पलभरका एक बारका भी सत्संग दुर्लभ है ॥ ३ ॥

देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी । मैं रघुबीर भजन अधिकारी ॥

सकुनाधम सब भाँति अपावन । प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन ॥

हे गरुड़जी! अपने हृदयमें विचारकर देखिये, क्या मैं भी श्रीरामजीके भजनका अधिकारी हूँ? पक्षियोंमें सबसे नीच और सब प्रकारसे अपवित्र हूँ । परन्तु ऐसा होनेपर भी प्रभुने मुझको सारे जगत्को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया [ अथवा प्रभुने मुझको जगत्प्रसिद्ध पावन कर दिया ] ॥ ४ ॥

दो० - आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन ।

निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन ॥ १२३ ( क) ॥